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Rivers of conflict...but also of peace Rich countries poor in water has been known for centuries to

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जल-संसाधन

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क्या आप सोचते हैं कि जो कुछ वर्तमान में है, ऐसा ही रहेगा या भविष्य कुछ पक्षों में अलग होने जा रहा है? कुछ निश्चितता के साथ यह कहा जा सकता है कि समाज जनांकिकीय परिवर्तन, जनसंख्या का भौगोलिक स्थानांतरण, प्रौद्योगिक उन्नति, पर्यावरणीय निम्नीकरण, और जल अभाव का साक्षी होगा। जल अभाव संभवतः इसकी बढ़ती हुई माँँग, अति उपयोग तथा प्रदूषण के कारण घटती आपूर्ति के आधार पर सबसे बड़ी चुनौती है। जल एक चक्रीय संसाधन है जो पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। पृथ्वी का लगभग 71 प्रतिशत धरातल पानी से आच्छादित है परंतु अलवणीय जल कुल जल का केवल लगभग 3 प्रतिशत ही है। वास्तव में अलवणीय जल का एक बहुत छोटा भाग ही मानव उपयोग के लिए उपलब्ध है। अलवणीय जल की उपलब्धता स्थान और समय के अनुसार भिन्न-भिन्न है। इस दुर्लभ संसाधन के आवंटन और नियंत्रण पर तनाव और लड़ई झगढ़े, संप्रदायों, प्रदेशों और राज्यों के बीच विवाद का विषय बन गए है। विकास को सुनिश्चित करने के लिए जल का मूल्यांकन, कार्यक्षम उपयोग और संरक्षण आवश्यक हो गए हैं। इस अध्याय में हम भारत में जल संसाधनों, इसके भौगोलिक वितरण, क्षेत्रीय उपयोग और इसके संरक्षण और प्रबंधन की विधियों पर चर्चा करेंगे।

भारत के जल संसाथन

भारत में विश्व के धरातलीय क्षेत्र का लगभग 2.45 प्रतिशत, जल संसाधनों का 4 प्रतिशत, जनसंख्या का लगभग 17 प्रतिशत से अधिक भाग पाया जाता है। देश में एक वर्ष में वर्षण से प्राप्त कुल जल की मात्रा लगभग 4,000 चन कि.मी. है। धरातलीय जल और पुनः पूर्तियोग भौम जल से 1,869 चन कि.मी. जल उपलब्ध है। इसमें से केवल 60 प्रतिशत जल का लाभदायक उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार देश में कुल उपयोगी जल संसाधन 1,122 चन कि.मी. है।

धरातलीय जल संसाधन

धरातलीय जल के चार मुख्य स्रोत हैं- नदियाँ, झीलें, तलैया और तालाब। देश में कुल नदियों तथा उन सहायक नदियों, जिनकी लंबाई 1.6 कि.मी. से अधिक है, को मिलाकर 10,360 नदियाँ हैं। भारत में सभी नदी बेसिनों में औसत वार्षिक प्रवाह 1,869 घन कि.मी. होने का अनुमान किया गया है। फिर भी स्थलाकृतिक, जलीय और अन्य दबावों के कारण प्राप्त धरातलीय जल का केवल लगभग 690 घन कि. मी. (32%) जल का ही उपयोग किया जा सकता है। नदी में जल प्रवाह इसके जल ग्रहण क्षेत्र के आकार अथवा नदी बेसिन और इस जल ग्रहण क्षेत्र में हुई वर्षा पर निर्भर करता है। आप कक्षा 11 की पुस्तक ‘भारत : भौतिक पर्यावरण’ में पढ़ चुके हैं कि भारत में वर्षा में अत्यधिक स्थानिक विभिन्नता पाई जाती है और वर्षा मुख्य रूप से मानसूनी मौसम संकेद्रित है। आप पुस्तक में पढ़ चुके हैं कि भारत में कुछ नदियाँ, जैसे- गंगा, ब्रहपुत्र और सिंधु के जल ग्रहण क्षेत्र बहुत बड़े है। गंगा, ब्रहपुत्र और बराक नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा अपेक्षाकृत अधिक होती है। ये नदियाँं यद्यपि देश के कुल क्षेत्र के लगभग एक-तिहाई भाग पर पाई जाती हैं जिनमें कुल धरातलीय जल संसाधनों का 60 प्रतिशत जल पाया जाता है। दक्षिणी भारतीय नदियों, जैसे- गोदावरी, कृष्णा और कावेरी में वार्षिक जल प्रवाह का अधिकतर भाग काम में लाया जाता है लेकिन ऐसा ब्रहपुत्र और गंगा बेसिनों में अभी भी संभव नहीं हो सका है।

भौम जल संसाधन

देश में, कुल पुनः पूर्तियोग्य भौम जल संसाधन लगभग 432 घन कि.मी. है। उत्तर-पश्चिमी प्रदेश और दक्षिणी भारत के कुछ भागों के नदी बेसिनों में भौम जल उपयोग अपेक्षाकृत अधिक है।

पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और तमिलनाडु राज्यों में भौम जल का उपयोग बहुत अधिक है। परंतु कुछ राज्य जैसे छत्तीसगढ़, ओडिशा, केरल आदि अपने भौम जल क्षमता का बहुत कम उपयोग करते हैं। गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, त्रिपुरा और महाराष्ट्र अपने भौम जल संसाधनों का मध्यम दर से उपयोग कर रहे हैं। यदि वर्तमान प्रवृत्ति जारी रहती है तो जल के माँग की आपूर्ति करने की आवश्यकता होगी। ऐसी स्थिति विकास के लिए हानिकारक होगी और सामाजिक उथल-पुथल और विघटन का कारण हो सकती है।

