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भारत की इस्पात नीति 2047: संरक्षणवाद से प्रतिस्पर्धा की ओर

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Written by Dilip Kumar
Published: 3 November 2026•12 min read
भारत की इस्पात नीति 2047: संरक्षणवाद से प्रतिस्पर्धा की ओर
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भारत की स्टील नीति 2047: संरक्षणवाद से प्रतिस्पर्धा की ओर 

UPSC IAS/BPSC | GS Paper 3 | भारतीय अर्थव्यवस्था | औद्योगिक नीति | खनिज संसाधन

हाल ही में भारत के इस्पात मंत्रालय ने Draft National Steel Policy: Vision 2047 प्रस्तुत किया है। इसका मकसद भारतीय इस्पात उद्योग को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना तथा 2047 तक इस्पात निर्यात को 45 मिलियन टन (4.5 करोड़ टन) तक पहुँचाना है। इस मद्देनजर कुछ सवाल भी उभरते हैं जैसे क्या भारत का इस्पात उद्योग वास्तव में कुशल और प्रतिस्पर्धी है, या उसे सरकारी संरक्षण के कारण अधिक लाभ मिल रहा है? विशेषज्ञ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि भारत को इस्पात उद्योग को अत्यधिक संरक्षण देने के बजाय उसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना चाहिए।

आइये , इस ब्लॉग के जरिये भारत के इस्पात उद्योग के वर्तमान और भविष्य पर गौर करते हैं.

सबसे पहले समझते हैं Draft National Steel Policy: Vision 2047 के महत्वपूर्ण बिन्दुओं को । ये हैं: 

  1. उत्पादन क्षमता में वृद्धि: भारत की कच्चे इस्पात की उत्पादन क्षमता को 604 मिलियन टन तक बढ़ाना।
  2. स्टील निर्यात को बढ़ावा: 2047 तक 45 मिलियन टन स्टील निर्यात का लक्ष्य।
  3. कच्चे माल की सुरक्षा: लौह अयस्क का घरेलू उत्पादन बढ़ाना, कोकिंग कोयले पर आयात निर्भरता घटाना तथा विदेशों में खनिज परिसंपत्तियाँ प्राप्त करना।
  4. स्क्रैप आधारित स्टील उत्पादन: स्टील स्क्रैप की उपलब्धता 36 MT से बढ़ाकर 123 MT करने का लक्ष्य तथा स्क्रैप संग्रहण को प्रोत्साहन।
  5. हरित स्टील (Green Steel): 2047 तक इस्पात उत्पादन की CO₂ उत्सर्जन तीव्रता लगभग 39% कम करना। हरित हाइड्रोजन , नवीकरणीय ऊर्जा और CCUS(Carbon Capture, Utilisation and Storage ) तकनीक को बढ़ावा देना।
  6. डिजिटल तकनीक एवं AI: इस्पात उत्पादन, गुणवत्ता, ऊर्जा, उत्सर्जन और लॉजिस्टिक्स में डिजिटल तकनीक तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग बढ़ाना।
  7. औद्योगिक सुरक्षा: इस्पात उद्योग सुरक्षा परिषद्  (SISC) तथा इस्पात उद्योग सुरक्षा निदेशालय  स्थापित करने का प्रस्ताव।

इस विज़न के बिन्दुओं से स्पष्ट होता है कि इसका उद्देश्य भारत के इस्पात उद्योग को 2047 तक विश्व स्तर पर न केवल प्रतिस्पर्धी और आत्मनिर्भर बल्कि आधुनिक और पर्यावरण-अनुकूल बनाना भी है। 

अब बात भारत के इस्पात उद्योग की वर्तमान स्थिति की

दोस्तों, स्टील यानी इस्पात आधुनिक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार है। इसका उपयोग सड़क, रेलवे, पुल, भवन, मशीनरी, रक्षा उपकरण, ऑटोमोबाइल निर्माण जैसे क्षेत्रों में किया जाता है। 

