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खाद्य पदार्थों में food colouring: U.P. के नए नियम और स्वास्थ्य पर प्रभाव

Explore Uttar Pradesh's food colour rules, banned dyes like Rhodamine B, health risks, FSSAI regulations, and food safety laws in India for UPSC preparation.

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Written by Dilip Kumar
Published: 29 October 2026•10 min read
खाद्य पदार्थों में food colouring: U.P. के नए नियम और स्वास्थ्य पर प्रभाव
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खाद्य पदार्थों में food colouring: उत्तर प्रदेश के नए नियम और स्वास्थ्य पर प्रभाव

चर्चा में क्यों ?

दोस्तों , त्योहारों का मौसम चल रहा है. ऐसे में मिठाइयों, चाट, समोसे, मोमोज, कॉटन कैंडी (रुई कि मिठाई ) और अन्य खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ जाना लाजिमी है। इन दिनों ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए कुछ दुकानदार खाद्य पदार्थों में चटकीले रंगों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब खाने में इस्तेमाल किए जाने वाले रंगों की जगह औद्योगिक रसायनों या प्रतिबंधित रंगों का प्रयोग किया जाता है। दरअसल, बीते दिनों उत्तर प्रदेश के खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (Food Safety and Drug Administration:FSDA) ने खाद्य पदार्थों में रंगों के इस्तेमाल को लेकर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। यह कदम चटनी जैसे खाद्य पदार्थों में गैर-खाद्य औद्योगिक रंगों के इस्तेमाल की जानकारी सामने आने के बाद उठाया गया। इन दिशा-निर्देशों में बताया गया है कि किन खाद्य पदार्थों में रंग डालना प्रतिबंधित है, किनमें निर्धारित शर्तों के तहत रंगों का इस्तेमाल किया जा सकता है और दुकानदारों को किन सावधानियों का पालन करना होगा।

आइये समझते हैं कि खाद्य रंग क्या होते हैं?

ये ऐसे पदार्थ हैं, जिन्हें किसी खाद्य उत्पाद का रंग बदलने, गाढ़ा करने या आकर्षक बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जैसे मिठाई को आकर्षक पीला या लाल रंग देना, केक और पेस्ट्री को अलग-अलग रंगों में तैयार करना। विस्तार से समझें तो खाद्य रंग मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं: (क) प्राकृतिक खाद्य रंग ये प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त होते हैं या खाद्य सामग्री के रूप में रंग प्रदान करते हैं जैसे चुकंदर से लाल या गुलाबी रंग, हल्दी से पीला रंग, टमाटर से लाल रंग, धनिया और पुदीने से हरा रंग, कश्मीरी लाल मिर्च से लाल रंग। (ख) कृत्रिम या सिंथेटिक खाद्य रंग ये रासायनिक प्रक्रियाओं से बनाए जाते हैं। इनमें से कुछ रंगों को भारतीय खाद्य सुरक्षा नियमों के तहत विशेष खाद्य श्रेणियों में एक निर्धारित मात्रा तक इस्तेमाल करने की अनुमति है। उत्तर प्रदेश सरकार ने नए दिशा-निर्देश क्यों जारी किए?

इस कदम के पीछे मुख्य उद्देश्य खाद्य पदार्थों में प्रतिबंधित औद्योगिक रंगों के इस्तेमाल को रोकना और आम लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा करना है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

1. खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकना: कुछ दुकानदार खाद्य पदार्थों को अधिक आकर्षक दिखाने के लिए ऐसे रसायनों का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो खाने के लिए बने ही नहीं हैं।

2. उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की रक्षा: प्रतिबंधित रंगों के सेवन से विषाक्त प्रभाव, एलर्जी तथा अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम हो सकता है।

3. स्ट्रीट फूड की निगरानी: चाट, समोसे, मोमोज, चटनी और अन्य खुले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना जरूरी है।

4. खाद्य कारोबार में जवाबदेही: दुकानदारों और निर्माताओं को रंगों की खरीद, उनकी मात्रा और उनके स्रोत का रिकॉर्ड रखना होगा।

5. खाद्य सुरक्षा नियमों का पालन: केवल उन्हीं रंगों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिनकी संबंधित खाद्य श्रेणी में अनुमति है। इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य केवल रंगों पर नियंत्रण लगाना नहीं, बल्कि खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और सुरक्षा में सुधार करना भी है।

अब बात इसकी कि कौन-कौन से रंग खाद्य पदार्थों में प्रतिबंधित हैं. इसे निम्नलिखित सूचि से आसानी से समझ सकते हैं.

