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FSI रिपोर्ट: आरक्षित वनों में आक्रामक विदेशी प्रजातियां

FSI रिपोर्ट में आरक्षित वनों की आक्रामक विदेशी प्रजातियां, जैवविविधता पर प्रभाव, नियंत्रण उपाय और BPSC परीक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य जानें।

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Written by Akhilesh Anand
Published: 13 August 202612 min read
FSI रिपोर्ट: आरक्षित वनों में आक्रामक विदेशी प्रजातियां
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FSI रिपोर्ट: आरक्षित वनों में विदेशी प्रजातियां

हाल ही में पर्यावरण राज्यमंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने लोकसभा में बताया है कि सरकार अब आरक्षित जंगलों में फैली विदेशी प्रजातियों को हटाने पर गंभीरता से काम कर रही है। इसी कड़ी में भारतीय वन सर्वेक्षण यानी FSI ने देश में सबसे ज्यादा नुकसान करने वाली 45 आक्रामक प्रजातियों की एक फोटो एल्बम तैयार की है। इसका मकसद है कि वनकर्मी और स्थानीय लोग जंगल में इन पौधों को तुरंत पहचान सकें और रिपोर्ट कर सकें।

वहीं भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण यानी BSI ने भी राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण को एक बड़ी रिपोर्ट सौंपी है। इसमें राज्य-वार बताया गया है कि जंगलों और खेतों में कौन-कौन सी विदेशी प्रजातियां फैल रही हैं। इसी रिपोर्ट के आधार पर अब देश के लिए एक राष्ट्रीय प्रबंधन योजना बनाई जाएगी। FSI के अनुसार, अभी आरक्षित वनों में ये विदेशी पौधे कहीं बहुत घने, कहीं थोड़े और कहीं बस इक्का-दुक्का दिख रहे हैं।

आरक्षित वन : सरकार के सीधे और कड़े नियंत्रण में आने वाले सबसे खास और कीमती जंगल होते हैं। यहाँ प्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा को सबसे ऊपर रखा जाता है, इसलिए आम लोगों के लिए नियम बेहद सख्त होते हैं। इन जंगलों में बिना विशेष अनुमति के किसी भी बाहरी व्यक्ति का जाना, पेड़ काटना, शिकार करना या अपने जानवरों को चराना पूरी तरह से मना होता है। इसे आप एक तरह से प्रकृति के लिए "नो-एंट्री ज़ोन" मान सकते हैं, जहाँ पेड़-पौधों और वन्यजीवों को बिना किसी इंसानी दखल के बढ़ने और सुरक्षित रहने का माहौल दिया जाता है।

संरक्षित वन : भी सरकार की देखरेख में ही होते हैं, लेकिन यहाँ के नियम आरक्षित वनों जितने कड़े नहीं होते। इन वनों का मुख्य मकसद जंगल को और ज्यादा बर्बाद होने से बचाना होता है, साथ ही वहाँ के स्थानीय लोगों की ज़रूरतों का भी ख्याल रखा जाता है। यही वजह है कि जंगल के आसपास रहने वाले आदिवासियों या ग्रामीणों को अपनी रोज़ी-रोटी चलाने के लिए सीमित अधिकार दिए जाते हैं। वे सरकारी नियमों के दायरे में रहकर अपनी आजीविका के लिए सूखी लकड़ियाँ इकट्ठा कर सकते हैं, जड़ी-बूटियाँ चुन सकते हैं और अपने पशुओं को वहाँ चरा सकते हैं।

आक्रामक विदेशी प्रजातियां क्या हैं?

आक्रामक विदेशी प्रजातियां वो पौधे, जानवर, कीट या बीमारियां हैं जो "बाहर से आकर" किसी जगह पर बस जाती हैं। ये उस जगह के मूल निवासी नहीं होते।

जैवविविधता पर कन्वेंशन(CBD) के हिसाब से आक्रामक विदेशी प्रजातियां वो हैं जो "बाहर से आती हैं, यहां टिक जाती हैं और फिर बेतहाशा बढ़ जाती हैं।"बढ़ने के बाद ये खाने-पीने और जगह के लिए हमारे देसी पौधों-जानवरों को हरा देती हैं।

