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अमेरिका-रूस संबंध और भारत की विदेश नीति

Explore why Donald Trump wants better relations with Russia, the role of trade and energy cooperation, US political opposition, and key implications for UPSC an

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Written by Dilip Kumar
Published: 20 October 2026•11 min read
अमेरिका-रूस संबंध और भारत की विदेश नीति
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अमेरिका-रूस संबंध और भारत की विदेश नीति

यह लेख UPSC/BPSC सहित अन्य प्रतियोगिता परीक्षाओं के दृष्टिकोण से अमेरिका-रूस वर्तमान संबंध और भारत की विदेश नीति को समझने में महत्त्वपूर्ण है. इस लेख का संबंध जहाँ UPSC में GS-2 से है वहीं BPSC में इसका जुड़ाव GS-1 के खण्ड ख से है.

दोस्तों आपने भारत-रूस की गाढ़ी दोस्ती और अमेरिका-रूस की गाढ़ी दुश्मनी के बारे में तो जरुर पढ़ा-सुना होगा| लेकिन यदि अमेरिका, रूस के साथ नजदीकी बनाने की कोशिश करने लगे तो क्या भारत को इससे चिंतित होने की जरुरत है? आइये विस्तार से इस संबंध में चर्चा करते हैं.

हाल में G2 को लेकर चर्चा तेज हुई है. G2 का सामान्य अर्थ है दो प्रमुख शक्तियों का ऐसा समूह या आपसी समझ, जिसके माध्यम से वे वैश्विक मामलों पर बड़ा प्रभाव डाल सकें।

इस लेख में G2 के दो अलग-अलग अर्थ समझने जरूरी हैं।

पहला G2: अमेरिका + चीन

दुनिया की दो बड़ी शक्तियाँ यदि आपस में समझौता करके वैश्विक व्यापार, सुरक्षा और एशिया के मामलों पर फैसले लेने लगें, तो भारत जैसे देशों के हित प्रभावित हो सकते हैं।

दूसरा G2: अमेरिका + रूस

यदि अमेरिका और रूस के बीच तनाव कम हो और दोनों ऊर्जा, खनिज, निवेश तथा सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाएँ, तो भारत को अवसर भी मिल सकते हैं और नई चुनौतियों का सामना भी करना पड़ सकता है। ऐसे में भारत को केवल अमेरिका-चीन के संभावित गठजोड़ पर ध्यान नहीं देना चाहिए। अमेरिका और रूस के बीच संभावित रणनीतिक समझौते को भी गंभीरता से समझना चाहिए।

गौरतलब है कि G2 कोई औपचारिक अंतरराष्ट्रीय संगठन नहीं है। यह दो बड़ी शक्तियों के बीच संभावित सहयोग या वैश्विक प्रभाव के बंटवारे को समझाने वाला विचार है।

 यह मुद्दा चर्चा में क्यों है?

दरअसल,अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूसी डीजल की आपूर्ति से जुड़े प्रतिबंधों में ढील देने की घोषणा की है। यह अनुमति अप्रैल 2027 तक के लिए दी गयी है। वहीं दूसरी ओर, बीते दिनों अमेरिका ने ऐसे देशों पर भारी टैरिफ लगाने की शक्ति देने वाला कानून भी बनाया है , जो रूस से तेल खरीदते हैं। भारत के लिए यह विरोधाभास महत्वपूर्ण हो जाता है।

दोस्तों, इस स्थिति को ऐसे समझें कि कोई देश भारत से कहता है कि रूस से तेल खरीदना बंद करो, क्योंकि इससे रूस को आर्थिक लाभ मिलता है। लेकिन जब उसी देश में ईंधन महँगा हो जाता है, तो वह अपने नागरिकों और उद्योगों के लिए रूस से ईंधन खरीदने की अनुमति दे देता है। 

इससे तीन बातें स्पष्ट होती हैं:

  • विदेश नीति में नैतिक तर्कों के साथ-साथ आर्थिक हित भी काम करते हैं।
  • घरेलू राजनीति किसी देश के अंतरराष्ट्रीय फैसलों को प्रभावित करती है।
  • बड़ी शक्तियों की नीतियों में बदलाव संभव है; इसलिए भारत को अपनी रणनीति लचीली रखनी चाहिए।

इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में देशों के हित अक्सर उनके घोषित सिद्धांतों से भी अधिक प्रभावशाली हो सकते हैं।

अमेरिका-रूस संबंधों में सुधार क्यों महत्वपूर्ण है?