प्रतिबंधित रंगसामान्य उपयोग या पहचानखाद्य पदार्थों में समस्या
रोडामाइन-B (Rhodamine-B)कपड़ा और कागज जैसे उद्योगों में रंगाईभोजन में इसका इस्तेमाल प्रतिबंधित है
मेटानिल येलो (Metanil Yellow)औद्योगिक रंगखाद्य पदार्थों में इसका इस्तेमाल प्रतिबंधित है
बटर येलो (Butter Yellow)औद्योगिक रंगखाने में मिलावट के लिए इसका इस्तेमाल प्रतिबंधित है
मैलाकाइट ग्रीन (Malachite Green)औद्योगिक रंगखाद्य पदार्थों में इसका इस्तेमाल प्रतिबंधित है
ऑरामीन (Auramine)औद्योगिक रंगखाद्य पदार्थों में इसका इस्तेमाल प्रतिबंधित है
ऑरेंज-II (Orange II)औद्योगिक रंगखाद्य पदार्थों में इसका इस्तेमाल प्रतिबंधित है
सूडान रंग (Sudan Dyes)औद्योगिक रंगों का समूहखाद्य पदार्थों में इनका इस्तेमाल प्रतिबंधित है

रोडामाइन-B क्या है?

यह एक कृत्रिम औद्योगिक रंग है, जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से कपड़ा और कागज जैसे उद्योगों में किया जाता है। इसका चमकीला गुलाबी या लाल रंग इसे देखने में आकर्षक बनाता है। कुछ मामलों में इसका इस्तेमाल खाद्य पदार्थों को अधिक चमकीला दिखाने के लिए किए जाने की आशंका सामने आई है जैसे कॉटन कैंडी को गहरा गुलाबी रंग देना, चटनी को अधिक चमकीला लाल दिखाना।

प्रतिबंधित रंग स्वास्थ्य के लिए क्यों खतरनाक हैं?

खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल किए जाने वाले रंगों की सुरक्षा बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इनका सेवन सीधे मानव शरीर में होता है। प्रतिबंधित औद्योगिक रंगों के सेवन से कई प्रकार के स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं। (क) विषाक्त प्रभाव कुछ औद्योगिक रंग शरीर में विषाक्त प्रभाव पैदा कर सकते हैं। इसका जोखिम संबंधित रसायन, सेवन की मात्रा और संपर्क की अवधि पर निर्भर करता है। (ख) लिवर और किडनी को नुकसान कुछ प्रतिबंधित रंगों के संपर्क को लिवर और किडनी से संबंधित नुकसान के जोखिम से जोड़ा गया है। इसलिए खाद्य पदार्थों में ऐसे रंगों का इस्तेमाल गंभीर चिंता का विषय है। (ग) एलर्जी और अतिसंवेदनशीलता कुछ स्वीकृत कृत्रिम रंग भी संवेदनशील व्यक्तियों में एलर्जी या अतिसंवेदनशीलता की प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों में त्वचा पर चकत्ते, सूजन या सांस लेने में कठिनाई जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। (घ) कैंसर संबंधी चिंता रोडामाइन-B जैसे कुछ गैर-खाद्य औद्योगिक रंगों के संभावित दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर चिंता जताई गई है।

किन खाद्य पदार्थों में रंग डालना प्रतिबंधित है?

उत्तर प्रदेश के दिशा-निर्देशों में कई रोजमर्रा के खाद्य पदार्थों में अलग से रंग मिलाने पर रोक को स्पष्ट किया गया है। प्रमुख खाद्य पदार्थ

1. चटनी: समोसे, चाट, मोमोज और रोल के साथ दी जाने वाली लाल या हरी चटनी में अलग से रंग नहीं मिलाया जा सकता। इसके बजाय टमाटर, चुकंदर, धनिया और पुदीने जैसी खाद्य सामग्री का इस्तेमाल किया जा सकता है।

2. कॉटन कैंडी और बर्फ की चुस्की: इनमें गैर-खाद्य औद्योगिक रंग, विशेषकर रोडामाइन-B, इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

3. तंदूरी चिकन और कबाब: इन खाद्य पदार्थों को चमकीला लाल दिखाने के लिए प्रतिबंधित औद्योगिक रंगों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। रंग और स्वाद के लिए उपयुक्त खाद्य सामग्री, जैसे कश्मीरी लाल मिर्च और देगी मिर्च, इस्तेमाल की जा सकती है।

