पूर्वोत्तर भारत: बाढ़ पूर्वानुमान और अलर्ट सिस्टम
हाल ही में पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में बताया कि पूर्वोत्तर भारत में बाढ़ की भविष्यवाणी और चेतावनी को और बेहतर बनाया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि असम इस बार 60 साल से ज्यादा समय की सबसे बड़ी बाढ़ से जूझ रहा है। इस आपदा से 8 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं और 30 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।
हर साल आने वाली बाढ़ के बावजूद भारत में राहत, बचाव और दीर्घकालिक समाधान अब भी एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं। बढ़ती बारिश, नदियों में उफान और बार-बार आने वाली चरम मौसमी घटनाओं के कारण अब सिर्फ तटबंध बनाना काफी नहीं है। हमें जलवायु के हिसाब से मजबूत सड़क, पुल, घर और जल निकासी व्यवस्था की जरूरत है।
बाढ़ पूर्वानुमान और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के बारे में
- पहले से सटीक मौसम की जानकारी:- मौसम विभाग अब ऊपरी असम के हर जिले के लिए 7 दिन पहले तक भारी और बहुत भारी बारिश का पूर्वानुमान दे रहा है। साथ ही अगले 7 दिनों के लिए रंग-कोड वाली चेतावनी भी जारी की जाती है - हरा, पीला, नारंगी, लाल। असम को पश्चिमी, दक्षिणी, मध्य और पूर्वी हिस्सों में बाँटकर हर क्षेत्र की बारिश की सटीकता और समय पर लगातार नज़र रखी जा रही है।
- मौसम के बड़े पैटर्न को भी समझा जा रहा है:-बारिश का पूर्वानुमान सिर्फ बादलों से नहीं बनता। मौसम विभाग अल नीनो, ला-नीना और हिंद महासागर द्विध्रुव जैसे बड़े जलवायु कारकों को भी देखता है।पूर्वोत्तर में इनका असर बाकी भारत से अलग होता है। यहाँ कभी-कभी अल नीनो के साल में भी ज्यादा बारिश हो जाती है, क्योंकि यहाँ की बारिश बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी और पहाड़ों पर भी निर्भर करती है। अभी मध्यम अल नीनो है और IOD तटस्थ है - इसे भी पूर्वानुमान में जोड़ा गया है।
- बाढ़ की भविष्यवाणी कैसे होती है:-बाढ़ सिर्फ बारिश से नहीं तय होती। इसके लिए नदी का जलस्तर, मिट्टी की स्थिति और जलग्रहण क्षेत्र भी जरूरी हैं। इसलिए मौसम विभाग बारिश और चेतावनी का डेटा देता है, और केंद्रीय जल आयोग उस डेटा को नदी की जानकारी और कंप्यूटर मॉडल के साथ मिलाकर असल बाढ़ की भविष्यवाणी और चेतावनी जारी करता है।
- तकनीक से हो रही है मदद:-पूर्वानुमान को और लोकल बनाने के लिए भारतएफएस नाम का नया हाई-रिज़ॉल्यूशन मॉडल लाया गया है। यह ब्लॉक और पंचायत स्तर तक 6 किमी की दूरी पर मौसम बता सकता है। इसे "अरुणिका" और "अर्का" सुपरकंप्यूटर से ताकत मिलती है।
- 'मिशन मौसम' के तहत MHEWS-DSS जैसी रीयल-टाइम मल्टी-हैज़र्ड चेतावनी प्रणाली भी शुरू की गई है। इसके अलावा पूर्वोत्तर में नए मौसम सेंसर और निगरानी स्टेशन भी लगाए जा रहे हैं।
असम में बाढ़ का खतरा इतना ज़्यादा क्यों है?
