EDU TERIA Logo
Unit1

कालक्रम एक

500

प्रारंभिक समाज

लेखन कला और शहरी जीवन

Textbook illustration

प्रारंभिक समाज

स अनुभाग में, हम प्रारंभिक समाजों से संबंधित विषय के बारे में पढ़ेंगे जो सुदूर अतीत में, लाखों साल पहले, मानव अस्तित्व की शुरुआत के बारे में है। आपके शिक्षक आपको बताएँगे कि सर्वप्रथम अफ्रीका में मानव प्राणियों का प्रादुभाव कैसे हुआ और पुरातत्व विज्ञानियों ने इतिहास के इन प्रारंभिक चरणों के बारे में, हड्डियों और पत्थर के औज्ञारों के अवशेषों की सहायता से, कैसे अध्ययन किया।

पुरातत्व विज्ञानियों ने आरंभिक मानव के जीवन के बारे में पुनर्निर्माण करने के प्रयत्न किए हैं। उन्होंने यह जानने की कोशिश की है कि वे कैसे घरों में रहते थे, वे पेड्ड़-पौधों से उत्पन्न कंदमूल एवं बीजों को इकड्टा करके और जानवरों का शिकार करके अपना भरण-पोषण कैसे करते थे और वे किन तरीकों से अपने भावों एवं विचारों को अभिव्यक्त करते थे। आप यह भी पढ़ेंगे कि आदमी द्वारा आग और भाषा का प्रयोग कब और कैसे शुरू हुआ और अंत में आप यह देखेंगे कि आज की दुनिया में भी जो लोग शिकार और पेड्ड़-पौधों से प्राप्त खाद्य-सामग्रियों से अपना भरण-पोषण करते हैं क्या उनके जीवन का अध्ययन करने से अतीत के बारे में जानकारी मिल सकती है।

विषय एक में कुछ प्रारंभिक नगरों जैसे- मेसोपोटामिया (वर्तमान इराक) के कुछ शहरों के बारे में चर्चा की गई है। इन नगरों का विकास मंदिरों के आस-पास हुआ था। ये नगर सुदूर व्यापार के केंद्र थे। पुरातात्विक साक्ष्यों यानी पुरानी बस्तियों के अवशेषों और बहुतायत से पाई जाने वाली लिखित सामग्रियों के आधार पर उस समय के भिन्न-भिन्न लोगों – शिल्पियों, लिपिकों, श्रमिकों, पुरोहितों, राजा-रानियों आदि के जीवन के पुनर्निर्माण का प्रयत्न किया गया है। आप यह भी देखेंगे कि इनमें से शहरों तथा कस्बों में पशुचारक समुदाय के लोग अपनी महत्वपूर्ण भूमिका कैसे निभाते थे। एक विचारणीय प्रश्न यह है कि यदि लेखन कला का विकास नहीं हुआ होता, तो इन शहरों में विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँँ कैसे संभव होतीं?

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि लाखों वर्षों तक जंगलों, गुफ्राओं अथवा कामचलाऊ घरों-आसरों तथा शिलाश्रयों में रहने वाले इनसानों ने आगे चलकर गाँवों और शहरों में रहना कैसे शुरू किया। यह एक लंबी कहानी है और ऐसी अनेक घटनाओं से जुड़ी है जो सर्वप्रथम नगरों की स्थापना से कम-से-कम पाँच हज्ञार वर्ष पहले घटित हुई थी।

अत्यंत दूरगामी प्रभाव डालने वाले परिवर्तनों में से एक थाः धीरे-धीरे खानाबदोश जिंदगी को छोड़कर खेती के लिए एक स्थान पर बस जाना, जो लगभग दस हज्ञार साल पहले शुरू हो गया था। आपके शिक्षक आपको बताएँगे कि खेती अपनाने से पहले, लोग कैसे अपने भोजन के लिए पेड्ड-पौधों की उपज इकट्टी किया करते थे। धीरे-धीरे उन्होंने भिन्न-भिन्न पौधों के बारे में जानकारी प्राप्त की; जैसे- वे कहाँँ उगते हैं, वे किस मौसम में फलते हैं, आदि-आदि। इस जानकारी के आधार पर उन्होंने पौधे उगाना सीख लिया। पश्चिमी एशिया में, गेहूँ और जौ, मटर और कई तरह की दालों की फसलें उगाई जाती थीं। पूर्वी तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया में ज्वार-बाजरा और धान की फसलें आसानी से उगाई जा सकती थीं। ज्वार-बाजरा अफ्रीका में पैदा किया जाता था। उन्हीं दिनों, लोगों ने भेड़-बकरी, ढोर, सूूअर और गधा जैसे जानवरों को पालतू बनाना सीख लिया था। तब, पौधों से निकलने वाले रेशों, जैसे रूई तथा पटसन और पशुओं पर उगने वाले रेशों जैसे ऊन आदि से कपड़े बुने जाने लगे थे। कुछ समय बाद, आज से लगभग पाँच हज्ञार साल पहले ढोरों और गधों जैसे पालतू जानवरों को हलों तथा गाडियों में जोता जाने लगा था।

इन घटनाक्रमों के फलस्वरूप और भी अनेक परिवर्तन हुए। जब लोग फसलें उगाने लगे तो उन्हें एक ही स्थान पर तब तक रहना पड़ता था जब तक कि उनकी उगाई हुई फसल पक न जाए। इसलिए एक स्थान पर बसकर रहना आम बात हो गई और इसके फलस्वरूप, लोग अपने रहने के लिए अधिक स्थायी घर बनाने लगे।

इसी बीच कुछ जन-समुदायों ने मिट्री के बर्तन बनाना भी सीख लिया। अनाज और अन्य उपज इकट्टी करने के लिए और नए उगाए गए अनाजों से तरह-तरह के भोजन बनाने के लिए इन बर्तनों का इस्तेमाल किया जाने लगा। वस्तुतः खाद्य पदार्थों को अधिक स्वादिष्ट और सुपाच्य बनाने के लिए, भोजन बनाने की प्रक्रिया पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा।

साथ ही, पत्थर के औज्ञार बनाने के तरीकों में भी बदलाव आया। हालॉँकि औज्ञार बनाने के पहले वाले तरीके भी चालू रहे पर कुछ औज्ञारों तथा उपकरणों को, घिसाई की विशद प्रक्रिया के जरिये, चिकना और पॉलिशदार बनाया जाने लगा। अनेक नए उपकरण बनाए गए; जैसे – अनाज की पिसाई और सफाई करने के लिए ओखली व मूसल और पत्थर की कुल्हाड़ी, कसिया और फावड़ा जिनसे जुताई के लिए भूमि साफ की जाती थी और बीज बोने के लिए खुदाई की जाती थी।

कुछ इलाकों में, लोग ताँबा और टिन (राँगा) जैसी धातुओं के खनिजों का उपयोग करना सीख गए। कभी-कभी, ताँबे के खनिजों को इक्टु करके उनके खास नीले, हरे रंग की वजह से उनका इस्तेमाल किया जाता था। इससे आगे चलकर धातुओं से गहने और औजार बनाने का रास्ता खुल गया।

दूरस्थ स्थानों (और समुद्रों) से उत्पन्न होने वाली कुछ अन्य प्रकार की चीजों के बारे में भी जानकारी बढ़ती जा रही थी। ये चीजें थीं: लकड़ी, पत्थर, हीरे-जवाहरात, धातुएँ, सीपियाँ और ऑस्पीडियन (ज्वालामुखी का पक्का जमा हुआ लावा)। स्पष्टतः लोग इन चीजों और इनके बारे में अपनी जानकारी के साथ एक स्थान से दूपरे स्थान पर जाते रहते थे और उनका प्रसार करते रहते थे।

इस प्रकार व्यापार में वृद्धि होती गई, गाँवों और कस्बों का विकास होता गया और लोगों का आवागमन बढ़ता गया, जिसके फलस्वरूप पुराने छोटे-छोटे जन-समुदायों के स्थान पर छोटे-छोटे राज्य विकसित हो गए। यद्यपि ये परिवर्तन बहुत धीमी गति से हुए और इस प्रक्रिया में कई हज्ञार वर्ष लग गए, लेकिन जब शहर स्थापित हो गए और उनका विकास होने लगा तो इन परिवर्तनों की रप्तार भी तेज़ हो गई। इसके अलावा, इन परिवर्तनों के दूरगामी परिणाम निकले। कुछ विद्धानों

4 विश्व इतिहास के कुछ विषय

ने तो इसे ‘क्रांति’ कहकर पुकारा, क्योंकि लोगों के जीवन में संभवतः इतना अधिक परिवर्तन आ गया था कि उन्हें पहचानना ही मुश्चिकल हो गया था। जब आप आरंभिक इतिहास में इन दो विपरीत विषयों का अन्वेषण करें तो इन निरंतरताओं और परिवर्तनों का अवश्य अवलोकन करें।

यह भी याद रखें कि हमने प्रारंभिक समाजों में से कुछ को ही उदाहरण के तौर पर विस्तृत अध्ययन के लिए चुना है। इनके अलावा, और भी कई प्रकार के प्रारंभिक समाज थे; जैसे - किसान समुदाय और पशुचारक यानी ग्वाले लोग, शिकारी–संग्राहक समुदाय और नगरवासी लोग। कालक्रम एक से अपको इन समाजों और लोगों के बारे में कुछ संकेत मिलेंगे।

कालक्रम का अध्ययन कैसे करें

आप इस प्रकार का कालक्रम पुस्तक के प्रत्येक अनुभाग (section) में पाएँगे।

प्रत्येक कालक्रम आपको विश्व इतिहास की प्रमुख प्रक्रियाओं और घटनाओं के बारे में बताएगा। जब आप इन कालक्रमों का अध्ययन कर रहे हों तो यह ध्यान रखें-

•
राजाओं के बीच लड़े गये युढ्दों की अपेक्षा उन प्रक्रियाओं या घटनाओं, जिनके द्वारा सामान्य स्त्रियों और पुरुषों ने इतिहास को प्रभावित किया, की तिथियों को अंकित करना अधिक कठिन है।
•
कुछ तिथियाँ किसी प्रक्रिया के आरंभ या उसकी परिपक्व अवस्था को दर्शाती हैं।
•
इतिहासकार लगातार नए-नए साक्ष्यों के आधार पर तिथियों में संशोधन कर रहे हैं या पुरानी तिथियों के निर्धरण के लिए नए तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
•
यद्धपि हमने कालक्रम को सुविधा की दृष्टि से भौगोलिक आधार पर बाँटा है पर वास्तविक ऐतिहासिक विकास प्रायः इन सीमाओं के पार जाते हैं।

- ऐतिहासिक प्रक्रियाओं में काल-अनुक्रम प्रायः ऊपर-नीचे या अतिव्यापित (overlapping) हो जाता है।

- मानव इतिहास की कुछ युगांतरकारी घटनाओं को ही यहाँं दिया गया है- इनकी प्रक्रियाओं का वर्णन आने वाले अध्यायों में किया गया है जिनके पूथक कालक्रम भी हैं।

- जहाँ पर आप एक* देखेंगे वहाँ पर आपको एक चित्र दिखाई देगा जो कि खाने में लिखी तिथि से संबंधित है।

- कालक्रमों में दिए गए खाली खानों का यह अर्थ नहीं है कि उस काल में कुछ भी विशेष घटित नहीं हुआ – कभी–कभी यह हमें बताता है कि हमें अभी तक यह पता नहीं है कि उस काल में क्या घटित हुआ।

- अगले वर्ष हम दक्षिण एशिया के इतिहास और विशेष रूप से भारतीय इतिहास का अध्ययन करेंगे। दक्षिण एशिया के बारे में दी गई तिथियाँ उस उपमहाद्वीप में हुए केवल कुछ विकासों को ही दर्शाती हैं।

(6 लाख वर्ष पूर्व से 1 ई.पू.)

Textbook illustration

यह कालक्रम मानव के उद्य, पौधों और पशुओं के बसने की प्रक्रिया (domestication) के बारे में प्रकाश डालता है। यहाँ पर कुछ प्रमुख प्रौद्योगिक विकासों; जैसे- आग का आविष्कार, धातुओं के प्रयोग, हल द्वारा खेती तथा पहिए या चाक के प्रयोग के बारे में जानकारी मिलती है। इस प्रक्रिया में नगरों का आविर्भाव और लेखन के प्रयोग के बारे में भी बताया गया है। आपको यहाँ पर कुछ प्राचीनतम साम्राज्यों का भी उल्लेख मिलेगा जिनकी विषय-वस्तु विस्तार से कालक्रम दो में दी जाएगी।

तिथिअफ्रीकायूरोप
6 लाख वर्ष पूर्व-500,000 वर्ष वर्तमान से पूर्वआस्ट्रेलोपिधिकस के जीवाश्म (वर्तमान से 56 लाख वर्ष पूर्व अग्न के प्रयोग के साक्ष्य मिले (वर्तमान से 14 लाख वर्ष पूर्व)
500,000-150,000 वर्तमान से पूर्वप्राज मानव (होमो सैपिक्स) के जीवाश्म (195,000 वर्तमान से पूर्व)अग्न के प्रयोग के साक्ष्य (400,000 वर्तमान से पूर्व)
150,000-50,000 वर्तमान से पूर्व
50,000-30,000प्राज मानव (होमो सैपिक्स) के जीवाश्म (40,000)
30,000-10,000गुफाओं/गुफा आवासों में चित्रकारी (27,500)गुफाओं/गुफा आवासों में चित्रकारी (विशेषकर फ्रांस और स्पेन में)
8000-7000 ई.पू.
7000-6000पशुओं और कुन्तों को पालतू बनाया गया
6000-5000गेहूँ और जौ की खेती (यूनान)
5000-4000
4000-3000गधे को पालतू बनाया गया, ज्वार-बाजरा आदि की खेती, ताँबे का प्रयोगताँबे का प्रयोग (क्रीट)
3000-2000हल द्वारा कृषि, प्रथम राजवंशों, नगरों, पिरामिडों, कैलेंडर, चित्रात्मक लिपि*, पैपाइरस पर लेखन (मिस्त्र)घोड़े को पालतू बनाया गया (पूर्वी यूरोप)
2000-1900नगरों, महलों, काँसे का प्रयोग, कुम्हार के चाक, व्यापार का विकास (क्रीट)
1900-1800
1800-1700
1700-1600लिपि का विकास (क्रीट)*
1600-1500
1500-1400काँच की बोतलों का प्रयोग (मिस्त्र)
1400-1300
1300-1200
1200-1100
1100-1000लोहे का प्रयोग हुआ
1000-900
900-800पश्चिम एशिया के फोनिशियनों ने उत्तरी अफ्रीका में कार्थेज नगर की स्थापना की; भूमध्यसागरीय क्षेत्र में व्यापार का विस्तार
800-700लोहे का प्रयोग (सूडान)प्रथम ओलपिक खेल (यूनान 776 ई.पू.)
700-600लोहे का प्रयोग (मिस्त्र)
600-500सिक्कों का प्रयोग* (यूनान); रोम गणराज्य की स्थापना (510 ई.पू.)
500-400फ्रारसियों का मिस्त्र पर आक्रमणएथ्न्स में ‘प्रजातंत्र’ की स्थापना (यूनान)
400-300मिस्त्र में सिकंदरिया (Alexandria) की स्थापना (332 ई.पू.) जो ज्ञान का प्रमुख केन्द्र बनामकदूनिया (Macedonia) के सिकंदर ने मिस्त्र और पश्चिम एशिया के भागों को जीता (336-323 ई.पू.)
300-200
200-100
100-1 ई.पू.
तिथिएशियादक्षिण एशिया
6 लाख-500,000 वर्तमान से पूर्वअग्नि का प्रयोग (700,000 वर्तमान से पूर्व, चीन)रिवात में पाषाणकालीन स्थल (1,900,000 वर्तमान से पूर्व, पाकिस्तान)
500,000-150,000 कर्तमान से पूर्व
150,000-50,000 कर्तमान से पूर्वप्राज मानव (होमो सैपियंस) के जीवाशम (100,000 वर्तमान से पूर्व, पश्चिम एशिया)
50,000-30,000 कर्तमान से पूर्व
30,000-10,000 कर्तमान से पूर्वकुत्ते को पालतू बनाया गया (14,000, पश्चिम एशिया)भीमबैटका के गुफा चित्र (मध्य-प्रदेश); होमो सैपियंस के जीवाशम (25,500 वर्तमान से पूर्व, श्रीलंका)
8000-7000 ई.पू.भेड और बकरियों को पालतू बनाया गया, गेहू और जौ की खेती (पश्चिम एशिया)
7000-6000सूअर और पशुओं को पालतू बनाया (पश्चिम और पूर्व एशिया)प्रारंभिक कृषि-बस्तियाँ (बलूचिस्तान)
6000-5000कुक्कुट-पालन, ज्वार-बाजरा तथा अरबी (yam) की खेती (पूर्वी एशिया)
5000-4000कपास की खेती (दक्षिण एशिया); ताँबे का प्रयोग (पश्चिम एशिया)
4000-3000कुम्हार के चाक का प्रयोग, यातायात के लिए पहिए का प्रयोग (3600 ई.पू.), लेखन का प्रयोग (3200 ई.पू., मेसोपोटामिया), कासे का प्रयोगताँबे का प्रयोग
3000-2000हल कृषि, नगर (मेसोपोटामिया); सिल्क का प्रयोग (चीन); घोड़े को पालतू बनाया गया (मध्य एशिया); चावल की खेती (दक्षिण-पूर्व एशिया)हड्डपाकालीन संस्कृति के नगर, लिपि* का प्रयोग (लगभग 2700 ई.पू.)
2000-1900खास पानी में रहने वाली भेंस को पालतू बनाया गया (पूर्वी एशिया)
1900-1800
1800-1700
1700-1600
1600-1500नगरों, लेखन, राज्यों (शांग राजवंश), काँसे का प्रयोग हुआ (चीन)*
1500-1400लोहे का प्रयोग हुआ (पश्चिम एशिया)छहग्वेद की रचना
1400-1300
1300-1200
1200-1100लोहे का प्रयोग, महापाषाण (megaliths) (दकन और दक्षिण भारत)
1100-1000एक कोहान वाले ऊँट को पालतू बनाया (अरब)
1000-900
900-800
800-700
700-600
600-500सिक्कों का प्रयोग (तुर्की); फारसी साम्राज्य (546 ई.पू.) जिसकी राजधानी पसिपोलिस थी; चीनी दार्शनिक कन्यूशियस (लगभग 551 ई.पू.)अनेक क्षेत्रों में नगरों और राज्यों की स्थापना, पहली बार सिक्कों का प्रयोग, जैन और बौढ़ धर्म का प्रसार
500-400
400-300मौर्य साम्राज्य की स्थापना (लगभग 321 ई.पू.)
300-200चीन में एक साम्राज्य की स्थापना (221 ई.पू.), चीन की विशाल दीवार के निर्माण-कार्य का प्रारंभ
200-100
100-1 ई.पू
तिथिअमरीकाआस्ट्रेलिया/प्रशान्त महासागरीय छ्रीप
6 लाख-500,000 वर्तमान से पूर्व
500,000-150,000 वर्तमान से पूर्व
150,000-50,000 वर्तमान से पूर्व
50,000-30,000 वर्तमान से पूर्वप्राज मानव (होमो सैपियंस) के जीवाश्म, समुद्र-यात्रा के प्राचीनतम संकेत (45,000 वर्ष वर्तमान से पूर्व)
30,000-10,000 वर्तमान से पूर्वहोमो सैपियंस के जीवाश्म (12,000 वर्ष वर्तमान से पूर्व)चित्रकला (20,000 वर्ष वर्तमान से पूर्व)
8000-7000 ई.पू
7000-6000कुम्ह्द्डा (Squash) की खेती
6000-5000क्रियाकलापप्रत्येक छह खानों सेएक तिथि को लीजिएऔर उस क्षेत्र में रहनेबाले पुरुषों और स्त्रियोंके लिए उस तिथि कीप्रक्रिया/घटना का क्यामहत्व रहा होगा, इसपर विचार-विमर्श कीजिए।
5000-4000सेम की खेती
4000-3000कपास और लौकी की खेती
3000-2000गिनि पिंग, टर्की को पालतू बनाया, मक्के की खेती
2000-1900आलू, मिर्च*, कैसावा, मूँगफली की खेती, लामा* और ऐल्पेका को पालतू बनाया
1900-1800
1800-1700
1700-1600
1600-1500
1500-1400
1400-1300
1300-1200
1200-1100मैक्सिको खाड़ी के चारों और ओल्मेक लोगों की बस्तियाँ, प्रार्भिक मंदिर और मूर्ति-शिल्पपोलिनेशिया और माइक्रोनेशिया में बस्तियाँ
1100-1000
1000-900चित्रात्मक लिपि का विकास
900-800
800-700
700-600
600-500
500-400
400-300
300-200
200-100
100-1 ई.पू
[Table rendering requires HTML format]
[Table rendering requires HTML format]

क्रियाकलाप

शहरी जीवन की शुरुआत मेसोपोटामिया* में हुई थी। फ्रात (Euphrates) और दज्जला (Tigris) नदियों के बीच स्थित यह प्रदेश आजकल इराक गणराज्य का हिस्सा है। मेसोपोटामिया की सभ्यता अपनी संपन्नता, शहरी जीवन, विशाल एवं समृद्ध साहित्य, गणित और खगोलविद्या के लिए प्रसिद्ध है। मेसोपोटामिया की लेखन-प्रणाली और उसका साहित्य पूर्वी भूमध्यसागरीय प्रदेशों और उत्तरी सीरिया तथा तुकर्ण में 2000 ई.पू. के बाद फैला, जिसके फलस्वरूप उस समस्त क्षेत्र के राज्यों के बीच आपस में, यहाँँ तक कि मिस्त्र के फ्राओ (Pharaoh) के साथ भी मेसोपोटामिया की भाषा और लिपि में लिखा-पढ़ी होने लगी। यहाँँ हम शहरी जीवन और लेखन के बीच के संबंधों की खोज करने का प्रयत्न करेंगे और फिर यह जानना चाहंगे कि लेखन की सतत परंपरा से क्या-क्या प्रतिफल प्राप्त हुए।

अभिलिखित इतिहास के आरांभिक काल में, इस प्रदेश को मुख्यतः इसके शहरीकृत दक्षिणी भाग को (नीचे विवरण देखें) सुमेर (Sumer) और अक्कद (Akkad) कहा जाता था। 2000 ई.पू. के बाद जब बेबीलोन एक महत्वपूर्ण शहर बन गया तब दक्षिणी क्षेत्र को बेबीलोनिया कहा जाने लगा। लगभग 1100 ई.पू. से, जब असीरियाइयों ने उत्तर में अपना राज्य स्थापित कर लिया, तब उस क्षेत्र को असीरिया (Assyria) कहा जाने लगा। उस प्रदेश की प्रथम ज्ञात भाषा सुमेरियन यानी सुमेरी थी। धीरे-धीरे 2400 ई.पू. के आसपास जब अक्कदी भाषी लोग यहाँँ आ गए तब अक्कदी ने सुमेरी भाषा का स्थान ले लिया। अक्कदी भाषा सिकंदर के समय (336-323 ई.पू.) तक कुछ क्षेत्रीय परिवर्तनों के साथ फलती-फूलती रही। 1400 ई.पू. से धीरे-धीरे अरामाइक (Aramaic) भाषा का भी प्रवेश शुरू हुआ। यह भाषा हिबू से मिलती-जुलती थी और 1000 ई.पू. के बाद व्यापक रूप से बोली जाने लगी थी। यह आज भी इराक के कुछ भागों में बोली जाती है।

मेसोपोटामिया में पुरातत्वीय खोजों की शुरुआत 1840 के दशक में हुई। वहाँ एक या दो स्थलों पर (जैसे उरुक और मारी में, जिन पर आगे चर्चा करेंगे) उत्खनन कार्य कई दशकों तक चलता रहा। (भारत में किसी भी स्थल पर इतने लंबे अरसे तक खुदाई की कोई परियोजना नहीं चली।) इन खुदाइयों के फलस्वरूप आज हम इतिहास के स्रोतों के रूप में सैकड़ों की संख्या में इमारतों, मूर्तियों, आभूषणों, कब्रों, औज्ञारों और मुद्राओं का ही नहीं बल्कि हज्ञारों की संख्या में लिखित दस्तावेजों का भी अध्ययन कर सकते हैं।

यूरोपवासियों के लिए मेसोपोटामिया इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि बाईबल के प्रथम भाग ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ में इसका उल्लेख कई संदर्भों में किया गया है। उदाहरण के लिए, ओल्ड टेस्टामेंट की ‘बुक ऑफ जेनेसिस’ (Book of Genesis) में ‘शिमार’ (shimar) का उल्लेख है जिसका तात्पर्य अर्थात् सुमेरे ईटों से बने शहरों की भूमि से है। यूरोप के यात्री और विद्धज्जन मेसोपोटामिया को एक तरह से अपने पूर्वजों की भूमि मानते थे, और जब इस क्षेत्र में पुरातत्वीय खोज की शुरुआत हुई तो ओल्ड टेस्टामेंट के अक्षरशः सत्य को सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया।

उन्नीसर्वीं सदी के मध्य से, मेसोपोटामिया के अतीत को खोजे जाने के उत्साह में कभी कोई कमी नहीं आई। सन 1873 में एक ब्रिटिश सामाचार-पत्र ने ब्रिटिश म्यूजियम द्वारा

11091CH02
11091CH02

*मेसोपोटामिया नाम यूनानी भाषा के दो शब्दों मेसोस (Mesos) यानी मध्य और पोटैमोस (Potamos) यानी नदी से मिलकर बना है। इसलिए ‘मेसोपोटामिया शब्द दजला फ़रात नदियों के बीच की ऊपजाऊ धरती को इंगित करता है।

बाईबल के अनुसार यह जलप्लावन पृथ्वी पर संपूर्ण जीवन को नष्ट करने वाला था। किंतु परमेश्वर ने जलप्लावन के बाद भी जीवन को पृथ्वी पर सुरक्षित रखने के लिए नोआ (Naoh) नाम के एक मनुष्य को चुना। नोआ ने एक बहुत विशाल नाव बनायी और उसमें सभी जीव-जंतुओं का एक-एक जोड़ा रख लिया और जब जलप्लावन हुआ तो बाकी सब कुछ नष्ट हो गया पर नाव में रखे सभी जोड़े सुरक्षित बच गए। ऐसी ही एक कहानी मेसोपोटामिया के परंपरागत साहित्य में भी मिलती है; इस कहानी के मुख्य पात्र को ‘ज़िउसूद्र’ (Ziusudra) या ‘उत्नापिष्टिम’ (Utnapishtim) कहा जाता था।

मानचित्र 1 : पश्चिम एशिया।

क्रियाकलाप 1

जलप्लावन के बारे में अनेक समाजों में अपनी-अपनी पुराण-कथाएँ प्रचलित हैं। ये कुछ ऐसे तरीके हैं जो इतिहास में हुए महत्चपूर्ण परिवर्तनों की यादों का अमिट रखते हुए अभिव्यक्त करते हैं। इनके बारे में कुछ और जानकारी का पता लगाएँ और यह बताएँ कि जलप्लावन से पहले और उसके बाद का जनजीवन कैसा रहा होगा।

प्रारंभ किए गए खोज अभियान का खर्च उठाया जिसके अंतर्गत मेसोपोटामिया में एक ऐसी पट्टिका (Tablet) की खोज की जानी थी जिसपर बाईबल में उल्लिखित जलप्लावन (Flood) की कहानी का अंकन था।

1960 के दशक तक यह समझा जाता था कि ओल्ड टेस्टामेंट की कहानियाँ अक्षरशः सही नहीं हैं लेकिन ये इतिहास में हुए महत्वपूर्ण परिवर्तनों के अतीत को अपने ढंग से अभिव्यक्त करती हैं। धीरे-धीरे, पुरातास्त्विक तकनीकें अधिकाधिक उन्नत और परिष्कृत होती गई। इसके अलावा भिन्न-भिन्न पहलुओं पर ध्यान दिया जाने लगा, यहाँ तक कि आम लोगों के जीवन की भी परिकल्पना की जाने लगी। बाईबल की कहानियों की अक्षरशः सच्चाई को प्रमाणित करने का कार्य गौण हो गया। आगे के अनुभागों में हम जिन बातों पर चर्चा करेंगे उनमें से अधिकांश इन परवर्ती अध्ययनों पर आधारित हैं।

Textbook illustration

मेसोपोटामिया और उसका भूगोल

इराक भौगोलिक विवधता का देश है। इसके पूर्वात्तर भाग में हरे-भरे, ऊँचे-नीचे मैदान हैं जो धीरे-धीरे वृक्षाच्छादित पर्वत- शृंखला के रूप में फैलते गए हैं। साथ ही यहाँ स्वच्छ झरने तथा जंगली फूल हैं। यहाँ अच्छी फ्रसल के लिए पर्याप्त वर्षा हो जाती है। यहाँ 7000 से 6000 ई.पू. के बीच खेती शुरू हो गई थी। उत्तर में ऊँची भूमि है जहाँ 'स्टेपी'–घास के मैदान हैं, यहाँ पशुपालन खेती की तुलना में आजीविका का अधिक अच्छा साधन है। सर्दियों की वर्षा के बाद, भेड़-बकरियाँ यहाँ उगने वाली छोटी-छोटी झाडियों और घास से अपना भरण-पोषण करती हैं। पूर्व में दज्जला की सहायक नदियाँ ईरान के पहाड़ी प्रदेशों में जाने के लिए परिवहन का अच्छा साधन हैं। दक्षिणी भाग एक रेगिस्तान है और यही वह स्थान है जहाँ सबसे पहले नगरों और लेखन-प्रणाली का प्रादुर्भाव हुआ (नीचे देखिए)। इन रेगिस्तानों में शहरों के लिए भरण-पोषण का साधन बन सकने की क्षमता थी। क्योंकि फ्रारात और दज्जला नाम की नदियाँ उत्तरी पहाड़ों से निकलकर अपने साथ उपजाऊ बारीक मिट्री लाती रही हैं। जब इन नदियों में बाढ़ आती है अथवा जब इनके पानी को सिंचाई के लिए खेतों में ले जाया जाता है तब यह उपजाऊ मिट्री बहाँ जमा हो जाती है।

Textbook illustration

फ़रात नदी रेगिस्तान में प्रवेश करने के बाद कई धाराओं में बॉटकर बहने लगती है। कभी-कभी इन धाराओं में बाढ़ आ जाती है और पुराने जमाने में ये धाराएँ सिंचाई की नहरों का काम देती थीं। इनसे आवश्यकता पड़ने पर गेहूँ, जौ और मटर या मसूर के खेतों की सिंचाई की जाती थी। रोम साम्राज्य (विषय 3) सहित सभी पुरानी व्यवस्थाओं में दक्षिणी मेसोपोटामिया की खेती सबसे ज्यादा उपज देने वाली हुआ करती थी। हालांकि वहाँ फ्रसल उपजाने के लिए आवश्यक वर्षा की कुछ कमी रहती थी।

खेती के अलावा भेड्ड़-बकरियाँ स्टेपी घास के मैदानों, पूर्वात्तरी मैदानों और पहाड़ों के ढालों पर पाली जाती थीं (ये उपजाऊ स्थान बाढ़ की नदियों से काफी ऊँचाई पर स्थित थे), जिनसे भारी मात्रा में मांस, दूध और ऊन आदि वस्तुएँ मिलती थीं। इसके अलावा, नदियों में मछलियों की कोई कमी नहीं थी और गर्मियों में खजूर के पेड़ खूब फल (पिंड खजूर) देते थे। लेकिन हमें यह सोचने की गलती नहीं करनी चाहिए कि शहरों का विकास केवल ग्रामीण समृद्धि के बल पर ही हुआ था। इस विकास के अन्य कारकों के विषय में हम बारी-बारी से चर्चा करेंगे, लेकिन पहले हमें शहरी जीवन के बारे में स्पष्ट जानकारी लेनी चाहिए।

मेसोपोटामिया के प्राचीनतम नगरों का निर्माण कांस्य युग यानी लगभग 3000 ई.पू. में शुरू हो गया था। काँसा, तॉबे और राँगे के मिश्रण से बनता है। काँसे के इस्तेमाल का मतलब है कि ये धातुएँ दूर-दूर से मंगाई जाती थीं। बढ़ई का सही काम करने, मनकों में छेद करने, पत्थर की मुद्राएँ उकेरने, फर्नीचर में जड़ने, सीपियाँ काटने आदि कामों के लिए धातु के औज्ञारों की जरूरत पड़ती थी। मेसोपोटामियाई हथियार भी काँसे के ही होते थे; उदाहरण के लिए, भालों की नोकें काँस्य की बनी होती थीं जिन्हें हम पृष्ठ 38 पर देख सकते हैं।

शहरीकरण का महत्व

शहर और नगर बड़ी संख्या में लोगों के रहने के ही स्थान नहीं होते थे। जब किसी अर्थव्यवस्था में खाद्य उत्पादन के अतिरिक्त अन्य आर्थिक गतिविधियाँ विकसित होने लगती है तब किसी एक स्थान पर जनसंख्या का घनत्व बढ़ जाता है। इसके फलस्वरूप कस्वे बसने लगते हैं। ऐसी परिस्थिति में लोगों का कस्बों में इकट्टे रहना उनके लिए फायदेमंद सिझ्द्र होता है। विशेषतः इसलिए क्योंकि शहरी अर्थव्यवस्थाओं में खाद्य उत्पादन के अलावा व्यापार, उत्पादन और तरह-तरह की सेवाओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। नगर के लोग आत्मनिर्भर नहीं रहते और उन्हें नगर या गाँव के अन्य लोगों द्वारा उत्पन्न वस्तुओं या दी जाने वाली सेवाओं के लिए उन पर आश्रित होना पड़ता है। उनमें आपस में बराबर लेन-देन होता रहता है। उदाहरण के लिए, एक पत्थर की मुद्रा बनाने वाले को पत्थर उकेरने के लिए काँसे के औज्ञारों की जरुरत पड़ती है; वह स्वयं ऐसे औज्ञार नहीं बना सकता और वह यह भी नहीं जानता कि मुद्राओं के लिए आवश्यक रंगीन पत्थर वह कहाँ से प्राप्त करे। उसकी विशेषज्जता तो सिर्फ नक्काशी यानी पत्थर उकेरने तक ही सीमित होती है, वह व्यापार करना नहीं जानता। काँसे के औज्ञार बनाने वाला भी धातु-ताँबा या राँगा (टिन) लाने के लिए खुद बाहर नहीं जाता। साथ ही, उसेईधन के लिए हरदम लकड़ी के कोयले की जरुरत रहती है। इस प्रकार ६्रम-विभाजन (Division of Labour) शहरी-जीवन की विशेषता है।

इसके अलावा, शहरी अर्थव्यवस्था में एक सामाजिक संगठन का होना भी जरूरी है। शहरी विनिर्माताओं के लिए ईंधन, धातु, विभिन्न प्रकार के पत्थर, लकड़ी आदि जरूरी चीज़े भिन्न-भिन्न जगहां से आती हैं जिनके लिए संगठित व्यापार और भंडारण की भी आवश्यकता होती है। शहरों में अनाज और अन्य खाद्य-पदार्थ गाँवों से आते हैं और उनके संग्रह तथा वितरण के लिए व्यवस्था करनी होती है। इसके अलावा और भी अनेक प्रकार के क्रियाकलापों में तालमेल बैठाना पड़ता हैः मुद्रा काटने वालों को केवल पत्थर ही नहीं, उन्हें तराशने के लिए औज्ञार और बर्तन भी चाहिए। जाहिर है कि ऐसी प्रणाली में कुछ लोग आदेश देते हैं और दूसरे उनका पालन करते हैं। इसके अलावा, शहरी अर्थव्यवस्था को अपना हिसाब-किताब लिखित रूप में रखना होता है।

क्रियाकलाप 2

क्या शहरी जीवन धातुओं के इस्तेमाल के बिना संभव होता? इस विषय पर चर्चा कीजिए।

Textbook illustration

किन विशेषजों का योगदान रहा होगा। उनकी सूची बनाइए।

वाका शीर्ष

3000 ई.पू. उरुक नगर में स्त्री का यह सिर एक सफ्रेद संगमरमर को तराशकर बनाया गया था। इसकी ऑँखों और भौहां में क्रमशः नीले लाजवर्द (Lapis lazuli) तथा सफ्रेद सीपी और काले डामर (Bitumen) की जड़ाई की गई होगी। सिर के ऊपर एक खाँचा बना हुआ है जो शायद गहना पहनने के लिए बनाया गया था। यह मूर्तिकला का एक विश्व-प्रसिद्ध नमूना है, इसके मुख, ठोड़ी और गालों की सुकोमल-सुंदर बनावट के लिए इसकी प्रशंसा की जाती है। यह एक ऐसे कठोर पत्थर में तराशा गया है जिसे काफी अधिक दूरी से लाना पड़ा होगा।

पत्थर लाने से लेकर इस मूर्ति के निर्माण में और

शहरों में माल की आवाजाही

मेसोपोटामिया के खाद्य-संसाधन चाहे कितने भी समृद्ध रहे हों, उसके यहाँ खनिज-संसाधनों का अभाव था। दक्षिण के अधिकांश भागों में औज्ञार, मोहरें (मुद्राएँ) और आभूषण बनाने के लिए पत्थरों की कमी थी। इराकी खजूर और पोपलार के पेड़ों की लकड़ी, गाड़ियाँ, गाड़ियों के पहिए या नावें बनाने के लिए कोई खास अच्छी नहीं थी; और औज्ञार, पात्र, या गहने बनाने के लिए कोई धातु वहाँ उपलब्ध नहीं थी। इसलिए हमारे विचार से प्राचीन काल के मेसोपोटामियाई लोग संभवतः लकड़ी, ताँबा, राँगा, चाँदी, सोना, सीपी और विभिन्न प्रकार के पत्थरों को तुर्की और ईरान अथवा खाड़ी-पार के देशों से मंगाते थे जिसके लिए वे अपना कपड़ा और कृषि-जन्य उत्पाद काफी मात्रा में उन्हें निर्यात करते थे। इन देशों के पास खनिज संसाधनों की कोई कमी नहीं थी, मगर वहाँ खेती करने की बहुत कम गुंजाइश थी। इन वस्तुओं का नियमित रूप से आदान-प्रदान तभी संभव होता जबकि इसके लिए कोई सामाजिक संगठन हो जो विदेशी अभियानों और विनिमयों को निर्देशित करने में सक्षम हो। दक्षिणी मेसोपोटामिया के लोगों ने ऐसे संगठन स्थापित करने की शुरुआत की।

शिल्प, व्यापार और सेवाओं के अलावा, कुशल परिवहन व्यवस्था भी शहरी विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। भारवाही पशुओं की पीठ पर रखकर या बैलगाड़ियों में ढालकर शहरों में अनाज या काठ कोयला लाना-ले जाना बहुत कठिन होता है क्योंकि उसमें बहुत ज्यादा समय लगता है और पशुओं के चारे आदि पर भी काफी खर्च आता है। शहरी अर्थव्यवस्था इसका बोझ्र उठाने के लिए सक्षम नहीं होती। इसलिए परिवहन का सबसे सस्ता तरीका सर्वत्र जलमार्ग ही होता है। अनाज के बोरों से लदी हुई नावें या बजरे, नदी की धारा अथवा हवा के वेग से चलते हैं, जिसमें

कोई खर्चा नहीं लगता, जबकि जानवरों से माल की ढुलाई की जाए तो उन्हें चारा खिलाना पड़ता है। पुराने मेसोपोटामिया की नहरें और प्राकृतिक जलधाराएँ छोटी-बड़ी बस्तियों के बीच माल के परिवहन का अच्छा मार्ग थीं। और आगे इसी अध्याय में मारी नगर का जो विवरण दिया गया है उसे पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाएगा कि फ़रात नदी उन दिनों व्यापार के लिए ‘विश्व-मार्ग’ के रूप में कितनी अधिक महत्वपूर्ण थी।

लेखन कला का विकास

सभी समाजों के पास अपनी एक भाषा होती है जिसमें उच्चरित ध्वनियाँ अपना अर्थ प्रकट करती है। इसे मौखिक या शाब्दिक भावाभिव्यक्ति कहते हैं। लिखना, मौखिक भावाभिव्यक्ति से उतना अलग नहीं है जितना हम अकसर समझ बैठते हैं। जब लेखन या लिपि के बारे में बात की जाती है तो उसका अर्थ है उच्चरित ध्वनियाँ, जो दृश्य संकेतों या चिहां के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं।

मेसोपोटामिया में जो पहली पट्टिकाएँ (Tablet) पाई गई हैं वे लगभग 3200 ई.पू की है। उनमें चित्र जैसे चिह्न और संख्याएँ दी गई है। वहाँ बैलों, मछलियों और रोटियों आदि की लगभग 5000 सूचियाँ मिली हैं, जो वहाँ के दक्षिणी शहर उरुक के मंदिरों में आने वाली और वहाँ से बाहर जाने वाली चीज्ञों की होंगी। स्पष्टत:, लेखन कार्य तभी शुरु हुआ जब समाज को अपने लेन-देन का स्थायी हिसाब रखने की ज़रूरत पड़ी क्योंकि शहरी जीवन में लेन-देन अलग-अलग समय पर होते थे, उन्हें करने वाले भी कई लोग होते थे और सौदा भी कई प्रकार के माल के बारे में होता था।

कीलाकार अक्षर
संकेत
कीलाकार अक्षर संकेत

चिकनी मिट्री की पट्टिकाएँः लगभग 3200 ईंपू. प्रत्येक पट्टिका की ऊँचाई 3.5 से.मी. या उससे कम है। इन पट्टिकाओं पर बने संकेत-चित्र (बैल मछली, अनाज और नाव) है।

बैल
बैल
Textbook illustration
अनाज,
मछली
अनाज, मछली
संख्याएँ ,
नाव
संख्याएँ , नाव

एक चिकनी मिट्री की पट्टिका जो दोनों ओर कीलाक्षरों में लिखी हुई है। यह एक गणितीय अभ्यास है। पट्टिका के अग्रभाग में सबसे ऊपर एक त्रिभुज और उसके आर-पार कुछ रेखाएँ अंकित हैं। आप देखेंगे कि अक्षर मिट्री में दबाकर अंकित किए गए हैं।

मेसोपोटामिया के लोग मिट्री की पट्ट्रकाओं पर लिखा करते थे। लिपिक चिकनी मिट्री को गीला करता था और फिर उसको गूंध कर और थापकर एक ऐसे आकार की पट्ट्री का रूप दे

Textbook illustration

क्यूनीफ्राम* (कीलाकार) लातिनी शब्द क्यूनियस जिसका अर्थ ‘खृष्टी’ और फ्रोमा जिसका अर्थ ‘आकार’ है, से बना है।

देता था जिसे वह आसानी से अपने एक हाथ में पकड़ सके। वह सावधानीपूर्वक उसकी सतहां को चिकना बना लेता था फिर सरकंडे की तीली की तीखी नोक से वह उसकी नम चिकनी सतह पर कीलाकार चिह (cuneiform*) बना देता था। जब ये पट्टिकाएँ धूप में सूख जाती थीं तो पक्की हो जाती थीं और वे मिट्री के बर्तनों जैसी ही मज्जबूत हो जाती थीं। जब उन पर लिखा हुआ कोई हिसाब, जैसे धातु के टुकड़ सौपने का हिसाब असंगत या गैर-ज़रूरी हो जाता तो उस पट्टिका को फेंक दिया जाता था। ऐसी पट्टी जब एक बार सूख जाती थी तो उस पर कोई नया चिह्ना या अक्षर नहीं लिखा जा सकता था। इस प्रकार प्रत्येक सौदे के लिए चाहे वह कितना ही छोटा हो, एक अलग पट्टिका की जरूरत होती थी। इसीलिए मेसोपोटामिया के खुदाई स्थलों पर सैकड़ों पट्टिकाएँ मिली हैं। और इस स्त्रोत-संपदा के कारण ही आज हम मेसोपोटामिया के बारे में इतना कुछ जानते हैं।

लगभग 2600 ई.पू. के आसपास वर्ण कीलाकार हो गए और भाषा सुमेरियन थी। अब लेखन का इस्तेमाल हिसाब-किताब रखने के लिए ही नहीं, बल्कि शब्द-कोश बनाने, भूमि के हस्तांतरण को कानूनी मान्यता प्रदान करने, राजाओं के कार्यों का वर्णन करने और कानून में उन परिवर्तनों को उद्धोषित करने के लिए किया जाने लगा जो देश की आम जनता के लिए बनाए जाते थे। मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी झात भाषा सुमेरियन का स्थान, 2400 ई.पू. के बाद, धीरे-धीरे अक्कदी भाषा ने ले लिया। अक्कदी भाषा में कीलाकार लेखन का रिवाज ईसवी सन् की पहली शताब्दी तक अर्थात् 2000 से अधिक वर्षों तक चलता रहा।

लेखन प्रणाली

जिस ध्वनि के लिए कीलाक्षर या कीलाकार चिहू का प्रयोग किया जाता था वह एक अकेला व्यंजन या स्वर नहीं होता था (जैसे अंग्रेजी वर्णमाला में m या a) लेकिन अक्षर (Syllables) होते थे (जैसे अंग्रेजी में -put-, या -la- या -in- )। इस प्रकार, मेसोपोटामिया के लिपिक को सैकड़ों चिहू सीखने पड़ते थे और उसे गीली पट्टी पर उसके सूखने से पहले ही लिखना होता था। लेखन कार्य के लिए बड़ी कुशलता की आवश्यकता होती थी, इसलिए लिखने का काम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता था। इस प्रकार, किसी भाषा-विशेष की ध्वनियों को एक दृश्य रूप में प्रस्तुत करना एक महान बौढ़िक उपलब्धि माना जाता था।

साक्षरता

मेसोपोटामिया के बहुत कम लोग पढ़-लिख सकते थे। न केवल प्रतीकों या चिह्नों की संख्या सैकड़ों में थी, बल्कि ये कहीं अधिक पेचीदा थे (पृष्ठ 33 पर दिए गए चित्र को देखिए।) अगर राजा स्वयं पढ़ सकता था तो वह यह चाहता था कि प्रशस्तिपूर्ण अभिलेखों में उन तथ्यों का उल्लेख अवश्य किया जाए। अधिकतर लिखावट बोलने के तरीके को दर्शाती थी।

एक अधिकारी द्वारा राजा को लिखा गया पत्र उसे पढ़कर सुनाया जाता था, इसलिए उसकी शुरुआत इस तरह की जाती थी:

“मेरे ‘अमुक’ मालिक को..... उनका ‘अमुक’ सेवक निवेदन करता है..... मुझे सौपे गए काम को मैने पूरा कर दिया है.....।”

सृष्टि के बारे में लिखे गए एक लंबे पौराणिक काव्य के अंत में यह लिखा गया हैः:

“इन काव्य पंक्तियों को सदा याद रखा जाए और बड़े-बूढ़े लोग इन्हें छोटों को पढ़ाएँ;

बुद्धिमान और विद्धान लोग इन पर चर्चा करें;

पिता इन्हें अपने पुत्रों के लिए बार-बार दोहराएँ;

(यहाँ तक कि) गवालों के कान भी इन पंक्तियों को सुनने के लिए सदा खुले रहें।"

लेखन का प्रयोग

शहरी जीवन, व्यापार और लेखन कला के बीच के संबंधों को उरुक के एक प्राचीन शासक एनर्मर्कर (Enmerkar) के बारे में लिखे गए एक सुमेरियन महाकाव्य में स्पष्ट किया गया है। मेसोपोटामिया की परंपरागत कथाओं के अनुसार, उरुक एक अत्यंत सुंदर शहर था जिसे अक्सर केवल ‘शहर’ कहकर ही पुकारा जाता था।

सुमेर के व्यापार की पहली घटना को एनर्मर्कर के साथ जोड़ा जाता है। उस महाकाव्य में कहा गया है कि उन दिनों व्यापार क्या होता है, यह कोई नहीं जानता था। एनर्मर्कर अपने शहर के एक सुंदर मंदिर को सजाने के लिए लाजवर्द और अन्य बहुमूल्य रत्न तथा धातुएँ मंगाना चाहता था। इस काम के लिए उसने अपना एक दूत अरट्टा (Aratta) नाम के एक सुदूर देश के शासक के पास भेजा। “दूत ने राजा के आदेश का पालन किया। रात में वह चाँद-तारों की रोशनी और उनसे सूचित दिशा के अनुसार और दिन में सूरज के बताए मार्ग पर आगे बढ़ता गया। वह रास्ते में आने वाले ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों को लाँघने के लिए ऊपर चढ़ता और उतरता रहा। जब वह पहाड़ पर था तो पहाड़ की तलहटी में रहने वाले ‘सूसा’ (Susa) नगर के लोगों ने उसे छोटे चूहों* की तरह नमस्कार किया। उसने पाँच पर्वतमालाएँ, छः पर्वतमालाएँ और फिर सात पर्वतमालाएँ पार की .....।”

दूत अरट्टा के मुखिया से लाजवर्द या चाँदी नहीं ला पाया और उसे बारम्बार लंबी यात्राओं के उपरान्त खाली हाथ ही लौटना पड़ा। इसके बावजूद कि वह अरट्टा के मुखिया से चाँदी प्राप्त करने के लिए उसको उरुक के राजा की और से तरह-तरह की धमकियाँ और आश्वासन देता रहा। अंत में दूत इतना चकरा गया कि अपनी बात को सही तरह से व्यक्त ही नहीं कर पाया और उसने एनर्मर्कर के संदेशों को घालमेल कर दिया। तब, “राजा एनर्मर्कर ने अपने हाथ से चिकनी मिट्री की पट्टिका बनाई और उस पर शब्द लिख दिए। उन दिनों, मिट्री पर शब्द लिखने का रिवाज्ञ नहीं था।”

*(कवि के कहने का तात्पर्य यह था कि जब दूत एक बार ऊँचे पहाड़ पर चढ़ गया तो नीचे घाटी में सभी चीज़े उसे बहुत छोटी लगी।)

जब लिखी हुई पट्टिका दूत ने अरट्टा के शासक के हाथों में दी, “तो उसने उसकी जाँच की। उच्चरित शब्द कील* यानी कीलाकार शब्द थे। उसे देखते ही उसकी त्योरियाँँ चढ़ गई। उसने पट्टिका पर नज़र गड्डाए रखी।”

इस घटना को शाब्दिक रूप से सत्य नहीं माना जाना चाहिए; लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मेसोपोटामिया की विचारधारा के अनुसार सर्वप्रथम राजा ने ही व्यापार और लेखन की व्यवस्था की थी। यह काव्य हमें यह भी बताता है कि लेखन कार्य सूचना इक्टुरी करने और दूर-दूर् भेजने का साधन तो था ही, साथ ही उससे मेसोपोटामिया की शहरी संस्कृति की उत्कृष्टता की भी झलक मिलती है।

दक्षिणी मेसोपोटामिया का शहरीकरण-मंदिर और राजा

5000 ई.पू. से दक्षिणी मेसोपोटामिया में बस्तियों का विकास होने लगा था। इन बस्तियों में से कुछ ने प्राचीन शहरों का रूप ले लिया। ये शहर कई तरह के थे। पहले वे जो मंदिरों के चारों ओर विकसित हुए; दूसरे जो व्यापार के केंद्रों के रूप में विकसित हुए; और शेष शाही शहर थे। इनमें से पहली दो श्रेणियों के शहरों पर यहाँँ चर्चा की जाएगी।

बाहर से आकर बसने वाले लोगों ने (उनके मूल स्थान का पता नहीं) अपने गाँवों में कुछ चुने हुए स्थानों या मंदिरों को बनाना या उनका पुनर्निर्माण करना शुरू किया। सबसे पहला ज्ञात मंदिर एक छोटा-सा देवालय था जो कच्ची ईंटों का बना हुआ था। मंदिर विभिन्न प्रकार के देवी-देवताओं के निवास स्थान थे, जैसे उर जो चंद्र देवता था और इन्नाना जो प्रेम व युङ्क की देवी थी। ये मंदिर ईंटों से बनाए जाते थे और समय के साथ बड़े होते गए। क्योंकि उनके खुले

Textbook illustration

औँगनों के चारों ओर कई कमरे बने होते थे। कुछ प्रार्भिक मंदिर साधारण घरों से अलग किस्म के नहीं होते थे- क्योंकि मंदिर भी किसी देवता का घर ही होता था। लेकिन मंदिरों की बाहरी दीवारें कुछ खास अंतरालों के बाद भीतर और बाहर की ओर मुड़ी हुई होती थों; यही मंदिरों की विशेषता थी। साधारण घरों की दीवारें ऐसी नहीं होती थीं।

देवता पूजा का केंद्र-बिंदु होता था। लोग देवी-देवता के लिए अन्न, दही, मछली लाते थे (पुराने जमाने के कुछ मंदिरों के फ्रशों पर मछली की हड्डियों की परतें जमी हुई मिली हैं।) आराध्य देव सैढ्वांतिक रूप से खेतों, मत्प्य क्षेत्रों और स्थानीय लोगों के पशुधन का स्वामी माना जाता था। समय आने पर उपज को उत्पादित वस्तुओं में बदलने की प्रक्रिया (जैसे तेल निकालना, अनाज पीसना, कातना और ऊनी कपड़ों को बुनना आदि) यहीं की जाती थी। घर-परिवार से ऊपर के स्तर के व्यवस्थापक, व्यापारियों के नियोक्ता, अन्न, हल जोतने वाले पशुओं, रोटी, जौ की शराब, मछली आदि के आवंटन और वितरण के लिखित अभिलेखों के पालक के रूप में मंदिर ने धीरे-धीरे अपने क्रियाकलाप बढ़ा लिए और मुख्य शहरी संस्था का रूप ले लिया। लैकिन अन्य दूसरे कारक भी इस व्यवस्था में विद्यमान थे।

ज़मीन में प्राकृतिक उपजाऊपन होने के बावजूद कृषि कई बार संकटों से घिर जाती थी। फ्रात नदी की प्राकृतिक धाराओं में किसी वर्ष तो बहुत ज्यादा पानी बह आता था और फ्रसलों को डुबा देता था और कभी-कभी

ये धाराएँ अपना रास्ता बदल लेती थीं, जिससे खेत सूखे रह जाते थे। जैसा कि पुरातत्वीय अभिलेखों से पता चलता है, मेसोपोटामिया के इतिहास में गाँव समय-समय पर पुनः स्थापित किए जाते रहे हैं। इन प्राकृतिक विपदाओं के अलावा, कई बार मानव-निर्मित समस्याएँ भी आ खड़ी होती थीं। जो लोग इन धाराओं के ऊपरी इलाकों में रहते थे, वे अपने पास की जलधारा से इतना ज्यादा पानी अपने खेतों में ले लेते थे कि धारा के नीचे की और बसे हुए गाँवों को पानी ही नहीं मिलता था। ये लोग अपने हिस्से की सरणी में से गाद (मिट्री) नहीं निकालते थे, जिससे बहाव रुक जाता था और नीचे वालों को पानी नहीं मिलता था। इसलिए मेसोपोटामिया के तत्कालीन देहातों में ज्ञमीन और पानी के लिए बार-बार झगड़े हुआ करते थे।

Textbook illustration

जब किसी क्षेत्र में लंबे समय तक लड़ाई चलती थी तो जो मुखिया लड़ई जीतते थे वे अपने साथियों एवं अनुयायियों को लूट का माल बॉर्टकर खुश कर देते थे तथा हारे हुए समूहों में से लोगों को बंदी बनाकर अपने साथ ले जाते थे, जिन्हें वे अपने चौकीदार या नौकर बना लेते थे। इस प्रकार, वे अपना प्रभाव और अनुयायियों की संख्या बढ़ा लेते थे। कितु, युढ़ में विजयी होने वाले ये नेता लोग स्थायी रूप से समुदाय के मुखिया नहीं बने रहते थे; आज हैं तो कल चले जाते थे। लेकिन बाद में एक ऐसा समय आया जब इन नेताओं ने समुदाय के कल्याण पर अधिक ध्यान देना शुरू कर दिया और उसके फलस्वरूप नयी-नयी संस्थाएँ और परिपाटियाँ स्थापित हो गई। इस समय के विजेता मुखियाओं ने कीमती भेंटों को देवताओं पर अर्पित करना शुरू कर दिया जिससे कि समुदाय के मॉदिरों की सुंदरता बढ़ गई। उन्होंने लोगों को उत्कृष्ट पत्थरों और धातुओं को लाने के लिए भेजा, जो देवता और समुदाय को लाभ पहुँचा सकें तथा मॉदिर की धन-संपदा के वितरण का और मॉदिरों में आने-जाने वाली वस्तुओं का हिसाब-किताब रखकर प्रभावी तरीके से संचालन कर सकें। जैसा कि एनर्मर्कर से जुड़ी कविताएँ व्यक्त करती हैं कि इस व्यवस्था ने राजा को ऊँचा स्थान दिलाया तथा समुदाय पर उसका पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया।

हम पारस्परिक हितों को सुदृढ़ करने वाले विकास के एक ऐसे दौर की कल्पना कर सकते हैं, जिसमें मुखिया लोगों ने ग्रामीणों को अपने पास बसने के लिए प्रोत्साहित किया, जिससे कि वे आवश्यकता पड़ने पर तुरंत अपनी सेना इकट्ट्री कर सकें। इसके अलावा, लोग एक-दूसरे के आस-पास रहने से स्वयं को अधिक सुरक्षित महसूस कर सकें। उरुक, जो उन दिनों सबसे पुराने मंदिर-नगरों में से एक था, से हमें सशस्त्र वीरों और उनसे हताहत हुए शत्रुओं के चित्र मिलते हैं; और सावधानीपूर्वक किए गए पुरातत्वीय सर्वेक्षणों से पता चला है कि 3000 ई.पू् के आसपास जब उरुक नगर का 250 हैक्टेयर भूमि में विस्तार हुआ तो उसके कारण दर्जनों छोटेट-छोटे गाँव उजड़ गए और बड़ी संख्या में आबादी का विस्थापन हुआ। उसका यह विस्तार शताब्दियों बाद फले-फूले मोहनजोदड़ो नगर से दो गुना था। यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि उरुक नगर

लगभग 3000 ई.पू में निर्मित एक मांदर जिसका खुला हुआ ऑँगन और बाहरी-भीतरी मुख भाग (उत्खनित रूप में) चित्र में दिखाया गया है।

Textbook illustration

ऊपर-एक काले पत्थर पर उत्कीर्णित शिलापट

(स्टेल)* पर दाढ़ी बाले व्यक्ति का दोहरा चित्र दिया गया है। उसके बालों और सिर पर बंधी हुई पट्टी, कमर पट्टी और लबे अंगरखे के निचले हिस्से (स्कर्ट) को देखिए। नीचे के दृश्य में उसे एक शेर पर अपने बड़े धनुष-बाण से आक्रमण करते हुए दिखाया गया है। ऊपर के दृश्य में, यह वीर उस उग्र शेर को आखिर अपने भाले से मार गिराता है। (लगभग 3200 ई.पू.)

*स्टेल, पत्थर के ऐसे शिलापट्ट होते हैं जिन पर अभिलेख उत्कीर्ण किये जाते हैं।

की रक्षा के लिए उसके चारों ओर काफी पहले ही एक सुदृढ़ प्राचीर बना दी गई थी। उरुक नगर 4200 ई.पू. से 400 ईसवी तक बराबर अपने अस्तित्व में बना रहा, और उस दौरान 2800 ई.पू. के आसपास वह बढ़कर 400 हैक्टेयर में फैल गया।

युद्धर्बंदियों ओर स्थानीय लोगों को अनिवार्य रूप से मंदिर का अथवा प्रत्यक्ष रूप से शासक का काम करना पड़ता था। कृषिकर भले ही न देना पड़े, पर काम करना अनिवार्य था। जिन्हें काम पर लगाया जाता था उन्हें काम के बदले अनाज दिया जाता था। सैकड़ों ऐसी राशन-सूचियाँ मिली हैं जिनमें काम करने वाले लोगों के नामों के आगे उन्हें दिए जाने वाले अनाज, कपड़े और तेल आदि की मात्रा लिखी गई है। एक अनुमान के अनुसार, इन मंदिरों में से एक मंदिर को बनाने के लिए 1500 आदमियों ने पाँच साल तक प्रतिदिन 10 घंटे काम किया था।

शासक के हुक्म से आम लोग पत्थर खोदने, धातु-खनिज लाने, मिट्री से ईंटें तैयार करने और मंदिर में लगाने, और सुदूर देशों में जाकर मंदिर के लिए उपयुक्त सामान लाने के कामों में जुटे रहते थे। इसकी वजह से 3000 ई.पू. के आसपास उरुक में खूब तकनीकी प्रगति भी हुई। अनेक प्रकार के शिल्पों के लिए काँसे के औजारों का प्रयोग होता था। वास्तुविदों ने ईटों के स्तंभों को बनाना सीख लिया था क्योंकि उन दिनों बड़े-बड़े कमरों की छतों के बोझ़ को संभालने के लिए शहतीर बनाने उपयुक्त लकड़ी नहीं मिलती थी।

सैकड़ों लोगों को चिकनी मिट्री के शंकु (कोन) बनाने और पकाने के काम में लगाया जाता था। इन शंकुओं को भिन्न-भिन्न रंगों में रॉगकर मांदिरों की दीवारों में लगाया जाता था जिससे वे दीवारें विभिन्न रंगों से सुशोभित हो जाती थी। मूर्तिकला के क्षेत्र में भी उच्चकोटि की सफलता प्राप्त की गई; इस कला के सुंदर नमूने आसानी से उपलब्ध होने वाली चिकनी मिट्री की अपेक्षा अधिकतर आयातित पत्थरों से तैयार किए जाते थे। तभी प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी एक युगांतरकारी परिवर्तन आया जो शहरी अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत उपयुक्त साबित हुआ और वह थाः कुम्हार के चाक का निर्माण। आगे चलकर इस चाक से कुम्हार की कार्यशाला में एक साथ बड़े पैमाने पर दर्जनों एक जैसे बर्तन आसानी से बनाए जाने लगे।

एक बेलनाकार मुद्रा की छाप, लगभग 3200 ई.पू.। इस छाप में अंकित दाढ़ी वाले सशस्त्र खड़े व्यक्ति और ऊपर काले पत्थर पर अंकित वीर का उत्कीर्णित शिलाप्ट्र या स्टेल*, दोनों में पोशाक और केश-शैली एक जैसी है। चित्र में तीन युढ़बंदी दिखाए गए हैं जिनके हाथ बंधे हुए हैं और चौथा व्यक्ति विजयी योढ्धा से हाथ फैलाकर द्या की भीख माँग रहा है।

Textbook illustration

मोहर : एक शहरी शिल्प-कृति

भारत में, प्राचीन काल में पत्थर की मोहरें होती थीं जिनपर चिह्न अंकित किए गए होते थे। लेकिन मेसोपोटामिया में, पहली सहस्त्राब्दी ई.पू. के अंत तक पत्थर की बेलनाकर मोहरें, जो बीच में आर-पार छिदी होती थीं, एक तीली लगाकर गीली मिट्री के ऊपर घुमाई जाती थीं और इस प्रकार उनसे लगातार चित्र बनता जाता था। वे अत्यंत कुशल कारीगरों द्वारा उकेरी जाती थीं और कभी-कभी उनमें ऐसे लेख होते थे; जैसे- मालिक का नाम, उसके इष्ट्देव का नाम और उसकी अपनी पदीय स्थिति, आदि। किसी कपड़े की गठरी या बर्तन के मृँह को चिकनी मिट्री से लीप-पोतकर उसपर वह मोहर घुमाई जाती थी जिससे उसमें अंकित लिखावट मिट्री की सतह पर छप जाती थी; इससे उस गठरी या बर्तन में रखी वस्तुओं को मोहर लगाकर सुरक्षित किया जा सकता था। जब इस मोहर को मिट्री की बनी पट्टिका पर लिखे पत्र पर घुमाया जाता था तो वह मोहर उस पत्र की प्रामाणिकता की प्रतीक बन जाती थी। इस प्रकार मुद्रा सार्वजनिक जीवन में नगरवासी की भूमिका को दर्शाती थी।

Textbook illustration

शहरी जीवन

ऊपर के विवरण से पता चलता है कि नगरों की सामाजिक व्यवस्था में एक उच्च या संभ्रांत वर्ग का प्रादुर्भाव हो चुका था। धन-दौलत का ज्यादातर हिस्सा समाज के एक छोटे से वर्ग में केंद्रित था। इस बात की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि बहुमूल्य चीज़ों (आभूषण, सोने के पात्र, सफेद सीपियाँ और लाजवर्द जड़े हुए लकड़ी के वाद्य यंत्र, सोने के सजावटी खंजर, आदि) विशाल मात्रा में उर में राजाओं और रानियों की कुछ कब्रों या समाधियों में उनके साथ दफ्नाई गई मिली हैं। लेकिन आम आद्मी की स्थिति क्या थी?

कानूनी दस्तावेज़ों (विवाह, उत्तराधिकार आदि के मामलों से संबंधित) से पता चलता है कि मेसोपोटामिया के समाज में एकल परिवार* (Nuclear family) को ही आदर्श माना जाता था हालांकि एक शादीशुदा बेटा और उसका परिवार अक्सर अपने माता-पिता के साथ ही रहा करते थे। पिता परिवार का मुखिया होता था। हमें विवाह की प्रक्रिया या विधि के बारे में कुछ जानकारी मिली है। विवाह करने की इच्छा के बारे में घोषणा की जाती थी और वधू के माता-पिता उसके विवाह के लिए अपनी सहमति देते थे। उसके बाद वर पक्ष के लोग वधू को कुछ उपहार देते

*एकल परिवार में एक पुरुष, उसकी पत्नी और बच्चे शामिल होते हैं। *हौज़ ज़मीन में एक ऐसा ढका हुआ गढूा होता है जिसमें पानी और मल जाता है।

उर नगर का एक रिहायशी इलाका, लगभग 2000 ई.पू। क्या आप चित्र में टेऴी-मेऴी गलियों के अलावा, दो या तीन बंद गलियाँ भी खोज सकते हैं?

थे। जब विवाह की रस्म पूरी हो जाती थी, तब दोनों पक्षों की और से उपहारों का आदान-प्रदान किया जाता था और वे एकसाथ बैठकर भोजन करते थे और फिर मंदिर में जाकर भेंट चढ़ाते थे। जब नववधू को उसकी सास लेने आती थी, तब वधू को उसके पिता द्वारा उसकी दाय का हिस्सा दे दिया जाता था। पिता का घर, पशुधन, खेत आदि उसके पुत्रों को मिलते थे।

आइए, अब उर नगर का अवलोकन करें। यह उन नगरों में से एक था जहाँ सबसे पहले खुदाई की गई थी। उर, मेसोपोटामिया का एक ऐसा नगर था जिसके साधारण घरों की खुदाई 1930 के दशक में सुव्यवस्थित ढंग से की गई। उसमें टेऴी-मेऴी व संकरी गलियाँ पाई गई जिससे यह पता चलता है कि पहिए वाली गाड़ियाँ वहाँ के अनेक घरों तक नहीं पहुँच सकती थीं। अनाज के बोरे और ईंधन के गढ़े संभवतः गधे पर लादकर घर तक लाए जाते थे। पतली व घुमावदार गलियों तथा घरों के भू-खंडों का एक जैसा आकार न होने से यह निष्कर्ष निकलता है कि नगर-नियोजन की पढ़ति का अभाव था। वहाँ गलियों के किनारे जल-निकासी के लिए उस तरह की नालियाँ-नहीं थी, जैसी कि उसके समकालीन नगर मोहनजोदड़ो में पाई गई हैं। बल्कि जल-निकासी की नालियाँ और मिट्री की नलिकाएँ उर नगर के घरों के भीतरी ऑंगन में पाई गई हैं, जिससे यह समझा जाता है कि घरों की छतों का ढलान भीतर की ओर होता था और वर्षा का पानी निकास नालियों के माध्यम से भीतरी ऑँगनों में बने हुए हौज्जों* में ले जाया जाता था। शायद्यय है स्सलिए किया गया था कि एक साथ तेज्ञ्रवर्षा आने पर घर के बाहर की कच्ची गलियाँ बुरी तरह कीचड़

से न भर जाएँ।

फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि लोग अपने घर का सारा कूड़ा-कचरा बुहारकर गलियों में डाल देते थे, जहाँ वह आने-जाने वाले लोगों के पैरों के नीचे आता रहता था। इस प्रकार बाहर कूड़ा डालते रहने से गलियों की सतहें ऊँची उठ जाती थीं जिसके कारण कुछ समय बाद घरों की दहलीजों को भी ऊँचा उठाना पड़ता था ताकि वर्षा के बाद कीचढ़ बह कर घरों के भीतर न आ सके। कमरों के अंदर रोशनी खिड्डिकियों से नहीं, बल्कि उन दरवाजों से होकर आती थी जो ऑगन में खुला करते थे। इससे घरों के परिवारों में गोपनीयता (privacy) भी बनी रहती थी। घरों के बारे में कई तरह के अंधविश्वास प्रचलित थे, जिनके विषय में उर में पाई गई शकुन-अपशकुन संबंधी बातें पट्टिकाओं पर लिखी मिली हैं; जैसे- घर की देहली ऊँची उठी हुई हो तो वह धन-दौलत लाती है; सामने का दरवाजा अगर किसी दूसरे के घर की ओर न खुले तो वह सौभाग्य प्रदान करता है; लेकिन अगर घर का लकड़ी का मुख्य दरवाजा (भीतर की ओर न खुलकर) बाहर की ओर खुले तो पत्नी अपने पति के लिए यंत्रणा का कारण बनेगी।

उर में नगरवासियों के लिए एक कब्रिस्तान था, जिसमें शासकों तथा जन-साधारण की समाधियाँ पाई गई; लेकिन कुछ लोग साधारण घरों के फ़शों के नीचे भी दफ्नाए हुए पाए गए थे।

Textbook illustration

पशुचारक क्षेत्र में एक व्यापारिक नगर

2000 ई.पू. के बाद मारी नगर शाही राजधानी के रूप में खूब्र फला-फूला। आपने देखा होगा (मानचित्र 2 में) कि मारी नगर दक्षिण के उस मैदानी भाग में स्थित नहीं हैं जहाँ खेती की पैदावार भरपूर होती थी, बल्क बह फ़रात नदी की उर्धवधारा पर स्थित है। मानचित्र 3 में विभिन्न रंगों का प्रयोग करके यह दशीया गया है कि इस ऊपरी क्षेत्र में खेती और पशुपालन साथ-साथ चलते

थे। मारी राज्य में वैसे तो किसान और पशुचारक दोनों ही तरह के लोग होते थे, लेकिन उस प्रदेश का अधिकांश भाग भेड-बकरी चराने के लिए ही काम में लिया जाता था।

पशुचारकों को जब अनाज, धातु के औज्ञारों आदि की जरूरत पड़ती थी तब वे अपने पशुओं तथा उनके पनीर, चमड़ा तथा मांस आदि के बदले ये चीज़ें प्राप्त करते थे। बाड़े में रखे जाने वाले पशुओं के गोबर से बनी खाद भी किसानों के लिए बहुत उपयोगी होती थी। फिर भी, किसानों तथा गड़रियों के बीच कई बार झगड़े हो जाते थे। गड़रिये कई बार अपनी भेड़-बकरियों को पानी पिलाने के लिए बोए हुए खेतों से गुज्ञार कर ले जाते थे जिससे किसान की फसल को नुकसान पहुँचता था। ये गड़रिये खानाबदोश होते थे और कई बार किसानों के गाँवों पर हमला बोलकर उनका इकढुँ किया माल लूट लेते थे। दूसरी तरफ, कई बार ऐसा भी होता था कि बस्तियों में रहने वाले लोग भी इन पशुचारकों का रास्ता रोक देते थे और उन्हें अपने पशुओं को नदी-नहर तक नहीं ले जाने देते थे।

मेसोपोटामिया के इतिहास पर नज़र डालें तो पता चलेगा कि वहाँ के कृषि से समृद्ध हुए मुख्य भूमि प्रदेश में यायावर समुदायों के झुंड के झुंड पश्चिमी मरुस्थल से आते रहते थे। ये गड़रिये गर्मियों में अपने साथ इस उपजाऊ क्षेत्र के बोए हुए खेतों में अपनी भेड्ड-बकरियाँ ले आते थे। ये समूह गड़रिये, फसल काटने वाले मज्जदूरों अथवा भाडे के सैनिकों के रूप में

आते थे और समृद्ध होकर यहीं बस जाते थे। उनमें से कुछ ने तो अपना खुद का शासन स्थापित करने की भी शक्ति प्राप्त कर ली थी। ये खानाबदोश लोग अक्कदी, एमोराइट, असीरियाई और आर्मीनियन जाति के थे। (आगे विषय 5 में इन पशुचारक समाजों के शासकों के बारे में कुछ अधिक जानकारी दी गई है।) मारी के राजा एमोराइट समुदाय के थे। उनकी पोशाक बहाँ के मूल निवासियों से भिन्न होती थी और उन्होंने मेसोपोटामिया के देवी-देवताओं का आदर ही नहीं किया बल्कि स्टेपी क्षेत्र के देवता डैगन (Dagan) के लिए मारी नगर में एक मंदिर भी बनवाया। इस प्रकार, मेसोपोटामिया का समाज और बहाँ की संस्कृति भिन्न-भिन्न समुदायों के लोगों और संस्कृतियों के लिए खुली थी और संभवतः विभिन्न जातियों तथा समुदायों के लोगों के परस्पर मिश्रण से ही बहाँ की सभ्यता में जीवन-शक्ति उत्पन्न हो गई।

मानचित्र 3: मारी नगर की स्थिति।

Textbook illustration

एक योढ़ा अपने हाथों में एक लंबा भाला और एक खपच्ची की ढाल पकड़े हुए है। एमोराइट लोगों की एक खास किस्म की पोशाक देखिए जो (पृष्ठ 38 पर दिखाई गई) सुमेरियन योढ़ा की पोशाक से भिन्न होती थी। यह चित्र एक सीपी पर उकेरा गया था, लगभग 2600 ई.पू।

Textbook illustration
मारी में ज़िमरीलिम का राजमहल (1810-1760 ई.पू.)
मारी में ज़िमरीलिम का राजमहल (1810-1760 ई.पू.)
Textbook illustration
लिपिक कार्यालय, बेंचो और मिट्रीदानों के साथ,
मिट्रीदानों में पट्टिकाएँ रखी जाती थीं।
लिपिक कार्यालय, बेंचो और मिट्रीदानों के साथ, मिट्रीदानों में पट्टिकाएँ रखी जाती थीं।
Textbook illustration

ज़िमरीलिम का मारी स्थित राजमहल (1810-1760 ई.पू.)

मारी का विशाल राजमहल वहाँ के शाही परिवार का निवास स्थान तो था ही, साथ ही वह प्रशासन और उत्पादन, विशेष रूप से कीमती धातुओं के आभूषणों के निर्माण का मुख्य केंद्र भी था। अपने समय में वह इतना अधिक प्रसिद्ध था कि उसे देखने के लिए ही उत्तरी सीरिया का एक छोटा राजा आया; वह अपने साथ मारी के राजा ज़िमरीलिम के नाम उसके एक अन्य राजा का परिचय पत्र लेकर वहाँ आया था। दैनिक सूचियों से पता चलता है कि राजा के भोजन की मेज पर हर रोज भारी मात्रा में खाद्य पदार्थ पेश किए जाते थे-आटा, रोटी, मांस, मछली, फल, मदिरा और बीयर। वह संभवतः अपने अन्य साथियों के साथ सफ्रेद पत्थर जड़े ऑगन (106) में बैठकर बाकायदा भोजन करता था। नक्शा देखने से आपको पता चलेगा कि राजमहल का सिफ़ एक ही प्रवेश द्वार था जो उत्तर की ओर बना हुआ था। उसके विशाल, खुले प्राँगण (जैसे 131) सुंदर पत्थरों से जड़े हुए थे। राजा विदेशी अतिथियों और अपने प्रमुख लोगों से कमरा-132 में मिलता था जहाँ के भित्त-चित्रों को देखकर आगंतुक लोग हतप्रभ रह जाते थे। राजमहल 2.4 हैक्टेयर के क्षेत्र में स्थित एक अत्यंत विशाल भवन था जिसमें 260 कक्ष बने हुए थे।

क्रियाकलाप 3

चित्र में प्रवेश ढ्वार से भीतरी ऑंगन तक के मार्ग का पता लगाइए। आप क्या सोचते हैं कि भंडारगृह में क्या रखा जाता होगा? रसोईघर की पहचान कैसे की जा सकती है?

किंतु, मारी के राजाओं को सदा सतर्क एवं सावधान रहना पड़ता था; विभिन्न जन-जातियों के चरवाहों को राज्य में चलने-फिरने की इजाजृत तो थी, परन्तु उन पर कड़ी नज्गर रखी जाती थी। राजाओं तथा उनके पदाधिकारियों के बीच हुए पत्र-व्यवहार में अक्सर इन पशुचारकों की गतिविधियों और शिविरों का उल्लेख किया गया है। एक बार एक पदाधिकारी ने राजा को लिखा था कि उसने रात को बार-बार आग से किए गए ऐसे संकेतों को देखा है जो एक शिविर से दूसरे शिविर को भेजे गए थे और उसे संदेह है कि कहीं किसी छापे या हमले की योजना तो नहीं बनाई जा रही है।

मारी नगर एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यापारिक स्थल पर स्थित था जहाँ से होकर लकड़ी, ताँबा, राँगा, तेल, मदिरा और अन्य कई किस्मों का माल नावों के जरिए फ्रात नदी के रास्ते दक्षिण और तुर्की, सीरिया और लेबनान के ऊँचे इलाकों के बीच लाया-ले जाया जाता था। मारी नगर व्यापार के बल पर समृढ्ध हुए शहरी केंद्र का एक अच्छा उदाहरण है। दक्षिणी नगरों को घिसाई-पिसाई के पत्थर, चविक्याँ, लकड़ी और शराब तथा तेल के पीपे ले जाने वाले जलपोत मारी में रुका करते थे, मारी के अधिकारी जलपोत पर जाया करते थे, उस पर लदे हुए सामान की जाँच करते थे (एक नदी में 300 मदिरा के पीपे रखे जा सकते थे।) और उसे आगे बढ़ने की इजाज्त देने से पहले उसमें लदे माल की कीमत का लगभग 10 प्रतिशत प्रभार वसूल करते थे। जौ एक विशेष किस्म की नौकाओं में आता था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कुछ पट्टि काओं में साइप्रस के द्रीप ‘अलाशिया’ (Alashiya) से आने वाले ताँबे का उल्लेख मिला है, यह द्रीप उन दिनों ताँबे तथा टिन के व्यापार के लिए मशहूर था। परंतु यहाँ राँगे का भी व्यापार होता था। क्योंकि कॉसा, औजार और हथियार बनाने के लिए एक मुख्य औद्योगिक सामग्री था, इसलिए इसके व्यापार का बहुत महत्व था। इस प्रकार, यद्यपि मारी राज्य सैनिक दृष्टि से उतना सबल नहीं था, परंतु व्यापार और समृढ्धि के मामले में बह अद्धितीय था।

मेसोपोटामिया के नगरों की खुदाई

आज, मेसोपोटामिया के पुरास्थलों के उत्खनक पहले के उत्खनकों की तुलना में बहुत अधिक कुशल हैं, उनके कार्य की यथार्थता एवं परिशुद्धता और अभिलेखन का स्तर बहुत ऊँचा है। इसलिए अब उस तरह के बड़े-बड़े इलाकों की खुदाई नहीं की जाती जैंसी उर नगर में की गई थी। इसके अलावा, बहुत कम पुरातत्वविदों के पास ही इतनी बड़ी धनराशि होती है कि वे एक साथ खनकों के बड़े दल को खुदाई के काम पर लगा सकें। इस प्रकार जानकारी प्राप्त करने का तरीका बदल गया है।

इस संबंध में ‘अबू सलाबिख’ (Abu Salabikh) नाम के एक छोटे कस्बे का उदाहरण लें। यह कस्वा 2500 ई. पू में लगभग 10 हैक्टेयर ज़मीन पर बसा हुआ था और इसकी आबादी 10,000 से कम थी। इसकी दीवारों की रूपरेखा की ऊपरी सतहां को सर्वप्रथम खरोंचकर निकाला गया। इस प्रक्रिया में टीले की ऊपरी सतह को किसी बेलचे, फावड़े या अन्य औज्ञार के धारदार चौड़े सिरे से कुछ मिलीमीटर तक खरोंचा जाता है। नीचे की मिट्री तब भी कुछ नम पाई गई और पुरातत्वविदों ने भिन्न-भिन्न रंगों, उसकी बनावट तथा ईटों की दीवारों की स्थिति तथा गढुँं और अन्य विशेषताओं का पता लगा लिया। जिन थोड़े-से घरों की खोज की गई उन्हें खोद कर निकाला गया। पुरातत्वविदों ने पौधों और पशुओं के अवशेषों को प्राप्त करने के लिए टनों मिट्री की छनबीन की। इसके चलते उन्होंने पौधों और पशुओं की अनेक प्रजातियों का पता लगाया। उन्हें बड़ी मात्रा में जली हुई मछलियों की हड्डियाँँ भी मिलीं जो बुहार कर बाहर गलियों में डाल दी गई थी। वहाँँ गोबर के उपलों के जले हुए ईंधन में से निकले हुए पौधों के बीज और रेशे मिले थे; इससे इस स्थान पर रसोईघर होने का पता चला। घरों में रहने के कमरे कौन-से थे, यह जानने के संकेत बहुत कम मिले है। वहाँँ की गलियों में सूअरों के छोटे बच्चों के दाँत पाए गए हैं, जिन्हें देखकर पुरातत्वविदों ने यह निष्कर्ष निकाला कि अन्य किसी भी मेसोपोटामियाई नगर की तरह यहाँँ भी सूअर छुट्टे घूमा करते थे। वस्तुतः: एकघर में तो ऑँगन के नीचे, जहाँँ किसी मृतक को दफनाया गया था, सूअर की कुछ हड्डियाँं के अवशेष मिले हैं जिससे प्रतीत होता है कि व्यक्ति के मरणोपरांत जीवन में खाने के लिए सूअर का कुछ मांस रखा गया था। पुरातत्वविदों ने कमरों के प्रश्न का बारीकी से अध्ययन यह जानने के लिए किया किघर के कौन-से कमरों पर पोपलार (एक लंबा पतला पेड) के लढुँ, खजूर की पत्तियों और घासफूस की छतें थीं और कौन-से कमरे बिना किसी छत के खुले आकाश के नीचे थे।

मेसोपोटामिया संस्कृति में शहरों का महत्व

मेसोपोटामिया वासी शहरी जीवन को महत्व देते थे जहाँ अनेक समुदायों और संस्कृतियों के लोग साथ-साथ रहा करते थे। युढ़ में शहरों के नष्ट हो जाने के बाद वे अपने काव्यों के जरिए उन्हें याद किया करते थे।

मेसोपोटामिया के लोगों को अपने नगरों पर कितना अधिक गर्व था इस बात का सबसे अधिक मर्मस्पर्शी वर्णन हमें गिल्गेमिश (Gilgamesh) महाकाव्य के अंत में मिलता है। यह काव्य 12 पट्टिकाओं पर लिखा गया था। ऐसा कहा जाता है कि गिल्गेमिश ने एनमर्कर के कुछ समय बाद उरुक नगर पर शासन किया था। वह एक महान योढ़ा था जिसने दूर-दूर तक के प्रदेशों को अपने अधीन कर लिया था, लेकिन उसे उस समय गहरा झटका लगा जब उसका वीर मित्र अचानक मर गया। इससे दुःखी होकर वह अमरत्व की खोज में निकल पड़ा। उसने सागरों-महासागरों को पार किया, औरु दुनियाभर का चक्कर लगाया। मगर उसे अपने साहसिक कार्य में सफलता नहीं मिली। हारकर गिल्गेमिश अपने नगर उरुक लौट आया। वहाँँ जब वह अपने आपको सांत्वना देने के लिए शहर की चहारदीवारी के पास आगे-पीछे चहलकदमी कर रहा था तभी उसकी नज़र उन पकी ईंटों पर पड़ी जिनसे उसकी नींव डाली गई थी। वह भावविभोर हो उठा। इस प्रकार उरुक नगर की विशाल प्राचीर पर आकर उस महाकाव्य की लंबी वीरतापूर्ण और साहस भरी कथा का अंत हो गया। यहाँँ गिल्गेमिश, एक जनजातीय योढ़ा की तरह यह नहीं कहता कि उसका अंत निश्चित है पर उसके पुत्र तो जीवित रहेंगे और इस नगर का आनंद लेंगे। इस प्रकार उसे अपने नगर में ही सांत्वना मिलती है जिसे उसकी प्यारी प्रजा ने बनाया था।

लेखन कला की देन

हालांकि मर्मस्पर्शी कहानियों-किस्सों और तरह-तरह के वर्णन को तो मौखिक रूप से एक-दूसरों को सुनाते हुए जीवित रखा जा सकता है, पर विज्ञान को जीवित रखने के लिए लिखित दस्तावेजों और किताबों की ज़रूरत पड़ती है ताकि विद्धानों की आगे आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें पढ़ सर्कें। संभवतः मेसोपोटामिया की दुनिया को सबसे बड़ी देन है उसकी कालगणना और गणित की विद्धत्तापूर्ण परंपरा है।

1800 ई.पू. के आसपास की कुछ पट्टिकाएँ मिली हैं जिनमें गुणा और भाग की तालिकाएँ, वर्ग तथा वर्गमूल और चक्रवृद्धि ब्याज की सारणियाँ दी गई है। उनमें 2 का वर्गमूल यह दिया गया है:

1+24/60+51/602+10/6031 + 2 4 / 6 0 + 5 1 / 6 0 ^ {2} + 1 0 / 6 0 ^ {3}

अगर आप इसे हल करें तो इसका उत्तर 1.41421296 होगा जो इसके सही उत्तर 1.41421356 से थोड़ा-सा ही भिन्न है। उस समय के विद्यार्थियों को इस प्रकार के सवाल हल करने होते थे: अगर एक खेत का क्षेत्रफल इतना-इतना है और वह एक अंगुल गहरे पानी में डूबा हुआ है तो संपूर्ण पानी का आयतन बताओ।

पृथ्वी के चारों ओर चंद्रमा की परिक्रमा के अनुसार एक पूरे वर्ष का 12 महीनों में विभाजन, एक महीने का 4 हफ्तों में विभाजन, एक दिन का 24 घंटों में और एक घंटे का 60 मिनट में विभाजन-यह सब जो आज हमारी रोज्ञर्म की जिंदगी का अचेतन हिस्सा है, मेसोपोटामियावासियों से ही हमें मिला है। समय का उपर्युक्त विभाजन सिकंदर के उत्तराधिकारियों ने अपनाया, बहाँ से वह रोम और फिर इस्लाम की दुनिया को मिला और फिर मध्ययुगीन यूरोप में पहुँचा (यह सब कैसे हुआ विषय 5 में देखिए)।

जब कभी सूर्थ और चंद्र ग्रहण होते थे तो वर्ष, मास और दिन के अनुसार उनके घटित होने का हिसाब रखा जाता था। इसी प्रकार रात को आकाश में तारों और तारामंडल की स्थिति पर बराबर नजर रखते हूए उनका हिसाब रखा जाता था।

मेसोपोटामियावासियों की इन महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक भी उपलब्धि संभव नहीं होती यदि लेखन की कला और विद्यालयों जैसी उन संस्थाओं का अभाव होता जहाँ विद्यार्थीगण पुरानी लिखित पट्टिकाओं को पढ़ते और उनकी नकल करते थे और जहाँ कुछ छात्रों को साधारण प्रशासन का हिसाब-किताब रखने वाले लेखाकार न बनाकर, ऐसा प्रतिभासंपन्न व्यक्ति बनाया जाता था जो अपने पूर्वजों की बौढ़िक उपलब्धियों को आगे बढ़ा सकें।

यह सोचना गलत होगा कि मेसोपोटामिया के शहरी लोग आधुनिक तौर-तरीकों से परिचित नहीं थे। अंत में, हमें उन दो प्रकार के प्रारभिक प्रयत्नों का अवलोकन करना चाहिए जिनके द्वारा अतीत के प्रलेखों एवं परंपराओं को खोजने और सुरक्षित रखने की कोशिश की गई थी।

एक पुराकालीन पुस्तकालय

लौहयुग में, उत्तरी प्रदेशों के असीरियाई लोगों ने एक साम्राज्य की स्थापना की जो 720 से 610 ई.पू. तक अपनी उन्नति के शिखर पर रहा। यह साम्राज्य मिस्त्र तक फैला हुआ था। राज्य की अर्थव्यवस्था उन दिनों लूटमार की हो गई थी क्योंकि अधीनस्थ प्रजाजनों को दबाकर उनसे खाद्य-सामग्री, पशु, धातु तथा शिल्प की वस्तुओं के रूप में बेगार और नजराना जबरदस्ती लिया जाता था।

बड़े-बड़े असीरियाई शासक जो बाहर से आकर बसे थे, दक्षिणी क्षेत्र बेबीलोनिया को उच्च संस्कृति का केंद्र मानते थे। उनमें से आखिरी राजा असुरबनिपाल (Assurbanipal, 668–627 ई.पू.) ने उत्तर में स्थित अपनी राजधानी निनवै (Nineveh) में एक पुस्तकालय की स्थापना की। उसने इतिहास, महाकाव्य, शकुन साहित्य, ज्योतिष विद्या, स्तुतियों और कविताओं की पट्टिकाओं को इकटुा करने का बहुत प्रयत्न किया और उसमें सफल रहा। उसने अपने लिपिकों को दक्षिण में पुरानी पट्टिकाओं का पता लगाने के लिए भेजा। क्योंकि दक्षिण में लिपिकों को विद्यालयों में पढ़ना-लिखना सिखाया जाता था, जहाँ उन्हें दर्जनों की संख्या में पट्टिकाओं की नकलें तैयार करनी होती थीं। बेबीलोनिया में ऐसे भी नगर थे जो पट्टिकाओं के विशाल संग्रह तैयार किए जाने और प्राप्त करने के लिए मशहूर थे। हालांकि लगभग 1800 ई.पू. के बाद सुमेरियन भाषा बोली जानी बंद हो गई थी, लेकिन विद्यालयों में वह शब्दावलियों, संकेत-सूचियों, द्रिभाणी (सुमेरी और अक्कदी) पट्टिकाओं आदि के माध्यम से अब भी पढ़ाई जाती थी। इसलिए 650 ई.पू. में भी, 2000 ई.पू. तक पुरानी कीलाकार अक्षरों में लिखी पट्टिकाएँ पढ़ी और समझी जा सकती थीं- और असुरबनिपाल के आदमी यह जानते थे कि पुरानी पट्टिकाओं और उनकी प्रतिकृतियों को कहाँँ खोजा और प्राप्त किया जा सकता है।

गिल्लोमिश के महाकाव्य जैसी महत्वपूर्ण पट्टिकाओं की प्रतियाँ तैयार की गई। प्रतियाँ तैयार करने वाले उनमें अपना नाम और तिथि लिखते थे। कुछ पट्टिकाओं के अंत में असुरबनिपाल का उल्लेख भी मिलता हैः:

“मैं असुरबनिपाल, ब्रहांड का सम्राट, असीरिया का शासक जिसे देवताओं ने विशाल बुब्दि प्रदान की है, जिसने विद्वानों के पाँडित्य के गृढ़ ज्ञान को प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की। मैने देवताओं के बुब्दि-विवेक को पट्ट्रिकाओं पर लिखा है..... और मैने पट्ट्रिकाओं की जाँच की और उन्हें संगृहीत किया। मैने उन्हें निनवै स्थित अपने इष्टदेव नाबू के मंदिर के पुस्तकालय में भविष्य में उपयोग के लिए रख दिया - अपने जीवन के लिए, अपनी आत्मा के कल्याण के लिए और अपने शाही सिंहासन की नीव को मजबृत बनाए रखने के लिए...।”

इससे भी महत्वपूर्ण काम था इन पट्टिकाओं की सूची तैयार करने का। इसके लिए एक टोकरी-भर पट्टिकाओं को मिट्री के लेबल से इस प्रकार अंकित किया गया: “असंख्य पट्टिकाएँ भूत-प्रेत निवारण विषय पर, ‘अमुक’ व्यक्ति द्वारा लिखी गई।” असुरबनिपाल के पुस्तकालय में कुल मिलाकर 1000 मूलग्रंथ थे और लगभग 30,000 पट्टिकाएँ थों जिन्हें विषयानुसार वर्गीकृत किया गया था।

और, एक आरंभिक पुरातन्चवेता

दक्षिणी कछार के एक शूरवीर नैबोपोलास्सर (Nabopolassar) ने बेबीलोनिया को 625 ई.पू. में असीरियाई आधिपत्य से मुक्त कराया। उसके उत्तराधिकारियों ने अपने राज्यक्षेत्र का विस्तार किया और बेबीलोन में भवन-निर्माण की परियोजनाएँ पूरी कीं। उस समय से लेकर 539 ई.पू. में ईरान के एकेमेनिड लोगों (Achaemenids) द्वारा विजित होने के बाद और 331 ई.पू. में सिकंदर से पराजित होने तक बेबीलोन दुनिया का एक प्रमुख नगर बना रहा। इसका क्षेत्रफल 850 हैक्टेयर से अधिक था, इसकी चहारदीवारी तिहरी थी, इसमें बड़े-बड़े राजमहल और मंदिर मौजूद थे, एक ज़िगुरात (Ziggurat) यानी सीढ़ीदार मीनार थी और नगर के मुख्य अनुष्ठान केंद्र तक शोभायात्रा के लिए एक विस्तृत मार्ग बना हुआ था। इसके व्यापारिक घराने दूर-दूर तक अपना कारोबार करते थे और इसके गणितझों तथा खगोलविदों ने अनेक नयी खोजें की थी।

नैबोनिडस (Nabonidus) स्वतंत्र बेबीलोन का अंतिम शासक था। उसने लिखा है कि उर के नगर-देवता ने उसे सपने में दर्शन दिए और उसे सुदूर दक्षिण के उस पुरातन नगर का कार्यभार सँभालने के लिए एक महिला पुरोहित (Priestess) को नियुक्त करने का आदेश दिया। उसने लिखा, “चृँकि बहुत लंबे समय से उच्च महिला पुरोहित का प्रतिष्ठान भुला दिया गया था, उसके विशिष्ट लक्षणों को कहीं नहीं बताया गया है, मैने दिन-पर-दिन उसके बारे में सोचा..”

वह आगे कहता है कि उसे एक बहुत पुराने राजा (जिसका शासनकाल हम आज 1150 ई.पूँ के आसपास मानते हैं) का पट्टलेख (Stele) मिला और उस पर उसने महिला पुरोहित की आकृति अंकित देखी। उसने उसके आभूषणों और वेशभूषा को ध्यानपूर्वक देखा। फिर उसने अपनी पुत्री को वैसी ही वेशभूषा से सुसज्जित कर महिला पुरोहित के रूप में प्रतिष्ठित किया।

एक अन्य अवसर पर, नैबोनिडस के आद्मी उसके पास एक टूटी हुई मूर्ति लाए जिसपर अक्कद के राजा सारगोन (Sargon) का नाम खुदा था। (आज हम जानते हैं कि उस राजा ने 2370 ई.पू. के आसपास शासन किया था।) नैबोनिडस और निस्संदेह अनेक बुढ़िजीवियों ने भी प्राचीन काल के इस महान राजा के बारे में सुन रखा था। नैबोनिडस ने यह महसूस किया कि उसे उस मूर्ति की मरम्मत करानी चाहिए। वह लिखता है, “देवताओं के प्रति भक्ति और राजा के प्रति अपनी निष्ठा के कारण, मैंने कुशल शिल्पियों को बुलाया और उसका खंडित सिर बदलवा दिया।”

क्रियाकलाप 4

आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि असुरबनिपाल और नैबोनिडस ने मेसोपोटामिया की प्राचीन परंपराओं की कद्र की?

काल-रेखा
लगभग 7000-6000 ई.पू.उत्तरी मेसोपोटामिया के मैदानों में खेती की शुरुआत
लगभग 5000 ई.पू.दक्षिणी मेसोपोटामिया में सबसे पुराने मंदिरों का बनना
लगभग 3200 ई.पू.मेसोपोटामिया में लेखन-कार्य की शुरुआत
लगभग 3000 ई.पू.उरुक का एक विशाल नगर के रूप में विकास : कांसे के औज्जारों के इस्तेमाल में बढ़ोतरी
लगभग 2700-2500 ई.पू.आरंभिक राजाओं का शासनकाल जिनमें गिल्गेमिश जैसे पौराणिक राजा भी शामिल हैं।
लगभग 2600 ई.पू.कीलाकार लिपि का विकास
लगभग 2400 ई.पू.सुमेरियन के स्थान पर अक्कदी भाषा का प्रयोग
2370 ई.पू.सारगोन, अक्कद सम्राट
लगभग 2000 ई.पू.सीरिया, तुर्कों और मिस्त तक कीलाकार लिपि का प्रसार; महत्वपूर्ण शहरी केन्द्रों के रूप में मारी और बेबीलोन का उद्धभव
लगभग 1800 ई.पू.गणितीय मूलपाठों की रचना; अब सुमेरियन बोलचाल की भाषा नहीं रही
लगभग 1100 ई.पू.असीरियाई राज्य की स्थापना
लगभग 1000 ई.पू.लोहे का प्रयोग
720-610 ई.पू.असीरियाई साम्राज्य
668-627 ई.पू.असुरबनिपाल का शासन
331 ई.पू.सिकंदर ने बेबीलोन को जीत लिया
लगभग पहली शताब्दी (ईसवी)अक्कदी भाषा और कीलाकार लिपि प्रयोग में रहीं
1850कीलाकार लिपि के अक्षरों को पहचाना व पढ़ा गया

अभ्यास

संक्षेप में उत्तर दीजिए

•
आप यह कैसे कह सकते हैं कि प्राकृतिक उर्वरता तथा खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर ही आरंभ में शहरीकरण के कारण थे?
•
आपके विचार से निम्नलिखित में से कौन-सी आवश्यक दशाएँ थीं जिनकी वजह से प्रारंभ में शहरीकरण हुआ था और निम्नलिखित में से कौन-कौन सी बातें शहरों के विकास के फलस्वरूप उत्पन्न हुई?
•
(क)अत्यंत उत्पाद्क खेती, (ख) जल-परिवहन, (ग) धातु और पत्थर की कमी, (घ) श्रम विभाजन, (ड.) मुद्राओं का प्रयोग, (च) राजाओं की सैन्य-शक्ति जिसने श्रम को अनिवार्य बना दिया।
•
यह कहना क्यों सही होगा कि खानाबदेश पशुचारक निश्चित रूप से शहरी जीवन के लिए खतरा थें?
•
आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि पुराने मंदिर बहुत कुछ घर जैसे ही हांगे?

संक्षेप में निबंध लिखिए

5. शहरी जीवन शुरू होने के बाद कौन-कौन सी नयी संस्थाएँ अस्तित्व में आई? आपके विचार से उनमें से कौन-सी संस्थाएँ राजा की पहल पर निर्भर थों।

6. किन पुरानी कहानियों से हमें मेसोपोटामिया की सभ्यता की झलक मिलती है?