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Unit14

At a Glance

शब्दावली

अजैव : कोई भी अजीवित वस्तु : सामान्यतः इसका तात्पर्य प्राणी के पर्यावरण के भौतिक और रासायनिक घटकों से होता है।

अपसौर/सूर्योंच्च : यह पृथ्वी के परिक्रमा पथ का वह बिंदु जो सूर्य से सर्वाधिक दूर (152.5 मिलियन कि.मी.) होता है अपसौर 3 अथवा 4 जुलाई घटित होता है।

अधिकेंद्र/एपिसेंटर : पृथ्वी की सतह पर वह स्थल-बिंदु जो भूकंप के उद्गम केंद्र से सब से कम दूरी पर स्थित होता है और इसी स्थल-बिंदु पर भूकंपी तरंगों की ऊर्जा का विमोचन होता है।

अवरोही पवन : पर्वतीय ढाल से नीचे की ओर बहने वाली पवन।

आवास : पारिस्थितिकी के संदर्भ में प्रयुक्त शब्द जिससे किसी पौधे या प्राणि के रहने के स्थान/क्षेत्र का बोध होता है।

एल निनो : इक्वेडोर एवं पेरू तट के साथ-साथ सामुद्रिक सतह पर कभी-कभी गर्म पानी का प्रवाह। पिछले कुछ समय से संसार के विभिन्न भागों के पूर्वानुमान के लिए इस परिषटना का प्रयोग किया जा रहा है। यह सामान्यतः क्रिसमस के आसपास घटित होता है। तथा कुछ सप्ताहों से कुछ महीनों तक बना रहता है।

ओज्ञोन : त्रि-आणुविक ऑक्सीजन जो पृथ्वी के वायुमंडल में एक गैस के रूप में पाई जाती है। ओजोन का अधिकतम संकेंद्रण पृथ्वी के पृष्ठ से 10-15 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्ट्रेटोस्फियर (समताप मंडल) में पाई जाती है जहाँ पर यह सूर्य की परा-बैंगनी किरणों को अवशोषित कर लेती है। समताप मंडलीय ओजोन नैसर्गिक रूप से पैदा होती है तथा पृथ्वी पर सूर्य के पराबैंगनी विकिरण के दुष्प्रभाव से जीवन की रक्षा करती है।

ओज्जोन छिंद्र : समताप मंडलीय ओजोन संकेन्द्रण में तीत्रता से मौसमी गिरावट। यह अंटार्कटिक में वसंत त्रक्ष्टु में घटित होती है। इस की जानकारी 1970 में मिली थी उस के बाद यह वायुमंडल में जटिल रसायनिक प्रतिक्रिया, जिसमें (CFC) क्लोरोफ्लूरोकार्बन भी सम्मिलित हैं, के फलस्वरूप बार-बार प्रकट होता है।

अंतर उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र : विषुवत् वृत्त या उस के पास निम्न वायु दाब तथा आरोही वायु का क्षेत्र। ऊपर उठने वाली वायु धाराएं वैश्चिक वायु अभिसरण तथा ताप जनित संवहन द्वारा बनती हैं।

केल्सीभवन : एक शुष्क पर्यावरणीय मृदा निर्माणकारी प्रक्रिया जिससे धरातल की मृदा परतों में चूना एकत्रित हो जाता है।

क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सी.एफ.सी.) : कृत्रिम रूप से उत्पन्न गैस जो पृथ्वी के वायुमंडल में सान्द्रित हो गई है। यह बहुत ही प्रबल ग्रीनहाउस गैस एरोसाल फुहारों, प्रशीतकों, धूम से बनती है।

कोरिआँलिस बल : पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न एक आभासी बल जो उत्तरी गोलाऊ्द्र में गतिमान चीजों को अपनी दाहिने ओर तथा दक्षिणी गोलाऊ्द्र मे अपने बाई और विक्षेपित कर देता है। विषुवत् वृत्त पर यह बल शून्य होता है। इस बल से मध्यअंक्षाशीय चक्रवातों, हरीकेन तथा प्रतिचक्रवातों जैसे मौसमी परिघटनाओं के प्रवाह की दिशा निर्धारित होती है।

कपासी मेघ : अपेक्षाकृत समतल आधार वाले वृहत् मेघ। ये 300 से 2000 मीटर की ऊँचाई तक पाए जाते हैं। कपासी वर्षी मेघ : एक पूर्णतयः विकसित ऊध्वाधर मेघ जिसका शीर्ष प्रायः निहाई की आकृति का होता है। इन मेघों का विस्तार पृथ्वी के धरातल पर कुछ सौ मीटर से लेकर 12,000 मी० तक हो सकता है।

ग्रीन हाउस प्रभाव : दैध्याधर तरंगों के रूप में अंतरिक्ष में प्रेषित ऊर्जा को वायुमंडल द्वारा अवशोषित कर के पृथ्वी के धरातल को ढक लेना।

