धारावी - एशिया की विशालतम गंदी बस्ती (स्लम)

भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुहे एवं समस्याएँ

पर्यावरण प्रदूषण
पर्यावरण प्रदूषण मानवीय क्रियाकलापों के अपशिष्ट उत्पादों से मुक्त द्रव्य एवं ऊर्जा का परिणाम है। प्रदूषण के अनेक प्रकार हैं। प्रदूषकों के परिवहित एवं विसरित होने के माध्यम के आधार पर प्रदूषण को निम्नलिखित प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है- (i) जल प्रदूषण, (ii) वायु प्रदूषण, (iii) भू-प्रदूषण, (iv) ध्वनि प्रदूषण।
जल प्रदूषण
बढ़ती हुई जनसंख्या और औद्योगिक विस्तारण के कारण जल के अविवेकपूर्ण उपयोग से जल की गुणवत्ता का बहुत अधिक निम्नीकरण हुआ है। नदियों, नहरों, झीलों तथा तालाबों आदि में उपलब्ध जल शुढ़ नहीं रह गया है। इसमें अल्प मात्रा में निलांबित कण, कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थ समाहित होते है। जब जल में इन पदार्थों की सांद्रता बढ़ जाती है तो जल प्रदूषित हो जाता है और इस तरह वह उपयोग के योग्य नहीं रह जाता। ऐसी स्थिति में जल में स्वतः शुढ़्रीकरण की क्षमता जल को शुढ़ नहीं कर पाती।

यद्यापि, जल प्रदूषण प्राकृतिक स्रोतों (अपरदन, भू-सखलन और पेड़-पौधों तथा मृत पशु के सड़ने-गलने आदि) से प्राप्त प्रदूषकों से भी होता है, तथापि मानव क्रियाकलापों से उत्पन्न होने वाले प्रदूषक चिंता के वास्तविक कारण हैं। मानव, जल को उद्योगों, कृषि एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से प्रदूषित करता है। इन क्रियाकलापों में उद्योग सर्वाधिक महत्वपूर्ण सहायक है।
| प्रदूषण प्रकार | सनिहित प्रदूषण | प्रदूषण के स्त्रोत |
| वायु प्रदूषण | सल्फर के ऑक्साइड ( , ) नाइट्रोजन ऑक्साइड,कार्बन मोनोओक्साइड, हाइड्रो कार्बन, अमोनिया, सीसाएल्डेहाइड्स एस्वेस्टोज्ञ एवं बेरिलियम | कोयले, पेट्रोल व डीजल का दहन (जलना), औद्योगिक प्रक्रम, ठोस कचरा निपटान, वाहित मल (जल-मल) निपटान आदि |
| जल प्रदूषण | बदबू, घुलित एवं निल्बित ठोस कण, अमोनिया तथा यूरिया,नाइट्रेट एवं नाइट्राइट्स, क्लोराइड्स, फ्लोराइड्स, कार्बोनेट्स,तेल एवं ग्रीस (चिकनाई), कीटनाशकों एवं पीड़कनाशी के अवशेष, टैंनिन, कोलीफार्म एम पी एम (जीवाणु गणना),सल्फेट्स एवं सल्फाइड्स, भारी धातुएँ जैसे कि सीसा,आर्सेनिक, पारा, मैंगनीज्ञ आदि रेडियोधर्मी पदार्थ तत्व | वाहित मल निपटान, नगरीय वाही जल, उद्योगों के विषाक्त कृष्चित भूमि के ऊपर से बहता जल बहिःस्नाव तथा नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र |
| भू-प्रदूषण | मानव एवं पशु मलादि विषाणु तथा जीवाणु तथा रोगवाहक विरलन कीटनाशक एवं उर्वरक अवशिष्ट क्षारीयता,फ्लोराइड्स, रेडियोधर्मी पदार्थ। | अनुचित मानव क्रियाकलाप, अनुपचारित औद्योगिक अपशिष्ट का निपटान, पीड़कनाशी एवं उर्वरकों का उपयोग। |
| ध्वनि प्रदूषण | सहन क्षमता से अधिक ऊँङ्ची ध्वनि का स्तर | वायुयान, मोटर-वाहन, रेलगाड्डियाँ, औद्योगिक प्रक्रम तथा विज्ञापन मीडिया |
उत्पादन प्रक्रिया में, उद्योग अनेक अवाँछित उत्पाद पैदा करते हैं जिनमें औद्योगिक कचरा, प्रदूषित अपशिष्ट जल, जहरीली गैसें, रासायनिक अवशेष, अनेक भारी धातुएँ, धूल, धुओँ आदि शामिल होता है। अधिकतर औद्योगिक कचरे को बहते जल में अथवा झीलों आदि में विसर्जित कर दिया जाता है। परिणामस्वरूप विषाक्त रासायनिक तत्व जलाशयों, नदियों तथा अन्य जल भंडारों में पहुँच जाते हैं जो इन जलों में रहने वाली जैव प्रणाली को नष्ट करते है। सर्वाधिक जल प्रदूषक उद्योग-चमड़ा, लुगदी व कागज्ञ, वस्त्र तथा रसायन हैं।
आधुनिक कृषि में विभिन्न प्रकार के रासायनिक पदार्थों का उपयोग होता है जैसे कि अकार्बनिक उर्वरक, कीटनाशक, खरपतवार नाशक आदि भी प्रदूषण उत्पादन करने वाले घटक हैं। इन रसायनों को नदियों, झीलों तथा तलाबों में बहा दिया जाता है। यह सभी रसायन जल के माध्यम में जमीन में स्रवित होते हुए भू-जल तक पहुँच जाते हैं। उर्वरक धरातलीय जल में नाइट्रेट की मात्रा को बढ़ा देते हैं। भारत में तीर्थ यात्राओं, धार्मिक मेले व पर्यटन आदि जैसी सांस्कृतिक गतिविधियाँं भी जल प्रदूषण का कारण हैं। भारत में, धरातलीय जल के लगभग सभी स्रोत संदूषित हो चुके हैं और मानव के उपयोग के योग्य नहीं है।
| नदी एवं राज्य | प्रदृषित पटरियाँ | प्रदृषण की प्रकृति | मुख्य प्रदूषक |
| गंगा (उत्तर प्रदेश, बिहार व प. बंगाल) | (अ) कानपुर का अनुप्रवाह (ब) वाराणसी का अनुप्रवाह (स) फरक्का बाँध | 1. कानपुर जैसे नगरों से औद्योगिक प्रदूषण।2. नगरीय केंद्रों का घरेलू अपशिष्ट नदी में लाशों का विसर्जन। | कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, पटना तथा कोलकाता जैसे नगर घरेलू कचरे को नदी में निर्मुक्त करते हैं। |
| यमुना (दिल्ली एवं उत्तर प्रदेश) | (अ) दिल्ली से चंबल के मिलन तक (ब) मथुरा व आगरा | 1. हरियाणा व उत्तर प्रदेश द्वारा पानी का सिंचाई हेतु निर्गमन।2. कृषि गतिविधियों के कारण यमुना जल में उच्च स्तर पर सूक्ष्म प्रदूषकों का प्रवाह।3. दिल्ली का घरेलू एवं औद्योगिक कचरे का नदी में प्रवाहित करना। | दिल्ली का अपने घरेलू अपशिष्ट को नदी में डालना। |

