जब कानून मौन हो, तो संविधान न्यायपालिका का मार्गदर्शन करे: CJI सूर्यकांत
यह ब्लॉग UPSC एवं अन्य प्रतियोगिता परीक्षाओं में भारतीय राजव्यवस्था विषय से जुड़े न्यायपालिका टॉपिक के दृष्टिकोण से उपयोगी है.
चर्चा में क्यों?
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने एक आयोजन में संबोधन के दौरान कहा है कि जब किसी नए मुद्दे पर कानून स्पष्ट उत्तर नहीं देता, तो न्यायपालिका को संविधान के मूल्यों के आधार पर मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए। दिल्ली हाईकोर्ट की स्थापना के 60 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि तकनीक बदल सकती है, लेकिन गरिमा, स्वतंत्रता और समानता जैसे संवैधानिक मूल्य नहीं बदलते। उन्होंने विशेष रूप से तीन आधुनिक चुनौतियों का उल्लेख किया:
- क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से बनाए गये कंटेंट को कॉपीराइट मिलना चाहिए?
- डीपफेक जैसी तकनीकों से होने वाले नुकसान से कानून कैसे निपटे
- तकनीकी नवाचार को प्रोत्साहित करते हुए व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा कैसे की जाए? CJI के अनुसार, ऐसे प्रश्नों के उत्तर हमेशा मौजूदा कानूनों में स्पष्ट रूप से नहीं मिलते। ऐसी परिस्थितियों में संविधान न्यायपालिका को दिशा देता है।
दोस्तों, कानून का मौन (Silence of Law) होने का अर्थ है कि किसी विशेष परिस्थिति के बारे में मौजूदा कानून में स्पष्ट प्रावधान या सीधा उत्तर उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति तब उत्पन्न हो सकती है, जब:
- कोई नई तकनीक सामने आती है।
- किसी नई सामाजिक समस्या का जन्म होता है।
- मौजूदा कानून उस परिस्थिति की स्पष्ट रूप से कल्पना नहीं करता।
- किसी कानूनी प्रावधान के अर्थ को लेकर अस्पष्टता होती है।
- किसी विवाद में कानून के अलग-अलग प्रावधानों के बीच सामंजस्य स्थापित करना आवश्यक होता है।
ऐसे में संविधान की भूमिका सामने आती है जो भारत के संविधान निर्माताओं की अमूल्य धरोहर है.
संविधान न्यायपालिका का मार्गदर्शन कैसे करता है?
भारतीय संविधान देश का सर्वोच्च कानून है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका, तीनों को संविधान की सीमाओं के भीतर काम करना होता है। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, संविधान मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है और न्यायपालिका को असंवैधानिक कानूनों तथा सरकारी कार्रवाइयों की न्यायिक समीक्षा करने की शक्ति प्रदान करता है।
CJI सूर्यकांत के बयान को समझने के लिए संविधान के तीन प्रमुख मूल्यों पर ध्यान देना चाहिए।
क. मानवीय गरिमा (Human Dignity) मानवीय गरिमा का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकारी है। किसी व्यक्ति को केवल तकनीकी प्रयोग की वस्तु नहीं माना जा सकता। नई तकनीक के विकास और इस्तेमाल में उसके अधिकारों का भी ध्यान रखना आवश्यक है। जैसे मानवीय गरिमा का विचार संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की न्यायिक व्याख्या से भी जुड़ा है।
ख. स्वतंत्रता (Liberty) स्वतंत्रता का अर्थ है कि व्यक्ति को कानून द्वारा निर्धारित उचित सीमाओं के भीतर अपने विचार रखने और जीवन से जुड़े निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त है। यहाँ पर तकनीक से जुड़े स्वतंत्रता के कई पहलू सामने आते हैं जैसे इंटरनेट पर विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता. व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा।
ग. समानता (Equality) समानता का अर्थ है कि कानून के सामने सभी व्यक्ति समान हैं और उनके साथ मनमाना भेदभाव नहीं होना चाहिए। AI के संदर्भ में यह सिद्धांत विशेष महत्त्व रखता है। उदाहरण के लिए यदि किसी AI प्रणाली का इस्तेमाल नौकरी के लिए उम्मीदवार चुनने में किया जाता है। और प्रणाली पक्षपातपूर्ण डेटा के कारण किसी विशेष सामाजिक समूह के योग्य उम्मीदवारों को अनुचित रूप से अस्वीकार करती है, तो समानता से जुड़े प्रश्न खड़े हो सकते हैं।
न्यायपालिका की भूमिका
लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका का कार्य केवल कानून की धाराओं को लागू करना नहीं है। उसे कानून की व्याख्या करनी होती है, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करनी होती है और यह सुनिश्चित करना होता है कि सरकारी संस्थाएँ संविधान के अनुसार कार्य करें। जब कोई नया विवाद सामने आता है, तो न्यायपालिका को कई बातों पर विचार करना पड़ता है। जैसे न्यायिक व्याख्या (Judicial Interpretation) यानी कानून के शब्दों, उद्देश्य और दायरे को समझकर किसी विशेष मामले में उसका अर्थ निर्धारित करना। इसी तरह संवैधानिक नैतिकता को महत्त्व देना होता है. अर्थात संविधान में निहित मूल्यों, संस्थागत मर्यादाओं और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप कार्य करना। इसमें समानता, स्वतंत्रता, गरिमा, धर्मनिरपेक्षता और कानून के शासन जैसे सिद्धांत महत्त्वपूर्ण हैं।
जब किसी नए मुद्दे पर कानूनी अस्पष्टता हो, तब ये मूल्य न्यायिक व्याख्या में मार्गदर्शन कर सकते हैं।
AI और कॉपीराइट: CJI ने इस मुद्दे को क्यों उठाया?