4. दाल, सब्जियाँ और बिरयानी: पकी हुई दाल, सब्जियों और बिरयानी में अलग से रंग मिलाने की अनुमति नहीं है।

5. दूध और सामान्य दुग्ध उत्पाद: दूध, सादा दही, क्रीम, बिना स्वाद वाला मक्खन, छेना और पनीर जैसी निर्दिष्ट श्रेणियों में अलग से रंग डालना प्रतिबंधित है।

6. मसाले और अनाज: पिसे हुए मसाले, चाय, कॉफी, अनाज, दालें, आटा और सूजी जैसी वस्तुओं में रंग मिलाने की अनुमति नहीं है।

7. अन्य खाद्य पदार्थ: खाद्य तेल, शहद, गुड़, शिशु आहार, ताजे फल, कच्ची सब्जियाँ और प्राकृतिक फलों के रस जैसी श्रेणियों में भी अलग से रंग मिलाने पर रोक लागू होती है। इसके अतिरिक्त, ब्रेड और बन के मुख्य भाग में कृत्रिम रंगों का इस्तेमाल प्रतिबंधित है। पैकबंद पेयजल और मिनरल वाटर में भी रंग मिलाने की अनुमति नहीं है।

क्या मिठाइयों और केक में कृत्रिम रंग इस्तेमाल किए जा सकते हैं?

हाँ, लेकिन केवल निर्धारित शर्तों के तहत। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के नियम कुछ निर्दिष्ट खाद्य श्रेणियों में स्वीकृत कृत्रिम रंगों के इस्तेमाल की अनुमति देते हैं। उदाहरण के लिए: कुछ मिठाइयाँ और कन्फेक्शनरी उत्पाद; केक और पेस्ट्री; बिस्कुट और कुकीज़; कुछ निर्दिष्ट प्रसंस्कृत फल; कुछ अन्य खाद्य उत्पाद, जिनमें संबंधित नियम रंगों की अनुमति देते हैं। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक (खाद्य उत्पाद मानक एवं खाद्य सहयोजक) विनियम, 2011 में खाद्य श्रेणियों के अनुसार रंगों के इस्तेमाल के नियम दिए गए हैं।

अब बात भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए कानूनों की

भारत में खाद्य पदार्थों की सुरक्षा और गुणवत्ता के नियमन में सबसे महत्त्वपूर्ण कानून खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 (Food Safety and Standards Act, 2006) है। इस कानून के तहत खाद्य पदार्थों के निर्माण, भंडारण, वितरण, बिक्री और आयात से संबंधित सुरक्षा मानक निर्धारित किए जाते हैं। FSSAI का पूरा नाम Food Safety and Standards Authority of India है। हिंदी में इसे भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण कहा जाता है। यह भारत में खाद्य सुरक्षा मानक निर्धारित करने और खाद्य पदार्थों से संबंधित नियामक व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है।

इसके प्रमुख कार्य हैं:

खाद्य पदार्थों के लिए सुरक्षा मानक निर्धारित करना। खाद्य सहयोजकों और रंगों के इस्तेमाल के नियम तय करना। खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और सुरक्षा से संबंधित नियमन करना। उपभोक्ताओं को सुरक्षित भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था को मजबूत करना। खाद्य कारोबारियों के लिए आवश्यक अनुपालन संबंधी नियम निर्धारित करना।

केंद्र स्तर पर FSSAI मानक निर्धारित करता है, जबकि राज्य के खाद्य सुरक्षा विभाग और संबंधित अधिकारी नियमों के क्रियान्वयन तथा निरीक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उत्तर प्रदेश में FSDA इसी व्यवस्था के अंतर्गत राज्य स्तर पर कार्रवाई करता है।

