COP31 में ‘ओवरशूट’(Overshoot) की चर्चा: केवल नए शब्द नहीं, ठोस कदम जरूरी
UPSC GS Paper-III पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन
चर्चा में क्यों?
दोस्तों, 9 नवंबर से अंताल्या(तुर्कीये) में जलवायु परिवर्तन से जुड़े सम्मेलन COP31 का आयोजन होना है। इस बीच विशेषज्ञों ने अपनी राय दी है कि दुनिया को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए केवल नए शब्द और नई रणनीतियाँ बनाने के बजाय वास्तविक कार्रवाई पर ध्यान देना चाहिए। इन्होंने विशेष रूप से ‘Overshoot’ (ओवरशूट) की अवधारणा पर सवाल उठाया है। दरअसल, दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि को औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर की तुलना में 1.5°C तक सीमित रखा जाए। लेकिन अब वैज्ञानिक आकलन बताते हैं कि दुनिया कुछ समय के लिए इस सीमा को पार कर सकती है। ऐसे में अगर हम पहले ही तापमान को 1.5°C से ऊपर जाने दे रहे हैं और बाद में उसे नीचे लाने की योजना बना रहे हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आज उत्सर्जन कम करने की जिम्मेदारी खत्म हो गई है।
COP31 क्या है?
COP का पूरा नाम – Conference of the Parties (पक्षकारों का सम्मेलन)। यह संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क अभिसमय (UNFCCC) से जुड़े देशों का वार्षिक सम्मेलन है। इसमें दुनिया के देश मिलकर जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए नीतियाँ और समझौते करते हैं। COP का आयोजन हर साल होता है। इसमें विकसित और विकासशील देश भाग लेते हैं। इसमें ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने, जलवायु वित्त और जलवायु अनुकूलन जैसे मुद्दों पर चर्चा होती है।
Overshoot (ओवरशूट) किसे कहते हैं?
ओवरशूट का मतलब होता है किसी निर्धारित सीमा को कुछ समय के लिए पार कर जाना। जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में इसका अर्थ है: वैश्विक औसत तापमान का 1.5°C की निर्धारित सीमा से ऊपर जाना और बाद में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कमी तथा वातावरण से CO₂ हटाने के प्रयासों के माध्यम से तापमान को फिर से नीचे लाना। इसे तीन चरणों में समझ सकते हैं: 1. Overshoot: वैश्विक तापमान 1.5°C से ऊपर चला जाता है। 2. Peak: तापमान एक उच्चतम स्तर पर पहुँचता है। 3. Decline: उत्सर्जन में कमी और कार्बन हटाने के उपायों से तापमान धीरे-धीरे नीचे लाने का प्रयास किया जाता है। इसे ही Overshoot, Peak and Decline Pathway कहा जाता है। यदि पृथ्वी का तापमान 1.5°C से ऊपर चला जाता है, तो बाद में तापमान कम करने के बावजूद पर्यावरण को हुआ नुकसान पूरी तरह ठीक नहीं हो सकता। इसलिए बेहतर उपाय यह है कि तापमान को पहले ही निर्धारित सीमा से ऊपर जाने से रोका जाए।
1.5°C तापमान की सीमा महत्वपूर्ण क्यों है?
2015 में हुए पेरिस जलवायु समझौते (Paris Agreement) में दुनिया के देशों ने वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर की तुलना में 2°C से काफी नीचे रखने का लक्ष्य रखा। तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित रखने के प्रयास जारी रखने पर सहमति दी। लेकिन 1.5°C की सीमा पार होने से कई गंभीर खतरे पैदा हो सकते हैं।
इसके प्रमुख प्रभाव
1. हिमनदों का पिघलना: हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल सकते हैं, जिससे भविष्य में नदियों के जल प्रवाह और जल सुरक्षा पर असर पड़ेगा।
2. समुद्र का जलस्तर बढ़ना: समुद्र का तापमान बढ़ने और बर्फ पिघलने से समुद्र का स्तर बढ़ेगा। इससे मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे तटीय शहरों को खतरा हो सकता है।
3. अत्यधिक गर्मी: हीटवेव की घटनाएँ अधिक गंभीर हो सकती हैं। इससे स्वास्थ्य, श्रम उत्पादकता और कृषि प्रभावित होंगे।
4. प्रवाल भित्तियों को नुकसान: समुद्र का तापमान बढ़ने से Coral Reefs में ब्लीचिंग की घटनाएँ बढ़ सकती हैं।
5. कृषि पर प्रभाव: अनियमित मानसून, सूखा और अत्यधिक गर्मी से फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है।
लेकिन प्रश्न यह उठता है कि आखिर यह 1.5°C तापमान की सीमा क्या है?
