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Unit9

भारत का संविधान - नागरिकों के मूल कर्तव्य

भारत में सामाजिक परिवर्तन

एवं विकास

कक्षा 12 के लिए समाजशास्त्र की पाठ्यपुस्तक

12110
12110

विद्यया S मृतमर्न्ते

Textbook illustration

एनसीई आर टी NCERT

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् NATIONAL COUNCIL OF EDUCATIONAL RESEARCH AND TRAINING

12110 – भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं विकास

कक्षा 12 के लिए पाठ्यपुस्तक

ISBN 81-7450-762-0

प्रथम संस्करण

सितंबर 2007 आश्विन 1929

पुनमुद्रण

नवंबर 2007, जनवरी 2009, जनवरी 2010, नवंबर 2010, जनवरी 2012, मार्च 2013, जनवरी 2014, जनवरी 2016, फरवरी 2017, दिसंबर 2017, दिसंबर 2018, अक्तूबर 2019, जुलाई 2021

संशोधित संस्करण

सितंबर 2022 अश्विन 1944

पुनर्मुद्रण

मार्च 2024 चैत्र 1946 दिसंबर 2024 अग्रहायण 1946 दिसंबर 2025 अग्रहायण 1947

PD 10T BS

© राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, 2007, 2022

₹ 100.00

एन.सी.ई.आर.टी. वाटरमार्क 80 जी.एस.एम. पेपर पर मुद्रित।

प्रकाशन प्रभाग में सचिव, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, श्री अरविंद मार्ग, नयी दिल्ली 110 016 द्वारा प्रकाशित तथा शिवम इंटरप्राईजेज, ई-49, सेक्टर ए-5/6, ट्रोनिका सिटी, गाजियाबाद, पिन-201103 द्वारा मुद्रित।

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गुवाहाटी 781021फ्रोन : 0361-2676869

प्रकाशन सहयोग

अध्यक्ष, प्रकाशन प्रभाग: एम.वी. श्रीनिवासन
मुख्य संपादक: बिज्ञान सुतार
मुख्य व्यापार प्रबंधक: अमिताभ कुमार
मुख्य उत्पादन अधिकारी (प्रभारी): दीपक जैसवाल
सहायक संपादक: एम. लाल
सहायक उत्पादन अधिकारी: दीपक कुमार

आवरण और सज्जा

श्वेता राव

चित्रांकन

ब्लू फिश और जोयल गिल

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (2005) सुझाती है कि बच्चों के स्कूली जीवन को बाहर के जीवन से जोड़ा जाना चाहिए। यह सिद्धांत किताबी ज्ञान की उस विरासत के विपरीत है जिसके प्रभाववश हमारी व्यवस्था आज तक विद्यालय और घर के बीच अंतराल बनाए हुए है। नयी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या पर आधारित पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकें इस बुनियादी विचार पर अमल करने का प्रयास है। इस प्रयास में हर विषय को एक मजबूत दीवार से घेर देने और जानकारी को रटा देने की प्रवृत्ति का विरोध शामिल है। आशा है कि ये कदम हमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) में वर्णित बाल-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था की दिशा में काफ्री दूर तक ले जाएँगे।

इस प्रयत्न की सफलता अब इस बात पर निर्भर है कि विद्यालयों के प्राचार्य और अध्यापक बच्चों को कल्पनाशील गतिविधियों और सवालों की मदद से सीखने और सीखने के दौरान अपने अनुभवों पर विचार करने का अवसर देते है। हमें यह मानना होगा कि यदि जगह, समय और आज्ञादी दी जाए तो बच्चे बड़ों द्वारा सौंपी गई सूचना-सामग्री से जुड़कर और जूझकर नए ज्ञान का सूजन कर सर्केंगे। शिक्षा के विविध साधनों एवं स्रोतों की अनदेखी किए जाने का प्रमुख कारण पाठ्यपुस्तक को परीक्षा का एकमात्र आधार बनाने की प्रवृत्ति है। सर्जना और पहल को विकसित करने के लिए जस्तरी है कि हम बच्चों को सीखने की प्रक्रिया में पूरा भागीदार माने और बनाएँ, उन्हें ज्ञान की निर्धारित खुराक का ग्राहक मानना छोड़ दें।

