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Unit7

RADIO GA GA!

Cell-shocked city suffers silently

For a city preparing to cross the 10 million mark for mobile phone users, Delhi is woefully wanting in mobile manners. Even the simple courtesy of putting the phone on vibrator alert in a cinema hall or meeting, or switching it off while filling petrol is missing

Abantika Ghosh | TNN

New Delhi: So, you think the title track from the latest Salman Khan blockbuster is really cool, and it adds to your personality quotient that whoever dials your mobile number gets to hear it. After all, one can never have enough of good music! Or, so you think.

Foisting your personal preferences on callors

rination a ringing mobile phone in a packed hall causes. Despite that, even the simple courtesy of keeping the phone on silent is missing. The only thing that works for these people is the adverse response of people around them." Tales of mobile harassment, even if you leave out the biggest irritant of all."

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October 28, 200 Hindustan Tim

onumer

Heritage body not nappy the WD's tunnel road proposal near Humayun's Tomb P6

Your

Prerna K. Mishra Delhi, October 27

you press the oil, it is

The

MPL 1003

Anand Parthasarathy

BANGALORE: Smaller, is always more beautiful. Consumer electronics press, buyers are willing to a slightly bigger device they get more functionalize the year-end holiday season seeing the

7 जनसंपर्क साथन और जनसंचार

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‘मास मीडिया’ यानी जनसंपर्क के साधन अनेक प्रकार के होते हैं, जैसे– टेलीविज्ञन, समाचारपत्र, फिल्में, पत्रिकाएँ, रेडियो, विज्ञापन, विडियो खेल और सीडी आदि। उन्हें मास मीडिया इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे एक साथ बहुत बड़ी संख्या में दर्शिकों, श्रोताओं एवं पाठकों तक पहुँचते हैं। उन्हें कभी-कभी जनसंचार (मास कम्युनिकेशन) के साधन भी कहा जाता है। आपकी पीढ़ी के बहुत से लोगों के लिए जनसंपर्क के किसी माध्यम से विहीन दुनिया की कल्पना करना भी संभवतः कठिन होगा।

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क्रियाकलाप 7.1

•
एक ऐसी दुनिया की कल्पना करें जहाँँ कोई टेलीविजन, सिनेमा, समाचारपत्र, पत्रिका, इंटरनेट, टेलीफ्रोन या मोबाइल फ्रोन कुछ भी न हों।
•
आप अपने किसी एक दिन के दैनिक क्रियाकलापों को लिखें। उन अवसरों का पता लगाएँ जब आपने जनसंपर्क या जनसंचार के किसी-न-किसी साधन का प्रयोग किया हो।
•
अपनी से पुरानी पीढ़ी के व्यक्तियों से पता लगाएँ कि संचार के इन साधनों के अभाव में जीवन कैसा था। आप उस जीवन की तुलना अपने जीवन से करें।
•
संचार प्रौद्योगिकियों का विकास होने से कार्य करने और खाली समय को बिताने के तरीकों में किस प्रकार का बदलाव आया है? चर्चा करें।

मास मीडिया हमारे दैनिक जीवन का एक अंग है। देश भर के अनेक मध्यवर्गीय परिवारों में लोग स्तर से उठते ही सबसे पहले रेडियो या टेलीविज्ञन

चालू करते हैं अथवा प्रातःकालीन समाचारपत्र देखते हैं। उन्हीं परिवारों के बच्चे सर्वप्रथम अपने मोबाइल फ्रोन पर यह देखने के लिए नजर डालते हैं कि कोई ‘मिस्ड कॉल’ तो नहीं आई है। अनेक नगरीय क्षेत्रों में नलसाज, बिजली मिस्त्री, बढ़ई, रंगसाज और अन्य विभिन्न प्रकार की सेवाएँंदेने वाले लोग अपना एक मोबाइल फ्रोन रखते हैं जिस पर उनसे आसानी से संपर्क किया जा सकता है। अब तो नगरों में अधिकतर दुकानें एक छोटा टेलीविजन सेट भी रखने लगी हैं। आने वाले ग्राहक दुकानदार से टेलीविजन पर दिखाई जा रही फिल्म या क्रिकेट मैच के बारे में छिटपुट बातचीत भी कर लेते हैं। विदेशों में रहने वाले भारतीय लोग टेलीफ्रोन और इंटरनेट की सहायता से देश में रहने वाले अपने मित्रों एवं परिवारों के साथ बराबर संपर्क बनाए रखते हैं। नगरों में रहने वाले प्रवासी कामगार वर्ग के लोग भी गाँवों में रहने वाले अपने

जनसंपर्क साधन और जनसंचार

परिवारों से दूरभाष द्वारा नियमित रूप से संपर्क बनाए रखते हैं। क्या आपने मोबाइल फ्रोनों के बारे में विभिन्न प्रकार के विज्ञापनों को देखा है? क्या आपने यह जानने की कोशिश की है कि ये मोबाइल फ्रोन विविध प्रकार के सामाजिक समूहों की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं? क्या आपको यह जानकर आश्चर्य नहीं होगा कि सी.बी.एस.ई. बोर्ड (केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड) के परीक्षा परिणाम इंटरनेट और मोबाइल फ्रोन दोनों पर उपलब्ध होते है। सच तो यह है कि इनकी पस्तकें भी इंटरनेट पर उपलब्ध हैं।

यह तो स्पष्ट है कि हाल के वर्षों में सभी प्रकार के जनसंचार के साधनों का चमत्कारिक रूप से विस्तार हुआ है। समाजशास्त्र के छात्र होने के नाते, हमें इस वृद्धि के अनेक पहलुओं के बारे में जानने में रुचि है। सर्वप्रथम, जबकि हम वर्तमान संचार क्रांति की विशिष्टता को पहचानते हैं तो हमें कुछ पीछे जाकर विशव में और भारत में आधुनिक जनसंपर्क के साधनों में हुई वृद्धि की रूपरेखा को प्रस्तुत करना भी आवश्यक है। इससे हमें यह समझने में सहायता मिलेगी कि किसी अन्य सामाजिक संस्था की तरह ही, मास मीडिया की संगचना और विषय-वस्तु का स्वरूप

The fastest-growing cell phone market

Anand Parthasarathy

BANGALORE: Two global surveys reveal lifestyle of world's most 'mobile' population. Indians love SMS, but ignore pricey services like phone Internet. They spend an average of Rs 5000 on a mobile phone handset -- but forgot over 30,000 phones in the last six months, in Mumbai taxis alone We buy six million mobile phones every month -- making us one of the world's fastest- growing cell phone markets -- 176 million-strong as of last month.

The average amount spent on a handset, which is around Rs. 5,000, represents nearly half a month's salary for most of us in India, while for Brit- ishers, it amounts to just 5%

Our favourite brands are Nokia and Samsung in that order and this is same as the global preference. But Panasonic is number three here, with Sony Ericsson and Motorola, the next two in the desi popularity stakes, while internationally Motorola is number three followed by Sony Ericsson and LG.

We love short messaging services, indeed 100 per cent

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INDIANS LOVE IT: Mobile phones are popular but costlier services like Net phone are shunned. Women are champion text messagers. - PHOTO: HANDOUT with these feature on our among the least concerned

teresting findings in the India section of a recent global survey of mobile phone trends, commissioned by Stockholm, Sweden-based SmartTrust, a leading provider of mobile device management solutions. The survey conducted by Taylor Nelson Sofres, covered 6,700 mobile consumers in 15 countries, 404 of them in India.

The full report is available for corporate users who register at the www.smarttrust.com for a free download.

In another survey, mobile security player Pointsec found that Mumbaites are second only to Londoners in forgetfullness - when it comes to their mobile phones. In the last six months they forgot 32,970 phones in Mumbai taxis - this is just the numbers reported as lost. Amnesiac London-based phone owners topped this number - with 54872 phones lost. Sydney, Stockholm, San Francisco, Washington, Munich, Helsinki, Berlin and Oslo all fared better.

But when it came to lost pocket PCs and laptops, India is nowhere in the Top Ten.

London is the mother city

भी आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में आए परिवर्तनों से निर्धारित हुआ है। उदाहरण के लिए, हम यह देखते हैं कि स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद, प्रारंभिक दशकों में प्रमुख रूप से राज्य (सरकार) और विकास के बारे में उसकी सोच ने मीडिया को कितना अधिक प्रभावित किया है और 1990 के बाद के भूमंडलीकरण के दौर में बाजार को कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है। दूसरा, हमें यह समझने में अधिक सहायता मिलती है कि समाज के साथ जनसंपर्क और संचार के साधनों के संबंध कितने द्वंद्वात्मक हैं। दोनों एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। मास मीडिया की प्रकृति और भूमि उस समाज द्वारा प्रभावित होती है जिसमें यह स्थित होता है। साथ ही, समाज पर मास मीडिया के दूरगामी प्रभाव पर जितना बल दिया जाए थोड़ा होगा। हम इस द्वंद्वात्मक संबंध को उस समय देखेंगे और समझेंगे जब हम इस अध्याय में (क) औपनिवेशिक भारत में मीडिया की भूमिका, (ख) स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद प्रारंभिक दशकों में, और (ग) अंततः: भूमंडलीकरण के संदर्भ में। तीसरा, जनसंचार, संचार के अन्य साधनों से भिन्न होता है क्योंकि इसे विशाल पूँजी उत्पादन और औपचारिक संरचनात्मक संगठन और प्रबंधन की आवश्यकता होती है। इस प्रकार, आप देखेंगे कि मास मीडिया की संरचना और प्रकार्य के लिए राज्य और/अथवा बाजार की प्रमुख भूमिका होती है। मास मीडिया ऐसे बहुत बड़े संगठनों के माध्यम से कार्य करता है जिनमें भारी पूँजी लगी होती है और काफ्री बड़ी संख्या में

तेजी से बढ़ता हुआ सैल फ्रोन बाजार

कर्मचारी काम करते हैं। चौथा, इसका महत्वपूर्ण अंतर यह है कि लोगों के विभिन्न वर्ग के लोग मास मीडिया का आसानी से प्रयोग कर सकते हैं। आपको याद होगा कि इसी तथ्य को पिछले अध्याय में डिजिटल अंतर (डिजिटल डिवाइड) की संकल्पना के रूप में प्रस्तुत किया गया था।

