सियांग बांध परियोजना का विरोध क्यों?
यह टॉपिक UPSC एवं अन्य प्रतियोगिता परीक्षाओं के दृष्टिकोण से पर्यावरण खंड से जुड़ा है।
दोस्तों, भारत में जलविद्युत परियोजनाएँ ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक विकास और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। लेकिन जब ऐसी परियोजनाएँ आदिवासी क्षेत्रों, जैव विविधता से समृद्ध पहाड़ी इलाकों और नदी घाटियों में प्रस्तावित होती हैं, तो इनके साथ पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय लोगों के अधिकारों और विस्थापन जैसी गंभीर चिंताएँ भी जुड़ जाती हैं। अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना (Siang Upper Multipurpose Project—SUMP) इसी बहस का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। इस ब्लॉग के जरिये हमलोग इस मुद्दे की हरेक तह को समझने की कोशिश करेंगे. सबसे पहले इस परियोजना के बारे में जानेंगे , इसके बाद सियांग नदी से जुड़ी जानकारी प्राप्त करेंगे. फिर समझेंगे कि आखिर विरोध की वजह क्या है ? और फिर चीन की मेगा परियोजना को भारत इससे जोड़कर क्यों देख रहा है , यह जानेंगे. अंत में आगे की राह पर गौर करेंगे.
सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना (SUMP) क्या है?
यह परियोजना अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी पर लगभग 11,200 मेगावाट की प्रस्तावित एक बड़ी जलविद्युत एवं बहुउद्देशीय परियोजना है। इसका प्रमुख उद्देश्य जलविद्युत उत्पादन के जरिये ऊर्जा उपलब्ध कराना और नदी के जल संसाधनों का उपयोग करना है। यह भी बताया जा रहा है कि बाढ़ प्रबंधन और ब्रह्मपुत्र घाटी में जल प्रवाह के रेगुलेशन जैसे संभावित लाभ भी होंगे। सियांग नदी के बारे में सियांग नदी का जुड़ाव ब्रह्मपुत्र नदी की उत्पत्ति और प्रवाह से है। तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी को यारलुंग त्सांगपो (Yarlung Tsangpo) कहा जाता है। यह नदी तिब्बत के पठार से होकर बहती है और हिमालय के पूर्वी भाग में एक बड़े मोड़ के बाद भारत के अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है। भारत में इसे सियांग या दिहांग कहा जाता है। इसके बाद दिबांग और लोहित जैसी नदियाँ इससे जुड़ती हैं। आगे चलकर यह नदी असम में ब्रह्मपुत्र के नाम से बहती है। इस प्रकार, सियांग नदी केवल अरुणाचल प्रदेश के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र के लिए महत्त्वपूर्ण है।
सियांग नदी का महत्त्व
1. जल संसाधन: यह क्षेत्र की प्रमुख नदियों में से एक है और स्थानीय समुदायों की आजीविका में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
2. जलविद्युत उत्पादन: नदी में उपलब्ध जल प्रवाह और ऊँचाई के अंतर के कारण इस क्षेत्र में जलविद्युत उत्पादन की संभावनाएँ हैं।
3. जैव विविधता: नदी घाटी में वन, पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र और विविध वन्यजीव पाए जाते हैं।
4. स्थानीय आजीविका: मछली पकड़ना, कृषि, वन संसाधनों का उपयोग और नदी से जुड़ी पारंपरिक गतिविधियाँ स्थानीय लोगों के जीवन का हिस्सा हैं।
5. अंतरराष्ट्रीय महत्त्व: ब्रह्मपुत्र का ऊपरी प्रवाह चीन के तिब्बत क्षेत्र से संबंधित है। इसलिए इस नदी पर बड़े बांधों का विकास भारत-चीन के जल संसाधन संबंधों और सीमा क्षेत्र की रणनीतिक चिंताओं से भी जुड़ सकता है।
सियांग बांध परियोजना का विरोध क्यों?