यह बात छिपी नहीं है कि अमेरिका और रूस के बीच लंबे समय से तनाव रहा है। इसके पीछे रूस-यूक्रेन युद्ध, रूस पर पश्चिमी प्रतिबंध, यूरोपीय सुरक्षा और दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दे हैं। इन स्थितियों में अमेरिका-रूस संबंधों को सुधारने के प्रयासों के पीछे कुछ संभावित कारण बताए गए हैं जिन्हें निम्नलिखित कारकों से समझा जा सकता है.

1. ऊर्जा और ईंधन की जरूरत

अमेरिका में ईंधन की ऊँची कीमतें महँगाई बढ़ा सकती हैं। रूसी ऊर्जा की आपूर्ति से कीमतों पर दबाव कम करने की कोशिश की जा सकती है।

2. आर्थिक सहयोग

ऊर्जा, खनिज, निवेश और आर्कटिक क्षेत्र के विकास में सहयोग से दोनों देशों को आर्थिक लाभ मिल सकता है।

3. युद्ध और सुरक्षा संबंधी तनाव कम करना

अमेरिका-रूस संवाद के जरिए यूक्रेन युद्ध समाप्त करने या तनाव कम करने का प्रयास हो सकता है। लेकिन बातचीत होने का अर्थ यह नहीं है कि युद्ध का समाधान निश्चित है।

4. रूस की चीन पर निर्भरता में कमी

रूस यदि अमेरिका से आर्थिक और कूटनीतिक संबंध सुधारता है, तो उसे चीन पर अपनी निर्भरता कम करने का अवसर मिल सकता है।  दोनों देशों के हितों में कुछ समानताएँ होने के बावजूद समझौता आसान नहीं है। रूस-यूक्रेन युद्ध, अमेरिकी घरेलू राजनीति और यूरोप की सुरक्षा संबंधी चिंताएँ इसके रास्ते में रुकावटें हैं।

ट्रंप की पहले कार्यकाल से ही रूस के साथ अच्छे संबंध की इच्छा

दोस्तों , ट्रंप के रूस के साथ संबंध सुधारने की इच्छा नई नहीं है। इसकी बानगी आप निम्नलिखित गतिविधियों से देख सकते हैं:

  • G8 में रूस की वापसी की संभावना : 2014 में रूस द्वारा क्रीमिया पर कब्जा करने के बाद रूस को G8 से निलंबित कर दिया गया था। अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने रूस को फिर से इस समूह में शामिल करने की इच्छा जताई।
  • 2018 की हेलसिंकी बैठक: फिनलैंड की राजधानी हेलसिंकी में ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात हुई। इस दौरान ट्रंप ने रूस को अमेरिका का विरोधी बताने से परहेज किया।
  • द्वितीय विश्व युद्ध का उदाहरण: ट्रंप बार-बार याद दिलाते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ ने नाजी जर्मनी के खिलाफ मिलकर लड़ाई लड़ी थी। उनका मानना है कि इसी तरह आज भी दोनों देश साझेदारी कर सकते हैं।

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में रूस के साथ क्या हुआ?

1.फरवरी 2025: रियाद में बातचीत

सऊदी अरब की राजधानी रियाद में अमेरिका और रूस के बीच उच्चस्तरीय बातचीत दोबारा शुरू हुई। इससे दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संपर्क बढ़ा।

2.अगस्त 2025:अलास्का शिखर सम्मेलन

ट्रंप और पुतिन की मुलाकात हुई। हालांकि, इस मुलाकात से रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त नहीं हुआ।

3. सितंबर 2026: मास्को में बातचीत

ट्रंप के दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर ने पुतिन से मुलाकात की। इसका उद्देश्य कूटनीतिक संवाद और संभावित समझौते के रास्ते तलाशना था।

नवंबर 2026 में शेनझेन (चीन) में होने वाले APEC शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रंप-पुतिन मुलाकात की संभावना जतायी गयी है. इसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को भी शामिल करने का विचार सामने आया था। इसके अलावा, दिसंबर 2026 में मियामी में होने वाले G20 शिखर सम्मेलन में ट्रंप , पुतिन की मेजबानी कर सकते हैं। हालांकि अभी इस बारे में पुष्टि नहीं हुई है।

ट्रंप रूस के साथ व्यापार क्यों बढ़ाना चाहते हैं?