7.1 आधुनिक मास मीडिया का प्रारंभ

पहली आधुनिक मास मीडिया की संस्था का प्रारंभ प्रिंटिंग प्रेप्त यानी मुद्रणालय (छापाखाना) के विकास के साथ हुआ था। हालॉँकि बहुत से समाजों में मुद्रणकला का इतिहास कई सदियों पहले शुरु हो गया था, लेकिन आधुनिक प्रौद्योगिकियों का प्रयोग करते हुए पुस्तकें छापने का काम सर्वप्रथम यूरोप में शुरु किया गया। यह तकनीक सर्वप्रथम जोहान गुटनबर्ग द्वारा 1440 में विकसित की गई थी। प्रारंभ में छपाई का काम धार्मिक पुस्तकों तक ही सीमित था।

प्रिंटिंग प्रेस का एक दृश्य
प्रिंटिंग प्रेस का एक दृश्य

औद्योगिक क्रांति के साथ ही, मुद्रण उद्योग का भी विकास हुआ। कुलीन मुद्रणालय के प्रथम उत्पाद साक्षर अभिजात लोगों तक ही सीमित थे। तत्पश्चात् 19वीं सदी के मध्य भाग में आकर जब प्रौद्योगिकियों, परिवहन और साक्षरता में और आगे विकास हुआ, तभी समाचारपत्र जन-जन तक पहुँचने लगे। देश के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को एक जैसे समाचार पढ़ने या सुनने को मिलने लगे। ऐसा कहा जाता है कि इसी के फलस्वरूप देश के विभिन्न भागों में रहने वाले लोग परस्पर जुड़े

21वीं सदी का दूरदर्शन समाचार कक्ष, भारत
21वीं सदी का दूरदर्शन समाचार कक्ष, भारत

हुए महसूस करने लगे और उनमें ‘हम की भावना’ विकसित हो गई। इस संबंध में, सुविख्यात विद्धान बेनेडिक्ट ऐंडरसन ने कहा कि इससे राष्ट्रवाद का विकास हुआ और जो लोग एक-द्वसरे के अस्तित्व के बारे में नहीं जानते थे, वे भी एक परिवार

के सदस्य-जैसा महसूस करने लगे। इससे अपरिचित लोगों के बीच भी मैत्री भाव उत्पन्न हो गया। इस प्रकार, ऐंडरसन के कथनानुसार हम राष्ट्र को एक ‘काल्पनिक समुदाय’ की तरह मान सकते हैं।

आप याद कीजिए कि कैसे 19वीं सदी के समाज सुधारक अक्सर समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं में अनेक सामाजिक मुद्रों पर लिखते थे और वाद-विवाद किया करते थे। भारतीय राष्ट्रवाद का विकास भी

जनसंपर्क साधन और जनसंचार

उपनिवेशवाद के विरुद्ध उसके संघर्ष के साथ गहराई से जुड़ा है। इसका उद्भभव भारत में ब्रिटिश शासन द्वारा लाए गए संस्थागत परिवर्तनों के परिणामस्वरूप हुआ। औपनिवेशिक सरकार के उत्पीड़क उपायों का खुलकर विरोध करने वाली राष्ट्रवादी प्रेस ने उपनिवेश-विरोधी जनमत जागृत किया और फिर उसे सही दिशा दी। परिणामस्वरूप औपनिवेशिक सरकार ने राष्ट्रवादी प्रेस पर शिकंजा कसना शुरु कर दिया और उस पर सेंसर व्यवस्था लागू कर दी। इसका एक उदाहरण इलबर्ट बिल 1883 के विरुद्ध आंदोलन है। राष्ट्रवादी आंदोलन को समर्थन देने के कारण ‘केसरी’ (मराठी), ‘मातृभूमि’ (मलयालम), ‘अमृतबाजार पत्रिका’ (अंग्रेजी) जैसे कई राष्ट्रवादी समाचारपत्रों को औपनिवेशिक सरकार की अप्रसन्नता सहनी पड़ी। लेकिन इसका उन पर कोई असर नहीं हुआ, उन समाचारपत्रों ने राष्ट्रवादी आंदोलन का समर्थन जारी रखा और वे औपनिवेशिक शासन को समाप्त करने की माँग करते रहो।

•
हालाँँकि राजा राममोहन राय से पहल्ले भी लोगों ने कुछ समाचारपत्र प्रकाशित करने प्रारंभ कर दिए थे, परंतु राजा राममोहन राय द्वारा बंगला भाषा में 1821 में प्रकाशित
•
‘संवाद-कौमुदी’ सर्वप्रथम और फारसी में 1822 में प्रकाशित ‘मिरात-उल-अखबार’ भारत के पहले ऐसे प्रकाशन थे जिनमें राष्ट्रवादी एवं लोकतंत्रात्मक दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई देता था।
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➢ फरदूनजी मुर्जबान मुंबई में गुजराती प्रेस के अग्रदूत थो। उन्होंने 1822 में ही ‘बॉम्बे समाचार’ नामक एक दैनिक पत्र शुरू कर दिया था।
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ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने 1858 में बंगला भाषा में 'शोम प्रकाश' नामक पत्र शुरू किया।
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'दि टाइम्स ऑफ़ इंडिया' का प्रकाशन मुंबई में 1861 में शुरू हुआ।
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➢ 'दि पायनियर' इलाहाबाद में, 1865 में।
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➢ 'दि मद्रास मेल' 1868 में।
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➢ 'दि स्टेट्समैन' कोलकाता में 1875 में।
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'दि सिविल एंड मिलिटरी गज्ञट' लाहौर में 1876 में शुरु हुआ। (देसाई 1948)

बॉक्स 7.1

ब्रिटिश शासन के अंतर्गत मास मीडिया का फैलाव समाचारपत्रों और पत्रिकाओं तथा फिल्मों और रेडियो तक ही सीमित था। रेडियो पूर्ण रूप से राज्य यानी सरकार के स्वामित्व में था। इसलिए उस पर राष्ट्रीय विचार अभिव्यक्त नहीं किए जा सकते थे। यद्यपि समाचारपत्र एवं फिल्में दोनों में स्वायत्तता थी, लेकिन ब्रिटिश राज उन पर कड़ी नजर रखता था। अंग्रेजी या देशी भाषाओं में समाचारपत्रों और पत्रिकाओं का प्रसार बहुत व्यापक रूप से नहीं होता था क्योंकि बहुत कम लोग साक्षर थे। फिर भी उनका प्रभाव उनकी वितरण संख्या की तुलना में बहुत अधिक था क्योंकि खबरें और सूचनाएँ वाणिज्यिक तथा प्रशासनिक केंद्रों जैसे बाजारों तथा व्यापारिक केंद्रों और न्यायालयों तथा कस्बों में पढ़ी जाती थी। पत्र-पत्रिकाओं (प्रिंट मीडिया) में जनमत के विभिन्न आयाम होते थे जिसमें ‘स्वतंत्र भारत’ के स्वरूप के बारे में विचार व्यक्त किए जाते थे। ये विभिन्न विचार भारत के स्वतंत्र हो जाने के बाद भी जारी रहे।

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7.2 स्वतंत्र भारत में मास मीडिया

दृष्टिकोण

स्वतंत्र भारत में, देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मीडिया से ‘लोकतंत्र के पहरेदार’ की भूमिका निभाने के लिए कहा। मीडिया से यह आशा की गई कि वह लोगों के हदय में आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय विकास की भावना भरे। आपने पिछले अध्यायों में पढ़ा था कि भारत में स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों में देश के विकास पर कितना अधिक बल दिया गया था। विभिन्न विकास कार्यों के बारे में आम लोगों को सूचित करने का साधन मीडिया ही था। तब मीडिया को अस्पृश्यता, बाल विवाह, विधवा बहिष्कार जैसी सामाजिक कुरीतियों तथा जाद्दू-टोना और विश्वास-चिकित्सा (फेथ हीलिंग) जैसे अंधविश्वासों के विरुढ्ध लड़ने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता था। एक

आधुनिक औद्योगिक समाज का निर्माण करने के लिए एक तर्कसंगत एवं वैज्ञानिक स्वभाव को बढ़ावा देने की आवश्यकता थी। सरकार का फिल्म प्रभाग समाचार, फिल्में और वृत्तचित्र प्रस्तुत करता था। इन्हें प्रत्येक सिनेमाघर में फिल्म प्रारंभ करने से पहले दिखाया जाता था ताकि दर्शिकों को सरकार द्वारा चलाई जा रही विकास प्रक्रिया के बारे में जानकारी मिल सके।

क्रियाकलाप 7.2

स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद के पहले दो दशकों में जो लोग बड़े हुए हैं, उनकी पीढ़ी में से अपने किसी परिचित व्यक्ति से उन वृत्तचित्रों के बारे में पूछें जो उन दिनों सिनेमाघर में फिल्म दिखाने से पहले नियमित रूप से दिखाए जाते थे। उनकी यादों को लिखें।

रेडियो

रेडियो प्रसारण जो 1920 के दशक में कोलकाता और चेन्नई में अपरिपक्व 'हैम' ब्रॉडकास्टिंग क्लबों के जरिए भारत में शुरु हुआ था, 1940 के दशक में द्वितीय विश्वयुढ्ध के दौरान एक सार्वजनिक प्रसारण प्रणाली के रूप में उस समय परिपक्व हो गया जब वह दक्षिण-पूर्व एशिया में मित्र राष्ट्रों की सेनाओं के लिए प्रचार का एक बड़ा साधन बना। स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय, भारत में केवल 6 रेडियो स्टेशन थे जो बड़े-बड़े शहरों में स्थित थे और प्राथमिक रूप से शहरी श्रोताओं की आवश्यकताओं को ही पूरा करते थे। 1950 तक समस्त भारत में कुल मिलाकर 5,46,200 रेडियो लाइसेंस थे।

चूँकि मीडिया नव-स्वतंत्र राष्ट्र के विकास में एक सक्रिय भागीदार माना जाता था; इसलिए आकाशवाणी (एआईआर) के कार्यक्रमों में मुख्य रूप से समाचार, सामयिक विषय और विकास पर चर्चाएँ होती थीं। नीचे दिए गए बॉक्स से तत्कालीन युग चेतना का पता चलता है।

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अमिता राय (बाद में मलिक) ऑल ड़ंडिया रेडियो, लखनऊ में डिस्क जॉकी के रूप में

