डीप ओशन मिशन
हाल ही में पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में डीप ओशन मिशन की प्रगति को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि भारत के स्वदेशी मानव-युक्त सबमर्सिबल MATSYA-6000 का डिजाइन और सिस्टम इंजीनियरिंग का कार्य पूरा हो चुका है। यह सबमर्सिबल भारत को 6000 मीटर तक की गहराई में जाकर गहरे समुद्र की खोज और अनुसंधान करने में सक्षम बनाएगा।
साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि हिंद महासागर के लिए लहरों, समुद्र-स्तर और चक्रवातों की बेहतर भविष्यवाणी करने वाले नए मॉडल विकसित किए गए हैं। ये मॉडल तटीय क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन को मजबूत करने और मछुआरों की सुरक्षा बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएंगे। इस प्रकार डीप ओशन मिशन न केवल तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है, बल्कि समुद्री सेवाओं को भी ज्यादा सटीक और उपयोगी बना रहा है।
डीप ओशन मिशन क्या है?
डीप ओशन मिशन (DOM) पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की एक महत्वाकांक्षी योजना है। इसका लक्ष्य गहरे समुद्र की खोज के लिए अपनी तकनीक और क्षमता बनाना है। ‘डीप ओशन मिशन’ प्रधानमंत्री की विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सलाहकार परिषद के 9 मिशनों में से भी एक है। इसे भारत सरकार द्वारा 2021 में शुरू की गई थी, जिसमें छह अलग-अलग क्षेत्रों में गतिविधियां शामिल हैं।
ये क्षेत्र हैं:
- गहरे समुद्र में खनन, मानव-युक्त सबमर्सिबल और पानी के नीचे काम करने वाले रोबोटिक्स के लिए तकनीक का विकास,
- समुद्र और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी सलाह देने वाली सेवाओं का विकास,
- गहरे समुद्र की जैव-विविधता की खोज और संरक्षण के लिए तकनीकी इनोवेशन,
- गहरे समुद्र का सर्वेक्षण और खोज,
- समुद्र से ऊर्जा और मीठा पानी प्राप्त करना, और
- समुद्री जीव विज्ञान के लिए आधुनिक मरीन स्टेशन की स्थापना।
इस मिशन के तहत होने वाली शोध और गतिविधियों का उद्देश्य भारत की 'ब्लू इकोनॉमी' को विकसित करने के पायलट परियोजना के भाग के तौर पर समुद्र के जीवित और निर्जीव संसाधनों (जैसे जैव-विविधता, पॉलीमेटैलिक नोड्यूल्स, पॉलीमेटैलिक सल्फाइड्स और समुद्री थर्मल ऊर्जा) की खोज करना और उनका इस्तेमाल करना है।
डीप ओशन मिशन की प्रमुख उपलब्धियां
डीप ओशन मिशन का मकसद भारत को गहरे समुद्र की तकनीक और संसाधनों में आत्मनिर्भर बनाना है। अब तक हुई अहम प्रगति:-
| मानवयुक्त सबमर्सिबल और खनन- | भारत का अपना सबमर्सिबल MATSYA-6000 तैयार है। इसका डिजाइन पूरा हो चुका है और जनवरी-फरवरी 2025 में चेन्नई के पास वेट हार्बर ट्रायल भी किए गए। वैज्ञानिकों ने अगस्त 2025 में फ्रांस के सबमर्सिबल के साथ ट्रेनिंग भी ली। साथ ही खुद से चलने वाली डीप-सी माइनिंग मशीन का डिजाइन पूरा हुआ और 2024 में अंडमान सागर में 1173 मीटर गहराई से 100 किलो से ज्यादा कोबाल्ट वाले नोड्यूल्स निकालकर दिखाए गए। |