लैगून और पश्च जल

भारत की समुद्र तट रेखा विशाल है और कुछ राज्यों में समुद्र तट बहुत दंतुरित (indented) है। इसी कारण बहुत-सी लैगून और झीलें बन गई हैं। केरल, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में इन लैगूनों और झीलों में बड़े धरातलीय जल संसाधन हैं। यद्यपि, सामान्यतः इन जलाशयों में खारा जल है, इसका उपयोग मछली पालन और चावल की कुछ निश्चित किस्मों, नारियल आदि की सिंचाई में किया जाता है।

जल की माँग और उपयोग

पारंपरिक रूप से भारत एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था है और इसकी जनसंख्या का लगभग दो-तिहाई भाग कृषि पर निर्भर है। इसीलिए, पंचवर्षीय योजनाओं में, कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए सिंचाई के विकास को एक अति उच्च प्राथमिकता प्रदान की गई है और बहुउद्हेशीय नदी घाटी परियोजनाएँ जैसे- भाखड़ा नांगल, हीराकुड, दामोदर घाटी, नागार्जुन सागर, इंदिरा गांधी नहर परियोजना आदि शुरू की गई है। वास्तव में, भारत की वर्तमान में जल की माँग, सिंचाई की आवश्यकताओं के लिए अधिक है।

धरातलीय और भौम जल का सबसे अधिक उपयोग कृषि में होता है। इसमें धरातलीय जल का 89 प्रतिशत और भौम जल का 92 प्रतिशत जल उपयोग किया जाता है। जबकि औंद्योगिक सेक्टर में, सतह जल का केवल 2 प्रतिशत और भौम जल का 5 प्रतिशत भाग ही उपयोग में लाया जाता है। घरेलू सेक्टर में धरातलीय जल का उपयोग भौम जल की तुलना में अधिक (9%) है। कुल जल उपयोग में कृषि सेक्टर का भाग दूसरे सेक्टरों से अधिक है। फिर भी, भविष्य में विकास के साथ-साथ देश में औंद्योगिक और घरेलू सेक्टरों में जल का उपयोग बढ़ने की संभावना है।

सिंचाई के लिए जल की माँग

कृषि में, जल का उपयोग मुख्य रूप से सिंचाई के लिए होता है। देश में वर्षा के स्थानिक-सामयिक परिवर्तिता के कारण सिंचाई की आवश्यकता होती है। देश के अधिकांश भाग वर्षाविहीन और सूखाग्रस्त हैं। उत्तर-पश्चिमी भारत और दक्कन का पठार इसके अंतर्गत आते हैं। देश के अधिकांश भागों में शीत और ग्रीष्म ऋष्टुओं में न्यूनाधिक शुष्कता पाई जाती है इसलिए शुष्क ऋष्टुओं में बिना सिंचाई के खेती करना कठिन होता है। पर्याप्त मात्रा में वर्षा वाले क्षेत्र जैसे पश्चिम बंगाल और बिहार में भी मानसून के मौसम में अवर्षा अथवा इसकी असफलता सूखा जैसी स्थिति उत्पन्न कर देती है जो कृषि के लिए हानिकारक होती है। कुछ फ्रसलों के लिए जल की कमी सिंचाई को आवश्यक बनाती है। उदाहरण के लिए चावल, गन्ना, जूट आदि के लिए अत्यधिक जल की आवश्यकता होती है जो केवल सिंचाई द्वारा संभव है।

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चित्र 4.1 : भारत - नदी बेसिन
चित्र 4.1 : भारत - नदी बेसिन

सिंचाई की व्यवस्था बहुफ्रसलीकरण को संभव बनाती है। ऐसा पाया गया है कि सिंचित भूमि की कृषि उत्पादकता असिंचित भूमि की अपेक्षा ज्यादा होती है। दूसरे, फ्रसलों की अधिक उपज देने वाली किस्मों के लिए आर्द्धता आपूर्ति नियमित रूप से आवश्यक है जो केवल विकसित सिंचाई तंत्र से ही संभव होती है। वास्तव में ऐसा इसलिए है कि देश में कृषि विकास की हरित क्रांति की रणनीति पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिक सफल हुई है।

पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में निवल बोए गए क्षेत्र का 85 प्रतिशत भाग सिंचाई के अंतर्गत है।

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना ( PMKSY )

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना देश के सभी कृषि फार्मों के लिए सुरक्षात्मक सिंचाई के कुछ साधनों तक पहुंच सुनिश्चित करने की व्यापक दृष्टि के साथ 2015-16 के दौरान केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई है, जिससे वाँछित ग्रामीण समृद्धि आएगी। इस कार्यक्रम के कुछ व्यापक उद्देश्य इस प्रकार हैं:

•
खेत में पानी की पहुंच बढ़ाना और सुनिश्चित सिंचाई के तहत खेती योग्य क्षेत्र का विस्तार करना ( हर खेत को पानी)
•
उचित प्रौद्योगिकियों और प्रथाओं के माध्यम से पानी का सर्वात्तम उपयोग करने के लिए जल स्थोत, वितरण और इसके कुशल उपयोग के एकीकरण को बढ़ावा देना।
•
अपव्यय को कम करने और अवधि और सीमा दोनों में उपलब्धता बढ़ाने के लिए खेत में जल उपयोग दक्षता में सुधार, सिंचाई और अन्य जल बचत प्रौद्योगिकियां ( प्रति बृंद अधिक फसल)
•
स्थायी जल संरक्षण प्रणालियों को अपनाना;
•
मृदा और जल संरक्षण, भूजल के पुनर्जनन, अपवाह को रोकने, आजीविका के विकल्प प्रदान करने, आदि द्वारा वर्षा पोषित क्षेत्रों का एकीकृत विकास सुनिश्चित करना।

इन राज्यों में गेहूँ और चावल मुख्य रूप से सिंचाई की सहायता से पैदा किए जाते हैं। निवल सिंचित क्षेत्र का 76.1 प्रतिशत पंजाब में और 51.3 प्रतिशत हरियाणा में, कुओं और नलकूपों द्वारा सिंचित है। इससे यह ज्ञात होता है कि ये राज्य अपने संभावित भौम जल के एक बड़े भाग का उपयोग करते हैं जिससे कि इन राज्यों में भौम जल में कमी आ जाती है

इन राज्यों में भौम जल संसाधन के अत्यधिक उपयोग से भौम जल स्तर नीचा हो गया है। वास्तव में, कुछ राज्यों, जैसे-राजस्थान और महाराष्ट्र में अधिक जल निकालने के कारण भूमिगत जल में फ्लुओराइड का संकेंद्रण बढ़ गया है और इस वजह से पश्चिम बंगाल और बिहार के कुछ भागों में संखिया (arsenic) के संकेंद्रण की वृद्धि हो गई।

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क्रियाकलाप

पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गहन सिंचाई से मृदा में लवणता बढ़ रही है और भौम जल सिंचाई में कमी आ रही है। इसके कृषि पर संभावित प्रभाव की चर्चा कीजिए।

संभावित जल समस्या

जल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता, जनसंख्या बढ़ने से दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है। उपलब्ध जल संसाधन औद्योगिक, कृषि और घरेलू निस्सरणों से प्रदूषित होता जा रहा है और इस कारण उपयोगी जल संसाधनों की उपलब्धता और सीमित होती जा रही है।

जल के गुणों का हास

जल गुणवत्ता से तात्पर्य जल की शुन्धता अथवा अनावश्यक बाहरी पदार्थों से रहित जल से है। जल बाह्म पदार्थों, जैसे-सूक्षम जीवों, रासायनिक पदार्थों, औद्योगिक और अन्य अपशिष्ट पदार्थों से प्रदूषित होता है। इस प्रकार के पदार्थ जल के गुणों में कमी लाते हैं और इसे मानव उपयोग के योग्य नहीं रहने देते है। जब विषैले पदार्थ झीलों, सरिताओं, नदियों, समुद्रों और अन्य जलाशयों में प्रवेश करते हैं, वे जल में घुल जाते हैं अथवा जल में निलंबित हो जाते हैं। इससे जल प्रदूषण बढ़ता है और जल के गुणों में कमी आने से जलीय तंत्र (aquatic system) प्रभावित होते हैं। कभी-कभी प्रदूषक नीचे तक पहुँच जाते हैं और भौम जल को प्रदूषित करते हैं। देश में गंगा और यमुना, दो अत्यधिक प्रदूषित नदियाँ हैं। चित्र 4.2 में गंगा और इसकी सहायक नदियाँ और उन पर स्थित शहर दर्शाए गए हैं।

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चित्र 4.2 : गंगा और इसकी सहायक नदियाँ और उन पर स्थित शहर
चित्र 4.2 : गंगा और इसकी सहायक नदियाँ और उन पर स्थित शहर

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क्रियाकलाप

गंगा और इसकी सहायक नदियों पर बसे हुए मुख्य शहरों/नगरों और उनके मुख्य उद्योगों को ढूँढ़िए और बताइए।

जल संरक्षण और प्रबंधन

अलवणीय जल की घटती हुई उपलब्धता और बढ़ती माँग से, सतत पोषणीय विकास के लिए इस महत्वपूर्ण जीवनदायी संसाधन के संरक्षण और प्रबंधन की आवश्यकता बढ़ गई है। विलवणीकरण द्वारा सागर/महासागर से प्राप्त जल उपलब्धता, उसकी अधिक लागत के कारण, नगण्य हो गई है। भारत को जल-संरक्षण के लिए तुरंत कदम उठाने हैं और प्रभावशाली नीतियाँ और कानून बनाने हैं, और जल संरक्षण हेतु प्रभावशाली उपाय अपनाने हैं। जल बचत तकनीकी और विधियों के विकास के अतिरिक्त, प्रदूषण से बचाव के प्रयास भी करने चाहिए। जल-संभर विकास, वर्षा जल संग्रहण, जल के पुनः चक्रण और पुनः उपयोग और लंबे समय तक जल की आपूर्ति के लिए जल के संयुक्त उपयोग को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।