दोस्तों , खाद्य मिलावट का समाज और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव को समझना भी जरूरी है खाद्य मिलावट स्वास्थ्य से संबंधित समस्या तो पैदा करती ही है, इसके व्यापक सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी होते हैं। इन्हें निम्न बिन्दुओं से समझते हैं: (क) सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रभाव असुरक्षित खाद्य पदार्थों के सेवन से लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। इससे परिवारों के मेडिकल खर्च बढ़ सकते हैं और स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। (ख) गरीब और कमजोर वर्गों पर प्रभाव कम कीमत वाले खाद्य पदार्थों पर निर्भर लोगों के लिए मिलावट का पता लगाना कठिन होता है। इससे बच्चे, कम आय वाले परिवार और अन्य कमजोर समूह अधिक जोखिम में आ सकते हैं। (ग) छोटे कारोबारियों पर प्रभाव जो दुकानदार नियमों का पालन करते हैं, उन्हें ऐसे कारोबारियों से अनुचित प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है, जो सस्ते प्रतिबंधित रसायनों का इस्तेमाल करते हैं। (घ) उपभोक्ताओं के विश्वास में कमी खाद्य पदार्थों में मिलावट की घटनाएँ सामने आने से बाजार में बिकने वाले उत्पादों की गुणवत्ता पर लोगों का भरोसा कम हो सकता है। (ङ) प्रशासनिक चुनौती खुले बाजार, छोटी दुकानों, सड़क किनारे खाद्य स्टॉल और बड़े खाद्य प्रतिष्ठानों की निगरानी के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित कर्मचारियों, प्रयोगशालाओं और नियमित निरीक्षण की आवश्यकता है।

खाद्य सुरक्षा के लिए अपेक्षाएँ

खाद्य पदार्थों में प्रतिबंधित रंगों के इस्तेमाल को रोकने के लिए सरकार, खाद्य कारोबारियों और उपभोक्ताओं को मिलकर काम करना होगा। इसके लिए बिन्दुवार चर्चा की गयी है:

1. नियमित निरीक्षण: मिठाई की दुकानों, रेस्तराँ, ढाबों, बेकरी और सड़क किनारे खाद्य स्टॉलों की नियमित जाँच होनी चाहिए।

2. प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ाना: खाद्य नमूनों की समय पर जाँच के लिए पर्याप्त आधुनिक प्रयोगशालाएँ और प्रशिक्षित कर्मचारी होने चाहिए।

3. दुकानदारों को जागरूक करना: छोटे दुकानदारों को खाद्य-ग्रेड रंगों, प्रतिबंधित औद्योगिक रसायनों और निर्धारित मात्रा के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए।

4. उपभोक्ता जागरूकता: लोगों को समझना चाहिए कि बहुत चमकीला रंग हमेशा अच्छी गुणवत्ता या बेहतर स्वाद का संकेत नहीं होता।

5. आपूर्ति शृंखला की निगरानी: प्रतिबंधित औद्योगिक रंगों की बिक्री, भंडारण और खाद्य पदार्थों में उनके अवैध इस्तेमाल पर निगरानी आवश्यक है।

6. पारदर्शी कार्रवाई: नियमों के उल्लंघन पर उचित कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए और खाद्य सुरक्षा संबंधी जानकारी जनता तक पहुँचाई जानी चाहिए।

7. प्राकृतिक खाद्य सामग्री को प्रोत्साहन: जहाँ उपयुक्त हो, वहाँ टमाटर, चुकंदर, हल्दी और मसालों जैसी खाद्य सामग्री से रंग और स्वाद प्राप्त किया जा सकता है। हालाँकि, इनके इस्तेमाल में भी खाद्य सुरक्षा के लागू नियमों का पालन आवश्यक है।

पूरी चर्चा से स्पष्ट होता है कि खाद्य पदार्थों का आकर्षक दिखना उनकी गुणवत्ता और सुरक्षा की गारंटी नहीं है। लाल चटनी, गुलाबी कॉटन कैंडी या चमकीली मिठाई देखकर उपभोक्ता अक्सर उनकी गुणवत्ता का अनुमान लगाते हैं, लेकिन वास्तविक सुरक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि खाद्य पदार्थों में कौन-से पदार्थ और कितनी मात्रा में इस्तेमाल किए गए हैं। उत्तर प्रदेश के नए दिशा-निर्देश इस बात को रेखांकित करते हैं कि खाद्य रंगों का इस्तेमाल वैज्ञानिक मानकों और निर्धारित नियमों के अनुसार होना चाहिए। केवल स्वीकृत खाद्य रंगों का इस्तेमाल, नियमित निरीक्षण, कारोबारियों की जवाबदेही और उपभोक्ताओं की जागरूकता ही खाद्य सुरक्षा को मजबूत बना सकती है। सुरक्षित भोजन केवल उपभोक्ता की व्यक्तिगत आवश्यकता नहीं, बल्कि लोक स्वास्थ्य और सुशासन का भी महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।

Reference: The Indian Express

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