भारत के छः राज्यों में ही विधान परिषद् क्यों?
यह ब्लॉग क्रमशः UPSC एवं अन्य प्रतियोगिता परीक्षाओं में भारतीय राजव्यवस्था के अंतर्गत राज्य विधान परिषद् टॉपिक को समझने मी सहायक होगा.
दोस्तों, भारत एक लोकतांत्रिक देश है. लोकतंत्र की रक्षा के लिए सरकार के तीन अंगों कार्यपालिका , विधायिका और न्यायपालिका की बड़ी भूमिका होती है. हमारे देश में केंद्र के स्तर पर द्विसदनीय विधायिका को अपनाया गया है जबकि छः राज्यों में द्विसदनीय विधायिका की यह व्यवस्था अपनाई गई है. केंद्र के स्तर पर द्विसदनीय विधायिका को क्रमशः लोक सभा (निम्न सदन) और राज्य सभा (उच्च सदन) कहा जाता है जबकि जिन राज्यों में द्विसदनीय विधायिका हैं उन्हें क्रमशः विधान सभा और विधान परिषद् नाम से संबोधित किया जाता है.
हाल ही में उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक की कुछ विधान परिषद सीटों के लिए चुनाव हुए हैं. ऐसे में कई सवाल आपके मन में आ सकते हैं जैसे ये परिषदें केवल छः राज्यों में ही क्यों हैं और ऐसे बाकी दो राज्य कौन हैं ? विधान परिषदों की जरुरत है भी या नहीं? क्या भारत का कोई भी वयस्क मतदाता विधान परिषदों के चुनाव में मतदान का अधिकारी होता है? विधान परिषदों के कर्तव्य क्या होते हैं? इस ब्लॉग में हमलोग इस विषय को सिलसिलेवार रूप में समझने की कोशिश करते हैं.
भारतीय राज्यों में विधान परिषदों का इतिहास
भारतीय राज्यों में विधान परिषदों को लेकर इतिहास मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों से जुड़ा है, जिसके कारण 1919 में राष्ट्रीय स्तर पर राज्य परिषद का गठन हुआ। फिर 1935 के भारत सरकार अधिनियम ने भारतीय प्रांतों में द्विसदनीय विधानमंडल स्थापित किए। गौरतलब है कि इस अधिनियम के जरिये ब्रिटेन शासित 11 प्रान्तों में से 6 में विधान परिषदों की स्थापना का प्रावधान किया गया. ये थे मद्रास, बम्बई, बंगाल, संयुक्त प्रान्त,बिहार और असम । अधिनियम के तहत 1937 में बंगाल में पहली बार विधान परिषद ने कार्य करना शुरू किया।
यहाँ पर एक सवाल लाजिमी है कि ब्रिटिश सरकार ने मद्रास, बम्बई, बंगाल, संयुक्त प्रान्त,बिहार और असम में ही विधान परिषद् की स्थापना क्यों की?
इसके उत्तर निम्नलिखित आधारों पर समझे जा सकते हैं:
क. प्रशासनिक महत्त्व: मद्रास, बम्बई और बंगाल ब्रिटिश भारत की प्रमुख प्रेसीडेंसियाँ थीं। इन क्षेत्रों में ब्रिटिश प्रशासन का पुराना और मजबूत ढाँचा मौजूद था।
ख. जनसंख्या और प्रशासनिक आवश्यकताएँ: बड़े और प्रशासनिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण प्रान्तों में कानून बनाने, राजस्व वसूलने, शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और अन्य प्रशासनिक मामलों के लिए अधिक संगठित व्यवस्था की आवश्यकता थी।
ग. राजनीतिक गतिविधियों का प्रभाव: बंगाल, बम्बई और मद्रास में शिक्षित भारतीयों, वकीलों, व्यापारियों और राजनीतिक संगठनों की सक्रियता अपेक्षाकृत अधिक थी।
घ. प्रशासनिक विकेंद्रीकरण: विधान परिषदों के माध्यम से प्रान्तीय स्तर पर कानून बनाने की व्यवस्था विकसित की गई। इससे कुछ विधायी कार्य प्रान्तों में किए जा सकते थे।
बिहार जैसे राज्य के संदर्भ में संसदीय विकास 1936 में हुआ, जब बिहार को एक अलग राज्य का दर्जा मिला। भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत, एक सदनीय विधायिका द्विसदनीय स्वरूप में परिवर्तित हो गई, अर्थात् बिहार विधान परिषद और बिहार विधान सभा।
इससे पहले स्वतंत्रता संग्राम के शुरूआती दिनों में ही कुछ बुद्धिजीवियों ने बंगाल से बिहार राज्य के पृथक्करण के लिए आंदोलन शुरू किया था। इस मांग की गंभीरता को देखते हुए, तत्कालीन भारत सरकार ने राज्य सचिव को पत्र लिखकर बिहार और उड़ीसा के लिए लेफ्टिनेंट गवर्नर का पद सृजित करने, विधान परिषद का गठन करने और पटना को बिहार और उड़ीसा की राजधानी बनाने की सिफारिश की।
25 अगस्त, 1911 के दिन भारत सरकार द्वारा ऐसी सिफारिश की गई थी। पुनः भारतीय परिषद अधिनियम 1861, भारत सरकार अधिनियम 1909 (1912 में संशोधित) के तहत परिषद का गठन किया गया था और इसमें विभिन्न श्रेणियों से संबंधित कुल 43 सदस्यों को शामिल किया गया था।
