भारत और उज्बेकिस्तान संबंध
हाल ही में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संसद भवन में उज्बेकिस्तान के विदेश मंत्री बख्तियार सैदोव से मुलाकात की है। इस उच्च-स्तरीय बातचीत के दौरान भारत और उज्बेकिस्तान क्रिटिकल मिनरल्स, खनन, व्यापार, ऊर्जा, बुनियादी ढांचे, रक्षा और शिक्षा के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाकर अपनी रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने पर सहमत हुए हैं।
उल्लेखनीय है कि भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 2026 में अपनी BRICS अध्यक्षता के दौरान भारत की पहलों का समर्थन करने के लिए उज्बेकिस्तान का धन्यवाद किया है और 2027-2029 की अवधि के लिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की अध्यक्षता के लिए उज्बेकिस्तान की उम्मीदवारी को नई दिल्ली का समर्थन भी जताया है।
उज़्बेकिस्तान मध्य एशिया के बीचों-बीच बसा एक देश है। चारों तरफ जमीन ही जमीन है - यानी इसका कोई समुद्री किनारा नहीं है। 1991 में सोवियत संघ टूटा तो उज़्बेकिस्तान भी एक आजाद मुल्क बन गया। भूगोल की बात करें तो ये चारों तरफ दोस्त-पड़ोसियों से घिरा है: उत्तर में कजाकिस्तान पूर्व में ताजिकिस्तान दक्षिण में तुर्कमेनिस्तान और अफगानिस्तान। रेशम मार्ग का ये ऐतिहासिक केंद्र आज भी मध्य एशिया को जोड़ने वाली सबसे अहम कड़ी है।
भारत-उज़्बेकिस्तान संबंध की पृष्ठभूमि
भारत और उज़्बेकिस्तान के रिश्ते पुराने और भरोसे वाले हैं। जब 1991 में उज़्बेकिस्तान आजाद हुआ, तो भारत उन पहले देशों में था जिसने उसे मान्यता दी और 18 मार्च 1992 को दोनों देशों के बीच औपचारिक राजनयिक रिश्ते शुरू हो गए। आज दोनों देश सिर्फ दोस्त नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में साथी हैं - राजनीति, व्यापार, रक्षा, आतंकवाद के खिलाफ, विज्ञान, परमाणु ऊर्जा, IT और अंतरिक्ष तक। साथ ही संस्कृति और शिक्षा के जरिए लोगों के बीच का जुड़ाव भी लगातार मजबूत हो रहा है। दरअसल वर्तमान वैश्विक परिदृश्य को देखा जाए तो उज़्बेकिस्तान मध्य एशिया में भारत का एक भरोसेमंद और रणनीतिक साझेदार है।
हाल ही में दोनों देशों के बीच मजबूत शैक्षिक और पेशेवर आदान-प्रदान की भी तारीफ की गई है। 3,000 से ज्यादा उज्बेक अधिकारियों, पेशेवरों और छात्रों ने भारत के 'इंडियन टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन' (ITEC) प्रोग्राम और स्कॉलरशिप स्कीम का फ़ायदा उठाया है। वर्तमान में 16,000 से ज्यादा भारतीय छात्र उज्बेकिस्तान में हायर एजुकेशन ले रहे हैं।
भारत-उज़्बेकिस्तान संबंध का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत और उज़्बेकिस्तान के रिश्ते सिर्फ आज के नहीं, सदियों पुराने हैं। दोनों सिल्क रोड पर थे, इसलिए व्यापार के साथ-साथ लोग और संस्कृति भी आते-जाते रहे। भारत में तुर्क राजवंश आए और पूरी तरह भारतीय हो गए।
मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर का जन्म भी आज के उज़्बेकिस्तान के अंदिजान में हुआ था। भारत में उनके बारे में अलग-अलग राय हो सकती है, पर उज़्बेकिस्तान में उन्हें आज भी राष्ट्रीय नायक माना जाता है।