असम को हर साल बाढ़ का सामना करना पड़ता है। इसके पीछे सिर्फ भारी बारिश नहीं, बल्कि भूगोल, नदियाँ और इंसानी कारण भी हैं।
- भौगोलिक स्थिति और नदियों का जाल:-असम ब्रह्मपुत्र और बराक नदी बेसिन में बसा है। यहाँ 50 से ज्यादा सहायक नदियाँ आकर मिलती हैं। ब्रह्मपुत्र के बाढ़ मैदान पर होने के कारण यह इलाका प्राकृतिक रूप से बाढ़ के लिए बहुत संवेदनशील है।
- ब्रह्मपुत्र का "अवसाद" संकट:- ब्रह्मपुत्र दुनिया की सबसे ज्यादा गाद ले जाने वाली नदियों में से एक है। जब यह असम के समतल मैदान में आती है तो ढाल कम हो जाने से गाद जमा होने लगती है। इससे नदी का तल ऊपर उठ जाता है और थोड़ी सी बारिश में भी पानी बाहर बहने लगता है। 1950 से अब तक नदी के कटाव से 4.27 लाख हेक्टेयर जमीन भी बह चुकी है।
- भारी बारिश और ऊपरी इलाकों का पानी:- असम में दक्षिण-पश्चिम मानसून के साथ-साथ अरुणाचल और मेघालय से आने वाला ऊपरी पानी भी अचानक बाढ़ ला देता है। ऊपरी पहाड़ी इलाकों में जंगल कटाई और मिट्टी का कटाव होने से और ज्यादा गाद नदी में आती है, जिससे नदी की पानी रोकने की क्षमता घट जाती है।
- जलवायु परिवर्तन का असर:- बदलते मौसम के कारण अब अत्यधिक बारिश की घटनाएं बढ़ गई हैं। इससे बाढ़ की तीव्रता और बार-बार आने की आवृत्ति दोनों बढ़ गई हैं।
- तटबंध ही काफी नहीं:-असम ने बाढ़ रोकने के लिए ज्यादातर तटबंधों पर भरोसा किया है। लेकिन कई तटबंध पुराने हो चुके हैं और ब्रह्मपुत्र जैसी तेज़ नदी को रोक पाने में कमजोर साबित हो रहे हैं।
- आंकड़े क्या कहते हैं:-असम का लगभग 39.58% भू-भाग बाढ़-प्रवण है। यह राष्ट्रीय औसत से करीब 4 गुना ज्यादा है। इसी वजह से यहाँ बाढ़ एक सालाना चुनौती बन गई है।
भारत में बाढ़ के कारण क्या हैं?
भारत का 4 करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा इलाका बाढ़-प्रवण है। हर साल औसतन 75 लाख हेक्टेयर क्षेत्र और 1600 लोग बाढ़ की चपेट में आते हैं। अब बाढ़ उन जगहों पर भी आने लगी है जो पहले सुरक्षित माने जाते थे। प्राकृतिक कारण
| तेज मानसून: | देश की 75-80% बारिश जून-सितंबर में होती है। बहुत तेज बारिश नदियों और नालों की क्षमता से ज्यादा हो जाती है और पानी बाहर फैल जाता है। |
| गाद और नदी तल का ऊँचा होना: | गंगा, ब्रह्मपुत्र जैसी हिमालयी नदियाँ बहुत गाद लाती हैं। गाद जमने से नदी का तल ऊपर उठ जाता है और थोड़ी बारिश में भी नदी तटबंध तोड़ देती है। |
| नदी का रास्ता बदलना: | कोसी नदी "बिहार का शोक" इसी वजह से कही जाती है। ज्यादा गाद वाली नदियाँ बार-बार अपना रास्ता बदलती हैं और नए इलाकों में बाढ़ लाती हैं। |
| GLOF - ग्लेशियर झील फटना: | जलवायु परिवर्तन से हिमालय की झीलें फूल रही हैं। 2023 में सिक्किम में इसी वजह से अचानक बाढ़ आई थी। |
| चक्रवात और तूफानी ज्वार: | बंगाल की खाड़ी के चक्रवात तेज बारिश और ऊँची लहरें लाते हैं, जिससे तटीय इलाके डूब जाते हैं और नदियों का पानी समुद्र में नहीं जा पाता। |
मानव-जनित कारण
| जंगल कटाई: | हिमालय और पश्चिमी घाट में पेड़ कटने से मिट्टी बहती है, गाद बढ़ती है और नदी की पानी रोकने की क्षमता घटती है। |
| तटबंधों पर निर्भरता: | 1954 से अब तक 34,000 किमी तटबंध बने हैं। लेकिन इनके कारण नदी तल और ऊपर उठता है और तटबंध टूटने पर बाढ़ और ज्यादा विनाशकारी हो जाती है। |
| बांधों का गलत प्रबंधन: | नियमों के बिना अचानक पानी छोड़ने से नीचे के इलाके डूब जाते हैं। 2018 की केरल बाढ़ इसका उदाहरण है। |
| बाढ़ मैदान और आर्द्रभूमि पर कब्जा: | नदियों के किनारे घर-बिल्डिंग और बील्स जैसी आर्द्रभूमि खत्म होने से प्रकृति की "स्पंज" क्षमता खत्म हो गई है। |
| अवैज्ञानिक बालू खन: | नदी से ज्यादा बालू निकालने से नदी का बहाव बदलता है और तट कमजोर होते हैं। |
शहरी बाढ़ के कारण
| अनियोजित शहरीकरण: | कंक्रीट और डामर की वजह से पानी जमीन में नहीं जा पाता। पूरा पानी सड़क पर बहता है। |
| झील-नालों पर अतिक्रमण: | बंगलूरू और चेन्नई में झीलों और प्राकृतिक निकासी रास्तों के बंद होने से पानी भर जाता है। |
| पुरानी नाली व्यवस्था: | नालियों का जाम होना और कचरा भर जाना भारी बारिश में पानी निकासी रोक देता है। |
| कम समय में बहुत ज्यादा बारिश: | जलवायु परिवर्तन से अब 2-3 घंटे में ही इतनी बारिश हो जाती है कि शहर की ड्रेनेज सिस्टम फेल हो जाती है। |
भारत ने बाढ़ प्रबंधन के लिए क्या उपाय किए हैं?