ट्रंप का दृष्टिकोण है कि पहले आर्थिक सहयोग बढ़ाया जाए, ताकि राजनीतिक तनाव कम करने और शांति स्थापित करने के लिए अनुकूल माहौल बन सके।

1. ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग

रूस के पास तेल और प्राकृतिक गैस जैसे ऊर्जा संसाधनों का बड़ा भंडार है। यदि अमेरिकी कंपनियों को रूस के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश और व्यापार के अवसर मिलते हैं, तो दोनों देशों के कारोबारी वर्ग के लिए संबंध सुधारना  लाभदायक हो सकता है।

2. आर्कटिक क्षेत्र का विकास

आर्कटिक पृथ्वी का उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र है। यहाँ प्राकृतिक संसाधनों और संभावित समुद्री व्यापार मार्गों का रणनीतिक महत्व है। अमेरिका और रूस के बीच आर्कटिक क्षेत्र में आर्थिक सहयोग के अवसर हो सकते हैं। हालाँकि, वहाँ सैन्य प्रतिस्पर्धा और पर्यावरण संबंधी चुनौतियाँ भी हैं।

3. खनिज संसाधनों में निवेश

रूस में विभिन्न प्रकार के खनिज संसाधन उपलब्ध हैं। इन संसाधनों से जुड़ा व्यापार और निवेश अमेरिकी कंपनियों को आर्थिक लाभ दे सकता है।

4. व्यापार से राजनीतिक तनाव कम करना

ट्रंप की सोच है कि जब दोनों देशों की कंपनियों और निवेशकों के आर्थिक हित एक-दूसरे से जुड़ेंगे, तो वे संबंधों में स्थिरता चाहेंगे। यदि अमेरिकी कंपनियों ने रूस में बड़ी परियोजनाओं में निवेश किया है, तो वे राजनीतिक तनाव और प्रतिबंधों के कारण अपने निवेश को नुकसान से बचाना चाहेंगी।

इस प्रकार आर्थिक सहयोग राजनीतिक संबंध सुधारने का एक माध्यम बन सकता है।

हालाँकि, व्यापार बढ़ने से राजनीतिक दुश्मनी अपने आप समाप्त नहीं होती। दोनों देशों के बीच सुरक्षा और रणनीतिक मतभेद फिर भी बने रह सकते हैं।

इसलिए यहाँ दो हितों के बीच टकराव दिखाई देता है: एक तरफ शांति और आर्थिक सहयोग की कोशिश, दूसरी तरफ यूक्रेन की सुरक्षा संबंधी चिंताएँ।

भारत के लिए तीन प्रमुख सावधानियाँ 

क. अमेरिका और रूस के संबंध हमेशा एक जैसे नहीं रहेंगे

भारत को अमेरिका और रूस के बीच स्थायी दुश्मनी मानकर अपनी विदेश नीति नहीं बनानी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय संबंध बदलते रहते हैं। आज दो देशों में तनाव हो सकता है, जबकि कल उनके बीच आर्थिक या रणनीतिक सहयोग बढ़ सकता है।

भारत के लिए इसका क्या अर्थ है?

भारत रूस से कच्चा तेल खरीदता है और उसके साथ लंबे समय से रक्षा संबंध रखता है। वहीं, अमेरिका भारत के लिए व्यापार, तकनीक, निवेश और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में महत्वपूर्ण साझेदार है।

यदि अमेरिका और रूस के संबंध सुधरते हैं, तो:

  • रूस से भारत की ऊर्जा खरीद पर अमेरिकी दबाव कम होने की संभावना बन सकती है।
  • भारत के रूस के साथ रक्षा संबंधों को लेकर अमेरिका के साथ तनाव कम हो सकता है।
  • भारत को अपनी विदेश नीति में अधिक विकल्प मिल सकते हैं।

हालाँकि, यह केवल एक संभावना है। अमेरिका-रूस संबंध सुधरने से भारत पर प्रतिबंध या टैरिफ का दबाव अपने आप समाप्त नहीं हो जाएगा।

ख.  रूस हमेशा अमेरिका का विरोध नहीं करेगा

भारत को यह नहीं मानना चाहिए कि रूस और अमेरिका के बीच विरोध हमेशा बना रहेगा। रूस अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार अमेरिका से सहयोग भी कर सकता है। रूस के लिए अमेरिका के साथ एक बड़ी शक्ति के रूप में बातचीत करना, आर्थिक अवसर प्राप्त करना और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों में राहत हासिल करना महत्वपूर्ण हो सकता है।

यदि हम इतिहास को देखें तो 1990 के दशक के शुरुआती दौर में रूस ने अमेरिका के साथ संबंध बेहतर करने की कोशिश की थी और इसके कारण भारत उसकी प्राथमिकताओं में पीछे चला गया था।

भारत को इससे क्या सीखना चाहिए?