वहीं कर्नाटक में विधान परिषद् 1907 से अस्तित्व में है। हालाँकि, उस समय कर्नाटक राज्य का वर्तमान स्वरूप नहीं था और इसे मैसूर विधान परिषद् (Mysore Legislative Council) कहा जाता था।
भारत की आजादी के बाद 1952 में बंगाल विधान परिषद् ने औपचारिक रूप लिया लेकिन साल 1969 में यहाँ से विधान परिषद् को उन्मूलित किया गया. इसके अलावा असम की परिषद 1947 में समाप्त हुई, जबकि मद्रास/तमिलनाडु की परिषद 1986 में।
वर्तमान में उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक के साथ-साथ आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में विधान परिषदों की व्यवस्था है. इनमें सबसे बड़ी विधान परिषद् सदस्य संख्या(100) उत्तर प्रदेश की है.
दोस्तों , इससे आप समझ सकते हैं कि औपनिवेशिक भारत की संवैधानिक गतिविधियों ने कहीं-न-कहीं भारत के राज्यों में विधान परिषद् स्थापित करने में भूमिका निभायी.
अब समझते हैं कि भारतीय संविधान राज्य विधान परिषद् की स्थापना या उत्सादन ( समाप्त करना) के लिए क्या प्रावधान करता है.
संविधान के अनुच्छेद 169 के तहत संसद विधान परिषद के गठन या उसे समाप्त करने के लिए कानून पारित कर सकती है, "यदि राज्य की विधान सभा अपने कुल सदस्यों के बहुमत से और उपस्थित एवं मतदान करने वाले विधानसभा सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से इस आशय का प्रस्ताव पारित करती है।"
अनुच्छेद 169 के अंतर्गत संसद साधारण बहुमत से कानून पारित कर सकती है। इसके लिए संविधान संशोधन की विशेष प्रक्रिया आवश्यक नहीं है।
अनुच्छेद 171 इसकी संरचना निर्धारित करता है। किसी राज्य में विधान पार्षदों की कुल संख्या विधायकों की कुल संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती और यह 40 से कम नहीं हो सकती।
अब समझते हैं कि भारत जैसे देश में विधान परिषदों की जरुरत है भी या नहीं?
इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिए पक्ष और विपक्ष दोनों पहलुओं को देखना होगा. सबसे पहले विधान परिषद् होने के पक्ष में दिए जाने वाले निम्नलिखित तर्कों पर गौर करते हैं.
(क) कानूनों की दोबारा समीक्षा
विधान सभा में कभी-कभी राजनीतिक बहुमत के कारण किसी विधेयक को जल्दबाजी में पारित किया जा सकता है। विधान परिषद् उस विधेयक पर दोबारा चर्चा कर सकती है और उसमें सुधार के सुझाव दे सकती है। इससे कानूनों की गुणवत्ता में सुधार होने की संभावना रहती है।
(ख) विशेषज्ञों को प्रतिनिधित्व
विधान परिषद् में ऐसे लोगों को भी प्रतिनिधित्व मिल सकता है जो प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति में सक्रिय नहीं हैं, लेकिन शिक्षा, साहित्य, विज्ञान या समाजसेवा के क्षेत्र में योगदान देते हैं। इससे विधायी प्रक्रिया में विशेषज्ञता का लाभ मिल सकता है।
(ग) जल्दबाजी में कानून बनने पर रोक
विधान परिषद् कानूनों पर पुनर्विचार का अवसर देती है।
यह विधान सभा द्वारा पारित विधेयकों की समीक्षा कर सकती है और संशोधन के सुझाव दे सकती है।
हालाँकि, इसकी शक्तियाँ सीमित हैं। यह सामान्य विधेयक को अनिश्चितकाल तक रोक नहीं सकती।
(घ) लोकतांत्रिक विचार-विमर्श को बढ़ावा
विधान परिषद् में अलग-अलग क्षेत्रों और अनुभवों से आने वाले लोगों को चर्चा का अवसर मिल सकता है। इससे कानून बनाते समय विभिन्न दृष्टिकोण सामने आ सकते हैं।
अब इसके विपक्ष से जुड़े निम्नलिखित पहलुओं को जानते हैं
(क) राजनीतिक पुनर्वास का माध्यम
आलोचकों का कहना है कि कभी-कभी राजनीतिक दल विधान परिषद् का उपयोग उन नेताओं को सदन में भेजने के लिए कर सकते हैं जो विधान सभा का चुनाव हार गए हों। ऐसी स्थिति में परिषद् विशेषज्ञों को अवसर देने के बजाय राजनीतिक नियुक्तियों का माध्यम बन सकती है।
(ख) सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ
विधान परिषद् चलाने के लिए सदस्यों के वेतन, भत्ते, कर्मचारियों, भवन और अन्य प्रशासनिक सुविधाओं पर खर्च करना पड़ता है। इसलिए आलोचकों का तर्क है कि यदि परिषद् से पर्याप्त लाभ नहीं मिलता, तो यह सार्वजनिक धन पर अतिरिक्त बोझ बन सकती है।
(ग) स्नातकों और शिक्षकों को विशेष प्रतिनिधित्व क्यों?
