प्रश्न
भारतीय संविधान की प्रस्तावना भारत को एक समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करती है। इस घोषणा को लागू करने हेतु किए गए संवैधानिक प्रावधानों की चर्चा कीजिए तथा वर्तमान समय में इनके प्रासंगिकता का आकलन कीजिए।
आदर्श उत्तर
STEP-I : भूमिका
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में वर्णित समाजवाद, पंथनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक गणराज्य हमारे संवैधानिक मूल्यों की आधारशिला एवं संविधान निर्माताओं के स्वप्न एवं आदर्शों का दर्पण है। इसके लिए संविधान के विभिन्न भागों में कई संवैधानिक प्रावधन किये गए थे साथ ही 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू होने के साथ ही समय-समय पर विभिन्न सरकारों ने इसके व्यावहारिक रूप से धरातल पर उतारने हेतु कई उल्लेखनीय कार्य किया है।
STEP-II : समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
भारतीय संविधान अपनी प्रस्तावना में भारत को एक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करता है। इस घोषणा को क्रियान्वित करने के लिए निम्नलिखित संवैधानिक उपबंध किए गए हैं-
समाजवादी - ध्यातव्य है कि 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी शब्द को जोड़कर स्पष्ट कर दिया गया कि भारतीय शासन का मौलिक लक्ष्य समाजवादी ढाँचे पर आधारित समाज की स्थापना है। भारतीय समाजवाद, साम्यवादी समाजवाद न होकर लोकतांत्रिक समाजवाद है। यहाँ मिश्रित अर्थव्यवस्था में विश्वास व्यक्त किया गया, जहाँ सार्वजनिक और निजी क्षेत्र साथ-साथ मौजूद होते हैं।
डी.एस. नकारा बनाम भारत संघ के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि समाजवाद का मूल तत्त्व कमजोर वर्ग और कर्मकारों के जीवन स्तर को ऊँचा करना है और उनके लिए जन्म से मृत्यु तक सामाजिक सुरक्षा की गारंटी देना है। इसका अर्थ आर्थिक समानता एवं आय के समान वितरण से है।
वस्तुतः भारतीय समाजवाद, गाँधीवाद और मार्क्सवाद का अनोखा मिश्रण है, जो निश्चय ही गाँधीवाद की ओर झुका है। यद्यपि उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण की नयी आर्थिक नीति (1991) ने भारत के समाजवादी प्रतिरूप को थोड़ा लचीला बनाया है। समाजवाद की घोषणा को क्रियान्वित करने वाले सबसे महत्त्वपूर्ण उपबंध नीति निर्देशक तत्व के अंतर्गत अनुच्छेद-39 (ख) और (ग) है।
39 (ख) में जहाँ सामूहिक हित के लिए समुदाय के भौतिक संसाधनों के सम वितरण की व्यवस्था है वहीं 39 (ग) में धन एवं उत्पादन के साधनों के संकेन्द्रण रोकने का उपबंध है। इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद-38 में यह निर्धारित किया गया है कि राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्घि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा तथा अनुच्छेद-39 (क) में समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता का प्रावधान है।
जबकि अनुच्छेद-41 में कुछ दशाओं में कार्य, शिक्षा और लोक सहायता पाने के अधिकार की बात की गई है। आगे अनुच्छेद-42 कार्य की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं तथा प्रसूति सहायता से संबंधित है। पुनः अनुच्छेद-43 कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी तथा 43 (क) उद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों की भागीदारी सुनिश्चित करता है, जबकि अनुच्छेद-47 के तहत पोषाहार एवं जीवन स्तर को ऊँचा करके लोक स्वास्थ्य को सुधार करने का दायित्व राज्य को दिया गया है।