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अनुसार जो भी गैर-देसी प्रजाति हमारे जंगल, जानवरों या उनके घर को नुकसान पहुंचाए, उसे आक्रामक विदेशी प्रजाति माना जाएगा।

भारत में सबसे ज्यादा फैलने वाली प्रजातियां:

जानवर: अफ्रीकी कैटफिश और नील तिलापिया - ये मछलियां तालाब की देसी मछलियों का खाना छीन लेती हैं। रेड-बैली पिरान्हा और एलीगेटर गार - खतरनाक शिकारी मछलियां जो नदी का संतुलन बिगाड़ती हैं। रेड-ईयर स्लाइडर कछुआ - अमेरिका से आया ये कछुआ हमारे देसी कछुओं की जगह ले रहा है।
पौधे: लैंटाना - जंगल में फैलकर देसी घास और झाड़ियों को खत्म कर देती है। वाटर हायसिंथ / जलकुंभी - तालाब और नदी को पूरी तरह ढक देती है। प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा / विलायती बबूल - खाली जमीन पर तेजी से कब्जा कर लेता है।

विदेशी प्रजातियों के फैलने के मूल कारण

बहुत पहले अंग्रेजों के समय में कुछ विदेशी पौधों और जानवरों को हमारे देश में जानबूझकर लाया गया था। इन्हें लाने के पीछे दो वजह थीं - पैसा कमाना और जगह को सुंदर बनाना। जैसे विलायती बबूल को 1877 में लाया गया ताकि सूखे इलाकों को हरा-भरा किया जा सके। वहीं लेंटाना या रंगुनिया को 19वीं सदी में इसके खूबसूरत फूलों की वजह से बगीचों की शोभा बढ़ाने के लिए लाया गया।

उसी समय अंग्रेजों ने व्यापार के लिए जंगलों को भी बदलना शुरू कर दिया। पहले जंगल में कई तरह के पेड़-पौधे और जीव एक साथ रहते थे। लेकिन उन्होंने जंगल काटकर उसकी जगह सिर्फ एक ही तरह की फसल लगा दी - जैसे चाय के बागान, सागौन या यूकेलिप्टस के पेड़। इससे जंगल का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया।

देसी पेड़-पौधे खत्म हो गए और जंगल में खाली जगह बन गई। इसी खाली जगह का फायदा उठाकर ये विदेशी प्रजातियां बहुत तेजी से फैल गईं और आज हमारे लिए समस्या बन गई हैं।

अन्य महत्वपूर्ण कारक

कृषि और पानी में बदलाव:- नहर और बोरवेल से जमीन गीली हो गई। इसका फायदा विलायती बबूल जैसे गहरी जड़ वाले पौधों को मिला और वो देसी पौधों से आगे निकल गए। खाद में यूरिया के ज्यादा इस्तेमाल से मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ गई। इससे सेना स्पेक्टाबिलिस जैसी घास देसी पौधों से तेज़ी से बढ़ने लगी।
जानवरों द्वारा ज्यादा चराई:- देश में करीब 50 करोड़ जानवर हैं। ये रोज देसी घास खा जाते हैं जिससे वो कमजोर हो जाती है। इस खाली जगह पर कंटीले और कड़वे पौधे पनप जाते हैं जिन्हें जानवर नहीं खाते, और वो बिना रुके फैलते रहते हैं।
जंगल का टूटना:- सड़क, खनन और शहर बसने से जंगल टुकड़ों में बंट गए। इन टूटे हिस्सों को "किनारा" कहते हैं। इन्हीं किनारों पर आक्रामक प्रजातियां सबसे पहले कब्जा कर लेती हैं, जबकि देसी पेड़ों को बढ़ने में बहुत समय लगता है।
व्यापार और जहाजों से आना :-विदेश से गेहूं और लकड़ी के साथ "फ्री" में बीज भी आ जाते हैं। पार्थेनियम यानी गाजर घास ऐसे ही गेहूं के साथ भारत आई थी। बड़े जहाज मुंबई-विशाखापत्तनम जैसे बंदरगाहों पर गंदा बैलेस्ट पानी छोड़ते हैं। उसी पानी में विदेशी लार्वा और कीट भी आ जाते हैं।
इनकी अपनी ताकत:-देसी पौधे एक जगह के माहौल में ढलते हैं, पर ये विदेशी पौधे गर्मी-सर्दी, सूखा-बारिश हर जगह जी लेते हैं। लैंटाना एक बार में हजारों बीज देती है जो सालों तक जिंदा रहते हैं।
जलकुंभी का सबसे बड़ा फायदा:- भारत में इसे खाने वाले कीट नहीं हैं। इसलिए ये तालाब में चटाई की तरह फैलकर पूरे पानी को ढक देती है।

