डॉक्टर गैलेन के अनुसार रोमन शहरों का ग्रामीण क्षेत्रों के साथ बर्ताव
दौ
साम्राज्य
तीन महाद्धीपों में फैला हुआ साम्राज्य
याचावर साम्राज्य

साम्राज्य

सोपोटामिया में साम्राज्य स्थापित होने के दो सहस्त्राब्दी बाद तक उस क्षेत्र तथा उसके पूर्व और पश्चिम में साम्राज्य निर्माण के विविध प्रयत्न होते रहे।
छठी शती ई. तक ईरानियों ने असीरिया के साम्राज्य के अधिकांश भाग पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था। स्थलमार्गों के साथ-साथ भूमध्यसागरीय तटवर्तीं क्षेत्रों में व्यापारिक संबंधों का विकास हुआ।
इन परिवर्तनों के फलस्वरूप व्यापार में सुधार हुआ और इस वजह से पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में यूनानी नगर तथा उनकी बस्तियों को लाभ हुआ। उन्हें काला सागर के उत्तर में रहने वाले यायावर लोगों के साथ घनिष्ठ व्यापारिक संपर्क से भी बहुत फ्रायदा हुआ। यूनान में अधिकांश समय तक एथेंस और स्पाटा के नगर-राज्य नागरिक जीवन के केंद्र बने रहे। चतुर्थ शती ई. के उत्तराध में यूनानी राज्यों में मेसीडोन राज्य के राजा सिकंदर ने कई सैन्य अभियान किए और उत्तरी अफ्रीका, पश्चिमी एशिया व ईरान तथा भारत में व्यास तक के क्षेत्र को जीत लिया। उसके सैनिकों ने और आगे पूर्व में जाने से मना कर दिया। सिकंदर का सैन्य दल पीछे मुड़ गया, यद्यपि कई यूनानी इस क्षेत्र में ही रह गए।
सिकंदर के नियंत्रण में इस पूरे क्षेत्र में यूनानियों और स्थानीय लोगों में आदर्शों और सांस्कृतिक परंपराओं का आदान-प्रदान हो रहा था। पूरे क्षेत्र का यूनानीकरण हो गया जिसे अंग्रेज्ञी में हेलेनाइज्जेशन कहा जाता है क्योंकि यूनानियों को हेलेनीज़ कहते थे। यूनानी भाषा इस क्षेत्र की एक जानी-पहचानी भाषा बन गई। लेकिन सिकंदर के साम्राज्य की यह राजनीतिक एकता उसकी मृत्यु के तुरंत बाद विघटित हो गई। हालाँळिक इसके तीन शताब्दी बाद तक यूनानी संस्कृति इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण बनी रही। इस क्षेत्र के इतिहास में यह काल प्रायः यूनानी काल के नाम से जाना जाता है। लेकिन यह मान्यता यूनानी विश्वासों व विचारों की तरह ही अन्य महत्वपूर्ण (संभवतः इससे भी अधिक महत्वपूर्ण) संस्कृतियों (मुख्य रूप से ईरान के पुराने साम्राज्य से संबंधित ईरानी संस्कृति) की महत्ता को अस्वीकार कर देती है।
इसके बाद के भावी इतिहास के महत्वपूर्ण पहलुओं के बारे में इस अनुभाग में पता चलेगा। सिकंदर के साम्राज्य के विघटन के फलस्वरूप हुई राजनीतिक कलह का लाभ उठाते हुए रोम के मध्य इतालवी नगर राज्य के छोटे किंतु सुसंगठित सैन्य बल ने दूसरी शती ई. से उत्तरी अफ्रीका और पूर्वी भूमध्यसागर पर नियंत्रण कर लिया। उस समय रोम एक गणतंत्र था। यद्यपि वहाँ की सरकार निर्वाचन की एक जटिल व्यवस्था पर आधारित थी लेकिन राजनीतिक संस्थाएँ जन्म और धन-संपदा को कुछ महत्व देती थी। यहाँ का समाज दासता से भी लाभान्वित था। रोम की सैन्य शक्ति ने एक समय सिकंदर के साम्राज्य का भाग रहे राज्यों के बीच व्यापार हेतु तंत्र स्थापित किया। प्रथम शती ई. के मध्य उच्च कुल में जन्मे सैन्य नायक जूलियस सीज़र के अधीन ‘रोम साम्राज्य’ वर्तमान ब्रिटेन और जर्मनी तक फैल गया।
लातिनी (जो रोम में बोली जाती थी) साम्राज्य की मुख्य भाषा थी। हालॉँकि पूर्व में रहने वाले कई लोग यूनानी भाषा का ही प्रयोग करते रहे। रोम के लोगों में यूनानी संस्कृति के प्रति गहरा आदर-भाव था। प्रथम शती ई.पू. के अंतिम भाग में साम्राज्य के राजनैतिक ढाँचे में परिवर्तन हुए। चतुर्थ शती ई. में सम्राट कॉन्स्टैनटाइन के ईसाई बनने के बाद इस साम्राज्य का काफ्री हद तक ईसाईकरण हो गया।
शासन को सुचारू ढंग से चलाने के लिए चौथी शती ई. में रोम साम्राज्य को पूर्वी और पश्चिमी दो हिस्सों में बाँट दिया गया। लेकिन पश्चिम में सीमावर्ती क्षेत्रों (गोथ, विसीगोथ, वैंडल व अन्य) की जनजातियों तथा रोम के बीच स्थित व्यवस्थाएँ बिगड़ने लगी। ये व्यवस्थाएँ व्यापार, सैन्य-भर्ती तथा बसने से जुड़ी थीं और जनजातियों ने रोम प्रशासन पर अपने आक्रमणों में वृद्धि कर दी। ये मतभेद बढ़ते गए और साम्राज्य के आंतरिक मतभेदों में जुड़ गए। फलतः पाँचवीं शती ई. आते-आते पश्चिम का यह साम्राज्य नष्ट हो गया। पूर्व के साम्राज्य की सीमा के अंतर्गत ही जनजातियों ने अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिए। ईसाई चर्च से प्रोत्साहन पाकर नौवीं शती ई. में ऐसे ही कुछ राज्यों को मिलाकर पवित्र रोमन साम्राज्य की स्थापना की गई। पवित्र रोमन साम्राज्य ने पुराने रोमन साम्राज्य के साथ निरंतरता का दावा किया।
कोरिंथ के यूनानी नगर के भग्नावशेष।

सातवीं शती ई. और पंद्रहवीं शती ई. के बीच पूर्वी रोमन साम्राज्य (कुंस्तुनतुनिया केंद्रित) की अधिकांश भूमि पर अरब साम्राज्य ने अधिकार कर लिया। दमिशक में केंद्रित इस अरब साम्राज्य को पैगम्बर मुहम्मद (जिन्होंने नवीं शती ई. में इस्लाम धर्म की स्थापना की) के अनुयायियों या इनके उत्तराधिकारियों (जिन्होंने आरंभ में बगदाद में शासन किया) द्वारा स्थापित किया गया था। इस इलाके की यूनानी व इस्लामी परंपराओं के बीच करीबी आदान-प्रदान था। इस क्षेत्र के व्यापारिक तंत्र और समृद्धि ने उत्तर के पशुचारी लोगों (विभिन्न तुक्री जनजातियों) को आकर्षित किया। इन्होंने प्रायः इस क्षेत्र के शहरों पर आक्रमण किए और इन पर अपना नियंत्रण कर लिया। इस क्षेत्र पर आक्रमण का प्रयास करने वाले अंतिम लोगों में मंगोल थे। चंगेज़ खान और उसके उत्तराधिकारियों के अधीन मंगोलों ने तेरहवीं शताब्दी में पश्चिम एशिया, यूरोप, मध्य एशिया और चीन में प्रवेश किया।
साम्राज्य बनाने और बनाए रखने के ये सारे प्रयास पूरे क्षेत्र में फैले हुए व्यापारिक तंत्र के संसाधन पर नियंत्रण की चाह से प्रेरित थे ताकि उन्हें उस क्षेत्र के भारत या चीन जैसे देशों से स्थापित संबंधों से फायदा हो सके। सभी साम्राज्यों ने व्यापार को स्थिरता प्रदान करने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था विकसित करने का प्रयास क्रिया। उन्होंने विभिन्न तरीकों के सैन्य संगठन का भी प्रयास क्रिया। किसी भी साम्राज्य की उपलब्धियों की महत्ता प्रायः उनके उत्तराधिकारियों ढ्वारा ग्रहण की जाती थी। कुछ समय बाद इस क्षेत्र में बोली और लिखी जाने वाली कई भाषाओं में चार भाषाएँ- फ़ारसी, यूनानी, लातिनी और अरबी महत्वपूर्ण हो गई।
ये साम्राज्य बहुत स्थिर नहीं थे। इसकी एक वजह यह थी कि वे विभिन्न क्षेत्रों के संसाधनों को लेकर आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे। ऐसा इन साम्राज्यों और उत्तर के पशुचारी लोगों के संबंधों में आ गए संकट के कारण भी था। इन पशुचारी लोगों से इन साम्राज्यों को व्यापार में तो
दमिश्क की इस महान मस्जिद का निर्माण 714 में पूरा हुआ।

समर्थन मिलता ही था साथ ही उनकी सेनाओं और उत्पादों के लिए उन्हें श्रम भी इनसे मिलता था। यह महत्वपूर्ण बात है कि सभी साम्राज्य नगर-केंद्रित नहीं थे। चंगेज़ खान और उसके उत्तराधिकारियों ढ्वारा शासित मंगोल साम्राज्य इस बात का अच्छा उदाहरण है कि पशुचारी लोगों ढ्वारा भी सफलतापूर्वक एक लंबे समय तक साम्राज्य को कायम रखा जा सकता है।
ऐसे धर्म जो अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले विभिन्न नृजातीय उत्पत्ति के लोगों को आकर्षित कर सकते थे, विशाल साम्राज्य निर्माण की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण थे। यह ईसाई धर्म (जो प्रथम शती ई. के आरंभिक काल में फ़िलिस्तीन में उदित हुआ) और इस्लाम धर्म (जो सातवीं शती ई. में उद्धूत हुआ) के विषय में भी सत्य था।
कालक्रम दो
(लगभग 100 ईसा पूर्व से 1300 ईसवी)