जल प्रदूषण विभिन्न प्रकार की जल जनित बीमारियों का एक प्रमुख स्रोत होता है। संदूषित जल के उपयोग के कारण प्रायः दस्त (डायरिया), ऑँतों के कृमि, हेपेटाइटिस जैसी बीमारियाँ होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट दर्शाती है कि भारत में लगभग एक-चौथाई संचारी रोग जल-जनित होते हैं।
यद्यापि नदी प्रदूषण सभी नदियों से संबंधित है, लेकिन गंगा नदी जो भारत के घनी आबादी बाले क्षेत्रों में से होकर बहती है, का प्रदूषण सभी के लिए चिंता का विषय है। गंगा नदी की स्थिति में सुधार के लिए, राष्ट्रीय स्तर पर गंगा सफ़ाई राष्ट्रीय अभियान शुरू किया गया था। वर्तमान ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम इसी से संबंधित है।
वायु प्रदूषण
वायु प्रदूषण को धूल, धुओँ, गैसें, कुहासा, दुर्गध और वाष्प जैसे संदूषकों की वायु में अभिवृद्धि व उस अवधि के रूप में
नमामि गंगे कार्यक्रम
एक नदी के रूप में गंगा का राष्ट्रीय महत्व है, लेकिन प्रदृषण को नियंत्रित करके नदी के संपूर्ण मार्ग की सफ़ाई की आवश्यकता है। केंद्र सरकार ने निम्नलिखित उद्देश्यों के साथ ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम आरंभ किया है –

Air pollution is world's top environmental health risk, WHO says
Sushmi Dey / TNN / Updated: Jun 2, 2015, 03:19 IST
Air pollution is the world's biggest environmental health risk, causing at least one in eight deaths around the globe, the World Health Organization has said.
Air pollution biggest killer in Southeast Asia, says WHO
A smoky haze that Ashrouded parts of Southeast Asia this month, forcing schools and busi- nesses to close, is just one ele- ment of an air pollution problem that kills hundreds of thousands of people in the region annually, the World Health Organisation said.
Air pollution, in major Southeast Asian and Chinese cities ranks among the worst in the world and contributes to the deaths of about 500,000 people each year, said Michal Krzyzanowski, an air quality specialist at the WHO's European Center for Environment and Health in Bonn.
Drifting smoke from purposely set forest fires in Indonesia caused Malaysia to declare a state of emergency last week in two areas outside Kuala Lumpur. Parts of Thailand were also blanketed in the haze.
Malaysia said hospitals reported a 150% increase in breathing problems and seven people who had a history of respiratory problems reportedly died. The government could not confirm the smoky air was to blame.
Worldwide, air pollution contributes to some 800,000 deaths each year. The emergency in Malaysia was lifted after two days. But meteorologists are predicting a new cloud will hover over parts of Malaysia and possibly Singapore.
The haze, blamed on illegal dry-season burning to clear land on Sumatra island, is an annual problem.

लिया जाता है जो मनुष्यों, जंतुओं और संपत्ति के लिए हानिकारक होते हैं। ऊर्जा के स्रोत के रूप में विभिन्न प्रकार के ईंधनों के प्रयोग में वृद्धि के साथ, पर्यावरण में विषाक्त धुएँ बाली गैसों के उत्सर्जन के परिणामस्वरूप बायु प्रदूषित होती है। जीवाश्म ईंधन का दहन, खनन और उद्योग बायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं। ये प्रक्रियाएँ बायु में सल्फर एवं नाइट्रोजन के ऑक्साइड, हाइड़ोकार्बन, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, सीसा तथा एस्वेस्टास को निर्मुक्त करते हैं।
वायु प्रदूषण के कारण श्वसन तंत्रीय, तंत्रिका तंत्रीय तथा रक्त संचारतंत्र संबंधी विभिन्न बीमारियाँ होती हैं।
नगरों के ऊपर कुहरा जिसे शहरी धूम्र कुहरा कहा जाता है, वस्तुतः वायुमंडलीय प्रदूषण के कारण होता है। यह मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होता है। वायु प्रदूषण के कारण अम्ल वर्षा भी हो सकती है। नगरीय पर्यावरण का वर्षा जल विश्लेषण इंगित करता है कि गर्मियों के पश्चात् पहली बरसात में पी.एच. का स्तर उत्तरवर्ती बरसातों से सदैव कम होता है।
ध्वनि प्रदूषण
विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न ध्वनि का मानव की सहनीय सीमा से अधिक तथा असहज होना ही ध्वनि प्रदूषण है। विभिन्न प्रकार के प्रौद्योगिकीय अन्वेषणों के चलते, हाल ही के वर्षों से यह एक गंभीर समस्या बनकर उभरा है।
ध्वनि प्रदूषण के प्रमुख स्रोत विविध उद्योग, मशीनीकृत निर्माण तथा तोड़-फोड़ कार्य, तीब्रचालित मोटर-वाहन और बायुयान इत्यादि हैं। इनमें सायरन, लाउडस्पीकर, फेरी वाले तथा सामुदायिक गतिविधियों से जुड़े विभिन्न उत्सव संबंधी कार्यों से होने वाली आवधिक किंतु प्रदूषण करने वाले शोर को भी जोड़ा जा सकता है। सुस्थिर शोर के स्तर को डेसीबल के संदर्भ में ध्वनि स्तर के द्वारा मापा जाता है।