ये उद्देश्य स्कूल की दैनिक जिंदगी और कार्यशैली में काफ़ी फेरबदल की माँंग करते हैं। दैनिक समय-सारणी में लचीलापन उतना ही जरुरी है जितनी वार्षिक कैलेंडर के अमल में चुस्ती, जिससे शिक्षण के लिए नियत दिनों की संख्या हकीकत बन सके। शिक्षण और मूल्यांकन की विधियाँं भी इस बात को तय करेंगी कि यह पाठ्यपुस्तक विद्यालय में बच्चों के जीवन को मानसिक दबाव तथा बोरियत की जगह खुशी का अनुभव बनाने में कितनी प्रभावी सिझ्ड होती है। बोझ़ की समस्या से निपटने के लिए पाठ्यक्रम निर्माताओं ने विभिन्न चरणों में ज्ञान का पुनर्निधारण करते समय बच्चों के मनोविज्ञान एवं अध्यापन के लिए उपलब्ध समय का ध्यान रखने की पहले से अधिक सचेत कोशिश की है। इस कोशिश को और गहराने के यत्न में यह पाठ्यपुस्तक सोच-विचार और विस्मय, छोटे समूहों में विचार-विर्मर्श और ऐसी गतिविधियों को प्राथमिकता देती है जिन्हें करने के लिए व्यावहारिक अनुभवों की आवश्यकता होती है।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् इस पुस्तक की रचना के लिए बनाई गई पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति के परिश्रम के लिए कृतज्ञता व्यक्त करती है। परिषद् सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक सलाहकार समिति के अध्यक्ष प्रोफेसर हरि वासुदेवन और इस पाठ्यपुस्तक समिति के मुख्य सलाहकार प्रोफेसर योगेन्द्र सिंह की विशेष आभारी है। इस पाठ्यपुस्तक के विकास में कई शिक्षाकों ने योगदान किया, इस योगदान को संभव बनाने के लिए परिषद् उनके प्राचायों एवं उन सभी संस्थाओं और संगठनों के प्रति कृतज्ञ हैं जिन्होंने अपने संसाधनों, सामग्री और सहयोगियों की मदद लेने में उदारतापूर्वक सहयोग दिया। परिषद् माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा प्रोफेसर मृणाल मीरी एवं प्रोफेसर जी.पी.

देशपांडे की अध्यक्षता में गठित निगरानी समिति (मॉनिटरिंग कमेटी) के सदस्यों को अपना मूल्यवान समय और सहयोग देने के लिए धन्यवाद देती है। व्यवस्थागत सुधारों और अपने प्रकाशनों में निरंतर निखार लाने के प्रति समर्पित राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् टिप्पणियों एवं सुझावों का स्वागत करेगी जिनसे भावी संशोधनों में मदद ली जा सके।

निदेशक

नयी दिल्ली

20 नवंबर 2006

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान

और प्रशिक्षण परिषद्

पाठ्यपुस्तकों में पाठ्य सामग्री का पुनर्स्थोजन

कोविड-19 महामारी को देखते हुए, विद्यार्थियों के ऊपर से पाठ्य सामग्री का बोझ कम करना अनिवार्य है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में भी विद्यार्थियों के लिए पाठ्य सामग्री का बोझ कम करने और रचनात्मक नजरिए से अनुभवात्मक अधिगम के अवसर प्रदान करने पर जोर दिया गया है। इस पृष्ठभूमि में, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् ने सभी कक्षाओं में पाठ्यपुस्तकों को पुनर्स्पोजित करने की शुरुआत की है। इस प्रक्रिया में रा.शै.अ.प्र.प. द्वारा पहले से ही विकसित कक्षावार सीखने के प्रतिफलों को ध्यान में रखा गया है।