1944 से कार्यरता प्रसिद्ध संपर्क एवं चलचित्र समालोचक अमिता ने 1944 में ऑल इंडिया रेडियो में कार्यांभ किया, उस समय इस क्षेत्र में बहुत कम महिलाएँ थी। तत्पश्चात ये बी.बी.सी., सी.बी.सी. एवं प्रसारण की अन्य अंतराष्ट्रीय संस्थाओं में चली गई। ये महिला पत्रकारों में वरिष्ठ हैं, चलचित्र, रेडियो और दरदर्शन समालोचनों और मुख्य समाचारपत्रों के स्तंभ लिखने के लिए जानी जाती हैं।

आकाशवाणी के समाचार प्रसारणों के अतिरिक्त, एक मनोरंजन का चैनल ‘विविध भारती’ भी था, जो श्रोताओं के अनुरोध पर, मुख्यतः हिंदी फिल्मों के गाने प्रस्तुत करता था। 1957 में आकाशवाणी ने अत्यंत लोकप्रिय चैनल ‘विविध भारती’ को अपने में शामिल कर लिया जो जल्दी ही प्रायोजित कार्यक्रम और विज्ञापन प्रसारित करने लगा और आकाशवाणी के लिए एक कमाऊँ चैनल बन गया।

जब 1947 में भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की थी, उस समय आकाशवाणी (ए.आई.आर.) के पास कुल मिलाकर छह रेडियो स्टेशनों की आधारभृत संरचना थी जो महानगरों में स्थित

आकाशवाणी के प्रसारणों से कुछ अंतर हुआ

बॉक्स 7.2

1960 के दशक में, हरित क्रांति के अंतर्गत, देश में

जब पहली बार अधिक उपज देने वाली फसलों की खेती की जाने लगी तो आकाशवाणी ने ही देहातों में इन फसलों का प्रचार करने का व्यापक अभियान अपने जिम्मे लिया और वह 1967 से दैनिक आधार पर 10 वर्ष से भी अधिक समय तक लगातार उनका प्रचार करती रही।

इस प्रयोजन के लिए, देश भर के अनेक आकाशवाणी केंद्रों में अधिक उपज देने वाली फसलों के बारे में विशेष कार्यक्रम तैयार किए जाते थे। इन कार्यक्रमों की इकाइयों में विषय के विशेषज्ञ शामिल थे, जो खेतों में जाते थे और उन किसानों से, जिन्हाँने नए प्रकार के धान और गेहूँ उगाना प्रारंभ किया था, जानकारी लेकर रेडियो पर प्रसारित करते थे।

स्रोत : बी. आर. कुमार 'ए.आई.आर. ब्रॉडकास्ट्रस डिंड मेक ए डिफरेंस' द हिंदू, दिसंबर 31, 2006.

थो। देश की 35 करोड़ की जनसंख्या के लिए कुल 2,80,000 रेडियो रिसीवर सेट ही थो। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद सरकार ने रेडियो प्रसारण के आधारभूत संरचना का विस्तार राज्यों की राजधानियों और सीमावर्ती क्षेत्रों में करने के कार्य को प्राथमिकता दी। इन वर्षों में आकाशवाणी ने भारत में रेडियो प्रसारण के लिए एक विशाल आधारभूत संरचना विकसित कर ली है। यह भारत की भौगोलिक, भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय तीन स्तरों पर अपनी सेवाएँ प्रदान कर रही है।

प्रारंभ में रेडियो के प्रचार-प्रसार एवं लोकप्रिय बनने के मार्ग में एक बड़ी बाधा रेडियो सेटों की ऊँची कीमत थी। लेकिन 1960 के दशक में जब ट्रांजिस्टर क्रांति आई तो रेडियो अधिक सुलभ हो गया क्योंकि ट्रांजिस्टर (बिजली की बजाय) बैटरी से चलने लगे और उन्हें कहीं भी आसानी से ले जाया जा सकता था; साथ ही, उनकी कीमतें भी बहुत अधिक घट गई। वर्ष 2000 में स्थिति यह थी कि लगभग 11 करोड़ परिवारों (भारत के संपूर्ण घर-परिवारों के दो-तिहाई भाग) में 24 भाषाओं और 146 बोलियों में रेडियो प्रसारण सुने

युद्ध, विपदाएँ और आकाशवाणी का विस्तार

बॉक्स 7.3

यह एक रोचक तथ्य है कि युद्धों और विपदाओं के कारण आकाशवाणी के क्रियाकलापों

में विस्तार हुआ हौ। 1962 में जब चीन के साथ युढ़ हुआ तो आकाशवाणी ने एक दैनिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए ‘वार्ता’ इकाई की स्थापना की। अगस्त 1971 में, जब बांग्लादेश का संकट मंडराने लगा तो समाचार सेवा प्रभाग ने 6 बजे प्रातः से मध्यरात्रि तक हर घंटे समाचार प्रसारण चालू किया। फिर 1991 के एक और संकट में राजीव गांधी की नृशंस हत्या के बाद ही आकाशवाणी ने चौबीसों घंटे बुलेटिन प्रस्तुत करने का एक और कदम उठाया।

जाते थे। उनमें से एक-तिहाई से भी अधिक घर-परिवार ग्रामीण थे। आज तक आकाशवाणी (ए.आई.आर.) 480 स्टेशनों तक पहुँच गया है और 681 ट्रांसमीटर देश के 92 प्रतिशत क्षेत्र में फैली 99 प्रतिशत आबादी को कवर करते हैं।

टेलीविज्ञन

भारत में ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने के लिए काफ़ी पहले यानी 1959 में ही टेलीविज्ञन के कार्यक्रमों को प्रयोग के तौर पर चालू कर दिया गया था। आगे चलकर, अगस्त 1975 से जुलाई 1976 के बीच उपग्रह की सहायता से शिक्षा देने के प्रयोग (साइट) के अंतर्गत टेलीविज्ञन ने छह राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक दर्शिकों के लिए प्रत्यक्ष रूप से प्रसारण किया। ये शैक्षिक प्रसारण प्रतिदिन चार घंटे तक 2400 टीवी सेटों पर सीधे प्रसारित किए जाते थे। इसी बीच, दूरदर्शन के अंतर्गत चार (दिल्ली, मुंबई, श्रीनगर और अमृतसर) में 1975 तक टेलीविज्ञन केंद्र स्थापित कर दिए गए। तत्पश्चात् एक ही वर्ष में कोलकाता, चेन्नई और जालंधर में तीन और केंद्र खोल दिए गए। प्रत्येक प्रसारण केंद्र के अपने बहुत से कार्यक्रम होते थे जिनमें समाचारों, बच्चों और महिलाओं के कार्यक्रम, किसानों के कार्यक्रम और मनोंज्ञन के कार्यक्रम सम्मिलित थे।

क्रियाकलाप 7.3

पुरानी पीढ़ी के विभिन्न लोगों से मिलें और पता लगाएँ कि 1970 और 1980 के दशकों में टेलीविजन के कार्यक्रमों में क्या दिखाया जाता था? क्या उन लोगों में से बहुतों को टेलीविजन उपलब्ध था?

जब कार्यक्रम वाणिज्यिक हो गए और उनमें इन कार्यक्रमों के प्रायोजकों के विज्ञापन शामिल किए जाने लगे तो लक्ष्यगत दर्शिकों में परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देने लगा। मनोरंजन के कार्यक्रमों में वृद्धि हो गई जो नगरीय उपभोक्ता वर्ग के लिए होते थे। दिल्ली में 1982 के एशियाई खेलों के दौरान रंगीन प्रसारण के प्रारंभ किए जाने और राष्ट्रीय नेटवर्क में तेजी से विस्तार हो जाने के फलस्वरूप टेलीविज्ञन प्रसारण का बहुत तेजी से वाणिज्यीकरण हुआ। वर्ष 1984–85 के दौरान टेलीविज्ञन, ट्रांसमीटरों की संख्या देशभर में बढ़ गई और फलस्वरूप जनसंख्या का एक बड़ा अनुपात उसमें सम्मिलित हो गया। यही वह समय था

जब 'हम लोग' (1984–85) और 'बुनियाद' (1986–87) जैसे सोप ओपेरा प्रसारित किए गए। यह अत्यंत लोकप्रिय सिद्ध हुआ और दूरदर्शन के लिए भारी मात्रा में विज्ञापन द्वारा राजस्व अर्जित किया जैसा कि आगे चलकर 'रामायण' (1987–88) और 'महाभारत' (1988–90) महाकाव्यों के प्रसारण से भी हुआ।

आज टेलीविजन उद्योग की स्थिति इस प्रकार है- टॉर्ड द्वारा जारी वार्षिक रिपोर्ट (2015–16) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा टीवी बाजार है। उद्योग विभाग के अनुमान के मुताबिक, मार्च 2016 तक, मौजूदा 2841 मिलियन घरों में, 18.1 करोड़ के आसपास टेलीविजन

जनसंपर्क साधन और जनसंचार

सेट हैं, जो कि केबल टीवी सेवाओं, डीटीएच सेवाओं, दूरदर्शन के एक स्थलीय टीवी नेटवर्क के अतिरिक्त आईपीटीवी सेवाओं के द्वारा सेवा प्रदान कर रहे हैं।

'हम लोग': एक निर्णायक मोड़

बॉक्स 7.4

'हम लोग' भारत का सबसे पहला लंबे समय तक चलने वाला सोप ओपेरा था... इस

नए सबसे पहले पथप्रदर्शक कार्यक्रम ने मनोरंजन संदेश में शैक्षिक अंतर्वस्तु का जानबूझकर समावेश करते हुए मनोरंजन-शिक्षा की संयुक्त रणनीति का उपयोग किया था।