ध्वनि प्रदूषण के सभी स्रोतों में से यातायात द्वारा पैदा किया गया शोर सबसे बड़ा क्लेश है। इसकी तीत्रता और प्रकृति इन घटकों पर निर्भर करता है जैसे कि वायुयान/वाहन/रेलगाड़ी के प्रकार, उन सड़कों की दशा तथा साथ-ही-साथ वाहन की स्थिति (आटोमोबाइल के संदर्भ में जैसे कारकों पर निर्भर करती है।) समुद्री यातायात में शोर की तीत्रता माल को चढ़ाने व उतारने का निपटान करने वाले पत्तन तक अधिक सीमित रहती है। उद्योग भी ध्वनि प्रदूषण का कारण है जिसमें उद्योग के आधार पर तीत्रता भिन्न-भिन्न होती है।
ध्वनि प्रदूषण स्थान विशिष्ट होता हैं तथा इसकी तीत्रता प्रदूषण के स्रोत जैसे कि औद्योगिक क्षेत्र, परिवहन मार्ग, हवाई अड्डे इत्यादि मुख्यमार्ग से दूर कम होती जाती है। भारत के कई बड़े शहरों एवं महानगरों में ध्वनि प्रदूषण बहुत खतरनाक है।
क्या आप जानते हैं ?
Oceans 10 times noisier today than 40 years ago
A study by Scripps Institute of Oceanography has revealed that Ocean Noise has increased tenfold since the 1960s. Oceanologists Sean Wiggins, John Hildebrand from Scripps and Mark McDonald from WhaleAcoustics, Colorado, studied declassified US Navy documents and came to the conclusion that global shipping has contributed a lot to increased undersea noise pollution. They said with populations increasing around the globe in recent decades, the underwater world had also become a noisier place, adding that the effects of greater noise on marine life was still unknown. Findings revealed a tenfold increase in underwater ocean noise as compared with the 1960s. They said the noise levels in 2003-2004 were about 10 to 12 decibels higher than in 1964-1966. The reasons could be due to the vast increase in the global shipping trade, the number of ships plying the oceans and higher speed of vessels.
नगरीय अपशिष्ट निपटान
नगरीय क्षेत्रों को प्रायः अति संकुल, भीड़-भाड़ तथा तीत्रबढ़ती जनंसख्या के लिए अपयाप्त सुविधाएँ और उसके परिणामस्वरूप साफ्र-सफाई की खराब स्थिति एवं प्रदूषित

वायु के रूप में पहचाना जाता है। ठोस अपशिष्टों (कचरे) के द्वारा होने वाला पर्यावरण प्रदूषण काफ़ी महत्वपूर्ण हो चुका है क्योंकि विभिन्न स्रोतों द्वारा जनित अपशिष्ट की मात्रा बहुत अधिक होती जा रही है। ठोस कचरे की अंतर्गत विभिन्न प्रकार के पुराने एवं प्रयुक्त सामग्रियाँं शामिल की जाती हैं जैसे कि जंग लगी पिनें, टूटे काँँच के समान, प्लास्टिक के डिब्बे, पोलीथिन की थैलियाँ, रही कागज, राख, प्लॉपियाँ, सी डी आदि का भिन्न-भिन्न स्थानों पर लगाया जाता है। इस त्यागे गए समान को कूड़ा-करकट, रही, गंदगी एवं कबाड़ आदि कहते हैं जिनका दो स्रोतों से निपटान होता है- (i) घरेलू प्रतिष्ठानों से और (ii) व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से। घरेलू कचरे को या तो सार्वजनिक भूमि पर या निजी ठेकेदारों के स्थलों पर डाला जाता है जबकि औद्योगिक/व्यावसायिक इकाइयों के कचरा का संग्रहण एवं निपटान जन सुविधाओं (नगरपालिकाओं) के द्वारा निचली सतह की सार्वजनिक जमीन (गढुँ) पर निस्तारित किया जाता है। कारखानों, विद्युत गृहों तथा भवन निर्माण या विध्वंस से भारी मात्रा में निकली राख या मलबे के परिणामस्वरूप गंभीर समस्याएँ पैदा हो गई है। ठोस अपशिष्ट से अप्रिय बदबू, मकिखयों एवं कृतकों (जैसे चूहे) से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम पैदा हो जाते हैं जैसे टाइफाइड (मियादी बुखार),

