भारत लॉन्च करेगा NVS-03: जानिए विस्तार से
यह टॉपिक क्रमशः UPSC एवं BPSC परीक्षाओं के दृष्टिकोण से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी खंड से जुड़ा है.
दोस्तों, भारत अपनी स्वदेशी सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली NavIC को मजबूत करने के लिए NVS-03 उपग्रह लॉन्च करने की तैयारी में है। यह मिशन इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि भारत की NavIC प्रणाली हाल के वर्षों में पुराने उपग्रहों की निर्धारित कार्य-अवधि पूरी होने और तकनीकी समस्याओं के कारण स्वतंत्र रूप से लोकेशन बताने में सक्षम नहीं रह गई थी। इसी बीच भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन इसरो ने आगामी 30 अक्टूबर को NVS-03 लॉन्च करने की योजना बनाई है। प्रस्तावित लॉन्च GSLV Mk II रॉकेट से श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से होगा।
आइये पूरी कहानी को एक-एक कर समझते हैं. इस क्रम में हम जानेंगे NavIC और NVS-03 के बारे में और इनके इस्तेमाल तथा भारत के लिए महत्त्व के बारे में.
सबसे पहले जानते हैं कि NavIC क्या है ?
NavIC का पूरा नाम है — Navigation with Indian Constellation. यह भारत की अपनी उपग्रह-आधारित नेविगेशन प्रणाली है, ISRO ने विकसित किया है। इसे पहले Indian Regional Navigation Satellite System (IRNSS) के नाम से जाना जाता था। जिस तरह मोबाइल में Google Maps लोकेशन बताने के लिए GPS जैसे सिस्टम के संकेतों का उपयोग करता है, उसी प्रकार NavIC भारत की अपनी सैटेलाइट प्रणाली के जरिये लोकेशन और समय से संबंधित जानकारी मुहैया कराता है।
इसके तीन प्रमुख काम हैं:
- Positioning (स्थिति निर्धारण): आप पृथ्वी पर किस जगह पर हैं?
- Navigation (मार्गदर्शन): आपको अपने गंतव्य तक किस दिशा में जाना है?
- Timing (समय निर्धारण): किसी उपकरण या नेटवर्क के लिए सटीक समय क्या है?
इन तीनों को संक्षेप में PNT — Positioning, Navigation and Timing कहा जाता है। इसकी मूल संरचना में 7 उपग्रहों का इस्तेमाल होना था. इसमें तीन सैटेलाइट जियोस्टेशनरी ऑर्बिट में और चार सैटेलाइट जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में रखे जाने की व्यवस्था थी. साथ ही इसकी कवरेज भारत और इसकी सीमा से लगभग 1,500 किमी आगे तक के दायरे में थी. इस प्रणाली का पहला उपग्रह जुलाई, 2013 में लॉन्च किया गया था.
दोस्तों, कारगिल युद्ध के दौरान भारत को लड़ाई के मैदान में सटीक भौगोलिक जानकारी की जरुरत थी। भारत ने अमेरिकी GPS प्रणाली से संबंधित सहायता चाही, लेकिन उसे आवश्यक सहायता नहीं मिली। इससे यह सीख मिली कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे महत्त्वपूर्ण मामलों में किसी दूसरे देश की नेविगेशन प्रणाली पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिमपूर्ण हो सकता है। इसी रणनीतिक आवश्यकता के कारण भारत ने 1999 के बाद अपनी क्षेत्रीय नेविगेशन प्रणाली विकसित करने की दिशा में काम शुरू किया।
इस तरह NavIC को राष्ट्रीय सुरक्षा, रेलवे और परिवहन, समुद्री सुरक्षा और आम नागरिक और आपदा प्रबंधन के मद्देनजर इस्तेमाल में लाया गया.
GPS और NavIC में क्या अंतर है?
