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इजरायल चुनाव 2026 और भारत

Understand how Israel’s elections influence global diplomacy, Middle East geopolitics, and India-Israel relations.

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Written by Dilip Kumar
Published: 29 October 2026•9 min read
इजरायल चुनाव 2026 और भारत
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इजरायल चुनाव 2026 और भारत

 चर्चा में क्यों ?

दोस्तों बीते 27 अक्टूबर को 120 सदस्यीय इजरायली संसद नेसेट के लिए चुनाव संपन्न हुए हैं. चुनाव में वर्तमान इजरायली प्रधानमंत्री  बेंजामिन नेतेन्याहू की किस्मत दांव पर है. ताजा आँकड़ों के मुताबिक नेतेन्याहू के नेतृत्व वाली लिकुड पार्टी को 53-54 सीटें मिलने की संभावना है जबकि सरकार बनाने के लिए न्यूनतम 61 सीटें होनी चाहिए.

इस ब्लॉग में हमलोग इस चुनाव से जुड़े सभी पहलुओं की चर्चा करेंगे. सबसे पहले तो यह समझेंगे कि इजराइल में कैसी चुनाव प्रणाली है, फिर देखेंगे कि यह भारतीय चुनाव प्रणाली से कैसे अलग है? और अंत में ये भी जानेंगे कि इजरायल चुनाव का वर्तमान वैश्विक कूटनीति से कैसा जुड़ाव है. आइये क्रम के साथ इन सब पर चर्चा करते हैं.

इजराइल की चुनाव प्रणाली 

इजरायली संसद के चुनाव में किसी राजनीतिक दल को मिले कुल वोटों के अनुपात के आधार पर संसद में सीटें दी जाती हैं। इस व्यवस्था को आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation System) कहा जाता है।

इसके विपरीत, भारत में लोकसभा चुनाव के लिए मुख्य रूप से फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (First-Past-the-Post—FPTP) प्रणाली अपनाई जाती है। इसमें किसी निर्वाचन क्षेत्र में सबसे अधिक वोट प्राप्त करने वाला उम्मीदवार विजयी होता है।

 इजरायल में मतदाता सामान्यतः किसी राजनीतिक दल या दलों के गठबंधन की उम्मीदवार सूची को वोट देते हैं। उम्मीदवारों की सूची चुनाव से पहले निर्धारित होती है।

इस व्यवस्था में मतदाता किसी पार्टी की सूची में उम्मीदवारों के क्रम को अपनी पसंद के अनुसार नहीं बदल सकता। इसलिए इसे बंद पार्टी-सूची आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Closed-List Proportional Representation) कहा जाता है।

यानी इजरायल में चुनाव का उद्देश्य केवल यह तय करना नहीं है कि किस निर्वाचन क्षेत्र से कौन जीतेगा, बल्कि यह भी है कि संसद में अलग-अलग राजनीतिक विचारों को उनके मत-प्रतिशत के अनुरूप प्रतिनिधित्व कैसे मिले।

इजरायल की चुनाव प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ

(क) पूरा देश एक निर्वाचन क्षेत्र

भारत में लोकसभा चुनाव के लिए देश को अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में बांटा गया है। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से एक सांसद चुना जाता है।

इजरायल में इसके विपरीत, नेसेट के चुनाव के लिए पूरा देश एक राष्ट्रीय निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है। किसी पार्टी को मिलने वाली सीटें उसके देशव्यापी वोट-प्रतिशत के आधार पर तय होती हैं।

इसका अर्थ है कि इजरायल में भारत की तरह प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से अलग-अलग एक सांसद चुनने की व्यवस्था नहीं है।

(ख) आनुपातिक प्रतिनिधित्व

आनुपातिक प्रतिनिधित्व का अर्थ है कि राजनीतिक दलों को मिले वोटों और संसद में उनकी सीटों के बीच यथासंभव अनुपात बनाए रखने का प्रयास किया जाता है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य छोटे और मध्यम आकार के राजनीतिक दलों को भी संसद में प्रतिनिधित्व का अवसर देना है, बशर्ते वे निर्धारित न्यूनतम चुनावी सीमा पार कर लें।

(ग) बंद पार्टी-सूची प्रणाली

इजरायल में राजनीतिक दल चुनाव से पहले अपने उम्मीदवारों की सूची प्रस्तुत करते हैं। मतदाता पार्टी की सूची को वोट देता है, न कि सूची में शामिल किसी एक उम्मीदवार को अलग से।

यदि किसी दल को पर्याप्त सीटें मिलती हैं, तो उसकी पूर्व निर्धारित सूची में ऊपर के क्रम पर मौजूद उम्मीदवार संसद में पहुंचते हैं।

इससे राजनीतिक दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि उम्मीदवारों के चयन और उनके क्रम का निर्धारण चुनाव से पहले होता है।

(घ) चुनावी सीमा यानी Electoral Threshold

इजरायल में किसी राजनीतिक दल को नेसेट में प्रतिनिधित्व पाने के लिए न्यूनतम चुनावी सीमा पार करनी होती है।

