आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण

इस अध्याय को पढ़ने के बाद आप इस योग्य होंगे कि:
1. प्रस्तावना
पिछले अध्यायों में आप यह पढ़ चुके हैं कि ऑँकड़ों को कैसे संगृहीत और व्यवस्थित किया जाता है। सामान्यतः ऑँकड़ों का परिमाण अधिक होता है, जिन्हें सुसंबढ़ एवं प्रस्तुति-योग्य रखने की आवश्यकता होती है। इस अध्याय में ऑँकड़ों के प्रस्तुतीकरण की जानकारी दी जाएगी, ताकि संग्रह किए गए वृहद्द ऑँकड़ों को आसानी से समझ कर उनका प्रयोग किया जा सके। सामान्यतः ऑँकड़े तीन प्रकार से प्रस्तुत किए जा सकते हैं:
2. ऑँकड़ों का पाठ-विषयक प्रस्तुतीकरण
पाठ-विषयक प्रस्तुतीकरण में ऑँकड़ों का विवरण पाठ में ही दिया जाता है। जब ऑँकड़ों का परिमाण बहुत अधिक न हो तो प्रस्तुतीकरण का यह स्वरूप अधिक उपयोगी होता है। निम्नलिखित स्थितियों को देखें:
स्थिति 1
बिहार के एक शहर में, 8 सितंबर 2005 को पेट्रोल तथा डीजलों की कीमतों की वृद्धि के विरोध में आयोजित एक बंद के दौरान 5 पेट्रोल पंप खुले तथा
17 बंद पाए गए और इसी प्रकार से 2 विद्यालय बंद तथा 9 विद्यालय खुले पाए गए।
स्थिति 2
भारत की जनगणना 2001 की रिपोर्ट के अनुसार भारत की जनसंख्या बढ़कर 102 करोड़ हो गई, जिसमें 53 करोड़ पुरुषों के मुकाबले 49 करोड़ महिलाएँ थी। 74 करोड़ लोग अभी भी भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में और केवल 28 करोड़ लोग शहरों एवं कस्बों में रह रहे थी। पूरे देश में 40 करोड़ श्रमिकों के मुकाबले गैर-श्रमिकों की संख्या 62 करोड़ थी। शहरी जनसंख्या में गैर-श्रमिकों की संख्या ग्रामीण जनसंख्या की अपेक्षा अधिक (19 करोड़) थी, जहाँ 74 करोड़ की ग्रामीण जनसंख्या में 31 करोड़ श्रमिक हैं।
इन दोनों ही स्थितियों में ऑँकड़ों को पाठ्य-सामग्री के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है। इस स्वरूप में प्रस्तुतीकरण की एक महत्वपूर्ण कमी यह है कि आँकड़ों को समझने के लिए पूरा पाठ पढ़ा ना होगा। किंतु, यह भी सत्य है कि यह मसला हर्में अकसर प्रस्तुतीकरण के खास बिंदुओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के योग्य बना देता है।

3. ऑँकड़ों का सारणीबढ़ प्रस्तुतीकरण
सारणीबढ़ प्रस्तुतीकरण में, ऑँकड़ों को पंक्तियों (क्षैतिज) तथा स्तंभों (ऊर्थवाधर) के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उदाहरण के लिए नीचे दी गई सारणी
4.1 को देखें, जिसमें साक्षरता दर के बारे में जानकारी दी गई है। इसमें तीन पंक्तियाँ (पुरुष, स्त्री तथा योग) और तीन स्तंभ दिए गए (शहरी, ग्रामीण एवंयोग) हैं। इसे 3 × 3 सारणी कहा जाता है, जिसमें 9 बॉक्स में 9 मदों की जानकारी दी गई है, जिसे 'सारणी की कोष्ठिका' कहा जाता है। प्रत्येक कोष्ठिका किसी लिंग ('स्त्री', 'पुरुष' या 'योग') की विशेषता और उसकी संख्या (ग्रामीण व्यक्तियों, शहरी व्यक्तियों तथा उनके योग का कुल साक्षरता प्रतिशत) की जानकारी देता है। ऑँकड़ों के सारणीयन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि ऑँकड़ों को सांख्यिकीय प्रयोग एवं उसके आधार पर निर्णय लेने के लिए व्यवस्थित करता है। सारणीयन में प्रयुक्त वर्गीकरण चार प्रकार के होते हैं:
गुणात्मक वर्गीकरण
जब वर्गीकरण गुणात्मक विशिष्टता के साथ किया जाता है, जैसे कि सामाजिक स्थिति, भौतिक स्थिति, राष्ट्रीयता, इत्यादि, तो इसे गुणात्मक वर्गीकरण कहा जाता है। उदाहरण के लिए, सारणी 4.1 में वर्गीकरण की विशिष्टता लिंग एवं स्थान के आधार पर है, जो स्वभाव में गुणात्मक है।
| लिंग | ग्रामीण | शहरी | योग |
| पुरुष | 79 | 90 | 82 |
| स्त्री | 59 | 80 | 65 |
| योग | 68 | 84 | 74 |
मात्रात्मक वर्गींकरण
मात्रात्मक वर्गीकरण में ऑँकड़ों का वर्गीकरण उन विशिष्टताओं के आधार पर किया जाता है जो स्वाभाविक रूप से मात्रात्मक होती है। दूसरे शब्दों में, इन विशिष्टताओं को मात्रात्मक रूप से मापा जा सकता है, जैसे आयु, कद, उत्पादन, आय इत्यादि मात्रात्मक विशिष्टताएँ है। विचाराधीन विशेषताओं के मानों को दर्शनि के लिए सीमाएँ निर्धारित करके वर्गों का गठन किया जाता है, जिन्हें वर्ग-सीमाएँ कहते हैं। मात्रात्मक वर्गीकरण का एक उदाहरण सारणी 4.2 में दिया गया है। सारणी में छूटे हुए अंकों की गणना करें।
