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लांसेट रिपोर्ट: भारत में बढ़ती गर्मी से स्वास्थ्य और रोजगार पर संकट

लांसेट की 2026 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बढ़ती गर्मी, वायु प्रदूषण और संक्रामक बीमारियाँ स्वास्थ्य, रोजगार और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं।

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Written by Akhilesh Anand
Published: 31 October 2026•10 min read
लांसेट रिपोर्ट: भारत में बढ़ती गर्मी से स्वास्थ्य और रोजगार पर संकट
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लांसेट रिपोर्ट: भारत में बढ़ती गर्मी से स्वास्थ्य और रोजगार पर संकट

चर्चा में क्यों है?

हाल ही में 'द लांसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज' की 2026 की रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु संकट अब केवल पर्यावरण की समस्या नहीं, बल्कि भारत के सामने तेजी से उभरता स्वास्थ्य और आर्थिक संकट भी है। रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन को रोकने के प्रयासों में अब स्वास्थ्य को केंद्र में रखना बेहद जरूरी है।

जलवायु परिवर्तन की चर्चा होते ही हमारे मन में बढ़ता तापमान, पिघलते ग्लेशियर और अनियमित मानसून जैसी तस्वीरें उभरती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बढ़ती गर्मी हमारी नींद, काम करने की क्षमता, स्वास्थ्य और कमाई तक को प्रभावित कर सकती है?

भारत में जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल मौसम के बदलाव तक सीमित नहीं रह गया है। भीषण गर्मी लोगों को बीमार बना रही है, काम के घंटे कम कर रही है, संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ा रही है और देश की अर्थव्यवस्था पर भी भारी बोझ डाल रही है।

लांसेट की 2026 रिपोर्ट के बारे में

'द लांसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज' एक वार्षिक रिपोर्ट है, जो यह आकलन करती है कि जलवायु परिवर्तन का मानव स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ रहा है और इससे निपटने के लिए कौन-से कदम उठाए जा सकते हैं।

इस रिपोर्ट का 10वां संस्करण 27 अक्टूबर को प्रकाशित किया गया। इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सहयोग से यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) के नेतृत्व में तैयार किया गया है।

इसमें 30 से अधिक देशों के 100 से ज्यादा संस्थानों से जुड़े लगभग 150 वैज्ञानिकों ने योगदान दिया है।

रिपोर्ट की प्रमुख विशेषताएँ:

  • इसमें पाँच प्रमुख क्षेत्रों के 54 संकेतकों (Indicators) का आकलन किया गया है।
  • इनमें स्वास्थ्य संबंधी खतरे, अनुकूलन क्षमता, उत्सर्जन में कमी, अर्थव्यवस्था और वित्त तथा जनभागीदारी को शामिल किया गया है।
  • इसमें चार नए संकेतक भी जोड़े गए हैं, जिनमें भूमि पर पानी की उपलब्धता, स्वास्थ्य क्षेत्र से होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, जलवायु एवं स्वास्थ्य अनुसंधान की फंडिंग और संबंधित विधायी प्रयास शामिल हैं।

भारत में बढ़ती गर्मी: स्वास्थ्य के साथ अर्थव्यवस्था पर भी असर

भारत उन देशों में शामिल है जहाँ बढ़ते तापमान का असर आम जनजीवन पर तेजी से दिखाई दे रहा है। इसका सबसे बड़ा प्रभाव खुले में काम करने वाले मजदूरों, किसानों, निर्माण श्रमिकों और अन्य मेहनतकश लोगों पर पड़ रहा है।

लांसेट की रिपोर्ट के अनुसार, 2016 से 2025 के बीच भारत में लोगों ने जितने दिनों तक अत्यधिक गर्मी का सामना किया, उनमें से औसतन 50% दिन सीधे जलवायु परिवर्तन से जुड़े थे।

आँकड़ों को समझें तो इस अवधि में भारत में हर साल औसतन 10.6 दिन लू चली, जिनमें से 5.3 दिन जलवायु परिवर्तन के कारण थे। लेकिन गर्मी का असर केवल लू लगने तक सीमित नहीं है।

  • हीट स्ट्रेस का खतरा: भारतीयों को हर साल औसतन 2,600 घंटे से अधिक ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, जब सामान्य बाहरी गतिविधियों के दौरान भी गर्मी से स्वास्थ्य पर मध्यम या उससे अधिक जोखिम था।
  • नींद पर प्रभाव: 2021 से 2025 के बीच रात के बढ़ते तापमान के कारण लोगों ने हर साल औसतन 64 घंटे की नींद गंवाई।
  • काम करने की क्षमता में कमी: 2016 से 2025 के दौरान अत्यधिक गर्मी के कारण भारत में हर साल औसतन 193 अरब संभावित श्रम घंटों का नुकसान हुआ।
  • आर्थिक नुकसान: वर्ष 2025 में गर्मी के कारण काम करने की क्षमता में आई कमी से होने वाली संभावित कमाई का नुकसान भारत की GDP के 4.2 % के बराबर था। वैश्विक स्तर पर यह आँकड़ा 0.91 % था। इसका सीधा अर्थ है कि बढ़ती गर्मी लोगों के स्वास्थ्य के साथ-साथ उनकी आय और देश की उत्पादकता को भी प्रभावित कर रही है।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा है डेंगू और मलेरिया का खतरा

