चिकित्सा एवं कृषि क्षेत्रों में परमाणु प्रौद्योगिकी
हाल ही में प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा तथा अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह ने राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में परमाणु प्रौद्योगिकी के बारे में विस्तृत जानकारी दी है। उन्होंने बताया है कि परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) चिकित्सा एवं कृषि दोनों क्षेत्रों में परमाणु प्रौद्योगिकी के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा दे रहा है।
डीएई, मुंबई स्थित रेडिएशन मेडिसिन सेंटर (आरएमसी) तथा कोलकाता स्थित रेडिएशन मेडिसिन रिसर्च सेंटर (आरएमआरसी) के माध्यम से भी नाभिकीय चिकित्सा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है जो कैंसर उपचार के लिए निदान एवं उपचार संबंधी सेवाएँ प्रदान करते हैं।
आरएमआरसी, कोलकाता, बीएआरसी, मुंबई के तत्वावधान में पूर्वी भारत में स्थापित एक अत्याधुनिक नाभिकीय चिकित्सा सुविधा है। यह केन्द्र जनवरी 2024 से संचालित है तथा पूर्वी एवं पूर्वोत्तर भारत के रोगियों को आधुनिक एवं किफायती नाभिकीय चिकित्सा आधारित निदान एवं उपचार सेवाएँ उपलब्ध करा रहा है।
चिकित्सा क्षेत्र में परमाणु प्रौद्योगिकी:
चिकित्सा क्षेत्र में, विशेष रूप से कैंसर उपचार के लिए, निदान एवं उपचारात्मक एप्लिकेशनों में नाभिकीय चिकित्सा तथा रेडियो आइसोटोप का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
रेडियोआइसोटोप का स्वदेशी उत्पादन
रेडियोआइसोटोप का स्वदेशी उत्पादन अनुसंधान रिएक्टरों एवं साइक्लोट्रॉन के माध्यम से किया जाता है। रुथेनियम-106, सीज़ियम-137 तथा स्ट्रॉन्शियम-90 से प्राप्त यिट्रियम-90 जैसे रेडियोआइसोटोप उच्च-स्तरीय द्रव अपशिष्ट (एचएलएलडब्ल्यू) के पुनर्प्रसंस्करण के माध्यम से प्राप्त किए जाते हैं।
भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र (बीएआरसी
परमाणु ऊर्जा विभाग की एक घटक इकाई भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र (बीएआरसी) नियमित रूप से रेडियो आइसोटोप तथा उपयोग के लिए तैयार रेडियोफार्मास्यूटिकल्स का उत्पादन करता है।
इनकी आपूर्ति परमाणु ऊर्जा विभाग के औद्योगिक उपक्रम विकिरण एवं आइसोटोप प्रौद्योगिकी बोर्ड (बीआरआईटी) के माध्यम से देशभर के नाभिकीय चिकित्सा केन्द्रों को की जाती है, जिससे निदान एवं उपचारात्मक एप्लिकेशनों के लिए इनकी समय पर उपलब्धता सुनिश्चित होती है।
आयातित रेडियोफार्मास्यूटिकल्स के किफायती स्वदेशी विकल्प उपलब्ध कराने के उद्देश्य से डीएई ने रेडियोफार्मास्यूटिकल्स तथा उनसे संबंधित उत्पादों के स्वदेशी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं।
नाभिकीय चिकित्सा लिगैंड
पिछले कुछ वर्षों में परमाणु ऊर्जा विभाग ने कैंसर से मुकाबले के राष्ट्रीय प्रयासों के तहत, विशेष रूप से आधुनिक उपचार एवं अनुसंधान के क्षेत्र में, कई महत्वपूर्ण नाभिकीय चिकित्सा लिगैंड तथा लक्षित उपचार विकसित किए हैं। डीएई ने प्रोस्टेट कैंसर के उपचार के लिए पेप्टाइड-आधारित लिगैंड पीएसएमए-617 विकसित किया है।
विभाग द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित 177एलयू-पीएसएमए-617 नाभिकीय चिकित्सा लिगैंड की आपूर्ति विकिरण एवं आइसोटोप प्रौद्योगिकी बोर्ड (बीआरआईटी) के माध्यम से देशभर के अस्पतालों को नियमित रूप से की जा रही है।
पीएसएमए-11
हाल ही में, डीएई ने पीएसएमए-11 नामक एक अन्य नाभिकीय चिकित्सा लिगैंड भी विकसित किया है, जो 68जीए- पीएसएमए-11 के उत्पादन के लिए आयात का स्वदेशी विकल्प है। 68जीए- पीएसएमए-11 का उपयोग प्रोस्टेट कैंसर के निदान में किया जाता है।
रेडियोधर्मी औषधीय उत्पाद
जीए68 डीओटीएएनओसी, जीए68 एफएपीआई तथा 18एफ एफडीजी जैसे रेडियोधर्मी औषधीय उत्पाद का उपयोग प्रोस्टेट कैंसर, न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर, म्यूसिनस एवं सिग्नेट रिंग जठरांत्र कैंसर, फेफड़ों का कैंसर, ग्रासनली का कैंसर, स्तन कैंसर, लिम्फोमा आदि विभिन्न प्रकार के कैंसरों के मूल्यांकन में किया जाता है।