| आयु समूह(वर्ष) | उत्तरदाताओं की संख्या | प्रतिशत |
| 20-30 | 3 | 0.55 |
| 30-40 | 61 | 11.25 |
| 40-50 | 132 | 24.35 |
| 50-60 | 153 | 28.24 |
| 60-70 | 140 | 25.83 |
| 70-80 | 51 | 9.41 |
| 80-90 | 2 | 0.37 |
| योग | 542 | 100.00 |
यहाँ पर वर्गीकरण की विशेषता आयु (वर्षों में) है, जिसका मात्रात्मक वर्गीकरण किया जा सकता है। विवेचना करें कि कैसे सारणी 4.1 में कुल मान तक पहुँचा गया।
क्रियात्मक गतिविधियाँ
छात्रों के संबंध में निम्नलिखित दर्शाए गए हों:
(क) कद (सें.मी. में) और
(ख) वजन (किग्रा में)
कालिक वर्गीकरण
इस वर्गिकरण में वर्गिकरण का आधार समय होता है तथा ऑँकड़ों को समय के अनुसार वर्गिकृत किया जाता है। समय घंटों, दिनों, हफ्सों, महीनों, वर्षों इत्यादि में हो सकता है। उदाहरण के लिए सारणी 4.3 देखें।
| वर्ष | बिक्री (लाख र० में) |
| 1995 | 79.2 |
| 1996 | 81.3 |
| 1997 | 82.4 |
| 1998 | 80.5 |
| 1999 | 100.2 |
| 2000 | 91.2 |
उपर्युक्त सारणी में वर्गिकरण का आधार एक ‘वर्ष’ में बिक्री है जिसके मान समय के स्केल पर दिखाए गए हैं।
क्रियात्मक गतिविधि
- अपने विद्यालय के कार्यालय में जाइए और विद्यालय की प्रत्येक कक्षा में अध्ययन करने वाले छात्रों की संख्या का पिछले 10 वर्षों के ऑँकड़ों का संग्रह कीजिए। इन ऑँकड़ों को सारणीबढ़ ढंग से प्रस्तुत करें।
स्थानिक वर्गीकरण
जब कोई वर्गीकरण इस प्रकार से किया जाए, कि वर्गीकरण का आधार स्थान हो, तो इसे स्थानिक-वर्गीकरण कहते हैं। यह स्थान कोई गाँव/कस्बा, खंड, जिला, राज्य या देश आदि हो सकता है।
सारणी 4.4 स्थानिक वर्गीकरण का एक उदाहरण है।
| गंतव्य स्थान | निर्यात भागीदारी |
| यू.एस.ए. | 12.5 |
| जर्मनी | 2.4 |
| अन्य यूरोपीय संघ के देश | 10.9 |
| यू.के. | 3.1 |
| जापान | 2.2 |
| रुस | 0.7 |
| चीन | 4.7 |
| पश्चिमी एशिया- गल्फ सहकारी परिषद् | 15.3 |
| शेष एशिया | 29.4 |
| अन्य | 18.8 |
| सभी | 100.0 |
क्रियात्मक गतिविधि
- अपनी कक्षा के छात्रों के मूल राज्यों/रिहायशी इलाकों के आधार पर उन से प्राप्त ऑँकड़ों को प्रस्तुत करते हुए एक सारणी बनाएँ।
4. ऑँकड़ों का सारणीकरण तथा सारणी के अंग
सारणी के निर्माण के लिए, सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि एक अच्छी सांख्यिकीय सारणी के कौन-कौन से महत्वपूर्ण अंग हैं। जब इन सभी अंगों को सुव्यस्थित कर एक साथ प्रस्तुत किया जाता है, तो ये ‘सारणी’ के रूप में हो जाते हैं। सारणी की संकल्पना का सबसे सरल तरीका यह है कि ऑँकड़ों को कुछ व्याख्यात्मक सूचनाओं के साथ पंक्तियों एवं स्तंभों में व्यवस्थित कर दिया जाए। सारणीकरण के कार्य को एकविध, ढूविध या त्रिविध वर्गीकरण ढ्वारा किया जा सकता है जो कि ऑँकड़ों की विशिष्टताओं की संख्या पर निर्भर करता है। एक अच्छी सारणी में निम्न बातें आवश्यक रूप से होनी चाहिएः
(क) सारणी संख्या
किसी सारणी की संख्या उसकी पहचान के लिए निर्धारित की जाती है। यदि कहीं एक से अधिक सारणियाँ प्रस्तुत की जाती हैं, तो उन सारणियों की संख्या ही उन्हें एक-दूसरे से अलग करती है। इसे सारणी के ऊपर या शीर्षेक की शुरुआत के साथ दिया जाता है। यदि एक पुस्तक में बहुत सारी सारणियाँ हैं, तो संख्या आरोही क्रम में दी जाती है। सामान्यतः सारणी की अवस्थिति के अनुसार सारणी की पहचान के लिए संख्याएँ जैसे 1.2, 3.1 इत्यादि भी दी जा सकती हैं। उदाहरण के लिए, सारणी संख्या 4.5 को अध्याय 4 की सारणी संख्या 5 (देखें सारणी 4.5) के रूप में पहचाना जा सकता है।
(ख) शीर्षक
सारणी का शीर्षक सारणी की विषयवस्तु की व्याख्या करता है। इसे बहुत ही स्पष्ट, संक्षिप्त एवं सावधानी पूर्ण चुने गए शब्दों में होना चाहिए, ताकि सारणी का भाव बिल्कुल स्पष्ट हो जिसमें अस्पष्टता न हो। इसे सारणी के बिल्कुल ऊपर तथा सारणी संख्या के ठीक बाद में या इसके ठीक नीचे दिया जाता है। (देखें सारणी 4.5)
(ग) उप शीर्षक या स्तंभ शीर्षक