'हम लोग' के करीब 156 कथांश (एपिसोड) 1984–85 के दौरान 17 महीनों तक हिंदी में प्रसारित किए गए। इस टेलीविज्ञन कार्यक्रम ने सामाजिक विषयों जैसे लैंगिक (यानी स्त्री-पुरुष) समानता, छोटा परिवार और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा दिया। 22 मिनट के प्रत्येक एपिसोड के अंत में, एक विख्यात भारतीय अभिनेता अशोक कुमार 30–40 सेकेंड के एक उपसंहार के रूप में उस एपिसोड से प्राप्त सबक को संक्षेप में प्रस्तुत किया करते थे। अशोक कुमार नाट्य प्रसंगों को दर्शिकों के दैनिक जीवन से जोड़ते थे। उदाहरण के लिए, उन्हांने एक निंदनीय पात्र जो शराब पीता था और अपनी बीवी से मार-पीट करता था, पर टिप्पणी करते हुए दर्शिकों से यह पूछा, “आपके विचार से बसेसर राम जैसे लोग इतनी ज्यादा शराब क्यों पीते हैं और फिर बुरा बर्ताव क्यों करते हैं? क्या आप ऐसे किसी व्यक्ति को जानते हैं? शराब पीने की लत को कैसे कम किया जा सकता है? इसके लिए आप क्या कर सकते हैं।” (सिंघल एवं रोजर्स, 1989) हम लोग के दर्शिकों के बारे में अध्ययन करने से दर्शिक वर्ग के सदस्यों एवं उनके प्रिय 'हम लोग' के पात्रों के बीच उच्चकोटि के परासामाजिक अंत:क्रिया का पता चलता है। उदाहरण के लिए, 'हम लोग' के बहुत से दर्शिकों ने यह बताया कि उन्हांने अपने निजी 'निवास कक्षों के एकांत में' अपने प्रिय पात्रों से मिलने के लिए अपनी दैनिक कार्यों में यथोचित परिवर्तन कर लिए थे। अन्य कई व्यक्तियों ने बताया कि वे टेलीविज्ञन सेटों के माध्यम से अपने प्रिय पात्रों से बातचीत करते थे; उदाहरण के लिए, "बड़की चिंता मत करो। जीवन बनाने का अपना सपना मत छोड़ो।"

'हम लोग' को देखने वालों की संख्या उत्तर भारत में 65 से 90 प्रतिशत और दक्षिण भारत में 20 से 40 प्रतिशत तक थी। औसतन लगभग 5 करोड़ दर्शक 'हम लोग' का प्रसारण देखते थे। इस सोप ओपेरा का एक असामान्य पक्ष यह था कि दर्शिकों से इसके बारे में बड़ी संख्या में यानी 4,00,000 से भी अधिक पत्र प्राप्त हुआ करते थे, वे इतने अधिक होते थे कि उनमें से अधिकांश तो 'दूरदर्शन' के अधिकारियों द्वारा खोले भी नहीं जा सकते थे।

(सिंघल एवं रोजर्स 2001)

हम लोग के विज्ञापनों ने एक नए उत्पाद मैगी 2 मिनट नूडल्स को बढ़ावा दिया जो टेलीविज्ञन के विज्ञापन की शक्ति और दूरदर्शन के वाणिज्यीकरण के प्रारंभ होने को दर्शर्ता है।

बॉक्स 7.5

मुद्रण माध्यम (प्रिंट मीडिया)

प्रिंट मीडिया यानी मुद्रण माध्यम के प्रारंभ और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रसार तथा राष्ट्रवादी आंदोलन, दोनों में उसकी भूमिका के बारे में जाना जा चुका है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद, प्रिंट मीडिया ने राष्ट्रनिर्माण के भारत में पत्रकारिता को एक अंतरात्मा से प्रेरित कार्य माना जाता था। जब स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक परिवर्तन

के आंदोलनों में तेजी आई और एक आधुनिक रूप धारण करते हुए समाज में जीवन निर्माण के नए शैक्षिक अवसर उत्पन्न हुए तो देशभक्तिपूर्ण और सामाजिक सुधार के आदर्शवाद की भावना से प्रेरित होंकर, उत्कृष्ट प्रतिभाशाली युवजन पत्रकारिता की ओर आकर्षित हुए। जैसाकि अक्सर ऐसे कामों में हुआ करता है, इस आजीविका में पैसा बहुत कम था। इस आजीविका को एक व्यवसाय के रूप में रूपांतरित होने में लंबा समय लगा। यह रूपांतरण ‘हिंदू’ जैसे समाचारपत्र के स्वरूप में आए परिवर्तन से प्रतिबिंबित होता है जो प्रारंभ में विशुढ़ सामाजिक एवं सार्वजनिक सेवा भाव को लेकर चला था पर आगे चलकर व्यापारी उद्यम में बदल गया, हालॉँकि उसमें सामाजिक और जन सेवा का भाव भी रहा।

स्रोत : संपादकीय 'यस्टरडे, टुडे, टुमॉरो', दि हिंदू, 13 सितंबर 2003, बी. पी. संजय 2006 में उब्धृत।

बॉक्स 7.6

कार्य में अपनी भागीदारी निभाने की भूमिका को बराबर जारी रखा और इसके लिए वह विकासात्मक मुद्दों को उठाता रहा और बहुत बड़े भाग के लोगों की आवाज को बुलंद करता रहा। नीचे के बॉक्स में दिया गया संक्षिप्त उढ़रण आपको प्रिंट मीडिया की उस प्रतिबढ़ता से अवगत कराएगा।

मीडिया को सबसे भयंकर चुनौती का सामना तब करना पढ़ा जब 1975 में आपातकाल की घोषणा की गई और मीडिया पर सेंसर व्यवस्था लागू की गई। सौभाग्यवश वह समय समाप्त हो गया और 1977 में लोकतंत्र की पुनः स्थापना हुई। भारत अनेक समस्याओं का सामना करते हुए भी अपने

स्वतंत्र मीडिया पर तर्कसंगत या समर्थनीय गर्व कर सकता है।

अध्याय के प्रारंभ में हमने बताया था कि मास मीडिया संचार के अन्य साधनों से कैसे भिन्न है क्योंकि बड़े पैमाने पर पूँजी, उत्पादन और प्रबंध संबंधी माँगों को पूरा करने के लिए एक ऐसे औपचारिक संरचनात्मक संगठन की आवश्यकता होती हौ। और यह भी कि किसी अन्य सामाजिक संस्था की तरह, मास मीडिया भी भिन्न-भिन्न आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों के अनुसार, संरचना तथा विषयवस्तु की दृष्टि से बदलता रहता है। अब आप यह देखेंगे कि मीडिया की विषयवस्तु तथा शैली दोनों ही भिन्न-भिन्न समयों पर किस प्रकार परिवर्तित होती रहती है। कभी-कभी राज्य यानी सरकार को भी अधिक बड़ी भूमिका निभानी होती है, और कुछ अन्य समयों पर, बाजार को। भारत में यह स्थान-परिवर्तन हाल के दिनों में अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप यह बहस भी छिड़ी है कि आधुनिक लोकतंत्र में मीडिया को क्या भूमिका अदा करनी चाहिए। अगले भाग में हम इन नयी बातों पर विचार करेंगे।

7.3 भूमंडलीकरण और मीडिया

हम पिछले अध्याय में भूमंडलीकरण के दूरगामी प्रभाव और संचार क्रांति के साथ उसके घनिष्ठ संबंध के बारे में पढ़ चुके हैं। मीडिया के हमेशा अनेक अंतरीष्ट्रीय आयाम रहे हैं- जैसे कि नए समाचार एकत्र करना और प्राथमिक रूप से पाश्चात्य फिल्मों को दूसरे देशों में बेचना। किंतु 1970 के दशक तक, अधिकांश मीडिया कंपनियाँ राष्ट्रीय सरकारों के विनियमों का पालन करते हुए, विशिष्ट घरेलू बाजारों में कार्यरत रहीं। मीडिया उद्योग भी कई अलग-अलग सेकटरों में विभाजित था, जैसे- सिनेमा, प्रिंट मीडिया, रेडिया और टेलीविजन प्रसारण, जो एक-दसरे से अलग रहकर स्वतंत्र रूप से अपना काम करते थे।

पिछले तीन दशकों में मीडिया उद्योग में अनेक रूपांतरण हुए हैं। राष्ट्रीय बाजारों का स्थान अब तरल भूमंडलीय बाजार ने ले लिया है और नवीन प्रौद्योगिकियों ने मीडिया के विभिन्न रूपों को जो पहले अलग-अलग थे, अब आपस में मिला दिया है।

भूमंडलीकरण और संगीत का मामला

बॉक्स 7.7

यह तर्क दिया जाता है कि संगीतात्मक रूप वह होता है जो किसी अन्य रूप की तुलना में

अधिक कुशलतापूर्वक भूमंडलीकरण को स्वीकार कर लेता है। इसका कारण यह है कि संगीत उन लोगों तक भी आसानी से पहुँच जाता है जो लिखी या बोली जाने वाली भाषा को नहीं जानते। व्यक्तिगत स्टीरियो प्रणालियों से संगीत टेलीविजन (जैसेकि एमटीवी) और कॉम्पेक्ट डिस्क (सीडी) तक प्रौद्योगिकी के विकास ने भूमंडलीय आधार पर संगीत के वितरण के लिए नए-नए और अधिक परिष्कृत तरीके प्रस्तुत कर दिए हैं।

मीडिया के रूपों का विलयन

यद्यापि संगीत उद्योग कुछ ही अंतरिष्ट्रीय समूहों के हाथों में अधिकाधिक रूप से केंद्रित होता जा रहा है, पर कुछ लोगों का मानना है कि इसके लिए एक बड़ा खतरा पैदा हो गया है। क्योंकि इंटरनेट के आ जाने से संगीत को स्थानीय संगीत की दुकानों से सीडी या कैसेट के रूप में खरीदने के स्थान पर डिजिटल रूप में डाउन लोड किया जा सकता है। भूमंडलीय संगीत उद्योग में इस समय अनेक फैक्ट्रियों, वितरण शृंखलाओं, संगीत की दुकानों और बिक्री कर्मचारियों का एक जटिल नेटवर्क शामिल है। यदि इंटरनेट इन सभी तत्वों की आवश्यकता को समाप्त कर संगीत को सीधे डाउनलोड कर बेचना संभव कर सकेगा तो फिर संगीत उद्योग में बाकी क्या बचेगा? आप संगीत उद्योग पर मोबाइल एण्लिकेशन के प्रभाव को कैसे देखते हैं?