मूल वनस्पति और जीवों पर असर

IUCN की रेड लिस्ट के हिसाब से हर 10 में से 1 प्रजाति को आज आक्रामक विदेशी प्रजातियों से खतरा है। मतलब हर 10 जानवर-पौधों में 1 की जिंदगी इन "बाहरी मेहमानों" की वजह से खतरे में है।

जंगल का संतुलन बिगड़ जाता है। ये प्रजातियां खाने की कड़ी को तोड़ देती हैं। एक को ज्यादा खाती हैं, दूसरे को बढ़ने ही नहीं देतीं। क्योंकि यहां इनका कोई दुश्मन नहीं होता, इसलिए ये बिना रुके फैलती हैं और पूरे इलाके पर कब्जा कर लेती हैं।

विलुप्त होने की बड़ी वजह:- 17वीं सदी के बाद से जितने भी जानवर विलुप्त हुए हैं, उनमें से लगभग 40% की वजह यही आक्रामक विदेशी प्रजातियां हैं। ये आंकड़ा बताता है कि जैवविविधता खत्म करने में इनका रोल कितना बड़ा है।

केस स्टडी: केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, राजस्थान। यहां की झीलों में अफ्रीकी कैटफिश छोड़ दी गई थी।ये मछली छोटे पक्षियों, मछलियों और प्रवासी पक्षियों के बच्चों तक को खा जाती है। इससे पूरे उद्यान का खाना-पानी वाला चक्र बिगड़ गया है।

आक्रामक विदेशी प्रजातियों की पहचान

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) और उससे जुड़ी संस्थाएं, सक्रिय रूप से आक्रामक विदेशी पौधों की प्रजातियों (आईएपीएस) की पहचान एवं निगरानी करती हैं।

आरक्षित वन और अन्य संरक्षित वन क्षेत्रों में आक्रामक बाहरी पौधों की प्रजातियों को हटाने एवं उन्हें नियंत्रित करने तथा स्थानीय पौधों की प्रजातियों को उगाने का काम संबंधित राज्य सरकारों/केन्द्र - शासित प्रदेशों के प्रशासन और संबंधित एजेंसियां ​​करती हैं।

यह कार्य स्थानीय जरूरतों और मंजूर की गई वन व वन्यजीव प्रबंधन योजनाओं के प्रावधानों के अनुरूप किया जाता है। सरकार टिकाऊ वन प्रबंधन पद्धतियों के जरिए स्थानीय पेड़-पौधों की प्रजातियों के संरक्षण, पुनर्जनन और संवर्धन को बढ़ावा देती है।

आक्रामक विदेशी प्रजातियों के प्रबंधन से जुड़ी पहलें

वैश्विक स्तर पर

CBD - जैविविधता पर अभिसमय:- इसमें अनुच्छेद 8(h) के तहत सभी देशों से कहा गया है कि विदेशी प्रजातियों को देश में आने से रोको, या आ गईं तो उन्हें कंट्रोल करो या खत्म करो। ये दिशा-निर्देश भी देता है कि किसे पहले रोकना है और कैसे मिलकर काम करना है।
कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा - लक्ष्य 6:- इसका टारगेट है कि 2030 तक आक्रामक प्रजातियों से जैविविधता और प्रकृति को होने वाला नुकसान 50% तक कम कर दिया जाए। मतलब 6 साल में आधी समस्या कम करनी है।
IUCN - ISSG और GISD डेटाबेस:-IUCN का स्पेशल ग्रुप दुनिया भर की आक्रामक प्रजातियों की लिस्ट बनाता है। इस डेटाबेस से हर देश जान पाता है कि कौन सी प्रजाति कहां खतरनाक है और उससे कैसे निपटा जाए।
CITES 1975:-ये जानवरों और पौधों के विदेशी व्यापार पर नजर रखता है। ताकि कोई खतरनाक प्रजाति "सजावट" या "व्यापार" के नाम पर देश में तस्करी करके न आ जाए।

