प्रश्न
भारत के गतिशील धर्मनिरपेक्षता पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
आदर्श उत्तर
42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976) के माध्यम से प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्षता' को शामिल करना भारतीय गणराज्य की पहचान को आधार प्रदान करता है। चर्च और राज्य के पूर्ण अलगाव वाले कठोर पश्चिमी मॉडल से अलग, भारत 'सर्व धर्म समभाव' (सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान) को अपनाता है। 'गतिशील धर्मनिरपेक्षता' के रूप में मौजूद यह ढांचा, संवैधानिक नैतिकता की रक्षा के लिए राज्य की तटस्थता और सुधार-उन्मुख हस्तक्षेप, दोनों का मेल है।
गतिशील धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप
समान सम्मान (सर्व धर्म समभाव): बिना किसी आधिकारिक राजकीय धर्म को स्थापित किए, सभी धार्मिक परंपराओं को समान संरक्षण और समर्थन देना।
सिद्धांत-आधारित दूरी: राज्य को एक लचीली सीमा बनाए रखने की अनुमति देना, जिसके तहत न्याय की आवश्यकताओं के अनुसार राज्य धार्मिक मामलों में शामिल हो सकता है या उनसे दूरी बना सकता है।
सामाजिक कल्याण का दायित्व (अनुच्छेद 25(2)(b)): विधायिका को यह अधिकार देना कि वह जन-कल्याण और सुधार के लिए धार्मिक प्रथाओं से जुड़े धर्मनिरपेक्ष पहलुओं को विनियमित (रेगुलेट) कर सके।
अस्पृश्यता का उन्मूलन (अनुच्छेद 17): एक समान और न्यायपूर्ण समाज बनाने के लिए, रूढ़िवादी धार्मिक रीति-रिवाजों में निहित भेदभावपूर्ण सामाजिक प्रथाओं पर प्रतिबंध लगाना।
अल्पसंख्यकों का संरक्षण (अनुच्छेद 29 और 30): भारत की बहु-सांस्कृतिक संरचना को बनाए रखने के लिए अल्पसंख्यक समूहों के भाषाई, लिपि-संबंधी और शैक्षिक अधिकारों की रक्षा करना।
मूल ढांचे (बेसिक स्ट्रक्चर) में समावेशन: 'मूल ढांचे के सिद्धांत' (एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, 1994) के तहत सुरक्षा, जो यह सुनिश्चित करता है कि सामान्य विधायी संशोधनों के जरिए धर्मनिरपेक्षता को खत्म न किया जा सके।
गतिशील धर्मनिरपेक्षता का महत्व
विविधता में सामंजस्य: यह धार्मिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन बनाता है, जिससे एक विविध समाज में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा मिलता है।
संवैधानिक नैतिकता की प्रधानता: यह सुनिश्चित करता है कि व्यक्तिगत अधिकार, लैंगिक न्याय और मानवीय गरिमा, दमनकारी पारंपरिक या बहुसंख्यकवादी मानदंडों से ऊपर रहें।
न्यायिक सुधार को सक्षम बनाना: यह अदालतों को भेदभावपूर्ण प्रथाओं (शायरा बानो और सबरीमाला फैसलों की तरह) को अमान्य करने का अधिकार देता है, जबकि साथ ही आवश्यक धार्मिक प्रथाओं की रक्षा भी करता है।
वर्चस्व को रोकना: यह राज्य की बहुलवाद और समानता के प्रति सक्रिय प्रतिबद्धता के माध्यम से, कमजोर समूहों को बहुसंख्यकवादी प्रभुत्व से बचाता है।
भारत का गतिशील धर्मनिरपेक्षतावाद भारतीय लोकतंत्र का एक अनिवार्य स्तंभ है। यह धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों के बीच सामंजस्य बिठाता है, ताकि सामाजिक प्रगति और समानता, कठोर परंपराओं की बेड़ियों में न बंधें। यह देश के बहुलवादी ताने-बाने को मजबूत करता है और यह सुनिश्चित करता है कि सामाजिक विकास में, आस्था की कट्टर या प्रतिगामी व्याख्याओं के कारण कभी कोई बाधा न आए।