परमाणु ऊर्जा विभाग टेक्निशियम-99एम आधारित रेडियोफार्मास्यूटिकल्स की तैयारी के लिए लगभग 18 प्रकार के कोल्ड किट का निर्माण एवं आपूर्ति करता है।
इनका व्यापक उपयोग शरीर के लगभग सभी प्रमुख अंगों को प्रभावित करने वाले रोगों, जिनमें विभिन्न प्रकार के कैंसर भी शामिल हैं, के शीघ्र निदान के लिए किया जाता है।
ये किट उच्च गुणवत्ता वाले नैदानिक रेडियोफार्मास्यूटिकल्स के निर्माण में सहायक हैं, जो नाभिकीय चिकित्सा में अनेक प्रकार के रोगों की प्रारंभिक पहचान, चरण निर्धारण तथा उपचार के दौरान निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
डीएई ने किफायती सेस्टा-एमआईबीआई के संश्लेषण की एक प्रक्रिया भी विकसित की है, जिसका नियमित रूप से 99एमटीसी-एमर्आईबीआई के रूप में हृदय की इमेजिंग के लिए उपयोग किया जाता है।
कृषि क्षेत्र में परमाणु प्रौद्योगिकी:
कृषि क्षेत्र में, परमाणु ऊर्जा विभाग ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) तथा राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के सहयोग से विकिरण-प्रेरित उत्परिवर्तन और संकरण तकनीकों का उपयोग करते हुए 72 उन्नत फसल किस्में विकसित की हैं, जिन्हें देशभर में व्यावसायिक खेती के लिए जारी एवं अधिसूचित किया गया है।
प्रमुख फसलों में संकरण तकनीक का उपयोग
इन किस्मों में धान, सरसों, तिल, मूंगफली, उड़द, मूंग, अरहर, ज्वार, लोबिया, गेहूं, सोयाबीन, सूरजमुखी, केला, अलसी तथा जूट शामिल हैं। इन फसलों की प्रमुख विशेषताओं में अधिक उपज, बड़े बीज, बेहतर गुणवत्ता, शीघ्र परिपक्वता, तथा सूखा, अधिक तापमान और लवणीयता जैसी जलवायु संबंधी प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता एवं रोग प्रतिरोधकता शामिल हैं। इनमें से अनेक किस्में किसानों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय हैं और देश में व्यापक रूप से उगाई जा रही हैं।
खाद्य विकिरण के लिए मानक एवं दिशा-निर्देश
डीएई खाद्य एवं कृषि उत्पादों के संरक्षण के लिए विकिरण प्रौद्योगिकियों के उपयोग को भी बढ़ावा दे रहा है। इसके लिए कृषि उत्पादों के विकिरण उपचार हेतु मानक संचालन प्रक्रियाएँ (एसओपी) विकसित की गई हैं, खाद्य विकिरण के लिए मानक एवं दिशा-निर्देश तैयार किए गए हैं, उन्नत विकिरण सुविधाओं का विकास किया गया है तथा विकिरण आधारित खाद्य संरक्षण प्रौद्योगिकियों का वाणिज्यीकरण करने के लिए उन्हें निजी उद्यमियों को हस्तांतरित किया जा रहा है।
विकिरण प्रसंस्करण से शीघ्र नष्ट होने वाले उत्पादों का भंडारण जीवन बढ़ता है, कटाई के बाद होने वाली हानि कम होती है, अनाज एवं मसालों का रसायन-मुक्त संरक्षण संभव होता है तथा निर्यात के लिए अंतरराष्ट्रीय पादप स्वच्छता मानकों का पालन सुनिश्चित करने में सहायता मिलती है।
वर्तमान में, देश में अब तक 42 खाद्य विकिरण सुविधाएँ स्थापित की जा चुकी हैं, जिनमें सरकारी एवं निजी दोनों क्षेत्रों की इकाइयाँ शामिल हैं।
कोबाल्ट-60
कोबाल्ट-60 (सीओ-60) आधारित विकिरण संयंत्रों का उपयोग चिकित्सा उत्पादों के स्टरलाइजेशन तथा कृषि एवं समुद्री उत्पादों के भंडारण जीवन को बढ़ाने के लिए किया जाता है। सीज़ियम (Cs) का उपयोग रक्त विकिरण संयंत्रों में रक्त के विकिरण के लिए किया जाता है।
परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियाँ निजी उद्यमियों को गैर-विशिष्ट आधार पर नाममात्र के शुल्क पर प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए उपलब्ध कराई जाती हैं।
खाद्य प्रसंस्करण में विकिरण प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने वर्ष 2024-25 में प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना (पीएमकेएसवाई) के अंतर्गत ‘एकीकृत शीत श्रृंखला एवं मूल्य संवर्धन अवसंरचना’ योजना के तहत देशभर में बहु-उत्पाद खाद्य विकिरण इकाइयों की स्थापना के लिए प्रोत्साहन की घोषणा की है।
तकनीकी प्रगति की आवश्यकता क्यों?