दौराला में पारिस्थितिकी के पुनर्भरण और मानव स्वास्थ्य के सुरक्षण का एक अनुकरणीय उदाहरण : केस अध्ययन
'प्रदूषक भोगता है' के वैश्विक नियम के आधार पर मेरठ के निकट दौराला में लोगों की प्रतिभागिता के सहारे पारिस्थितिकी के पुनर्भरण और मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए प्रयास किया गया है। मेरठ के एक गैर सरकारी संगठन (एन.जी.ओ.) द्वारा पारिस्थितिकी पुनर्भरण के एक मॉङल की रचना के तीन वर्ष बाद परिणाम आने आरंभ हो गए। दौराला स्थित उद्योगों के पदाधिकारियों, गैर-सरकारी संगठनों, सरकारी अधिकारियों और अन्य पणधारियों की मेरठ में हुई मीर्टिंग में परिणाम सामने आए। लोगों के शक्तिशाली तकों, प्रामाणिक अध्ययनों और दबाव ने इस गाँव के 12,000 निवासियों को एक नया जीवन दान दिया है। यह सन् 2003 की बात है जब दौरालावासियों की दयनीय दशा ने एक जनहित सभा (सिविल सोसायटी) का ध्यान आकृष्ट किया। 12,000 लोगों की जनसंख्या वाले इस गाँव का भू-जल भारी धातुओं के संपर्क से संदूषित हो चुका था। इसका कारण यह था कि दौराला के उद्योगों के अनुपचारित अपशिष्ट जल का भू-जल स्तर में निश्कालन हो रहा था। एन.जी.ओ. के कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर लोगों के स्वास्थ्य-स्तर संबंधी सर्वेक्षण किया और एक रिपोर्ट बनाई। उस संगठन, ग्रामीण समुदाय और जन-प्रतिनिधियों ने आपस में बैठकर इन समस्याओं के टिकाऊ समाधान ढूँढ़ने का प्रयास किया। उद्योगपतियों ने पारिस्थितिकी की गिरती दशा को नियंत्रित करने में गहरी रुचि दिखाई। गाँव की उपरली टंकी (over hand tank)की क्षमता बढ़ाई गई और समुदाय को पीने योग्य जल उपलब्ध कराने के लिए 900 मीटर की अतिरिक्त पाइपलाइन बिछाई गई। गाँव के गाद-युक्त तालाब को साफ्र किया गया और इसे गाद-विमुक्त करके पुनः जल से भर दिया गया। बड़ी मात्रा में गाद को हटाकर अधिक मात्रा में जल का मार्ग प्रशस्त किया गया तथा जलभृतों में जल पुनः भरा जाए। जगह-जगहवर्ष-जल संग्रहण की संरचनाएँ बनाई गई। जिनसे मानसून के पश्चात भू-जल के संदूषण में कमी आई। एक हज्ञार वृक्षों की लगाए गए जिनसे पर्यवरण का संवर्धन हुआ।
गलघोटूँ (डिष्थीरिया), दस्त तथा हैजा (कॉलरा) आदि। इसके साथ ही यह कूड़ा-कचरा अक्सर क्लेश पैदा करते हैं जब कभी भी इनका लापरवाही से निपटान किया जाता है तो यह हवा से फैलने एवं बरसाती पानी से छितरने के कारण परेशानी का कारण बनता है।
नगरीय क्षेत्रों के आसपास औद्योगिक इकाइयों के संकेंद्रण से भी औद्योगिक अपशिष्टों में वृद्धि होती है। औद्योगिक कचरे को नदियों में डालने से जल प्रदूषण की समस्या होती है। नगर आधारित उद्योगों तथा अनुपचारित वाहित मल के कारण नदियों के प्रदूषण से अनुप्रवाह में स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएँ पैदा होती हैं।
भारत में नगरीय अपशिष्ट निपटान एक गंभीर समस्या है मुंबई, कोलकाता, चेनई व बेंगलूरु आदि महानगरों में ठोस अपशिष्ट के 90 प्रतिशत को एकत्रित करके उसका निपटान किया जाता है लेकिन देश के अन्य अधिकांश शहरों में, अपशिष्ट का 30 प्रतिशत से 50 प्रतिशत कचरा बिना एकत्र किए छोड़ दिया जाता। जो गलियों में, घरों के पीछे खुली जगहां पर तथा परती जमीनों पर इकटुना हो जाता है जिसके कारण स्वास्थ्य संबंधी गंभीर जोखिम पैदा हो जाते हैं। इन अपशिष्टों को संसाधन के रूप में उपचारित कर इनका ऊर्जी पैदा करने व कंपोस्ट (खाद) बनाने में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अनुपचारित अपशिष्ट धीरे-धीरे सड़ते हैं और वातावरण में विषाक्त गैसें छोड़ते हैं जिनमें मिथेन गैस भी शामिल हैं।

क्रियाकलाप
हम क्या फेंकते हैं, और क्यों?
हमारा कचरा (अपशिष्ट) कहाँ जाकर समाप्त होता है?
रदी बीनने वाले बच्चे कचरे को क्यों खँगालते हैं। क्या इसका कुछ मूल्य होता है?
क्या हमारा नगरीय अपशिष्ट उपयोगी है?

ग्रामीण-शहरी प्रवास
ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की और जनसंख्या प्रवाह अनेक कारकों से प्रभावित होता है जैसे कि नगरीय क्षेत्रों में मज्ञदूरों की अधिक माँँग, ग्रामीण क्षेत्रों में रोज्ञगार के निम्न अवसर तथा नगरीय एवंग्रामीण क्षेत्रों के बीच विकास का असंतुलित प्रारूप आदि हैं।
क्या आप जानते हैं ?
वर्तमान में विश्व की लगभग 55 प्रतिशत जनसंख्या नगरों में निवास करती है और निकट भविष्प में और अधिक लोग जुड़ जाएंगे। यह अनुपात 2050 तक 68 प्रतिशत तक पहुँचने का अनुमान है। ये सरकारों पर दबाव बनाएँगी कि वे जीवन की वाँछित गुणवत्ता के लिए इष्टतम अवसंरचना के साथ नगरीय क्षेत्रों को जीने के लिए बेहतर स्थान बनाएँ।
नगरीय जनसंख्या में वृद्धि एक प्राकृतिक वृद्धि के परिणामस्वरूप (जब मृत्यु दर की अपेक्षा वृद्धि दर अधिक हो), निवल अप्रवास (जहाँ बाहर जाने वालों की अपेक्षा आने वाले अधिक हो) और कभी-कभी नगरीय क्षेत्रों का पुनः वर्गीकरण जिसमें आसपास की ग्रामीण जनसंख्या को शामिल कर लिया जाता है, के कारण बढ़ती है। भारत में एक अनुमान के अनुसार 1961 के बाद शहरी क्षेत्रों की जनसंख्या में 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई और इसमें से 29 प्रतिशत जनसंख्या ने ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर प्रवास किया।

