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3 संविधान एवं सामाजिक परिवर्तन

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आप देखेंगे कि संविधान में लोगों की सहायता करने की क्षमता निहित है क्योंकि यह सामाजिक न्याय के आधारभूत मानदंडों पर आधारित है। उदाहरण के लिए ग्राम पंचायतों से संबंधित निदेशक सिब्दांत एक संशोधन के रूप में के. संथानम द्वारा संविधान सभा में लाया गया था। 40 साल के बाद 1992 के 73वें संशोधन में यह एक संवैधानिक विधेयक बन गया। अगले भाग में आप इसके विषय में पढ़ेंगे।
संविधान केवल इस बात का संदर्भ ग्रंथ नहीं है कि सामाजिक न्याय के लिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं बल्कि इसमें सामाजिक न्याय के अर्थ को प्रचारित-प्रसारित करने की संभावनाएँ भी निहित हैं। सामाजिक न्याय की समकालीन समझ को ध्यान में रखते हुए अधिकारों और कर्तव्यों की व्याख्या में सामाजिक आंदोलनों ने भी न्यायालयों और प्राधिकरणों की सहायता की है। कानून और न्यायालय ऐसी संस्थाएँ हैं जहाँ प्रतिस्पर्धी दृष्टिकोणों पर बहस होती है। संविधान वह माध्यम है जो राजनीतिक शक्ति को सामाजिक हित की ओर प्रवाहित करता है और उसे सुसंगत बनाता है।
संवैधानिक मानदंड और सामाजिक न्याय : सामाजिक न्याय सशक्तता की व्याख्या
यह जान लेना आवश्यक है कि कानून और न्याय में अंतर है। कानून का सार इसकी शक्ति है। कानून इसलिए कानून है क्योंकि इससे बल प्रयोग अथवा अनुपालन के संचरण के माध्यमों का प्रयोग होता है। इसके पीछे राज्य की शक्ति निहित होती है। न्याय का सार निष्पक्षता है। कानून की कोई भी प्रणाली अधिकारियों के संस्तरण के माध्यम से ही कार्यरत होती है। ऐसे प्रमुख मानदंड जिनसे नियम और अधिकारी संचालित होते हैं, संविधान कहलाता है। यह एक ऐसा दस्तावेज है जिससे किसी राष्ट्र के सिद्धांतों का निर्माण होता है। भारतीय संविधान भारत का मूल मानदंड है। अन्य सभी कानून, संविधान द्वारा नियत कार्य प्रणाली के अंतर्गत बनते है। ये कानून संविधान द्वारा निश्चित अधिकारियों द्वारा बनाए व लागू किए जाते हैं। कोई विवाद होने पर संविधान द्वारा अधिकार प्राप्त न्यायालयों के संस्तरण द्वारा कानून की व्याख्या होती है। ‘उच्चतम न्यायालय’ सर्वोंच्च है और वही संविधान का सबसे अंतिम व्याख्याकर्ता भी है।
उच्चतम न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण रुपों में मौलिक अधिकारों को बढ़ाया है। नीचे दिया गया बॉक्स इनमें से कुछ उदाहरणों को दर्शाता है-
मौलिक अधिकार वह सब अंतर्भूत करता है जो इसके लिए आकस्मिक है। अनुच्छेद 21 जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का वर्णन करता है और जीवन के लिए अनिवार्य गणवत्ता, जीवनयापन के साधन, स्वास्थ्य, आवास, शिक्षा और गरिमा की व्याख्या करता
बॉक्स 3.1
है। विभिन्न उद्धोषणाओं में जीवन की विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है और इसे एक पशुमात्र के अस्तित्व से बेहतर व महत्वपूर्ण रूप में व्याख्यायित किया गया है। ये व्याख्याएँ उन कैदियों को राहत पहुँचाने के लिए प्रयोग की जाती है जिन्हें प्रताड़ित करने और वंचित रखने का दंड मिला है। यह उन्हें मुक्त करने, बंधुआ मज्जदूरों को पुनर्वासित करने और प्राथमिक स्वास्थ्य व शिक्षा उपलब्ध कराने की व्याख्या करता है। 1993 में उच्चतम न्यायालय ने सूचना के अधिकार को स्वीकार करते हुए कहा कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है और उसका आनुषांगिक अंग है जो अनुच्छेद 19(क) के अंतरगत वर्णित है।