भारत-विशिष्ट पहलें

राष्ट्रीय जैवविविधता कार्य योजना – NBAP:-भारत की अपनी योजना है जो आक्रामक प्रजातियों को रोकने और मैनेज करने पर फोकस करती है। राज्य सरकारों के साथ मिलकर देसी जैवविविधता को बचाने का काम करती है।
NAPINVAS - राष्ट्रीय कार्य योजना:-इसे पर्यावरण मंत्रालय ने बनाया है। इसका काम है - प्रजातियों को आने से पहले रोकना, जल्दी पहचानना और फिर कंट्रोल करना। मतलब "पहले बचाव, फिर इलाज" वाली नीति।
NISIC - राष्ट्रीय आक्रामक प्रजाति सूचना केंद्र:- ये एक तरह का हेल्पडेस्क है। यहां किसानों, वैज्ञानिकों और आम लोगों को आक्रामक प्रजातियों की जानकारी मिलती है।जागरूकता और रिसर्च के लिए डेटा भी यहीं से मिलता है।
पादप संगरोध आदेश, 2003:-कृषि विभाग इसे चलाता है। विदेश से आने वाले बीज, पौधे और फल-सब्जी की जांच इसी के तहत होती है।ताकि बीज के साथ "बीमारी" या खरपतवार हमारे खेतों में न आ जाए।

राष्ट्रीय वन नीति, 1988 का लक्ष्य

राष्ट्रीय वन नीति, 1988 का मुख्य लक्ष्य पर्यावरण को स्थिर रखना और देसी प्रजातियों से वृक्षारोपण करके जंगल बढ़ाना है। राष्ट्रीय कार्य योजना 2023 में आक्रामक प्रजातियों को हटाने, खराब जंगलों को दोबारा बसाने और जल-संभर प्रबंधन पर जोर दिया गया है। हर जगह स्थानीय पेड़ लगाने से मिट्टी की नमी बचेगी, भूजल बढ़ेगा और पूरा इकोसिस्टम मजबूत होगा।

आक्रामक विदेशी प्रजातियों को रोकने के लिए जरूरी कदम

हवाई अड्डे और बंदरगाहों पर क्वारंटाइन सेंटर को एक्स-रे स्कैनर और DNA टेस्ट से लैस किया जाए। ताकि सामान में छिपे बीज या कीड़े के लार्वा पकड़े जा सकें।

जहाजों के लिए बेलास्ट वाटर मैनेजमेंट कानून को सख्ती से लागू किया जाए। जहाज भारत के पानी में गंदा पानी छोड़ने से पहले उसे साफ करें।

"ग्रीनिंग एंड ब्राउनिंग एटलस ऑफ इंडिया" जैसी सैटेलाइट मैप का इस्तेमाल हो।

अगर किसी जंगल में अचानक "हरियाली" बढ़े तो वो असली पेड़ नहीं, लैंटाना या विलायती बबूल का हमला हो सकता है। उसे तुरंत पकड़ा जाए।

जैविक तरीका: जिस देश से प्रजाति आई है, वहां से उसके "दुश्मन" कीट या फफूंद लाकर उसे कंट्रोल किया जाए। लेकिन बहुत सावधानी से, ताकि वो खुद समस्या न बन जाए।

प्रजाति हटाने के बाद जमीन खाली न छोड़ें। तुरंत नीम या देसी घास लगाएं। वरना खाली जगह पर फिर से वही आक्रामक पौधा आ जाएगा।

गांव के लोग और वन रक्षक सबसे पहले जंगल देखते हैं। उन्हें मोबाइल ऐप देकर ट्रेन किया जाए ताकि वो दिखते ही फोटो भेज सकें।

आदिवासी और स्थानीय लोगों का ज्ञान सबसे बड़ा हथियार है। उनकी मदद से कौन सा पौधा कहां से उखाड़ना है, ये सबसे अच्छे से पता चलता है।

