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थोक महंगाई दर बढ़कर 11.39% पर पहुंची

थोक महंगाई दर 11.39% होने के कारण, WPI और CPI में अंतर, महंगाई के प्रकार और इसे नियंत्रित करने के उपाय जानें।

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Written by Akhilesh Anand
Published: 15 October 2026•6 min read
थोक महंगाई दर बढ़कर 11.39% पर पहुंची
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थोक महंगाई दर बढ़कर 11.39% पर पहुंची

यह लेख भारत में महंगाई से जुड़े कारकों को समझने और उसका प्रभाव, आकलन को जानने में सहायक है. UPSC में सामान्य अध्ययन पेपर 3 और BPSC में सामान्य अध्ययन पेपर 2 के खण्ड ख के दृष्टिकोण से यह लेख आपके लिए उपयोगी होगा.

खबरों में क्यों है?

एक बार फिर से महंगाई दर बढ़ने की खबरें आम उपभोक्ताओं के लिए चिंताजनक होती जा रही हैं। वैश्विक परिदृश्य में महंगाई (मुद्रास्फीति) की व्यापक स्तर पर चर्चा के बीच भारतीय बाज़ारों में वस्तुओं की कीमतों में तेजी आने लगी थी और इसी बीच थोक महंगाई दर के आंकड़े बढ़कर 11.39% हो गए हैं। इससे रोजमर्रा की कई वस्तुओं के मूल्य प्रभावित हो सकते हैं। जाहिर है इसका असर कारोबारियों से लेकर आम उपभोक्ताओं तक देखने को मिल सकता है।

IMF के मुताबिक, मुद्रास्फीति एक तय समय में कीमतों के बढ़ने की दर है, चाहे वो समग्र कीमतें हों या कुछ खास वस्तुओं/सेवाओं की। इसका मतलब है कि जीवन यापन कितना महंगा हुआ है, एक साल में वस्तुओं और सेवाओं का एक पूरा बास्केट पहले से कितना महंगा हो गया।भारत में इसका असर ज्यादा महसूस होता है, क्योंकि यहाँ आर्थिक असमानता ज्यादा है और बड़ी आबादी पर कीमतों की मार सीधे पड़ती है।

भारत में महंगाई (मुद्रास्फीति) को मापने के लिये उपयोग किये जाने वाले दो प्राथमिक सूचकांक उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) और थोक मूल्य सूचकांक (WPI) हैं।

क्या है थोक महंगाई?

यह थोक स्तर पर (उत्पादकों और व्यवसायों के दृष्टिकोण से) वस्तुओं की कीमतों में औसत परिवर्तन को मापता है। इसमें CPI की तुलना में वस्तुओं की व्यापक रेंज शामिल है। भारत में WPI में प्राथमिक वस्तुएँ, ईंधन और बिजली तथा निर्मित उत्पाद शामिल हैं। इससे पता चलता है कि थोक बाजार में वस्तुओं की कीमतों में कितना बदलाव हुआ है। जब कच्चे माल, खाद्य पदार्थों और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं, तो थोक महंगाई दर में भी तेजी आ सकती है। थोक कीमतों में बढ़ोतरी का असर उत्पादन और परिवहन की लागत पर भी पड़ सकता है। यदि कंपनियों की लागत बढ़ती है, तो वे इसका कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डाल सकती हैं। वर्ष 2017 में अखिल भारतीय WPI का आधार वर्ष 2004-05 से संशोधित कर 2011-12 कर दिया गया है।

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI)

यह महंगाई (मुद्रास्फीति) का एक प्रमुख संकेतक है जो समय के साथ वस्तुओं और सेवाओं की एक शृंखला के लिये उपभोक्ताओं द्वारा भुगतान की जाने वाली औसत खुदरा कीमतों में बदलाव को मापता है। CPI के लिये आधार वर्ष 2012 है। मौद्रिक नीति समिति (MPC) मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिये CPI डेटा का उपयोग करती है। भारत में विभिन्न CPI हैं जो विशिष्ट जनसंख्या समूहों को पूरा करते हैं:

  • औद्योगिक श्रमिकों के लिये CPI (CPI-IW)
  • कृषि श्रमिकों के लिये CPI (CPI-AL)
  • ग्रामीण मज़दूरों के लिये CPI (CPI-RL)
  • शहरी गैर-शारीरिक कर्मचारियों के लिये CPI (CPI-UNME)

वर्तमान परिदृश्य में महंगाई का संकट

महंगाई वर्तमान भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने एक प्रमुख चुनौती है। खाद्य पदार्थों, ईंधन, परिवहन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि आम लोगों के घरेलू बजट पर असर डालती है। बीते सितंबर में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 11.39% हो गई, जबकि अगस्त में यह 9.92% थी। वहीं, थोक महंगाई दर 5.54% पर पहुंच गई।

महंगाई बढ़ने के प्रमुख कारणों में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, उत्पादन लागत में बढ़ोतरी और आपूर्ति संबंधी समस्याएं शामिल हैं। इसका सबसे अधिक प्रभाव निम्न और मध्यम आय वर्ग पर पड़ता है। बढ़ती कीमतों के कारण लोगों की क्रय शक्ति और बचत करने की क्षमता घटती है, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी आवश्यक सेवाओं पर खर्च करना भी कठिन हो जाता है।

