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भारत-मलेशिया संबंध

भारत-मलेशिया संबंधों में व्यापार, रक्षा, डिजिटल सहयोग, ASEAN और इंडो-पैसिफिक की भूमिका व प्रमुख चुनौतियों को जानें।

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Written by Akhilesh Anand
Published: 21 August 20264 min read
भारत-मलेशिया संबंध
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भारत-मलेशिया संबंध

चर्चा में क्यों है?

हाल ही में लोक प्रशासन और शासन सुधारों के क्षेत्र में सहयोग पर भारत-मलेशिया संयुक्त कार्य समूह (JWG) की दूसरी बैठक आयोजित की गई। बैठक का फोकस डिजिटल सरकार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्लाउड सेवाएं, साझा डिजिटल अवसंरचना, साइबर सुरक्षा, ब्लॉकचेन, डेटा-आधारित निर्णय लेने और कनेक्टेड सरकार जैसे विषयों पर था।

इसका मुख्य लक्ष्य सरल, तेज और अधिक नागरिक-केंद्रित सार्वजनिक सेवाएं देना है। साथ ही भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग (ITEC) कार्यक्रम के तहत चल रहे क्षमता निर्माण सहयोग पर भी चर्चा हुई।

भारत-मलेशिया के द्विपक्षीय संबंध

ऐतिहासिक संबंध बहुत गहरे हैं। ये रिश्ते चोल काल 9वीं-13वीं शताब्दी से जुड़े हैं, जब दक्षिण भारत और मलय प्रायद्वीप के बीच समुद्री व्यापार होता था। राजराज चोल प्रथम और राजेंद्र चोल द्वितीय के समय चोल नौसेना की शक्ति दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैली, जिसमें आज का मलेशिया भी शामिल था।

आर्थिक साझेदारी भी मजबूत है। मलेशिया ASEAN में भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। द्विपक्षीय व्यापार 2024-25 में 19.86 बिलियन USD तक पहुंच गया। दोनों देश अब INR और रिंगित में व्यापार को बढ़ावा दे रहे हैं ताकि डॉलर पर निर्भरता कम हो। आर्थिक सहयोग का आधार MICECA और AITIGA समझौते हैं।

रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देश हरिमौ शक्ति, समुद्र लक्ष्मण और उदारशक्ति जैसे संयुक्त अभ्यास करते हैं। मलेशिया-भारत सुरक्षा संवाद के जरिए सहयोग पर चर्चा होती है। मलेशिया तेजस LCA और ब्रह्मोस मिसाइल के लिए एक संभावित बड़ा बाजार भी है।

रणनीतिक रूप से मलेशिया भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी का अहम स्तंभ और इंडो-पैसिफिक में एक महत्वपूर्ण सहयोगी है। यह ASEAN-भारत संबंधों को दिशा देने में भी बड़ी भूमिका निभाता है। दक्षिण चीन सागर में नियम-आधारित व्यवस्था बनाए रखने के लिए मलेशिया जैसे देशों से रिश्ते मजबूत करना जरूरी है। प्रवासी समुदाय रिश्तों की एक और कड़ी है। मलेशिया में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा भारतीय मूल का समुदाय 27 लाख लोग रहते हैं, जिनमें ज्यादातर तमिलनाडु से हैं।