भारत में, नगरों की जनसंख्या तेज्ञी से बढ़ रही है। चूँकि छोटे एवं मध्यम नगरों में रोज्ञगार के कम अवसर उपलब्ध होते हैं, गरीब लोग सामान्यतः अपनी आजीविका के लिए इन शहरों को छोड़कर सीधे महानगरों में पहुँचते है।
इस विषय पर बेहतर समझ बनाने हेतु नीचे एक अध्ययन दिया गया है। इसे ध्यानपूर्वक पढँं और ग्रामीण-नगरीय प्रवास की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करें।
केस अध्ययन
रमेश अनुबंध के आधार पर तलचर (उड़ीसा का कोयला क्षेत्र) में निर्माण स्थल पर पिछले दो वर्षों से एक वेल्डर के रूप में कार्य कर रहा है। वह अपने ठेकेदार के साथ-साथ देश-भर में विभिन्न जगहों, जैसे कि सूरत, मुंबई, गांधीनगर, भरुँच, जामनगर आदि नगरों में जाता है। वह प्रतिवर्ष अपने पैतृक गाँव में पिता के पास रू. 20,000 भेजता है। उसके द्वारा भेजे गए पैसे मुख्यतः दैनिक उपभोग, स्वास्थ्य की देखभाल, बच्चों की पढ़ई आदि पर खर्च होता है। कुछ पैसे कृषि, जमीन की खरीद तथा घरों के निर्माण पर भी खर्च होता है। रमेश के परिवार के रहन-सहन का स्तर सार्थक रूप से सुधरा है।
15 वर्ष पहले, हालात ऐसे नहीं थे। परिवार बहुत ही कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा था। उसके तीन भाई और उनके परिवार तीन एकड़ भूमि पर निर्भर थे। परिवार बुरी तरह से कर्ज में डूबा हुआ था। रमेश को अपनी पढाई नवीं कक्षा में ही छोड़नी पड़ी। शादी के बाद तो वह और भी कठिन परिस्थितियों में घिर गया।
इसी समय, रमेश अपने गाँव के कुछ सफल उत्त्रवासियों से प्रभावित हुआ, जो लुधियाना में काम कर रहे थे और गाँव में अपने परिवारों को पैसे और उपभोक्ता वस्तुएँ भेज कर पाल-पोस रहे थे। इस तरह परिवार की कंगाली और लुधियाना में नौकरी का भरोसा पाकर वह अपने मित्र के साथ पंजाब चला आया। उसने 1988 में लुधियाना की एक ऊन फैक्टरी में रू. 20 प्रतिदिन की मज्जदूरी पर 6 माह तक काम किया। अपनी इस अल्प आय में वैयक्तिक खर्चों का इंतज्ञाम कर पाने की मुशिकल के साथ-साथ, उसे नई संस्कृति और पर्यावरण के साथ स्वयं को अनुकृलित करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसके बाद उसने अपने दोस्त के मार्गदर्शन पर लुधियाना से सूरत (गुजरात) में काम करने का निर्णय लिया। सूरत में उसने वेल्डिंग के कार्य करने का कौशल सीखा और इसके बाद वह उसी ठेकेदार के साथ अलग-अलग जगहों पर जाता रहता है। हालॉँकि रमेश के गाँव में उसकी परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरी है, परंतु उसे अपने से दूर रहने की पीड़ा झेलनी पड़ती है। वह अपनी पत्नी एवं बच्चों को अपने साथ नहीं ले जा सकता क्योँकि उसकी नौकरी अस्थायी और स्थानांतरणीय है।
'Slum-dwellers are the backbone of labour force'
Ruzbeh N Bharucha wears some
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t. रेवाहे गर्षे कार्टा 1 प्रधान एक्ता रू
का समादी और पर माकत पेक्ति j बसाजस अनुपय
को बहागिको जन्देशन को निकारण को अस्थली वर्षया तुलन
कारणा। तुल्पर्जी साते नैंग्रपय
मने लोगों के अस्थानी जिकरण वृद्धि देखा तुल्पार गई तुल्पार
यह नागरिक उप्त्रवार और कर्णे को एक्षिक्षण
को कहा है। सेपिकार को विमेडल की वैस्तन अं
प्रधान विभाग को स्वातसमा रैं
प्रें सल को दैंकर और एज
स्ताकट क्षी ज्यवस्था निवरे नें
(जिमार्ती नोगा: ५००)
1
Can a slum become a world class township?
Kalpuna Sharma
THE MONSOON has ended in Mumbai and the demolition res-
1. Sedation and the desiccision lesson has begun. So even as shrumwellers take to the streets in
2. Western state to the streets to protest, the Maharashtra Government is getting ready to launch a major new experiment
In slum redevelopment, the ambitious Dharasi Slum Redevelopment Project.
The plan looks impressive in the power point presentation because it iruns out the
creases, eliminates the dirt and the mess, and, most important of all, removers actual
people. So you have a messy, crowded, unplanned, settlement like Dharawi - a contig-
nous collection of distinct slum settlements that have merged over time into one entity -
that is neatly divided into five segments. How have these segments been imagined?
Where do the dividing lines appear in real-
-
What is the motive for a new slum
redevelopment plan for Dharavi? Will
people like the potter and the cobbler b
given their due?
225 sq ft free. The developer can use the
Remaining lease to bona commercial de residential spaces for sale.
The scheme has been through many ups and downs and lately several corruption
scans have come to light. But, despite its failings, as a senior official pointed out, some
60,000 families or 150,000 slumdwellers have been resettled in permanent housing. This is a dream in the ocean since that there
This is a drop in the ocean given that there are an estimated 6.5 million slumdwellings. But it is the largest number to be achieved in
But it is the largest number to be repossessed in a large number of units.
In that sense, the Dharavi Redevelopment Student is briefing now round. The crowd
Project is becoming new grounds. The developer will have to provide not just the build-
lings to resettle the alnarodwellers living in the particular area but also all the infrastructure
including roads, drainage, water supply, municipal office, hospital, school, industrial en-
tate, open spaces for recreation, etc. In other words, the developer will be expected to deliver a complete to successful in the U.S.
To entice developers, the government has had to modify the Development Limited
had to mostly the Developments Index for this newart.

