भारत-आर्मेनिया संबंध
चर्चा में क्यों है?
हाल ही में भारत और आर्मेनिया के रिश्ते एक बार फिर सुर्खियों में आए हैं। दरअसल भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने आर्मेनिया की आधिकारिक यात्रा की है। इस दौरान भारत और आर्मेनिया के रक्षा मंत्रालयों के बीच एक समझौता ज्ञापन MoU पर दस्तखत हुए। इसका उद्देश्य संयुक्त सहयोग, नवाचार और अनुसंधान को बढ़ावा देना है।
इसके अलावा एक अहम फैसला और हुआ। दोनों देशों ने अपनी सेनाओं के बीच 'संयुक्त सेवा स्टाफ वार्ता' को नियमित बनाने के लिए 'कार्य-शर्तों' का भी आदान-प्रदान किया। यदि सीधी तौर पर कहें तो अब भारत और आर्मेनिया की सेनाएं भविष्य में तय समय पर बैठकर रणनीति और सहयोग पर बात करेंगी।
आर्मेनिया, पश्चिमी एशिया और काकेशस क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण देश है। रक्षा सहयोग बढ़ाकर भारत न सिर्फ अपने रक्षा निर्यात को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि इस संवेदनशील क्षेत्र में अपनी मौजूदगी भी मजबूत कर रहा है।
एतिहासिक संबंध
भारत और आर्मेनिया के रिश्ते बहुत पुराने हैं। साहित्यिक साक्ष्यों के मुताबिक आर्मेनिया में भारतीय बस्तियाँ 149 ईसा पूर्व से मौजूद थीं। कहा जाता है कि थॉमस काना 780 ईस्वी में मालाबार तट पर पहुंचने वाले पहले अर्मेनियाई थे।
मुगल काल में अर्मेनियाई व्यापारी आगरा आए। सम्राट अकबर उनकी व्यापारिक ईमानदारी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें विशेषाधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और सरकारी पद दिए। यहीं की एक रानी मरियम ज़मानी बेगम को भी अर्मेनियाई मूल की माना जाता है। मध्य युग में आर्टाशात, मेट्सबिन और ड्विन जैसे शहर भारत के साथ कीमती पत्थर, जड़ी-बूटियों और वस्त्रों के व्यापार के केंद्र बन गए।
17वीं सदी में भारत में अर्मेनियाई समुदाय का आकार और प्रभाव तेजी से बढ़ा। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ व्यापार किया और बंदूक बनाने, छपाई जैसे शिल्पों में योगदान दिया। कलकत्ता के अर्मेनियाई शिक्षा और कानून के क्षेत्र में भी आगे रहे। भारतीय शास्त्रीय गायिका गोहर जान अर्मेनियाई मूल की थीं। 1794 में मद्रास से "अज़दारार" दुनिया की पहली अर्मेनियाई भाषा की पत्रिका प्रकाशित हुई।
1773 में शाहामिर शाहामिरियन ने स्वतंत्र आर्मेनिया के पहले संविधान का मसौदा भी यहीं से प्रस्तुत किया। भारत की आजादी के बाद ज्यादातर अर्मेनियाई ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका चले गए। अब भारत में बचा समुदाय मुख्यतः कलकत्ता, मुंबई, दिल्ली, आगरा और चेन्नई में है।
कलकत्ता का नाज़रेथ का पवित्र चर्च 1707 में बना और अर्मेनियाई कॉलेज एवं परोपकारी अकादमी आज भी उनकी पहचान है। सोवियत युग में डॉ. राधाकृष्णन और इंदिरा गांधी ने आर्मेनिया का दौरा किया। और 26 दिसंबर 1991 को भारत ने स्वतंत्र आर्मेनिया को सबसे पहले मान्यता देने वाले देशों में से एक बनकर इस पुरानी दोस्ती को नई दिशा दी।
भारत और आर्मेनिया के रिश्ते सिर्फ आज के नहीं हैं। दोनों के बीच सक्रिय राजनीतिक संबंध हैं और संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी हम एक-दूसरे का साथ देते आए हैं।
कैसे शुरू हुई नई शुरुआत?
1991 में जब सोवियत संघ टूटा और आर्मेनिया एक स्वतंत्र देश बना, तो भारत ने सबसे पहले उससे हाथ मिलाया। 1992 में दोनों देशों के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित हुए। और फिर 1999 में येरेवन में भारत का दूतावास खुला, जिसने रिश्तों को और मजबूती दी।
दिलचस्प बात ये है कि अगर आर्मेनिया-भारत के संबंधों को "उत्कृष्ट" कहा जाए तो गलत नहीं होगा। आर्मेनिया CIS देशों में अकेला ऐसा देश है जिसके साथ भारत के 1995 में ही राजनयिक संबंध थे - रूस को छोड़कर।
CIS यानी स्वतंत्र राज्यों का राष्ट्रमंडल 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद बना था। आज इसके सदस्य हैं - अज़रबैजान, आर्मेनिया, बेलारूस, कज़ाखस्तान, किर्गिज़स्तान, मोल्दोवा, रूस, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज़्बेकिस्तान और यूक्रेन। इस दोस्ती को कानूनी रूप 1995 में हुई "मित्रता और सहयोग संधि" से मिला।
भू-राजनीतिक महत्व और नई साझेदारी
इस घटनाक्रम का बड़ा भू-राजनीतिक महत्व है। दक्षिण काकेशस में रूस की पारंपरिक भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं और ऐसे समय में आर्मेनिया अपने सुरक्षा ढांचे में विविधता लाकर भारत जैसे साझेदारों के साथ संबंध गहरे कर रहा है। वहीं भारत भी रक्षा सहयोग के जरिए यूरोप, पश्चिम एशिया और मध्य एशिया को जोड़ने वाले इस रणनीतिक क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति बना रहा है।
उदयपुर स्थित उसानास फाउंडेशन के अभिनव पांड्या के मुताबिक, नया समझौता रिश्ते को सिर्फ "खरीदार-विक्रेता" से आगे ले गया है। अब इसमें संयुक्त प्रशिक्षण, जंगल युद्ध और सैन्य अभियानों में विशेषज्ञता साझा करना, साथ ही खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान भी शामिल है। इस दिशा में शुरुआत पहले ही हो चुकी है। मई 2024 में दोनों देशों की पहली रक्षा परामर्श बैठक हुई और 2024-25 के लिए सहयोग योजना बनी।
इसके बाद एक संयुक्त कार्य समूह ने 2026 तक का सहयोग कार्यक्रम तैयार किया, जिसमें उच्च-स्तरीय दौरे, सैन्य शिक्षा, युद्ध अभ्यास, सैन्य-तकनीकी सहयोग और अनुभवों का आदान-प्रदान शामिल है। संक्षेप में, नया जनरल स्टाफ तंत्र सिर्फ प्रशासनिक नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि भारत और आर्मेनिया बदलते यूरेशियन सुरक्षा माहौल में एक-दूसरे को दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार के रूप में देख रहे हैं।
रक्षा संबंध
आर्मेनिया के साथ भारत का रक्षा रिश्ता पिछले कुछ सालों में काफी तेजी से बढ़ा है। इसकी नींव 2020 के नागोर्नो-काराबाख युद्ध से पहले ही पड़ गई थी, जब आर्मेनिया ने भारतीय सैन्य उपकरणों में रुचि दिखाई थी।
2020 में स्वाति रडार की डील--आर्मेनिया ने भारत से 40 मिलियन डॉलर का सौदा किया। इसके तहत भारत ने आर्मेनिया को 4 'स्वाति' वेपन लोकेटिंग रडार WLR सप्लाई किए। ये रडार दुश्मन की तोपों और मोर्टार की लोकेशन तुरंत बता देते हैं।
अक्टूबर 2022 - बड़ी हथियार डीलभारत और आर्मेनिया ने मिसाइल, रॉकेट और गोला-बारूद के निर्यात के लिए एक बड़ा समझौता किया। इसमें सबसे खास है भारत का स्वदेशी पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर।
ये रॉकेट सिस्टम कम समय में दुश्मन के बड़े इलाके को निशाना बना सकता है। आगे की संभावना भारत, आर्मेनिया को अपनी MPATGM यानी मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल भी निर्यात कर सकता है। ये कंधे पर रखकर चलाई जाने वाली टैंक-रोधी मिसाइल है और पहाड़ी इलाकों के लिए बहुत कारगर है।
पहले भारत रक्षा के लिए बड़े देशों पर निर्भर था। अब भारत खुद एक रक्षा निर्यातक बनकर उभरा है। आर्मेनिया के साथ ये डील सिर्फ व्यापार नहीं है, ये रणनीतिक भरोसे की निशानी भी है। भारत के "मेक इन इंडिया" हथियार अब दुनिया में अपनी जगह बना रहे हैं, और आर्मेनिया उन शुरुआती भरोसेमंद साझेदारों में से एक है।
2020 के बाद बदली तस्वीर और भारत को फायदा
2020 में नागोर्नो-काराबाख संघर्ष में आर्मेनिया को अज़रबैजान से हार झेलनी पड़ी। इसके बाद उसका आर्थिक और राजनीतिक अलगाव और गहरा गया। इस दौरान आर्मेनिया का कमजोर बुनियादी ढांचा उसके लिए रुकावट बन गया। इसी वजह से वह चीन की बेल्ट एंड रोड पहल में शामिल नहीं हो पाया, और चीन का निवेश भी येरेवन की जगह बाकू की ओर चला गया।
यही स्थिति भारत के लिए अवसर बन गई। आर्मेनिया ने अपने वाणिज्यिक और राजनीतिक संबंधों में विविधता लाने के लिए विकासशील एशियाई देशों, खासकर भारत के साथ जुड़ना शुरू किया। हाल के वर्षों में आर्मेनियाई प्रवासी समुदाय और येरेवन सरकार के सक्रिय प्रयासों की वजह से भारत और आर्मेनिया के बीच मजबूत राजनीतिक संबंध भी विकसित हुए हैं।
आपूर्ति शृंखला और अर्थव्यवस्था: नए गलियारे, नए अवसर
आर्मेनिया सिर्फ रक्षा के लिहाज से ही नहीं, बल्कि आर्थिक और व्यापारिक दृष्टि से भी भारत के लिए एक अहम साझेदार बन सकता है। इसकी सबसे बड़ी वजह है इसकी भौगोलिक स्थिति। आर्मेनिया उस यूरेशियन कॉरिडोर के बीच में पड़ता है जो फारस की खाड़ी से होते हुए रूस और यूरोप तक जाता है।
ऐसे में यह वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं की प्रतिस्पर्धा में एक संभावित "हब" या केंद्र बन सकता है, जहाँ से भारत अपना माल यूरोप और मध्य एशिया तक आसानी से पहुंचा सके।इसके अलावा आर्मेनिया, कृषि, फार्मास्यूटिकल्स, विनिर्माण और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में भी भारत के साथ मिलकर काम कर सकता है।
भारत की तरक्की और तकनीक के साथ आर्मेनिया की जरूरतें काफी हद तक मेल खाती हैं, इसलिए यहाँ सहयोग की बड़ी गुंजाइश है। सबसे अहम बात ये है कि भारत-आर्मेनिया का ये आर्थिक जुड़ाव, चीन के कर्ज वाले "बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव" मॉडल के लिए एक भरोसेमंद और संतुलित विकल्प दे सकता है।
और ये भी तय है कि आर्मेनिया द्वारा भारतीय रक्षा उपकरणों की बढ़ती खरीद से न सिर्फ हमारे रक्षा संबंध मजबूत होंगे, बल्कि भारत में सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्र के रक्षा विनिर्माण को भी सीधा फायदा मिलेगा।
भारत के लिए आर्मेनिया का महत्व