पाठ्य सामग्रियों के पुनर्स्योजन में निम्नलिखित बिंदुओं को ध्यान में रखा गया है -

•
एक ही कक्षा में अलग-अलग विषयों के अंतर्गत समान पाठ्य सामग्री का होना;
•
एक कक्षा के किसी विषय में उससे निचली कक्षा या ऊपर की कक्षा में समान पाठ्य सामग्री का होना;
•
कठिनाई स्तर;
•
विद्यार्थियों के लिए सहज रूप से सुलभ पाठ्य सामग्री का होना, जिसे शिक्षकों के अधिक हस्तक्षेप के बिना, वे खुद से या सहपाठियों के साथ पारस्परिक रूप से सीख सकते हों;
•
वर्तमान संदर्भ में अप्रासंगिक सामग्री का होना।

वर्तमान संस्करण, ऊपर दिए गए परिवर्तनों को शामिल करते हुए तैयार किया गया पुनर्स्योजित संस्करण है।

भारत का संविधान

उहेशिका

हम, भारत के लोग, भारत को एक ¹[संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य] बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को :

सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म

और उपासना की स्वतंत्रता,

प्रतिष्ठा और अवसर की समता

प्राप्त कराने के लिए,

तथा उन सब में

व्यक्ति की गरिमा और ²[राष्ट्र की एकता

और अखंडता] सुनिश्चित करने वाली बंधुता

बढ़ाने के लिए

दृळसंकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख

26 नवंबर, 1949 ई. को एतद्धारा इस संविधान को

अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

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पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति

अध्यक्ष, समाज विज्ञान उच्च माध्यमिक स्तरीय पाठ्यपुस्तक सलाहकार समिति

हरि वासुदेवन, प्रोफ्रेसर, इतिहास विभाग, कलकता विश्वविद्यालय, कोलकाता

मुख्य सलाहकार

योगेन्द्र सिंह, प्रोक्रेसर एमिरिटस, सेंटर फॉर द स्टडीज्ज ऑफ्र सोशल सिस्टम्स, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली

सलाहकार

मैत्रेयी चौधरी, प्रोक्रेसर, सेंटर फॉर द स्टडीज ऑफ सोशल सिस्टम्स, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली

सतीश देशपांडे, प्रोफ्रेसर, समाजशास्त्र विभाग, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

सदस्य

अंजन घोष, फैलो, सेंटर फॉर स्टडीज़ इन सोशल साइंसेज़, कोलकाता

अमिता बाविस्कर, प्रोफेसर, इस्टीट्यूट ऑफ़ इकोनाँमिक ग्रोथ, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

कैरल उपाध्याय, विजिर्टिंग एसोसिएट फैलो, नेशनल इस्टीट्यूट ऑफ्र एडवांस स्टडीज, बंगलूर

कुशल देव, प्रोफ्रेसर, समाजशास्त्र विभाग, इंडियन इस्टीट्यूट ऑफ्र टैक्नोलॉजी, मुंबई

खमयमबम इंदिरा, असिस्टेंट प्रोफेसर, नॉर्थ इस्ट रीजनल इस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन, रा.शै.अ.प्र.प., शिलांग

लता गोविंदन नायर, भूतपूर्व शिक्षक, सरदार पटेल विद्यालय, नयी दिल्ली

नित्या रामाकृष्णन, अधिवकता, दिल्ली उच्च न्यायालय, नयी दिल्ली

नंदिनी सुंदर, प्रोफ्रेसर, डिपार्टमेंट ऑफ़ सोशियोलॉजी, दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

सारिका चंद्रवंशी साजू, असिस्टेंट प्रोफेसर, आर.आई.ई., रा.शै.अ.प्र.प., भोपाल

तसॉंगवाई न्यूमई, असिस्टेंट प्रोफेसर, नार्थ इस्ट रीजनल इस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन, रा.शौ.अ.प्र.प., शिलांग