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जल प्रदूषण का निवारण

उपलब्ध जल संसाधनों का तेजी से निम्नीकरण हो रहा है। देश की मुख्य नदियों के प्रायः पहाड़ी क्षेत्रों के ऊपरी भागों तथा कम बसे क्षेत्रों में अच्छी जल गुणवत्ता पाई जाती है। मैदानों में, नदी जल का उपयोग गहन रूप से कृषि, पीने, घरेलू और औूद्योगिक उदेश्यों के लिए किया जाता है। अपवाहिकाओं के साथ कृषिगत (उर्वरक और कीटनाशक), घरेलू (ठोस और अपशिष्ट पदार्थ) और औूद्योगिक बहि: स्वाव नदी में मिल जाते है। नदियों में प्रदूषकों का संकेंद्रण गर्मी के मौसम में बहुत अधिक होता है क्योंकि उस समय जल का प्रवाह कम होता है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सी.पी.सी.बी.), राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एस.पी.सी.) के साथ मिलकर 507 स्टेशनों की राष्ट्रीय जल संसाधन की गुणवत्ता की निगरानी किया जा रहा है। इन स्टेशनों से प्राप्त किया गया ऑँकड़ा दर्शाता है कि जैव और जीवाणविक संदूषण नदियों में प्रदूषण का मुख्य स्रोत है। दिल्ली और इटावा के बीच यमुना नदी देश में सबसे अधिक प्रदूषित नदी है। दूसरी प्रदूषित नदियाँ अहमदाबाद में साबरमती, लखनऊ में गोमती, मदुरई में काली, अडयार, कृअम (संपूर्ण विस्तार), वैगई, हैदराबाद में मूसी तथा कानपुर और वाराणसी में गंगा है। भौम जल प्रदूषण देश के विभिन्न भागों में भारी/विषैली धातुओं, फ्लुओराइड और नाइट्रेट्स के संकेंद्रण के कारण होता है।

वैधानिक व्यवस्थाएँ, जैसे- जल अधिनियम 1974 (प्रदूषण का निवारण और नियंत्रण) और पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986, प्रभावपूर्ण ढंग से कार्यान्वित नहीं हुए हैं। परिणाम यह है कि 1997 में प्रदूषण फैलाने वाले

Rivers of conflict...but also of peace Rich countries poor in water has been known for centuries to be a major cause of ten- There have been more 3,800 unilateral, bilateral or multilateral declarations or conventions on water supply of water: WWF

Water has been known for centuries to be a major cause of tension and conflict-within countries, as well as among nations. Yet while its propensity to strain relations frequently makes headlines, the other side of the coin-water as an agent of cooperation-rarely gets sufficient attention.

With more than the 260 water basins in the world transcending national borders, it is hardly surprising that the situation is widely seen as being fodder for hostility.

Nevertheless, research has shown much more historical evidence of water as a catalyst for cooperation rather than a trigger of conflict. There are more than

There have been more than 500 conflicts over water in the past century, but it's also an agent of cooperation

ALL WELL? There are more than 3,800 declarations or conventions on water, including 286 treaties
ALL WELL? There are more than 3,800 declarations or conventions on water, including 286 treaties

3,800 unilateral, bilateral or multilateral declarations or conventions on water 286 are treaties, with 61 referring to over 200 international river basins.

There are examples of workable ac cords on water reached even by state that were in conflict over other matters like India and Pakistan, Israel and Jordan. Another example is that of the Northern Aral Sea, shared by Kazakhstan and Uzbekistan. It is being successfully restored after its surface has shrunk to less than half its original size as a result of a massive diversion of water under the Soviet Union, which has drained the two rivers feeding it and dev astated the surrounding environment.

Geneva: Rich countries have to make drastic changes to policies if they are to avoid the water crisis that is facing poorer nations, environmental organisation WWF said on Wednesday.

In a survey of the situation across the industrialised world, it said many cities were already losing the battle to maintain water supplies as governments talked about conservation but failed to implement their pledges.

G WILL IT LAST?
G WILL IT LAST?

has been very difficult." In Europe, the report said, countries around the Atlantic are suffering from recurring droughts, while in the Mediterranean region water resources were being depleted by the boom in tourism and irrigated agriculture.

In Australia, already the driest continent, salinity had become a major threat to a large proportion of key farming areas, while in the US wide areas were using substantially more water than could be replenished.

Even in Japan with its high rainfall, contamination of water supplies had become a serious issue.

Climate change? Barmer grapples with floods

AND THEY SAY IT'S A DESERTIn the Times of Adversity : A woman carries her child to safety in the flooded Kudla village of Rajasthan's Barmer district
AND THEY SAY IT'S A DESERTIn the Times of Adversity : A woman carries her child to safety in the flooded Kudla village of Rajasthan's Barmer district
t-prone Barmer?place in Barmer, 500 people in such support from all walks ofAshwani Vyas
t-prone Barmer?place in Barmer, 500 people in such support from all walks ofAshwani Vyas

place in Barmer, 500 people in the region died of falsciparium malaria. The state government's health department is yet to wake up to the situation.

Ironically, this is the same region where the much-touted Indira Canal cuts a greening swathe across the desert, but brings its own share of woes. The waters that were to bloom the desert, have also led to a change in eco-system of the desert. Large parts of it have turned marshy and in some places, soil salinity has changed, leading to problems like waterlogging, say experts.