Agricultural water efficiency
gration and not on
immigration. For me.
a poor family or
diversal. I
a livelihood. We aren't interested.
in removing poverty. We are only
interested in removing the poor
from the main city.
■ Are you against slum demoli
■ Are you against slum demoli
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indicates that in
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1986
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1. 2023年1月1日
The quick brown fox jumps over the lazy dog.
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राख में करेद्वते उमगीद
the 17 great city
1. 用 气相分离的物质,用于化学分析。
1. 2023年,公司与上海华谊(集团)股份有限公司(以下简称“公司”)签署《关于上海华谊(集团)股份有限公司与上海华谊(集团)股份有限公司之股份转让协议》。
1. 用 气相分离的物质,将 气相分离成一个有机化合物。
1. 2023年1月1日
The quick brown fox jumps over the lazy dog.
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The quick brown fox jumps over the lazy dog.
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क्या आपने कोई गंदी बस्ती देखी
है? अपने शहर की किसी गंदी बस्ती
में जाएँ और वहाँ रहने वाले लोगों
की समस्याओं के बारे में लिखें।
भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्धे एवं समस्याएँ

“बसें सिफ्र बस्ती की परिधि से गुज्ञरती हैं। ऑटो रिक्शा अपवादस्वरूप भी उसके अंदर नहीं जा सकते। धारावी केंद्रीय मुंबई का एक हिस्सा है जहाँ तिपहिया वाहनों का प्रवेश भी निषेध है।
इस गंदी बस्ती से केवल एक मुख्य सड़क गुजरती है। इसे ‘नाइटीफुट रोड’ के गलत नाम से जाना जाता है। जो अपनी चौडाई में घटकर आधे से कम रह गई है। कुछ एक गलियाँ एवं पगाडंडियाँ इतनी संकरी हैं कि वहाँं से एक साईंकिल का गुजरना भी मुशिकल है। समूची बस्ती अस्थायी निर्माण के भवन हैं जो कि दो से तीन मंजिल ऊँची है तथा उनमें जंग लगी लोहे की

सीद्धियाँ ऊपर को जाती हैं जहाँँ एक ही कमरे को किराए पर लेकर पूरा परिवार रहता है। कई बार तो यहाँँ एक कमरे में 10-12 लोग रहते हुए देखे जा सकते हैं। यह एक प्रकार से विक्टोरिया लंदन के पूर्वी सिरे की औद्योगिक इकाइयों का उत्कट अनुवर्ती संस्करण जैसा है।
लेकिन धारावी बहुत ही निराशाजनक रहस्यों का पालक है, अपेक्षाकृत धनाद्य मुंबई के निर्माण में इसकी भूमिका है। यहाँ पर छायारहित स्थान, वृक्षरहित, सूर्य की रोशनी (धूप), असंगृहीत कचरा, गदे पानी के ठहरे हुए गडळढे, जहाँ केवल अमानवीय प्राणी जैसे काले कौओं और लंबे भूरे चूहे के साथ-साथ कुछेक सर्वाधिक सुंदरतापूर्ण तथा भारत में निर्मित मूल्यवान एवं उपयोगी सामान बनाए जाते हैं। धारावी से मृत्तिका शिल्प (सेरेमिक्स), मिट्री के बर्तन, कसीदाकारी एवं जरी का काम, परिष्कृत चमड़े का काम, उच्च फ्रैशन, वस्त्रादि, महीन पिरवाँ (रॉट), धातु (रॉटमैंटल) का कार्य, उत्कृष्ट आभूषण सेट, लकड़ी की पच्चीकारी तथा फर्नीचर आदि भारत एवं दुनिया भर के धनाद्यों के घरों तक जाता है।
धारावी वस्तुतः सागर का एक हिस्सा है जोकि व्यापक रूप से कचरे से भरी गई जगह पर है जिसे (कचरा) मुख्यतः यहाँ पर रहने के लिए आने बाले लोगों द्वारा उत्पादित किया गया था जो अधिकतर अनुसूच्चित जाति और गरीब मुसलमान आदि थे। यहाँँ नालीदार चादरों से बनी 20 मीटर ऊँची जगह/भवन इधर-उधर संबढ़ पड़ी हैं जिनमें खाल एवं चमड़ा शोधन के कार्य होते हैं। यहाँँ पर खुशी का हिस्सा यह है कि सभी जगह कूड़ा-कचरा छितराया होता है।
(सीब्रूक, 1996, प्र. 50, 51-52)