वर्तमान में यह सीमा 3.25% मान्य वोट है। जो दल यह सीमा पार नहीं कर पाते, उन्हें सामान्य सीट-वितरण प्रक्रिया में प्रतिनिधित्व नहीं मिलता।

(ङ) गठबंधन सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका

इजरायल की आनुपातिक चुनाव प्रणाली के कारण कई राजनीतिक दलों को संसद में प्रतिनिधित्व मिल सकता है। ऐसे में किसी एक दल के लिए अपने दम पर बहुमत हासिल करना कठिन हो सकता है।

नेसेट में कुल 120 सीटें हैं। इसलिए सामान्य बहुमत के लिए 61 सदस्यों का समर्थन महत्वपूर्ण होता है। यदि किसी एक दल को 61 सीटें नहीं मिलतीं, तो सरकार बनाने के लिए कई दलों को एक साथ आना पड़ सकता है। इसे गठबंधन सरकार (Coalition Government) कहते हैं।

इस प्रक्रिया में छोटे दल भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि उनके समर्थन से किसी गठबंधन को बहुमत मिल सकता है।

(च) समय से पहले चुनाव

इजरायल में नेसेट का सामान्य कार्यकाल चार वर्ष है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में संसद का कार्यकाल पूरा होने से पहले भी चुनाव हो सकते हैं।

राजनीतिक गतिरोध, सरकार बनाने में विफलता, संसद का समय से पहले विघटन या बजट संबंधी परिस्थितियां समयपूर्व चुनाव का कारण बन सकती हैं।

इसलिए सामान्य कार्यकाल चार वर्ष होने के बावजूद, इजरायल में राजनीतिक परिस्थितियों के कारण चुनाव अपेक्षाकृत जल्दी भी हो सकते हैं।

भारत की चुनाव प्रणाली 

भारत में लोकसभा चुनाव के लिए मुख्य रूप से फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली अपनाई जाती है।

इस प्रणाली में देश को अलग-अलग संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में बांटा जाता है। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से एक सांसद चुना जाता है।

किसी निर्वाचन क्षेत्र में जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक वोट मिलते हैं, वह विजयी घोषित होता है। उसे कुल वोटों का 50% से अधिक प्राप्त करना अनिवार्य नहीं है।

भारत में लोकसभा चुनाव के दौरान मतदाता अपने निर्वाचन क्षेत्र के उम्मीदवार को चुनते हैं। बाद में लोकसभा में दलों की संख्या और उनके समर्थन के आधार पर सरकार का गठन होता है।

कहा जा सकता है कि भारत में भी गठबंधन सरकार बन सकती है, लेकिन उसकी आवश्यकता और स्वरूप चुनाव परिणामों पर निर्भर करते हैं।

इजरायल में सरकार का गठन कैसे होता है?

इजरायल की चुनाव प्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सरकार का गठन है।

चुनाव में मतदाता नेसेट के सदस्यों को चुनते हैं। इसके बाद यह निर्धारित किया जाता है कि कौन-सा नेता संसद में बहुमत का समर्थन प्राप्त करके सरकार बना सकता है।

इजरायल में राष्ट्रपति की भूमिका सरकार गठन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण होती है। राष्ट्रपति निर्वाचित संसदीय गुटों के प्रतिनिधियों से परामर्श करने के बाद उस सांसद को सरकार बनाने का अवसर दे सकता है, जिसके बहुमत का समर्थन हासिल करने की सबसे अच्छी संभावना हो।

चुनाव का परिणाम अभी क्यों महत्वपूर्ण है?

यदि किसी एक दल या राजनीतिक गुट को 61 सीटों का समर्थन नहीं मिलता, तो सरकार बनाने के लिए अन्य दलों के साथ बातचीत करनी पड़ती है।

इसलिए चुनाव के बाद तीन संभावित स्थितियां बन सकती हैं:

  • नेतन्याहू का गुट दूसरे दलों के समर्थन से सरकार बनाए।
  • विपक्षी दल आपस में समझौता करके सरकार बनाने का प्रयास करें।
  • यदि कोई गुट आवश्यक समर्थन नहीं जुटा पाए, तो राजनीतिक गतिरोध पैदा हो और भविष्य में फिर चुनाव की स्थिति बन जाए।

इजरायल के चुनाव भारत के लिए महत्वपूर्ण क्यों ?