इस परियोजना के विरोध के पीछे स्थानीय समुदायों की भूमि, आजीविका, संस्कृति, पर्यावरण और भविष्य को लेकर कई चिंताएँ हैं। (क) भूमि और विस्थापन का डर बड़े बांधों के निर्माण के लिए जलाशय, निर्माण स्थल, सड़कें और अन्य बुनियादी ढाँचे विकसित करने पड़ सकते हैं। इससे प्रभावित क्षेत्रों में भूमि के उपयोग में बदलाव आ सकता है। कुछ स्थानों पर लोगों को विस्थापन का सामना करना पड़ सकता है, जबकि अन्य क्षेत्रों में उनकी कृषि भूमि, वन संसाधनों या पारंपरिक आजीविका पर प्रभाव पड़ सकता है। स्थानीय लोगों की प्रमुख चिंता यह है कि विकास परियोजना के लाभों की तुलना में उन्हें इसकी सामाजिक और आर्थिक लागत अधिक न चुकानी पड़े।
(ख) पर्यावरणीय प्रभाव दोस्तों, अरुणाचल प्रदेश पूर्वी हिमालय का हिस्सा है। यह क्षेत्र जैव विविधता, घने वनों और संवेदनशील पर्वतीय पारिस्थितिकी के लिए जाना जाता है।
एक बड़े बांध के निर्माण से संभावित रूप से निम्नलिखित प्रभाव पड़ सकते हैं:
- वनों की कटाई और प्राकृतिक आवासों का विखंडन।
- नदी के प्राकृतिक प्रवाह में परिवर्तन।
- मछलियों और अन्य जलीय जीवों के आवास पर प्रभाव।
- नदी के तलछट यानी गाद के प्रवाह में बदलाव।
- निर्माण कार्यों के कारण भूस्खलन का जोखिम बढ़ना।
- स्थानीय जल स्रोतों और पारंपरिक संसाधनों पर प्रभाव।
(ग) जनजातीय पहचान और संस्कृति अरुणाचल प्रदेश में अनेक जनजातीय समुदाय रहते हैं। कई समुदायों के लिए भूमि, जंगल और नदियाँ केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और सामाजिक जीवन का भी हिस्सा हैं। यदि किसी परियोजना से पारंपरिक भूमि या नदी तक पहुँच प्रभावित होती है, तो उसका असर समुदाय की सांस्कृतिक निरंतरता पर भी पड़ सकता है। इसी कारण स्थानीय प्रदर्शनकारियों ने भूमि, नदियों, जनजातीय पहचान और मौलिक अधिकारों की सुरक्षा की मांग की है।
(घ) भूकंप और भूस्खलन का जोखिम पूर्वोत्तर भारत और पूर्वी हिमालय का बड़ा हिस्सा भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील है। इस क्षेत्र में भूकंप, भारी वर्षा और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक घटनाएँ हो सकती हैं। बड़े बांधों और जलाशयों की योजना बनाते समय निम्नलिखित बातों का वैज्ञानिक मूल्यांकन जरूरी है:
- भूकंप से बांध की संरचना पर संभावित प्रभाव।
- पहाड़ी ढलानों की स्थिरता।
- जलाशय के आसपास भूस्खलन की संभावना।
- अत्यधिक वर्षा और अचानक बाढ़ की स्थिति।
- बांध की सुरक्षा तथा आपातकालीन निकासी की व्यवस्था।
(ङ) स्थानीय लोगों का विश्वास और प्रशासनिक प्रक्रिया प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि परियोजना से संबंधित सर्वेक्षण के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती से क्षेत्र में तनाव बढ़ रहा है। स्थानीय लोगों की आशंका है कि परियोजना की प्रारंभिक प्रक्रियाओं में उनकी चिंताओं को पर्याप्त महत्त्व नहीं दिया जा रहा।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक प्रश्न उठता है: क्या किसी बड़ी विकास परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले स्थानीय समुदायों के साथ पर्याप्त संवाद किया गया है?
यदि लोगों को परियोजना के उद्देश्य, संभावित प्रभाव, लाभ और नुकसान के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती, तो अविश्वास बढ़ सकता है। इसके परिणामस्वरूप विरोध-प्रदर्शन और प्रशासन के साथ टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसलिए पारदर्शिता, समय पर सूचना और स्थानीय समुदायों की सार्थक भागीदारी किसी भी बड़ी परियोजना की सफलता के लिए आवश्यक हैं।
चीन की यारलुंग त्सांगपो परियोजना और सियांग बांध का संबंध
यह स्पष्ट है कि चीन तिब्बत के क्षेत्र में यारलुंग त्सांगपो नदी पर बड़े जलविद्युत विकास की योजनाओं पर काम कर रहा है। यह वही नदी है जो भारत में अरुणाचल प्रदेश में सियांग और आगे असम में ब्रह्मपुत्र कहलाती है। सियांग परियोजना को चीन की विशाल जलविद्युत परियोजनाओं के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
भारत के लिए यह मुद्दा क्यों महत्त्वपूर्ण है?