इसका आसान अर्थ है कि आज की पृथ्वी का औसत तापमान, औद्योगिक क्रांति शुरू होने से पहले की पृथ्वी के औसत तापमान से 1.5°C से ज्यादा न बढ़े। औद्योगिक क्रांति से पहले (लगभग 1850–1900 के आसपास) पृथ्वी का वैश्विक औसत तापमान लगभग 13.7°C से 13.9°C माना जाता है। यह पूरी पृथ्वी (भूमि और महासागर) का औसत तापमान है। पेरिस समझौते का 1.5°C लक्ष्य इसी आधार अवधि की तुलना में तापमान वृद्धि को सीमित करने से संबंधित है।
इस सन्दर्भ में कार्बन बजट से जुड़े पहलू को भी समझना जरूरी है
कार्बन बजट का अर्थ है किसी निश्चित तापमान सीमा को पार होने से रोकने के लिए दुनिया अधिकतम कितनी मात्रा में CO₂ का उत्सर्जन कर सकती है। दूसरे शब्दों में, पृथ्वी के पास कार्बन उत्सर्जन की एक सीमित क्षमता है। यदि हम उससे अधिक CO₂ उत्सर्जित करेंगे, तो वैश्विक तापमान बढ़ने की संभावना बढ़ जाएगी। यदि कुछ देश बहुत अधिक CO₂ उत्सर्जित करके इस बजट का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल कर लेते हैं, तो बाकी देशों के लिए तापमान वृद्धि को सीमित रखना और कठिन हो जाता है।
ऐसे में यह समझना जरूरी है कि दुनिया का कुल कार्बन बजट कितना है? अब तक इसमें से कितना खर्च हो चुका है? किस देश ने ऐतिहासिक रूप से कितना कार्बन उत्सर्जित किया है और उसकी जिम्मेदारी कितनी होनी चाहिए? अफ़सोस कि अब तक COP के निर्णयों में कुल या शेष कार्बन बजट की मात्रात्मक सीमा और देशों द्वारा उसके इस्तेमाल की हिस्सेदारी पर पर्याप्त स्पष्ट चर्चा नहीं हुई है।
Overshoot की अवधारणा में समस्या क्या है?
इस बात को लेकर चिंता जाहिर की जा रही है कि ओवरशूट की चर्चा कहीं वास्तविक जलवायु कार्रवाई से ध्यान हटाने का माध्यम न बन जाए। वस्तुतः इसमें निम्नलिखित चार प्रमुख पक्ष शामिल हैं: (क) भविष्य की तकनीक पर जरूरत से ज्यादा भरोसा
ओवरशूट की योजना में यह उम्मीद की जाती है कि भविष्य में वातावरण से बड़ी मात्रा में CO₂ हटाया जा सकेगा। इसे Carbon Dioxide Removal (CDR) कहते हैं। इसके कुछ तरीके हैं:
- बड़े पैमाने पर पौधरोपण।
- जंगलों और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण।
- Direct Air Capture तकनीक से हवा में मौजूद CO₂ को हटाना।
- कुछ तकनीकों के माध्यम से कार्बन को लंबे समय तक जमीन के भीतर संग्रहित करना। समस्या यह है कि भविष्य में बड़े पैमाने पर कार्बन हटाने की तकनीक कितनी प्रभावी और सस्ती होगी, यह अभी निश्चित नहीं है।
(ख) कुछ नुकसान वापस ठीक नहीं हो सकते
उदाहरण के लिए यदि हिमालय का कोई ग्लेशियर पूरी तरह पिघल गया तो बाद में यदि वैश्विक तापमान घट भी जाता है, तो वह ग्लेशियर तुरंत अपने पुराने आकार में वापस नहीं आ जाएगा। इसलिए तापमान को बाद में कम करने की योजना, आज होने वाले नुकसान का पूरा समाधान नहीं है।
(ग) वास्तविक उत्सर्जन कटौती से ध्यान हटना
यदि देश यह मान लें कि भविष्य में कार्बन हटाने वाली तकनीकें उपलब्ध हो जाएँगी, तो वे आज जीवाश्म ईंधन के उपयोग को कम करने में देरी कर सकते हैं।
(घ) जिम्मेदारी तय करने का सवाल
गौरतलब है कि दुनिया के सभी देशों ने जलवायु परिवर्तन में बराबर योगदान नहीं दिया है। यह जगजाहिर है कि औद्योगिक क्रांति के बाद विकसित देशों ने लंबे समय तक कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। इसलिए सवाल उठता है: 1. किस देश ने ऐतिहासिक रूप से कितना प्रदूषण किया? 2. किस देश ने उपलब्ध कार्बन बजट का कितना हिस्सा इस्तेमाल किया? 3. जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान की भरपाई कौन करेगा? विकसित और विकासशील देशों के बीच विवाद क्या है?