SURVIVAL INSTINCTWater Woes : A father carries his son to safety as he writes through floodwater, after a three-day spell of body rain in Dhantala village, near Sitiguri
SURVIVAL INSTINCTWater Woes : A father carries his son to safety as he writes through floodwater, after a three-day spell of body rain in Dhantala village, near Sitiguri

समाचार विवरणों में उठाए गए मुह्दों पर परिचर्चा कीजिए।

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251 उद्योग, नदियों और झीलों के किनारे स्थापित किए गए थे। जल उपकर अधिनियम 1977, जिसका उद्देश्य प्रदूषण कम करना है, उसके भी सीमित प्रभाव हुए। जल के महत्व और जल प्रदूषण के अधिप्रभावों के बारे में जागरूकता का प्रसार करने की आवश्यकता है। जन जागरूकता और उनकी भागीदारी से, कृषिगत कायों तथा घरेलू और औद्योगिक विसर्जन से प्राप्त प्रदूषकों में बहुत प्रभावशाली ढंग से कमी लाई जा सकती है।

जल का पुनः चक्र और पुनः उपयोग

पुनः चक्र और पुनः उपयोग, दूसरे रास्ते हैं जिनके द्वारा अलवणीय जल की उपलब्धता को सुधारा जा सकता है। कम गुणवत्ता के जल का उपयोग, जैसे शोधित अपशिष्ट जल, उद्योगों के लिए एक आकर्षक विकल्प हैं और जिसका उपयोग शीतलन एवं अग्निशमन के लिए करके वे जल पर होने वाली लागत को कम कर सकते हैं। इसी तरह नगरीय क्षेत्रों में स्नान और बर्तन धोने में प्रयुक्त जल को बागवानी के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। वाहनों को धोने के लिए प्रयुक्त जल का उपयोग भी बागवानी में किया जा सकता है। इससे अच्छी गुणवत्ता वाले जल का पीने के उद्देश्य के लिए संरक्षण होगा। वर्तमान में, पानी का पुनः चक्रण एक सीमित माप में किया गया है। फिर भी, पुनः चक्रण द्वारा पुनः पूर्तियोग्य जल की उपादेयता व्यापक है।

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क्रियाकलाप

अपने घर में विभिन्न कार्यों के लिए उपयोग में लाए गए जल की मात्रा को देखिए और वे तरीके बताइए जिनसे विभिन्न कार्यों के लिए इस जल का पुनः उपयोग और पुनः चक्रण किया जा सकता हो।

कक्षा अध्यापकों को जल के पुनः चक्रण और पुनः उपयोग पर एक चर्चा का आयोजन करना चाहिए।

जल संभर प्रबंधन

जल संभर प्रबंधन से तात्पर्य, मुख्य रूप से, धरातलीय और भौम जल संसाधनों के दक्ष प्रबंधन से है। इसके अंतर्गत बहते जल को रोकना और विभिन्न विधियों, जैसे- अंतः स्ववण तालाब, पुनर्भरण, कुओं आदि के द्वारा भौम जल का संचयन और पुनर्भरण शामिल है। तथापि, विस्तृत अर्थ में जल संभर प्रबंधन के अंतर्गत सभी संसाधनों- प्राकृतिक (जैसे- भूमि, जल, पौधे और प्राणियों) और जल संभर सहित मानवीय संसाधनों के संरक्षण, पुनरृत्पादन और विवेकपूर्ण उपयोग को सम्मिलित किया जाता है। जल संभर प्रबंधन का उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों और समाज के बीच संतुलन लाना है। जल-संभर व्यवस्था की सफलता मुख्य रूप से संप्रदाय के सहयोग पर निर्भर करती है।

केंद्रीय और राज्य सरकारों ने देश में बहुत से जल- संभर विकास और प्रबंधन कार्यक्रम चलाए हैं। इनमें से कुछ गैर सरकारी संगठनों द्वारा भी चलाए जा रहे हैं। 'हरियाली' केंद्र सरकार द्वारा प्रवर्तित जल-संभर विकास परियोजना है जिसका उद्देश्य ग्रामीण जनसंख्या को पीने, सिंचाई, मत्स्य पालन और वन रोपण के लिए जल संरक्षण के लिए योग्य बनाना है। परियोजना लोगों के सहयोग से ग्राम पंचायतों द्वारा निष्पादित की जा रही है।

क्या आप जानतो हैं ?

अटल भूजल योजना (अटल जल) को सात राज्यों, गुजरात, हरियाणा, कर्नटिक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के 80 जिलों के 229 प्रशासनिक ब्लॉकों/तालुकाओं की 8220 जल की कमी वाले ग्राम पंचायतों में कार्यान्वित किया जा रहा है। भारत में, चुने गए राज्यों में जल की कमी (अति-दोहित, गंभीर और अर्ध-गंभीर) ब्लॉकों की कुल संख्या का लगभग 37 प्रतिशत हिस्सा है। अटल जल के प्रमुख पहलुओं में से एक पहलू जलसंरक्षण और विवेकपूर्ण जल प्रबंधन में जल के उपयोग के मौजूदा रवैये के प्रति जनता के व्यवहार मे परिवर्तन लाना है। (स्त्रोत : वार्षिक रिपोर्ट, जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार 2022-23)

नीरू-मीरू (जल और आप) कार्यक्रम (आंध्र प्रदेश में) और अरवारी पानी संसद (अलवर राजस्थान में) के अंतर्गत लोगों के सहयोग से विभिन्न जल संग्रहण संरचनाएँ जैसे-अंतः स्रवण तालाब ताल (जोहड़) की खुदाई की गई है और रोक बाँध बनाए गए है। तमिलनाडु में घरों में जल संग्रहण संरचना को बनाना आवश्यक कर दिया गया है। किसी भी इमारत का निर्माण बिना जल संग्रहण संरचना बनाए नहीं किया जा सकता है।

