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दुर्लभ ग्राउंड गेको के भविष्य पर खतरा

Learn how the proposed bauxite mining project in Odisha’s Balda Hills threatens the rare Jeypore Ground Gecko.

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Written by Dilip Kumar
Published: 15 October 2026•6 min read
दुर्लभ ग्राउंड गेको के भविष्य पर खतरा
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ओडिशा की बल्दा पहाड़ियों में बॉक्साइट खनन से दुर्लभ गेको पर खतरा

यह टॉपिक पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, खनन, आदिवासी अधिकारों और सतत विकास के बीच के संघर्ष को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है। UPSC और BPSC की प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) तथा मुख्य परीक्षा (Mains) दोनों के लिए इससे प्रश्न बन सकते हैं।

चर्चा में क्यों?

ओडिशा की बल्दा पहाड़ियों (Balda Hills) में बॉक्साइट खनन की प्रस्तावित परियोजना से एक अत्यंत दुर्लभ छिपकली जैसी प्रजाति, जेपोर ग्राउंड गेको (Jeypore Ground Gecko) के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो गया है।

मुख्य बातें

  • ओडिशा के बल्दा पहाड़ी क्षेत्र में गेको के बहुत कम जीवित सदस्य दर्ज किए गए हैं।
  • प्रस्तावित खनन परियोजना से नागेश्वरी आरक्षित वन (Nageswari Reserve Forest) के लगभग 147 हेक्टेयर क्षेत्र पर प्रभाव पड़ने की आशंका है।
  • स्थानीय आदिवासी समुदाय भी खनन परियोजना का विरोध कर रहे हैं।
  • इस मामले में पर्यावरण संरक्षण, खनिज संसाधनों के उपयोग और आदिवासी समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन का प्रश्न उठता है।

बॉक्साइट क्या है? 

बॉक्साइट एक प्रमुख धात्विक खनिज अयस्क (ore) है, जिससे एल्युमिनियम धातु बनाई जाती है। एल्युमिनियम का उपयोग हवाई जहाज, कार, बिजली के तार, पैकेजिंग और अनेक औद्योगिक उत्पादों में होता है।

भारत में बॉक्साइट का महत्त्व

  • एल्युमिनियम उद्योग के लिए आवश्यक कच्चा माल।
  • औद्योगिक विकास और रोजगार का स्रोत।
  • खनिज आधारित अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान।
  • ओडिशा भारत के प्रमुख बॉक्साइट संसाधन वाले राज्यों में से एक है।

गौरतलब है कि यदि खनन के लिए जंगलों को हटाया जाता है या पहाड़ियों की प्राकृतिक संरचना बदल दी जाती है, तो वहाँ रहने वाले दुर्लभ जीवों का आवास नष्ट हो सकता है।

जेपोर ग्राउंड गेको क्या है?

गेको छिपकली के समान एक सरीसृप (reptile) होता है। जेपोर ग्राउंड गेको एक दुर्लभ प्रजाति है, जो पूर्वी घाट के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में पाई जाती है।

इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ हैं:

  • वैज्ञानिक महत्त्व: यह एक दुर्लभ और सीमित भौगोलिक क्षेत्र में पाई जाने वाली प्रजाति है।
  • आवास: चट्टानों की दरारों, पत्थरों के नीचे और सूखी पत्तियों के बीच रह सकती है।
  • आकार:  इसकी लंबाई लगभग 3.6 इंच होती है।
  • व्यवहार: यह मुख्यतः रात्रिचर (nocturnal) है, यानी रात में अधिक सक्रिय रहती है।
  • खतरा: इसके प्राकृतिक आवास में कमी आने से इसके अस्तित्व पर संकट बढ़ सकता है।

यह प्रजाति इतनी खास क्यों है?

 इस गेको को 1878 में दर्ज किया गया था। बाद में इसे लगभग 130 वर्षों तक नहीं देखा गया और इसे संभवतः विलुप्त मान लिया गया। वर्ष 2010 में ओडिशा के कोरापुट जिले में इसे दोबारा खोजा गया। 

इसे IUCN की रेड लिस्ट में संकटापन्न श्रेणी और CITES (the Convention on International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora) के Appendix II में संरक्षण दिया गया है. Appendix II दर्शाता है कि प्रजाति अभी विलुप्त नही हुई है लेकिन यदि अवैध व्यापार को नहीं रोका गया तो ऐसी स्थिति बन सकती है. अतः यह अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर रोक लगाता है.