महंगाई पर नियंत्रण के लिए सरकार को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बेहतर बनाने, जमाखोरी रोकने और बाजार में कीमतों की निगरानी मजबूत करने जैसे कदम उठाने चाहिए। साथ ही, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और सरकार के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। प्रभावी नीतियों के माध्यम से कीमतों में स्थिरता बनाए रखना, कमजोर आय वर्ग को राहत देना और लोगों की क्रय शक्ति की रक्षा करना महंगाई नियंत्रण का प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए।

मुद्रास्फीति (महंगाई) के विभिन्न स्वरुप

मांग-जनित मुद्रास्फीति (Demand Pull):जब मांग आपूर्ति से ज्यादा हो जाती है। लोगों के पास पैसा ज्यादा है और सामान कम, तो वे ज्यादा दाम देने को तैयार हो जाते हैं और कीमतें बढ़ जाती हैं। जैसे - उभरती अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता खर्चा बढ़ने से।
लागत-जनित मुद्रास्फीति (Cost Push):जब उत्पादन लागत बढ़ जाती है। कच्चा माल महंगा, वेतन ज्यादा, या सप्लाई चेन टूटना। उदाहरण के लिए मार्च 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध से खाद्य तेल महंगा, 'तेल एवं वसा' में महंगाई 18.79% तक पहुंच गई।
वेतन-मूल्य मुद्रास्फीति (Built-in Inflation):वेतन और कीमत का चक्र। मजदूर ज्यादा वेतन मांगते हैं, कंपनियां लागत निकालने के लिए कीमत बढ़ा देती हैं, फिर मजदूर फिर से ज्यादा वेतन मांगते हैं। जैसे - यूनियनों की सामूहिक सौदेबाजी से वेतन और फिर कीमतें बढ़ना।
मौद्रिक मुद्रास्फीति: जब बाजार में पैसे की सप्लाई बहुत बढ़ जाए। लोगों के पास क्रय शक्ति ज्यादा, तो मांग और कीमत दोनों बढ़ती हैं। जैसे - केंद्रीय बैंक द्वारा ज्यादा नोट छापना।
आपूर्ति संकट:जब अचानक सप्लाई रुक जाए। प्राकृतिक आपदा, युद्ध, सूखा आदि से। उदाहरण के लिए सूखे से फसल खराब और खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ना।

मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के तरीके:

1. मौद्रिक नीति : RBI रेपो रेट घटा-बढ़ा कर बाजार में पैसे की सप्लाई को कंट्रोल करता है। ब्याज ज्यादा होगा तो लोन महंगा होगा , इससे खर्च कम होगा और महंगाई काबू में होगी । साथ ही OMO यानी Open Market Operation (सरकारी बॉन्ड खरीदना/बेचना) से भी पैसे की मात्रा को कंट्रोल किया जाता है।

2. राजकोषीय नीति : सरकार टैक्स और खर्च से मांग को कंट्रोल करती है। टैक्स बढ़ाने से लोगों के हाथ में पैसा कम आता है , तो खर्च और महंगाई दोनों घटते हैं।

3. खाद्य कीमतों का प्रबंधन: भारत में महंगाई अक्सर खाने-पीने से आती है। इसके लिए MSP और PDS जैसी योजनाएं हैं।

4. बफर स्टॉक: सरकार अनाज-दालों का स्टॉक रखती है ताकि कमी के समय कीमत न बढ़े। दाल, तिलहन, गरी (Copra) की सरकारी खरीद होती है।

5. व्यापार नीति: जरूरत पड़ने पर आयात-निर्यात पर रोक लगाकर घरेलू बाजार में सप्लाई और कीमत स्थिर रखी जाती है।

6. जमाखोरी रोकना: कृत्रिम कमी रोकने के लिए जमाखोरी, कालाबाजारी पर कार्रवाई। आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 इस मामले में बहुत असरदार नहीं रहा है।

7. विनिमय दर प्रबंधन: रुपये की स्थिर विनिमय दर से आयात महंगा नहीं होता और महंगाई काबू में रहती है। इसके लिए अलग एजेंसी बनाने का सुझाव दिया जाता है।

8. वित्तीय समावेशन: PMJDY(प्रधानमंत्री जनधन योजना) जैसी योजनाओं से पैसा बैंकों में आता है, तो निवेश के लिए स्थिर फंड मिलता है और महंगाई का दबाव कम होता है।

निष्कर्ष:  

थोक महंगाई दर में बढ़ोतरी अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। इसका असर केवल कारोबार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समय के साथ आम उपभोक्ताओं के खर्च को भी प्रभावित कर सकता है। आगे आने वाला रूख इस बात पर निर्भर करेगा कि वस्तुओं की कीमतें, कच्चे माल की लागत और आपूर्ति की स्थिति कैसी रहती है। यदि थोक कीमतों में तेजी बनी रहती है, तो खुदरा बाजार पर भी दबाव बढ़ सकता है।

Reference:

  1. जनसत्ता ई पेपर

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