हमने संगीत उद्योग और उस पर पड़े भूमंडलीकरण के दूरगामी परिणामों के साथ अपनी चर्चा को प्रारंभ किया था। मास मीडिया में जो परिवर्तन हुए हैं, वे इतने अधिक हैं कि यह अध्याय संभवतः उनके बारे में आपको एक विखंडित जानकारी ही दे पाएगा। युवापीढ़ी के एक सदस्य होने के नाते आप यहाँं दी गई समझ के आधार पर और अधिकाधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। अब हम यहाँं यह देखेंगे कि भूमंडलीकरण के कारण प्रिंट मीडिया (मुख्यतः समाचारपत्र और पत्रिकाएँ), इ्लेक्ट्रॉनिक मीडिया (मुख्यतः टेलीविज्न) और रेडियो में क्या-क्या परिवर्तन आए हैं।

मुद्रण माध्यम (प्रिंट मीडिया)

हम ये देख चुके हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन के प्रसार के लिए समाचारपत्र और पत्रिकाएँ कितने महत्वपूर्ण थे। अक्सर, ऐसा विश्वास किया जाता है कि टेलीविज्ञन और इंटरनेट के विकास से प्रिंट मीडिया का महत्व कम हो जाएगा। किंतु भारत में हमने समाचारपत्रों के प्रसार को बढ़ते हुए देखा है। जैसाकि बॉक्स में बताया गया है, नयी प्रौद्योगिकियों ने समाचारपत्रों के उत्पादन और प्रसार को बढ़ावा देने में मदद की है। बड़ी संख्या में चमकदार पत्रिकाएँ भी बाजार में आ गई हैं।

जाहिर है कि भारतीय भाषाओं के समाचारपत्रों की इस आश्चर्यजनक वृद्धि के कई कारण हैं। पहला, ऐसे साक्षर लोगों की संख्या में काफ़ि बढ़ोतरी हुई जो शहरों में प्रवसन कर रहे हैं। 2003 में हिंदी दैनिक ‘हिंदुस्तान’ के दिल्ली संस्करण की 64,000 प्रतियाँ छपती थीं जो 2005 तक बढ़ कर 4,25,000 हो गई। इसका कारण यह था कि दिल्ली की एक करोड़ सैंतालीस लाख की जनसंख्या में से 52 प्रतिशत लोग उत्तर प्रदेश और बिहार के हिंदीभाषी क्षेत्रों से आए हैं। इनमें से 47 प्रतिशत लोगों की पृष्ठभूमि ग्रामीण है और उनमें से 60 प्रतिशत लोग 40 वर्ष से कम आयु के हैं।

भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों की क्रांति

बॉक्स 7.8

पिछले कुछ दशकों में सबसे महत्वपूर्ण घटना भारतीय भाषा के समाचार पत्रों में क्रांति रही है। हिंदी, तेलुगू और

कन्नड़ में उच्चतम वृद्धि दर्ज की गई। 2006 से 2016 तक हमारे देश में प्रकाशनों को प्रिंट करने का ओसतन 23.7 मिलियन प्रतियों के औसत से दैनिक संचलन में वृद्धि हुई थी। वर्ष 2006 और वर्ष 2016 के मध्य समग्र वार्षिक वृद्धि दर 4.87 प्रतिशत के अनुसार दैनिक औसतन प्रतियों का संचलन 62.8 मिलियन रहा जो कि वर्ष 2016 में 39.1 था। चार मुख्य भौगोलिक क्षेत्रों में उत्तरीय क्षेत्र में अधिकतम संचलन 7.83 प्रतिशत रहा है। दक्षिण, पश्चिम और पूर्वीय क्षेत्रों में वृद्धि दर क्रमशः 4.95 प्रतिशत, 2.81 प्रतिशत और 2.63 प्रतिशत रहा है। भारत में शीर्ष दैनिक समाचार पत्रों के वर्ग में दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर को ओसतन 3.92 मिलियन और 3.81 मिलियन की बिक्री की दर से सम्पिलित किया गया है।

(स्त्रोत : ऑँडिट ब्यूरो सरकुलेशन, 2016-17)

'ईनाडु' तेलुग समाचारपत्र की कहानी भी भारतीय भाषाओं के समाचारपत्रों (प्रेस) की सफलता का एक उदारहण है। 'ईनाडु' के संस्थापक रामोजी राव ने 1974 में इस समाचारपत्र को प्रारंभ करने से पहले एक चिट-फंड सफलतापूर्विक चलाया था। 1980 के दशक के मध्य भाग में ग्रामीण क्षेत्रों में अरक-विरोधी आंदोलन जैसे उपयुक्त मुद्रों से जुड़कर यह तेलुगु समाचारपत्र देहातों में पहुँचने में सफल हो गया। अपनी इस सफलता से प्रेरित होकर उसने 1989 में 'जिला दैनिक' निकालने शुरु किए। ये छोटे-छोटे पत्रक होते थे जिनमें जिला-विशेष के सनसनीखेज समाचार और उसी जिले के गाँवों और छोटे कर्स्बों से प्राप्त वर्गीकृत विज्ञापन छापे जाते थे। 1998 तक आते-आते 'ईनाडु' आंध्र प्रदेश के दस कर्स्बों से प्रकाशित होने लगा था और संपूर्ण तेलुगु दैनिक पत्रों के प्रसार में इसका हिस्सा 70 प्रतिशत था।

द्ससरा, छोटे कस्बों और गाँवों में पाठकों की आवश्यकताएँ शहरी पाठकों से भिन्न होती हैं और भारतीय भाषाओं के समाचारपत्र उन आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। 'मलयाली मनोरमा' और 'ईनाडु' जैसे भारतीय भाषाओं के प्रमुख पत्रों ने स्थानीय समाचारों की संकल्पना को एक महत्वपूर्ण रीति से जिला संस्करणों और आवश्यकतानुसार ब्लाक संस्करणों के माध्यम से प्रारंभ किया। एक अन्य अग्रणी तमिल समाचार पत्र 'दिन्तंती' ने हमेशा सरल और बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया। भारतीय भाषाओं के समाचारपत्रों ने उन्नत मुद्रण प्रौद्योगिकियों को अपनाया और परिशिष्ट, अनुपूरक अंक, साहित्यिक पुस्तिकाएँ प्रकाशित करने का प्रयत्न किया। 'दैनिक भास्कर' समूह की संवृद्धि का कारण उनके द्वारा अपनाई गई अनेक विपणन संबंधी

भारत में समाचारपत्रों के प्रसार में परिवर्तन

बॉक्स 7.9

भारतीय पाठक सर्वेक्षण, 2019 के हाल में प्रकाशित ऑँकड़ों के अनुसार, हिंदी भाषी क्षेत्रों में पाठकों की संख्या

में सर्वाधिक वृद्धि हुई है। भारतीय भाषाओं के दैनिक समाचारपत्रों के पाठकों की संख्या में पिछले वर्ष काफ्री अधिक वृद्धि हुई और वह 2019 में 19.1 करोड़ से बढ़कर 42.5 करोड़ के ऑँकड़े पर पहुँच गई है। दूसरी ओर अंग्रेजी के दैनिक समाचारपत्रों के पाठकों की संख्या 3.1 करोड़ के आसपास अपरिवर्तित ही रही है। 2005 में हिंदी के दैनिक समाचारपत्रों में ‘दैनिक जागरण’ (7.4 करोड़ पाठक) और ‘दैनिक भास्कर’ (5.1 करोड़ पाठकों के साथ) सूची में सबसे ऊपर है, जबकि ‘दि टाइम्स ऑफ्र इंडिया’ और ‘दि हिंदू’ अंग्रेजी के दैनिक हैं जिसके पाठकों की संख्या 50 लाख से अधिक (74 लाख) है। 1 करोड़ पाठकों वाले कुल सर्वात्तम 10 दैनिकों में से छह हिंदी के, एक तमिल, दो मलयालम और एक अंग्रेजी के है। (http://mruc.net)

रणनीतियाँ हैं, जिनके अंतर्गत वे उपभोक्ता संपर्क कार्यक्रम, घर-घर जाकर सर्वेक्षण और अनुसंधान जैसे कार्य करते हैं। इससे हम फिर उसी मुद्दे पर आ जाते हैं कि आधुनिक मास मीडिया के लिए एक औपचारिक संरचनात्मक संगठन का होना आवश्यक है।

जनसंपर्क साधन और जनसंचार

जबकि अंग्रेजी भाषा के समाचारपत्र, जिन्हें अक्सर 'राष्ट्रीय दैनिक' कहा जाता है, सभी क्षेत्रों में पढ़े जाते हैं, देशी भाषाओं के समाचारपत्रों का प्रसार राज्यों तथा अंदरूनी ग्रामीण प्रदेशों में बहुत अधिक बढ़ गया है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से मुकाबला करने के लिए, समाचारपत्रों ने, विशेष रूप से अंग्रेजी भाषा के समाचारपत्रों ने एक ओर जहाँं अपनी कीमतें घटा दी है वहीं दूसरी ओर एक साथ अनेक केंद्रों से अपने अलग-अलग संस्करण निकालने लगे हैं।

क्रियाकलाप 7.4

•
पता लगाइए कि जिस समाचारपत्र से आप भलीभॉति परिचित हैं, वह कितने स्थानों से निकाला जाता है।
•
क्या आपने गौर किया है कि उनमें किसी नगर के हितों और घटनाओं को विशेष महत्व देने वाले परिशिष्ट होते हैं।
•
क्या आपने ऐसे अनेक वाणिज्यिक परिशिष्टों को देखा है जो आजकल कई समाचारपत्रों के साथ आते हैं?