भारत के इस्पात उद्योग की वर्तमान स्थिति देखें तो जहाँ साल 2000 में भारत विश्व का नौवाँ सबसे बड़ा स्टील उत्पादक था और उस दौरान भारत का वैश्विक स्टील उत्पादन में हिस्सा 5% से भी कम था। वहीं आज भारत लगभग 170 मिलियन टन स्टील उत्पादन के साथ विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बना हुआ है। हालाँकि चीन लगभग 961 मिलियन टन उत्पादन के साथ पहले स्थान पर है। 

इस प्रकार भारत ने उत्पादन क्षमता में बड़ी वृद्धि तो की है लेकिन केवल अधिक उत्पादन करना ही वैश्विक प्रतिस्पर्धा का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए । वास्तविक प्रतिस्पर्धा का दरअसल अर्थ है कम लागत, बेहतर गुणवत्ता, अधिक उत्पादकता और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी कीमत पर बिक्री करना।

हम लोगों ने शुरू में ही बात कि कि भारत के इस्पात उद्योग को सरकारी संरक्षण मिलने को लेकर विशेषज्ञ सचेत कर रहे हैं. अतः इस पहलू को समझना जरूरी है.

दरअसल, सरकार घरेलू उद्योग को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए कई प्रकार के उपाय करती है। इसे संरक्षणवाद कहा जाता है। इसका अर्थ है घरेलू उद्योग को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए सरकार द्वारा शुल्क, प्रतिबंध या अन्य सहायता प्रदान करना।

भारत के इस्पात उद्योग को मुख्य रूप से तीन प्रकार से संरक्षण मिलता है।

(क) लौह अयस्क पर निर्यात शुल्क (Export Duty)

इस्पात बनाने के लिए लौह अयस्क (Iron Ore) एक प्रमुख कच्चा माल होता है। भारत में 58% से अधिक लौह कंटेंट वाले लौह अयस्क पर 30% निर्यात शुल्क लगाया जाता है। इससे लौह अयस्क का विदेशों में निर्यात महँगा हो जाता है। वहीं घरेलू बाजार में लौह अयस्क की कीमत अंतरराष्ट्रीय कीमत से कम रहती है। फलस्वरूप भारतीय इस्पात कंपनियों को सस्ता कच्चा माल मिलता है। इसलिए इस्पात कंपनियों का उत्पादन खर्च कम होता है और उनका मुनाफा बढ़ता है। 

दूसरी तरफ, महंगे निर्यात की इस नीति से लौह अयस्क खनन कंपनियों को उनके संसाधनों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। इससे खनन, नई खोज और खनिज संपदा के विकास के लिए प्रोत्साहन कम हो सकता है। इस वजह से खनिज संपन्न राज्यों को भी संभावित आर्थिक लाभ से वंचित होना पड़ता है।

(ख) आयात शुल्क और Safeguard Duty: भारत में विदेशी इस्पात के आयात पर शुल्क लगाया जाता है।

इसके अलावा Safeguard Duty आरोपित की जाती है. यह एक विशेष प्रकार का शुल्क है, जिसे घरेलू उद्योग को अचानक बढ़े हुए आयात से होने वाली गंभीर क्षति से बचाने के लिए लगाया जाता है।

इसे एक आसान उदाहरण से समझा जा सकता है. मान लीजिए जापान से आने वाले इस्पात की कीमत ₹100 है। यदि भारत में लगभग 18% शुल्क लागू होता है, तो उसका आयात मूल्य लगभग ₹118 हो जाएगा । इससे घरेलू इस्पात कंपनियों को विदेशी कंपनियों के मुकाबले कीमत का लाभ मिलता है।

लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि भारत के निर्माण, ऑटोमोबाइल और अन्य उद्योगों को महँगा  इस्पात खरीदना पड़ सकता है।

(ग) Quality Control Orders (QCOs): इन आदेशों के माध्यम से सरकार यह सुनिश्चित करती है कि बाजार में उपलब्ध उत्पाद निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप हों। इस्पात के मामले में QCOs के अंतर्गत कुछ उत्पादों के लिए निर्धारित प्रमाणन और गुणवत्ता संबंधी आवश्यकताएँ पूरी करना जरूरी होता है। इसका उद्देश्य है :

