El Niño 2026: चरम आना बाकी !
चर्चा में क्यों?
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने दुनिया के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान तथा सूखा और बाढ़ जैसी मौसमी घटनाओं के बढ़ते जोखिम की चेतावनी दी है। दरअसल, अल नीनो की स्थिति दिसंबर, 2026 के आसपास चरम पर पहुँच सकती है और इसका प्रभाव फरवरी 2027 तक बना रह सकता है।
भारत के लिए इसे महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अल नीनो भारतीय मानसून को प्रभावित कर सकता है। इससे खेती, जल उपलब्धता, खाद्य उत्पादन और महँगाई पर असर पड़ सकता है।
El Niño क्या है?
प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय हिस्से का पानी जब सामान्य से अधिक गर्म होने लगता है, तो इस जलवायु घटना को अल नीनो कहते हैं। सामान्य स्थिति में पूर्वी प्रशांत महासागर से गर्म पानी पश्चिम की ओर, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ, धकेला जाता है। अल नीनो के दौरान यह व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है और गर्म पानी पूर्वी प्रशांत में अधिक जमा होने लगता है।
इससे समुद्र और वायुमंडल के बीच ऊर्जा का आदान-प्रदान बदलता है और दुनिया के अनेक हिस्सों में मौसम प्रभावित होता है।
उदाहरण के तौर पर जैसे किसी कमरे में एक जगह तापमान बदलने से हवा का प्रवाह बदल सकता है, वैसे ही प्रशांत महासागर के तापमान में बदलाव से दूर-दूर के क्षेत्रों में वर्षा और तापमान के पैटर्न बदल सकते हैं।
El Niño कैसे बनता है?

इसे तीन चरणों में समझा सकता है
चरण 1: सामान्य स्थिति
व्यापारिक पवनें (Trade Winds) पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं। ये गर्म सतही पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ ले जाती हैं।
चरण 2: पवनें कमजोर होती हैं
गर्म पानी का पश्चिम की ओर जाना कम हो जाता है और मध्य तथा पूर्वी प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म होने लगता है।
चरण 3: मौसम का पैटर्न बदलता है
समुद्र के ऊपर हवा का दबाव, बादलों का निर्माण और वर्षा का वितरण बदलता है। इसका असर भारत समेत दुनिया के कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
यह समुद्र और वायुमंडल के बीच होने वाली प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है।
El Niño, La Nina और ENSO में अंतर
| आधार | अल नीनो | ला नीना |
| समुद्र का तापमान | सामान्य से अधिक गर्म | सामान्य से अधिक ठंडा |
| व्यापारिक पवनें | सामान्यतः कमजोर | सामान्यतः मजबूत |
| वर्षा का पैटर्न | प्रशांत क्षेत्र में पूर्व की ओर खिसक सकता है | सामान्य पैटर्न के विपरीत दिशा में खिसक सकता है |
| भारत का मानसून | कमजोर होने की संभावना बढ़ सकती है | बेहतर मानसून की संभावना बढ़ सकती है |
ENSO का पूरा नाम: El Niño–Southern Oscillation। यह प्रशांत महासागर में समुद्र के तापमान और वायुमंडलीय दबाव तथा पवनों के बीच होने वाले परस्पर बदलावों की प्रणाली है। इसकी तीन अवस्थाएँ हैं—अल नीनो, ला नीना और न्यूट्रल।
भारत पर अल नीनो का क्या प्रभाव पड़ सकता है?
(क) भारतीय मानसून
अल नीनो भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून को कमजोर कर सकता है। इससे सामान्य से कम वर्षा और सूखे का जोखिम बढ़ सकता है।
(ख) कृषि उत्पादन
धान, दालें और वर्षा पर निर्भर दूसरी फसलें प्रभावित हो सकती हैं। सिंचाई की लागत बढ़ सकती है और किसानों की आय घट सकती है।
(ग) जल संकट
कम वर्षा से जलाशयों, भूजल और पीने के पानी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है।
(घ) महँगाई
फसल उत्पादन घटने पर कुछ खाद्य पदार्थों की आपूर्ति कम हो सकती है, जिससे उनकी कीमतें बढ़ सकती हैं।
(ङ) गर्मी और स्वास्थ्य
पहले से गर्म परिस्थितियों के साथ अल नीनो वैश्विक तापमान को और बढ़ा सकता है। इससे कुछ क्षेत्रों में लू और गर्मी से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।
NOAA के अनुसार, ENSO वैश्विक तापमान, वर्षा, कृषि, जंगल की आग और मत्स्य संसाधनों को प्रभावित कर सकता है।
भारत का सन्दर्भ
- 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से लगभग 13% कम वर्षा के साथ समाप्त हुआ।
- इसे 2001 के बाद चौथा सबसे कम वर्षा वाला मानसून बताया गया है।
- महाराष्ट्र और कर्नाटक में सूखे की स्थिति घोषित किए जाने का उल्लेख है।
- महाराष्ट्र के कुछ जिलों में पानी की कटौती लागू की गई।
क्या अल नीनो से दुनिया में हर जगह सूखा पड़ता है?
नहीं। इसका प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों में अलग होता है।
| क्षेत्र | संभावित प्रभाव |
| भारत और कुछ दक्षिण एशियाई क्षेत्र | कम वर्षा और सूखे का जोखिम |
| इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया | कुछ क्षेत्रों में शुष्क परिस्थितियाँ |
| पेरू और इक्वाडोर | अधिक वर्षा और बाढ़ का जोखिम |
| दुनिया के कई हिस्से | सामान्य से अधिक तापमान |