समाचारपत्र उत्पादन में परिवर्तन : प्रौद्योगिकी की भूमिका

1980 के दशक के अंतिम वर्षों और 1990 के दशक के प्रारंभिक वर्षों से समाचारपत्र संवाददाता की डेस्क से अंतिम पेज-प्रूफ तक पूर्णरूप से स्वचालित हो गए हैं। इस स्वचालित शृंखला के कारण कागज का प्रयोग पूरी तरह से समाप्त हो गया है। ऐसा दो प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों के कारण संभव हुआ है- (लैन) लोकल एरिया नेटवर्क यानी स्थानीय इलाके के नेटवर्कों के माध्यम से पर्सनल कंघ्यूटरों (पी.सी.) की नेटवर्क व्यवस्था और समाचार निर्माण के लिए ‘न्यूजमेकर’ जैसे तथा अन्य विशिष्ट सॉफ्टवेयरों का प्रयोग।

बदलती हुई प्रौद्योगिकी ने संवाददाता की भूमिका और कार्यों को भी बदल दिया है। एक संवाददाता के पुराने आधारभृत उपकरणों, एक आशुलिपि पुस्तिका, पेन, टाइपराइटर और पुराना सादा टेलीफ्रोन का स्थान एक छोटे डिजिटल रिकॉर्डर, एक लैपटॉप या एक पी.सी., मोबाइल या सेटेलाइट फ्रोन, 'मॉङ्टेम' डिश और ऐंटिना जैसे अन्य नए उपकरणों ने ले लिया है। समाचार संग्रहण कार्य में आए इन सभी प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों ने समाचारों की गति को बढ़ा दिया है और समाचारपत्रों के प्रबंधकवर्ग को अपनी कार्याविधि को बढ़ाने में सहायता दी है। अब वे अधिक संख्या में संस्करण निकालने की योजना बनाने और पाठकों को नवीनतम समाचार देने में सक्षम हो गए हैं। देशी

भाषाओं के अनेक समाचारपत्र प्रत्येक जिले के लिए अलग संस्करण निकालने के लिए इन नयी प्रौद्योगिकियों का प्रयोग कर रहे हैं। यद्यपि मुद्रण केंद्र तो सीमित है, पर संस्करणों की संख्या कई गुना बढ़ गई है।

मेरठ से निकलने वाले ‘अमर उजाला’ जैसे समाचारपत्रों की शृंखलाएँ समाचार एक्त्रित करने और चित्रात्मक सामग्री में सुधार के लिए नयी प्रौद्योगिकी का प्रयोग कर रही हैं। इस समाचारपत्र के पास उत्तर प्रदेश तथा उत्तरांचल राज्यों से निकलने वाले अपने सभी तेरह संस्करणों की सामग्री देने के लिए लगभग एक सौ संवाददाता और कर्मचारी और लगभग इतने ही फ्रोटोग्राफर का एक नेटवर्क है। सभी एक सौ संवाददाता समाचार भेजने के लिए ‘पी.सी.’ और मॉडेम उपकरणों से सुसज्जित हैं और फ्रोटोग्राफर अपने साथ डिजिटल कैमरा रखते हैं। डिजिटल चित्र ‘मॉडेम’ के माध्यम से केंद्रीय समाचारकक्ष को भेजे जाते हैं।

बॉक्स 7.10

Textbook illustration

विभिन्न आयुवर्ग के व्यक्ति समाचार पत्र में क्या पढ़ते हैं

समाचार पत्रों का यह प्रयत्न रहा है कि उनके पाठक बढ़े और वे स्वयं विभिन्न समूहों तक

बॉक्स 7.11

पहुँचों। ऐसा कहा जाता है कि समाचार पत्र पढ़ने की आदतें बदल गई हैं। जबकि वृद्धजन पूरा-पूरा समाचार पत्र पढ़ते हैं, युवा पाठक अक्सर अपनी-अपनी विशिष्ट रुचियाँ रखते हैं और उन्हीं के अनुसार वे खेल, मनोरंजन या सामाजिक गपशप जैसे विषयों के लिए निर्धारित पृष्ठों पर सीधे पहुँच जाते हैं। पाठकों की रुचियों में भिन्नता होने का निहितार्थ यह है कि समाचार पत्र को भी विभिन्न प्रकार की ‘कहानियाँ’ रखनी चाहिए जो विभिन्न रुचियों के पाठकों को आकर्षित कर सकें। इसीलिए समाचार पत्र अक्सर ‘सूचनारंजन’ (इनफोटेनमेंट) यानी सूचना तथा मनोरंजन दोनों के मिश्रण का समर्थन करते हैं ताकि सभी प्रकार के पाठकों की रुचि बनी रहे। समाचार पत्रों का प्रकाशन अब कतिपय परंपराबढ़ मूल्यों के लिए प्रतिबढ़ता से संबंधित नहीं रहा है। समाचार पत्र अब उपभोक्ता वस्तु बन गए हैं और जब तक संख्या बड़ी है, सबकुछ़ बिक्री के लिए प्रस्तुत है।

बॉक्स 7.11 का अभ्यास

पाठ्य सामग्री को ध्यानपूर्वक पढ़े-

•
आपके विचार से क्या पाठक बदल गए हैं अथवा समाचार पत्र बदल गए हैं? चर्चा करें।
•
'सूचनारंजन' शब्द पर चर्चा करें। क्या आप इसके कुछ उदाहरण सोच सकते हैं? आपके विचार से सूचनारंजन का क्या प्रभाव होगा?
Textbook illustration

बहुत से लोगों को यह डर था कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उत्थान से प्रिंट मीडिया के प्रसार में गिरावट आएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वस्तुतः यह विस्तृत ही हुआ है। किंतु इस प्रक्रिया के कारण अक्सर कीमतें घटानी पड़ी हैं और परिणामस्वरूप विज्ञापनों के प्रायोजकों पर निर्भरता बढ़ गई जिसके कारण अब समाचार पत्रों की विषय-वस्तु में विज्ञापनदाताओं की भूमिका बढ़ गई है। बॉक्स 7.11 में इस व्यवहार के तर्क को स्पष्ट किया गया है।

टेलीविज्ञन

1991 में भारत में केवल एक ही राज्य-नियंत्रित टीवी चैनल ‘दूरदश्न’ था। 1998 तक लगभग 70 चैनल हो गए। 1990 के दशक के मध्यभाग

से गैर सरकारी चैनलों की संख्या कई गुना बढ़ गई हौ। वर्ष 2020 में जब दूरदर्शन 35 से अधिक चैनलों पर अपने कार्यक्रम प्रसारित कर रहा था, गैर सरकारी टेलीविजन नेटवर्कों की संख्या 900 के आसपास थी। गैर सरकारी उपग्रह टेलीविजन में हुई आश्चर्यजनक वृद्धि समकालीन भारत में हुए निर्णयात्मक विकासों में से एक हौ। वर्ष 2002 में, औसतन 13.4 करोड़ लोग प्रति सप्ताह उपग्रह टी.वी. देखा करते थे। यह संख्या बढ़कर 2005 में 19 करोड़ हो गई। वर्ष 2002 में उपग्रह टी.वी. की सुविधा वाले घरों की संख्या 4 करोड़ थी

जनसंपर्क साधन और जनसंचार

जो बढ़कर 2005 में 6.10 करोड़ हो गई। टी.वी. रखने वाले सभी घरों में से 56 प्रतिशत घरों में अब उपग्रह ग्राहकी (सेटेलाइट सब्सक्रिप्नान) पहुँच चुकी है।

1991 के खाड़ी युन्ध ने (जिसने सी.एन.एन. चैनल को लोकप्रिय बनाया) और उसी वर्ष हांगकांग के द्वामपोआ हचिनसन समूह द्वारा प्रांंभ किए गए स्टार टी.वी. ने भारत में गैर-सरकारी उपग्रह चैनलों के आगमन का संकेत दे दिया था। 1992 में, हिंदी आधारित उपग्रह मनोंजन चैनल जी-टीवी ने भारत में केबल टेलीविजन को अपने कार्यक्रम देना शुरु कर दिया था। वर्ष 2000 तक आते-आते, भारत में 40 गैर सरकारी केबल और उपग्रह चैनल उपलब्ध हो चुके थे, जिनमें से कुछ ऐसे भी थे जो केवल क्षेत्रीय भाषाओं के प्रसारण पर ही केंद्रित थे, जैसे– सन टी.वी., ईनाडु टी.वी., उद्य टी.वी., राज टी.वी. और एशिया नेट। इस बीच जी टी.वी. ने भी कई क्षेत्रीय नेटवर्क शुरु किए जो मराठी, बंगला और अन्य भाषाओं में कार्यक्रम प्रसारित करते हैं।

1980 के दशक में, एक ओर जहाँ दूरदर्शन तेजी से विस्तृत हो रहा था, वहीं केबल टेलीविजन उद्योग भी भारत के बड़े-बड़े शहरों में तेजी से पनपता जा रहा था। वी.सी.आर. ने दूरदर्शन की एकल चैनल कार्यक्रम व्यवस्था के अनेक विकल्प प्रस्तुत करके भारतीय दर्शिकों के लिए मनोरंजन के विकल्पों में कई गुना वृद्धि कर दी। निजी घरों और सामुदायिक बैठक कक्षों में वीडियो कार्यक्रम देखने की सुविधा में भी तेजी से वृद्धि हुई। वीडियो कार्यक्रमों में अधिकतर देशी और आयातित दोनों प्रकार की फिल्मों पर आधारित मनोरंजन शामिल था। 1984 तक, मुंबई और अहमदाबाद जैसे नगरों में उद्यमी एक दिन में अनेक फिल्में प्रसारित करने के लिए अपार्टमेंट भवनों में तार लगाने लगे। केबल चलाने वालों की संख्या जो 1984 में 100 थी, बढ़कर 1988 में 1200, 1992 में 15,000 और 1999 में लगभग 60,000 हो गई।

स्टार टी.वी., एम.टी.वी., चैनल वी, सोनी जैसी अन्य अनेक पारराष्ट्रीय (अंतररिष्ट्रीय) टेलीविज्ञन कंपनियों के आ जाने से कुछ लोगों को भारतीय युवाओं और भारतीय संस्कृति पर उनके संभावित प्रभाव के बारे में चिंता हुई। लेकिन अधिकांश पारराष्ट्रीय टेलीविज्ञन चैनलों ने अनुसंधान के माध्यम से यह जान लिया है कि भारतीय दर्शिकों के विविध समूहों को आकर्षित करने में चिर-परिचित कार्यक्रमों का प्रयोग ही अधिक

प्रिंस का बचाव

बॉक्स 7.12

प्रिंस नाम का एक पाँँच वर्षीय बालक हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के अल्डेहढ़ी गाँँव में एक

55 फुट गहरे वेधन-कूप (बोरवैल) के गड़ढ़े में गिर गया था और उसे 50 घंटे के कठिन परिश्रम के बाद सेना द्वारा बाहर निकाला जा सका। इसके लिए सेना ने एक दूसरे कुएँ के समानांतर सुरंग खोदी। बालक जिस शैफ्ट में नीचे बंद था उसमें बंद सर्किट वाला टेलीविजन कैमरा (सी.सी.टी.वी.) भोजन के साथ, उतारा गया था। दो समाचार चैनलों ने अपने अन्य सभी कार्यक्रम छोड़कर लगातार दो दिनों तक उस बालक की ही चित्रावली दिखानी जारी रखी, जिसमें यह दिखाया गया था कि बालक कितनी बहादुरी से कीड़े-मकौड़ों से लड़ रहा है, सो रहा है या अपनी माँ को चिल्ला-चिल्लाकर पुकार रहा है। यह सब टीवी के परदे पर दिखाया जा रहा था। उन्होंने मंदिरों से बाहर कुछ लोगों के साक्षात्कार भी लिए और यह पूछा कि “आप प्रिंस के बारे में क्या महसूस कर रहे हैं?” उन्होंने लोगों से यह भी कहा कि हमें प्रिंस के लिए एस.एम.एस. द्वारा संदेश भेजें। हजारों लोग उस स्थान पर जमा हो गए और दो दिनों तक मुफ्त सामुदायिक भोजन (लंगर) चला। इससे رाष्ट्रभर में एक उन्माद और चिंता का वातावरण उत्पन्न हो गया और लोगों को मंदिरों, मस्जिदों, चर्चां और गुरुद्वारों में प्रिंस के सुरक्षित जीवन के लिए प्रार्थनाएँ करते हुए दिखलाया गया। ऐसे और भी कई उदाहरण हैं जब टीवी को लोगों के व्यक्तिगत जीवन में दखल करते हुए दिखाया गया है।