  • खराब गुणवत्ता वाले स्टील को रोकना।
  • उपभोक्ताओं की सुरक्षा करना।
  • भारतीय उद्योग में गुणवत्ता सुधारना।

लेकिन यदि QCOs अत्यधिक व्यापक या अनावश्यक रूप से कठोर हों, तो इससे आयात में रुकावट आती है। 228 स्टील उत्पाद QCO के दायरे में थे। भारत के पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गौबा की अध्यक्षता वाली समिति ने कथित तौर पर 122 उत्पादों को इस सूची से हटाने की सिफारिश की थी, लेकिन उस समय तक केवल 59 उत्पादों को निलंबित किया गया था।

 इसलिए यह जरूरी है कि अनावश्यक QCOs को हटाया जाना चाहिए, जबकि वास्तविक गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों को बनाए रखा जाना चाहिए।

संरक्षणवाद का सबसे बड़ा नुकसान

इस्पात उद्योग को संरक्षण देने का लाभ केवल इस्पात कंपनियों को मिलता है, लेकिन इसका खर्च अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों को उठाना पड़ सकता है। इसे समझने के लिए एक उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए भारत में इस्पात की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में अधिक है। इस स्थिति में:

  • निर्माण कंपनियों को महँगा इस्पात खरीदना पड़ेगा।
  • ऑटोमोबाइल कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ेगी।
  • छोटे और मध्यम उद्योगों की लागत बढ़ेगी।
  • भारतीय उत्पादों की विदेशी बाजारों में प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है।
  • निर्यात करने वाली कंपनियों का लाभ कम हो सकता है।

भारत में घरेलू Hot-Rolled Coil (HRC) इस्पात की कीमत जापान जैसे उच्च लागत वाले देश की तुलना में भी 6–7% अधिक है। Hot-Rolled Coil (HRC) इस्पात को गर्म करके रोलिंग प्रक्रिया से तैयार किया जाता है। इसका उपयोग ऑटोमोबाइल, निर्माण, पाइप और मशीनरी निर्माण में होता है।

निर्माण परियोजनाओं की कुल लागत में इस्पात का हिस्सा लगभग 15% और ऑटोमोबाइल उद्योग के कच्चे माल में इस्पात तथा उससे संबंधित उत्पादों का हिस्सा लगभग 5% है।

क्या संरक्षण हटाने से इस्पात उद्योग को नुकसान होगा?

यदि भारत आयात शुल्क कम करता है और घरेलू इस्पात की कीमत लगभग 6% घटकर जापान के स्तर के करीब पहुँचती है, तो:

  • सबसे बड़ी निजी इस्पात कंपनी की लाभप्रदता लगभग 25% घट सकती है।
  • सबसे बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की इस्पात कंपनी की लाभप्रदता लगभग 50% घट सकती है।
  • तेजी से बढ़ने वाली बड़ी निजी इस्पात कंपनी की लाभप्रदता लगभग 40% घट सकती है।

यह दर्शाता है कि वर्तमान लाभप्रदता का एक हिस्सा सरकारी संरक्षण पर निर्भर हो सकता है।

वहीं यदि लौह अयस्क पर निर्यात शुल्क समाप्त कर दिया जाए और इस्पात कंपनियों को लौह अयस्क अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर खरीदना पड़े, तो:

  • सबसे बड़ी निजी कंपनी की लाभप्रदता लगभग 7% तक घट सकती है।
  • तेजी से बढ़ने वाली निजी कंपनी की लाभप्रदता लगभग 95% तक घट सकती है।
  • सबसे बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी घाटे में जा सकती है।

अतः अभी तक की चर्चा से जाहिर हो रहा है कि भारत में इस्पात उद्योग के संदर्भ में जो लाभ की बात की जा रही है उसके पीछे की  मूल वजह इस उद्योग को मिलने वाला संरक्षण है।

ऐसे में सवाल उठता है कि भारत को 2047 तक वैश्विक स्टील प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए क्या करना चाहिए?