इस कालक्रम के केंद्र बिंदु राज्य और साम्राज्य हैं। इनमें से कुछ, जैसे कि रोमन साम्राज्य, बहुत बड़े थे और तीन महाद्वीपों में फैले हुए थे। इस समय प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएँ विकसित हुई और बौढ्किक गतिविधियों से जुड़ी संस्थाओं का उद्य हुआ। पुस्तकें लिखी गई और विचार महाद्वीपों के आर-पार फैलने लगे। कई ऐसी वस्तुएँ जो आज हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा हैं, इस काल में पहली बार प्रयोग में आई।
| तिथि | अफ्रीका | यूरोप |
| 100-50 ई.पू | समुद्री मागों द्वारा दक्षिण-पूर्वी एशिया से केले पूर्वी अफ्रीका लाए गए | स्पाठ्केस 100,000 गुलामों का नेतृत्व करते है।![]() |
| 50-1 | क्लयोपेट्रा, मिस्त की रानी (51-30 ई.पू.) | रोम में कोलस्सम का निर्माण (73 ई.पू.) |
| 1-50 ईसवी | ||
| 50-100 | ||
| 100-150 | सिकंदरिया के नायक ने भाप पर चलाने वाली मशीन बनायी | रोमन साम्राज्य अपने शिखर पर* |
| 150-200 | सिकंदरिया के टॉलेमी ने भूगोल पर एक पुस्तक लिखी | |
| 200-250 | ||
| 250-300 | ||
| 300-350 | एक्सम* (Axum) (330) में ईसाई धर्म की शुरुआत | कॉन्स्टैनटाइन सम्राट बनते हैं और कुंस्तुनगुनिया नगर की स्थापना करते हैं |
| 350-400 | रोमन साम्राज्य का पूर्व और पश्चिम दो बराबर भागों में विभाजन | |
| 400-450 | यूरोप के चैंडल लोगों द्वारा उत्तर अफ्रीका में राज्य की स्थापना (429) | उत्तर और मध्य यूरोप के कबीलों का रोमन साम्राज्य पर आक्रमण |
| 450-500 | गॉल (फ्रांस) के क्लोविस का ईसाई धर्म को अपनाना (496) | |
| 500-550 | इटली में सेंट बॉंडिक्ट द्वारा एक मठ की स्थापना (526), इंग्लैड में सेंट ऑंगस्टीन द्वारा ईसाई धर्म की शुरुआत (596), ग्रैगो महान (590) द्वारा रोमन कैथोलिक चर्च को नीव रखना | |
| 550-600 | ||
| 600-650 | कुछ मुसलमानों का अबीसीनिया (615) से प्रचास (हिजरा) | |
| 650-700 | अरबी मुसलमान की मिस्त्र के दक्षिण में स्थित नूबिओआ से संधि (652) | बेडे द्वारा अंग्रेजी चर्च और व्यक्तियों का इतिहास लिखा गया |
| 700-750 | ||
| 750-800 | ||
| 800-850 | घाना में राज्य का उदय | शाल्मेन, फ्रेकों के राजा को पवित्र रोमन सम्राट की उपाधि (800) |
| 850-900 | केव और नोवगोर्ड में प्रथम रूसी राज्यों की स्थापना | |
| 900-950 | पश्चिम यूरोप पर समुद्री दस्युओं के आक्रमण | |
| 950-1000 | ||
| 1000-50 | इटली में सेलरेनो में मेडिकल स्कूल की स्थापना (1030) | |
| 1050-1100 | अलमोरविद राज्य (1056-1147) का घाना से दक्षिण स्मेन तक विस्तार | नॉर्मेंडी के विलियम का इंग्लैण्ड पर आक्रमण और फिर शासक बनना (1066); प्रथम धर्मयुद्ध की घोषणा (1095) |
| 1100-50 | जिम्बाब्बे का स्वर्ण और ताँबे की शित्पकृतियों के उत्पादन और लंबी दूरी के व्यापार के केंद्र के रूप में उदय (1120-1450) | |
| 1150-1200 | नोतें दम, कथोड्ल के निर्माण कार्य का आरंभ (1163) | |
| 1200-50 | इशियोपिया में ईसाई चचाँ की स्थापना (1200), पश्चिम अग्रौनीका माली राज्य में टिबकटू एक शिश्का के केंद्र के रूप में | संबेदना और सादगी पर बल देते हुए असीसी के सेंट फ्रासिस द्वारा एक मठ संगठन की स्थापना (1209); मैनाकार्टा पर हस्ताक्षर कर्ने वाले राजा के विरुद्ध इंग्लैण्ड के लॉर्डस का विद्रोह, राजा कानून के अनुसार शासन करने को सहमत |
| 1250-1300 | आस्ट्रिया में 1918 तक राज्य करने वाले हेप्सर्बग वंश की स्थापना | |
| तिथि | एशिया | दक्षिणी एशिया |
| 100-50 ई.पू | चीन में हान साम्राज्य, एशिया से यूरोप तक रेशम मार्ग का विकास | शक और बाख्ली यूनानियों द्वारा उत्तर-पश्चिम में राज्यों की स्थापना; दक्कन में सातवाहनों का उदय |
| 50-1 | दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व, पूर्व एशिया और यूरोप में बढ़ता व्यापार | |
| 1-50 ईसवी | रोम साम्राज्य के एक प्रांत जूडिया में ईसा, अरब पर रोमन आक्रमण (24) | |
| 50-100 | उत्तर पश्चिम और मध्य एशिया में कुषाण राज्य की स्थापना | |
| 100-150 | चीन में कागज्ञ का आविष्कार (118); प्रथम भूकंप-लेखी का निर्माण (132) | ![]() |
| 150-200 | ||
| 200-250 | हान साम्राज्य का अंत (221); फ्रांस में ससानियों का राज्य (226) | |
| 250-300 | राजमहल में चाय, चीन (262), चुंबकीय कुतुबनुमा का प्रयोग, चीन (270) | |
| 300-350 | चीनियों द्वारा घुड्सवारी* करते बक्त रकाब का प्रयोग | गुप्त वंश* की स्थापना (320) |
| 350-400 | फा-शियन की चीन से भारत की यात्रा (399) | |
| 400-450 | आर्यभट, खगोलज्ञ और गणितज्ञ | |
| 450-500 | ||
| 500-550 | ||
| 550-600 | जापान में बौढ़ धर्म का आगमन (594); चीन में अनाज के आवागमन के लिए 34 वर्षों में 5,000,000 श्रमिकों की मदद से प्रौंड कैनाल का निर्माण (584-618) | एहोल और बादामी में चालुक्य मंदिरों का निर्माण |
| 600-650 | चीन में तांग वंश (618); हजरत मोहम्मद का मदीना की ओर प्रस्थान, हिजरी युग का आरंभ (622); ससानी साम्राज्य का पतन (642) | जुआंग जांग का चीन से भारत की ओर प्रस्थान, नालंदा का शिक्षा के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उदय |
| 650-700 | उमय्या खिलाफत (661-750) | |
| 700-750 | उमय्या की एक शाखा द्वारा स्पेन पर विजय, चीन में तांग वंश की स्थापना | अरबों की सिंध पर विजय (712) |
| 750-800 | अब्बासी खिलाफत की स्थापना और बगुदाद का एक मुख्य सांस्कृतिक और वाणिज्यिक केंद्र बनना | ![]() |
| 800-850 | कम्बोडिया में खमेर राज्य की स्थापना (802) | |
| 850-900 | प्रथम मुद्रित पुस्तक, चीन (868) | |
| 900-950 | ||
| 950-1000 | चीन में कागजी मुद्रा का प्रयोग | |
| 1000-50 | इन्न सिना; एक फारसी डॉक्टर चिकित्सा के ऊपर एक पुस्तक लिखता है जिसका अनुसरण सदियों तक किया जाता है | महमूद गज्नी का उत्तर-पश्चिम पर आक्रमण; अलबरुनी का भारत आगमन, तंजौर में राजराजेश्वर मंदिर का निर्माण |
| 1050-1100 | अल्प अरसालान द्वारा तुर्की साम्राज्य की स्थापना (1075) | |
| 1100-50 | चीन में आतिशबाजी के प्रदर्शन का पहला लिखित विवरण | कल्हण द्वारा राजतरंगिणी की रचना |
| 1150-1200 | कंबोडिया का अंकोर साम्राज्य अपनी चरम सीमा पर (1180), अंकोर वाट में मंदिर प्रौंगण | |
| 1200-50 | चंगेज खान द्वारा सत्ता को दूढ़ करना (1206) | दिल्ली सत्तनत की स्थापना (1206) |
| 1250-1300 | चंगेज खान का पोता, कुबलई खान चीन का सम्राट बनते हैं | अमीर खुसरो (1253-1325) ने कविता और संगीत* के नये रूपों की शुरुआत की; कोणार्क का सूर्य मंदिर |
| तिथि | अमरीका | आस्ट्रेलिया/प्रशांत द्वीप |
| 100-50 ई.पू. | ![]() | |
| 50-1 | ||
| 1-50 ईसवी | ||
| 50-100 | ||
| 100-150 | ||
| 150-200 | ||
| 200-250 | ||
| 250-300 | ||
| 300-350 | मेक्सिको में टीयोटीहुकान (Teotihuacan) नगर-राज्य की स्थापना, माया के आनुष्ठानिक केंद्र*, खगोल शास्त्र का विकास, चित्रमय लिपि* | क्रियाकलाप एसी पाँच घटनाएँ/प्रक्रियाएँ बताइए जिनमें लोगों का विभिन्न क्षेत्रों/महाद्वीपों के आर-पार आवागमन रहा। इन घटनाओं/प्रक्रियाओं का अपने समय में क्या महत्व था? |
| 350-400 | ![]() | |
| 400-450 | ||
| 450-500 | ||
| 500-550 | ||
| 550-600 | ||
| 600-650 | ||
| 650-700 | ||
| 700-750 | ||
| 750-800 | ||
| 800-850 | ||
| 850-900 | ||
| 900-950 | ||
| 950-1000 | उत्तर अमरीका में प्रथम नगर का निर्माण (लगभग 990) | पोलीनेशिया के मोरी मार्ग निर्देशक द्वारा न्यूजीलैंड की खोज |
| 1000-50 | ||
| 1050-1100 | पोलीनेशिया के द्वीपों में शकरकंद की पैदावार (मूलत: दक्षिण अमरीका में) | |
| 1100-1150 | ||
| 1150-1200 | ||
| 1200-50 | ||
| 1250-1300 |


रोम के इतिहासकारों के पास स्लोत-सामग्री का विशाल भंडार है। इस संपूर्ण स्लोत-सामग्री को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता हैः (क) पाठ्य सामग्री; (ख) प्रलेख या दस्तावेज्ज और (ग) भौतिक अवशेष। पाठ्य स्लोतों में शामिल हैः: समकालीन व्यक्तियों द्वारा लिखा गया उस काल का इतिहास (जिसे ‘वर्ष-वृत्तांत’ (Annals) कहा जाता था क्योंकि ये वृत्तांत प्रतिवर्ष लिखे जाते थे), पत्र, व्याख्यान, प्रवचन, कानून, आदि। दस्तावेज्जी स्लोत मुख्य रूप से उत्कीर्ण अभिलेखों या पैपाइरस पेड़ के पत्तों आदि पर लिखी गई पांडुलिपियों के रूप में मिलते हैं। उत्कीर्ण अभिलेख आमतौर पर पत्थर की शिलाओं पर खोदे जाते थे, इसलिए वे नष्ट नहीं हुए और बहुत बड़ी मात्रा में यूनानी और लातिनी में पाए गए है। पैपाइरस एक सरकंडा जैसा पौधा था जो मिस्र में नील नदी के किनारे उगा करता था और उसी से लेखन सामग्री तैयार की जाती थी। रोज्ञमरी की जिंदगी में उसका व्यापक इस्तेमाल किया जाता था। हज्ञारों की संख्या में संविदापत्र, लेख, संवादपत्र और सरकारी दस्तावेज्ज आज भी ‘पैपाइरस’ पत्र पर लिखे हुए पाए गए हैं और पैपाइरोलोजिस्ट यानी पैपाइरस शास्त्री कहे जाने वाले विद्धानों द्वारा प्रकाशित किए गए हैं। भौतिक अवशेषों में अनेक प्रकार की चीज़े शामिल हैं जो मुख्य रूप से पुरातत्वविदों को (खुदाई और क्षेत्र सर्वेक्षण आदि के जरिए) अपनी खोज में मिलती हैं; जैसे – इमारतें, स्मारक और अन्य प्रकार की संरचनाएँ, मिट्री के बर्तन, सिक्के, पच्चीकारी का सामान, यहाँँ तक कि संपूर्ण भू-दृश्य (जैसे, हवाई छायांकन द्वारा प्राप्त)। इनमें से प्रत्येक स्लोत हमें अतीत के बारे में एक प्रकार की ही जानकारी देते हैं। इन जानकारियों को मिलाकर देखना अत्यंत उपयोगी हो सकता है। लेकिन कितनी अच्छी तरह से इतिहासकार इन स्लोतों के तथ्यों में अंतर्सबंध बनाता हैं यह उसकी कुशलता पर निर्भर करता है।
ईसा मसीह के जन्म से लेकर सातवीं शताब्दी के पूर्वाईमं 630 के दशक तक की अवधि में अधिकांश यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और मध्य-पूर्व तक के विशाल क्षेत्र में दो सशक्त साम्राज्यों का शासन था। ये दो साम्राज्य रोम और ईरान के थे। रोम तथा ईरान के लोग आपस में प्रतिद्धिनी थे और अपने इतिहास के अधिकांश काल में वे आपस में लड़ते रहे। उनके साम्राज्य एक-दूसरे के बिलकुल पास थे, उन्हें भूमि की एक संकरी पट्टी जिसके किनारे फ़रात नदी बहा करती थी, अलग करती थी। इस अध्याय में हम रोम के साम्राज्य के बारे में पढ़़गे, मगर कहीं-कहीं प्रसंगवश रोम के प्रतिद्धिनी ईरान का भी उल्लेख करते रहेंगे।
यदि आप नीचे दिए गए मानचित्र पर नज़र डालें तो देखेंगे कि यूरोप और अफ्रीका के महाद्वीप एक समुद्र द्वारा एक-दूसरे को अलग किए हुए हैं जो पश्चिम में स्प्नेन से लेकर पूर्व में सीरिया तक फैला हुआ है। इस समुद्र को भूमध्यसागर कहा गया है और यह उन दिनों रोम साग्राज्य का हद्य था। रोम का भूमध्यसागर और उत्तर तथा दक्षिण की दोनों दिशाओं में सागर के आसपास स्थित सभी प्रदेशों पर प्रभुत्व था। उत्तर में साग्राज्य की सीमा का निर्धारण दो महान नदियों राइन और डैन्यूब से होता था और दक्षिणी सीमा सहारा नामक अति विस्तृत रेगिस्तान से बनती थी। इस प्रकार
मानचित्र 1: यूरोप और उत्तरी अफ्रीका।