कुछ क्षेत्रों में जल-संभर विकास परियोजनाएँ पर्यावरण और अर्थव्यवस्था का कायाकल्प करने में सफल हुई हैं। फिर भी सफलता कुछ की ही कहानियाँ हैं। अधिकांश घटनाओं में, रालेगॉन सिद्धि, अहमदनगर, महाराष्ट्र में जल-संभर विकास : एक वस्तुस्थिति अध्ययन

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महाराष्ट्र में, अहमदनगर जिले में रालेगॉन सिद्धि एक छोटा-सा गाँव है। यह पूरे देश में जल-संभर विकास का एक उदाहरण है। 1975 में, यह गाँव गरीबी और शराब के गैर कानूनी व्यापार जाल में जकड़ा हुआ था। उस समय गाँव में परिवर्तन आया जब सेना का एक सेवानिवृत्त कर्मचारी उस गाँव में बस गया और जल-संभर विकास का कार्य आरंभ किया। उसने गाँव वालों को परिवार नियोजन और ऐच्छिक श्रम, खुली चराई, वृक्षों की कटाई रोकने और मध्य निषेध के लिए तैयार किया।

ऐच्छिक श्रम आर्थिक सहायता के लिए सरकार पर कम से कम निर्भर रहने के लिए आवश्यक था। उस स्वयंसेवी के कथनानुसार, “इसने परियोजनाओं की लागत का समाजीकरण कर दिया।” जो व्यक्ति गाँव के बाहर काम कर रहे थे, उन्होंने भी प्रति वर्ष एक महीने का वेतन देकर विकास में सहयोग दिया।

गाँव में अंतः स्नावी तालाब के निर्माण के साथ कार्य शुरू हुआ। 1975 में तालाब में पानी नहीं रुक सका। तटबंध की दीवारें रिस रही थी। तटबंध को स्वैच्छिक रूप से मरम्मत करने के लिए लोगों को एकत्र किया गया। लोगों की याद में पहली बार गर्मी में इसके नीचे सात कुओं में जल भर गया। लोगों ने अपने नेता और उसके विचारों में अपना विश्वास दिखाया। नौजवानों का एक समूह बनाया गया जिसे ‘तरुण मंडल’ कहा गया। समूह ने दहेज प्रथा, जातिवाद और छुआछूत पर प्रतिबंध लगाने का काम किया। शराब आसवन इकाई खत्म कर दी गई और मद्य निषेध लागू कर दिया गया।

थान पर चारा देने पर जोर देकर खुली चराई पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया। गहन जल फ्रसल, जैसे- गन्ने की खेती पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कम पानी की आवश्यकता वाली फ्रसलों, जैसे- दालें, तिलहन और कुछ नगदी फ्रसलों को प्रोत्साहित किया गया।

स्थानिक संस्थाओं के सारे चुनाव सर्वसम्पति के आधार पर शुरू कर दिए गए। “इसने संप्रदाय के नेताओं को लोगों का पूर्ण प्रतिनिधि बना दिया।” न्याय पंचायत प्रणाली स्थापित की गई। तब से कोई भी मुकदमा पुलिस को नहीं दिया जाता।

22 लाख रुपए की लागत से एक विद्यालय की इभारत का निर्माण केवल गाँव के संसाधनों के उपयोग से क्रिया गया। उसके लिए कोई भी दान नहीं लिया गया। आवश्यकता पड़ने पर धन को कर्ज लेकर बाद में वापस कर दिया गया। गाँव वालों को इस आत्मनिर्भरता से गर्व महसूस हुआ। गर्व की अनुप्रेरणा और ऐच्छिक भावना की इस अनुप्रेरणा से श्रम की हिस्सेदारी की एक नई प्रणाली का विकास हुआ। लोग कृषि कार्य में स्वेच्छा से एक-दूसरे की मदद करने लगे। भूमिहीन श्रमिकों को रोज्ञगार मिल गया। आजकल ग्राम अपने समीपवर्ती

रालेगॉन सिद्धि जल संभर विकास से पूर्व
रालेगॉन सिद्धि जल संभर विकास से पूर्व
रालेगॉन सिद्धि जल संभर विकास के बाद
रालेगॉन सिद्धि जल संभर विकास के बाद

ग्रामों में उनके लिए भूमि खरीदने की योजना बनाते हैं। वर्तमान में जल पर्याप्त मात्रा में है, खेती फल-फूल रही है, यद्यपि उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग अत्यधिक हो रहा है। नेता के बाद कार्य जारी रखने के लिए वर्तमान पीढ़ी की समृद्धि को बनाए रखने की योग्यता के संबंध में प्रश्न उठता है। उनके शब्दों में इसका उत्तर मिलता है, “रालेगॉन के विकास की प्रक्रिया एक आदर्श गाँव बनने तक नहीं रुकेगी।” बदलते समय के साथ लोग विकास के नए रास्तों की ओर अग्रसर है। भविष्य में, रालेगॉन देश का एक अलग माँडल प्रस्तुत कर सकता है।”

समस्याओं को कम करने के उपागमों को अपनाने से क्या होता है? एक सफल कहानी बनती है। कार्यक्रम अपनी उदीयमान अवस्था पर ही हैं। देश में लोगों के बीच जल संभर विकास और प्रबंधन के लाभों को बताकर जागरूकता उत्पन्न करने की आवश्यकता है और इस एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन उपागम द्वारा जल उपलब्धता सतत पोषणीय आधार पर निश्चित रूप से की जा सकती है।