धर्मनिरपेक्ष - धर्मनिरपेक्ष शब्द को वर्ष 1976 के 42वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा गया। धर्मनिरपेक्षता का मूल अर्थ है कि राज्य सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करे यानी किसी धर्म को कोई विशेष दर्जा या राज्याश्रय प्रदान न करे। पुनः धर्मनिरपेक्ष राज्य से आशा की जाती है कि वह अपनी जनता के साथ भेद-भाव न करे तथा धर्म और राजनीति को अलग करने का प्रयत्न करे।
'धर्मनिरपेक्षता’ को क्रियान्वित करने के लिए कई संवैधानिक उपबंध है, जैसे अनुच्छेद-14 से 16 के तहत समानता का अधिकार जो धर्माधारित भेदभाव का निषेध करता है। पुनः अनुच्छेद-27 में प्रावधान है कि राज्य किसी धर्म को बढ़ावा देने के लिए किसी व्यक्ति अथवा संस्था की कर चुकाने के लिए बाध्य नहीं करेगा जबकि अनुच्छेद-28 सरकारी शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा को प्रतिबंधित करता है।
लोकतांत्रिक- संविधान की प्रस्तावना में लोकतांत्रिक शासन की परिकल्पना की गई है। यह प्रचलित ‘संप्रभुता के सिद्घांत’ पर आधारित है अर्थात् सर्वोच्च शक्ति जनता में निहित होती है। भारत जैसे विविधतामूलक वृहद जनसंख्या वाले देश में संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था की गई है जिसमें कार्यकारणी अपने सभी नीतियों और कार्यों के लिए विधायिका के प्रति जवाबदेह है। ध्यातव्य है कि संविधान की प्रस्तावना में लोकतांत्रिक शब्द का इस्तेमाल वृहद रूप में किया गया है, जिसमें न केवल राजनीतिक लोकतंत्र बल्कि सामाजिक व आर्थिक लोकतंत्र को भी शामिल किया गया है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था को क्रियान्वित करने के लिए व्यापक संवैधानिक उपबंध है। प्रथमतः अनुच्छेद 326 के अंतर्गत सार्वभौम वयस्क मताधिकार दिया गया है। पुनः संसद और राज्य विधानमंडल के संदर्भ में व्यापक संवैधानिक प्रावधान है। इसके अतिरिक्त विधि की सर्वोच्चता (अनुच्छेद-14), न्यायपालिका की स्वतंत्रता और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के लिए निर्वाचन आयोग की व्यवस्था है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के सफल संचालन में अहम भूमिका निभाते हैं।
गणतंत्र- भारतीय संविधान की प्रस्तावना में गणतंत्र का सामान्य अर्थ यह है कि राष्ट्र का प्रमुख, राष्ट्रपति निर्वाचित होगा। विदित है कि राष्ट्रपति का चुनाव पाँच वर्ष के लिए अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है। इसके साथ ही गणतंत्र के अर्थ में दो और बातें कही जा सकती हैं, पहला यह कि राजनैतिक संप्रभुता किसी व्यक्ति विशेष अथवा राजा के हाथ में होने के बजाय जनता के हाथ में होता है और दूसरा यह कि इसमें किसी भी प्रकार का विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग उपस्थित नहीं होता है।
गणराज्य की घोषणा को क्रियान्वित करने वाला सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपबंध अनुच्छेद-52 है जिसमें कहा गया है कि भारत का एक राष्ट्रपति होगा तथा संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी (अनुच्छेद 53)। यद्यपि इस शक्ति का प्रयोग वह मंत्रिपरिषद के परामर्श से करेगा, जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा (अनुच्छेद 74)।
STEP-III : इनकी व्यवहारिकता का आकलन
आजादी के बाद से ही प्रस्तावना में वर्णित मूल्यों एवं दर्शन को व्यवहारिक रूप से लागू करने का प्रयास सरकार द्वारा किया गया है जिसे हम निम्न रूप में देख सकते हैं।
समाजवादी आदर्श की व्यावहारिकता