इस अत्यंत विस्तृत क्षेत्र में रोम साम्राज्य फैला हुआ था। दूसरी ओर, कैस्पियन सागर के दक्षिण से पूर्वी अरब तक का समूचा इलाका और कभी-कभी अफ्रगानिस्तान के कुछ हिस्से भी ईरान के नियंत्रण में थे। इन दो महान शक्तियों ने दुनिया के उस अधिकांश भाग को आपस में बाँट रखा था जिसे चीनी लोग ता-चिन (बृहत्तर चीन या मोटे तौर पर पश्चिम) कहा करते थे।
साम्राज्य का आरंभिक काल
रोमन साम्राज्य को मोटे तौर पर दो चरणों में बाँटा जा सकता है, जिन्हें ‘पूर्ववर्ती’ और ‘परवर्ती’ चरण कह सकते है। इन दोनों चरणों के बीच तीसरी शताब्दी का समय आता है जो उन्हें दो ऐतिहासिक भागों में विभाजित करता है। दूसरे शब्दों में कहें तो तीसरी शताब्दी के मुख्य भाग तक की संपूर्ण अवधि को ‘पूर्ववर्ती साम्राज्य’ और उसके बाद की अवधि को ‘परवर्ती साम्राज्य’ कहा जा सकता है।
दो महाशक्तियों तथा उनसे संबंधित साम्राज्यों में एक बड़ा अंतर यह था कि रोमन साम्राज्य सांस्कृतिक दृष्टि से ईरान की तुलना में कहीं अधिक विविधतापूर्ण था। इस अवधि के दौरान पार्थियाई तथा बाद में ससानी राजवंशों ने ईरान पर शासन किया, जिन लोगों पर शासन हुआ उनमें अधिकतर ईरानी थे। इसके विपरीत, रोमन साम्राज्य ऐसे क्षेत्रों तथा संस्कृतियों का एक मिलाजुला रूप था जो कि मुख्यतः सरकार की एक साझी प्रणाली द्वारा एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए थे। साम्राज्य में अनेक भाषाएँ बोली जाती थीं लेकिन प्रशासन के प्रयोजन हेतु लातिनी तथा यूनानी भाषाओं का ही प्रयोग होता था। पूर्वी भाग के उच्चतर वर्ग यूनानी भाषा और पश्चिम भाग के लोग लातिनी भाषा बोलते और लिखते थे और इन दोनों भाषाओं के बीच की सीमा रेखा भूमध्यसागर को चीरती हुई उस पार अफ्रीकी प्रांत त्रिपोलितानिया (जो कि लातिनी-भाषी था) और सायरेनाएका (यूनानी भाषी) के बीच से जाती थी। जो लोग साम्राज्य में रहते थे वे सभी एकमात्र, शासक यानी सम्राट की ही प्रजा थे, चाहे वे कहीं भी रहते हों और कोई भी भाषा बोलते हों।
प्रथम सम्नाट, ऑगस्टस ने 27 ई.पू. में जो राज्य स्थापित किया था उसे ‘प्रिसिपेट’ कहा जाता था। यद्यपि ऑगस्टस एकछत्र शासक और सत्ता का वास्तविक स्रोत था तथापि इस कल्पना को जीवित रखा गया कि बह केवल एक ‘प्रमुख नागरिक’ (लातिनी भाषा में प्रिंसेप्स) था, निरंकुश शासक नहीं था। ऐसा ‘सैनेट’ को सम्मान प्रदान करने के लिए किया गया था; सैनेट वह निकाय था जिसने उन दिनों में जब रोम एक ‘रिपब्लिक’ यानी गणतंत्र* था, सत्ता पर अपना नियंत्रण रखा था। रोम में सैनेट नामक संस्था का अस्तित्व कई शताब्दियों तक रहा था। वह एक ऐसी संस्था थी जिसमें कुलीन एवं अभिजात वर्गों यानी मुख्यतः रोम के धनी परिवारों का प्रतिनिधित्व था। लेकिन आगे चलकर उसमें इतालवी मूल के जृमींदारों को भी शामिल कर लिया गया था। रोम के इतिहास की अधिकांश पुस्तकें जो आज यूनानी तथा लातिनी में ज्यादातर लिखी मिलती हैं इन्हीं लोगों द्वारा लिखी गई थी। इन पुस्तकों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सम्नाटों की परख इस बात से की जाती थी कि वे सैनेट के प्रति किस तरह का व्यवहार रखते थे। सबसे बुरे सम्नाटवे माने जाते थे जो सैनेट के सदस्यों के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार करते थे और उनको शक की नजर से देखते थे या फिर उनके साथ कृूरता व हिंसा करते थे। कई सैनेटर गणतंत्र-युग में लौटने के लिए तरसते थे, किन्तु अधिकतर सैनेटरों को यह अहसास जरूर हो गया कि यह असंभव था।
सम्राट और सैनेट के बाद साम्राज्यिक शासन की एक अन्य प्रमुख संस्था सेना थी। फ्रारस के साम्राज्य में तो बलात्** भर्ती बाली सेना थी लेकिन रोम की सेना एक व्यावसायिक सेना थी जिसमें प्रत्येक सैनिक को वेतन दिया जाता था और न्यूनतम 25 वर्ष तक सेवा करनी पड़ती थी। एक वेतनभोगी सेना का होना निस्संदेह रोमन साम्राज्य की अपनी एक ख्रास विशेषता थी। सेना साम्राज्य में सबसे बड़ा एकल संगठित निकाय थी (जिसमें चौथी शताब्दी तक 6,00,000 सैनिक थे) और उसके पास निश्चित रूप से सम्राटों का भाग्य निर्धारित करने की शक्ति थी। सैनिक बेहतर वेतन
*इस साम्राज्य में *‘गणतंत्र’ (रिपब्लिक) एक ऐसी शासन व्यवस्था थी जिसमें वास्तविक सत्ता ‘सैनेट’ नामक निकाय में निहित थी। सैनेट में धनवान परिवारों के एक छोटे से समूह का बोलबाला रहता था जिन्हें अभिजात कहा जा सकता है। व्यावहारिक तौर पर, गणतंत्र अभिजात वर्ग की सरकार का शासन ‘सैनेट’ नामक संस्था के माध्यम से चलाता था। गणतंत्र 509 ई.पू. से 27 ई.पू. तक चला लेकिन 27 ई.पू. में जूलियस सीज़र के दत्तक पुत्र तथा उत्तराधिकारी ऑक्टेवियन ने उसका तख्ला पलट दिया और सत्ता अपने हाथ में ले ली और ऑगस्टस नाम से रोम का सम्राट बन बैठा। सैनेट की सदस्यता जीवन-भर चलती थी और उसके लिए जन्म की अपेक्षा धन और पद-प्रतिष्ठा को अधिक महत्व दिया जाता था।
**बलात् भर्ती वाली सेना वह होती है जिसमें कुछ वर्गों या समूहों के वयस्क पुरुषों को अनिवार्य रूप से सैनिक सेवा करनी पड़ती है।
और सेवा-शर्तों के लिए लगातार आंदोलन करते रहते थे। यदि सैनिक अपने सेनापतियों और यहाँँ तक कि सम्भाट द्वारा निराश महसूस करते थे तो ये आंदोलन प्रायः सैनिक विद्रोहांं का रूप ले लेते थे। यह भी ध्यान रहे कि रोम सेना की जो तस्वीर हमारे सामने पेश की गई है वह उन इतिहासकारों द्वारा तैयार की गई थी जो सैनेट के प्रति सहानुभूति रखते थे। सैनेट सेना से घृणा करती थी और उससे डरती थी, क्यौंकि वह प्रायः अप्रत्याशित हिंसा का स्क्रोत थी, विशेष रूप से तीसरी शताब्दी की तनावपूर्ण परिस्थितियों में जब सरकार को अपने बढ़ते हुए सैन्य खर्चों को पूरा करने के लिए भारी कर लगाने पड़े थे।
संक्षेप में, सम्राट, अभिजात वर्ग और सेना साम्राज्य के राजनीतिक इतिहास में तीन मुख्य ‘खिलाड़ी’ थे। अलग-अलग सम्राटों की सफलता इस बात पर निर्भर करती थी कि वे सेना पर कितना नियंत्रण रख पाते हैं और जब सेनाएँ विभाजित हो जाती थीं तो इसका परिणाम सामान्यतः
गृहयुद्ध* होता था। एक ऐसे वर्ष (69 ईस्वी) को छोड़कर, जब एक के बाद एक कुल मिलाकर, चार सम्राट गढ़ी पर बैठे, पहली दो शताब्दियों में कोई गृहयुद्ध नहीं हुआ और अपेक्षाकृत शाँति बनी रही। सिंहासन यथासंभव पारिवारिक वंशक्रम पर आधारित था। पिता का राज्य पुत्र को मिलता था, चाहे यह नैसर्गिक हो अथवा ग्रहण किया हुआ उत्तराधिकारी दत्तक, और सेना भी इस सिद्धांत को पूरी तरह से मानती थी। उदाहरणार्थ, टिबेरियस (Tiberious) (14–37 ईस्वी), जो रोम सम्राटों की लंबी कतारों में दूसरा था प्रिसिपेट की स्थापना करने वाले ऑगस्टस का अपना पुत्र नहीं था, किन्तु सत्ता का सहज परिवर्तन सुनिश्चित करने के लिए ऑगस्टस ने उसे गोद ले लिया था।
प्रथम दो शताब्दियों में अन्य देशों के साथ युढ़ भी बहुत कम हुए। ऑगस्टस से टिबेरियस ढ्वारा प्राप्त किया गया साम्राज्य पहले ही इतना लंबा-चौड़ा था कि इसमें और अधिक विस्तार करना अनावश्यक प्रतीत होता था। वास्तव में ऑगस्टस का शासन काल शाँति के लिए याद किया जाता है, क्योंकि इस शांति का आगमन दशकों तक चले आंतरिक संघर्ष और सदियों की सैनिक विजय के पश्चात हुआ था। साम्राज्य के प्रारंभिक विस्तार में एकमात्र अभियान सम्राट त्राजान ने 113-17 ईस्वी में चलाया जिसके ढ्वारा उसने फ़रात नदी के पार के क्षेत्रों पर निरर्थक कब्जा कर लिया था; लेकिन उसके उत्तराधिकारियों ने उन इलाकों को छोड़ दिया।

रोम के फोरम जूलियम की ढुकानें। पुराने रोमन फोरम के विस्तार के लिए 51 ई. पूँ के बाद स्तम्भों वाले इस चौक (पिआज्ञा) को बनाया गया।
*गृहयुढ़ दूसरे देशों से संघर्ष के ठीक विपरीत अपने ही देश में सत्ता हासिल करने के लिए किया गया सशस्त्र संघर्ष है।
सम्राट ग्राजान का स्वज्न - भारत की विजय?
‘तत्पश्चात् भयंकर भूकंप से पीड़ित एंटिओं के बाद (115/16), 116 में त्राजान फ़रात नदी के रास्ते आगे की और बढ़ता हुआ पार्थियन की राजधानी टेसीफून तक चला गया और फिर वहाँ फ़रास की खाड़ी के सिरे पर पहुँच गया । (इतिहासकार) कैसियस डियो (Cassius Dio) के अनुसार वहाँ पर वह भारत की और जाने वाले किसी वाणिज्यिक पोत को लालायित नज़रों से देख रहा था और चाह रहा था कि काश वह सिकंदर जैसा जवान होता।’
- स्त्रोतः फरगस मिल्लर, दि रोमन नीयर ईस्ट
निकटवर्ती पूर्व रोमन साम्राज्य के भूमध्य सागरीय क्षेत्र में रहने वाले लोगों की दृष्टि से निकटवर्ती पूर्व का मतलब था भूमध्यसागर के बिलकुल पूर्व का इलाका; मुख्य रूप से सीरिया, फ़िलिस्तीन और मेसोपोटामिया के प्रांत जो रोमन साम्राज्य के हिस्से थे और मोटे तौर पर आसपास के क्षेत्र, जैसे अरब।
*ये स्थानीय राज्य थे जो रोम के ‘आश्रित’ थे। रोम को भरोसा था कि ये शासक अपनी सेनाओं का प्रयोग रोम के समर्थन में करंगे और बदले में रोम ने उनका अलग अस्तित्व स्वीकार कर लिया।
नाइम्स के पास पान दु गार्ड, फ्रांस, प्रथम सदी ई. रोम के इंजीनियरों ने तीन महाद्रीपों के पार पानी ले जाने के लिए विशाल जलसेतुओं (Aqueducts) का निर्माण किया।
इस काल की एक विशेष उपलब्धि यह रही कि रोमन साम्राज्य के प्रत्यक्ष शासन का क्रमिक रूप से काफी विस्तार हुआ। इसके लिए अनेक आश्रित राज्यों को रोम के प्रांतीय राज्य-क्षेत्र में मिला लिया गया। निकटवर्ती पूर्व ऐसे राज्यों* से भरा पड़ा था लेकिन दूसरी शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों तक जो राज्य फ़रात नदी के पश्चिम में (रोम राज्य क्षेत्र की ओर) पड़ते थे उन्हें भी रोम द्वारा हड़प लिया गया। प्रासंगिक तौर पर यह उल्लेखनीय है कि ये राज्य अत्यंत समृढ्ध थे; उदाहरण के लिए, हेरॉड के राज्य से प्रतिवर्ष 54 लाख दीनारियस (1,25,000 कि.ग्रा. सोने) के बराबर आमदनी होती थी! दीनारियस रोम का एक चॉँदी का सिक्का होता था जिसमें लगभग 4.5 ग्राम विशुढ्ध चॉँदी होती थी।
वास्तव में, इटली के सिवाय, जिसे उन शताब्दियों में प्रांत नहीं माना जाता था, साम्राज्य के सभी क्षेत्र प्रांतों में बॉटे हुए थे और उनसे कर वसूला जाता था। दूसरी शताब्दी में जब रोम अपने चरमोत्कर्ष पर था, रोमन साम्राज्य स्कॉटलैंड से आर्मेनिया की सीमाओं तक और सहारा से फ़रात और कभी-कभी उससे भी आगे तक फैला हुआ था। यह सच है कि उन दिनों शासन व्यवस्था को चलाने के लिए उनकी सहायतार्थ आज-जैसी कोई सरकार नहीं थी। तो फिर यह प्रश्न उठता है कि सम्राटों के लिए इतने लंबे-चौड़े और तरह-तरह के इलाकों पर नियंत्रण रख पाना कैसे संभव हुआ जिनकी आबादी दूसरी शताब्दी के मध्य में लगभग 6 करोड़ तक पहुँच गई थी? इस प्रश्न का उत्तर साम्राज्य के शहरीकरण में खोजा जा सकता है।
संपूर्ण साम्राज्य में दूर-दूर तक अनेक नगर स्थापित किए गए थे जिनके माध्यम से समस्त साम्राज्य पर नियंत्रण रखा जाता था। भूमध्यसागर के तटां पर स्थापित बड़े शहरी केंद्र (कार्थेज, सिकंदरिया तथा ऐंटिओंक इनमें सबसे बड़े थे) साम्राज्यिक प्रणाली के मूल आधार थे। इन्हीं शहरों के माध्यम से ‘सरकार’ प्रांतीय ग्रामीण क्षेत्रों पर कर लगाने में सफल हो पाती थी, जिनसे साम्राज्य को अधिकांश धन-संपदा प्राप्त होती थी। इसका अर्थ यह हुआ कि स्थानीय उच्च वर्ग रोमन साम्राज्य को कर वसूली और अपने क्षेत्रों के प्रशासन के कार्य में सक्रिय सहायता देते थे। इटली और अन्य प्रांतों के बीच सत्ता का आकस्मिक अंतरण वास्तव में, रोम के राजनीतिक इतिहास का एक अत्यंत रोचक पहलू रहा है। दूसरी और तीसरी शताब्दियों के दौरान, अधिकतर प्रशासक तथा सैनिक अफसर इन्हीं उच्च प्रांतीय वर्गों में से होते थे। इस प्रकार उनका एक नया संभ्रांत वर्ग बन गया जो कि सैनेट के सदस्यों की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली था क्योंकि उसे सम्राटों का समर्थन प्राप्त था। जैसे-जैसे यह नया समूह उभर कर सामने आया, सम्राट गैलीनस (253-68)