सारणी के प्रत्येक स्तंभ के ऊपर की ओर एक स्तंभ नाम दिया जाता है जो स्तंभ के अंतर्गत दी गई संख्याओं की व्याख्या करता है। इसे उपशीर्षक या स्तंभ शीर्षक कहते हैं। (देखें सारणी 4.5)
(घ) अवशीर्ष या पंक्ति शीर्षक
उपशीर्षक या स्तंभशीर्षक की भाँति सारणी की प्रत्येक पंक्ति को भी एक शीर्षक दिया जाता है। पंक्तियों के नाम को अवशीर्ष या अवशीर्ष मदें भी कहते हैं और संपूर्ण बायें स्तंभ को अवशीर्ष स्तंभ कहा जाता है। पंक्तिशीर्षकों का संक्षिप्त विवरण सारणी के बिल्कुल ऊपर बायीं ओर दिया जा सकता है। (देखें सारणी 4.5)
(ड़) सारणी का मुख्य भाग
सारणी का मुख्य भाग वह होता है, जिसमें वास्तविक आँकड़े होते हैं। सारणी में किसी भी संख्या/आँकड़े की अवस्थिति उसकी पंक्ति एवं स्तंभ के अनुसार सुनिश्चत होती है। उदाहरण के लिए द्वितीय पंक्ति एवं चौथे स्तंभ के आँकड़ों से यह संकेत मिलता है कि 2001 में ग्रामीण भारत में 25 करोड़ गैर श्रमिक महिलाएँ थों (देखें सारणी 4.5)।
(च) माप की इकाई
यदि पूरी सारणी में माप की इकाई समान रहे, तो सारणी की संख्याओं (वास्तविक ऑँकड़ों) को सदैव सारणी के शीर्षक के साथ लिखा जाना चाहिए। यदि सारणी की पंक्तियों या स्तंभों के लिए भिन्न माप इकाइयाँ हों, तो उन इकाइयों की चर्चा निश्चित रूप से ‘उपशीर्षक’ या ‘अवशीर्ष’ के साथ की जानी चाहिए। यदि संख्याएँ बहुत बड़ी हैं तो इन्हें पूर्णांक बना देना चाहिए और पूर्णांक बनाने की विधि का संकेत दिया जाना चाहिए (देखें सारणी 4.5)।

(छ) स्रोत
यह एक संक्षिप्त विवरण या वाक्यांश होता है जिसमें सारणी में प्रस्तुत किए गए ऑँकड़ों के स्लोत के बारे में बताया जाता है। यदि एक से अधिक स्लोत हैं, तो सभी स्लोतों के बारे में लिखा जाना चाहिए। स्लोत को प्रायः सारणी के नीचे दिया जाता है। (देखें सारणी 4.5)।
(ज) टिप्पणी
टिप्पणी किसी सारणी का अंतिम अंग होता है। पाद टिप्पणी के अंतर्गत किसी सारणी के ऑँकड़ों की विषय-वस्तु की उन विशिष्टताओं के बारे में व्याख्या की जाती है, जो कि स्वतः स्पष्ट नहीं होती हैं और न ही पहले कहीं उनकी व्याख्या की गई होती है।
क्रियात्मक गतिविधियाँ
5. ऑँकड़ों का आरेखी प्रस्तुतीकरण
ऑकड़ों को प्रस्तुत करने की यह तीसरी विधि है। यह विधि सारणीकृत या पाठ-विषयक प्रस्तुतीकरण की तुलना में, ऐऑकड़ों के आधार पर, वस्तु-स्थिति को जल्दी समझने में सबसे अधिक सहायक होती है। ऑकड़ों के आरेखी प्रस्तुतीकरण से संख्याओं में निहित अमूर्तता कम हो जाती है और वे अधिक मूर्त एवं आसानी से समझने योग्य बन जाते हैं।
सारणी में प्रस्तुत किए गए ऑँकड़ों की अपेक्षा आरेखी प्रस्तुतीकरण में ऑँकड़ों की परिशुढ़ता थोड़ी कम हो सकती है, किंतु ये सारणी की तुलना में अधिक प्रभावी होते हैं।
सामान्यतः कई प्रकार के आरेखों का प्रयोग होता है। इनमें से कुछ महत्वपूर्ण इस प्रकार हैं:
ज्यामितीय आरेख (Geometric Diagram)
दंड आरेख तथा बृत्त आरेख ज्यामितीय आरेख की श्रेणी में आते हैं। दंड आरेख तीन प्रकार के होते हैः सरल दंड आरेख, बहु दंड आरेख तथा घटक दंड-आरेख।
दंड-आरेख (Bar Diagram)
सरल दंड-आरेख (Simple Bar Diagram)
सरल दंड आरेख के अंतर्गत समान अंतरालों तथा समान विस्तार वाले आयताकार दंडों का एक समूह प्रत्येक श्रेणी/वर्ग के ऑँकड़ों को दर्शाता है। दंड की ऊँचाई या लंबाई ऑँकड़े के परिमाण को प्रकट करती है। दंड का निचला छोर आधार रेखा को इस प्रकार स्पर्श करता है कि दंड की ऊँचाई शून्य इकाई से शुरू होती है। दंड-आरेख के दंडों की सापेक्ष ऊँचाई को देखकर, ऑकड़ों को अपेक्षाकृत आसानी से समझा जा सकता है। इसके लिए ऐँकड़े बारंबारता वाले या गैर-बारंबारता वाले दोनों प्रकार के हो सकते हैं। गैर-बारंबारता वाले ऑकड़ों में किसी खास विशिष्टता जैसे उत्पादन, फसल, जनसंख्या आदि को विभिन्न समयों या विभिन्न राज्यों के आधार पर लिया जाता है और विशिष्टताओं के मूल्यों के अनुरूप दंडों को आरेख की ऊँचाई के रूप में रखा जाता है। विशिष्टताओं का मापा हुआ (गणना किया हुआ) मान प्रत्येक मान की पहचान को बनाए रखता है। चित्र 4.1 दंड-आरेख का एक उदाहरण है।