| समुद्री जलवायु और चेतावनी प्रणाली- | हिंद महासागर के लिए लहर, समुद्र-स्तर और चक्रवात के बेहतर मॉडल बने हैं। INCOIS ने 11 ग्लाइडर मिशन पूरे किए और समुद्र की निगरानी के लिए 60 वेव ड्रिफ्टर्स व 92 आर्गो फ्लोट्स लगाए। |
| जैव विविधता और माइक्रोब्स- | गहरे समुद्र से 2038 तरह के माइक्रोब्स अलग किए गए, जिनमें कई ऐसी प्रजातियां हैं जो पहले हिंद महासागर में नहीं मिली थीं। आंध्र में मरीन माइक्रोबियल रिपॉजिटरी बन रही है। CM LRE ने 31 सीमाउंट्स का सर्वे कर 201 गहरे समुद्री प्रजातियों को दर्ज किया, जिनमें 43 नई हो सकती हैं। |
| सर्वेक्षण और नया रिसर्च पोत- | भारतीय रिज में 4 हाइड्रोथर्मल वेंट फील्ड मिले, और भारत ने पहली बार एक सक्रिय वेंट की तस्वीर ली। GRSE कोलकाता में एक नया स्वदेशी ओशन रिसर्च वेसल बन रहा है जिसका डिजाइन और काम शुरू हो चुका है। |
| ऊर्जा और पानी- | बड़ी क्षमता वाले OTEC आधारित डिसेलिनेशन प्लांट की विस्तृत रिपोर्ट तैयार है। |
| शोध स्टेशन और सहयोग- | चेन्नई के नेमेली में नया मरीन स्टेशन बन रहा है। देशभर के 70 संस्थानों के साथ मिलकर 145 संयुक्त समुद्री शोध परियोजनाएं चल रही हैं। कुल मिलाकर डीप ओशन मिशन भारत को तकनीक, ऊर्जा, जैव-संसाधन और जलवायु समझ में मजबूत कर रहा है। |
इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी (आईएसए)
गहरे समुद्र में संसाधनों की खोज और उनके इस्तेमाल के लिए, इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी (आईएसए) के माइनिंग कोड के ड्राफ्ट में समुद्री पर्यावरण की सुरक्षा के लिए कड़े उपाय शामिल किए गए हैं।
इनमें एहतियाती तरीका, पर्यावरण से जुड़े शुरुआती अध्ययन, पर्यावरण पर पड़ने वाले असर का आकलन (ईआईए), पर्यावरण प्रबंधन और निगरानी कार्यक्रम, और हालात के हिसाब से बदलाव करने वाले प्रबंधन के उपाय शामिल हैं।
भारत, इन सुरक्षा उपायों को तैयार करने के लिए ISA द्वारा अपनाए गए विचार-विमर्श के तरीके में हिस्सा लेता है। आईएसए ने अभी तक माइनिंग कोड को मंजूरी नहीं दी है।
डीप ओशन अन्वेषण में प्रमुख चुनौतियाँ
गहरे समुद्र की दुनिया रोमांचक तो है, पर आसान बिल्कुल नहीं। यहां वैज्ञानिकों के सामने कई बड़ी दिक्कतें आती हैं।
| जबरदस्त समुद्री दबाव:- | गहराई बढ़ने के साथ दबाव भी हजारों किलो प्रति वर्ग मीटर तक पहुंच जाता है। सामान्य उपकरण इस दबाव में तुरंत चकनाचूर हो जाते हैं, इसलिए खास मजबूत डिजाइन चाहिए। |
| उपकरणों का डिजाइन:- | यहां इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनें अंतरिक्ष से भी ज्यादा मुश्किल हालात में काम करती हैं। लवणता, संक्षारण और ठंड के कारण कोई भी कमजोर पुर्जा जल्दी खराब हो जाता है। |