टिप्पणी
विकासशील देशों में, रमेश जैसे गरीब, अर्धिशिक्षित एवं अकुशल श्रमिक ग्रामीण क्षेत्रों से प्रायः: शहरी क्षेत्रों के असंगठित एवं अनौपचारिक क्षेत्रों के छोटे मोटे धंधे परिवार का पोषण करने के लिए प्रवास करते रहते हैं। चृँकि गंतव्य स्थान पर मजदूरी काफ़ी कम होती है, इसलिए पत्नियों को गाँव में बच्चों और बड़ों की देखभाल के लिए छोड़ दिया जाता है। इसी कारण ग्रामीण–नगरीय प्रवास में पुरुषों का प्रभुत्व होता है।
गंदी बस्तियों की समस्याएँ
'नगरीय या नगरीय केंद्र' की अवधारणा को ग्रामीण से विभेदित करने के लिए आवासीय भूगोल में परिभाषित किया गया है जिसके बारे में आप पहले ही इस पुस्तक के कुछ अध्यायों में पढ़ चुके हैं। 'मानव भूगोल के सिद्धांत' नामक पुस्तक में पढ़ चुके हैं कि इस अवधारणा को विभिन्न देशों में अलग-अलग तरीके से परिभाषित किया गया है।
नगरीय एवं अनगरीय बस्तियाँ अपने प्राकार्यों में भिन्न होती हैं और कई बार वे दूसरे के पूरक होती हैं। इन सबके बावजूद ये नगरीय और ग्रामीण क्षेत्र दो भिन्न सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं प्रौद्योगिक वातावरण में विकसित हुई हैं।
भारत, जिसमें ग्रामीण जनसंख्या अधिक है और (इसकी 2011 में लगभग 69% जनसंख्या ग्रामीण है) जहाँँ गाँवों को महात्मा गांधी ने आदर्शि गणतंत्र माना था, वहाँँ अधिकतर ग्रामीण क्षेत्र अभी भी गरीब हैं और प्राथमिक क्रियाकलापों में संलग्न हैं। यहाँँ पर अधिकतर ग्राम प्रमुख नगरीय क्रोड के पृष्ठप्रदेश की रचना करते हुए इनके परिशिष्ट के रूप में विद्यमान हैं।
इससे ऐसा लगता है कि नगरीय केंद्र ग्रामीण क्षेत्रों के विपरीत अभेदीकृत एवं एकरूप इकाइयाँ हैं। इसके विपरीत, भारत में नगरीय केंद्र सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक-सांस्कृतिक एवं विकास के अन्य संकेतकों के किसी अन्य क्षेत्र की अपेक्षा कहीं अधिक विविधतापूर्ण हैं। सबसे भी ऊपर फार्म हाउस तथा उच्च आय वर्ग की बस्तियाँ है जिनमें चौड़ी सड़कें, स्ट्रीट लाइट, जल एवं स्वच्छता सुविधाओं, पाकों-उपवनों तथा सुविकसित हरित-पट्टियों, खेल के मैदानों एवं वैयक्तिक सुरक्षा के प्रावधान तथा वैयक्तिता के अधिकार के रूप में सुविकसित नगरीय अवसंरचना है। दूसरे छोर पर झुरुगी-बस्तियाँ, गंदी बस्तियाँ, झोपडपट्टी तथा पटरियों के किनारे बने ढाँचे खड़े है। इनमें वे लोग रहते हैं जिन्हें ग्रामीण क्षेत्रों से नगरीय क्षेत्रों में आजीविका की खोज में प्रवासित होने के लिए विवश होना पड़ा या वे ऊँचे किराए और जमीन की महँगी कीमत के कारण पर अच्छे आवासों में नहीं रह पाते। वे लोग पर्यावरण की दृष्टि से बेमेल और निम्नीकृत क्षेत्रों पर कब्जा कर रहते हैं। गंदी बस्तियाँ न्यूनतम वाँछित आवासीय क्षेत्र होते हैं जहाँ जीर्ण-शीर्ण मकान, स्वास्थ्य की निम्न सुविधाएँ, खुली हवा का अभाव तथा पेयजल, प्रकाश तथा शौच सुविधाओं जैसी आधारभूत आवश्यक चीजों का अभाव पाया जाता है। खुले में शौच, अनियमित जल निकासी व्यवस्था, भीड़-भरी संकरी सड़कें, स्वास्थ्य तथा सामाजिक समस्याएँ हैं।
स्वच्छ भारत मिशन शहरों के नवीकरण का एक हिस्सा है जिसे भारत सरकार ने शहरी गंदी बस्तियों में जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए शुरु किया है।
इसके अतिरिक्त गंदी बस्तियों की अधिकांश जनसंख्या नगरीय अर्थव्यवस्था के असंगठित क्षेत्र में कम वेतन और अधिक जोखिम भरा कार्य करते हैं। परिणामस्वरूप ये लोग अल्प-पोषित होते हैं और इन्हें विभिन्न रोगों और बीमारियों की संभावना बनी रहती है। ये लोग अपने बच्चों के लिए उच्चित शिक्षा का खर्च भी वहन नहीं कर सकते। गरीबी उन्हें नशीली दवाओं, शराब, अपराध, गुंडागदी, पलायन, उदासीनता और अंततः सामाजिक बहिष्कार के प्रति उन्मुख करती है।
गंदी बस्तियों के निवासियों के बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित क्यों रह जाते हैं?
भू-निम्नीकरण
कृषि योग्य भूमि पर दबाव का कारण केवल सीमित उपलब्धता ही नहीं, वरन इसकी गुणवत्ता में कमी भी इसका कारण है। मृदा अपरदन, लवणता (जलाक्रांतता) तथा भू-क्षारता से भू-निम्नीकरण होता है। भू-उर्वरकता के अप्रबंधन के साथ इसका अविरल उपयोग होने पर क्या स्थिति होगी? भू-निम्नीकरण होगा तथा उत्पादकता में कमी आएगी। भू-निम्नीकरण का अभिप्राय स्थायी या अस्थायी तौर पर भूमि की उत्पादकता की कमी है।
यद्यपि सभी निम्नकोटि भूमियाँ व्यर्थ भूमि नहीं हैं, लेकिन अनियांत्रत प्रक्रियाएँ इसे व्यर्थ भूमि में परिवर्तित कर देती हैं।
भूनिम्नीकरण दो प्रकियाओं द्वारा तीत्रता से होता है। ये प्रक्रियाएँ प्राकृतिक तथा मानवजनित है। भारतीय दूर-संवेदन संस्थान ने व्यर्थ भूमि को दूर-संवेदन तकनीक की सहायता से सीमांकित किया है और इन प्रक्रियाओं के आधार पर इनको वर्गीकृत किया जा सकता है। जैसे- प्राकृतिक खडु, मरुस्थलीय या तटीय रेतीली भूमि, बंजर चट्टानी क्षेत्र, तीत्र ढाल वाली भूमि तथा हिमानी क्षेत्र। ये मुख्यतः प्राकृतिक कारकों द्वारा घटित हुई है। प्राकृतिक तथा मानवजनित प्रक्रियाओं से निम्नकोटि भूमियों में जलाक्रांत व दलदली क्षेत्र, लवणता व क्षारता से प्रभावित भूमियाँ; झाड़ी सहित व झाड़ियों रहित भूमियाँ आदि सम्मिलित हैं। कुछ अन्य निम्नकोटि भूमियाँ भी हैं जैसे- स्थानांतरित कृषि जनित क्षेत्र, रोपण कृषि जनित, क्षरित वन, क्षरित चरागाह तथा खनन व औद्योगिक व्यर्थ क्षेत्र जो मानवीय प्रक्रियाओं से कृषि के अयोग्य हुई हैं। तालिका 9.3 से यह प्रदर्शित है कि प्राकृतिक प्रक्रियाओं की अपेक्षा मानवीय प्रक्रियाओं द्वारा अधिक व्यर्थ भूमि का विस्तार हुआ है।
केस अध्ययन
झबुआ जिला मध्य प्रदेश के अति पश्चिमी कृषि जलवायु क्षेत्र में अवस्थित है। यह वास्तव में हमारे देश के सर्वीधिक पाँच पिछड़े जिलों में से एक है। जनजातीय जनसंख्या विशेषतः भील का उच्च सांद्रण इसकी विशेषता है। लोग गरीबी के कारण कष्ट झेल रहे है, और यह गरीबी जंगल एवं भूमि दोनों संसाधनों के उच्च दर से निम्नीकरण के कारण प्रबलित हो गई है। यहाँ भारत सरकार के ‘ग्रामीण विकास’ तथा ‘कृषि मंत्रालय’ दोनों ही से जल संभरण प्रबंधन कार्यक्रम फंड अनुदानित हैं, जिन्हें झबुआ जिले में सफलतापूर्वक क्रियान्वित किया गया है। यह निम्नीकरण को रोकने तथा भूमि की गुणवत्ता को सुधारने में सफल सिद्ध होगा। जल संभरण प्रबंधन कार्यक्रम भूमि, जल तथा वनस्पतियों के बीच संबढ़ता को पहचानता है और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन एवं सामुदायिक सहभागिता से लोगों के आजीविका को सुधारने का प्रयास करता है। पिछले पाँच वर्षों में, ग्रामीण विकास मंत्रालय से निधि प्राप्त राजीव गांधी मिशन ढ्वारा क्रियांवित जल संभरण प्रबंधन ने अकेले झबुआ जिले की लगभग 20 प्रतिशत भूमि का उपचार किया है।