जलवायु परिवर्तन का एक गंभीर प्रभाव संक्रामक बीमारियों के प्रसार पर भी पड़ रहा है। तापमान, बारिश और पर्यावरणीय परिस्थितियों में बदलाव से मच्छरों तथा दूषित पानी के जरिये फैलने वाली बीमारियों के लिए अनुकूल परिस्थिति बन रही है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों का जोखिम बढ़ा है।

डेंगू से जुड़े प्रमुख आँकड़े:

डेंगू फैलाने वाले Aedes albopictus मच्छर के कारण संक्रमण का खतरा 1951-1960 की तुलना में 2016-2025 के दौरान 84 % बढ़ गया।

डेंगू फैलाने वाली दूसरी प्रमुख प्रजाति Aedes aegypti में भी संक्रमण फैलाने की क्षमता अधिक पाई गई। 1981-1990 की तुलना में 2016-2025 के दौरान मलेरिया फैलाने वाले परजीवियों के लिए अनुकूल महीनों की संख्या बढ़ी है।

  • Plasmodium falciparum के लिए अनुकूल महीनों में 19 % की वृद्धि हुई। Plasmodium vivax के लिए अनुकूल महीनों में 18 % की वृद्धि हुई। भारत में हर साल औसतन लगभग चार महीने ऐसी परिस्थिति बनी रही, जो मलेरिया संक्रमण के लिए अनुकूल थी।

समुद्री बैक्टीरिया का बढ़ता खतरा

जलवायु परिवर्तन का असर समुद्री पर्यावरण पर भी दिखाई दे रहा है। भारत के तटीय क्षेत्रों में Vibrio बैक्टीरिया के प्रसार के लिए अनुकूल परिस्थितियों में 1982-1991 की तुलना में 27% की वृद्धि हुई है।

वर्ष 2025 तक ऐसे अनुकूल तटीय क्षेत्र की लंबाई लगभग 2,740 किलोमीटर पहुँच गई। इन बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमण के अनुमानित मामले बढ़कर सालाना लगभग 97,500 हो गए हैं।

वायु प्रदूषण और जंगल की आग: स्वास्थ्य के लिए दोहरी चुनौती

भारत में जलवायु परिवर्तन के साथ वायु प्रदूषण भी गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा कर रहा है। जंगलों में लगने वाली आग से निकलने वाला धुआं और जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से पैदा होने वाला प्रदूषण लोगों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचा रहा है।

लांसेट की रिपोर्ट के अनुसार:

  • 2021 से 2025 के बीच जंगलों की आग से निकलने वाले धुएं के कारण भारत में हर साल औसतन 90,300 मौतें हुईं।
  • 2003 से 2012 के दौरान यह आँकड़ा 67,800 मौतें सालाना था।
  • वर्ष 2023 में PM2.5 प्रदूषण के संपर्क में आने के कारण भारत में 22 लाख से अधिक मौतें हुईं।
  • PM2.5 से संबंधित मौतों में 2016 की तुलना में 22 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

जीवाश्म ईंधन की भूमिका

रिपोर्ट के अनुसार, PM2.5 प्रदूषण से हुई मौतों में 38 प्रतिशत के लिए जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल जिम्मेदार था। जीवाश्म ईंधन से जुड़े वायु प्रदूषण के कारण हुई मौतों में 67 प्रतिशत के लिए कोयला जिम्मेदार था।

हालांकि, घरेलू वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों में कुछ कमी भी दर्ज की गई। 2016 में घरेलू वायु प्रदूषण से लगभग 7.83 लाख मौतें हुई थीं। 2023 में यह संख्या घटकर लगभग 6.17 लाख रह गई।

आर्थिक नुकसान भी कम नहीं

वर्ष 2023 में वायु प्रदूषण से जुड़ी समय से पहले होने वाली मौतों के कारण भारत को लगभग 517 अरब अमेरिकी डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ। यह देश की GDP के लगभग 13.5 प्रतिशत के बराबर था। यह आंकड़ा बताता है कि वायु प्रदूषण केवल स्वास्थ्य संबंधी समस्या नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती है।

सूखा, जल संकट और समुद्र का बढ़ता जलस्तर

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पानी की उपलब्धता और तटीय क्षेत्रों पर भी पड़ रहा है। हालांकि, भारत में सूखे से जुड़े आंकड़े एक मिली-जुली तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।

सूखे की स्थिति में बदलाव

2021 से 2025 के बीच भारत के औसतन 13 प्रतिशत भूभाग में हर साल कम से कम एक महीने अत्यधिक सूखे की स्थिति रही।