भारतीय वन सर्वेक्षण - FSI के बारे में

1. भारतीय वन सर्वेक्षण यानी FSI, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत देश का सबसे बड़ा वन डेटा देने वाला संगठन है। इसकी स्थापना 1 जून 1981 को हुई थी और इसका मुख्यालय देहरादून, उत्तराखंड में है। 2. FSI का मुख्य काम है देश भर के जंगलों और पेड़ों पर नजर रखना। ये हर 2 साल में उपग्रह की तस्वीरों और जमीन पर सर्वेक्षण के आधार पर "भारत वन स्थिति रिपोर्ट - ISFR" जारी करता है। 3. इसी रिपोर्ट से हमें पता चलता है कि देश में वन आवरण और वृक्ष आवरण कितना बढ़ा या घटा।इसके अलावा FSI सरकार की मदद के लिए e-Green Watch पोर्टल भी चलाता है। इससे जंगलों में चल रही सरकारी परियोजनाओं की निगरानी होती है और जंगल में आग जैसी आपात स्थिति का भी तुरंत पता चल जाता है। 4. आसान शब्दों में कहें तो FSI हमारे जंगलों का "हेल्थ चेकअप रिपोर्ट" बनाता है ताकि देश की योजनाएं और पर्यावरण नीतियां सही डेटा के साथ बन सकें।

भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण - BSI के बारे में

1. भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण यानी BSI पर्यावरण मंत्रालय के तहत देश का सबसे पुराना पौधा विज्ञान वाला संगठन है। इसकी स्थापना 1890 में हुई थी और इसका मुख्यालय कोलकाता, पश्चिम बंगाल में है। देश भर में इसके 9 क्षेत्रीय केंद्र भी काम करते हैं। 2. BSI का काम है देश के जंगली पौधों को खोजना, उनकी पहचान करना और लिस्ट बनाना। खासकर उन इलाकों में जो बहुत ज्यादा जैव विविधता वाले या नाजुक हैं। 3. ये राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर की "फ्लोरा" यानी पौधों की किताबें भी प्रकाशित करता है। इसके अलावा BSI उन पौधों को चिन्हित करता है जो खत्म होने के कगार पर हैं, और उन्हें बचाने के लिए वनस्पति उद्यानों में उगाता है। 4. ये आदिवासियों और स्थानीय लोगों का पौधों से जुड़ा पारंपरिक ज्ञान भी इकट्ठा करता है। साथ ही देश भर के पौधों का एक बड़ा राष्ट्रीय डेटाबेस बनाता है, जिसमें हर्बेरियम, फोटो और जीवित नमूने रखे जाते हैं। 5. अगर FSI जंगलों का "हेल्थ चेकअप" करता है, तो BSI जंगलों के अंदर लगे हर पौधे की "पहचान और रिकॉर्ड" रखता है।

निष्कर्ष

आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ आज भारत की जैविविधता के लिए सबसे बड़ा छुपा हुआ खतरा बन गई हैं। पहले इन्हें कमाई और सुंदरता के लिए लाया गया, पर आज ये देसी पौधों-जानवरों का खाना, घर और पानी सब छीन रही हैं।अगर समय रहते इन्हें बंदरगाहों पर ही रोका न गया, जंगलों में जल्दी पहचाना न गया और गांव-समुदाय को साथ न जोड़ा गया, तो आने वाले समय में हमारे जंगल, खेत और नदियां सिर्फ 4-5 तरह की विदेशी प्रजातियों से भर जाएंगे। इसलिए इस संकट का समाधान तभी संभव है जब सरकार, समाज और विज्ञान तीनों मिलकर काम करेंगे। रोकथाम पर पैसा खर्च करना, जल्दी पता लगाना और देसी प्रकृति को वापस लाना ही हमें इस "हरित संकट" से बचा सकता है, क्योंकि जंगल बचेंगे तभी हमारा भविष्य बचेगा।

भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) की रिपोर्ट और वनों से जुड़े पर्यावरणीय मुद्दे (जैसे आरक्षित वनों में विदेशी प्रजातियां) मुख्य रूप से BPSC परीक्षा (प्रारंभिक और मुख्य) के पर्यावरण, पारिस्थितिकी और भूगोल के पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं।

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