प्रश्न
‘संविधानवाद’ और ‘संवैधानिक नैतिकता’ की व्याख्या कीजिए।
आदर्श उत्तर
संविधानवाद और संवैधानिक नैतिकता आधुनिक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के दो स्तंभ हैं। जहाँ संविधानवाद इस विचार का प्रतीक है कि सरकार की शक्ति सीमित, जवाबदेह और संविधान के ढाँचे के भीतर ही होनी चाहिए, वहीं संवैधानिक नैतिकता उस नैतिक मर्यादा का प्रतिनिधित्व करती है, जो संस्थाओं और नागरिकों को संविधान के मूल्यों, भावनाओं और उच्चतर उद्देश्यों को बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन करती है।
सर्वोच्च न्यायालय ने मनोज नारुला बनाम भारत संघ (2014) मामले में कहा है कि "संवैधानिक नैतिकता का अर्थ है संविधान के नियमों को पालन करना और ऐसे व्यवहार से बचना जो कानून के नियमों का उल्लंघन करे।" वहीं, नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इसी सिद्घांत का हवाला देते हुए तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 377 की व्याख्या करते हुए सहमति आधारित समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक नैतिकता सामाजिक पूर्वाग्रहों से ऊपर होनी चाहिए।

डॉ. बी.आर. अम्बेडकर के अनुसार, संवैधानिक नैतिकता का अर्थ होगा विभिन्न लोगों के परस्पर विरोधी हितों के बीच प्रभावी समन्वय तथा किसी भी कीमत पर अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए काम करने वाले विभिन्न समूहों के बीच बिना किसी टकराव के उन्हें सौहार्दपूर्ण ढंग से हल करने के लिए प्रशासनिक सहयोग।

संविधानवाद और संवैधानिक नैतिकता मिलकर एक लोकतांत्रिक राज्य की नैतिक और संरचनात्मक रीढ़ बनते हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतंत्र में दोनों का सामंजस्यपूर्ण व्यवहार न केवल अधिकारों की रक्षा के लिए बल्कि संवैधानिक संस्कृति के पोषण के लिए भी आवश्यक है। अंततः एक संविधान तभी स्थायी रह सकता है, जब संविधानवाद के माध्यम से उसका सम्मान किया जाए और संवैधानिक नैतिकता के माध्यम से उसकी आत्मा को अक्षुण्ण रखा जाए।