प्रभावशाली होगा। सोनी इंटरनेशनल की प्रारंभिक रणनीति यह रही कि हर सप्ताह 10 हिंदी फिल्में प्रसारित की जाएँ और बाद में जब स्टेशन अपने हिंदी कार्यक्रम तैयार कर ले, तब धीरे-धीरे इनकी संख्या घटा दी जाए। अब अधिकतर विदेशी नेटवर्क या तो हिंदी भाषा के कार्यक्रमों का एक हिस्सा (एम.टी.वी. इंडिया) हो गए हैं अथवा नया हिंदी चैनल (स्टार प्लस) ही शुरु कर दिया है। स्टार स्पोर्ट्स और ई.एस.पी.एन. दोहरी कॉर्मेंटरी अथवा हिंदी में एक ऑडियो साउंड ट्रैक चलाते हैं। बड़ी कंपनियों ने बंगला, पंजाबी, मराठी और गुजराती जैसी भाषाओं में विशिष्ट क्षेत्रीय चैनल शरू किए हैं।

स्थानीयकरण का सबसे नाटकीय तरीका संभवतः स्टार टी.वी. ढ्वारा अपनाया गया। स्टार प्लस चैनल, जो प्रारंभ में हांगकांग से संचालित पूर्ण रूप से सामान्य मनोरंजन का अंग्रेजी चैनल था, ने अक्तूबर 1996 से सायं 7 और 9 बजे के बीच हिंदी भाषा के कार्यक्रम देने शुरु कर दिए। फिर फरवरी 1999 से बह पूर्ण रूप से हिंदी चैनल बन गया और उसके सभी अंग्रेजी धारावाहिक स्टारवल्डे को, जो कि इस नेटवर्क का अंग्रेजी भाषा का अंतरिष्ट्रीय चैनल है, को दे दिए गए। इस परिवर्तन को प्रोत्साहन देने वाले विज्ञापनों में हिंगलिश का यह नारा शामिल था- ‘आपकी बोली आपका प्लस प्वाइंट’ (बूचर, 2003)। स्टार और सोनी दोनों ही संयुक्त राज्य अमेरिका के अपने कार्यक्रमों को छोटे बच्चों के लिए डब करते रहे क्योंकि उन्हें यह प्रतीत होने लगा था कि बच्चे उन विलक्षणताओं को समझने और स्वीकार करने लगे हैं जो उस स्थिति में उत्पन्न होती है जब भाषा कोई अन्य हो और कथा परिवेश कोई अन्य। क्या आपने कभी कोई डब किया हुआ कार्यक्रम देखा है? उसके बारे में आप क्या महसूस करते हैं?

अधिकांश चैनल हफ्ले में सातों दिन और दिन में चौबीसों घंटे चलते हैं। उनमें समाचारों का स्वरूप जीवंत एवं अनौपचारिक होता है। समाचारों को पहले की अपेक्षा अब बहुत अधिक तात्कालिक, लोकतंत्रात्मक और आत्मीय बना दिया गया है। टेलीविजन ने सार्वजनिक वाद-विवाद को बढ़ावा दिया है और हर बीतते हुए वर्ष के साथ वह अपनी पहुँच को विस्तृत करता जा रहा है। इससे हमारे समक्ष यह प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या गंभीर राजनीतिक और आर्थिक मुहों की उपेक्षा तो नहीं की जा रही।

हिंदी और अंग्रेजी में समाचार देने वाले चैनलों की संख्या बराबर बढ़ती जा रही है। इसी प्रकार क्षेत्रीय चैनल भी बढ़ रहे हैं और उनके सबके साथ ही यथार्थवादी प्रदर्शन/रिएलिटी शो वार्ता प्रदर्शन, बॉलीवुड प्रदर्शन, पारिवारिक नाट्य प्रदर्शन, अंतःक्रियात्मक प्रदर्शन, खेल प्रदर्शन और प्रहसन एवं हॉंसी-मज्ञाक के प्रदर्शन बड़ी संख्या में हो रहे हैं। मनोरंजन टेलीविज्ञन ने महान सितारों (सुपर स्टार्स) का एक नया वर्ग पैदा कर दिया है जिनके नामों से हर घर-परिवार सुपरिचित हो गया है और लोकप्रिय पत्रिकाओं और समाचारपत्रों के गपशप-स्तंभों में उनकी निजी जिंदगी और प्रदर्शन में उनकी प्रतिद्धंद्विता के किस्से भरे होते हैं। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ अथवा ‘इंडियन आइडल’ या ‘बिंग बॉस’ जैसे वास्तविक प्रदर्शन दिन-पर-दिन लोकप्रिय होते जा रहे हैं। इनमें से अधिकांश कार्यक्रम पाश्चात्य कार्यक्रमों के प्रारूप पर तैयार किए गए हैं। इनमें से किन-किन

सोप ओपेरा

सोप ओपेरा ऐसी कहानियाँ हैं जो धारावाहिक रूप से दिखलाई जाती हैं। वे लगातार चलती हैं।

अलग-अलग कहानियाँ समाप्त हो सकती हैं, और भिन्न-भिन्न पात्र प्रकट और गायब होते रहते हैं, पर स्वयं 'सोप' का तब तक कोई अंत नहीं होता जब तक कि उसे पूरी तरह प्रसारण से वापस नहीं ले लिया जाता। सोप ओपेगा एक इतिवृत को लेकर चलते हैं जिसे नियमित दर्शक जानते हैं, वह चरित्रों से, उनके व्यक्तित्व और उनके जीवन के अनुभवों से सुपरिचित हो जाते है।

बॉक्स 7.13

जनसंपर्क साधन और जनसंचार

कार्यक्रमों को अंतःक्रियात्मक प्रदर्शन, पारिवारिक नाट्य प्रदर्शन, वार्ती प्रदर्शन और यथार्थवादी प्रदर्शन कहा जा सकता है? चर्चा करें।

रेडियो

वर्ष 2000 में, आकाशवाणी के कार्यक्रम भारत के सभी दो-तिहाई घर-परिवागों में, 24 भाषाओं और 146 बोलियों में, 12 करोड़ से भी अधिक रेडियो सेटों पर सुने जा सकते थे। 2002 में गैर सरकारी स्वामित्व वाले एफ.एम. रेडियो स्टेशनों की स्थापना से रेडियो पर मनोरंजन के कार्यक्रमों में बढ़ोतरी हुई। श्रोताओं को आकर्षित करने के लिए ये निजी तौर पर चलाए जा रहे रेडियो स्टेशन अपने श्रोताओं का मनोरंजन करते थे। चॉँकि गैर सरकारी तौर पर चलाए

Can you talk your walk? GenZ has tuned into a new career

Malivika Nanda

I'd sit alone and watch your light. My only friend through teenage nights. And everything I had to know, I heard it on my radio... You had your time you had the power, You've yet to have your finest hour, Radio... Radio Ga Ga...

Long ago when Queen's Freddie Mercury sung Radio Ga Ga, maybe it was a subtle reference to the finest hour which we are witnessing now – the radio boom which is loud and clear. This boom has made radio jockeying the coolest career option for the hip and happening

Textbook illustration

GenZ. And if seeing is believing, the incessant rush of wannabe RJ's who thronged the Fever 104 stall at the recently-held HT Youth Nexus made our conviction further stronger. The fever is certainly on the rise.

It's the right choice

But what has made RJ-ing the coolest choice? Perhaps, it is the rising level of awareness among youngsters, who want something more and extraordinary when it comes to career. No run of the mill stuff for them because they are willing to risk and experiment. As actress Preity Zinta, who was an RJ in

रेडियो गा गा

जाने वाले एफ.एम. चैनलों को कोई राजनीतिक समाचार बुलेटिन प्रसारित करने की अनुमति नहीं देता है, इसलिए इनमें से बहुत से चैनल अपने श्रोताओं को लुभाए रखने के लिए किसी विशेष प्रकार के लोकप्रिय संगीत में अपनी विशेषता रखते हैं। ऐसे एक एफ.एम. चैनल का दावा है कि वह दिन-भर ‘हिट’ गानों को ही प्रसारित करता है। अधिकांश एफ.एम. चैनल जो कि युवा शहरी व्यावसायिकों तथा छात्रों में लोकप्रिय हैं, अक्सर मीडिया समूहों के होते हैं। जैसे ‘रेडियो मिर्ची’ ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ समूह का है, ‘रैड एफ.एम.’ ‘लिविंग मीडिया’ का और ‘रेडियो सिटी’ ‘स्टार नेटवर्क’ के स्वामित्व में हैं। लेकिन नेशनल पब्लिकरेडियो (यू.एस.ए.) अथवा बी.बी.सी. (यू.के.) जैसे स्वतंत्रेरेडियो स्टेशन जो सार्वजनिक प्रसारण में संलग्न हैं, हमारे प्रसारण परिद्रुश्य से बाहर हैं।

दो फिल्मों 'रंग दे बसंती' और 'लगे रहो मुन्नाभाई' में, रेडियो को संचार के सक्रिय माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया गया है, हालाँकि दोनों ही फिल्में समकालीन परिवेश की हैं। 'रंग दे बंसती' में, एक कर्तव्यनिष्ठ, गुस्सैल कॉलेज छात्र भगत सिंह की कहानी से प्रेरित होकर एक मंत्री की हत्या कर देता है और फिर जनता तक अपना संदेश प्रसारित करने के लिए आकाशवाणी को अपने कब्जे में कर लेता है। जबकि 'लगे रहो मुन्नाभाई' में, नायिका एक रेडियो जॉकी है जो अपनी आत्मीय पुकार 'गुड मॉर्निंग इंडिया' से देश को जगाती है और नायक भी एक लडङ्की के जीवन को बचाने के लिए रेडियो स्टेशन का सहारा लेता है।

