केरल के पारंपरिक सुरंगम
Eduteria Insights · 30 Oct 2026
चर्चा में क्यों?
केरल के कासरगोड जिले की आठ ग्राम पंचायतें पारंपरिक जल-संरक्षण प्रणाली ‘सुरंगम’ (Surangam) को पुनर्जीवित करने की योजना बना रही हैं।
इसका मुख्य उद्देश्य भूजल का पुनर्भरण करना(restoration), वर्षा जल का संरक्षण करना और सूखे के समय पानी की उपलब्धता बनाए रखना है।
इस परियोजना में केंद्रीय भूजल बोर्ड (Central Ground Water Board—CGWB) के केरल क्षेत्रीय कार्यालय के विशेषज्ञों ने सुरंगों की बहाली, संरक्षण और वैज्ञानिक रखरखाव पर संबंधित अधिकारियों के साथ चर्चा की है।
महत्त्वपूर्ण तथ्य
सुरंगम केरल की एक पारंपरिक भूमिगत जल-संग्रह प्रणाली है। इसमें लेटेराइट (Laterite) चट्टानों वाली पहाड़ियों के अंदर क्षैतिज दिशा में सुरंगें बनाई जाती हैं, जिनसे प्राकृतिक रूप से रिसने वाला भूजल(ground water) बाहर निकलता है।
सुरंगम की प्रमुख विशेषताएँ
क्षैतिज सुरंगें: इन्हें पहाड़ी के अंदर क्षैतिज दिशा में खोदा जाता है।
प्राकृतिक जल प्रवाह: भूजल के रिसाव से पानी सुरंग में प्रवेश करता है।
कम ऊर्जा की आवश्यकता: अनुकूल परिस्थितियों में पानी को प्राकृतिक गुरुत्व(natural gravity) के कारण बाहर लाया जा सकता है।
स्थानीय तकनीक: यह स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों और पारंपरिक ज्ञान पर आधारित है।
जल संरक्षण: इससे स्थानीय समुदायों को पानी उपलब्ध कराने और जल संसाधनों का बेहतर उपयोग करने में मदद मिल सकती है।
भारत की अन्य पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियाँ
सुरंगम (Surangam): केरल: विशेषकर कासरगोड पहाड़ियों में क्षैतिज सुरंग बनाकर भूजल एकत्र करना
आहर-पाइन (Ahar-Pyne): बिहार:जल संग्रहण और नहरों के माध्यम से सिंचाई
जोहड़ (Johad):राजस्थान: वर्षा जल का संग्रहण और भूजल पुनर्भरण
कुल्ह (Kuhl) : हिमाचल प्रदेश: पहाड़ी जलधाराओं से पानी को खेतों तक पहुँचाना
जाबो (Zabo): नागालैंड: जल संरक्षण को कृषि, पशुपालन और वन संरक्षण से जोड़ना
बांस ड्रिप सिंचाई: मेघालय: बाँस की नलियों से पानी पहुँचाकर सिंचाई करना
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