| लैंडिंग और आवाजाही:- | समुद्र तल कीचड़ और दलदल जैसा होता है। भारी सबमर्सिबल या माइनिंग मशीनों का वहां टिकना और चलना बहुत मुश्किल होता है। |
| ऊर्जा और सामग्री निकालना:- | समुद्र तल से खनिजों को ऊपर पंप करके लाना बहुत ज्यादा बिजली मांगता है। साथ ही इतनी गहराई में केबल और पंपिंग सिस्टम बनाना भी चुनौती है। |
| संचार और दृश्यता:- | की कमीपानी में रेडियो/विद्युत चुंबकीय तरंगें काम नहीं करतीं, इसलिए दूर से रिमोट वाहन चलाना मुश्किल है। और प्राकृतिक रोशनी कुछ मीटर के बाद खत्म हो जाती है, इसलिए सब अंधेरे में करना पड़ता है। |
| अन्य कारक:- | तापमान में भारी बदलाव, उच्च लवणता और संक्षारण जैसी चीजें हर उपकरण और मिशन को और जटिल बना देती हैं। |
| नोट: | इन्हीं वजहों से संयुक्त राष्ट्र ने 2021-2030 को 'समुद्र विज्ञान का दशक' घोषित किया है, ताकि दुनिया मिलकर इन चुनौतियों का हल निकाले। |
आगे की राह
गहरे समुद्र की चुनौतियों से निपटने के लिए हमें सोच और तकनीक दोनों बदलनी होगी:
| जैविक रूप से प्रेरित डिजाइन – बायोमिमिक्री:- | समुद्री जीव लाखों सालों से गहरे समुद्र के दबाव और अंधेरे में जी रहे हैं। उनके शरीर और संरचना से सीखकर हम ऐसे सबमर्सिबल और रोबोट बना सकते हैं जो ज्यादा लचीले और टिकाऊ हों। |
| ऊर्जा नवाचार:- | लंबे मिशनों के लिए बैटरी पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। इसलिए OTEC यानी समुद्री तापीय ऊर्जा, ज्वार और लहरों से बिजली जैसी टिकाऊ ऊर्जा तकनीकों पर काम करना होगा। |
| मल्टी-सेंसर एकीकरण:- | गहराई में रोशनी नहीं होती, इसलिए सिर्फ कैमरे से काम नहीं चलेगा। सोनार, लिडार और अन्य इमेजिंग तकनीकों को मिलाकर एक "स्मार्ट आंख" बनानी होगी, जिससे नेविगेशन और मैपिंग बेहतर हो। |
| पर्यावरणीय प्रभाव पर ध्यान:- | गहरे समुद्र का इकोसिस्टम बहुत नाजुक है। इसलिए खनन और अन्वेषण ऐसे हों जिससे जीव-जंतुओं को कम से कम नुकसान हो। इसके लिए सख्त अंतर्राष्ट्रीय नियम और नैतिक गाइडलाइंस बनाना जरूरी है। |
निष्कर्ष
डीप ओशन मिशन भारत के लिए सिर्फ विज्ञान का प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि भविष्य की ऊर्जा, संसाधन और जलवायु सुरक्षा की कुंजी है। गहरे समुद्र में अपार संभावनाएं हैं - खनिज, नई दवाएं, जैव विविधता और साफ ऊर्जा। लेकिन साथ में दबाव, अंधेरा और तकनीकी चुनौतियां भी हैं। इसलिए बायोमिमिक्री, टिकाऊ ऊर्जा, बेहतर सेंसर और पर्यावरण-संतुलित नीतियों के साथ आगे बढ़ना जरूरी है। अगर हम इसे सही तरीके से कर पाते हैं, तो डीप ओशन मिशन भारत को "ब्लू इकोनॉमी" में आत्मनिर्भर बनाएगा।
‘डीप ओशन मिशन’ विज्ञान एवं प्रौधोगिकी से संबंधित टॉपिक हैं और यह बीपीएससी (BPSC) मुख्य परीक्षा (Mains) में शामिल सामान्य अध्ययन प्रपत्र-2 से सीधी तौर पर जुड़ा हुआ है। इसके अलावा करेंट अफेयर्स की दृष्टिकोण से प्रीलिम्स(PT) के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।