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जल-संभर प्रबंधन द्वारा जल संरक्षण
जल-संभर प्रबंधन द्वारा जल संरक्षण
झीलों द्वारा जल संरक्षण
झीलों द्वारा जल संरक्षण
सर्विस कूप द्वारा जल संरक्षण
सर्विस कूप द्वारा जल संरक्षण
पुनर्भरण कूप द्वारा जल संरक्षणचित्र 4.3 : वर्षा जल संग्रहण की विभिन्न विधियाँ
पुनर्भरण कूप द्वारा जल संरक्षणचित्र 4.3 : वर्षा जल संग्रहण की विभिन्न विधियाँ

वर्षा जल संग्रहण

वर्षा जल संग्रहण विभिन्न उपयोगों के लिए वर्षा के जल को रोकने और एकत्र करने की विधि है। इसका उपयोग भूमिगत जलभृतों के पुनर्भरण के लिए भी किया जाता है। यह एक कम मूल्य और पारिस्थितिकी अनुकूल विधि है जिसके द्वारा पानी की प्रत्येक बृँद संरक्षित करने के लिए वर्षा जल को नलकूपों, गड्दाँं और कुओं में एकत्र किया जाता है। वर्षा जल संग्रहण पानी की उपलब्धता को बढ़ाता है, भूमिगत जल स्तर को नीचा होने से रोकता है, फ्लुओराइड और नाइट्रेट्स जैसे संदूषकों को कम करके अवमिश्रण भूमिगत जल की गुणवत्ता बढ़ाता है, मृदा अपरदन और बाढ़ को रोकता है और यदि इसे जलभृतों के पुनर्भरण के लिए उपयोग किया जाता है तो तटीय क्षेत्रों में लवणीय जल के प्रवेश को रोकता है।

देश में विभिन्न समुदाय लबे समय से अनेक विधियों से वर्षजिल संग्रहण करते आ रहे है। ग्रामीण क्षेत्रों में परंपरागत वर्षा जल संग्रहण सतह संचयन जलाशयों, जैसे- झीलों, तालाबों, सिंचाई तालाबों आदि में किया जाता है। राजस्थान में वर्षा जल संग्रहण ढाँचे जिन्हें कुंड अथवा टाँका (एक ढका हुआ भूमिगत टंकी) के नाम से जानी जाती है जिनका निर्माण घर अथवा गाँव के पास या घर में संग्रहित वर्षा जल को एकत्र करने के लिए किया जाता है। वर्षा जल संग्रहण के विभिन्न विधियों को समझने के लिए चित्र 4.3 देखिए।

बहुमूल्य जल संसाधन के संरक्षण के लिए वर्षा जल संग्रहण प्रविधि का उपयोग करने का क्षेत्र व्यापक है। इसे घर की छतों और खुले स्थानों में वर्षा जल द्वारा संग्रहण किया जा सकता है। वर्षा जल संग्रहण घरेलू उपयोग के लिए, भूमिगत जल पर समुदाय की निर्भरता कम करता है। इसके अतिरिक्त माँँग-आपूर्ति अंतर के लिए सेतु बंधन के कार्य के अतिरिक्त इससे भौम जल निकालने में ऊर्जा की बचत होती है क्योंकि पुनर्भरण से भौम जल स्तर में वृद्धि हो जाती है। आजकल वर्षा जल संग्रहण विधि का देश के बहुत से राज्यों में बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है। वर्षा जल संग्रहण से मुख्य रूप से नगरीय क्षेत्रों को लाभ मिल सकता है क्योंकि जल की माँँग, अधिकांश नगरों और शहरों में पहले ही आपूर्ति से आगे बढ़ चुकी है।

उपर्युक्त कारकों के अतिरिक्त विशेषकर तटीय क्षेत्रों में पानी के विलवणीकरण और शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्रों में खारे पानी की समस्या, नदियों को जोड़कर अधिक जल के क्षेत्रों से कम जल के क्षेत्रों में जल स्थानांतरित करके भारत में जल समस्या को सुलझाने का महत्वपूर्ण उपाय हैं। फिर भी, वैयक्तिक उपभोक्ता, घरेलू और समुदायों के दृष्टिकोण से, सबसे बड़ी समस्या जल का मूल्य है।

राष्ट्रीय जल नीति, 2012 की मुख्य विशेषताएँ

राष्ट्रीय जल नीति 2012 का उद्देश्य मौजूदा स्थिति का आकलन करना और एकीकृत राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य के साथ कार्य योजना के लिए एक रूपरेखा प्रस्तावित करना है। नीति के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए, देश के जल संसाधनों के संरक्षण, विकास और बेहतर प्रबंधन के लिए इसमें कई सिफारिशों की गई हैं।

राष्ट्रीय जल नीति (2012) की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं:

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अंतर-राज्यीय नदियों और नदी घाटियों के इष्टतम विकास के लिए एक राष्ट्रीय जल ढांचा कानून, व्यापक कानून की आवश्यकता पर जोर।
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सुरक्षित पेयजल और स्वच्छता, खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने, अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर गरीब लोगों का समर्थन करने और न्यूनतम पारिस्थितिकी तंत्र की जरूरतों के लिए उच्च प्राथमिकता आवंटन के लिए पूर्व-खाली जरूरतों को पूरा करने के बाद, पानी को आर्थिक रूप से अच्छा माना जाना चाहिए ताकि इसके संरक्षण और कुशल उपयोग को बढ़ावा दिया जा सके।
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जल संसाधन संरचनाओं के डिजाइन और प्रबंधन के लिए जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर अनुकूलन रणनीतियों और स्वीकार्यता मानदंडों की समीक्षा पर जोर दिया गया है।
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पानी के कुशल उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न उद्देश्यों के लिए पानी के उपयोग के लिए बेंचमार्क विकसित करने की एक प्रणाली विकसित की जानी चाहिए, यानी जल पदचिन्ह और जल ऑडिटिंग।
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शहरी क्षेत्रों और ग्रामीण क्षेत्रों में जल आपूर्ति की शर्तों में बड़ी असमानता को दूर करने की सिफारिश की गई है।
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जल संसाधान परियोजनाओं और सेवाओं का प्रबंधान सामुदायिक भागीदारी से किया जाना चाहिए।

स्त्रोत : प्रेस सूचना ब्यूरो, भारत सरकार, जल संसाधान मंत्रालय

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क्रियाकलाप

जल क्रांति अभियान (2015-16)

जल एक पुनः उपयोगी संसाधन है, लेकिन इसकी उपलब्धता सीमित है तथा आपूर्ति और माँंग के बीच अंतर समय के साथ बढ़ता जाएगा। वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन दुनिया के कई क्षेत्रों में जल तनाव की स्थिति पैदा कर देगा। भारत की एक खास स्थिति-उच्च जनसंख्या वृद्धि और तेजी से आर्थिक विकास के साथ पानी की बढ़ती माँंग है।

जल क्रांति अभियान भारत सरकार द्वारा 2015-16 में आरंभ किया गया जिसका मुख्य उद्देश्य देश में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता को सुनिश्चित करना है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में लोग पारंपरिक तरीकों से जल संरक्षण और प्रबंधन सुनिश्चित करते हैं।

जल क्रांति अभियान का लक्ष्य स्थानीय निकायों और सरकारी संगठन एवं नागरिकों को सम्पिलित करके इस अभियान के उद्देश्य के बारे में जागरूकता फैलाना है। जल क्रांति अभियान के अंतर्गत निम्नलिखित गतिविधियाँ प्रस्तावित की गई :-

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‘जल ग्राम’ बनाने के लिए देश के 672 जिलों में से प्रत्येक जिले में एक ग्राम जिसमें जल की कमी है, उसे चुना गया है।
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भारत के विभिन्न भागों में 1000 हेक्टेयर मॉँडल कमांड क्षेत्र की पहचान की गई। उदाहरण के लिए- उत्तर प्रदेश, हरियाणा (उत्तर), कर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु (दक्षिण), राज्यस्थान, गुजरात (पश्चिम), ओडिशा (पूर्व), मेघालय (उत्तर-पूर्व)।
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प्रदूषण को कम करने के लिए -
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जल संरक्षण और कृत्रिम पुनर्भरण
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भूमिगत जल प्रदूषण को कम करना
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देश के चयनित क्षेत्रों में आर्सेनिक मुक्त कुओं का निर्माण

4. लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए जनसंचार माध्यम, जैसे - रेडियो, टी.बी., प्रिंट मीडिया, पोस्टर प्रतिस्पर्धि, निबंध प्रतियोगिता माध्यम हैं।

जल क्रांति अभियान इस तरह से बनाया गया है कि जल सुरक्षा द्वारा खाद्य सुरक्षा और आजीविका प्रदान की जाए।

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अभ्यास

1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए।

(i) निम्नलिखित में से जल किस प्रकार का संसाधन है?

(क) अजैव संसाधन

(ग) जैव संसाधन

(ख) अनवीकरणीय संसाधन

(घ) अचक्रीय संसाधन

(ii) निम्नलिखित दक्षिण भारतीय राज्यों में से किस राज्य में भौम जल उपयोग (% में) इसके कुल भौम जल संभाव्य से ज्यादा है?

(क) तमिलनाडु

(ग) आंध्र प्रदेश

(ख) कर्नटिक

(घ) केरल

(iii) देश में प्रयुक्त कुल जल का सबसे अधिक समानुपात निम्नलिखित सेक्टरों में से किस सेक्टर में है?

(क) सिंचाई

(ग) घरेलू उपयोग

(ख) उद्योग

(घ) इनमें से कोई नहीं

2. निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें।

(i) यह कहा जाता है कि भारत में जल संसाधनों में तेजी से कमी आ रही है। जल संसाधनों की कमी के लिए उत्तरदायी कारकों की विवेचना कीजिए।

(ii) पंजाब, हरियाणा और तमिलनाडु राज्यों में सबसे अधिक भौम जल विकास के लिए कौन-से कारक उत्तरदायी हैं?

(iii) देश में कुल उपयोग किए गए जल में कृषि क्षेत्र का हिस्सा कम होने की संभावना क्यों है?

(iv) लोगों पर संदूषित जल/गंदे पानी के उपभोग के क्या संभव प्रभाव हो सकते हैं?

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें।

(i) देश में जल संसाधनों की उपलब्धता की विवेचना कीजिए और इसके स्थानिक वितरण के लिए उत्तरदायी निर्धारित करने वाले कारक बताइए।

(ii) जल संसाधनों का हास सामाजिक द्वंद्रों और विवादों को जन्म देते हैं। इसे उपयुक्त उदाहरणों सहित समझाइए।

(iii) जल-संभर प्रबंधन क्या है? क्या आप सोचते हैं कि यह सतत पोषणीय विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है?

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