ने सैनेटरों को सैनिक कमान से हटा कर इस नए वर्ग के उद्य को सुदृढ़ बना दिया। ऐसा कहा जाता है कि गैलीनस ने सैनेटरों को सेना में सेवा करने अथवा इस तक पहुँच रखने पर पाबंदी लगा दी थी ताकि साम्राज्य का नियंत्रण उनके हाथों में न जाने पाए।
संक्षेप में, पहली शताब्दी के बाद वाले वर्षों में और दूसरी शताब्दी के दौरान तथा तीसरी शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में सेना तथा प्रशासन में अधिकाधिक लोग प्रांतों से लिए जाने लगे क्योंकि इन क्षेत्रों के लोगों को भी नागरिकता मिल चुकी थी जो पहले इटली तक ही सीमित
थी। सैनेट पर कम से कम तीसरी शताब्दी तक इतालवी मूल के लोगों का प्रभुत्व बना रहा, लेकिन बाद में प्रांतों से लिए गए सैनेटर बहुसंख्यक हो गए। इन प्रवृत्तियों से यह पता चलता है कि साम्राज्य में, राजनीतिक तथा आर्थिक दोनों ही दृष्टियों से, इटली का पतन हो चला था और भूमध्य सागर के अपेक्षाकृत अधिक समृढ्ध और शहरीकृत भागों, जैसे स्पेन के दक्षिणी हिस्सों, अफ्रीकी और पूर्वी भागों में नए संभ्रांत वगों का उद्य हो रहा था। रोम के संदर्भ में नगर एक ऐसा शहरी केंद्र था, जिसके अपने दंडनायक (मजिस्ट्रेट), नगर परिषद (सिटी काउंसिल) और अपना एक सुनिश्चित राज्य-क्षेत्र था जिसमें उसके अधिकार-क्षेत्र में आने वाले कई ग्राम शामिल थे। इस प्रकार किसी भी शहर के अधिकार-क्षेत्र में कोई दूसरा शहर नहीं हो सकता था, किन्तु उसके तहत कई गाँव लगभग हमेशा ही होते थे। आमतौर पर शाही अनुकम्पा (अथवा नाराजगी) के कारण गाँवों का दर्जा बढ़ा कर उन्हें शहरों का दर्जा और शहरों को गाँवों का दर्जा दिया जा सकता था। किसी शहर में रहने का लाभ यही था कि खाने की कमी और अकाल के दिनों में भी इसमेंग्रामीण इलाकों की तुलना में बेहतर सुविधाएँ प्राप्त होने की संभावना रहती थी।
क्रियाकलाप 1
रोमन साम्राज्य के राजनीतिक इतिहास में कौन तीन मुख्य ‘खिलाड़ी’ थे? प्रत्येक के बारे में एक-दो पंक्तियाँ लिखिए। रोमन सम्राट अपने इतने बड़े साम्राज्य पर शासन कैसे कर लेता था? इसके लिए किसका सहयोग महत्वपूर्ण था?
कई प्रांतों में लगातार कई वर्षों से पड़ रहे अकाल ने साधारण से साधारण बुद्धिवाले आदमी को भी यह बता दिया कि लोगों में कुपोषण के कारण बीमारियाँ हो रही हैं। शहर में रहने वाले लोगों का फ्रसल कटाई के शीघर बाद अगले पूरे वर्ष के लिए पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न अपने भंडारों में भर लेना एक रिवाज था। सारा गेहूँ, जौ, सेम तथा मसूर और दालों का काफी बड़ा हिस्सा शहरियों द्वारा ले जाने के बाद भी कई प्रकार की दालें किसानों के लिए बची रह गई थी। सर्दियों के लिए जो कुछ भी बचा था, उसे खा-पीकर खत्म कर देने के पश्चात् देहाती लोगों को वसंत ऋष्टु में अस्वास्थ्यकर खाद्यों पर निर्भर रहना पड़ा; उन्होंने पेड़ों की टहनियाँ, छालें, जड़े, झाडियाँ, अखाद्य पेड़-पौधे और पत्ते खाकर किसी तरह अपने प्राणों को बचाए रखा।
- गैलेन, ऑँन गुड एण्ड बैंड डाइट
सार्वजनिक स्नान-गृह रोम के शहरी-जीवन की एक खास विशेषता थी (जब एक ईरानी शासक ने ऐसे स्नान-गृहों को ईरान में शुरू करने का प्रयत्न किया तो उसे वहाँ के पुरोहित वर्ग के क्रोध का सामना करना पड़ा! जल एक पवित्र वस्तु थी और सार्वजनिक-स्नान में उन्हें, जल का अपवित्रीकरण दिखता था)। शहरी लोगों को उच्च-स्तर के मनोरंजन उपलब्ध थी। उदाहरणार्थ, एक कैलेंडर से हमें पता चलता है कि एक वर्ष में कम से कम 176 दिन वहाँ कोई-न-कोई मनोरंजक कार्यक्रम या प्रदर्शन (Spectacula) अवश्य होता था!

रोमन छावनी, बिन्दोनिसा (Vindonissa, आधुनिक स्विट्जरलॉंड में) में एक रंगशाला, प्रथम शती ईं। इसका प्रयोग सैन्य क्रवायद और सैनिकों के मनोरंजन के आयोजन हेतु किया जाता था।
तीसरी-शताब्दी का संकट
यदि पहली और दूसरी शताब्दियाँ कुल मिला कर शांति, समृद्धि तथा आर्थिक विस्तार की प्रतीक थीं, तो तीसरी शताब्दी आंतरिक तनाव के पहले बड़े संकेत लेकर सामने आई। 230 के दशक से साम्राज्य ने स्वयं को कई मोर्चों पर जूझता पाया। ईरान में, 225 ईस्वी में अपेक्षाकृत एक अधिक आक्रामक वंश उभर कर सामने आया (इस वंश के लोग स्वयं को ‘ससानी’ कहते थे) और केवल 15 वर्षों के भीतर यह तेजी से फ़रात की दिशा में फैल गया। तीन भाषाओं में खुदे एक प्रसिद्ध शिलालेख में, ईरान के शासक शापुर प्रथम ने दावा किया था कि उसने 60,000 रोमन सेना का सफ़ाया कर दिया है और रोम साम्राज्य की पूर्वी राजधानी एंटिओक पर कब्जा भी कर लिया है। इस बीच, कई जर्मन मूल की जनजातियों, अथवा राज्य समुदायों (जिनमें से प्रमुख एलमन्नाइ, फ्रैंक और गोथ थे) ने राइन तथा डैन्यूब नदी की सीमाओं की और बढ़ना शुरू कर दिया; और 233 से 280 तक की समूची अवधि में उन प्रांतों की पूरी सीमा पर बार-बार आक्रमण हुए जो काला सागर से लेकर आल्पस और दक्षिणी जर्मनी तक फैले हुए थे। रोमवासियों को डैन्यूब से आगे का क्षेत्र छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा, जबकि इस काल के सम्राट उन लोगों के विरुद्ध लगातार युद्ध करते रहे, जिन्हें रोमवासी ‘विदेशी बर्बर’ (Barbarian) कहा करते थे। तीसरी शताब्दी में थोड़े-थोड़े अंतर से अनेक सम्राट (47 वर्षों में 25 सम्राट) सत्तासीन हुए जो इस तथ्य का स्पष्ट सूचक है कि इस अवधि में साम्राज्य को बेहद तनाव की स्थिति से गुज़रना पड़ा।
लिंग, साक्षरता, संस्कृति
रोमन समाज की अपेक्षाकृत अधिक आधुनिक विशेषताओं में से एक विशेषता यह थी कि उन दिनों ‘एकल’ परिवार (Nuclear family) का व्यापक रूप से चलन था। वयस्क पुत्र अपने पिता के परिवारों के साथ नहीं रहते थे और वयस्क भाई बहुत कम साझे परिवार में रहते थे। दूसरी ओर, दासों को परिवार में सम्मिलित किया जाता था क्योंकि रोमवासियों के लिए परिवार की यही अवधारणा थी। सामान्यतः गणतंत्र के परवर्तीकाल (प्रथम शती ई. पू.) तक विवाह का रूप ऐसा था कि पत्नी अपने पति को अपनी संपत्ति हस्तांतरित नहीं किया करती थी किंतु अपने पैतृक परिवार में बह अपने पूरे अधिकार बनाए रखती थी। महिला का दहेज वैवाहिक अवधि के दौरान उसके पति के पास चला जाता था, किन्तु महिला अपने पिता की मुख्य उत्तराधिकारी बनी रहती थी और अपने पिता की मृत्यु होने पर उसकी संपत्ति की स्वतंत्र मालिक बन जाती थी। इस प्रकार, रोम की महिलाओं को संपत्ति के स्वामित्व व संचालन में व्यापक कानूनी अधिकार प्राप्त थे। दूसरे शब्दों में, कानून के अनुसार पति–पत्नी को संयुक्त रूप से एक वित्तीय हस्ती नहीं बल्कि अलग–अलग दो वित्तीय हस्तियाँ माना जाता था और पत्नी को पूर्ण वैधिक स्वतंत्रता प्राप्त थी। तलाक देना अपेक्षाकृत आसान था और इसके लिए पति अथवा पत्नी ढ्वारा केवल विवाह–भंग करने के इरादे की सूचना देना ही काफी था। दूसरी और, पुरुष 28–29, 30–32 की आयु में विवाह करते थे, जबकि लड़कियों की शादी 16–18 व 22–23 साल की आयु में की जाती थी। इसलिए पति और पत्नी के बीच आयु का अंतराल बना रहता था। इससे असमानता को कुछ बढ़ावा मिला होगा। विवाह आम–तौर पर परिवार ढ्वारा नियोजित होते थे और इसमें कोई संदेह नहीं कि महिलाओं पर उनके पति अक्सर हावी रहते थे। महान कैथोलिक बिशप ऑगस्टीन* जिन्होंने अपना अधिकांश जीवन उत्तरी अफ्रीका में बिताया था, ने लिखा है कि उनकी माता की उनके पिता ढ्वारा नियमित रूप से पिटाई की जाती थी और जिस छोटे से नगर में वे बड़े हुए वहाँ की अधिकतर पत्नियाँँ इसी तरह की पिटाई से अपने शरीर पर लगी खरोंचें दिखाती रहती थीं! अंततः, पिताओं का अपने बच्चों पर अत्यधिक कानूनी नियंत्रण होता था-कभी-कभी तो दिल दहलाने वाली सीमा तक; 牉दाहरणार्थ, अवाँछित बच्चों के मामले
*सेंट ऑगस्टीन (354-430) 396 से उत्तरी अफ्रीका के हिप्पो नामक नगर के बिशप थे। चर्च के बौढ़िक इतिहास में उनका उच्चतम स्थान था। बिशप लोग ईंसाई समुदाय में अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्ति माने जाते थे और अक्सर वे बहुत शक्तिशाली होते थे।
में उन्हें जिंदा रखने या मार डालने तक का कानूनी अधिकार प्राप्त था। ऐसी जानकारी मिलती है कि कभी-कभी पिता शिशुओं को मारने के लिए उन्हें ठंड में छोड़ देते थे।
साक्षरता की स्थिति क्या थी? यह निश्चित है कि कामचलाऊ साक्षरता* की दरें साम्राज्य के विभिन्न भागों में काफी अलग-अलग थी। उदाहरणार्थ, पोम्पेई नगर में, जो 79 ईस्वी में ज्वालामुखी फटने से दफ्रन हो गया था, इस बात का ठोस प्रमाण मिलता है कि वहाँ कामचलाऊ साक्षरता व्यापक रूप में विद्धमान थी। पोम्पेई की मुख्य गलियों की दीवारों पर अंकित विज्ञापन और समूचे शहर में अभिरेखण (Graffiti) पाए गए हैं।
इसके विपरीत, मिस्त्र में आज भी सैकड़ों ‘पैपाइरस’ बचे हुए हैं जिन पर अत्यधिक औपचारिक-दस्तावेज्ज, जैसे कि संविदा-पत्र आदि लिखे हुए हैं। ये दस्तावेज्ज आमतौर पर व्यावसायिक लिपिकों द्वारा लिखे जाते थे। ये दस्तावेज्ज अक्सर हमें यह बताते हैं कि अमुक व्यक्ति ‘क’ अथवा ‘ख’ पढ़ या लिख नहीं सकता। किन्तु यहाँ भी साक्षरता निश्चित रूप से कुछ वर्गों के लोगों में अपेक्षाकृत अधिक व्यापक थी, जैसे कि सैनिकों, फौजी अफ्रसरों और सम्पदा-प्रबंधकों में।
रोमन साम्राज्य में सांस्कृतिक विविधता कई रूपों एवं स्तरों पर दिखाई देती है, जैसे, धार्मिक सम्प्रदायों तथा स्थानीय देवी-देवताओं की भरपूर विविधता; बोलचाल की अनेक भाषाएँ;
वेशभूषा की विविध शैलियाँ; तरह-तरह के भोजन; सामाजिक संगठनों के रूप (जनजातीय और अन्य); यहाँँ तक कि उनकी बस्तियों के अनेक रूप। अरामाइक निकटवर्ती पूर्व (कम से कम फ्रात के पश्चिम में) का प्रमुख भाषा-समूह था, मिस्त में कॉप्टिक, उत्तरी अफ्रीका में प्यूनिक तथा बरबर (Berber) और स्पेन तथा उत्तर-पश्चिमी में कैल्लिक भाषा बोली जाती थी। परन्तु इनमें बहुत सी भाषाई संस्कृतियाँ पूर्णत: मौखिक थीं, वे कम से कम तब तक मौखिक रहीं जब तक उनके लिए एक लिपि का आविष्कार नहीं किया गया। उदाहरणार्थ, अर्मिनियाई भाषा का लिखना भी