हिंदी अनुवाद

परशुराम शर्मा, भूतपूर्व निदेशक (राजभाषा), भारत सरकार, नयी दिल्ली

संजय गर्ग, सहायक निदेशक (लेखा), राष्ट्रीय महालेखागार, नयी दिल्ली

देवनाथ पाठक, पी.जी.टी. समाजशास्त्र, ब्लूबैल इंटरनेशनल स्कूल, नयी दिल्ली

राजेश कुमार, शोध छात्र, हिन्दी विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली

मंजू भह, प्रोफेसर, सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, रा.शै.अ.प्र.प., नयी दिल्ली

सदस्य समन्वयक

मंजू भह, प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, रा.शै.अ.प्र.प., नयी दिल्ली इस पाठ्यपुस्तक के निर्माण में अनेक व्यक्तियों द्वारा कठिन परिश्रम किया गया और इस कार्य को एकचुनौती के रूप में निर्धारित समय में पूरा किया गया, परिषद उन सभी की आभारी है। सर्वप्रथम हम उन सभी सहकर्मियों के आभारी हैं जिन्होंने अन्य व्यस्तताओं के होते हुए भी सभी कार्यों से पहले अपना समय एवं परिश्रम इस पुस्तक को पूरा करने में लगाया। हमारे मुख्य सलाहकार प्रोफेसर योगेन्द्र सिंह समर्थन के स्तम्भरहे और उन्होंने हमें आगे बढ़ने के लिए आवश्यक आत्मविश्वास दिया। प्रोफेसर सिंह ने प्रोफेसर कृष्ण कुमार, निदेशक, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् के साथ मिलकर वो अभय हस्त प्रदान किया जिससे हमारे सामूहिक प्रयासों को दिशा मिली। प्रोफेसर सविता सिन्हा, प्रोफेसर, सामाजिक विज्ञान एवं मानिविकी शिक्षा विभाग एवं डीन, अकादमिक ने प्रत्येक क्षण हमें हर तरह का समर्थन प्रदान किया। डॉ. श्वेता उप्पल, मुख्य संपादक, प्रकाशन विभाग ने हमारे काम को सरल तो बनाया ही साथ ही हमें ऐसे ऊँचे लक्ष्य निर्धारित करने के लिए प्रोत्साहित भी किया जो शायद हम स्वयं तय न कर पातो।

हम सीमा बनर्जी, पी.जी.टी. समाजशास्त्र, लक्ष्मण पब्लिक विद्यालय, नयी दिल्ली; देव एन. पाठक, ब्लूबैल अंतरीष्ट्रीय विद्यालय, नयी दिल्ली; निर्मला चौधरी, पी.जी.टी. समाजशास्त्र, नेहरु आदर्श सीनियर सेकेडरी विद्यालय, दिल्ली, किरन शर्मा पी.जी.टी. समाजशास्त्र, राजकीय सीनियर सेकेडरी विद्यालय, प्रेसीडेंट स्टेट, नयी दिल्ली को उनके सहयोग तथा सुझावों के लिए धन्यवाद ज्ञापित करते हैं। अनुवाद संबंधी सहायता के लिए परिषद् प्रोफ़सर सतीश देशपांडे, ढॉ. राजीव गुप्ता, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर, ढॉ. जीतेन्द्र प्रसाद, महर्षि द्यानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक, ढॉ. संजय गर्ग, राष्ट्रीय अभिलेखागार, नयी दिल्ली, ढॉ. परशुराम शर्मा, नयी दिल्ली, ढॉ. मधु नागला, महर्षि द्यानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक, सुदर्शन गुप्ता राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, पलोरा, जम्मू का आभार व्यक्त करती है।

श्वेता राव विशेष धन्यवाद की पात्र हैं जिन्होंने इस पाठ्यपुस्तक को डिजाइन करने की चुनौती को स्वीकार किया और वास्तव में हमारे प्रयत्नों को संभव बनाया। उनका योगदान प्रत्येक पृष्ठ पर स्पष्टतः दृष्टिगोचर होता है। परिषद् जैसना जयचन्द्रन, शोधे छात्रा, सेंटर फॉर द स्टडी ऑफे सोशल सिस्टम्स, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नयी दिल्ली की उनके योगदान एवं सहयोग के लिए आभारी है।