इसका आसान जवाब है कि जो बेवजह संरक्षण मिल रहा है उसे विनियमित किया जाए. इसके लिए निम्नलिखित बिन्दुओं पर गौर करना चाहिए.

(क) आयात शुल्क को धीरे-धीरे कम करना

भारत को अगले पाँच वर्षों में आयात शुल्क को चरणबद्ध तरीके से ASEAN देशों के लगभग 3–4% स्तर तक लाने का प्रयास करना चाहिए।

इससे:

  • विदेशी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
  • घरेलू कंपनियों को लागत कम करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।
  • उपभोक्ता उद्योगों को सस्ता स्टील मिलेगा।
  • भारतीय उद्योगों की निर्यात क्षमता बढ़ सकती है।

    हालाँकि, शुल्क कम करने की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि घरेलू उद्योग अचानक संकट में न आए।

(ख) अनावश्यक QCOs को हटाना

गुणवत्ता नियंत्रण आवश्यक है, लेकिन अनावश्यक गुणवत्ता आदेश व्यापार में बाधा बन सकते हैं।

इसलिए:

  • अनावश्यक QCOs हटाए जाएँ।
  • गुणवत्ता परीक्षण की प्रक्रिया सरल हो।
  • अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रमाणन विकसित किया जाए।
  • गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बनाया जाए।

(ग) लौह अयस्क पर निर्यात शुल्क समाप्त करना: 

उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क पर 30% निर्यात शुल्क समाप्त किया जाना चाहिए। इससे लौह अयस्क उत्पादकों को बेहतर मूल्य मिलेगा। खनन क्षेत्र में निवेश बढ़ सकता है। नई खदानों की खोज को प्रोत्साहन मिलेगा। खनिज संसाधनों का अधिक कुशल उपयोग संभव होगा।

लेकिन इसके लिए घरेलू इस्पात उद्योग को वैश्विक कीमतों के अनुसार उत्पादन लागत प्रबंधन करना होगा।

(घ) खनन नीति में सुधार

भारत की खनिज संपदा की खोज अभी भी सीमित है।

भारत की स्पष्ट भूवैज्ञानिक संभावनाओं (Obvious Geological Potential) में से केवल लगभग 10% का ही अन्वेषण किया गया है।

इसका एक कारण खनन नीति में मौजूद बाधाएँ हैं।

वर्तमान व्यवस्था में नई खदान खोजने वाली कंपनी को भविष्य की नीलामी प्रक्रिया में खदान छोड़नी पड़ सकती है और फिर उसे वापस प्राप्त करने के लिए प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। इससे नई खोज करने वाली कंपनियों के लिए प्रोत्साहन कम हो सकता है।

अतः जरुरत इस बात की है कि नई खदान खोजने वाली कंपनियों को उचित प्रोत्साहन मिले। खनिज अन्वेषण में निजी निवेश बढ़ाया जाए। ऑस्ट्रेलिया जैसे खनिज संपन्न देशों की सफल नीतियों से सीख ली जाए। खनिज संपदा का वैज्ञानिक और सतत उपयोग किया जाए।

इससे भारत की खनन क्षमता और GDP में खनन क्षेत्र का योगदान बढ़ सकता है।

(ड़) सार्वजनिक क्षेत्र की इस्पात कंपनियों में सुधार

भारत में प्रमुख स्टील कंपनियों में SAIL, Tata Steel और JSW शामिल हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की कुछ स्टील इकाइयों के निजीकरण पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। निजीकरण से ना केवल उत्पादन क्षमता में सुधार होगा बल्कि बेहतर प्रबंधन, निवेश में वृद्धि, सरकारी वित्तीय बोझ में कमी और संसाधनों का अधिक कुशल उपयोग भी हो सकेगा 

हालाँकि, रणनीतिक निगरानी और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा भी आवश्यक है।

उदाहरण के तौर पर भारत ने फार्मास्यूटिकल और ऑटोमोबाइल पार्ट्स उद्योगों में आयात शुल्क कम किया, लेकिन इससे उद्योग समाप्त नहीं हुए। इसके बजाय इन क्षेत्रों के निर्यात में वृद्धि हुई। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि कम संरक्षण का अर्थ हमेशा उद्योग का कमजोर होना नहीं होता।