*पढ़ने और लिखने का दैनिक प्रयोग, प्राय: छोटे-मोटे संदभों में।
इनमें से एक सर्वाधिक मज्ञाकिया विज्ञापन जो पोम्पई की दीवार पर लगा है, कहता है : दीवार, तुम धन्य हो, अपने ऊपर इतनी उबाऊ लिखावट का बोझ़ ढोते हुए भी तुम बरकरार खड़ी हो, भरभराकर गिरी नहीं।

एडेसा में पच्चीकारी (दूसरी शती ई.)। सीरिया के इस अभिलेख से पता चलता है कि यहाँ जो लोग दिखाए गए हैं वे राजा अबगर की पत्नी तथा परिवार के सदस्य हैं।
पोम्पईः एक मदिरा व्यापारी का भोजन कक्ष। कमरे की दीवारों पर मिथक पशु बनाए गए हैं।
क्रियाकलाप 2
रोमन साम्राज्य में स्त्रियाँ कहाँ तक आत्मनिर्भर थीं? रोमन-परिवार की स्थिति की तुलना आज के भारतीय-परिवार की स्थिति से करो।
फ्रांस के दक्षिणी तट के पास पोतभंग (पहली शती ई.)। ये एम्फोरा इतालवी हैं जिन पर फोंडी झील के निकट के उत्पादक की मुहर लगी हुई है।
बहुत देर बाद पाँचवीं शताब्दी में शुरू हुआ, हालांकि तीसरी शताब्दी के मध्य तक बाइबिल का कॉष्टिक भाषा में अनुवाद हो चुका था। कई स्थानों पर, लातिनी भाषा के प्रसार ने उन भाषाओं के लिखित रूप का स्थान ग्रहण कर लिया जिनका पहले से ही व्यापक प्रसार था। ऐसा विशेष रूप से केल्टिक भाषा के साथ हुआ जिसका लिखा जाना प्रथम शताब्दी के पश्चात बंद ही हो गया।
आर्थिक विस्तार
साम्राज्य में बंदरगाहों, खानों, खदानों, ईट-भटुरों, जैतून के तेल की फैक्टरियों आदि की संख्या काफी अधिक थी, जिनसे उसका आर्थिक आधारभूत ढाँँचा काफी मज्तबूत था। गेहैं, अंगूरी शराब तथा जैतून का तेल मुख्य व्यापारिक मदें थीं जिनका अधिक मात्रा में उपयोग होता था और ये मुख्यतः स्पेन, गैलिक प्रांतों, उत्तरी अफ्रीका, मिस्त्र तथा अपेक्षाकृत कम मात्रा में इटली से आती थीं, जहाँ इन फसलों के लिए सर्वोत्तम स्थितियाँ उपलब्ध थीं। शराब, जैतून का तेल तथा अन्य तरल पदार्थों की ढुलाई ऐसे मटकों या कंटेनरों में होती थी जिन्हें “एम्फ्रोरा (Amphora) कहते थे। इन मटकों के टूटे हुए टुकड़े बहुत बड़ी संख्या में अभी भी मौजूद हैं। (उल्लेखनीय है कि रोम में मोंटी टेस्टैकियो (Monte Testaccio) स्थल पर ऐसे 5 करोड़ से अधिक मटकों के अवशेष पाए गए हैं!) पुरातत्वविद इन टुकड़ों को ठीक से जोड़कर इन कंटेनरों को फिर से सही रूप देने और यह पता लगाने में सफल हुए हैं कि उनमें क्या-क्या ले जाया जाता था। इसके

अलावा, प्राप्त वस्तुओं की मिट्री का भूमध्य सागरीय क्षेत्रों में उपलब्ध चिकनी मिट्री के नमूनों के साथ मिलान करके पुरातत्वविज्ञानी हमें उनके निर्माण स्थल के बारे में जानकारी देने में सफल हुए हैं। इस प्रकार, हम अब कुछ विश्वास के साथ, एक उदाहरण के रूप में कह सकते हैं कि स्पेन में जैतून का तेल निकालने का उद्यम 140-160 ईस्वी के वर्षों में अपने चरमोत्कर्ष पर था। उन दिनों स्पेन में उत्पादित जैतून का तेल मुख्य रूप से ऐसे कंटेनरों में ले जाया जाता था जिन्हें 'ड़ेसल-20' कहते थे। इसका यह नाम हैनरिक ड़ेसल नामक पुरातत्वविद के नाम पर आधारित है जिसने इस किस्म के कंटेनरों का रूप सुनिश्चित किया था। ड़ेसल-20 नामक कंटेनरों के अवशेष भूमध्यसागरीय क्षेत्र में अनेक उत्खनन-स्थलों पर पाए गए हैं जिससे ऐसा प्रतीत होता हैं कि स्पेन के जैतून के तेल का व्यापक प्रसार था। ऐसे साक्ष्य (भिन्न-भिन्न प्रकार के एम्फ्रोरा पात्रों के अवशेषों और उनके
मिलने के स्थानों) के बल पर पुरातत्वविद यह बता सके हैं कि स्पेन के जैतून के तेल के उत्पादक अपने इतालवी प्रतिद्धिद्यियों से तेल का बाजार छीनने में सफल हुए। ऐसा तभी संभव हुआ होगा जब स्पेन के उत्पादकों ने अपेक्षाकृत कम कीमतों पर बेहतर गुणवत्ता वाला तेल बेचा होगा। दूसरे शब्दों में, भिन्न-भिन्न प्रदेशों के ज़मींदार एवं उत्पादक अलग-अलग वस्तुओं का बाजार हथियाने के लिए आपस में प्रतिस्पर्थी करते रहते थे। बाद में उत्तरी अफ्रीका के उत्पादकों ने स्पेन के जैतून के तेल के उत्पादकों जैसा महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया और तीसरी तथा चौथी शताब्दियों के अधिकांश भाग में इनका उस क्षेत्र में बोलबाला रहा। फिर 425 ईस्वी के बाद पूर्व ने उत्तरी अफ्रीका के प्रभुत्व को तोड़ दियाः परिवर्ती पाँँचवीं शताब्दी और छठी शताब्दी में एगियन, दक्षिणी एशिया-माइनर (तुर्की), सीरिया और फ्रिलिस्तीनी व्यापारी अंगूरी शराब तथा जैतून-तेल के प्रमुख निर्यातक बन गए जबकि भूमध्यसागर के बाजारों में अफ्रीका से आने वाले कंटेनरों में अचानक कमी हो गई। इन प्रमुख गतिविधियों के साथ-साथ अलग-अलग प्रदेशों की समृद्धि उनकी वस्तुओं की गुणवत्ता और उनके उत्पादन तथा परिवहन की क्षमता के अनुसार अधिक या कम होती गई।
साम्राज्य के अंतर्गत ऐसे बहुत से क्षेत्र आते थे जो अपनी असाधारण उर्वरता के कारण बहुत प्रसिद्ध थे; जैसे – इटली में कैम्पैनिया, सिसिली, मिस्त्र में फैय्यूम, गैलिली, बाइजैकियम (ट्यूनीसिया), दक्षिणी गॉल (जिसे गैलिया नार्बोर्नोंसिस कहते थे) तथा बाएटिका (दक्षिणी स्पेन)। स्ट्रैबो तथा प्लिनी जैसे लेखकों के अनुसार ये सभी प्रदेश साम्राज्य के चनी आबादी वाले और सबसे धनी भागों में से कुछ थे। सबसे बढ़िया किस्म की अंगूरी शराब कैम्पैनिया से आती थी। सिसिली और बाइजैकियम रोम को भारी मात्रा में गेहुँ का निर्यात करते थे। गैलिली में गहन खेती की जाती थी (“इतिहासकार जोसिफ्रस ने लिखा है : प्रदेशवासियों ने ज़मीन के एक-एक इंच टुकड़े पर खेती कर रखी है”) और स्पेन का जैतून का तेल स्पेन के दक्षिण में गुआडलक्विविर नदी के किनारों के साथ-साथ बसी अनेक जमींदारियों (फंडी) से आता था।
दूसरी ओर, रोम क्षेत्र के अनेक बड़े-बड़े हिस्से बहुत कम उन्नत अवस्था में थे। उदाहरणार्थ, नुमीडिया (आधुनिक अल्ल्जीरिया) के देहाती क्षेत्रों में ऋष्टु-प्रवास* (Transhumance) व्यापक पैमाने पर होता था। चरवाहे तथा अर्ध-यायावर अपने साथ में अवन (oven) आकार की झौपड़ियाँ (जिन्हें मैपालिया कहते थे) उठाए इधर-उधर घूमते-फिरते रहते थे। लेकिन जब उत्तरी-अफ्रीका में रोमन जागीरों का विस्तार हुआ तो वहाँं चरागाहों की संख्या में भारी कमी आई और खानाबदोश चरवाहों की आवाजाही पहले से अधिक निर्यांत्रित हो गई। स्पेन में भी, उत्तरी क्षेत्र बहुत कम विकसित था और इसमें अधिकतर केल्टिक-भाणी किसानों की आबादी थी, जो पहाड़ियों की चोटियों पर बसे गाँवों में रहते थे। इन गाँवों को कैस्टेला (Castella) कहा जाता था। जब हम, रोम साम्राज्य के बारे में सोचने-समझने का प्रयास करें तो हमें इन असमानताओं को कभी नहीं भूलना चाहिए।
हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हम यह न मान बैठें कि यह एक ‘प्राचीन’ दुनिया थी, इसलिए उस समय के लोगों का सांस्कृतिक तथा आर्थिक जीवन आदिम या पिछड़ा हुआ था। लेकिन स्थिति इसके कुछ विपरीत थी। भूमध्यसागर के आसपास पानी की शक्ति का तरह-तरह से इस्तेमाल किया जाता था। इस काल में जल-शक्ति से मिलें चलाने की प्रौद्योगिकी में खासी प्रगति हुई। स्पेन की सोने और चाँँदी की खानों में जल-शक्ति से खुदाई की जाती थी और पहली तथा दूसरी शताब्दियों में बड़े भारी औंद्योगिक पैमाने पर इन खानों से खनिज निकाले जाते थे। उस समय उत्पादकता का स्तर इतना ऊँचा था कि उन्नीसवीं शताब्दी तक यानी कि लगभग 1700 वर्ष बाद भी ऐसे उत्पादन के स्तर देखने को नहीं मिलते। उस समय सुगठित वाणिज्यिक और
क्रियाकलाप 3
मिट्री के बर्तनों के अवशेषों पर काम करने वाले पुरातत्वविद बहुत-कुछ जासूमों की तरह होते हैं क्यो? स्पष्ट करो। एम्फ़ोरा हमें रोम काल के भूमध्यसागरीय क्षेत्र के आर्थिक जनजीवन के बारे में क्या बताते हैं?
*त्रहतु-प्रवास से तात्पर्य है ऊँचे पहाड़ी क्षेत्रों और नीचे के मैदानी इलाकों में भेड़-बकरियों तथा अन्य जानवरों को चराने के लिए चरागाहों की खोज में ग्वालों तथा चरवाहों का मौसम के अनुसार वार्षिक आवागमन।
बैंकिंग-व्यवस्था थी और धन का व्यापक रूप से प्रयोग होता था। इन सभी बातों से यह संकेत मिलता है कि हममें रोम की समुन्नत अर्थव्यवस्था को कम ऑँकने की प्रवृत्ति कितनी अधिक है। अब दास-प्रथा और श्रम-संबंधी मुद्दों पर भी विचार कर लेना प्रासंगिक होगा।
दासों के प्रति व्यवहार
कुछ ही समय बाद शहर के शासक ल्यूसियस पेडेनियस सेकंडस का उसके एक दास ने कल्ल कर दिया। कल्ल के पश्चात, पुराने रिवाज के अनुसार यह आवश्यक था कि एक ही छत के नीचे रहने वाले प्रत्येक दास को फॉसी दे दी जाए। परन्तु बहुत से निर्दोष लोगों को बचाने के लिए भीड़ एकत्र हो गई और दंगे शुरू हो गए। सैनेट भवन को घेर लिया गया हालांकि सैनेट भवन में अत्यधिक कठोरता का विरोध किया जा रहा था। परंतु अधिकांश सदस्यों ने परिवर्तन किए जाने का विरोध किया। जो सैनेटर फॉसी देने के पक्ष में थे, उनकी बात मानी गई। परन्तु पत्थर और जलती हुई मशालें लिए भारी भीड़ ने इस आदेश को कार्यान्वित किए जाने से रोका। नीरो ने अभिलेख द्वारा इन लोगों को फटकार लगाई, उन सारे मार्गों पर सेना लगा दी गई जहाँ सैनिकों के साथ दोषियों को फॉसी पर चढ़ाने के लिए ले जाया जा रहा था।
- टैसिटस (55-117), आरंभिक साम्भाज्य का इतिहासकार।
श्रमिकों पर नियंत्रण
भूमध्यसागर और निकटवर्ती पूर्व (पश्चिमी एशिया) दोनों ही क्षेत्रों में दासता की जड़े बहुत गहरी थीं और चौथी शताब्दी में ईसाई धर्म ने राज्य-धर्म बनने के बाद भी इस गुलामी की प्रथा को कोई गंभीर चुनौती नहीं दी। इसका अर्थ यह नहीं है कि रोम की अर्थव्यवस्था में अधिकांश श्रम, दासों द्वारा ही किया जाता था। तथापि यह बात गणतंत्रीय काल में इटली के मामले में सही हो सकती है। (जहाँ ऑगस्टस के शासनकाल में इटली की कुल 75 लाख की आबादी में 30 लाख दास थे), किन्तु समग्रा साग्राज्य में ऐसी स्थिति नहीं थी। उन दिनों दासों को पृँजी-निवेश की दृष्टि से देखा जाता था। कम से कम रोम के एक लेखक ने तो जृमींदारों को ऐसे संदर्भों में उन गुलामों का इस्तेमाल न करने की सलाह दी, जहाँ फृसल की कटाई के लिए उनकी बहुत बड़ी संख्या में आवश्यकता हो अथवा जहाँ स्वास्थ्य को, मलेरिया जैसी बीमारियों से नुकसान पहुँच सकता हो। ऐसे विचार दासों के प्रति सहानुभृति पर नहीं बल्कि हिसाब-किताब पर आधारित थे। एक ओर जहाँ उच्च वर्ग के लोग दासों के प्रति प्रायः कृूरतापूर्ण व्यवहार करते थे, वहीं दूसरी ओर साधारण लोग उनके प्रति कहीं अधिक सहानुभृति रख सकते थे। नीरो के शासन काल में घटी एक प्रसिझ्ट्र घटना के बारे में देखिए एक इतिहासकार क्या कहता है (हाशिये पर बॉक्स में)।
जब पहली शताब्दी में शांति स्थापित होने के साथ लड़ाई झगड़े कम हो गए तो दासों की आपूर्ति में कमी आने लगी और दास-श्रम का प्रयोग करने वालों को दास प्रजनन* (Slave Breeding) अथवा वेतनभोगी मज्जदूरों जैसे विकल्पों का सहारा लेना पड़ा। वेतनभोगी मज्जदूर सस्ते तो
*दास प्रजनन गुलामों की संख्या बढ़ाने की एक ऐसी प्रथा थी जिसके अंतर्गत दासियों और उनके साथ मर्दों को अधिकाधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था; उनके बच्चे भी आगे चलकर दास ही बनते थे।
सामने के पृष्ठ परः आरांभिक तीसरी शती ईं. चर्चल, अल्जीरिया की पच्चीकारी। यहाँ कृषि के दुश्य: ऊपर- बीज बोना व हल चलाना। नीचे- अंगूर के बागानों में काम करना।
पड़ते ही थे, उन्हें आसानी से छोड़ा और रखा जा सकता था। वास्तव में, रोम में सरकारी निर्माण-कार्यों पर, स्पष्ट रूप से मुक्त श्रमिकों का व्यापक प्रयोग किया जाता था क्योंकि दास-श्रम का बहुतायत प्रयोग बहुत माँहगा पड़ता था। भाड़े के मजृदूरों के विपरीत, गुलाम श्रमिकों को वर्ष भर रखने के लिए भोजन देना पड़ता था और उनके अन्य खर्चे भी उठाने पड़ते थे, जिससे इन गुलाम श्रमिकों को रखने की लागत बढ़ जाती थी। इसीलिए संभवतः बाद की अवधि में कृषि-क्षेत्र में अधिक संख्या में गुलाम मजृदूर नहीं रहे, कम-से-कम पूर्वी प्रदेशों में तो ऐसा ही हुआ। दूसरी ओर, इन दासों और मुक्त व्यक्तियों (अर्थात ऐसे दास जिन्हें उनके मालिकों ने मुक्त कर दिया था) को व्यापार-प्रबंधकों के रूप में व्यापक रूप से नियुक्त किया जाने लगा, यहाँ स्पष्टतः उनकी अधिक संख्या में आवश्यकता नहीं थी। मालिक अक्सर अपने गुलामों अथवा मुक्त हुए गुलामों को अपनी ओर से व्यापार चलाने के लिए पूँजी यहाँँ तक कि पूरा का पूरा कारोबार सौप देते थे।
रोमन कृषि-विषयक लेखकों ने श्रम-प्रबंधन की ओर बहुत ध्यान दिया। दक्षिणी स्पेन से आए, पहली शताब्दी के लेखक, कोलूमेल्ला (Columella) ने सिफ्फारिश की थी कि ज़मींदारों को अपनी ज़रूरत से दुगुनी संख्या में उपकरणों तथा औज्ञारों का सुरक्षित भंडार रखना चाहिए ताकि उत्पादन लगातार होता रहे, ‘क्योंकि दास संबंधी श्रम-समय की हानि ऐसी मदों की लागत से अधिक बैठती है।' नियोक्ताओं की यह आम धारणा थी कि निरीक्षण यानी देखभाल के बिना कभी भी कोई काम ठीक से नहीं करवाया जा सकता। इसलिए मुक्त तथा दास, दोनों प्रकार के श्रमिकों के लिए निरीक्षण सबसे महत्वपूर्ण पहलू था। निरीक्षण को सरल बनाने के लिए, कामगारों को कभी-कभी छोटे दलों में विभाजित कर दिया जाता था। कोलूमेल्ला ने दस-दस श्रमिकों के समूह बनाने की सिफ्फारिश की थी और यह दावा किया कि इन छोटे समूहों में यह बताना अपेक्षाकृत आसान होता है कि उनमें से कौन काम कर रहा है और कौन कामचोरी। इससे पता चलता है कि उन दिनों श्रम-प्रबंधन पर विस्तार से विचार किया जाता था। वरिष्ठ प्लिनी एक प्रसिझ्ड प्रकृति विज्ञान के लेखक ने दास समूहों के प्रयोग की यह कहकर निंदा की कि यह उत्पादन आयोजित करने का सबसे खराब तरीका है क्योंकि इस प्रकार अलग-अलग समूह में काम करने वाले दासों को आमतौर पर पैरों में जंजीर डालकर एक-साथ रखा जाता था।
एसे तरीके कठोर और कूर प्रतीत होते हैं, लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि आज विश्व में अधिकांश फैक्ट्रियाँ श्रम नियंत्रण के कुछ ऐसे ही सिद्धांत लागू करती हैं। वास्तव में, रोमन साम्राज्य में कृछ औद्योगिक प्रतिष्ठानों ने तो इससे भी अधि