प्रोफेसर सतीश सबरवाल एवं प्रोफेसर एन. जयराम, सदस्य, मॉनिटरिंग कमेटी विशेष धन्यवाद के पात्र हैं जिनकी सतर्क टिप्पणियों एवं सुझावों से हम बहुत अधिक लाभान्वित हुए।

अंततः हम उन सभी सदस्यों एवं व्यक्तियों के प्रति आभारी हैं जिन्होंने हमें प्रकाशनों से सामग्री का उपयोग करने की अनुमति दी। परिषद् श्री आर. के. लक्ष्मण की विशेष आभारी है जिन्होंने हमें अपने कार्टून उपयोग करने की अनुमति दी। परिषद् मालविका कारलेकर का उनकी पुस्तक ‘विज्युलाइजिंग इंडियन वुमेन’ 1875–1947, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशित छायाचित्रों का उपयोग करने के लिए आभार व्यक्त करती है। परिषद् राधा कुमार के प्रति उनकी पुस्तक ‘द हिस्ट्री ऑफ़ डूइंग:एन इलस्टेटेड एकाउंट ऑफ़ मूवर्मेंट फॉर वीमंस राइट्स एंड फेमीनिज्म इन इंडिया’ 1800–1990 के छायाचित्रों एवं रवि अग्रवाल के छायाचित्रों के संकलन के लिए भी आभारी है। कुछ छायाचित्र राजस्थान पर्यटन विभाग, राजस्थान सरकार, नयी दिल्ली से लिए गए हैं, हम उनके भी आभारी हैं। हमने कुछ सामग्री एवं छायाचित्रों को इंडिया टुडे, आउटलुक और प्रंटलाइन एवं कुछ समाचारपत्रों जैसे द हिंदू, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया और द इंडियन एक्सप्रेस से भी लिया है इसके लिए हम उनके आभारी हैं। परिषद् रेल म्यूजियम लाइब्रेरी, चाणक्यपुरी, नयी दिल्ली के प्रति आभार प्रदर्शित करती है। परिषद् वाई.के. गुप्ता एवं आर. सी. दास, केन्द्रीय शैक्षिक तकनीकी संस्थान के सहयोग के प्रति भी आभार व्यक्त करती है।

पुस्तक के विकास के विभिन्न चरणों में सहयोग के लिए डी.टी.पी. ऑफरेटर उत्तम कुमार, नाजिया खान एवं ईश्वर सिंह, कॉपी एडीटर मनोज मोहन, प्रूफरीडर अनामिका गोविल, प्रभारी कंष्यूटर कक्ष दिनेश कुमार के प्रति भी हम आभारी हैं। प्रकाशन विभाग द्वारा हमें पूर्ण सहयोग एवं सुविधाएँ प्राप्त हुई, इसके लिए हम उनका आभार व्यक्त करते हैं।

परिषद्, इस संस्करण के पुनर्सयोजन के लिए पाठ्यक्रमों, पाठ्यपुस्तकों एवं विषय सामग्री के विश्लेषण हेतु दिए गए महत्वपूर्ण सहयोग के लिए सीमा बनर्जी एवं आभा सेठ, पी.जी.टी. समाजशास्त्र; अचला प्रीतम टंडन, एसोसिएट प्रोफ्रेसर, समाजशास्त्र विभाग, हिंदू कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय; मंजू भट्ट, प्रोफ्रसर, सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, रा.शै.अ.प्र.प., नयी दिल्ली: के प्रति आभार व्यक्त करती है।