1. जल सुरक्षा: ब्रह्मपुत्र नदी भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए महत्त्वपूर्ण जल संसाधन है। नदी के ऊपरी प्रवाह में होने वाले बदलावों को लेकर भारत की स्वाभाविक रुचि है।
2. रणनीतिक महत्त्व: चीन और भारत के बीच सीमा संबंधी विवादों के कारण सीमा के निकट विकसित होने वाला बड़ा बुनियादी ढाँचा रणनीतिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
3. जल प्रवाह और आँकड़ों की उपलब्धता: नदी के प्रवाह, जलाशय संचालन और बाढ़ संबंधी सूचनाओं का आदान-प्रदान सीमा-पार जल प्रबंधन के लिए उपयोगी है।
4. क्षेत्रीय विकास: भारत के लिए पूर्वोत्तर में बिजली उत्पादन, आधारभूत ढाँचे और स्थानीय विकास को बढ़ावा देना भी महत्त्वपूर्ण है।
जलविद्युत परियोजना और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन
यह इस पूरे विवाद का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। भारत को एक ओर स्वच्छ ऊर्जा की आवश्यकता है, तो दूसरी ओर हिमालय जैसे संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा भी करनी है। इस संतुलन के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं।
1. स्वतंत्र पर्यावरणीय प्रभाव आकलन परियोजना शुरू करने से पहले उसके संभावित प्रभावों का विस्तृत अध्ययन किया जाना चाहिए। इसमें वन, वन्यजीव, नदी के प्रवाह, तलछट, भूकंपीय जोखिम, भूस्खलन और स्थानीय आजीविका का आकलन शामिल होना चाहिए।
2. संचयी प्रभाव आकलन केवल एक बांध का प्रभाव देखना पर्याप्त नहीं है। यदि किसी नदी घाटी में कई बांध या जलविद्युत परियोजनाएँ प्रस्तावित हों, तो सभी परियोजनाओं के संयुक्त प्रभावों का अध्ययन करना चाहिए। इसे संचयी पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Cumulative Impact Assessment) कहा जाता है। उदाहरण के लिए, एक ही नदी पर कई बांध बनाए जाने से नदी के प्राकृतिक प्रवाह, मछलियों के आवागमन और तलछट के परिवहन पर संयुक्त प्रभाव पड़ सकता है।
3. स्थानीय समुदायों की भागीदारी स्थानीय लोगों को परियोजना की योजना बनाने और उसके प्रभावों का आकलन करने की प्रक्रिया में सार्थक भागीदारी मिलनी चाहिए। उन्हें निम्नलिखित जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए:
- परियोजना का उद्देश्य और स्वरूप।
- भूमि और पर्यावरण पर संभावित प्रभाव।
- पुनर्वास तथा मुआवजे की व्यवस्था।
- रोजगार और विकास से संबंधित संभावित लाभ।
- शिकायत दर्ज करने और समाधान प्राप्त करने की प्रक्रिया।
4. उचित पुनर्वास और मुआवजा यदि परियोजना के कारण लोगों को विस्थापित होना पड़े, तो केवल आर्थिक मुआवजा पर्याप्त नहीं हो सकता। पुनर्वास में भूमि, आवास, आजीविका, शिक्षा, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक संबंधों पर पड़ने वाले प्रभावों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
5. पारिस्थितिक प्रवाह बनाए रखना नदी में न्यूनतम आवश्यक जल प्रवाह बनाए रखना महत्त्वपूर्ण है, ताकि जलीय जीवों, नदी के पारिस्थितिकी तंत्र और नदी पर निर्भर समुदायों की आवश्यकताओं की रक्षा की जा सके। इसे पर्यावरणीय प्रवाह (Environmental Flow) कहा जाता है।
भारत में विकास परियोजनाओं से जुड़े अन्य उदाहरण
सियांग बांध का मुद्दा भारत में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की व्यापक बहस का हिस्सा है। (क) अरुणाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर की जलविद्युत परियोजनाएँ पूर्वोत्तर भारत में नदियों और पहाड़ी भूभाग के कारण जलविद्युत की पर्याप्त संभावनाएँ हैं। उल्लेखनीय है कि सियांग परियोजना से जुड़ा विवाद अरुणाचल प्रदेश के उपरी सुबनसिरी जिले तक पहुँच गया जहाँ 1605 मेगावाट का सुबनसिरी अपर हाइड्रोइलेक्ट्रिसिटी प्रोजेक्ट (मेंगा बाँध) प्रस्तावित है। लेकिन यहाँ की भौगोलिक संवेदनशीलता, जैव विविधता और जनजातीय समुदायों की आजीविका को ध्यान में रखते हुए ही परियोजनाओं की योजना बनाना होगा।
(ख) टिहरी बांध, उत्तराखंड टिहरी बांध जलविद्युत उत्पादन, जल आपूर्ति और बाढ़ प्रबंधन से जुड़े लाभों के लिए महत्त्वपूर्ण है। इसके साथ विस्थापन, पुनर्वास और पर्यावरणीय प्रभावों पर भी व्यापक बहस हुई है।
(ग) नर्मदा घाटी परियोजना नर्मदा घाटी की परियोजनाओं के संदर्भ में सिंचाई, बिजली उत्पादन, विस्थापन, पुनर्वास और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े प्रश्न लंबे समय से चर्चा में रहे हैं।
निष्कर्ष: विकास के साथ विश्वास और पर्यावरण संरक्षण भी जरूरी
सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना से जुड़ा विवाद भारत के सामने मौजूद एक व्यापक चुनौती को दिखाता है। देश को स्वच्छ ऊर्जा, आर्थिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा की आवश्यकता है, लेकिन इन लक्ष्यों को प्राप्त करते समय स्थानीय समुदायों के अधिकारों और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र की उपेक्षा नहीं की जा सकती। सरकार को परियोजना के लाभों और संभावित नुकसान का निष्पक्ष आकलन करना चाहिए। स्थानीय लोगों की चिंताओं को सुनना, पर्यावरणीय प्रभावों की स्वतंत्र जाँच करना और कानून के अनुसार उचित प्रक्रिया अपनाना आवश्यक है। यदि किसी परियोजना से गंभीर और अस्वीकार्य नुकसान की आशंका सामने आती है, तो उसके डिजाइन में बदलाव, वैकल्पिक विकल्पों की जाँच या आवश्यक होने पर परियोजना पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
Reference: The Hindu