क्रियात्मक गतिविधियाँ
- आपने अपने विद्यालय की प्रत्येक कक्षा में इस वर्ष अध्ययन कर रहे छात्रों की संख्या का संग्रह क्रियाएं कीजिए। अब उसी सारणी को दंड–आरेख द्वारा दिखाएँ।
विभिन्न प्रकार के ऑँकड़ों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के आरेखी प्रस्तुतीकरण की आवश्यकता हो सकती है। दंड-आरेख बारंबारता एवं गैर-बारंबारता दोनों प्रकार के चरों एवं गुणों के लिए उपयुक्त होते हैं। विविक्त चर जैसे, परिवार के आकार, पाँसे पर बिंदु, परीक्षा में प्राप्त ग्रेड आदि और लिंग, धर्म, जाति, देश इत्यादि गुण दंड-आरेख के द्वारा प्रस्तुत किए जा सकते हैं। दंड-आरेख गैर-बारंबारता ऑँकड़ों को प्रस्तुत करने के लिए अधिक सुविधाजनक होते हैं, जैसे कई वर्षों के लिए आय-व्यय लेखा, आयात/निर्यात आदि।

जिस वर्ग का दंड अधिक लंबा है (जैसे केरल में साक्षरता) वह किसी दूसरे वर्ग (पं. बंगाल की साक्षरता) की अपेक्षा विशेषता की अधिक माप
| भारत के प्रमुख राज्य | 2001 | 2011 | ||
| पुरुष | स्त्री | पुरुष | स्त्री | |
| आंध्र प्रदेश (आ.प्र.) | 70.3 | 50.4 | 75.6 | 59.7 |
| आसाम (आसा.) | 71.3 | 54.6 | 78.8 | 67.3 |
| बिहार (बि.) | 59.7 | 33.1 | 73.4 | 53.3 |
| झारखंड (झार.) | 67.3 | 38.9 | 78.4 | 56.2 |
| गुजरात (गुज.) | 79.7 | 57.8 | 87.2 | 70.7 |
| हरियाणा (हरि.) | 78.5 | 55.7 | 85.3 | 66.8 |
| कर्नाटक (कर्ना.) | 76.1 | 56.9 | 82.9 | 68.1 |
| केरल (के.) | 94.2 | 87.7 | 96.0 | 92.0 |
| मध्य प्रदेश (म.प्र.) | 76.1 | 50.3 | 80.5 | 60.0 |
| छत्तीसगढ़ (छत्त.) | 77.4 | 51.9 | 81.5 | 60.6 |
| महाराष्ट्र (महा.) | 86.0 | 67.0 | 89.8 | 75.5 |
| ओडिशा (ओडी.) | 75.3 | 50.5 | 82.4 | 64.4 |
| पंजाब (पंजा.) | 75.2 | 63.4 | 81.5 | 71.3 |
| राजस्थान (राज.) | 75.7 | 43.9 | 80.5 | 52.7 |
| तमिलनाडु (तमिण) | 82.4 | 64.4 | 86.8 | 73.9 |
| उत्तर प्रदेश (उ.प्र.) | 68.8 | 42.2 | 79.2 | 59.3 |
| उत्तराखंड (उत्त.) | 83.3 | 59.6 | 88.3 | 70.7 |
| पश्चिम बंगाल (प.बं.) | 77.0 | 59.6 | 82.7 | 71.2 |
| भारत | 75.3 | 53.7 | 82.1 | 65.5 |

दिखाता है। दंडों का प्रयोग (जिन्हें स्तंभ भी कहते हैं) सामान्यतः काल-श्रेणी के ऑँकड़ों के प्रस्तुतीकरण के लिए किया जाता है (1980–2000 के बीच अन्न उत्पादन, कार्य सहभागिता दर में एक दशक में उतार चढ़ाव, कई वर्षों के दौरान पंजीकृत बेरोजगारी, साक्षरता दर आदि), (चित्र 4.2)।
दंड-आरेख के कई रूप हो सकते हैं, जैसे कि बहु दंड-आरेख तथा घटक दंड-आरेख।
क्रियात्मक गतिविधियाँ
बहु दंड-आरेख (Multiple Bar Diagram)
बहु दंड-आरेखों का प्रयोग (चित्र 4.2) दो या अधिक ऑँकड़ा-समुच्चयों की तुलना के लिए किया जाता है, उदाहरण के लिए विभिन्न वर्षों में आय और व्यय या आयात और निर्यात या विभिन्न विषयों एवं विभिन्न कक्षाओं में प्राप्त किए गए अंक आदि।
घटक दंड-आरेख (Component Bar Diagram) घटक दंड आरेख (चित्र 4.3) या चार्ट (जिन्हें उप-आरेख भी कहा जाता है) का प्रयोग विभिन्न घटकों (ऐसे तत्व या भाग जिनसे वस्तु का निर्माण होता है) के आकारों की तुलना करने के लिए तथा इन घटकों तथा उनके अभिन्न अंगों के संबंधों पर प्रकाश डालने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए विभिन्न उत्पादों की बिक्री से प्राप्त धन, किसी प्रस्पी भारतीय परिवार के व्यय की मदें (जैसे खान-पान, किराया, दवा, शिक्षा, बिजली आदि घटक), आय और व्यय के लिए बजट परिव्यय, जनसंख्या, श्रमशक्ति के घटक आदि। घटक दंड-आरेखों को सामान्यतः उपयुक्त छायाओं या रंगों से भरा जाता है।

अर्थ निर्वचनः चित्र 4.2 के द्वारा आसानी के साथ यह पता किया जा सकता है कि पूरे देश में पिछले कई वर्षों में महिला साक्षरता की दर में वृद्धि हुई है। ठीक इसी प्रकार से कई अर्थ निकाले जा सकते हैं। जैसे यह आरेख दर्शाता है कि बिहार, झारखंड तथा उत्तर प्रदेश में महिला साक्षरता दर में सर्वाधिक वृद्धि हुई है।
| लिंग | नामांकित(प्रतिशत) | गैर नामांकित(प्रतिशत) |
| लड़के | 91.5 | 8.5 |
| लड़कियाँ | 58.6 | 41.4 |
| कुल | 78.0 | 22.0 |
किसी घटक दंड-आरेख के अंतर्गत दो या दो से अधिक घटकों को दंडों और उसके उपभागों के द्वारा प्रकट किया जाता है। उदाहरण के लिए, दंड के द्वारा 6-14 आयु-वर्ग के सभी बच्चों की जनसंख्या को प्रदर्शित कर सकते हैं। ये घटक नामांकित और गैर-नामांकित बच्चों का अनुपात दर्शाते हैं। घटक दंड-आरेख के अंतर्गत लड़के, लड़कियों तथा आयु विशेष के बच्चों के कुल योग को भिन्न-भिन्न घटक-दंडों द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है, जैसा चित्र 4.3 में दिखाया गया है। घटक दंड-आरेख बनाने के लिए, सबसे पहले X-अक्ष पर एक दंड बनाया जाता है, जिसकी कुल ऊँचाई ऑँकड़ों के कुल मान के बराबर होती है (प्रतिशत ऑँकड़ों के लिए दंड की ऊँचाई 100 इकाइयों के बराबर होगी, देखें चित्र 4.3) अन्यथा दंड की ऊँचाई दंड के कुल मान के बराबर बनायी जाती है तथा घटकों की आनुपातिक ऊँचाई एकिक विधि के द्वारा निर्धारित की जाती है। दंड को विभाजित करने के क्रम में छोटे घटकों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है।
वृत्त आरेख (Pie Diagram)
वृत्त आरेख भी एक घटक आरेख है, पर घटक दंड-आरेखों के स्थान पर इसे एक ऐसे वृत्त द्वारा प्रस्तुत किया जाता है, जिसके क्षेत्र को आनुपातिक रूप से उन घटकों में विभाजित किया जाता है, जिन्हें यह दर्शाता है (चित्र 4.4)।
इसे वृत्त चार्ट भी कहते हैं। यहाँ पर वृत्त को केंद्र से परिधि की ओर सीधी रेखाओं के द्वारा उतने ही भागों में विभाजित किया जाता है जितनी घटकों की संख्या होती है।


सामान्यतः वृत्त चाटों को किसी वर्ग विशेष के निरपेक्ष मान के आधार पर नहीं बनाया जाता। यहाँ पर सबसे पहले प्रत्येक वर्ग के मान को वर्गों के कुल मान के प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है। वृत्त आरेख में वृत्त को 100 बराबर भागों में बाँट लिया जाता है, जिसमें प्रत्येक अंश 3.6°(360°/100) के बराबर होता है, चाहे त्रिज्या का मान कुछ भी हो। कोण को जानने के लिए घटक को वृत्त के केंद्र से कक्षांतरित करना होगा, जिसमें प्रत्येक घटक के प्रतिशत अंकों को 3.6° से गुणा करना होगा। घटकों के प्रतिशतों के वृत्त के कोणीय घटकों के रूप में परिवर्तन का एक उदाहरण सारणी 4.8 में प्रदर्शित किया गया है।
यह जानना रोचक हो सकता है कि दंड-आरेख द्वारा प्रस्तुत किए गए ऑँकड़े भी अच्छी तरह वृत्त चार्ट द्वारा दिखाए जा सकते हैं। यहाँ पर केवल इसकी आवश्यकता होती है कि वृत्त आरेख बनाने से पहले घटकों के निरपेक्ष मान को प्रतिशत में बदलना होता है।
सारणी 4.8
| स्थिति | जनसंख्या | प्रतिशत | कोणीय घटक |
| सीमांत श्रमिक | 9 | 8.8 | 32° |
| मुख्य श्रमिक | 31 | 30.4 | 109° |
| गैर श्रमिक | 62 | 60.8 | 219° |
| कुल | 102 | 100.0 | 360° |

क्रियात्मक गतिविधियाँ
बारंबारता आरेख (Frequency Diagram)
समूहीकृत बारंबारता वितरण के रूप में प्रस्तुत ऑँकड़ों को सामान्यतः बारंबारता आरेखों के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है, जैसे कि आयत चित्र, बारंबारता बहुभुज बारंबारता वक्र तथा ओजाइव आदि।
आयत चित्र (Histogram)
आयत चित्र एक द्विविम आरेख है। यह आयतों का एक ऐसा समुच्चय है, जिसमें वर्ग सीमाओं के अंतराल (X - अक्ष पर) आधार का कार्य करते हैं तथा जिनके क्षेत्रफल वर्ग बारंबारता के अनुपात में होते हैं (चित्र 4.5)। यदि वर्ग के अंतराल का विस्तार एक समान हो जैसा कि सामान्यतः होता है तो आयतों का क्षेत्रफल उनकी बारंबारताओं के अनुपात में होता है। हालौंकि कई प्रकार के ऑँकड़ों में विभिन्न विस्तार वाले अंतरालों का उपयोग सुविधाजनक होता है तथा कई बार आवश्यक भी हो जाता है। उदाहरण के लिए, आयु के अनुसार मृत्यु का सारणीयन करते समय आरंभ में, जब अधिक आयु वर्ग की जनसंख्या की तुलना में कम आयु वालों की मृत्युदर काफी ऊँची हो तो संक्षिप्त आयु-अंतराल (जैसे कि 0, 1, 2 वर्ष / 0, 7, 28... दिवस आदि), अधिक सार्थक और उपयोगी होंगे। इस प्रकार के ऑँकड़ों के आलेखी निरूपण में किसी आयत के क्षेत्रफल की ऊँचाई, इसकी ऊँचाई (यहाँ बारंबारता) तथा आधार (यहाँ पर वर्ग अंतराल का विस्तार) का भागफल है। जब अंतराल समान हों, अर्थात् जब सभी आयतों का आधार सामान हों, तब तुलना के उद्देश्य से क्षेत्रफल को किसी भी अंतराल की बारंबारता के द्वारा आसानी से प्रस्तुत किया जा सकता है। जब आधारों का विस्तार भिन्न-भिन्न होता है, तब आयतों की ऊँचाई को समायोजित किया जाता है, ताकि तुलनात्मक मापों को प्राप्त किया जा सके। इस प्रकार की स्थिति में निरपेक्ष बारंबारता के स्थान पर बारंबारता घनत्व (जिसमें वर्ग बारंबारता का विभाजन वर्ग अंतराल के विस्तार से होता है) अधिक सार्थक होगा।
चूँकि आयत चित्र आयताकार होते हैं, वर्ग अंतराल की बारंबारता (या बारंबारता घनत्व) के बराबर ऊध्वाधिर दूरी पर आधार रेखा पर उसी परिमाण की एक समांतर रेखा खींची जाती है। आयत चित्र कभी विविक्त चर ऑँकड़ों के लिए नहीं खींचा जाता है। चृँकि, सतत चरों के लिए वर्ग अंतराल की निचली सीमा पूर्व अंतराल की ऊँची सीमा के साथ मिल जाती है (भले ही बह समान हो या असमान), अतः सभी आयत साथ-साथ होते हैं और दो आसन्न आयतों के बीच कोई खाली स्थान नहीं होता। यदि वर्ग संतत नहीं होते हैं तो पहले उन्हें संतत वर्गों में बदला जाता है, जैसा कि अध्याय 3 में बताया जा चुका है। कई बार दो आसन्न आयतों के बीच के समान अंश को हटा दिया जाता है, ताकि संततता का बेहतर प्रभाव पड़। इसके परिणामस्वरूप जो आकृति बनती है वह दोहरे सोपान की तरह लगती है।
| दैनिकमज्दूरी(रु) | मज्दूरों कीसंख्या(बारंबारता) |
| 45-49 | 2 |
| 50-54 | 3 |
| 55-59 | 5 |
| 60-64 | 3 |
| 65-69 | 6 |
| 70-74 | 7 |
| 75-79 | 12 |
| 80-84 | 13 |
| 85-89 | 9 |
| 90-94 | 7 |
| 95-99 | 6 |
| 100-104 | 4 |
| 105-109 | 2 |
| 110-114 | 3 |
| 115-119 | 3 |
आयत चित्र दंड–आरेख के समान दिखता है। परन्तु, इनके बीच समानताओं से कहीं अधिक भिन्नताएँ हैं, जिसका पता पहली बार में नहीं चलता। स्तंभों का क्षेत्रफल, अंतराल तथा चौड़ाई सभी यादृच्छिक होते हैं। स्तंभों की ऊँचाई महत्वपूर्ण है, न कि इनकी चौड़ाई या क्षेत्रफल। एक ऊध्वाधर रेखा भी ठीक उसी उद्देश्य को पूरा कर सकती है जितना कि उसी चौड़ाई का एक दंड करता है। इसके अतिरिक्त आयत चित्र में दो आयतों के बीच कोई रिक्त स्थान नहीं छोड़ा जाता है, जबकि दंड-आरेख में दो क्रमिक दंडों के बीच कुछ रिक्त स्थान अवश्य छोड़ा जाता है (बहुदंड आरेख या घटक-दंड आरेखों को छोड़कर)। यद्यपि सभी दंडों की चौड़ाई समान होती है तथापि तुलना की दृष्टि से इनकी चौड़ाई का कोई महत्व नहीं होता है। आयत चित्र में चौड़ाई उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी ऊँचाई। दंड-आरेख विविक्त एवं संतत दोनां ही चरां के लिए बनाये जा सकते हैं, जबकि आयत चित्र केवल संतत चर के लिए ही बनाए जाते हैं। आयत चित्र बारंबारता वितरण के बहुलक के मान को भी आलेखी रूप में दिखा सकता है, जैसा चित्र 4.5 में दिखाया गया है तथा ग-निर्देशांक पर बिंदुओं से बनी क्षैतिज रेखा बहुलक को दर्शाती है।
बारंबारता बहुभुज (Frequency Polygon)
बारंबारता बहुभुज सीधी रेखाओं से घिरा हुआ एक समतल है, जिसमें सामान्यतः चार या अधिक रेखाएँ होती हैं। बारंबारता बहुभुज आयत चित्र का विकल्प होता है, जो आयत चित्र से ही व्युतपन्न होता है। बारंबारता बहुभुज को वक्र के आकार के अध्ययन के लिए किसी आयत चित्र के ऊपर लगाया जा सकता है। आयत चित्र के क्रमिक आयतों के ऊपरी छोर के मध्य बिंदुओं को जोड़ कर बारंबारता बहुभुज का निर्माण बहुत आसानी से किया जा सकता है। आवृत्ति बहुभुज आधार रेखा से दूर दो छोरों पर समाप्त हो जाता है, जिससे वक्र के अंतर्गत आनेवाले क्षेत्रफल का परिकलन संभव नहीं होता। इसका समाधान आधार रेखा से दोनों वर्गों के मध्यमानों को वितरण के प्रत्येक छोर पर शून्य बारंबारता से मिलाकर किया जाता है। आधार के दोनों छोरों को खंडित रेखाओं या बिंदु रेखाओं द्वारा जोड़ा जा सकता है। अतः वक्र का कुल क्षेत्रफल, आयत चित्र के क्षेत्रफल की भॉँति,

चित्र 4.5 एक कर्स्बे के एक स्थानिक क्षेत्र के 85 दैनिक मजदूरों के वितरण के लिए आयत चित्र। कुल बारंबारता या प्रतिदर्श के आकार का प्रतिनिधित्व करता है।
बारंबारता बहुभुज समूहित बारंबारता वितरण के प्रस्तुतीकरण के लिए सर्वाधिक प्रचलित विधि है। वर्ग सीमाएँ तथा वर्ग-चिह, दोनों को X-अक्ष पर प्रदर्शित किया जा सकता है तथा दो क्रमिक वर्ग-चिहां के बीच की दूरी वर्ग अंतराल की चौड़ाई के आनुपातिक/समान होती है। ऑँकड़ों का आलेखन तब आसान होता है जब वर्ग चिह ग्राफ पेपर की मोटी रेखाओं के ऊपर आपतित (पड़ते) होते हैं। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है कि वर्ग सीमाओं या वर्ग चिहां का प्रयोग X-अक्ष पर किया गया है या नहीं, बारंबारताएँ (निर्देशांकों के रूप में) सदैव वर्ग-अंतराल के मध्यबिंदु पर आलेखित होती हैं। जब आलेख पर सभी बिंदु आलेखित हो जाते हैं, तो इन्हें क्रमिक सरल रेखाओं के द्वारा सावधानी से आपस में जोड़ दिया जाता है। खंडित रेखाएँ दो अंतरालों के बीच मध्य बिंदु को जोड़ती हैं, एक शुरू में और दूसरी अंत में, जो आलेखित वक्र के दो छोर होते हैं (चित्र 4.6)। जब एक ही अक्ष पर दो या दो से अधिक आलेखित वितरणों की तुलना की जाती है, तो बारंबारता बहुभुज संभवतः अधिक उपयोगी होता है, क्योंकि आयत-चित्र में दो या दो से अधिक वितरणों की ऊध्वाधर रेखाएँ एवं शैतिज रेखाएँ आपस में मिल सकती हैं।
बारंबारता वक्र (Frequency Curve)
बारंबारता वक्र को, बारंबारता बहुभुज के बिंदुओं से निकटतम गुजरते हुए मुक्त-हस्त से वक्र बनाकर आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। यह आवश्यक नहीं है कि यह बारंबारता बहुभुज के सभी बिंदुओं से होकर गुजरे, परंतु यह उन बिंदुओं से निकटतम होकर गुजरता है (चित्र 4.7)।
तोरण (Ogive)
तोरण को संचयी बारंबारता वक्र के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि संचयी बारंबारताएँ दो प्रकार की होती हैं, उदाहरण के लिए, ‘से कम’ प्रकार एवं ‘से अधिक’ प्रकार की। तदनुसार, किसी समूहित बारंबारता वितरण ऑँकड़ों के लिए दो प्रकार के तोरण भी होते हैं। यहाँ, बारंबारता बहुभुज की भाँति साधारण बारंबारताओं के स्थान पर बारंबारता वितरण की वर्ग-सीमाओं के सामने संचयी बारंबारताओं को Y-अक्ष पर आलेखित किया जाता है। संचयी बारंबारताओं को ‘से कम’ तोरण के लिए क्रमश: वर्ग अंतरालों की ऊपरी सीमा के सामने आलेखित किया जाता है, जबकि ‘से कम’ तोरण के लिए क्रमश: वर्ग अंतरालों की निम्नतम सीमा के सामने आलेखित किया जाता है। इन दोनों ही तोरणों की एक रोचक विशेषता यह है कि इन का परस्पर प्रतिच्छेद बिंदु बारंबारता वितरण की मध्यिका (आकृति 4.8 ब) बनाता है। जैसा कि दोनों तोरणों के आकार से स्पष्ट होता है, ‘से कम’ प्रकार का तोरण कभी घटता नहीं है और ‘से अधिक’ प्रकार का तोरण कभी बढ़ता नहीं है।


| सारणी 4.10 ( क ) | सारणी 4.10 ( ख ) | सारणी 4.10 ( ग ) | |||
| गणित में प्राप्त अंकों का बारंबारता वितरण | गणित में प्राप्त अंकों का ‘से कम’ संचयी बारंबारता | गणित में प्राप्त अंकों का ‘से अधिक’ संचयी बारंबारता | |||
| अंक | छात्रों की संख्या | अंक | छात्रों की संख्या | अंक | छात्रों की संख्या |
| 0-20 | 6 | 20 से कम | 6 | 0 से अधिक | 64 |
| 20-40 | 5 | 40 से कम | 11 | 20 से अधिक | 58 |
| 40-60 | 33 | 60 से कम | 44 | 40 से अधिक | 53 |
| 60-80 | 14 | 80 से कम | 58 | 60 से अधिक | 20 |
| 80-100 | 6 | 100 से कम | 64 | 80 से अधिक | 6 |
| योग | 64 | ||||


अंकगणितीय रेखा चित्र (Arithmetic Line Graph)
अंकगणितीय रेखा चित्र को काल श्रेणी आलेख भी कहा जाता है। इस आलेख के अंतर्गत समय (घंटा, दिन/तारीख, सप्ताह/माह, वर्ष इत्यादि) को x-अक्ष पर आलेखित किया जाता है और चरों के मानों (काल-श्रेणी ऑँकड़ों) को y-अक्ष पर आलेखित किया जाता है। इन आलेखित बिंदुओं को जोड़ने से प्राप्त रेखा-चित्र अंकगणितीय रेखा-चित्र (काल-श्रेणी आलेख) कहलाता है। यह लंबी अवधि के काल-श्रेणी ऑँकड़ों की प्रवृत्ति और आवर्तिता इत्यादि को समझने में सहायक होता है।
क्रियात्मक गतिविधि
- क्या तोरण वितरण के उन विभागकारी मानों की जानकारी देने में सहायक हो सकता है, जिन्हें यह प्रदर्शित करता है?