इजरायली चुनाव का प्रभाव पश्चिम एशिया की राजनीति, फिलिस्तीन के मुद्दे, ईरान के साथ तनाव, अमेरिका की मध्य-पूर्व नीति और भारत के रणनीतिक हितों पर भी पड़ सकता है।

भारत के लिए इजरायल एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा और व्यापार के क्षेत्रों में सहयोग है।

हालांकि, भारत के सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान और अन्य अरब देशों के साथ भी महत्वपूर्ण आर्थिक एवं रणनीतिक संबंध हैं। इसके अलावा, भारत फिलिस्तीनी लोगों के अधिकारों और Two State Solution(ऐसी नीति जिसमें इजरायल और फिलिस्तीन दोनों के एक-दूसरे से स्वतंत्र राष्ट्र बाने की अपेक्षा की जाती है) का भी समर्थन करता है।

इसलिए इजरायल में चुनाव के परिणामों को समझते समय भारत को तीन प्रमुख पहलुओं पर ध्यान देने की जरुरत है:

  1. इजरायल की घरेलू राजनीति और नई सरकार की नीतियाँ 
  2. पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन और वैश्विक कूटनीति
  3. भारत के रक्षा, ऊर्जा, व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क संबंधी हित

इजरायल के चुनाव और वैश्विक कूटनीति के बीच संबंध 

इजरायल की चुनावी राजनीति का प्रभाव मुख्य रूप से पाँच क्षेत्रों में दिखाई दे सकता है।

(क) अमेरिका और इजरायल के संबंध

संयुक्त राज्य अमेरिका, इजरायल का प्रमुख रणनीतिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच रक्षा, खुफिया जानकारी, सैन्य तकनीक और क्षेत्रीय सुरक्षा में व्यापक सहयोग है।

इजरायल में नई सरकार बनने के बाद अमेरिका के साथ उसके संबंधों में निम्नलिखित मुद्दे महत्वपूर्ण रह सकते हैं:

  • ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसकी क्षेत्रीय गतिविधियों पर नीति।
  • इजरायल की सैन्य सुरक्षा के लिए अमेरिकी समर्थन।
  • गाजा में संघर्ष और युद्धविराम से संबंधित निर्णय।
  • फिलिस्तीन के भविष्य और पश्चिम एशिया में शांति की संभावनाएं।

    भारत के लिए महत्व: अमेरिका और इजरायल के बीच तनाव बढ़ने या घटने का असर भारत की पश्चिम एशिया नीति पर पड़ सकता है। भारत दोनों देशों के साथ महत्वपूर्ण संबंध रखता है और अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप स्वतंत्र निर्णय लेना चाहता है।

(ख) ईरान और पश्चिम एशिया की सुरक्षा

ईरान और इजरायल के बीच लंबे समय से रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता रही है।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव और सशस्त्र समूहों को उसके समर्थन जैसे मुद्दे इजरायल की सुरक्षा नीति के प्रमुख विषय हैं।

इजरायल में नई सरकार के सामने यह महत्वपूर्ण प्रश्न होगा कि वह ईरान के प्रति सैन्य दबाव, कूटनीतिक वार्ता और क्षेत्रीय सहयोग के बीच किस प्रकार संतुलन बनाती है। इसका प्रभाव भारत पर भी पड़ सकता है, क्योंकि भारत के ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंध हैं और वह ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार तथा क्षेत्रीय संपर्क को महत्वपूर्ण मानता है।

(ग) फिलिस्तीन का मुद्दा और अंतरराष्ट्रीय संबंध

फिलिस्तीन का प्रश्न इजरायल की घरेलू राजनीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, दोनों में महत्वपूर्ण है।

इजरायल की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के बीच फिलिस्तीनी राज्य, गाजा की भविष्य की व्यवस्था, वेस्ट बैंक में बस्तियों और सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर मतभेद हैं।

नई सरकार की नीतियों का प्रभाव इन विषयों पर पड़ सकता है:

  1. गाजा में स्थायी युद्धविराम की संभावना।
  2. फिलिस्तीनी प्रशासन की भविष्य की भूमिका।
  3. वेस्ट बैंक में इजरायली बस्तियों का विस्तार।
  4. फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना की संभावना।
  5. इजरायल और अरब देशों के बीच संबंधों का सामान्यीकरण।

    भारत फिलिस्तीन के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करता है और बातचीत के माध्यम से दो-राज्य समाधान की दिशा में प्रयासों का पक्षधर रहा है।

(घ) सऊदी अरब और अरब देशों के साथ संबंध

सऊदी अरब तथा अन्य अरब देशों के साथ इजरायल के संबंध पश्चिम एशिया के शक्ति संतुलन को प्रभावित करते हैं।

इजरायल और कुछ अरब देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया में सुरक्षा, व्यापार, प्रौद्योगिकी और क्षेत्रीय स्थिरता महत्वपूर्ण विषय रहे हैं। यदि इजरायल की नई सरकार अरब देशों के साथ संवाद और सहयोग को प्राथमिकता देती है, तो क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण की संभावना बढ़ सकती हैं।

इसके विपरीत, फिलिस्तीन से संबंधित मुद्दों पर अत्यधिक तनाव क्षेत्रीय सहयोग को कठिन बना सकता है।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, इजरायल के चुनाव का महत्व केवल वहाँ की सरकार के गठन तक सीमित नहीं है। इसके परिणाम पश्चिम एशिया की सुरक्षा, ईरान के साथ संबंधों, फिलिस्तीन के भविष्य और अमेरिका सहित प्रमुख वैश्विक शक्तियों की कूटनीति को प्रभावित कर सकते हैं। 

Reference: The Hindu

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