जलवायु परिवर्तन: सूखा, बाढ़, तापमान में उतार-चढ़ाव। इसके लिए जलवायु-स्मार्ट कृषि (CSA) को अपनाना होगा।
खाद्य अपशिष्ट: विश्व का 1/3 भोजन यानी 1.3 बिलियन टन बर्बाद। 2020 में 3.1 बिलियन लोग पौष्टिक भोजन वहन नहीं कर सके।
जनसंख्या दबाव: 2050 तक जनसंख्या 9.7 बिलियन। उत्पादन दोगुना करना होगा।
सीमित संसाधन: कृषि योग्य भूमि और जल की कमी। इसके लिए ऊर्ध्वाधर खेती, हाइड्रोपोनिक्स, कुशल सिंचाई का विस्तार करना होगा।
आगे की राह वैश्विक खाद्य सुरक्षा में परमाणु प्रौद्योगिकी खाद्य सुरक्षा में परमाणु तकनीक के प्रभावी उपयोग के लिए निम्न 4 स्तरों पर कार्य करना आवश्यक है:
1. बुनियादी ढाँचे और सुविधाओं का विकासविकिरण सुविधाओं, विश्लेषणात्मक प्रयोगशालाओं और परमाणु उपकरणों के लिए धन आवंटित करना। उदाहरण के लिए खराब होने वाले उत्पादों के संरक्षण और खाद्य हानि को कम करने हेतु खाद्य विकिरण सुविधाएँ स्थापित करना।
2. विनियामक सुधार और प्रक्रियाओं का सुव्यवस्थितीकरणरेडियोधर्मी कृषि सामग्रियों के सुरक्षित संचालन, परिवहन और निपटान के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाना। विकिरण-प्रेरित उत्परिवर्ती फसलों के अनुमोदन और व्यावसायीकरण की निगरानी के लिए एक विशेष नियामक निकाय का गठन करना।
3. सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावाअनुसंधान संस्थानों, निजी क्षेत्र और उद्योग के बीच प्रौद्योगिकी हस्तांतरण हेतु सहयोग बढ़ाना। परमाणु-आधारित कृषि उत्पादों के विकास और व्यावसायीकरण में निवेश के लिए कंपनियों को प्रोत्साहन देना।
4. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और ज्ञान साझाकरणFAO/IAEA के संयुक्त केंद्रों के साथ साझेदारी कर विशेषज्ञता और तकनीक का हस्तांतरण करना। वैश्विक स्तर पर सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाकर क्षमता निर्माण करना।
निष्कर्ष
परमाणु प्रौद्योगिकी "सुरक्षित भोजन और स्वस्थ जीवन" दोनों का आधार है। FAO-IAEA का "One Health" दृष्टिकोण भी यही दर्शाता है कि मानव, पशु और पर्यावरण स्वास्थ्य आपस में जुड़े हैं। बुनियादी ढाँचे, सख्त नियमन, जन-जागरूकता और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के साथ इस तकनीक को अपनाकर ही हम 2050 तक 9.7 बिलियन आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित कर सकते हैं। परमाणु प्रौद्योगिकी विज्ञान का वह उपकरण है जो "खेत से अस्पताल तक" मानव जीवन को सुरक्षित और सतत बनाती है।
यह टॉपिक बीपीएससी मुख्य परीक्षा सामान्य अध्ययन पेपर-II के तीसरे खंड यानी 'विज्ञान और प्रौद्योगिकी के महत्व और अनुप्रयोग' से संबंधित एक महत्वपूर्ण समसामयिक विषय है।
Reference:









