भारत का संविधान
कक्षा 11 के लिए इतिहास की पाठ्यपुस्तक



राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्
NATIONAL COUNCIL OF EDUCATIONAL RESEARCH AND TRAINING
11091 - विश्व इतिहास के कुछ विषय
कक्षा 11 के लिए पाठ्यपुस्तक
ISBN 81-7450-587-3
प्रथम संस्करण
जून 2006 ज्येष्ठ 1928
पुनर्मुद्रण
अप्रैल 2007, दिसंबर 2007,
मई 2009, जनवरी 2010,
जून 2011, फरवरी 2013,
नवंबर 2013, जनवरी 2014,
दिसंबर 2014, फरवरी 2016,
मार्च 2017, फरवरी 2018,
जनवरी 2019, दिसंबर 2019
और दिसंबर 2021
संशोधित संस्करण
अक्तूबर 2022, कार्तिक 1944
पुनर्मुद्रण
मार्च 2024 चैत्र 1946
जून 2024 ज्येष्ठ 1946
जनवरी 2025 पौष 1946
जून 2025 ज्येष्ठ 1947
मार्च 2026 फाल्गुन 1947
PD 25T BS
© राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, 2006, 2022
₹ 145.00
एन.सी.ईआर.टी. वॉटरमार्क 80 जी.एस.एम.
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प्रकाशन प्रभाग में सचिव, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, श्री अरविंद मार्ग, नयी दिल्ली 110016 द्वारा प्रकाशित तथा स्टालियन ग्राफिक्स प्रा. लि. डी-165, सेक्टर-63, नोएडा, यूपी. द्वारा मुद्रित।
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मुख्य उत्पादन अधिकारी (प्रभारी) : दीपक जैसवाल
संपादक : नरेश यादव
सहायक उत्पादन अधिकारी : सायुराज ए.आर.
आवरण एवं सज्जा
आर्ट क्रिएशंस, नयी दिल्ली
चित्रांकन
के. वर्गीज़
आमुख
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (2005) सुझाती है कि बच्चों के स्कूली जीवन को बाहर के जीवन से जोड़ा जाना चाहिए। यह सिद्धांत किताबी ज्ञान की उस विरासत के विपरीत है जिसके प्रभाववश हमारी व्यवस्था आज तक स्कूल और घर के बीच अंतराल बनाए हुए है। नयी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या पर आधारित पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकें इस बुनियादी विचार पर अमल करने का प्रयास हैं। इस प्रयास में हर विषय को एक मजबृत दीवार से घेर देने और जानकारी को रटा देने की प्रवृत्ति का विरोध शामिल है। आशा है कि ये कदम हमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) में वर्णित बाल-केंद्रित व्यवस्था की दिशा में काफ्री दूर तक ले जाएँगे।
इस प्रयत्न की सफलता अब इस बात पर निर्भर है कि स्कूलों के प्राचार्य और अध्यापक बच्चों को कल्पनाशील गतिविधियों और सवालों की मदद से सीखने और अपने अनुभव पर विचार करने का अवसर देते हैं। हमें यह मानना होगा कि यदि जगह, समय और आज्ञादी दी जाए तो बच्चे बड़ों द्वारा सौपी गई सूचना-सामग्री से जुड़कर और जूझकर नये ज्ञान का सृजन करते हैं। शिक्षा के विविध साधनों व स्वोतों की अनदेखी किए जाने का प्रमुख कारण पाठ्यपुस्तक को परीक्षा का एकमात्र आधार बनाने की प्रवृत्ति है। सर्जना और पहल को विकसित करने के लिए ज़रुरी है कि हम बच्चों को सीखने की प्रक्रिया में पूरा भागीदार मानें और बनाएँ, उन्हें ज्ञान की निर्थारित खुराक का ग्राहक मानना छोड़ दें।
ये उद्देश्य स्कूल की दैनिक जिंदगी और कार्यशैली में काफ्री फेरबदल की माँंग करते हैं। दैनिक समय-सारणी में लचीलापन उतना ही जरूरी है जितना वार्षिक कैलेण्डर के अमल में चुस्ती, जिससे शिक्षण के लिए नियत दिनों की संख्या हकीकत बन सके। शिक्षण और मूल्यांकन की विधियाँ भी इस बात को तय करेंगी कि यह पाठ्यपुस्तक स्कूल में बच्चों के जीवन को मानसिक द्बाव तथा बोरियत की जगह खुशी का अनुभव बनाने में कितनी प्रभावी सिद्ध होती है। बोझ की समस्या से निपटने के लिए पाठ्यक्रम निर्माताओं ने विभिन्न चरणों में ज्ञान का पुनर्निर्धारण करते समय बच्चों के मनोविज्ञान एवं अध्यापन के लिए उपलब्ध समय का ध्यान रखने की पहले से अधिक सचेत कोशिश की है। इस कोशिश को और गहराने के यत्न में यह पाठ्यपुस्तक सोच-विचार और विस्मय, छोटे समूहों में बातचीत एवं बहस और हाथ से की जाने वाली गतिविधियों को प्राथमिकता दैती है।
एन.सी.ई.आर.टी. इस पुस्तक की रचना के लिए बनाई गई पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति के परिश्रम के लिए कृतज्ञता व्यक्त करती है। परिषद् सामाजिक विज्ञान सलाहकार समूह के अध्यक्ष, प्रोफ्रेसर हरि वासुदेवन, इतिहास पाठ्यपुस्तक समिति के मुख्य सलाहकार, प्रोफ्रेसर नीलाद्रि भट्टाचार्य एवं सलाहकार, प्रोफ्रेसर नारायणी गुप्ता की विशेष आभारी है। इस पाठ्यपुस्तक के निर्माण में कई शिक्षकों ने योगदान दिया;
iv
इस योगदान को संभव बनाने के लिए हम उनके प्राचायों के आभारी हैं। हम उन सभी संस्थाओओं और संगठनों के प्रति कृतज़ हैं जिन्होंने अपने संसाधनों, सामग्री और सहयोगियों की मदद लेने में हमें उदारतापूर्वक सहयोग दिया। हम माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा प्रोफेसर मृणाल मीरी एवं प्रोफेसर जी.पी. देशपांडे की अध्यक्षता में गठित निगरानी समिति (मॉनिटरिंग कमेटी) के सदस्यों को अपना मूल्यवान समय और सहयोग देने के लिए धन्यवाद देते हैं। व्यवस्थागत सुधारों और अपने प्रकाशनों में निरंतर निखार लाने के प्रति समर्पित एन.सी.ई.आर.टी. टिप्पणियों एवं सुझावों का स्वागत करेगी जिनसे भावी संशोधनों में मदद ली जा सके।
निदेशक
नयी दिल्ली
20 दिसंबर 2005
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान
और प्रशिक्षण परिषद्
पाठ्यपुस्तकों में पाठ्य सामग्री का पुनर्स्योजन
कोविड-19 महामारी को देखते हुए, विद्यार्थियों के ऊपर से पाठ्य सामग्री का बोझ कम करना अनिवार्य है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में भी विद्यार्थियों के लिए पाठ्य सामग्री का बोझ कम करने और रचनात्मक नज़रिए से अनुभवात्मक अधिगम के अवसर प्रदान करने पर जौर दिया गया है। इस पृष्ठभूमि में, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् ने सभी कक्षाओं में पाठ्यपुस्तकों को पुनर्सयोजित करने की शुरुआत की है। इस प्रक्रिया में रा.शै.अ.प्र.प. द्वारा पहले से ही विकसित कक्षावार सीखने के प्रतिफलों को ध्यान में रखा गया है।
पाठ्य सामग्रियों के पुनर्सयोजन में निम्नलिखित बिंदुओं को ध्यान में रखा गया है -
वर्तमान संस्करण, ऊपर दिए गए परिवर्तनों को शामिल करते हुए तैयार किया गया पुनर्स्योजित संस्करण है।
विश्व इतिहास का अध्ययन
आप सोच रहे होंगे कि एक ही वर्ष के अंदर विश्व इतिहास का अध्ययन कैसे संभव है? आखिर, विश्व के विभिन्न देशों में इतना कुछ हुआ और प्रत्येक देश के बारे में इतना कुछ लिखा जा चुका है। इतने विस्तृत व असीम संग्रह से कुछ विषयों को ही हम अध्ययन के लिए कैसे चुन सकते हैं?
ये जायज्ञ सवाल हैं। विश्व इतिहास पर किसी पुस्तक को पढ़ने से पहले हमें इन प्रश्नों का उत्तर जानना चाहिए। किसी भी पाठ्यक्रम से यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसकी रचना किस प्रकार हुई है। इसी तरह से एक किताब से यह साफ्र होना चाहिए कि उसके क्या उद्देश्य हैं।
हमें यह याद रखना चाहिए कि इतिहास के अध्ययन अथवा लेखन में इतिहासकार सदैव तरह-तरह के चयन करता है। कई दशकों पहले ई.एच. कार ने इसी बात को अपनी उत्कृष्ट पुस्तक इतिहास क्या है में उठाया है। किसी पुराने अभिलेखागार में दस्तावेजों के ढेरों की जाँच-पड़ताल कर इतिहासकार उन तथ्यों को नोट करता है जो उसे महत्वपूर्ण जान पढ़ते हैं। वह अन्य जगहों के अभिलेखागारों से प्रमाण एकत्रित करता है और विभिन्न प्रमाणों व तथ्यों में अंतर्सबंध स्थापित करने का प्रयास करता है। न तो वह उन सभी चीजों को उतार सकता है जिसे उसने पढ़ा है और न ही वह हर प्रमाण का प्रयोग कर सकता है। जो प्रमाण उसे महत्वपूर्ण नहीं लगते उन्हें वह छोड़ देता है। बाद में कोई अन्य इतिहासकार उन्हीं स्रोतों को नए प्रश्नों के साथ पढ़ता है। नए इतिहासकार को अब कुछ ऐसे प्रमाण मिलते हैं जिन्हें पहले अनदेखा कर दिया गया था। वे इन प्रमाणों की व्याख्या करती हैं, नए अंतर्सबंध कायम करती है और इस तरह से इतिहास की एक नयी किताब लिख डालती हैं।
चयन की यह प्रक्रिया इतिहास लेखन में अंतर्निंहित रही है। इसलिए इतिहास पढ़ते समय यह देखना आवश्यक है कि इतिहासकार कैसी घटनाओं के बारे में लिख रहा है तथा कैसे उनकी व्याख्या कर रहा है। हमें इतिहासकार के प्रमुख तर्क और उसकी सोच के ढाँचे को जानना जरूरी है जिसके जरिए वे किन्हीं विशेष घटनाओं को समझता है।
हाल तक हम जो इतिहास पढ़ते आए हैं आमतौर पर वह आधुनिक पश्चिम के उद्य की कहानी रही है। यह कहानी निरंतर प्रगति और विकास की थीः विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, बाजार व व्यापार, तर्क तथा तर्कणावाद, आज्ञादी और स्वतंत्रता के विस्तार की। अक्सर किन्हीं विशेष घटनाओं का इतिहास पश्चिम की विजयी यात्रा की बड़ी कहानी का ही हिस्सा था। समस्त विश्व में साम्राज्यवादी प्रभुत्व अतीत की इसी अवधारणा पर आधारित था। पश्चिम अपने को इस प्रगति का अग्रदूत मानता था। वह यह मानता था कि विश्व को सभ्य बनाना, सुधार करना व करवाना, विभिन्न देशों के मूल निवासियों को शिक्षित करना, व्यापार व बाजारों का विस्तार करना उसकी खास ज्ञिम्मेवारी है।
क्या आज हमें इस समझ के बारे में प्रश्न नहीं उठाने चाहिए? ऐसा करने के लिए हमें विश्व इतिहास को फिर से देखना होगा। कई महाद्वीपों और लम्बे ऐतिहासिक कालों का सफर करते हुए हमें यह सोचना होगा कि विश्व इतिहास को नए तरीके से देखा जा सकता है। इस यात्रा में विश्व इतिहास के कृछ विषय आपकी मदद करेगी।
ऐसा यह तीन तरीकों से करेगी।
सबसे पहले यह पुस्तक विकास और प्रगति की महान कहानियों के पीछे छुपे ज्यादा ‘अँधेरे’ इतिहासों से आपका परिचय कराएगी। आप देखेंगे कि कैसे पंद्रहवीं, सोलहवीं शताब्दियों में दक्षिण अमरीका में अन्वेषकों और व्यापारियों के आगमन ने केवल पश्चिमी वाणिज्य और संस्कृति के लिए अपने द्वार ही नहीं खोले बल्कि इससे वहाँ विभिन्न तरह की बीमारियाँ फैलीं, सभ्यता का विनाश हुआ और आबादियों का खात्मा हो गया। बाद में उत्तरी अमरीका व ऑस्ट्रेलिया में गोरों के बसने का परिणाम केवल प्रगति नहीं (विषय 6) रहा। इन स्थानों में आधुनिक पूँजीवादी विकास के इतिहास के पीछे मूल निवासियों के विस्थापन व जन-संहार की भयानक कहानियाँ हैं।
viii
फिर जब आप अनुभाग दो में राज्यों व साम्राज्यों के निर्माण के बारे में पढ़ेंगे तो पाएँगे कि वह कहानी केवल रोम (विषय 2) यानि कि यूरोप की नहीं है बल्कि मध्य इस्लामिक राज्यों एवं मंगोलों के क्षेत्रों की (विषय 3) भी है। इन अध्यायों से आपको पता चलेगा कि इन जगहों पर समाज व राजनीतिक व्यवस्था अलग ढंग से संगठित थी।
यह पुस्तक अनुभाग चार में आधुनिकीकरण के विभिन्न रास्तों के बारे में भी आपको बताएगी। आप जानते होंगे कि औद्योगीकरण सबसे पहले ब्रिटेन में हुआ। एक ज्ञमाने में यह माना जाता था कि अन्य देशों ने विभिन्न तरीकों से ब्रिटिश मॉडल का ही अनुकरण किया। इसलिए अन्य देशों में औद्योगीकरण से जुड़े विकास को ब्रिटिश मॉडल के हिसाब से ही परखा जाता रहा। ऐसा तर्क फिर से पश्चिम को विश्व केंद्र के रूप में देखता है। लेकिन आज हम यह जानते हैं कि सारी रचनात्मकता पश्चिम से ही नहीं आई। दूसरी ओर यह कहना भी उच्चित नहीं होगा कि विश्व घटनाओं पर पश्चिम का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, या फिर प्रत्येक देश के इतिहास को अलग-थलग कर देखना चाहिए, या फिर हमें विकास की देशज जड़ों का ही परीक्षण करना चाहिए। ऐसा परिप्रेक्ष्य सीमित होगा और यह एक तरह की संकीर्णता पैदा करेगा। इसकी जगह हमें यह जानना आवश्यक है कि विभिन्न देशों में लोग अपनी दुनिया बनाने के लिए रचनात्मक तरीकों से काम करते रहे हैं और इन क्रियाकलापों का प्रभाव अन्य देशों और यूरोप सहित अन्य महाद्वीपों पर पड़ा है। विषय 5 में आप देखेंगे कि पुनर्जांगरण युगीन यूरोप की सांस्कृतिक गतिविधियों पर दुनिया के अन्य देशों में होने वाली घटनाओं का भी बहूत प्रभाव पड़ा।
इस पुस्तक में आपकी यात्रा आरंभिक नगरों (विषय 1) के विकास से शुरू होगी। आप फिर देखेंगे कि दुनिया के तीन अलग हिस्सों में कैसे बड़े राज्य-साम्राज्य विकसित हुए और इनको कैसे संगठित किया गया (अनुभाग दो)। अगले अनुभाग में आप देखेंगे कि कैसे नौवीं व पंद्रहवीं शताब्दियों के बीच यूरोपीय समाज व संस्कृति में बदलाव आया और, दक्षिणी अमरीका के लोगों के लिए यूरोपीय विस्तार का क्या अर्थ (अनुभाग तीन) था। अंततः आप आधुनिक विश्व के जटिल निर्माण का इतिहास पढ़ेंगे (अनुभाग चार)। आपको ये सभी अध्याय इन विषयों के विवादों से परिचित करवाएँगे ताकि आप समझ सकें कि इतिहासकार पुराने मुद्हों पर कैसे निरंतर पुनर्विचार करते रहते हैं।
प्रत्येक अनुभाग एक परिचय व कालरेखा से शुरू होता है। परीक्षा के लिए इन तिथिक्रमों को याद रखना ज़रूरी नहीं है। इनके द्वारा यह बताया गया है कि एक खास समय पर दुनिया के विभिन्न हिस्सों में क्या हो रहा था। इनसे आपको विभिन्न जगहों के सापेक्षिक इतिहास को जानने में मदद मिलेगी।
कालरेखाएँ बनाना एक कठिन काम है। किसी भी कालरेखा में हम किन तिथियों को शामिल करते हैं? इस पर हमेशा इतिहासकार एकमत नहीं रहे हैं। वास्तव में अगर आप एक ही काल से संबंधित विभिन्न पुस्तकों में दिए गए तिथिक्रमों की तुलना करें तो आप शायद पाएँगे कि उन सभी के मुख्य मुढे भिन्न है। इसलिए हमें प्रत्येक तिथिक्रम को आलोचनात्मक छंग से पढ़ना चाहिए। हमें यह देखना चाहिए कि कोई भी तिथिक्रम हमें क्या बताता है और क्या नहीं बताता है। कालरेखाएँ विशिष्ट रूप से इतिहास की रूपरेखा निर्धारित कर देती हैं।
इस वर्ष आप दक्षिण एशिया के इतिहास के बारे में नहीं पढ़ रहे हैं। अगले वर्ष की पुस्तक भारतीय इतिहास से जुड़े विषयों पर होगी। इन वर्षों (कक्षा 11 व 12) में आप विश्व इतिहास की निर्णायक घटनाओं और प्रक्रियाओं के बारे में ही नहीं बल्कि ये भी जानेंगे कि इतिहासकार अतीत के बारे में अपनी समझ़ कैसे बनाते हैं? आप देखेंगे कि वे किन स्रोतों का प्रयोग करते हैं और उन्हें कैसे समझते हैं। आप यह भी जानेंगे कि ऐतिहासिक ज्ञान विवादों व पुनव्याख्याओं के द्वारा कैसे बनता है।
नीलाद्रि भढ़ाचार्य
मुख्य सलाहकार, इतिहास
पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति
अध्यक्ष, सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक सलाहकार समिति
हरि वासुदेवन, प्रोफेसर, इतिहास विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय, कोलकाता
मुख्य सलाहकार
नीलाद्रि भट्टाचार्य, प्रोफ्रेसर, ऐतिहासिक अध्ययन केंद्र, समाज विज्ञान संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली
सलाहकार
नारायणी गुप्ता ( अवकाशप्राप्त प्रोफ्रेसर), इतिहास विभाग, जामिया मिलिया इस्लामिया, नयी दिल्ली (विषय 6)
सदस्य
अरूप बनर्जी, प्रोफ्रेसर, इतिहास विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
अनिल सेठी, प्रोफ्रेसर, सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, एन.सी.ई.आर.टी., नयी दिल्ली
चित्रा श्रीनिवासन, वरिष्ठ अध्यापिका, सरदार पटेल विद्यालय, नयी दिल्ली
जयरस वाणाजी, विजिटिंग प्रोफ्रेसर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली (विषय 2)
नजफ़ हैदर, एसोसिएट प्रोफ़ेसर, ऐतिहासिक अध्ययन केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली
बीबा सोब्ती, वरिष्ठ अध्यापिका, मॉडर्न स्कूल, नयी दिल्ली
ब्रिज तंखा, प्रोफेसर, पूर्व एशियाई अध्ययन विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली (विषय 7)
भास्कर चक्रवर्ती, प्रोफ्रेसर, इतिहास विभाग, कलकता विश्वविद्यालय, कोलकाता (विषय 5)
रजत दत, प्रोफ्रेसर, ऐतिहासिक अध्ययन केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली (विषय 4)