भारत के लिए आर्मेनिया सिर्फ एक छोटा देश नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से बहुत अहम साझेदार है। पहला कारण है अखिल-तुर्कवाद का मुकाबला। तुर्की की मंशा अंकारा के नेतृत्व में एक बड़े तुर्की साम्राज्य की है, जिसमें सभी तुर्की-भाषी देश शामिल हों।
नागोर्नो-काराबाख संघर्ष में भारत ने आर्मेनिया को सैन्य उपकरण देकर खुलकर उसका साथ दिया है। इससे भारत ने अप्रत्यक्ष रूप से तुर्की, अज़रबैजान और उनके सहयोगी पाकिस्तान की विस्तारवादी सोच को भी जवाब दिया है।दूसरा बड़ा पहलू भू-राजनीतिक है।
पाकिस्तान पहले से ही अज़रबैजान को सेना और हथियारों की मदद दे रहा है, और बदले में अज़रबैजान पाकिस्तान को रणनीतिक फायदा पहुंचाता है। अगर अज़रबैजान आर्मेनिया पर हावी हो गया, तो पाकिस्तान और मजबूत हो जाएगा।
साथ ही तुर्की, अज़रबैजान और पाकिस्तान के जरिए चीन तक एक सीधा रास्ता बन सकता है, जिसका इस्तेमाल कश्मीर सीमा तक सैन्य सामान पहुंचाने में भी हो सकता है। इसलिए भारत आर्मेनिया की मदद करके न सिर्फ एक दोस्त देश को बचा रहा है, बल्कि काकेशस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी और दक्षिण एशिया की सुरक्षा दोनों को मजबूत कर रहा है।
आर्थिक सहयोग
आर्थिक सहयोग के लिहाज से आर्मेनिया भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी बन सकता है। यह भारत समर्थित INSTC यानी अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कॉरिडोर और ईरान समर्थित काला सागर-फारस की खाड़ी कॉरिडोर दोनों में अहम भूमिका निभा सकता है।
इससे भारत को यूरोप और मध्य एशिया तक सामान पहुंचाने का एक छोटा और वैकल्पिक रास्ता मिलेगा।
आगे की राह
आर्मेनिया-भारत सहयोग को विकसित लोकतंत्रों के साथ जुड़ाव का हिस्सा बनाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए उच्च-स्तरीय और संतुलित कूटनीति जरूरी होगी।
आज अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की संरचना तेजी से बदल रही है, जिससे नए खतरे और नए अवसर दोनों पैदा हो रहे हैं। ऐसे में आर्मेनिया को अपने विदेशी संबंधों का विविधीकरण करना होगा। पश्चिमी देश इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। अगर भारत और आर्मेनिया समान लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर साथ आएं, तो यह सहयोग आधुनिकीकरण, संस्थागत मजबूती और राष्ट्रीय रक्षा को सुदृढ़ करने में मददगार साबित होगा।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, भारत-आर्मेनिया संबंध आज एक नए और मजबूत चरण में पहुंच गए हैं। ऐतिहासिक मित्रता और साझा लोकतांत्रिक मूल्यों की नींव पर अब रक्षा, अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति तीनों स्तरों पर सहयोग बढ़ रहा है। रक्षा के क्षेत्र में हथियारों की डील और तकनीकी साझेदारी, आर्थिक मोर्चे पर INSTC जैसे कॉरिडोर में भूमिका, और रणनीतिक रूप से अखिल-तुर्कवाद का मुकाबला - ये सभी दिखाते हैं कि दोनों देश एक-दूसरे के लिए कितने अहम हैं। आगे चलकर अगर भारत और आर्मेनिया उच्च-स्तरीय कूटनीति और विविध साझेदारियों के साथ आगे बढ़ें, तो यह रिश्ता न सिर्फ दोनों देशों को फायदा पहुंचाएगा, बल्कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में स्थिरता और संतुलन का भी एक नया मॉडल बन सकता है।