अध्ययन के लिए सुझाव

प्रथम पुस्तक को आप पहले ही पढ़ चुके हैं। अतः आप राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा के इस मूलभाव से परिचित हो चुके हैं कि पाठ्यपुस्तकें जीवन में संचार करती हैं। यह विचार आपको रटने की पढ्धति से दूर ले जाता है। पाठ्यपुस्तक में यह प्रयास किया गया है कि “आपको विचार करने और चकित होने के अवसर मिलें, आप छोटे-छोटे समूहों में बातचीत कर सकें तथा दिन प्रतिदिन के अनुभवों से जुड़ी हुई क्रियाएँ कर सकें।” हमारे प्रयास में विषयवस्तु को समकालीन सामाजिक वातावरण और बच्चों के दैनिक क्रियाकलापों से जोड़ा जाए। इसे संभव बनाने के लिए हमने समाचारपत्रों की रिपोर्ट, पत्रिकाओं के लेखों तथा काल्पनिक कथाओं के संक्षिप्त भावों को बॉक्स में प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही सरकारी प्रतिवेदन तथा बच्चों के दिन प्रतिदिन के जीवन के उदाहरणों को भी प्रस्तुत किया गया है। इस कारण अभ्यास एवं क्रियाकलाप पाठ्यपुस्तक में आवश्यक अंग बन गए हैं। समाजशास्त्रीय लेखन से भी कुछ पक्ष लेने के प्रयास किए गए हैं ताकि आप समाजशास्त्रीय अनुसंधान से परिचित हो सकें।

हमारे लिए यह सारा प्रयास चुनौतीपूर्ण रहा है एवं कभी-कभी यह कठिन भी रहा है। हम इस तथ्य से परिचित हैं कि आपके सुझाव भविष्य में इन पुस्तकों को सुधारने के लिए सहायक सिब्ध होंगे। कृपया हमें निम्नलिखित पते पर लिखें– विभागाध्यक्ष, सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद्, श्री अरविंदो मार्ग, नयी दिल्ली-110016। आप हमें ई-मेल भी कर सकते हैं– [email protected] हमें आपके जवाबों का इंतजार रहेगा। विशेषतः आपकी आलोचनात्मक प्रतिक्रियाएँ एवं पुस्तक में सुधार के लिए सुझावों का हम स्वागत करेंगे। हम आपको यह विशवास दिलाते हैं कि पाठ्यपुस्तक के आगामी संस्करण में उपयोगी सुझावों को सम्मिलित क्रिया जाएगा।

प्रोफेसर मैत्रेयी चौधरी

प्रोफ़ेसर मंजू भह्ट

विषय-सूची

आमुख iii

पाठ्यपुस्तकों में पाठ्य सामग्री का पुनर्स्थोजन v

अध्ययन के लिए सुझाव x

अध्याय 1 1-14

संरचनात्मक परिवर्तन

अध्याय 2 15–30

सांस्कृतिक परिवर्तन

अध्याय 3 31–40

संविधान एवं सामाजिक परिवर्तन

अध्याय 4 41–56

ग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन

अध्याय 5 57–70

औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास

अध्याय 6 71–90

भूमंडलीकरण और सामाजिक परिवर्तन

अध्याय 7 91-110

जनसंपर्क साधन और जनसंचार

अध्याय 8 111–130

सामाजिक आंदोलन

शब्दावली 131-132

भारत का संविधान

भाग 4क

नागरिकों के मूल कर्तव्य

अनुच्छेद 51 क

मूल कर्तव्य - भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह -

•
(क) संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे;
•
(ख) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हद्य में संजोए रखे और उनका पालन करे;
•
(ग) भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण बनाए रखे;
•
(घ) देश की रक्षा करे और आहवान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे;
•
(ड) भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेंदभावों से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो महिलाओं के सममान के विरुद्ध हों;
•
(च) हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करे;
•
(छ) प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करे और उसका संवर्धन करे तथा प्राणिमात्र के प्रति द्याभाव रखे;
•
(ज) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे;
•
(झ) सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे;
•
(ज) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत् प्रयास करे, जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाइयों को छू सके; और
•
(ट) यदि माता-पिता या संरक्षक है, छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु बाले अपने, यथास्थिति, बालक या प्रतिपाल्य को शिक्षा के अवसर प्रदान करे।
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