मौलिक अधिकारों के संदर्भ में नीति निर्देशक सिद्धांतों की प्रस्तुति- उच्चतम न्यायालय ने 'समान कार्य के लिए समान वेतन' निर्देशक तत्व को अनुच्छेद 14 के 'समानता के मौलिक अधिकार' के अंतर्गत माना तथा बहुत से बागान एवं कृषि श्रमिकों तथा अन्य को राहत पहुँचाई।
3.1 पंचायती राज और ग्रामीण सामाजिक रूपांतरण की चुनौतियाँ
पंचायती राज के आदर्श
पंचायती राज का शाब्दिक अनुवाद होता है 'पाँच व्यक्तियों द्वारा शासन'। इसका अर्थ गाँव एवं अन्य जमीनी स्तर पर लचीले लोकतंत्र की क्रियाशीलता से है। मूल स्तर से लोकतंत्र का विचार हमारे देश में विदेश से आयातित नहीं है, लेकिन ऐसा समाज जहाँ असमानताएँ अत्यंत तीव्र हैं, लोकतांत्रिक भागीदारी को लिंग, जाति और वर्ग के आधार पर बाधित किया जाता है। जैसाकि आप इस अध्याय में समाचारपत्रों की रिपोटीं में आगे देखेंगे कि ऐसे गाँवों में पारंपरिक रूप से जातीय पंचायतें रही हैं लेकिन ये हमेशा प्रभुत्वशाली समूहों का ही प्रतिनिधित्व करती रही हैं। इनका दृष्टिकोण प्रायः रूढ़िवादी रहा है और ये लगातार लोकतांत्रिक मानदंडों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विपरीत निर्णय लेते रहे हैं।
जब संविधान बनाया जा रहा था तो उसमें पंचायतों की कोई चर्चा नहीं की गई थी। उस समय कई सदस्यों ने इस मुद्दे पर अपने दुख, क्रोध और निराशा को प्रकट किया था। ठीक उसी समय अपने ग्रामीण
अनुभव का उल्लेख करते हुए डा. अंबेडकर ने तर्क दिया कि स्थानीय कुलीन और उच्चजातीय लोग सुरक्षित परिधि से इस प्रकार घिरे हुए हैं कि स्थानीय स्वशासन का मतलब होगा भारतीय समाज के पददलित लोगों का निंंतर शोषण। नि:संदेह उच्च जातियाँ जनसंख्या के इस भाग को चुप करा देंगी। स्थानीय सरकार की अवधारणा गाँधीजी को भी प्रिय थी। वे प्रत्येक ग्राम को स्वयं में आत्मनिर्भिर और पर्याप्त इकाई मानते थे जो स्वयं अपने को निर्देशित करे। ग्राम स्वराज्य को वे आदर्श मानते थे और चाहते थे कि स्वतंत्रता के बाद भी गाँवों में यही शासन चलता रहे।
पहली बार 1992 में 73वें संविधान संशोधन के रूप में मौलिक व प्रागंभिक स्तर पर लोकतंत्र और विकेंद्रीकृत शासन का परिचय मिलता है। इस अधिनियम ने पंयाचती राज संस्थाओं को संवैधानिक प्रस्थिति प्रदान की। अब यह अनिवार्य हो गया है कि स्थानीय स्वशासन के सदस्य गाँवों तथा नगरों में हर पाँच साल में चुने जाएँ। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि स्थानीय संसाधनों पर अब चुने हुए निकायों का नियंत्रण होता है।
73वें और 74वें संविधान संशोधन ने ग्रामीण व नगरीय दोनों ही क्षेत्रों के स्थायी निकायों के सभी चयनित पदों में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण दिया। इनमें से 17 प्रतिशत सीटें अनुसूचित जाति
पंचायती राज संस्था की त्रिस्तरीय व्यवस्था
बॉक्स 3.2

व अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। यह संशोधन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके अंतर्गत पहली बार निर्वाचित निकायों में महिलाओं को शामिल किया गया जिससे उन्हें निर्णय लेने की शक्ति मिली। स्थानीय निकायों, ग्राम पंचायतों, नगर निगमों, जिला परिषदों आदि में एक तिहाई पदों पर महिलाओं का आरक्षण है। 73वें संशोधन के तुरंत बाद 1993–94 के चुनाव में 8,00,000 महिलाएँ एक साथ राजनीतिक प्रक्रियाओं से जुड़ी। वास्तव में महिलाओं को मताधिकार देने वाला यह एक बढ़ा कदम था। स्थानीय स्वशासन के लिए त्रिस्तरीय पंचायती राज प्रणाली का प्रावधान करने वाला संवैधानिक संशोधन पूरे देश में 1992–93 से लागू है (बॉक्स 3.2 पढ़े)।
