प्रश्न
भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची में उल्लिखित दलबदल विरोधी कानून पर संक्षेप में चर्चा करें।
आदर्श उत्तर
10वीं अनुसूची, जिसे आमतौर पर 'दल-बदल विरोधी कानून' के रूप में जाना जाता है, को 1970 के दशक में शुरू हुए बड़े पैमाने पर दल-बदल को रोकने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा संविधान के 52वें संशोधन (1985) के माध्यम से भारतीय संविधान में जोड़ा गया था। इस कानून का उद्देश्य निर्वाचित जन प्रतिनिधियों को निजी लाभ के लिए राजनीतिक दलों को बदलने से रोकना है।
10वीं अनुसूची में दल-बदल के आधार पर सांसदों और विधायकों को अयोग्य ठहराने से जुड़े निम्नलिखित प्रावधान शामिल हैं:
अयोग्यता के आधार (अनुच्छेद 102 और 191, भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची को किसी भी सदस्य को अयोग्य ठहराने का अधिकार देते हैं)
यदि कोई निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से किसी राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है।
यदि वह सदन में अपने राजनीतिक दल द्वारा जारी किसी निर्देश (व्हिप) के विपरीत मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है।
यदि कोई सदस्य निर्दलीय निर्वाचित होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
यदि कोई मनोनीत सदस्य 6 महीने की अवधि समाप्त होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
दल-बदल के आधार पर अयोग्यता से जुड़े सवालों पर फैसला लेने का अधिकार सदन के अध्यक्ष या सभापति के पास होता है, और उनका फैसला अंतिम होता है।
इस अनुसूची के तहत अयोग्यता से जुड़ी सभी कार्यवाही को संसद या राज्य विधानमंडल की कार्यवाही माना जाता है।
दल-बदल विरोधी कानून के तहत छूट
अगर किसी राजनीतिक दल के दो-तिहाई विधायक किसी दूसरी पार्टी में विलय करने का फैसला करते हैं, तो न तो दूसरी पार्टी में शामिल होने वाले विधायकों को और न ही मूल पार्टी में बने रहने वाले विधायकों को अयोग्य ठहराया जाएगा।
अध्यक्ष या सभापति के पद पर चुना गया कोई भी व्यक्ति अपनी पार्टी से इस्तीफा दे सकता है, और यदि वह अपना पद छोड़ देता है, तो वह वापस अपनी पार्टी में शामिल हो सकता है।
पहले कानून के तहत पार्टियों का विभाजन हो सकता था, लेकिन अब इसे गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया है।
निर्णय लेने का अधिकार
दल-बदल के कारण अयोग्यता से जुड़ा कोई भी सवाल सदन के पीठासीन अधिकारी (यानी लोकसभा में अध्यक्ष और राज्यसभा में सभापति) द्वारा तय किया जाता है।
इस कानून के संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने इसे और अधिक प्रभावी और निष्पक्ष बनाने के प्रयास किए हैं। किहोतो होलोहन मामले (1992) में अपने फैसले के जरिए, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दल-बदल को लेकर पीठासीन अधिकारी का फैसला अंतिम नहीं होगा, बल्कि उस पर न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
दल-बदल विरोधी कानून के तहत फैसला लेने के लिए कोर्ट ने कोई समय-सीमा तय नहीं की है। हालांकि, कोर्ट ने पीठासीन अधिकारी द्वारा फैसला लेने में की जा रही अनावश्यक देरी पर चिंता जताई है।
यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से अपनी सदस्यता छोड़ देता है, तो उसे उसके आचरण के आधार पर अयोग्य ठहराया जा सकता है।
दल-बदल विरोधी कानून (1985) ने निश्चित रूप से दल-बदल की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने, राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने, जनादेश का सम्मान करने और भारतीय लोकतंत्र में दलीय व्यवस्था का महत्व बनाए रखने की दिशा में कई प्रयास किए हैं। लेकिन, विशेष रूप से छोटे और क्षेत्रीय दलों के मामले में, और कुछ राज्यों के संदर्भ में, यह कानून पूरी तरह से प्रभावी नहीं रहा है। इसका परिणाम यह हुआ है कि राजनीतिक अस्थिरता बनी रही है और बार-बार सत्ता में अनावश्यक बदलाव देखने को मिले हैं।