झबुआ जिले का पेटलावाड विकास खंड, जिले के सर्वाधिक उत्तरी छोर पर स्थित है तथा सरकार एवं गैर सरकारी संगठनों की साझ्नेदारी तथा जल संभरण प्रबंधन हेतु समुदाय की प्रतिभागिता का सफल और रोचक प्रकरण प्रस्तुत करता है। पेटलावाड विकास खंड के भील (कारावट गाँव के सतरुंडी बस्ती) समुदाय ने अपना स्वयं का प्रयास करके विस्तृत भागों की साझ्नी संपदा संसाधनों को पुनर्जीवित किया है। प्रत्येक परिवार ने साझ्नी संपदा में एक पेड़ लगाया और उसे अनुरक्षित किया। इसके साथ ही प्रत्येक परिवार ने चरागाह भूमि पर चारा घास को बोया और कम से कम दो वर्षों तक उसकी सामाजिक घेराबंदी इसके बाद भी, उनका कहना था, इन ज्ञमीनों पर कोई खुली चराई नहीं होगी और पशुओं की आहार पूर्ति हेतु नाँद बनाए जाएँगे और इस प्रकार से उन्हें यकीन था कि जो चरागाह उन्होंने विकसित किए हैं, वे भविष्य में उनके पशुओं का सतत पोषण करते रहेंगे।
इस अनुभव का एक रोचक पक्ष यह है कि समुदाय इस चरागाह प्रबंधन प्रक्रिया की शुरुआत करते कि इससे पहले ही पड़ोसी गाँव के एक निवासी ने उस पर अतिक्रमण कर लिया। गाँव वालों ने तहसीलदार को बुलाया और साझी जमीन पर अपने अधिकारों को सुनिश्चित कराया। इस अनुवर्ती संघर्ष को गाँववालों ढ्वारा सुलझाया गया जिसके लिए उन्होंने साझी चरागाह भूमि पर अतिक्रमण करने वाले दोषी को अपने प्रयोक्ता समूह का सदस्य बनाकर उसे साझी चरागाह भूमि की हरियाली से लाभांश देना आरंभ किया। (साझी संपदा संसाधन के बारे में ‘भूमि-संसाधन एवं कृषि’ वाले अध्याय को देखें।)



अभ्यास
1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए।
(i) निम्नलिखित में से सर्वाधिक प्रदूषित नदी कौन-सी है?
(क) ब्रहापुत्र
(ग) यमुना
(ख) सतलुज
(घ) गोदावरी
(ii) निम्नलिखित में से कौन-सा रोग जल जन्य है?
(क) नेत्रश्लेष्मला शोथ
(ग) श्वसन संक्रमण
(ख) अतिसार
(घ) श्वासनली शोथ
(iii) निम्नलिखित में से कौन-सा अम्ल वर्षा का एक कारण है?
(क) जल प्रदूषण
(ग) शोर प्रदूषण
(ख) भूमि प्रदूषण
(घ) वायु प्रदूषण
(iv) प्रतिकर्ष और अपकर्ष कारक उत्तरदायी है-
(क) प्रवास के लिए
(ग) गंदी बस्तियाँ
(ख) भू-निम्नीकरण के लिए
(घ) वायु प्रदूषण
2. निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें।
(i) प्रदूषण और प्रदूषकों में क्या भेद है?
(ii) वायु प्रदूषण के प्रमुख स्त्रोतों का वर्णन कीजिए।
(iii) भारत में नगरीय अपशिष्ट निपटान से जुड़ी प्रमुख समस्याओं का उल्लेख कीजिए।
(iv) मानव स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण के क्या प्रभाव पड़ते हैं?
3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें।
(i) भारत में जल प्रदूषण की प्रकृति का वर्णन कीजिए।
(ii) भारत में गंदी बस्तियों की समस्याओं का वर्णन कीजिए।
(iii) भू-निम्नीकरण को कम करने के उपाय सुझाइए।