खनन से होने वाले पाँच प्रमुख खतरे

1. प्राकृतिक आवास का विनाश (Habitat Loss)

खनन के लिए पेड़-पौधे हटाने, चट्टानें तोड़ने और जमीन खोदने से गेको का रहने का स्थान नष्ट हो सकता है।

2. चट्टानों की दरारों का नष्ट होना

यह गेको चट्टानों की दरारों और पत्थरों के नीचे रहता है। ब्लास्टिंग तथा खुदाई से उसके छिपने और प्रजनन के स्थान नष्ट हो सकते हैं।

3. धूल, शोर और कंपन

खनन मशीनों, वाहनों और विस्फोटों से धूल, शोर तथा कंपन बढ़ सकते हैं। इससे गेको और अन्य जीवों का व्यवहार प्रभावित हो सकता है।

4. आवास का विखंडन (Habitat Fragmentation)

यदि जंगल के बीच खनन क्षेत्र बन जाता है, तो जीवों के रहने का स्थान छोटे-छोटे हिस्सों में बँट सकता है। इससे उनके लिए भोजन, सुरक्षित आश्रय और प्रजनन के अवसर कम हो सकते हैं।

5. विलुप्ति का जोखिम

सीमित क्षेत्र में रहने वाली दुर्लभ प्रजातियों के पास दूसरे सुरक्षित स्थान पर जाने के विकल्प कम हो सकते हैं। इसलिए आवास का नुकसान उनकी आबादी के लिए गंभीर साबित हो सकता है।

आवास का नुकसान (Habitat Loss) जैव विविधता के लिए एक बड़ा खतरा माना जाता है। जब किसी प्रजाति का प्राकृतिक घर नष्ट होता है, तो केवल उस प्रजाति को ही नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान हो सकता है।

पूर्वी घाट (Eastern Ghats) का पर्यावरणीय महत्त्व

पूर्वी घाट भारत के पूर्वी हिस्से में फैली पहाड़ियों की एक शृंखला है। यह ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों से संबंधित पहाड़ी भूभागों में फैली हुई है।

इसके प्रमुख पर्यावरणीय महत्त्व निम्नलिखित हैं:

  • जैव विविधता: यहाँ अनेक प्रकार के पौधे, सरीसृप, पक्षी और स्तनधारी पाए जाते हैं।
  • स्थानीय प्रजातियों का संरक्षण: कुछ प्रजातियाँ केवल विशिष्ट क्षेत्रों में पाई जाती हैं।
  • जल संरक्षण: वन और मिट्टी वर्षा के पानी के अवशोषण तथा बहाव को प्रभावित करते हैं।
  • मिट्टी का संरक्षण: वनस्पति मिट्टी के कटाव को कम करने में मदद करती है।
  • आदिवासी आजीविका: कई आदिवासी समुदाय भोजन, औषधीय पौधों और अन्य वन संसाधनों के लिए जंगलों पर निर्भर हैं।

आदिवासी समुदाय खनन परियोजना का विरोध क्यों कर रहे हैं?

बल्दा पहाड़ियों में खनन परियोजना को लेकर स्थानीय आदिवासी समुदायों में भी असंतोष है। 

इस विवाद के तीन प्रमुख पहलू हैं

(क) पारंपरिक भूमि और वन अधिकार

आदिवासी समुदायों का जंगलों से केवल आर्थिक संबंध नहीं होता। जंगल उनकी संस्कृति, परंपरा, आजीविका और सामाजिक जीवन का भी हिस्सा होते हैं।

यदि खनन से उनकी पारंपरिक भूमि और वन संसाधनों पर असर पड़ता है, तो उनकी आजीविका और सांस्कृतिक पहचान प्रभावित हो सकती है।

(ख) ग्राम सभा की भूमिका

अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा और स्थानीय समुदायों की भूमिका विशेष महत्त्व रखती है। वन अधिकार अधिनियम, 2006 के अंतर्गत पात्र समुदायों के वन अधिकारों की पहचान और संरक्षण के प्रावधान हैं।

(ग) विकास बनाम अधिकार

खनन से रोजगार, सरकारी राजस्व और उद्योगों को कच्चा माल मिल सकता है। दूसरी ओर, इससे जंगलों, जल स्रोतों और स्थानीय समुदायों को नुकसान हो सकता है।

इसलिए सही प्रश्न यह नहीं है कि विकास होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि विकास कानूनी, पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ और सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण तरीके से कैसे हो।

सतत विकास (Sustainable Development) से इसका संबंध

सतत विकास का अर्थ है वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करना, लेकिन इस तरह की भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता कम न हो।

ओडिशा की बल्दा पहाड़ियों में प्रस्तावित बॉक्साइट खनन परियोजना जयपुर ग्राउंड गेको जैसी दुर्लभ प्रजाति के भविष्य को लेकर चिंता पैदा करती है।

अतः विकास नीति ऐसी होनी चाहिए जो आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करते हुए पर्यावरणीय स्थिरता, जैव विविधता और सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करे। यही सतत विकास का मूल उद्देश्य है।

निष्कर्ष: 

बल्दा पहाड़ियों का मामला दर्शाता है कि किसी प्राकृतिक क्षेत्र का महत्त्व केवल उसके खनिज संसाधनों से तय नहीं होता। वहाँ रहने वाली दुर्लभ प्रजातियाँ, जंगल और स्थानीय समुदाय भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। 

Reference: The Hindu

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