18वीं सदी में जब मध्य एशिया में अकाल और उथल-पुथल थी, तो हजारों लोग बेहतर जीवन के लिए भारत आए। इतिहासकार स्कॉट सी. लेवी के मुताबिक, 1717 में अकेले समरकंद के करीब 12,000 लोग मुगल भारत में बसने आए।
1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद शांति के लिए जो ऐतिहासिक ताशकंद समझौता हुआ था, वो इसी उज़्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में साइन हुआ था। यहीं 1966 में हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने आखिरी सांस ली थी। इसलिए ताशकंद भारत के लिए सिर्फ एक शहर नहीं, एक भावना भी है।
द्वीपक्षीय संबंध: रक्षा से लेकर स्टार्टअप तक
रक्षा और सुरक्षा:- दोनों ने "दस्त्लिक 2019" संयुक्त सैन्य अभ्यास किया। ताशकंद में उज़्बेक सेना अकादमी में "इंडिया रूम" भी बनाया गया। आतंकवाद, संगठित अपराध और तस्करी जैसे मुद्दों पर दोनों का नजरिया एक जैसा है। भारत उज़्बेक सुरक्षा एजेंसियों को ट्रेनिंग और क्षमता निर्माण में मदद करता है। दोनों देशों ने आतंकवाद के प्रति हमेशा 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई है। इसमें खासतौर पर सीमा-पार आतंकवाद और आतंकवादियों के सुरक्षित ठिकाने भी शामिल हैं।
व्यापार और निवेश:- व्यापार 2019-20 में 247 मिलियन डॉलर से बढ़कर 2021-22 में 342 मिलियन डॉलर हुआ - 38.5% की बढ़ोतरी। भारतीय कंपनियां फार्मा, ऑटो पार्ट्स, मनोरंजन और होटल में निवेश कर रही हैं। एमिटी और शारदा यूनिवर्सिटी ने ताशकंद और अंदिजान में कैंपस खोले। iCreate जैसे संस्थान उज़्बेक स्टार्टअप इकोसिस्टम बनाने में मदद कर रहे हैं।
पर्यटन और ऊर्जा:- उज़्बेकिस्तान ने भारतीयों के लिए ई-वीजा आसान किया। हर साल करीब 8,000 उज़्बेक इलाज के लिए भारत आते हैं - मेडिकल टूरिज्म बढ़ रहा है। उज़्बेकिस्तान ISA में शामिल होना चाहता है और सोलर प्रोजेक्ट्स में भारतीय कंपनियों को बुला रहा है।
बातचीत के मंच:-प्रोजेक्ट्स पर नजर रखने के लिए "राष्ट्रीय समन्वय समितियां" बनी हैं। "भारत-मध्य एशिया व्यापार परिषद" और "भारत-मध्य एशिया वार्ता" के जरिए पूरे क्षेत्र से कनेक्टिविटी, व्यापार और संस्कृति को मजबूती मिल रही है।
भारत-उज़्बेकिस्तान संसदीय मैत्री समूह
भारत-उज़्बेकिस्तान संसदीय मैत्री समूह का गठन मार्च 2026 में भारतीय संसद (लोकसभा और राज्यसभा) द्वारा किया गया है। इस समूह का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच विधायी संबंधों को प्रगाढ़ करना और आर्थिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक तथा जन-संबंधी क्षेत्रों में द्विपक्षीय साझेदारी को नई गति प्रदान करना है।
यह मंच दोनों देशों के जनप्रतिनिधियों के बीच नियमित संवाद को बढ़ावा देगा, जिससे साझा चुनौतियों जैसे आतंकवाद और उग्रवाद के समाधान में विधायी अनुभवों का आदान-प्रदान हो सके।