पंचायतों की शक्तियाँ और उत्तरदायित्व
संविधान के अनुसार पंचायत को स्वशासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने हेतु शक्तियाँ व अधिकार दिए जाने चाहिए। आज सभी राज्य सरकागों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे स्थानीय प्रतिनिधिक संस्थाओं को पुनर्जीवित करें।
पंचायतों को निम्नलिखित शक्तियाँ व उत्तरदायित्व प्राप्त हैं-
New deal for panchayat workers
Staff Correspondent
BHOPAL: Panchayat Karmis (workers) associated with over 23,000 panchayats across Madhya Pradesh will now be covered under a special group insurance package. Under the scheme, the workers would be covered for serious ailments, accidents and death. The Group Insurance Scheme would be introduced in all the panchayats of the State on April 1, 2007. At present there are about 18,000 workers in 23,051 panchayats across the State.
Under this scheme, there is provision for financial assistance of Rs.1 lakh to the family of a panchayat karmi in case of death while in service. Besides, an assistance of Rs.50,000 would be given to a panchayat karmi in the case of permanent disability or loss of both eyes, two body organs, one eye or one body organ due to some accident. Similarly, an assistance of Rs.25,000 would be given for the loss of one eye or one body part or any serious ailment.
पंचायतों द्वारा किए जाने वाले सामाजिक कल्याण के कार्यों में शामिल है कि शमशानों एवं कब्रिस्तानों का रखरखाव, जन्म और मृत्यु के ऑँकड़े रखना, मातृत्व केंद्रों और बाल कल्याण केंद्रों की स्थापना, पशुओं के तालाब पर नियंत्रण, परिवार-नियोजन का प्रचार और कृषि-कार्यों का विकास। इसके अलावा सड़कों के निर्माण, सार्वजनिक भवनों के निर्माण, तालाबों व स्कूलों के निर्माण जैसे विकासात्मक कार्य भी इसमें शामिल हैं। पंचायतें कुटीर उद्योगों के विकास में भी सहयोग करती हैं और छोटे सिंचाई कार्यों की भी देखभाल करती हैं। बहुत सी सरकारी योजनाएँ, जैसे कि एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम, एकीकृत बाल विकास योजना आदि पंचायत के सदस्यों द्वारा संचालित होती हैं।
संपत्ति, व्यवसाय, पशु, वाहन आदि पर लगाए गए कर, चुंगी, भू-राजस्व आदि पंचायतों की आय के मुख्य स्रोत हैं। जिला पंचायत द्वारा प्राप्त अनुदान पंचायत के संसाधनों में वृद्धि करते हैं। पंचायतों के लिए यह अनिवार्य है कि वे अपने कार्यालय के बाहर बोर्ड लगाएँ जिसमें प्राप्त वित्तीय सहायता के उपयोग से संबंधित ऑँकड़े लिखे हों। यह व्यवहार यह सुनिश्चित करने के
Special Correspondent
NEW DELHI: The Union Panchayati Raj Ministry has prepared a software to maintain databases of bank accounts of all Panchayati Raj Institutions (PRIs) to facilitate the transfer of funds through banking channels, preferably electronically.
Once the data is entered, money can be transferred directly to the 2,40,000 PRIs from the State's Consolidate
Fund.