एफ.एम. चैनलों के प्रयोग की संभावनाएँ अत्यधिक हैं। रेडियो स्टेशनों के और अधिक निजीकरण तथा समुदाय के स्वामित्व वाले रेडियो स्टेशनों के उद्धभव के परिणामस्वरूप रेडियो स्टेशनों का और अधिक विकास होगा। स्थानीय समाचारों को सुनने की माँग बढ़ रही है। भारत में एफ.एम. चैनलों को सुनने वाले घरों की संख्या ने स्थानीय रेडियो द्वारा नेटवर्कों का स्थान ले लेने की विश्वव्यापी प्रवृत्ति को बल दिया। नीचे बॉक्स में दी गई सामग्री से न केवल एक ग्रामीण युवक की चतुराई का पता चलता है बल्लिक स्थानीय संस्कृतियों के पोषण की आवश्यकता भी प्रकट होती है।

संभवतः यह संपूर्ण एशियाई उपमहाद्रीप में एकमात्र ग्रामीण एफ.एम. रेडियो स्टेशन हो। यह प्रसारण उपकरण, जिसकी कीमत बहुत कम है... शायद दुनिया भर में सबसे सस्ता उपकरण

बॉक्स 7.14

हो। लेकिन स्थानीय लोगों को निश्चित रूप से यह बहुत प्यारा है। भारत के उत्तरी राज्य बिहार में एक सुहावनी सुबह को, राघव महतो नाम का एक युवक अपने घर में विकसित एफ.एम. रेडियो स्टेशन चालू करने के लिए तैयार होता है। मरम्मत सेवा प्रदान करने वाली राघव की छोटी-सी दुकान और रेडियो स्टेशन के 20 किलोमीटर (12 मील) के घरे में रहने वाले हजारों ग्रामवासी अपने प्रिय स्टेशन का कार्यक्रम सुनने के लिए अपने रेडियो सेट चालू करते हैं। थोड़ी-सी घरघराहट की आवाज़ के बाद एक युवक का आत्मविश्वासपूर्ण स्वर रेडियो तरंगों पर तैरने लगता है। “सुप्रभात : राघव एफ.एम. मंसूरपुर में आपका स्वागत है। अब अपने मनपसंद गाने सुनिए” की घोषणा राघव के मित्र और कार्यक्रम संचालक शंभु के स्वर में सुनाई पड़ती है जो स्थानीय संगीत की टेपों के ढेर से घिरा हुआ सैलोटेप का प्लास्टर लगे माइक्रोफ्रोन में बोलता है। अगले 12 घंटों तक, राघव महतो का निर्जन एफ.एम. रेडियो स्टेशन फिल्पी गाने सुनाता है और एच.आई.वी. तथा पोलियो जैसी बीमारियों के बारे में सार्वजनिक हित की खबरें और सजीव स्थानीय समाचार भी देता है जिनमें खोए गए बच्चों और नयी खुलने वाली स्थानीय दुकानों की खबरें भी शामिल होती हैं। राघव और उसका मित्र शंभु राघव की छप्पर वाली दुकान प्रिया इल्लेक्ट्रॉनिक्स शॉप से अपना देसी रेडियो स्टेशन चलाते हैं।

जगह तंग है... झाँपड़ा किराए का है जिसमें संगीत भरे टेप और जंग लगे बिजली के उपकरणों का ढेर लगा है और जो मरम्मत सेवा प्रदान करने वाली राघव की दुकान के साथ-साथ रेडियो स्टेशन का कार्य भी करती है।

राधव पढ़ा-लिखा न हो परंतु उसके स्वदेशी एफ.एम. स्टेशन ने उसे स्थानीय राज नेताओं से भी अधिक लोकप्रिय बना दिया है। राधव का रेडियो के साथ प्रेस-प्रसंग 1997 में प्रारंभ हुआ जब उसने एक स्थानीय मरम्मत की दुकान में एक मिस्त्री के रूप में काम करना प्रारंभ किया था। जब दुकान का मालिक वह क्षेत्र छोड़कर चला गया तो एक कैंसर-पीड़ित खेतिहर मजदूर के बेटे राधव ने एक मित्र के साथ मिलकर वह झाँपड़ी ले ली। 2003 में किसी समय राघव ने, जो तब तक रेडियो के बारे में काफ्री कुछ जान चुका था ..... गरीबी की मार से पीड़ित बिहार राज्य में, जहाँ बुहुत से क्षेत्रों में बिजली नहीं है, सस्ते बैटरी से चलने वाले ट्रांजिस्टर ही मनोरंजन का सबसे लोकप्रिय साधन है। “इस विचार को पक्का करने और ऐसी किट तैयार करने में, जो एक निर्धारित रेडियो आवृत्ति रेडियोफ्रिक्वेंसी पर मेरे कार्यक्रम प्रसारित कर सके, मुझे काफ्री लंबा समय लगा। किट पर 50 रू. लागत आई”, राघव कहता है। प्रसारण किट एक एंटीना के साथ लंबे बाँस पर पास के एक तीनमंजिला अस्पताल पर लगी है। एक लंबा तार उस प्रसारण यंत्र को नीचे राघव के रेडियो झाँपड़े में लगे घरघराहट करने वाले, घर के बने पुराने स्टीरियो कैसेट प्लेयर से जोड़ता है। तीन अन्य जंग लगे, स्थानीय रूप से बने बैटरी चालित टेपरेकॉर्डर रंगीन तारों और एक बेतार (कॉर्डलेस) माइक्रोफ्रोन के साथ इससे जुड़े है।

राघव के झ्रोंपड़े में स्थानीय भोजपुरी, बॉलीबुड और भक्ति गीतों के कोई 200 टेप हैं जिन्हें बह अपने श्रोताओं के लिए बजाता है। राघव का रेडियो स्टेशन उसका एक शौक है- बह उससे कुछ कमाता नहीं है। बह अपनी इलेक्ट्रॉनिक मरम्मत की ढुकान से कोई दो हज्ञार रुपए प्रतिमास कमा लेता है। यह युवक जो अपने परिवार के साथ एक झ्रोंपड़े में रहता है, यह नहीं जानता कि एक एफ.एम. स्टेशन चलाने के लिए सरकार से लाइसेंस लेना होता है। “में इस बारे में नहीं जानता। मेंने तो यह धंधा बस कौतूहलवश प्रारंभ कर दिया था और हर वर्ष इसका प्रसारण क्षेत्र बढ़ता गया,” बह कहता है।

इसलिए जब कुछ समय पहले कुछ लोगों ने उससे यह कहा कि उसका रेडियो स्टेशन अवैध है तो उसने उसे वास्तव में बंद कर दिया। लेकिन स्थानीय ग्रामवासियों ने उसके झौपड़े को घेर लिया और उसे अपनी सेवाएँ फिर से चालू करने के लिए राजी कर लिया। स्थानीय लोगों को इससे कोई मतलब नहीं कि राधव का ‘एफ.एम. मंसूरपुर-1’ के पास कोई सरकारी लाइसेंस है या नहीं– वे तो बस उसे प्यार करते हैं।

“मेरे स्टेशन को पुरुषों से अधिक महिलाएँ ज्यादा सुनती हैं, ” वह कहता है। “यद्यपि बॉलीवुड और स्थानीय भोजपुरी गाने नितांत आवश्यक हैं, पर में सूर्योदय और सूर्यस्त के समय महिलाओं और बुजुगों के लिए भक्ति गीत भी प्रसारित करता हूँ.” चूँकि गाँव वालों के पास राघव को फ्रोन करने की सुविधा नहीं है, इसलिए वे गीतों की फरमाइश दस्ती तौर पर लिखित संदेशों के माध्यम से अथवा पड़ोस के सार्वजनिक टेलीफ्रोन कार्यालय को फ्रोन करके भेजते हैं। एक रेडियो स्टेशन के ‘संचालक’ के रूप में राघव का यश बिहार में दूर-दूर तक फैल गया है। लोगों ने उसके रेडियो स्टेशन पर काम करने के लिए लिखा है और उसकी प्रौद्योगिकी को खरीदने में अपनी रूचि दिखाई है।

स्त्रोत : बीबीसी न्यूज्ञ (अमरनाथ तिवारी द्वारा)

http://news.bbc.co.uk/go/pvt-12/hi/south_asia/4735642.stm

प्रकाशित : 2006/02/24 11:34:36 जी.एम.टी. बी.बी.सी. एम.एम.वी.

निष्कर्ष

इस तथ्य पर अधिक बल देने की आवश्यकता नहीं है कि मास मीडिया आज हमारे व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन का एक आवश्यक अंग बन गया है। यह अध्याय हमारे जीवन में हुए मीडिया संबंधी सभी अनुभवों को व्यक्त नहीं कर सकता। यह तो हमें यही समझा सकता है कि मास मीडिया समकालीन समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें मीडिया के अनेक आयामों पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया गया है, ये आयाम हैं- राज्य और बाजार के साथ मीडिया का संबंध, इसका सामाजिक गठन एवं प्रबंधन, पाठकों एवं श्रोताओं तथा दर्शिकों के साथ इसके संबंध, आदि। दसरे शब्दों में, यहाँ उन नियंत्रणों जिनके अंतर्गत रहकर मीडिया अपना काम करता है, और अनेक तरीकों, जिनसे यह हमारे जीवन को प्रभावित करता है, पर दृष्टिपात किया गया है।

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समाचारपत्र उद्योग में जो परिवर्तन हो रहे हैं, उनकी रूपरेखा प्रस्तुत करों। इन परिवर्तनों के बारे में आपकी क्या राय है?
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क्या एक जनसंचार के माध्यम के रूप में रेडियो खत्म हो रहा है? उदारीकरण के बाद भी भारत में एफ.एम. स्टेशनों के सामर्थि की चर्चा करो।
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टेलीविज्ञन के माध्यम में जो परिवर्तन होते रहे हैं उनकी रूपरेखा प्रस्तुत करें। चर्चा करें।

संदर्भ ग्रंथ

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बुचर, मेलिसा. 2003. ट्रांसनेशनल टेलीविजन, कल्चर आईडेंटिटी एंड चेंज; क्षैन स्टार केम टू इंडिया सेज, नयी दिल्ली

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भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं विकास

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पेज, डेविड और विलियम गावले. 2001. सेटेलाइट ओवर साउथ एशिया, सेज, नयी दिल्ली
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