जलवायु परिवर्तन पर दुनिया के देशों के बीच एक बड़ा विवाद जिम्मेदारी और संसाधनों को लेकर है।
विकसित देशों का पक्ष 1. सभी देशों को अपने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तेजी से कटौती करनी चाहिए। 2. जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए सभी देशों को अधिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए। 3. उत्सर्जन कम करने के लिए नई तकनीकों को अपनाना चाहिए।
विकासशील देशों का पक्ष 1. विकसित देशों ने औद्योगिक क्रांति के बाद लंबे समय तक अधिक प्रदूषण किया है। 2. विकासशील देशों को अभी गरीबी, बेरोजगारी और ऊर्जा की कमी जैसी समस्याओं से निपटना है। 3. विकसित देशों को जलवायु वित्त और आधुनिक तकनीक उपलब्ध करानी चाहिए। 4. विकासशील देशों पर विकसित देशों के समान जिम्मेदारी नहीं थोपी जानी चाहिए।
भारत के लिए यह मुद्दा क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत एक विकासशील देश है। यहाँ आर्थिक विकास, ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। भारत के सामने कुछ प्रमुख चुनौतियाँ हैं:
1. ऊर्जा की बढ़ती मांग: भारत में उद्योग, परिवहन, कृषि और शहरीकरण के कारण बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। कोयला अभी भी भारत के ऊर्जा तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
2. जलवायु परिवर्तन का अधिक प्रभाव: भारत में हीटवेव, बाढ़, सूखा, अनियमित मानसून और हिमालयी ग्लेशियरों से जुड़े खतरे बढ़ रहे हैं।
3. जलवायु वित्त की आवश्यकता: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और जलवायु अनुकूल बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए बड़े निवेश की जरूरत है।
4. विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन: भारत को गरीबी दूर करने, रोजगार पैदा करने और औद्योगिक विकास के साथ-साथ उत्सर्जन भी कम करना है।
भारत को COP31 में निम्नलिखित मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए:
- विकसित देशों से जलवायु वित्त की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना
- विकासशील देशों को सस्ती और आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराना
- ऐतिहासिक उत्सर्जन के आधार पर जिम्मेदारी तय करना।
- नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना।
- जलवायु अनुकूलन और आपदा प्रबंधन को मजबूत करना।
- उत्सर्जन में कटौती के साथ-साथ विकासशील देशों की ऊर्जा जरूरतों का ध्यान रखना।
COP31 में किन बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए?
1. Carbon Budget: कुल और शेष कार्बन बजट का वैज्ञानिक आकलन होना चाहिए।
2. Emission Reduction: केवल भविष्य के लक्ष्यों की घोषणा नहीं, बल्कि वर्तमान उत्सर्जन में वास्तविक कटौती होनी चाहिए।
3. Climate Finance: विकासशील देशों को पर्याप्त वित्तीय सहायता मिलनी चाहिए।
4. Technology Transfer: स्वच्छ ऊर्जा और कार्बन प्रबंधन की तकनीक सुलभ होनी चाहिए।
5. Climate Justice: देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी और आर्थिक क्षमता के आधार पर जलवायु कार्रवाई होनी चाहिए।
6. Adaptation: बाढ़, सूखा, हीटवेव और समुद्र के बढ़ते जलस्तर से निपटने की तैयारी मजबूत होनी चाहिए।
पूरी चर्चा से स्पष्ट होता है कि दुनिया को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वास्तविक कार्रवाई करनी चाहिए, न कि केवल नई अवधारणाएँ और शब्द गढ़ने चाहिए। ओवरशूट की अवधारणा यह मानकर चलती है कि तापमान पहले 1.5°C से ऊपर जाएगा और बाद में उसे नीचे लाने का प्रयास किया जाएगा। लेकिन समस्या यह है कि इस दौरान ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्र का जलस्तर बढ़ना और जैव विविधता को नुकसान जैसी घटनाएँ हो सकती हैं, जिनकी भरपाई बाद में संभव नहीं होगी। इसलिए COP31 में केवल भविष्य की योजनाओं पर चर्चा करने के बजाय कार्बन बजट, ऐतिहासिक जिम्मेदारी, वास्तविक उत्सर्जन कटौती, जलवायु वित्त और तकनीकी सहायता पर ठोस निर्णय लेने चाहिए।
Reference: The Hindu