सारणी 4.11
| वर्ष | निर्यात | आयात |
| 1993-94 | 698 | 731 |
| 1994-95 | 827 | 900 |
| 1995-96 | 1064 | 1227 |
| 1996-97 | 1188 | 1389 |
| 1997-98 | 1301 | 1542 |
| 1998-99 | 1398 | 1783 |
| 1999-2000 | 1591 | 2155 |
| 2000-01 | 2036 | 2309 |
| 2001-02 | 2090 | 2452 |
| 2002-03 | 2549 | 2964 |
| 2003-04 | 2934 | 3591 |
| 2004-05 | 3753 | 5011 |
| 2005-06 | 4564 | 6604 |
| 2006-07 | 5718 | 8815 |
| 2007-08 | 6559 | 10123 |
| 2008-09 | 8408 | 13744 |
| 2009-10 | 8455 | 13637 |
| 2010-11 | 11370 | 16835 |
| 2011-12 | 14660 | 23455 |
| 2012-13 | 16343 | 26692 |
| 2013-14 | 19050 | 27154 |

यहाँ आप आरेख 4.9 में देख सकते हैं कि यद्यपि वर्ष 1993-94 से 2013-14 के बीच सभी वर्षों में निर्यात की अपेक्षा आयात अधिक थे। आप देख सकते हैं कि 2001-02 के बाद आयात और निर्यात दोनों के मानों में लगातार वृद्धि हुई है तथा 2001-02 के बाद दोनों (निर्यात व आयात) के बीच का अंतर बढ़ गया।
6. सारांश
अब तक आपने समझ लिया होगा कि ऑँकड़ों को विभिन्न रूपों में किस प्रकार प्रस्तुत किया जाए जैसे, पाठ-विषयक, सारणीबढ़ तथा रेखीय रूप में। साथ ही आप संगृहीत ऑँकड़ों की प्रस्तुति के लिए उपयुक्त विधि तथा आरेख के प्रकार का चुनाव भी कर सकेंगे। इस तरह से आप ऑँकड़ों को अर्थपूर्ण, बोधगम्य तथा उदेश्यपूर्ण तरीके से प्रस्तुत कर सकते हैं।
पुनरावर्तन
अभ्यास
निम्नलिखित 1 से 10 तक के प्रश्नों के सही उत्तर चुनें:
1. दंड-आरेख
2. आयत चित्र के माध्यम से प्रस्तुत किए गए ऑँकड़ों से आलेखी रूप से निम्नलिखित जानकारी प्राप्त कर सकते हैं:
3. तोरणों के द्वारा आलेखी रूप में निम्न की स्थिति जानी जा सकती हैः:
4. अंकगणितीय रेखा चित्र के द्वारा प्रस्तुत ऑँकड़ों से निम्न को समझने में मदद मिलती हैः:
5. निम्नलिखित कथनों में से सही या गलत बताएँ :
6. निम्नलिखित को प्रस्तुत करने के लिए किस प्रकार का आरेख अधिक प्रभावी होता है?
7. मान लीजिए, आप भारत में शहरी गैर-कामगारों की संख्या में वृद्धि तथा भारत में शहरीकरण के निम्न स्तर पर बल देना चाहते हैं, जैसा कि उदाहरण 4.2 में दिखाया गया है, तो आप उसका सारणीयन कैसे करंगे?
8. यदि किसी बारंबारता सारणी में समान वर्ग अंतरालों की तुलना में वर्ग अंतराल असमान हों, तो आयत-चित्र बनाने की प्रक्रिया किस प्रकार भिन्न होगी।
9. भारतीय चीनी कारखाना संघ की रिपोर्ट में कहा गया है कि दिसंबर 2001 के पहले पखवाड़े के दौरान 3,87,7000 टन चीनी का उत्पादन हुआ, जबकि ठीक इसी अवधि में पिछले वर्ष (2000 में) 3,78,7000 टन चीनी का उत्पादन हुआ था। दिसम्बर 2001 में घरेलू खपत के लिए चीनी मिलों से 2,83,000 टन चीनी उठाई गई और 41,000 टन चीनी निर्यात के लिए थी, जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि में घरेलू खपत की मात्रा 1,54,000 टन थी और निर्यात शून्य था।
10. निम्नलिखित सारणी में कारक लागत पर सकल घरेलू उत्पाद में क्षेत्रकवार अनुमानित वास्तविक संवृब्दि दर को (पिछले वर्ष से प्रतिशत परिवर्तन) प्रस्तुत किया गया है:
| वर्ष | कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्रक | उद्योग | सेवाएँ |
| 1994–95 | 5.0 | 9.2 | 7.0 |
| 1995–96 | -0.9 | 11.8 | 10.3 |
| 1996–97 | 9.6 | 6.0 | 7.1 |
| 1997–98 | -1.9 | 5.9 | 9.0 |
| 1998–99 | 7.2 | 4.0 | 8.3 |
| 1999–2000 | 0.8 | 6.9 | 8.2 |