GPS = Global Positioning System | NavIC = Navigation with Indian Constellation
| आधार | NavIC | GPS |
| किस देश की प्रणाली? | भारत | अमेरिका |
| संचालन/विकास | ISRO | अमेरिकी सरकार की प्रणाली |
| कवरेज | भारत और लगभग 1,500 किमी आसपास का क्षेत्र | वैश्विक |
| मूल संरचना | 7 उपग्रहों की क्षेत्रीय प्रणाली | लगभग 32 उपग्रहों का वैश्विक समूह |
| प्रमुख उद्देश्य | भारत और आसपास के क्षेत्र में नेविगेशन | पूरी दुनिया में नेविगेशन |
| भारत के लिए विशेष महत्त्व | रणनीतिक स्वायत्तता और क्षेत्रीय कवरेज | व्यापक वैश्विक उपलब्धता |
दूसरे प्रमुख वैश्विक सिस्टम हैं GLONASS( रूस); Galileo (यूरोपीय संघ); BeiDou (चीन). जापान का QZSS भी एक क्षेत्रीय प्रणाली है, जो GPS के संकेतों को बेहतर बनाने में मदद करती है।
अब समझते हैं कि NavIC की सेवा में समस्या क्यों आई?
जुलाई 2026 में संसद में दी गई सरकारी जानकारी के अनुसार, NavIC के पास उस समय PNT सेवाओं के लिए केवल तीन उपग्रह उपलब्ध थे। स्वतंत्र रूप से बुनियादी लोकेशन निर्धारित करने के लिए कम-से-कम चार परिचालन उपग्रह जरूरी होते हैं। इसलिए NavIC की स्वतंत्र positioning सेवा उपलब्ध नहीं थी.
समस्या के तीन प्रमुख कारण सामने आए
(क) पुराने उपग्रहों की निर्धारित कार्य-अवधि समाप्त होना
प्रारंभिक NavIC उपग्रहों में से कई की निर्धारित कार्य-अवधि लगभग 10 वर्ष थी। समय बीतने के साथ उनकी उपयोगिता कम हुई और कुछ उपग्रहों के महत्त्वपूर्ण उपकरणों ने काम करना बंद कर दिया।
(ख) परमाणु घड़ियों में खराबी
नेविगेशन सिस्टम के लिए समय का बिलकुल सटीक मापन जरूरी है। शुरुआती उपग्रहों में इस्तेमाल की गई कुछ बाहर से आयातित परमाणु घड़ियाँ खराब हो गईं, जिससे नेविगेशन संबंधी क्षमता प्रभावित हुई।
(ग) उपग्रहों को अंतिम कक्षा में स्थापित करने में विफलता जैसे IRNSS-1H को 2017 में लॉन्च के बाद कक्षा में स्थापित करने में समस्या हुई। वहीं NVS-02 जनवरी, 2025 में सफलतापूर्वक प्रक्षेपित हुआ, लेकिन उसके प्रणोदन(propulsion system) में समस्या के कारण वह अपनी निर्धारित अंतिम कक्षा तक नहीं पहुँच सका।
इन समस्याओं ने उपग्रहों के प्रतिस्थापन और NavIC की सेवा की निरंतरता को प्रभावित किया।
परमाणु घड़ी का महत्त्व: मान लीजिए, किसी उपग्रह से मोबाइल तक रेडियो सिग्नल पहुँचने में कितना समय लगा, इसका सटीक हिसाब रखना है। यदि समय मापने में थोड़ी-सी भी गलती हो, तो दूरी की गणना गलत हो सकती है। उपग्रह नेविगेशन में सिग्नल के आने में लगे समय को मापकर दूरी का अनुमान लगाया जाता है। कई उपग्रहों से प्राप्त दूरी के आधार पर रिसीवर अपनी स्थिति निर्धारित करता है।
अब बात करते हैं कि NVS-03 क्या है और यह क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह NavIC की दूसरी पीढ़ी के उपग्रहों में तीसरा उपग्रह है। NVS का अर्थ Navigation Satellite है। इसका मुख्य उद्देश्य पुराने उपग्रहों की जगह लेने वाली नई पीढ़ी की व्यवस्था को मजबूत करना और भारत की स्वतंत्र नेविगेशन सेवा को बहाल करने में मदद करना है। इससे पहले NVS-01 मई 2023 में लॉन्च किया गया। यह दूसरी पीढ़ी के NavIC उपग्रहों में पहला था और इसमें स्वदेशी परमाणु घड़ी तकनीक का उपयोग किया गया।
इसके बाद NVS-02 जनवरी 2025 में लॉन्च हुआ, लेकिन अंतिम निर्धारित कक्षा में पहुँचने के लिए आवश्यक इंजन संचालन नहीं हो सका
अब NVS-03 का उद्देश्य NavIC की उपग्रह संरचना को मजबूत करना और स्वतंत्र लोकेशन सेवा बहाल करने में मदद करना है। सरकार ने NVS-04 और NVS-05 को भी विकास के उन्नत चरण में बताया है। इसलिए NVS-03 किसी एक उपग्रह का मिशन भर नहीं है, बल्कि भारत की नेविगेशन प्रणाली की निरंतरता बनाए रखने के व्यापक प्रयास का हिस्सा है।
NVS-03 में कौन-सी नई तकनीकें हैं?