विधान परिषद् में कुछ सीटें स्नातकों और शिक्षकों के निर्वाचन क्षेत्रों के लिए निर्धारित होती हैं।
आलोचकों का कहना है कि आज स्नातक होना कोई असाधारण योग्यता नहीं है। इसके अलावा, केवल स्नातक की डिग्री होने से यह सुनिश्चित नहीं होता कि कोई व्यक्ति अधिक योग्य या बेहतर जनप्रतिनिधि होगा। लोकतंत्र में सवाल उठता है कि स्नातकों को अन्य नागरिकों की तुलना में अलग प्रतिनिधित्व क्यों दिया जाए।
(घ) राजनीतिक दलों में पहले से विशेषज्ञ मौजूद हैं
राजनीतिक दलों में डॉक्टर, शिक्षक, वकील और अन्य पेशेवर लोग भी मौजूद हैं। इसलिए विशेषज्ञों को प्रतिनिधित्व देने के लिए अलग सदन बनाना अनिवार्य नहीं है।
(ङ) सभी राज्यों में विधान परिषद् क्यों नहीं?
यदि विधान परिषद् वास्तव में इतनी उपयोगी है, तो सभी राज्यों में इसकी स्थापना क्यों नहीं की गई? इससे यह संकेत मिलता है कि इसकी उपयोगिता को लेकर देश में व्यापक राजनीतिक सहमति नहीं है।
गौरतलब है कि कुछ समय पूर्व असम और राजस्थान में विधान परिषद् स्थापित करने के प्रस्ताव संसद में लाए गए थे। इन प्रस्तावों की संसदीय स्थायी समितियों ने जाँच की और उनका समर्थन किया। विशेषज्ञों के मुताबिक देश में राजनीतिक नेताओं की संख्या और राजनीतिक पदों की माँग बढ़ने के कारण विधान परिषद् का महत्त्व भी बढ़ा है।
विधान परिषद् का गठन या उसका उन्मूलन कई बार प्रशासनिक आवश्यकता से अधिक राजनीतिक प्राथमिकताओं से प्रभावित हो सकता है।
यही कारण है कि संसदीय समितियों ने केंद्र सरकार से इस विषय पर राष्ट्रीय नीति बनाने पर विचार करने की सिफारिश की थी। इसका उद्देश्य यह था कि:
- विधान परिषद् की उपयोगिता का मूल्यांकन स्पष्ट मानदंडों के आधार पर हो।
- इसके गठन के लिए उचित प्रक्रिया और आवश्यकताओं पर विचार किया जाए।
- यह देखा जाए कि परिषद् वास्तव में कानूनों की समीक्षा और प्रतिनिधित्व में योगदान दे रही है या नहीं।
- सरकार बदलने के बाद केवल राजनीतिक कारणों से परिषद् को समाप्त करने की प्रवृत्ति पर विचार किया जाए।
अब सवाल है कि क्या विधान परिषद् की शक्तियाँ सीमित हैं
विधान परिषद्, विधान सभा के बराबर शक्तिशाली नहीं है। सामान्य विधेयकों के मामले में विधान परिषद् किसी विधेयक को स्थायी रूप से रोक नहीं सकती। यदि विधान सभा दोबारा विधेयक पारित कर देती है, तो विधान परिषद् उसे अनिश्चितकाल तक रोकने में सक्षम नहीं होती। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 197 के अनुसार, सामान्य विधेयक के मामले में विधान परिषद् अधिकतम लगभग चार महीने तक विधायी प्रक्रिया में देरी कर सकती है। इसलिए आलोचकों का तर्क है कि जब परिषद् के पास अंतिम निर्णय लेने की शक्ति नहीं है, तो उस पर खर्च करना कितना उचित है?