CJI सूर्यकांत ने जिन प्रमुख प्रश्नों का उल्लेख किया, उनमें एक प्रश्न यह था कि क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से सामग्री को बनाए गये कॉपीराइट मिलना चाहिए। न्यायालयों को ऐसे विवादों में निम्नलिखित पहलुओं पर विचार करना पड़ सकता है:
- मौलिकता का निर्धारण कैसे किया जाए?
- AI के उपयोग में मानव रचनात्मक योगदान की क्या भूमिका हो? AI से तैयार सामग्री के अधिकार किसे प्राप्त हों?
- मौजूदा रचनाओं का AI प्रशिक्षण में उपयोग किन परिस्थितियों में वैध है?
- रचनाकारों और तकनीकी कंपनियों के हितों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए? इन प्रश्नों के समाधान में मौजूदा कानूनों की व्याख्या महत्त्वपूर्ण होगी।
डीपफेक (Deepfake): नई तकनीक और मौलिक अधिकारों की चुनौती
डीपफेक ऐसी कृत्रिम रूप से बनाई गई या बदली गई तस्वीर, आवाज या वीडियो सामग्री को कहा जाता है, जिसमें किसी व्यक्ति को कुछ ऐसा कहते या करते हुए दिखाया जा सकता है जो उसने वास्तव में नहीं किया। यह तकनीक AI का उपयोग करके सामग्री को वास्तविक जैसा बना सकती है।
डीपफेक से जुड़ी प्रमुख समस्याएँ
1. निजता का उल्लंघन: किसी व्यक्ति की तस्वीर या आवाज का उसकी अनुमति के बिना दुरुपयोग हो सकता है।
2. प्रतिष्ठा को नुकसान: नकली सामग्री से व्यक्ति की सामाजिक और व्यावसायिक प्रतिष्ठा प्रभावित हो सकती है।
3. गलत सूचना: डीपफेक के माध्यम से झूठी खबरें फैल सकती हैं।
4. चुनावी प्रक्रिया पर प्रभाव: भ्रामक सामग्री मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित कर सकती है।
5. आर्थिक धोखाधड़ी: किसी अधिकारी या कारोबारी की नकली आवाज का इस्तेमाल करके धन ट्रांसफर करवाया जा सकता है। न्यायपालिका के सामने मुख्य चुनौती न्यायालय को यह सुनिश्चित करना पड़ सकता है कि डीपफेक के कारण किसी व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन न हो, लेकिन साथ ही वैध अभिव्यक्ति और रचनात्मक गतिविधियों पर अनावश्यक प्रतिबंध भी न लगे।
अनुच्छेद 21 और तकनीकी युग में व्यक्तिगत स्वतंत्रता
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है कि किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है। समय के साथ न्यायिक व्याख्या ने अनुच्छेद 21 के दायरे को व्यापक बनाया है। निजता के अधिकार को भी मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है।
अतः जब कानून मौन हो, तो न्यायपालिका को संवैधानिक मूल्यों के आधार पर उचित समाधान तलाशना चाहिए, लेकिन शक्तियों के पृथक्करण और लोकतांत्रिक जवाबदेही का सम्मान भी करना चाहिए।
निष्कर्ष
पूरी चर्चा से स्पष्ट होता है कि CJI सूर्यकांत का वक्तव्य भारतीय संविधान की स्थायी प्रासंगिकता को रेखांकित करता है। समाज, अर्थव्यवस्था और तकनीक बदलते रहते हैं, लेकिन मानवीय गरिमा, स्वतंत्रता, समानता और न्याय जैसे संवैधानिक मूल्य लोकतांत्रिक शासन के मूल आधार बने रहते हैं। AI, डीपफेक और डिजिटल कॉपीराइट जैसे मुद्दे यह दिखाते हैं कि कानून को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप विकसित होना पड़ता है। जब मौजूदा कानून किसी नई समस्या का स्पष्ट उत्तर नहीं देता, तो न्यायपालिका संवैधानिक मूल्यों और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के आधार पर उचित व्याख्या कर सकती है।
Reference: The Hindu