यदि कंपनियों को बेहतर तकनीक, कुशल श्रमिक, उचित निवेश और प्रतिस्पर्धी वातावरण मिलता है, तो वे वैश्विक बाजार में अधिक सफल हो सकती हैं।

बात करते हैं भारतीय इस्पात उद्योग के सामने अन्य चुनौतियों की । इनमे शामिल हैं:

(क) कोकिंग कोयले पर निर्भरता : भारत इस्पात उत्पादन के लिए आवश्यक कोकिंग कोयले का लगभग 90% आयात करता है।

इससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि का असर भारत पर पड़ता है। साथ ही विदेशी आपूर्ति में रुकावट होने पर उत्पादन पर असर पड़ सकता है। इस्पात उत्पादन की लागत बढ़ सकती है। और ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती बनी रहती है।

(ख) विश्व का सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक चीन

यदि चीन में उत्पादन अधिक हो और घरेलू मांग कम हो, तो वह अतिरिक्त इस्पात को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कम कीमत पर बेच सकता है।

इससे भारतीय इस्पात कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है।

(ग) हरित व्यापार अवरोधक(Green Trade Barriers)

वैश्विक व्यापार में अब पर्यावरणीय मानकों का महत्व बढ़ रहा है।

यूरोपीय संघ का Carbon Border Adjustment Mechanism (CBAM) इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। CBAM का उद्देश्य आयातित वस्तुओं के उत्पादन में होने वाले कार्बन उत्सर्जन की लागत को ध्यान में रखना है।

इससे अधिक कार्बन उत्सर्जन वाले इस्पात उत्पादों को यूरोपीय बाजार में अतिरिक्त लागत का सामना करना पड़ सकता है।

इसलिए भारत को भविष्य में निम्नलिखित पर ध्यान देना होगा:

  • Green Steel उत्पादन।
  • ऊर्जा दक्षता।
  • कार्बन उत्सर्जन में कमी।
  • स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग।
  • आधुनिक उत्पादन तकनीक।

अतः भारत को इन चुनौतियों की मद्देनजर अपेक्षित इस्पात नीति पर जोर देना चाहिए चीन

भारत के लिए इस्पात उद्योग का महत्व

इस्पात उद्योग केवल एक औद्योगिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि भारत के आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण आधार है। इसके महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

  • आधारभूत विकास : सड़क, रेलवे, पुल, बंदरगाह और भवन निर्माण में स्टील आवश्यक है।
  • मेक इन इंडिया : घरेलू विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करता है।
  • रोजगार सृजन: खनन, स्टील उत्पादन, परिवहन और निर्माण क्षेत्रों में रोजगार पैदा करता है।
  • रक्षा उत्पादन : रक्षा उपकरणों और सैन्य अवसंरचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • निर्यात संवृद्धि : वैश्विक बाजार में भारत की निर्यात क्षमता बढ़ाता है।
  • आर्थिक संवृद्धि : औद्योगिक विकास और GDP में योगदान देता है।
  • रणनीतिक महत्त्व: राष्ट्रीय अवसंरचना और औद्योगिक सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

निष्कर्ष

भारत ने स्टील उत्पादन में उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन 2047 तक विकसित भारत बनने के लक्ष्य के लिए केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को ऐसा इस्पात उद्योग विकसित करना होगा जो:

  • कम लागत पर उत्पादन करे।
  • अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को पूरा करे।
  • वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सके।
  • अन्य उद्योगों को सस्ता और बेहतर इस्पात उपलब्ध कराए।
  • पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ हो।
  • खनिज संसाधनों का कुशल उपयोग करे।

कुल मिलाकर  संरक्षण से उद्योग को अस्थायी लाभ मिल सकता है, लेकिन दीर्घकालिक वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए दक्षता, नवाचार और खुले प्रतिस्पर्धी वातावरण की आवश्यकता होती है।

Reference: The Indian Express

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