भारत-मलेशिया संबंधों में मुख्य चुनौतियाँ

स्थायी व्यापार घाटा:-वित्त वर्ष 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार लगभग 20 बिलियन USD रहा, लेकिन यह मलेशिया के पक्ष में असंतुलित है। भारत मुख्यतः पाम ऑयल, इलेक्ट्रॉनिक्स और क्रूड ऑयल जैसी उच्च-मूल्य वस्तुओं का आयात करता है, जबकि मांस, एल्यूमिनियम और पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात उतनी तेजी से नहीं बढ़ा।
“पाम ऑयल” की कूटनीति और अस्थिरता:-मलेशिया भारत को पाम ऑयल का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। यह निर्भरता कभी-कभी राजनीतिक हथियार बन जाती है। 2019-20 में मतभेदों के कारण भारत ने मलेशियाई पाम ऑयल के आयात सीमित कर दिए थे। साथ ही वनों की कटाई जैसे मुद्दों पर सतत उत्पादन को लेकर बढ़ती वैश्विक निगरानी से भविष्य में लागत और व्यापार में जटिलता आ सकती है।
राजनीतिक और कूटनीतिक संवेदनशीलताएँ:-पूर्व मलेशियाई नेताओं द्वारा अनुच्छेद 370 और CAA पर की गई टिप्पणियों से तनाव पैदा हुआ था। 2019 में UNGA में मलेशिया ने कश्मीर पर भारत पर आरोप भी लगाया था। वर्तमान नेतृत्व का रुख रचनात्मक है, लेकिन अविश्वास के निशान अभी बाकी हैं।
चीन कारक” और भू-राजनीति:-चीन मलेशिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और BRI के तहत ईस्ट कोस्ट रेल लिंक जैसी परियोजनाओं में निवेशक भी है। दोनों देश नौसैनिक मार्गों की स्वतंत्रता चाहते हैं, लेकिन दक्षिण चीन सागर को लेकर अंतर है। मलेशिया चीन के प्रति शांतिपूर्ण-कूटनीतिक रुख रखता है, जबकि भारत क्वाड के साथ बीजिंग के विस्तारवाद के खिलाफ सख्त रुख का समर्थन करता है।

भारत-मलेशिया संबंधों को बेहतर बनाने हेतु सुझाव

रक्षा को एक स्तंभ बनाना:-सैन्य-से-सैन्य सहयोग को गहरा किया जाए और भारत मलेशिया के लिए विश्वसनीय रक्षा आपूर्तिकर्ता बने। तेजस और ब्रह्मोस जैसे प्लेटफॉर्म सहयोग क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ रणनीतिक संतुलन दे सकते हैं।
सांस्कृतिक सॉफ्ट पावर का उपयोग:-तमिल भाषा के प्रति “साझा स्नेह” और यूनिवर्सिटी ऑफ मलाया में तिरुवल्लुवर सेंटर के जरिए जन-जन का जुड़ाव बढ़ाया जा सकता है। इससे संबंध केवल सरकारी स्तर तक सीमित नहीं रहेंगे।
समुद्री क्षेत्र जागरूकता (MDA):-मलक्का जलडमरूमध्य से भारत का 60% व्यापार गुजरता है। भारत को मलेशिया को अपने IFC-IOR सूचना संलयन केंद्र नेटवर्क में शामिल करना चाहिए ताकि शत्रुतापूर्ण नौसैनिक गतिविधियों की रियल-टाइम खुफिया जानकारी साझा हो सके।
व्यापार असंतुलन को ठीक करना:-वर्तमान घाटे को कम करने के लिए 2026-27 तक AITIGA समीक्षा को तेज करना होगा। इससे उत्क्रमी शुल्क संरचनाओं को ठीक किया जा सकेगा और भारतीय विनिर्माण को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही पाम ऑयल के लिए G2G दीर्घकालिक अनुबंध से भारत में मूल्य स्थिरता और मलेशिया में मांग की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।

निष्कर्ष

भारत-मलेशिया संबंधों का भविष्य सिर्फ तेल खरीदने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसे "साथ में चिप्स और जेट बनाने" वाली रणनीतिक साझेदारी में बदलना होगा। ऐसा करके दोनों देश अस्थिर इंडो-पैसिफिक शताब्दी में अपनी स्वायत्तता और सुरक्षा को मजबूत कर सकते हैं।

Reference:-
  1. https://www.pib.gov.in/PressReleaseDetail.aspx?PRID=2301237&reg=48&lang=2

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