भारत का समाजवाद राज्य की अर्थनीति को इस प्रकार निर्देशित करता है कि संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण, अवसरों की समानता और कमजोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित हो। स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार, हरित क्रांति, सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार, गरीबी उन्मूलन एवं आज की सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ (जैसे जन-धन, मनरेगा, मुफ्त भोजन, स्वास्थ्य बीमा आदि) समाजवादी प्रतिबद्घता को दर्शाती हैं।
फिर भी आर्थिक असमानता, बेरोज़गारी, क्षेत्रीय विकास का असंतुलन, निजीकरण की तीव्र गति और पूँजी-केन्द्रित विकास मॉडल समाजवादी आदर्श की पूर्ण प्राप्ति में बाधक बने हुए हैं। अमीरी-गरीबी की खाई बढ़ने से संविधान का समाजवादी लक्ष्य व्यवहार में अभी आंशिक रूप से ही साकार हुआ है।
पंथनिरपेक्षता की व्यावहारिकता
भारत ने प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता, किसी भी धर्म का पालन, प्रचार और संरक्षण का अधिकार दिया है। राज्य सभी धर्मों के प्रति समान दूरी बनाए रखते हुए किसी विशेष धर्म का पक्ष नहीं लेता। हालाँकि, व्यवहार में साम्प्रदायिक तनाव, धार्मिक ध्रुवीकरण, पहचान की राजनीति और समय-समय पर होने वाली हिंसा पंथनिरपेक्षता को चुनौती देती है। कई बार राजनीतिक दल धार्मिक भावनाओं का उपयोग करके मतदाताओं को प्रभावित करते हैं, जिससे प्रस्तावना का पंथनिरपेक्ष चरित्र कमजोर पड़ता है। फिर भी न्यायपालिका, नागरिक समाज और संवैधानिक संस्थाएँ इस मूल मूल्य की रक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
लोकतांत्रिक शासन की व्यावहारिकता
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहाँ सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, स्वतंत्र एवं नियमित चुनाव, बहुदलीय प्रणाली, स्वतंत्र न्यायपालिका और सक्रिय मीडिया लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं। लेकिन व्यावहारिक पक्ष में धनबल, चुनावी अनैतिकता, दलबदल, राजनीतिक विघटन, सूचना का सीमित प्रवाह, और कुछ संस्थाओं पर प्रभाव की आशंका लोकतांत्रिक गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। हाल के वर्षों में सोशल मीडिया-प्रेरित ध्रुवीकरण और फेक न्यूज ने भी लोकतांत्रिक विमर्श को जटिल बनाया है। इसके बावजूद नागरिक भागीदारी में वृद्घि, पारदर्शी कानून, डिजिटल शासन और न्यायपालिका की सक्रियता लोकतंत्र की नींव को सुदृढ़ बनाए रखती है।
गणराज्य की वास्तविकता
गणराज्य का अर्थ है- राष्ट्र का प्रमुख जनता द्वारा चुना जाता है और देश की सर्वश्रेष्ठ सत्ता नागरिकों के पास होती है।
भारत में राष्ट्रपति का चुनाव, मौलिक अधिकारों की सुरक्षा और शासन का जनता के प्रति जवाबदेह रहना इस आदर्श को व्यवहार में दर्शाता है।
लेकिन सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ, अवसरों की असमान पहुँच, शक्तिशाली वर्गों का प्रभुत्व और प्रशासनिक ढाँचे की जटिलता सामान्य व्यक्ति की वास्तविक भागीदारी को सीमित करती हैं।
इसके बावजूद संवैधानिक संस्थाएँ, न्यायपालिका और सुधारात्मक कानून गणराज्यात्मक आदर्श को जीवित रखते हैं।
STEP-IV : निष्कर्ष
प्रस्तावना सिर्फ़ एक शुरुआती अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि भारत के संवैधानिक नज़रिए का एक गतिशील चार्टर है। यह देश के ऐतिहासिक अनुभवों को उसकी भविष्य की इच्छाओं के साथ मिलाता है और कानूनों और सरकारी कार्यों को समझने के लिए एक मानक ढाँचा देता है। राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक न्याय के सार को बताकर, प्रस्तावना संविधान के बदलाव लाने वाले चरित्र को मज़बूत करती है। इसकी स्थायी प्रासंगिकता संवैधानिक नैतिकता को प्रेरित करने और भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों को मज़बूत करने की इसकी क्षमता में निहित है।