दूसरी पीढ़ी के NavIC उपग्रहों में कुछ महत्त्वपूर्ण सुधार किए गए हैं।
1. स्वदेशी परमाणु घड़ी तकनीक
भारत ने नेविगेशन उपग्रहों में स्वदेशी परमाणु घड़ी तकनीक विकसित की है। इससे आयातित उपकरणों पर निर्भरता कम करने और प्रणाली की विश्वसनीयता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
2. L1, L5 और S-बैंड संकेत
दूसरी पीढ़ी के उपग्रह L1 बैंड सहित अतिरिक्त संकेत सुविधाएँ प्रदान करते हैं। L1 बैंड का उपयोग GPS जैसे सिस्टम में भी होता है, जिससे संगत रिसीवरों और उपभोक्ता उपकरणों में NavIC को अपनाना आसान हो सकता है।
3. सेवा की निरंतरता और विश्वसनीयता
नई पीढ़ी के उपग्रह पुराने उपग्रहों की जगह लेने और प्रणाली की निरंतरता बनाए रखने के लिए तैयार किए जा रहे हैं। NVS-03 की उपयोगिता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि वह सफलतापूर्वक निर्धारित कक्षा में पहुँचे और परिचालन शुरू करे।
NavIC के सामने प्रमुख चुनौतियाँ
भारत ने स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली विकसित करने में महत्त्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन कुछ चुनौतियों पर ध्यान देना आवश्यक है।
- तकनीकी विश्वसनीयता: परमाणु घड़ियों और प्रणोदन प्रणाली में खराबी से सेवा प्रभावित हो सकती है।
- समय पर उपग्रह प्रतिस्थापन: पुराने उपग्रहों की कार्य-अवधि समाप्त होने से पहले नए उपग्रहों को तैयार करना जरूरी है।
- उपभोक्ता उपकरणों में अपनाना: मोबाइल फोन, स्मार्टवॉच और दूसरे उपकरणों में NavIC-संगत चिपसेट का व्यापक उपयोग आवश्यक है।
- लॉन्च और कक्षा संबंधी जोखिम: उपग्रह का सफल प्रक्षेपण ही पर्याप्त नहीं है; उसे सही कक्षा में स्थापित करके परिचालन योग्य बनाना भी जरूरी है।
- अनुसंधान एवं स्वदेशी निर्माण: प्रमुख उपकरणों और तकनीकों के घरेलू विकास से दीर्घकालीन निर्भरता घटाई जा सकती है।
निष्कर्ष:
इन चुनौतियों का समाधान केवल नए उपग्रह भेजने से नहीं, बल्कि संपूर्ण नेविगेशन प्रणाली को मजबूत करने से होगा। अतः पूरी चर्चा से स्पष्ट होता है कि NVS-03 भारत के लिए केवल एक नया उपग्रह नहीं है। यह अपनी नेविगेशन प्रणाली को अधिक विश्वसनीय बनाने, रणनीतिक निर्भरता घटाने और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। इसकी वास्तविक सफलता सफल लॉन्च के साथ-साथ सही कक्षा में स्थापित होने और नियमित परिचालन शुरू होने पर निर्भर करेगी।
Reference: The Indian Express अभ्यास प्रश्न: भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- IRNSS के तीन सैटेलाइट जियोस्टेशनरी ऑर्बिट में और चार सैटेलाइट जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में हैं।
- IRNSS पूरे भारत और इसकी सीमाओं से बाहर लगभग 5500 sq. km को कवर करता है।
- 2019 के बीच तक भारत के पास पूरी दुनिया को कवर करने वाला अपना सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम होगा। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
a. केवल 1 b. 1 और 2 c. केवल 2 और 3 d. कोई नहीं (IAS Pre. 2018)