क कड़े नियंत्रण लागू कर रखे थे। बरिष्ठ प्लिनी ने सिकंदरिया की फ्रैंकिन्सेंस* (Frankincense) यानी सुगांधित राल (Resin) की फैक्ट्रियों के हालात का वर्णन किया है, जहाँ उनके अनुसार कितना ही कड़ा निरीक्षण रखो, पर्याप्त प्रतीत नहीं होता था: “कामगारों के ऐप्रनों पर एक सील लगा दी जाती है, उन्हें अपने सिर पर एक गहरी जाली वाला मास्क या नेट पहनना पड़ता है और उन्हें फैक्ट्री से बाहर जाने के लिए अपने सभी कपड़े उतारने पड़ते है।” कृषि श्रमिक अवश्य ही थके-थके से रहते होंगे और उन्हें नापसंद किया जाता होगा क्योंकि तीसरी शताब्दी के एक राज्यादेश में मिस्न के किसानों द्वारा अपने गाँव छोड़कर जाने का उल्लेख है जिसमें यह कहा गया है कि वे इसलिए गाँव छोड़कर जा रहे थे ताकि उन्हें खेती के काम में न लगना पड़े। संभवतः: यही बात अधिकांश Fैक्ट्रियों और कारखानों पर लागू होती थी। 398 के एक कानून में यह कहा गया है कि कामगारों को दागा जाता था ताकि यदि वे भागने और छिपने का प्रयत्न करें तो उन्हें पहचाना जा सके। कई निजी मालिक कामगारों के साथ ऋण-सविदा के रूप में करार कर लेते थे ताकि वे यह दावा कर सकें कि उनके कर्मचारी उनके कर्जंदार हैं, और इस प्रकार वे अपने कामगारों पर कड़ा नियंत्रण रखते थे। दूसरी शताब्दी की प्रारंभिक अवधि का एक लेखक हमें बताता है: “हज्ञारों श्रमिक गुलामी में काम करने के लिए आत्मसमर्षण करते हैं, हालांकि वे मुक्त है।” दूसरे शब्दों में, बहुत-से गरीब परिवारों ने तो जीवित रहने के लिए ही ऋणबढ़ता स्वीकार कर ली थी। हाल ही में खोजे गए ऑगस्टीन के पत्रों में से एक पत्र से हमें यह जानकारी मिलती है कि कभी-कभी माता-पिता अपने बच्चों को 25 वर्ष के लिए बेच कर बंधुआ मज्ञदूर बना देते थे। ऑगस्टीन ने एक बार अपने एक्रवकील मित्र से पूछा कि पिता की मृत्यु हो जाने पर क्या
*फैंकिन्सेंस- एक यूरोपीय नाम जो वास्तव में सुगंधित राल है। इसका प्रयोग धृप-अगरबत्ती और इत्र बनाने कै लिए किया जाता था। इसे बोसवेलिया के पेड्ड से प्राप्त किया जाता था। इस पेड्ड के तने में बडा छेद कर इसंके रस को बहने दिया जाता था और रस सूखने पर राल प्राप्त किया जाता था। फैंकिन्सेंस की सबसे उत्कृष्ट किस्म की राल अरब प्रायद्वीप से आती थी।
*यह विद्रोह जूडेया (Judaea) में रोम शासन के विरुद्ध हुआ था जिसे रोमवासियों ने ‘यहूदी-युद्ध’ कही जाने वाली लड़ाई में क्रूरतापूर्वक दबा दिया था।
क्रियाकलाप 4
इस अध्याय में तीन ऐसे लेखकों का उल्लेख किया गया है जिनकी रचनाओं का प्रयोग यह बताने के लिए किया गया है कि रोम के लोग अपने कामगारों के साथ कैसा बर्ताव करते थे। क्या आप उनके नाम बता सकते हैं? उस अनुभाग को स्वयं फिर से पढ़िए और उन दो तरीकों का वर्णन कीजिए जिनकी सहायता से रोम के लोग अपने श्रभिकों पर नियंत्रण रखते थे।
**अश्वारोही (इक्वाइट्स) या नाइट वर्ग परंपरागत रूप से दूसरा सबसे अधिक शक्तिशाली और धनवान समूह था। मूल रूप से वे ऐसे परिवार थे जिनकी संपत्ति उन्हें घुड़सेना में भर्ती होने की ऑपचारिक योग्यता प्रदान करती थी; इसीलिए इन्हें इक्वाइट्स कहा जाता था। सैनेटरों की तरह अधिकतर नाइट ज़मींदार होते थे लेकिन सैनेटरों के विपरीत उनमें से कई लोग जहाजों के मालिक, व्यापारी और साहूकार (बैंकर) भी होते थे, यानी वे व्यापारिक क्रियाकलापों में संलग्न रहते थे।
इन बच्चों को आज्ञाद किया जा सकता था। ग्रामीण ऋष्ट-ग्रस्तता और भी अधिक व्यापक थी। इस कर्जदारी का एक उदाहरण इस घटना से मिलता है कि 66 ईस्वी के जबरदस्त यहूदी विद्रोह* में क्रांतिकारियों ने जनता का समर्थन प्राप्त करने के लिए साहूकारों के ऋष्टणपत्र (बांड) नष्ट कर डाले।
फिर भी, हमें इस संबंध में सही स्थिति समझने के लिए पर्याप्त सावधानी बरतनी चाहिए और सीधे इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच जाना चाहिए कि अधिकतर श्रमिकों पर इन तरीकों से द्बाव डाला जाता था। पाँचवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में सम्नाट ऐनस्टैसियस ने ऊँची मजदूरियाँ देकर और समूचे पूर्वी क्षेत्र से श्रमिकों को आकर्षित करके तीन सप्ताह से भी कम समय में पूर्वी सीमांत क्षेत्र में दारा शहर का निर्माण किया था। कुछ दस्तावेज्ञों (‘पैपाइरी’ पैपाइरस का बहुवचन) से हम यह अनुमान भी लगा सकते हैं कि छठी शताब्दी तक भूमध्यसागरीय क्षेत्र में, विशेषकर पूर्वी भाग में, वेतनभोगी श्रमिक कितने अधिक फैल गए थे।
सामाजिक श्रेणियाँ
आइए अब हम और अधिक ब्योरे न देकर साम्राज्य की सामाजिक संरचनाओं की जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करें। इतिहासकार टैसिटस ने प्रारंभिक साम्राज्य के प्रमुख सामाजिक समूहों का वर्णन इस प्रकार किया हैः सैनेटर ( पैट्टेस, शाब्दिक अर्थः पिता); अशवारोही* वर्ग के प्रमुख सदस्य; जनता का सम्माननीय वर्ग, जिनका संबंध महान घरानों से था; फूहड़ निम्नतर वर्ग यानी कमीनकारू (प्लेब्स सोर्डिंडा), जो उनके अनुसार, सर्कस और थिएटर तमाशे देखने के आदी थे; और अंततः दास। तीसरी शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में सैनेट की सदस्य संख्या लगभग 1,000 थी और कुल सैनेटरों में लगभग आधे सैनेटर अभी भी इतालवी परिवारों के थे। साम्राज्य के परवर्ती काल में, जो चौथी शताब्दी के प्रारंभिक भाग में कॉन्स्टैनटाइन प्रथम के शासन काल से आरंभ हुआ, टैसिटस द्वारा उल्लिखित पहले दो समूह ( सैनेटर और नाइट या अशवारोही** ) एकीकृत होकर एक विस्तृत अभिजात वर्ग (Aristocracy) बन चुके थे। और इनके कुल परिवारों में से कम से कम आधे परिवार अफ्रीकी अथवा पूर्वी मूल के थे। यह “‘परवर्ती रोमन’” अभिजात वर्ग अत्यधिक धनवान था किन्तु कई तरीकों से यह विशुढ़ सैनिक संभ्रांत वर्ग से कम शक्तिशाली था, जिनकी पृष्ठभूमि अधिकतर अभिजात वर्गयि नहीं थी। ‘मध्यम’ वर्गों में अब नौकरशाही और सेना की सेवा से जुड़े आम लोग शामिल थे, किन्तु इसमें अपेक्षाकृत अधिक समूढ़ सौदागर और किसान भी शामिल थे जिनमें बहुत-से लोग पूर्वी प्रांतों के निवासी थे। टैसिटस ने इस सम्माननीय मध्यम वर्ग का महान सीनेट गृहों के आश्रितों (clients) के रूप में वर्णन किया है। मुख्य रूप से सरकारी सेवा और राज्य पर निर्भरता ही इन मध्यम वर्गयि परिवारों का भरण-पोषण करती थी। उनसे नीचे भारी संख्या में निम्नतर वर्गों का एक विशाल समूह था, जिन्हें सामूहिक रूप से हुमिलिओरिसि यानी “‘निम्नतर वर्ग’” कहा जाता था। इनमें प्रामीण श्रमिक शामिल थे जिनमें बहुत से लोग स्थायी रूप से बड़ी जागीर में नियोजित थे; औद्योगिक और खनन प्रतिष्ठानों के कामगार; प्रवासी कामगार जो अनाज तथा जैतून की फ्रसल कटाई और निर्माण उद्योग के लिए अधिकांश श्रम की पूर्ति करते थे; स्व-नियोजित शिल्पकार जो, ऐसा बताया जाता था, कि मज़दूरी पाने वाले श्रमिकों की तुलना में बेहतर खाते-पीते थे; बहुत बड़ी संख्या में कभी-कभी काम करने वाले श्रमिक, विशेषकर बड़े शहरों में, और वस्तुतः हज्ञारों गुलाम जो विशेष रूप से पूरे पश्चिमी साम्राज्य में पाए जाते थे।
पाँचवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल के एक इतिहासकार ओलिंपिओडोरस (Olympiodorus) ने, जो एक राजदूत भी था, लिखा है कि रोम नगर में रहने वाले कुलीन परिवारों को उनकी संपद्धाओं से वार्षिक आय 4000 पाउंड सोने के बराबर होती थी; इसमें वह उपज शामिल नहीं थी जिसका उपभोग वे सीधे कर लेते थे!
परवर्ती साम्राज्य में प्रथम तीन शताब्दियों से प्रचलित चाँँदी-आधारित मौद्रिक प्रणाली समाप्त हो गई क्योंकि स्पेन को खानों से चाँँदी मिलनी बंद हो गयी थी और सरकार के पास चाँँदी की मुद्रा के प्रचलन के लिए पर्याप्त चाँँदी नहीं रह गई थी। कांस्टैनटाइन ने सोने पर आधारित नयी मौद्रिक-प्रणाली स्थापित की और परवर्ती समूचे पुराकाल में इन मुद्राओं का भारी मात्रा में प्रचलन रहा।
रोम साम्राज्य के परवर्ती काल में, बहाँ की नौकरशाही के उच्च तथा मध्य वर्ग अपेक्षाकृत बहुत धनी थे क्योंकि उन्हें अपना वेतन सोने के रूप में मिलता था और वे अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा ज़मीन जैसी परिसंपत्तियाँ खरीदने में लगाते थे। इसके अतिरिक्त साम्राज्य में भ्रष्टाचार बहुत फैला हुआ था, विशेष रूप से न्याय-प्रणाली और सैन्य आपूर्तियों के प्रशासन में। उच्च अधिकारी और गवर्नर लूट-खसोट और लालच के लिए कुख्यात हो गए। लेकिन सरकार ने इस प्रकार के भ्रष्टाचारों को रोकने के लिए बारम्बार हस्तक्षेप किया। इस संबंध में हमें पता ही इसलिए चलता है कि सरकार द्वारा अनेक कानून बनाए गए; साथ ही इतिहासविदों तथा अन्य बुढ़िजीवियों ने ऐसे भ्रष्ट कारनामों की खुलकर निंदा की। आलोचना का यह तत्व अभिजात्य एवं श्रेण्य जगत की एक उल्लेखनीय विशेषता है। रोमन राज्य तानाशाही पर आधारित था। बहाँ असहमति या आलोचना को कभी-कभार ही बर्दाशत किया जाता था। आमतौर पर सरकार विरोध का उत्तर, हिंसात्मक कार्ववाई से देती थी (विशेष रूप से पूर्वी भाग के शहरों में जहाँ लोग अक्सर निडर होकर सम्राटों का मज्ञाक उड़ाया करते थे।) तथापि चौथी शताब्दी तक आते-आते रोमन कानून की एक प्रबल पंरपरा का उद्धभव हो चुका था और उसने सर्वाधिक भयंकर सम्राटों पर भी अंकुश लगाने का काम किया था। सम्राट लोग
अपनी मनमानी नहीं कर सकते थे और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए कानून का सक्रिय रूप से प्रयोग किया जाता था। इसीलिए चौथी शताब्दी के अंतिम दशकों में ऐम्ब्रोस जैसे शक्तिशाली बिशपों के लिए यह संभव हो पाया कि यदि सम्नाट आम जनता के प्रति अत्यधिक कठोर या दमनकारी हो जाएँ तो ये बिशप भी उतनी ही अधिक शक्ति से उनका मुकाबला करें।
रोमन अभिज्ञात वर्ग की आमदनियाँ पाँचवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में
रोम के ऊँचे घरानों में से प्रत्येक के पास अपने आप में वह सब कुछ मौजूद था जो एक मध्यम आकार के शहर में हो सकता है। एक घुड़दौड़ का मैदान (हिप्पोड्रोम) , अनेक मंच-मंदिर, फव्बारे और विभिन्न प्रकार के स्नानागार... बहुत से रोमन परिवारों को अपनी संपत्ति से प्रतिवर्ष 4,000 पाउंड सोने की आय प्राप्त होती थी, जिसमें अनाज, शराब और अन्य उपज शामिल नहीं थीं; इन उपजों को बेचने पर सोने में प्राप्त आय के एक-तिहाई के बराबर आमदनी हो सकती थी। रोम में द्वितीय श्रेणी के परिवारों की आय 1000 अथवा 1500 पाउंड सोना थी।
- थेब्स का ओलिंपिओडोरस
परवर्ती पुराकाल
इस अध्याय के अंत में हम रोमन साम्राज्य की अंतिम शताब्दियों में उसके सांस्कृतिक परिवर्तनों पर दृष्टिपात करेंगे। ‘परवर्ती पुराकाल’ शब्द का प्रयोग रोम साम्राज्य के उद्धभव, विकास और पतन के इतिहास की उस अंतिम दिलचस्प अवधि का वर्णन करने के लिए किया जाता है जो मोटे तौर पर चौथी से सातवों शताब्दी तक फैली हुई थी। यहाँ तक कि चौथी शताब्दी स्वयं भी अनेक सांस्कृतिक और आर्थिक हलचलों से परिपूर्ण थी। सांस्कृतिक स्तर पर, इस अवधि में लोगों के धार्मिक जीवन में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए, जिनमें से एक था सम्राट कॉन्स्टैनटाइन द्वारा ईसाई धर्म को राजधर्म बना लेने का निर्णय, और दूसरा था सातवों शताब्दी में इस्लाम का उद्य। लेकिन राज्य के ढाँङे में भी उतने ही महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। ये परिवर्तन सम्राट डायोक्लीशियन (284-305) के समय से प्रारंभ हुए।
सम्राट डायोक्लीशियन ने देखा कि साम्राज्य का विस्तार बहुत ज्यादा हो चुका है और उसके अनेक प्रदेशों का सामरिक या आर्थिक दृष्टि से कोई महत्व नहीं है इसलिए उसने उन हिस्सों को छोड़कर साम्राज्य को थोड़ा छोटा बना लिया। उसने साम्राज्य की सीमाओं पर क्रिले बनवाए, प्रांतों का पुनर्गठन किया और असैनिक कार्यों को सैनिक कार्यों से अलग कर दिया; साथ ही उसने सेनापतियों (Duces) को अधिक स्वायत्तता प्रदान कर दी, जिससे ये सैन्य अधिकारी अधिक शक्तिशाली समूह के रूप में उभर आए।