ब्लॉग के अगले सवाल पर आते हैं कि क्या भारत का कोई भी वयस्क मतदाता विधान परिषदों के चुनाव में मतदान का अधिकारी होता है?
दरअसल, विधान परिषद् के चुनाव में मतदान का अधिकार इस बात पर निर्भर करता है कि मतदाता किस निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में पंजीकृत है।
विधान परिषद् के चुनाव में कौन मतदान कर सकता है?
| निर्वाचन क्षेत्र | कौन मतदान करता है? |
| स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन क्षेत्र(एक तिहाई सदस्यों का चुनाव) | निर्धारित स्थानीय निकायों के पात्र सदस्य |
| स्नातक निर्वाचन क्षेत्र( बारहवें हिस्से:1/12 का चुनाव ) | निर्धारित योग्यता पूरी करने वाले और मतदाता सूची में पंजीकृत स्नातक(स्नातक की योग्यता कम-से-कम 3 वर्ष पहले प्राप्त की हो। ) |
| शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र(बारहवें हिस्से:1/12 का चुनाव ) | निर्धारित शर्तें पूरी करने वाले और पंजीकृत शिक्षक(जो राज्य के भीतर कम से कम माध्यमिक विद्यालय स्तर के शिक्षण संस्थानों में कम से कम तीन वर्षों से अध्यापन कार्य में लगे हों।) |
| विधान सभा सदस्यों द्वारा निर्वाचन | संबंधित राज्य के विधायक (MLA) |
इनके अतिरिक्त, विधान परिषद् के कुछ सदस्यों को राज्यपाल नामित करते हैं। नामित सदस्यों के चयन के लिए आम जनता मतदान नहीं करती।
अंत में समझते हैं कि विधान परिषदों के कर्तव्य क्या होते हैं?
1. कानूनों की समीक्षा करना
विधान सभा द्वारा पारित विधेयकों पर चर्चा करना और उनमें सुधार के सुझाव देना विधान परिषद् का प्रमुख कार्य है। इससे कानून की कमियों को पहचानने का अवसर मिलता है।
2. जनता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करना
शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, बेरोजगारी और राज्य के विकास जैसे विषयों पर सदस्य चर्चा कर सकते हैं तथा जनहित के मुद्दे उठा सकते हैं।
3. सरकार से सवाल पूछना
परिषद् के सदस्य राज्य सरकार के मंत्रियों से प्रश्न पूछ सकते हैं और सरकारी नीतियों तथा प्रशासनिक कार्यों पर स्पष्टीकरण माँग सकते हैं। यह राज्य में जवाबदेही बढ़ाने का एक माध्यम है।
4. विशेषज्ञों को प्रतिनिधित्व देना
परिषद् में शिक्षकों, स्नातकों, स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों और राज्यपाल द्वारा नामित विशेषज्ञों के माध्यम से अलग-अलग अनुभवों को विधायी चर्चा में शामिल किया जा सकता है।
विधान परिषद् की विधायी शक्तियाँ
| विषय | विधान परिषद् की भूमिका |
| सामान्य विधेयक | संशोधन सुझा सकती है और अधिकतम लगभग 4 महीने तक देरी कर सकती है। |
| धन विधेयक (Money Bill) | केवल सुझाव दे सकती है; विधेयक को अधिकतम 14 दिनों तक रख सकती है। |
| बजट | बजट पर चर्चा कर सकती है, लेकिन अनुदानों की माँगों पर मतदान नहीं करती। |
| सरकार का गठन | सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका नहीं होती। |
| अविश्वास प्रस्ताव | सरकार को हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं कर सकती। |
ये सीमाएँ संविधान के अनुच्छेद 197, 198 और 203 सहित संबंधित प्रावधानों से निर्धारित होती हैं।
क्या विधान परिषद् सरकार को हटा सकती है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(2) के अनुसार राज्य मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होती है, विधान परिषद् के प्रति नहीं।
निष्कर्ष
पूरी चर्चा से स्पष्ट होता है कि विधान परिषद् राज्य स्तर पर कानूनों की समीक्षा और विभिन्न वर्गों को प्रतिनिधित्व देने का एक अतिरिक्त मंच प्रदान करती है। हालाँकि, इसकी सीमित शक्तियाँ, अतिरिक्त वित्तीय खर्च और राजनीतिक समायोजन के लिए इसके संभावित दुरुपयोग की आशंका इसकी उपयोगिता पर प्रश्न उठाती हैं। इसलिए विधान परिषद् का गठन केवल राजनीतिक लाभ के आधार पर नहीं, बल्कि राज्य की वास्तविक आवश्यकताओं, विधायी गुणवत्ता, व्यापक प्रतिनिधित्व और वित्तीय औचित्य के आधार पर किया जाना चाहिए।
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