रीतू सिंह, असिस्टेंट प्रोफ्रेसर, सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, एन.सी.ई.आर.टो., नयी दिल्ली लक्ष्मी सुब्रमण्यम, प्रोफ्रेसर, पूर्व एशियाई अध्ययन केंद्र, कोलकाता
सुनील कुमार, एसोसिएट प्रोफ्रेसर, इतिहास विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली (विषय 3)
सुप्रिया वर्मा, एसोसिएट प्रोफ्रेसर, इतिहास विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद
शीरीन रत्लागर (अवकाशप्राप्त प्रोफेसर), इतिहास अध्ययन केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली (विषय 1)
हिंदी अनुवाद
अनिल सेठी, प्रोक्रेसर, सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, एन.सी.ई.आर.टी., नयी दिल्ली
परशुराम शर्मा, भूतपूर्व निदेशक (राजभाषा), भारत सरकार
प्रत्यूष कुमार मंडल, एसोसिएट प्रोफेसर, सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, एन.सी.ई.आर.टी., नयी दिल्ली राजेन्द्र प्रसाद तिवारी (अवकाशप्राप्त अनुसंधान अधिकारी), इतिहास एवं पुरातत्व, वैज्ञानिक एवं तकनीर्क शब्दावली आयोग, नयी दिल्ली
रीतू सिंह, असिस्टेंट प्रोफ्रेसर, सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, एन.सी.ई.आर.टी., नयी दिल्ली
संजीव कुमार, हिंदी विभाग, देशबंधु कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
सीमा एस. ओझा, असिस्टेंट प्रोफ्रेसर, सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, एन.सी.ई.आर.टी., नयी दिल्ली
सदस्य-समन्वयक
प्रत्यूष कुमार मंडल, ग्रोफ्रेसर, सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, एन.सी.ई.आर.टी., नयी दिल्ली
आभार
चित्रों के लिए आभार
विषय सूची
आमुख ____ iii
प्रस्तावना ____ vii
अनुभाग एक – प्रारंभिक समाज
भूमिका ____ 2
कालक्रम एक – (6 लाख वर्ष पूर्व से 1 ई.पू.) ____ 4
विषय 1: लेखन कला और शहरी जीवन ____ 9
अनुभाग दो - साम्राज्य
भूमिका 30
कालक्रम दो – (लगभग 100 ई.पू. से 1300 ईसवी)____ 34
विषय 2: तीन महाद्रीपों में फैला हुआ साग्राज्य____ 38
विषय 3: यायावर साम्नाज्य____ 58
अनुभाग तीन – बदलती परंपराएँ
भूमिका 78
कालक्रम तीन – (लगभग 1300-1700) ____ 82
विषय 4: तीन वर्ग ____ 86
विषय 5: बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ 106
अनुभाग चार – आधुनिकीकरण की ओर
भूमिका 124
कालक्रम चार – (लगभग 1700-2000) ____ 128
विषय 6: मूल निवासियों का विस्थापन ____ 135
विषय 7: आधुनिकीकरण के रास्ते ____ 153
निष्कर्ष 182

उद्देशिका
हम, भारत के लोग, भारत को एक ¹[संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य] बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को :
सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म
और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता
प्राप्त कराने के लिए,
तथा उन सब में
व्यक्ति की गरिमा और ²[राष्ट्र की एकता
और अखंडता] सुनिश्चित करने वाली बंधुता
बढ़ाने के लिए
दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई. को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