भारत बाढ़ से निपटने के लिए 3 स्तर पर काम कर रहा है - संरचनात्मक, गैर-संरचनात्मक और नीतिगत। मकसद है बाढ़ को रोकना, नुकसान कम करना और लोगों को समय पर बचाना।
संरचनात्मक उपाय –भौतिक ढांचा
1. तटबंध और जल निकासी: देशभर में 34,000 किमी से ज्यादा तटबंध, ड्रेनेज चैनल और ऊँचे स्थानों पर गाँव बनाए गए हैं ताकि पानी बस्तियों में न घुसे।
2. बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021: बड़े बांधों की नियमित निगरानी, मरम्मत और संचालन के लिए कानूनी ढांचा। इससे बांध टूटने से आने वाली बाढ़ का खतरा कम होता है।
3. जलाशय प्रबंधन: बांधों में पानी "रूल कर्व" के हिसाब से रखा जाता है। मानसून से पहले थोड़ी जगह खाली छोड़ दी जाती है जिसे "फ्लड कुशन" कहते हैं, ताकि अतिरिक्त पानी जमा किया जा सके।
4. नदी जोड़ो योजना: राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना के तहत अतिरिक्त बाढ़ के पानी को जल-कम वाले क्षेत्रों में भेजने की योजना, ताकि बाढ़ भी कम हो और सूखा भी।
गैर-संरचनात्मक उपाय - योजना और चेतावनी
| फ्लड प्लेन ज़ोनिंग: | CWC ने 1975 में मॉडल कानून दिया। इसके तहत बाढ़ वाले इलाकों में घर-बिल्डिंग पर रोक ताकि नुकसान कम हो। |
| बाढ़ पूर्वानुमान और चेतावनी: | केंद्रीय जल आयोग रीयल-टाइम सेंसर और कंप्यूटर मॉडल से पूरे देश में बाढ़ की भविष्यवाणी करता है। IMD भी भारी बारिश की चेतावनी देता है ताकि निकासी हो सके। |
| जलग्रहण क्षेत्र उपचार - CAT: | पहाड़ों और ऊपरी इलाकों में वनीकरण, जलसंभर और मिट्टी संरक्षण ताकि गाद कम हो और पानी का बहाव धीमा पड़े। |
| समुदाय की तैयारी: | गाँव-शहर स्तर पर जागरूकता, मॉक ड्रिल और स्थानीय आपदा योजनाएं। ताकि लोग खतरे में खुद को बचा सकें। संस्थागत और नीतिगत उपाय |
| आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005: | इसके तहत NDMA, SDMA, DDMA, NDRF, SDRF बने। ये तैयारी, बचाव, राहत और पुनर्वास का पूरा सिस्टम चलाते हैं। |
| FMBAP योजना: | जल शक्ति मंत्रालय की यह योजना राज्यों को बाढ़ नियंत्रण, कटाव रोकने और ड्रेनेज के लिए केंद्रीय फंड देती है। |
| राष्ट्रीय जल नीति, 2012: | नदी बेसिन को एक इकाई मानकर प्रबंधन, जलसंभर बचाना और प्राकृतिक नालों-तालाबों को पुनर्जीवित करने पर जोर। |
निष्कर्ष
बाढ़ भारत की एक वार्षिक और जटिल समस्या है। असम जैसी जगहों पर यह भूगोल, भारी मानसून, गाद और जलवायु परिवर्तन के कारण और भी गंभीर हो गई है। पहले हमारा फोकस सिर्फ तटबंध बनाने पर था, लेकिन अब सरकार ने तरीका बदला है। आज बाढ़ प्रबंधन का मतलब है - संरचनात्मक काम + सही पूर्वानुमान + समुदाय की तैयारी + नदियों का सम्मान। बांध सुरक्षा कानून, CWC की चेतावनी प्रणाली, NDMA का ढांचा और FMBAP जैसी योजनाएं इसी दिशा में कदम हैं। लेकिन जब तक हम बाढ़ मैदानों पर कब्जा रोकेंगे नहीं, जंगलों को बचाएंगे नहीं और शहरों की ड्रेनेज ठीक नहीं करेंगे, तब तक बाढ़ का खतरा बना रहेगा।
सामान्य अध्ययन पेपर-2 के अंतर्गत आपदा प्रबंधन, भारत और बिहार का भूगोल, तथा विज्ञान और प्रौद्योगिकी खंड से जुड़ी है। यह टॉपिक सीधे तौर पर बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के शमन और तकनीकी अनुप्रयोगों से संबंधित है।
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