इसके मुकाबले 1981 से 1990 के दौरान यह आंकड़ा 34 प्रतिशत था। यानी अत्यधिक सूखे से प्रभावित क्षेत्र में कमी दर्ज की गई है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत की जल सुरक्षा से जुड़ी समस्याएं समाप्त हो गई हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, 2006-2015 की तुलना में 2016-2025 के दौरान कम ताजे पानी के भंडारण वाले महीनों की संख्या में 6.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इससे स्पष्ट है कि जल उपलब्धता और जल प्रबंधन की चुनौती अब भी बनी हुई है।

समुद्र का बढ़ता जलस्तर और तटीय आबादी

समुद्र का जलस्तर बढ़ने और समुद्री पानी के गर्म होने से तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के सामने बाढ़, विस्थापन और बुनियादी सेवाओं में बाधा का खतरा बढ़ रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत की लगभग 1.82 करोड़ आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती थी, जो समुद्र तल से एक मीटर से भी कम ऊंचाई पर स्थित हैं।

यह देश की कुल आबादी का लगभग 1.3 प्रतिशत है। इसके अलावा, 2023-2025 के दौरान भारत के आसपास समुद्र की सतह का तापमान 1981-2010 के औसत से 0.4 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा।

समुद्र के गर्म होने से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और मछलियों की उपलब्धता भी प्रभावित हो सकती है। इसका असर तटीय समुदायों की आजीविका पर पड़ सकता है।

जलवायु संकट के बीच स्वच्छ ऊर्जा से उम्मीद की किरण

रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों के साथ कुछ सकारात्मक संकेत भी सामने आए हैं। दुनिया के कई देशों में स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव तेज हुआ है और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार:

  • वर्ष 2025 में स्वच्छ ऊर्जा में वैश्विक निवेश बढ़कर रिकॉर्ड 2.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया।
  • यह जीवाश्म ईंधन में किए गए निवेश से लगभग दोगुना था।
  • वर्ष 2016 के बाद कम से कम 77 देशों में जीवाश्म ईंधन से होने वाले वायु प्रदूषण में गिरावट आई।
  • इन देशों में प्रदूषण में कमी के कारण हर साल अनुमानित 3.23 लाख मौतों को रोकने में मदद मिली।

हालांकि, चुनौती अभी भी बड़ी है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में जीवाश्म ईंधन की हिस्सेदारी अब भी 80 प्रतिशत से अधिक बनी हुई है। रिपोर्ट ने यह भी चिंता जताई है कि दुनिया की 100 सबसे बड़ी तेल और गैस कंपनियों की वर्ष 2040 तक उत्पादन संबंधी योजनाएं, वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लक्ष्य के अनुरूप स्तर से 150 प्रतिशत अधिक हैं। इससे स्पष्ट होता है कि स्वच्छ ऊर्जा में निवेश बढ़ने के बावजूद दुनिया को अभी लंबा रास्ता तय करना है।

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए क्या कदम उठाने की जरूरत है?

लांसेट रिपोर्ट के वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन को औपचारिक रूप से वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में मान्यता देने की मांग की है। उनका मानना है कि जलवायु नीतियों और वित्तीय योजनाओं में स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना जरूरी है।

रिपोर्ट में मुख्य रूप से निम्नलिखित कदम उठाने पर जोर दिया गया है:

1. ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी: कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करके स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना।

2. स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना: अत्यधिक गर्मी, प्रदूषण और संक्रामक बीमारियों से निपटने के लिए स्वास्थ्य प्रणालियों को तैयार करना।

3. अनुसंधान में निवेश: जलवायु परिवर्तन और मानव स्वास्थ्य के बीच संबंधों को समझने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देना।

4. वित्तीय सहायता: जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए विशेष रूप से कमजोर देशों और समुदायों को पर्याप्त वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना।

5. जलवायु अनुकूलन: गर्मी, सूखे, बाढ़ और समुद्र के बढ़ते जलस्तर जैसे खतरों से निपटने के लिए बेहतर तैयारी करना। भारत के संदर्भ में खुले में काम करने वाले श्रमिकों को गर्मी से बचाना, वायु प्रदूषण कम करना, संक्रामक बीमारियों की निगरानी मजबूत करना और जल एवं तटीय सुरक्षा को बेहतर बनाना विशेष रूप से जरूरी है।

निष्कर्ष: जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का नहीं, वर्तमान का संकट है

लांसेट की 2026 की रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण संदेश देती है, जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल पर्यावरण पर नहीं, बल्कि सीधे मानव जीवन, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। बढ़ती गर्मी से श्रम उत्पादकता प्रभावित हो रही है, प्रदूषण से स्वास्थ्य पर बोझ बढ़ रहा है और बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियां संक्रामक बीमारियों के खतरे को बढ़ा रही हैं। ऐसे में जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीति केवल तापमान नियंत्रित करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसमें मानव स्वास्थ्य, आजीविका, खाद्य सुरक्षा और जल सुरक्षा को भी समान महत्व देना होगा। क्योंकि जलवायु परिवर्तन से पृथ्वी का तापमान ही नहीं बढ़ रहा, बल्कि यह हमारे स्वस्थ जीवन और सुरक्षित भविष्य के सामने भी एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

Reference:

The Wire

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