अप्रैल 2025 में ताशकंद में आयोजित अंतर-संसदीय संघ (आईपीयू) की 150वीं सभा के संदर्भ में विशेष स्मारक प्रकाशन उज्बेकिस्तान के विदेश मंत्री बख्तियार सैदोव द्वारा भेंट किया गया है जिसमें उज्बेकिस्तान द्वारा आयोजित अंतर-संसदीय संघ की 150वीं सभा का विस्तृत विवरण शामिल है।
प्रमुख चुनौतियाँ
आर्थिक जुड़ाव कमजोर :- रक्षा-सांस्कृतिक संबंध मजबूत होने के बावजूद व्यापार आंकड़ा 2021-22 में सिर्फ 342 मिलियन डॉलर रहा। क्षमता की तुलना में ये बहुत कम है। इसका मुख्य कारण लॉजिस्टिक्स लागत और जानकारी की कमी है।
भौगोलिक और कनेक्टिविटी बाधा:- उज़्बेकिस्तान भू-आबद्ध है। सीधी हवाई कनेक्टिविटी और समुद्री पहुंच न होने से व्यापार महंगा और धीमा हो जाता है। अभी पाकिस्तान-अफगानिस्तान वाला रास्ता अवरुद्ध है, इसलिए विकल्प सीमित हैं। भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धाचीन ने BRI के तहत मध्य एशिया में बुनियादी ढांचे और निवेश पर बढ़त बना ली है। इससे भारत के लिए क्षेत्र में आर्थिक जगह बनाना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
आगे की राह
आर्थिक साझेदारी का विस्तार:- फार्मा, IT, सोलर, शिक्षा और स्टार्टअप - ये वो क्षेत्र हैं जहां भारत की ताकत और उज़्बेकिस्तान की जरूरत मिलती है। संयुक्त उद्यम और "मेक इन उज़्बेकिस्तान" मॉडल से दोनों को फायदा होगा।
संस्थागत तालमेल:- राष्ट्रीय समन्वय समितियों और भारत-मध्य एशिया वार्ता जैसे मंचों को नतीजा-केंद्रित बनाना होगा। बिजनेस टू बिजनेस संपर्क और नियमित व्यापार मेले जरूरी हैं।
कनेक्टिविटी का गेम-चेंजर: INSTC- उज़्बेकिस्तान का INSTC में शामिल होना सबसे अहम कदम होगा। ईरान के चाबहार पोर्ट + INSTC के जरिए भारत-उज़्बेकिस्तान को सीधा, सस्ता और तेज व्यापार मार्ग मिलेगा। ये चीन के BRI का व्यवहारिक विकल्प भी बनेगा।
निष्कर्ष:
भारत और उज़्बेकिस्तान का रिश्ता सिर्फ फाइलों और समझौतों का नहीं है। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। सिल्क रोड के जमाने में कारवां चलते थे, तो भारत का मसाला और कपड़ा समरकंद पहुंचता था। आज दुनिया बदल गई है। कनेक्टिविटी ही ताकत बन गई है। ऐसे में उज़्बेकिस्तान भारत के लिए "मध्य एशिया का दरवाजा" बन सकता है। रक्षा में साथ, सोलर और ऊर्जा में साझेदारी, फार्मा और IT में निवेश, और कैंपस से कैंपस तक शिक्षा का आदान-प्रदान - यहां संभावनाएं बहुत हैं।
हां, रास्ते अभी आसान नहीं हैं। व्यापार कम है और सीधी उड़ानें कम हैं। लेकिन अगर हम अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) जैसा गलियारा बना लें और सरकारी-कारोबारी तालमेल बढ़ाएं, तो ये दिक्कतें दूर हो सकती हैं। सबसे जरूरी बात - जिस वक्त चीन पूरे क्षेत्र में तेजी से पैर पसार रहा है, उस वक्त भारत-उज़्बेकिस्तान की दोस्ती सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि पूरे इलाके में शांति और संतुलन के लिए भी जरूरी है।
बीपीएससी (BPSC) मुख्य परीक्षा में अंतर्राष्ट्रीय संबंध (IR) GS Paper-2 के खंड-II का एक महत्वपूर्ण और उच्च-स्कोरिंग हिस्सा है। प्रीलिम्स में करेंट अफेयर्स और मेंस दोनों की दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं।