Karnataka has already implemented this system, using the fast expanding electronic network of banks to transfer funds from the State treasury to individual panchayats.
Here, the State Government sends 12th Finance Commission funds and its own untied statutory grant to all panchayats directly from the State Department of Panchayati Raj through banks without any intermediary.
The arrangement involves six nationalised and 12 gramin banks, in which all 5,800 panchayats at all levels hold accounts.
This has reduced the time taken for funds to reach each panchayat from two months to 12 days.
The Ministry of Finance has indicated its willingness to work with the Panchayati Raj Ministry towards developing a consensus on adoption of this tool kit, across
Central ministries and State Governments.
The 12th Finance Commission has recommend that a sum of Rs. 20,000 be made available as grants to the State Governments between 2005-2010 to augment the Consolidated Fund at State level to facilitate the supplementing of the financial resources placed at the disposal of the panchavats.
The Union Finance Ministry has also mandated that these funds must invariably be transferred to panchayats within 15 days of their being credited to State Consolidated Fund.
The Finance Ministry guidelines also make it clear that grants will not be released to a State where elections to the panchayats have not been held, each State Finance Secretary would be required to provide a certificate within 15 days of the release of each instalment by the Government certifying the dates and amounts of local grants received by the State from the Government, and the dates and amounts of grants released by the State to the PRIs.
In the case of delayed transfer to the PRIs from the State, an amount of interest at the rate equal to the Reserve Bank of India rate has to be additionally paid by the State to the PRIs, for the period of delay.
लिए अपनाया गया कि जमीनी स्तर के सामान्य जन के 'सूचना के अधिकार' को सुनिश्चित किया जा सके और पंचायतों के सारे कार्य जनता के समक्ष हो। लोगों के पास पैसों के आवंटन की छानबीन का अधिकार है। साथ ही वे यह भी पूछ सकते हैं कि गाँव के कल्याण और विकास के हेतु लिए गए निर्णियों के कारण क्या हैं।
कुछ राज्यों में न्याय पंचायतों की भी स्थापना की गई है। कुछ छोटे-मोटे दीवानी और आपराधिक मामलों की सुनवाई का अधिकार इनके पास होता है। ये जुर्माना लगा तो सकते हैं लेकिन कोई सजा नहीं दे सकते। ये ग्रामीण न्यायालय प्रायः कुछ पक्षों के आपसी विवादों में समझौता कराने में सफल होते हैं। विशेष रूप से ये तब प्रभावशाली होते हैं जब किसी पुरुष द्वारा दहेज के लिए स्त्री को प्रताड्डित किया जाए या उसके विरुद्ध हिंसात्मक कार्यवाही की जाए।
जनजाति क्षेत्रों में पंचायती राज
बहुत से आदिवासी क्षेत्रों की प्रारंभिक स्तर के लोकतांत्रिक कार्यों की अपनी समूढ्ध परंपरा रही है। हम मेघालय से संबंधित एक उदाहरण दे रहे हैं। गारो, खासी और जयंतिया, तीनों ही आदिवासी जातियों की सैकड़ों साल पुरानी अपनी राजनीतिक संस्थाएँ रही हैं। ये राजनीतिक संस्थाएँ इतनी सुविकसित थीं कि ग्राम, वंश और राज्य के स्तर पर ये बड़ी कुशलता से कार्य करती थीं। उदाहरणार्थ, खासियों की पारंपरिक राजनीतिक प्रणाली में प्रत्येक वंश की अपनी परिषद् होती थी जिसे ‘दरबार कुर’ कहा जाता था और जो उस वंश के मुखिया के निर्देशन में कार्य करता था। यद्यपि मेघालय में जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्थाओं की परंपरा रही है, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों का एक बड़ा खंड संविधान के 73वें संशोधन के प्रावधान से बाहर है। शायद यह इसलिए क्योंकि उस समय की नीतियाँ बनाने वाले पारंपरिक राजनीतिक संस्थाओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते थे।
दलित जाति की कलावती चुनाव लड़ने के संबंध में चिंतित थी। आज वह एक पंचायत सदस्य है और यह अनुभव कर रही है कि जब से वह पंचायत सदस्य बनी है तब से उसका विश्वास और आत्मसम्मान बढ़ गया है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि अब उसका अपना एक नाम है। पंचायत की
सदस्य बनने से पहले वह 'रामू की माँ' या 'हीरालाल की पत्नी' के नाम से जानी जाती थी। यदि वह ग्राम-प्रधान पद का चुनाव हार गई तो उसे अनुभव होगा कि उसकी सखियों की नाक कट गई।
स्रोत - यह आलेख ‘महिला समाख्या’ नामक गैर सरकारी संगठन द्वारा दर्ज किया गया है, जो कि ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए कार्य करता है।
बॉक्स 3.3
वन पंचायत
बॉक्स 3.4
उत्तराखंड में अधिकांश कार्य महिलाएँ करती हैं, क्योंकि पुरुष प्रायः रक्षा सेवाओं के लिए बाहर नियुक्त होते है। खाना बनाने के लिए अधिकांश ग्रामीण लकड़ियों का प्रयोग करते हैं। जैसाकि आप जानते होंगे कि वनों का
कटाव पर्वतीय क्षेत्रों की एक बड़ी समस्या है। कभी-कभी पशुओं का चारा और लकड़ी इकढ़ा करने के लिए औरतों को मीलों पैदल चलना पड़ता है। इस समस्या के समाधान के लिए औरतों ने वन-पंचायतों की स्थापना की। वन पंचायत की औरतें पौधशालाएँ बनाकर छोटे पौधों का पालन-पोषण करती हैं, जिन्हें पहाड़ी ढालों पर रोपा जा सके। इसकी सदस्य आसपास के जंगलों की अवैध कटाई से सुरक्षा भी करती है। चिपको आंदोलन – जिसमें कि पेड़ों को कटने से बचाने के लिए औरतें उनसे चिपक जाती थीं, इस क्षेत्र में ही प्रारंभ किया गया था।
निरक्षर महिलाओं के लिए पंचायती राज प्रशिक्षण
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यह पंचायती राज प्रणाली की शक्तियों के प्रचार-प्रसार का एक नवाचारी उपाय है। सुखीपुर और दुखीपुर नामक दो गाँबों की कहानी कपड़े की फड़ (कहानी कहने का एक परंपरागत
(लोक माध्यम) के द्वारा प्रस्तुत की गई। दुखीपुर गाँव में एक भ्रष्ट प्रधान थी – विमला। उसने गाँव में स्कूल बनवाने के लिए पंचायत से धन लिया था, लेकिन उसका उपयोग उसने अपने परिवार का घर बनवाने के लिए किया। गाँव का बाकी हिस्सा दुखी और गरीब था। दूसरी तरफ, सुखीपुर गाँव में एक साधारण वर्ग की औरत (नजमा) प्रधान थी; उसने ग्रामीण विकास के पैसे को गाँव के भौतिक संसाधनों को बढ़ाने के लिए खर्च किया। इस
गाँव में प्राथमिक चिकित्सालय, सड़कें व पक्के मकान थों बसें यहाँ आराम से पहुँच सकती थीं। लोक संगीत और चित्रमय फड़ दोनों एक साथ समर्थ सरकार और उसमें भागीदारी प्रचार- प्रसार के लिए उपयोगी हथियार थों कहानी कहने का ये नया तरीका निरक्षर महिल्लाओं में जागरूकता फैलाने में बहुत प्रभावशाली था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस प्रचार ने यह संदेश दिया कि केवल मतदान करना, चुनाव में खड़े होना या जीतना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि यह जानना भी आवश्यक है

कि किसी व्यक्ति को क्यों मत दिया जाए, उसमें ऐसी क्या विशेषता होनी चाहिए और वह आगे क्या करना चाहता/चाहती है। गीत फड़ के माध्यम से कही गई कहानी सत्यनिष्ठा का पक्ष भी प्रबल करती है।
यह प्रशिक्षण कार्यक्रम ‘महिला समाख्या’ नामक गैर सरकारी संगठन द्वारा समायोजित किया गया था जो ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए कार्य करता है।
संविधान एवं सामाजिक परिवर्तन
जैसाकि समाजशास्त्री टिपलुट नोंगबरी ने कहा है कि आदिवासी संस्थाएँ अपनी संरचना और क्रियाकलाप में लोकतांत्रिक ही हों, यह आवश्यक नहीं है। भूरिया समिति की रिपोर्ट (जिसने इस मुद्दे का अध्ययन किया है) पर टिप्पणी करते हुए नोंगबरी ने कहा कि हालाँकि पारंपरिक आदिवासी संस्थाओं पर समिति की चिंता प्रशंसनीय है, लेकिन यह स्थिति की जटिलता का आकलन कर पाने में असमर्थ रही। आदिवासी समाजों में प्रबल समतावादी लोकाचार पाया जाता है, इसके बावजूद उनमें स्तरीकरण के तत्व कहीं न कहीं उपस्थित हैं। आदिवासी राजनीतिक संस्थाएँ केवल महिलाओं के प्रति असहिष्णुता के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया ने इस व्यवस्था में विकृतियाँ भी उत्पन्न कर दी हैं जिससे यह पहचानना मुशिकल है कि क्या पारंपरिक है और क्या अपारंपरिक (नोंगबरी, 2003:220)। यह आपको परंपरा की परिवर्तनशील प्रकृति की याद दिलाता है जिसकी चर्चा हम अध्याय 1 व 2 में कर चुके हैं।
लोकतंत्रीकरण और असमानता
अब आपके सामने स्पष्ट हो जाएगा कि जिस देश में जाति, समुदाय और लिंग आधारित असमानता का लंबा इतिहास हो, ऐसे समाज में लोकतंत्रीकरण आसान नहीं है। पिछली पुस्तक में आप विभिन्न प्रकार की असमानताओं से परिचित हो चुके हैं। अध्याय 4 में ग्रामीण भारतीय संरचना की और अच्छी जानकारी प्राप्त करेंगे। ऐसी असमान व अलोकतांत्रिक सामाजिक संरचना को देखने के बाद यह आश्चर्यजनक नहीं लगता कि बहुत से मामलों में गाँव के कुछ विशेष समूह, समुदाय, जाति से संबंधित लोग न तो गाँव की समितियों में शामिल किए जाते हैं और न ही उन्हें ऐसे क्रियाकलापों की सूचना दी जाती है। ग्राम सभा के सदस्य प्रायः एक ऐसे छोटे से गुट द्वारा नियंत्रित व संचालित किए जाते हैं जो अमीर किसानों या उच्च जाति के जर्मींदारों के होते हैं। बहुसंख्यक लोग देखते भर रह जाते हैं और ये लोग बहुमत को अनदेखा करके विकासात्मक कार्यों का और सहायता राशि बाँटने का फैसला कर लेते हैं।
3.2 लोकतांत्रिक राजनीति में राजनीतिक दल, द्बाव एवं हित समूह
हर सुबह के अखबार पर एक दृष्टिमात्र से ही अनेक ऐसे उदाहरण दिखेंगे कि विभिन्न समूह कैसे अपनी आवाज सुनाना चाहते हैं और सरकार का ध्यान अपनी परेशानियों की ओर आकृष्ट करना चाहते हैं।
उद्योगपति ‘फेडरेशन ऑफ्र इंडियन कॉमर्स एंड चैंबर्स’; ‘एसोसिएशन ऑफ्र चैंबर्स ऑफ्र कॉमर्स’ जैसे संगठन बनाते है। कर्मचारी ‘इंडियन ट्रेड यूनियन कांग्रेस’, या ‘द सेंटर फॉर इंडियन ट्रेड यूनियंस’ बनाते है। किसान कृषि संगठन बनाते हैं, जैसा कि शेतकरी संगठन कृषि मजदूरों का अपना अलग संघ होता है। अंतिम पाठ में आप अन्य प्रकार के संगठनों और सामाजिक आंदोलनों जैसे आदिवासी एवं पर्यावरण आंदोलन के बारे में पट्टेंगे।
सरकार के लोकतांत्रिक प्रारूप में राजनीतिक दल मुख्य भूमिका अदा करते हैं। एक राजनीतिक दल को निर्वाचन प्रक्रिया द्वारा सरकार पर न्यायपूर्ण नियंत्रण स्थापित करने की ओर उन्मुख संगठन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। राजनीतिक दल एक ऐसा संगठन होता है जो सत्ता हथियाने और सत्ता का उपयोग कुछ विशिष्ट कार्यों को संपन्न करने के उद्देश्य से स्थापित करता है। राजनीतिक दल समाज की कुछ विशेष समझ और यह कैसे होना चाहिए पर आधारित होते हैं। लोकतांत्रिक प्रणाली में विभिन्न समूहों के हित राजनीतिक दलों द्वारा ही प्रतिनिधित्व प्राप्त करते हैं जो उनके मुद्रों को उठाते हैं। विभिन्न हित समूह
क्रियाकलाप 3.1
राजनीतिक दलों को प्रभावित करने के लिए कार्य करेंगे। जब किसी समूह को लगता है कि उसके हित की बात नहीं की जा रही है तो वह एक अलग दल बना लेता है। या फिर ये दबाव समूह बना लेते हैं जो सरकार से अपनी बात मनवाने की कोशिश करते हैं। हित समूह राजनीतिक क्षेत्र में कुछ निश्चित हितों को पूरा करने के लिए बनाए जाते हैं। ये प्राथमिक रूप से वैधानिक अंगों के सदस्यों का समर्थन प्राप्त करने के लिए बनाए जाते हैं। कुछ स्थितियों में राजनीतिक संगठन शासन सत्ता पाना तो चाहते हैं लेकिन वे इंकार कर देते हैं क्योंकि उन्हें कुछ मानक माध्यमों द्वारा ऐसा अवसर नहीं मिलता है। ऐसे संगठन तब तक आंदोलन में बने रहते हैं जब तक उन्हें मान्यता नहीं मिलती।
पहले व दूसरे, दोनों ही क्रियाक्लापों में बताया गया है कि सरकार पर दबाव बनाने के लिए सभी समूहों में समान क्षमता नहीं है। अतः कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि दबाव समूह की अवधारणा प्रबल सामाजिक समूहों जैसे वर्ग, जाति अथवा लैंगिक समूह आदि की शक्ति को हतोत्साहित करती है। वे यह अनुभव करते हैं कि यह कहना अधिक सही होगा कि प्रबल वर्ग ही राज्य को नियंत्रित करते हैं। यहाँं इस बात का यह अर्थ नहीं है कि सामाजिक आंदोलन और दबाव समूह लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाते। आठवाँ अध्याय यही दर्शाता है।
हर साल फरवरी के अंत में भारत सरकार के वित्त मंत्री संसद के सामने बजट पेश करते हैं। इसके पहले हर रोज अखबार में यह खबर छपती है कि भारतीय उद्यमियों के संगठन, श्रमिक संघों, किसानों और महिलाओं के संगठनों ने वित्त मंत्रालय के साथ बैठक की।
बॉक्स 3.6
दल के संबंध में मैक्स वेबर के विचार
वर्गों की वास्तविक स्थिति अर्थ प्रणाली के क्रम में है, जबकि प्रस्थिति समूहांं का स्थान सामाजिक क्रम (आर्डर) में है...... लेकिन दल शक्ति संरचना के अंतर्गत होते हैं...।
बॉक्स 3.7
दलों की क्रियाएँ हमेशा एक ऐसे उद्देश्य के लिए होती हैं जिनकी प्राप्ति एक नियोजित दृष्टि के लिए की जाती है। उद्देश्य एक ‘कारण’ हो सकता है (दल का उद्देश्य किसी आदर्श या भौतिक आवश्यकता के लिए कार्यक्रम की वास्तविकता को जानना भी हो सकता है), या उद्देश्य निजी भी हो सकता है (आराम, शक्ति और इनके माध्यम से नेता और दल के अनुयायियों का सम्मान)।
(वेबर 1948:194)
संविधान एवं सामाजिक परिवर्तन
संदर्भ गंथ
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