भारत को रूस के साथ अपने संबंध मजबूत रखने चाहिए, लेकिन यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि रूस हर परिस्थिति में भारत को सबसे अधिक प्राथमिकता देगा।

भारत को निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:

  • रूस के साथ नियमित उच्चस्तरीय संवाद बनाए रखना।
  • रक्षा उपकरणों, कलपुर्जों और तकनीक की आपूर्ति को सुरक्षित रखना।
  • रूस के साथ आर्थिक और ऊर्जा सहयोग बढ़ाना।
  • अपनी सुरक्षा के लिए अन्य देशों पर अत्यधिक निर्भरता कम करना।

भारत को रणनीतिक स्वायत्तता के सन्दर्भ में ध्यान रखना होगा यानी भारत अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय ले और किसी एक शक्तिशाली देश के दबाव में अपनी विदेश नीति तय न करे।

ग. यूरोप भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है

भारत के हित केवल अमेरिका और रूस तक सीमित नहीं हैं। यूरोप के साथ भारत के संबंध भी बहुत अहम हो गए हैं। यूरोप भारत के लिए निम्नलिखित वजहों से महत्त्वपूर्ण है:

  • व्यापार: भारतीय वस्तुओं और सेवाओं के लिए बड़ा बाजार।
  • तकनीक: आधुनिक उद्योग, स्वच्छ ऊर्जा और उन्नत तकनीकी सहयोग।
  • निवेश: भारत में रोजगार और औद्योगिक विकास के अवसर।
  • रक्षा: रक्षा उपकरणों, तकनीक और सैन्य सहयोग के क्षेत्र में साझेदारी।
  • स्थिरता: यूरोप में युद्ध और अस्थिरता का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

यदि अमेरिका और रूस के बीच समझौता हो भी जाता है, तो रूस और यूरोप के बीच तनाव समाप्त होना जरूरी नहीं है। इसलिए केवल अमेरिका-रूस समझौता भारत के सभी हितों की रक्षा नहीं कर सकता। इसलिए भारत को रूस के साथ संबंध बनाए रखने के साथ-साथ यूरोपीय देशों के साथ भी मजबूत संबंध रखने चाहिए।

रूस-यूक्रेन युद्ध और भारत की भूमिका

भारत को यूक्रेन में शांति स्थापित करने के प्रयासों में योगदान देना चाहिए। भारत रूस और यूरोपीय देशों के बीच सीधे संवाद को भी प्रोत्साहित कर सकता है। भारत के सामने चुनौती यह है कि उसके रूस और पश्चिमी देशों, दोनों के साथ महत्वपूर्ण हित जुड़े हुए हैं।

भारत के सामने संतुलन की चुनौती निम्न वजहों से दिखती है.

क. रूस के साथ संबंध

ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा उपकरण, सैन्य तकनीक और दीर्घकालीन रणनीतिक सहयोग।

ख. अमेरिका के साथ संबंध

व्यापार, निवेश, उन्नत तकनीक, रक्षा सहयोग और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में साझेदारी।

ग. यूरोप के साथ संबंध

बाजार, औद्योगिक तकनीक, निवेश, रक्षा सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता।

भारत के लिए सबसे बेहतर रास्ता किसी एक पक्ष को चुनना नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए सभी महत्वपूर्ण साझेदारों के साथ संबंध बनाए रखना है।

कुल मिलाकर, ट्रंप की रूस नीति का मूल विचार यह है कि आर्थिक सहयोग और व्यापारिक हितों के माध्यम से राजनीतिक तनाव कम किया जा सकता है. लेकिन अमेरिकी घरेलू राजनीति, रूस-यूक्रेन युद्ध और यूरोपीय सुरक्षा संबंधी चिंताएँ इस रणनीति की सफलता को सीमित कर सकती हैं। साथ ही भारत की सफल विदेश नीति का आधार किसी एक महाशक्ति के साथ निकटता नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में अपने राष्ट्रीय हितों, आर्थिक सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा करना है। 

Reference: The Indian Express

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