सम्राट कॉन्स्टैनटाइन, 313 ई. की एक विशाल मूर्ति का हिस्सा।
*एकाश्म- इसका तात्पर्य एक बड़ी चट्ट्रान का टुकड़ा होता है, परंतु इसका प्रयोग यहाँ पर मानव इकाइयों के लिए किया गया है। जब हम कहते हैं कि समाज अथवा संस्कृति एकाश्म है तो उसका अर्थ है कि उसमें विविधता की कमी है और उनमें आंतरिक एकरूपता है।
**ईसाईकरण उस प्रक्रिया को कहते हैं जिसके द्वारा ईसाई धर्म भिन्न-भिन्न जन-समूहों के बीच फैलाया गया और वहाँ का प्रमुख धर्म बना दिया गया।
कॉन्स्टैनटाइन ने इनमें से कुछ परिवर्तनों को पुख्ता बनाया और अपनी ओर से भी कुछ परिवर्तन किए। उसके द्वारा मुख्य रूप से मौद्रिक क्षेत्र में कुछ नए परिवर्तन किए गए। उसने सॉलिडस (Solidus) नाम का एक नया सिक्का चलाया जो 4.5 ग्राम शुढ़ सोने का बना हुआ था। यह सिक्का रोम साग्राज्य समाप्त होने के बाद भी चलता रहा। ये सॉलिडस सिक्के बहुत बड़े पैमाने पर ढाले जाते थे और लाखों-करोड़ों की संख्या में चलन में थे। कॉन्स्टैनटाइन का एक अन्य नवाचार था एक दूसरी राजधानी कुंस्तुनतुनिया (Constantinople) का निर्माण (जहाँ तुर्की में आजकल इस्तांबुल नगर बसा हुआ है पहले इसे बाइज्टेंटाइन कहा जाता था)। यह नयी राजधानी तीन ओर समुद्र से घिरी हुई थी। चूकि नयी राजधानी के लिए नयी सैनेट की जरूरत थी इसलिए चौथी शताब्दी में शासक वर्गों का बड़ी तेज़ी से विस्तार हुआ। मौद्रिक स्थायित्व और बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण आर्थिक विकास में तेज़ी आई। पुरातच्चीय अभिलेखों से पता चलता है कि औद्योगिक प्रतिष्ठानों सहित ग्रामीण उद्योग-धंधों में व्यापार के विकास में पर्याप्त मात्रा में पूँँजी लगाई गई। इनमें तेल की मिलें और शीशे के कारखाने, पेंच की प्रेसें तथा तरह-तरह की पानी की मिलें जैसी नयी प्रौद्योगिकियाँँ महत्वपूर्ण हैं। धन का अच्छा खासा निवेश पूर्व के देशों के साथ लम्बी दूरी के व्यापार में किया गया जिससे ऐसे व्यापार का पुनरुस्थान हुआ।
इन सभी के फलस्वरूप शहरी संपदा एवं समृद्धि में अत्यधिक
वृद्धि हुई, जिससे स्थापत्य कला के नए–नए रूप विकसित हुए और भोग–विलास के साधनों में भरपूर तेज़ी आई। शासन करने वाले कुलीन पहले से कहीं अधिक धन–संपन्न और शक्तिशाली हो गए। मिस्न में परवर्ती शताब्दियों के पैपाइरस पौधे के पत्तों पर लिखे हुए सैकड़ों दस्तावेज़ मिले हैं, जिनसे यह पता चलता है कि तत्कालीन समाज अपेक्षाकृत अधिक खुशहाल था, जहाँ मुद्रा का व्यापक रूप से इस्तेमाल होता था और ग्रामीण संपदाएँ भारी मात्रा में सोने के रूप में लाभ कमाती थीं। उदाहरण के लिए, छठी शताब्दी के दौरान जस्टीनियन के शासनकाल में अकेला मिस्न प्रतिवर्ष 25 लाख सॉलिडस (लगभग 35,000 पाउंड सोना) से अधिक धनराशि करों के रूप में देता था। निस्संदेह, पश्चिमी एशिया के बड़े-बड़े ग्रामीण इलाके पाँचवीं और छठी शताब्दियों में (आज बीसवीं शताब्दी की तुलना में भी) अधिक विकसित और घने बसे हुए थे! इसी सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर इस अवधि में आगे चलकर अनेक सांस्कृतिक परिवर्तन हुए।
यूनान और रोमवासियों की पारंपरिक धार्मिक संस्कृति बहुदेववादी थी। ये लोग अनेक पंथों एवं उपासना पढ़तियों में विश्वास रखते थे और जूपिटर, जूनो, मिनर्वा और माँर्स जैसे अनेक रोमन इतालवी देवों और यूनानी तथा पूर्वी देवी-देवताओं की पूजा किया करते थे, जिसके लिए उन्होंने साम्राज्य भर में हज्ञारों मॉदिर, मठ और देवालय बना रखे थे। ये बहुदेववादी स्वयं को किसी एक नाम से नहीं पुकारते थे। रोमन साम्राज्य का एक अन्य बड़ा धर्म यहूदी धर्म (Judaism) था। लेकिन यहूदी धर्म भी ‘एकाश्म*’ (Monolith) यानी विविधताहीन नहीं था, अर्थात् परवर्ती पुराकाल के यहूदी धर्म में अनेक विविधताएँ मौजूद थीं। अतः चौथी या पाँँचवीं शताब्दियों में साम्राज्य का ‘ईसाईकरण’** एक क्रमिक एवं जटिल प्रक्रिया के रूप में हुआ। बहुदेववाद (Polytheism) विशेष रूप से पश्चिमी प्रांतों में आसानी से तुरंत गायब नहीं हुआ, हालाँकि ईसाई धर्मप्रचारक वहाँ प्रचलित बहुदेववादी मत-मतांतरों तथा धार्मिक रीति-रिवाजों का लगातार विरोध करते रहे और ईसाई जनसाधारण की तुलना में बहुदेववाद की निंदा करते रहे। चौथी शताब्दी में भिन्न-भिन्न धार्मिक समुदायों के बीच की सीमाएँङ्तनी कठोर एवं गहरी नहीं थीं जितनी कि आगे चलकर हो गई, ऐसा शक्तिशाली बिशपों की कोशिशों के कारण हुआ, जिन्होंने अपने अनुयायियों को कड़ाई से धार्मिक विश्वासों तथा रीति-रिवाजों का पालन करने का पाठ पढ़ाया।
जनता में आम खुशहाली, खासतौर पर, पूर्वी भागों में अधिक फैली जहाँ आबादी छठी सदी के मुख्य भाग तक बढ़ती रही थी, हालांकि वहाँ प्लेग की महामारी का प्रकोप हो चुका था जिसके कारण 540 के दशक में लगभग संपूर्ण भूमध्यसागरीय प्रदेश प्रभावित हो गया था। इसके विपरीत, पश्चिम में साम्राज्य राजनीतिक दृष्टि से विखंडित हो गया क्योंकि उत्तर से आने वाले जर्मन मूल के समूहों (गोथ, वैंडल, लोंबार्ड आदि) ने सभी बड़ प्रांतों को अपने कब्ज़े में ले लिया था और अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिए थे जिन्हें ‘रोमोत्तर’ (Post-Roman) राज्य कहा जा सकता है। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण राज्य थे : स्पेन में विसिगोथों (Visigoths) का राज्य (जिसे अरबों ने 711 से 720 के बीच नष्ट कर दिया); गॉल में फ्रैकों का राज्य (लगभग 511-687) और इटली में लोंबार्डों का राज्य (568-774)। ये राज्य एक भिन्न किस्म की दुनिया की शुरुआत के पूर्व संकेत थे जिस दुनिया को आमतौर पर मध्यकालीन (Medieval) कहा जाता है। पूर्वी भाग में, जहाँ साम्राज्य संयुक्त बना रहा, जस्टीनियन का शासनकाल समृद्धि और शाही महत्वाकांक्षा के उच्च स्तर का द्योतक था। जस्टीनियन ने (533 में) अफ्रीका को बैंडलों (Vandals) के कब्ज़े से छुड़ा लिया और इटली को ऑस्ट्रोगोथों से लेकर वापस उस पर अधिकार कर लिया। इससे देश तहस-नहस हो गया और लौंबार्ड (Lombard) के आक्रमण के लिए रास्ता तैयार हो गया। सातवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों तक आते-आते रोम और ईरान के बीच लड़ाई पिर छिड़ गई। ससानी शासकों (जो तीसरी शताब्दी से ईरान पर शासन कर रहे थे) ने मिम्र सहित सभी विशाल पूर्वी
79 ई. में बना कोलोसियम जहाँ तलवारिये (तलवार चलाने में निपुण योढ्ला) जंगली जानवरों का मुकाबला करते थे। यहाँ एक साथ 60,000 दर्शक बैठ सकते थे।

प्रांतों में बड़े पैमाने पर आक्रमण कर दिया। बाइज्टेंटियम (अब रोम साम्राज्य को ज्यादातर इसी नाम से जाना जाता था) ने 620 के दशक में इन प्रांतों पर फिर से अपना कब्जा कर लिया, लेकिन उसके कुछ ही वर्ष बाद उसे दक्षिण-पूर्व की ओर से एक बहुत जौरदार अंतिम धक्का लगा जिसे वह सहन नहीं कर सका।
अरब प्रदेश से शुरू होने वाले इस्लाम के विस्तार को ‘प्राचीन विश्व इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक क्रांति’ कहा जाता है। 642 तक, जब पैंगम्बर मुहम्मद की मृत्यु को मुश्किल से 10 साल हुए थे, पूर्वी रोमन और ससानी दोनों राज्यों के बड़े-बड़े भाग भीषण युढ़ के बाद अरबों के कब्ज़े में आ गए। किंतु, हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि उभरते हुए इस्लामी राज्य की जीतें, जो एक शताब्दी बाद अंततः स्पेन, सिंध और मध्य एशिया तक फैल गई, अरब जनजातियों को ही पराजित करने से हुई। अरब से शुरू होकर ये जीतें सीरियाई रेगिस्तान तथा इराक की सरहदों तक पहुँचीं, जिसके पश्चात् मुस्लिम सेनाएँ और दूर-दूर तक गई। जैसाकि हम अगले विषय चार में देखेंगे, अरब प्रायढ़ीप और वहाँँ रहने वाली अनेक जनजातियों के एकीकरण के कारण ही इस्लाम धर्म का क्षेत्रीय विस्तार हुआ।

शासक
27 ई.पू-14 ईस्वी
ऑगस्टस, प्रथम रोम सम्राट
14-37
टिबेरियस
98-117
त्राजान
117-38
हैड्डियन
193-211
सेप्टिमियस सेवेरस
241-72
ईरान में शापुर प्रथम
का शासन
253-68
गैलीनस
284-305
टेट्राकी (चतुस्तंत्र)
डायोक्लीशियन
मुख्य शासक
312-37
कॉन्स्टैनटाइन
309-79 ईरान में शापुर
द्वितीय का शासन
408-50
थियोडोसियस द्वितीय
(प्रसिद्ध 'थियोडोसियस
कोड' का संकलन कर्ता)
490-518
अनैस्टैसियस
527-65
जस्टीनियन
531-79 ईरान में
खुसरो प्रथम का शासन
610-41
हेराक्लियस
घटनाएँ
| 27 ई.पू. | ऑक्टेवियन द्वारा स्थापित ‘प्रिसिपेट’, वह अब अपने आपको ऑगस्टस कहने लगा था |
| लगभग 24-79 | वरिष्ठ प्लिनी का जीवन; विसूवियस नामक ज्वालामुखी के फटने से उसकी मृत्यु; विसूवियस ने रोमन नगर पोम्पई को भी अपने लावे में दफ्न कर लिया था |
| 66-70 | विशाल यहूदी विद्रोह और रोमन सेनाओं का जेरूसलम पर कब्जा |
| लगभग 115 | त्राजान की पूर्व में विजयों के बाद, रोमन साम्राज्य का अधिकतम विस्तार |
| 212 | साम्राज्य के सभी मुक्त निवासियों को रोमन नागरिक का दर्जा दे दिया गया |
| 224 | ईरान में नया वंश स्थापित, जिसे उनके पूर्वज ससान के नाम पर ससानी कहा गया |
| 250 का दशक | फारसवासियों ने फ़रात के पश्चिम में स्थित रोमन प्रदेशों पर आक्रमण किया |
| 258 | कार्थेज़ के साइप्रसवासी बिशप को मृत्युदंड |
| 260 का दशक | गैलीनस ने फिर से सेना संगठित की |
| 273 | पामाएरा का कारवाँ नगर रोमवासियों द्वारा नष्ट किया गया |
| 297 | डायोक्लीशियन ने 100 प्रांतों में साम्राज्य का पुनर्गठन किया |
| लगभग 310 | कॉन्स्टैनटाइन ने सोने का नया सिक्का (सॉलिडस) चलाया |
| 312 | कॉन्स्टैनटाइन ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया |
| 324 | कॉन्स्टैनटाइन अब साम्राज्य का एकमात्र शासक बन गया। उसने कुंस्तुनतुनिया नगर की स्थापना की |
| 354-430 | हिप्पो के बिशप ऑगस्टीन का जीवन-काल |
| 378 | गोथ लोगों ने ऐड्ड्रियैनोपोल में रोमन सेनाओं को करारी मात दी |
| 391 | सिकंदरिया में सेरपियम (सेरापिस के मंदिर) नष्ट किए गए |
| 410 | विसिगोथों ने रोम का विध्वंस कर दिया |
| 428 | वैंडल लोगों ने अफ्रीका के प्रदेश पर कब्जा कर लिया |
| 434-53 | अट्टिला नामक हूण का साम्राज्य |
| 493 | ऑस्ट्रोगोथों ने इटली में राज्य स्थापित किया |
| 533-50 | जस्टीनियन द्वारा अफ्रीका और इटली को मुक्त करा लेना |
| 541-70 | ब्यूबोनिक प्लेग का प्रकोप |
| 568 | लौंबार्ड लोगों ने इटली पर आक्रमण किया |
| लगभग 570 | पैंगम्बर मुहम्मद का जन्म |
| 614-19 | फारस के शासक खुसरो द्वितीय ने पूर्वी रोम प्रदेशों पर आक्रमण करके उन पर कब्जा कर लिया |
| 622 | पैंगम्बर मुहम्मद और उनके साथी मक्का छोड़कर मदीना चले गए |
| 633-42 | अरब विजयों का पहला और महत्वपूर्ण चरण; मुस्लिम सेनाओं ने सीरिया, फिलिस्तीन, मिम्र, इराक और ईरान कै कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया |
| 661-750 | सीरिया में उमम्या वंश |
| 698 | अरबों ने कार्थेज़ को जीत लिया |
| 711 | स्पेन पर अरबों का आक्रमण |