ग्रीन हाउस गैसें : ग्रीन हाउस प्रभाव के लिए जिम्मेदार गैसे है। इन गैसों में कार्बन-डाइआक्साइड (CO₂) मिथेन, नाइट्रस आक्साइड, क्लोरोफ्लोरो कार्बन सी.एफ.सी. तथा क्षोभ मंडलीय ओजोन सम्मिलित हैं।

गुप्त ऊष्मा : किसी पदार्थ को उस के उच्चतर स्थिति में परिवर्तित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा जैसे (ठोस → ढ्रव → गैस) यही ऊर्जा पदार्थ से उस समय उत्पन्न होती है जब स्थिति उलट जाती है जैसे (गैस → ढ्रव → ठोस)।

जैव-विविधता : विभिन्न प्रजातियों की विविधता (प्रजातीय विविधता), प्रत्येक प्रजाति में आनुवाँशिक विभिन्नता (आनुवाँशिक विविधता) और पारितंत्रों की विविधता।

जीवभार : एक समय विशेष के अंतराल पर सामान्यतः प्रति इकाई क्षेत्र मापा गया जीवित ऊतकों का भार।

ज्वालामुखी कुंड : विस्फोटक प्रकार का ज्वालामुखी जिससे विशाल वृत्ताकार गर्त बन जाता है। इनमें कई गर्तों का व्यास 40 कि.मी. जितना बड़ा हो सकता हैं ये ज्वालामुखी तब बनते हैं जब ग्रेनाइट प्रकार का मैग्मा पृथ्वी की सतह की ओर तीव्रता से उठाता है।

जल्योजन ( हाइड्रेशन ) : रासायनिक अपक्षयण का एक रूप जो किसी खनिज के परमाणु एवं अणुओं के साथ पानी के (H+ तथा OH-) आयनों की दृढ़ संलग्नता का द्योतक है।

जल, अपघटन ( हाड्गोलिसिस ): रासायनिक अपक्षयण की वह प्रक्रिया जिस में खनिज आयनों एवं जल आयनों (OH- और H+) की प्रतिक्रिया सम्मिलित होती है। और इससे नए यौगिकों के निर्माण से चट्टानी पृष्ठ का अपघटन होता है।

ताप प्रवणस्तर : किसी जल संहति में वह सीमा जहाँ तापक्रम में अधिकतम ऊध्वाधिर परिवर्तन होता है। यह सीमा सतह के पास पाए जाने वाले पानी की कोष्ण परत तथा गंभीर शीतल पानी की परत के बीच का संक्रमण क्षेत्र है।

थल समीर : स्थल और जल के मध्य अंतरापृष्ठ पर पाया जाने वाला स्थानीय ताप परिसंचरण तत्रा। इस तंत्र में पृष्ठीय पवनें रात के समय स्थल से सागर की और चलती हैं।

दुर्बलतामंडल : पृथवी के मेंटल का वह खंड जो लचीले लक्षणों का प्रदर्शन करता है। दुर्बलतामंडल स्थल मंडल के नीचे 100 से 200 कि.मी. के बीच अवस्थित होता है।

धुवीय ज्योति : धुवीय प्रदेशों के ऊपरी वायुमंडल (आयनमंडल) में बहुरंगी प्रकाश जो मध्य एवं उच्च अक्षांशों में स्थित स्थानों से दृष्टिगोचर होता है, इसकी उत्पति सौर पवनों की ऑक्सीजन और नाइट्रोजन से परस्पर क्रिया फलस्वरूप होती है। उत्तरी गोलार्ध में धुवीय ज्योति को उत्तर धुवीय ज्योति और दक्षिणी गोलार्ध में इसे दक्षिणी धुवीय ज्योति कहा जाता है।

पक्षाभस्तरी मेघ : बहुत ऊँचाई पर चादर (Sheet) की तरह के बादल ये भी हिम कणों से बनते हैं। इन बादलों की पतली परत पूरे आकाश पर छाई हुई दिखती है। ये भी 5000 से 18000 मीटर की ऊँचाई तक पाए जाते हैं।

पारिस्थितिक तंत्र/पारितंत्र : किसी क्षेत्र का जैव एवं अजैव तत्वों से बना तंत्र। ये दोनों समुदाय अंतःसंबंधित होते हैं और इनमें अंतः क्रिया होती है।

पुरा चुंब्रकत्व ( पैलियोमैगनटिज्ञम ) : चट्टानों की रचना काल में उन में विद्यमान चुंबकीय प्रवृत्ति ग्रहणशील खनिजों द्वारा क्षैतिज झुकाव के रूप में सरेखण।

प्लेट विवर्तनिक : बह सिद्धांत जिस की मान्यता है कि भूपृष्ठ कुछ महासागरीय एवं महाद्वीपीय प्लेटों से बना है। मैंटल में संवहनीय धाराओं के संचलन। इन प्लेटों में पृथ्वी के दुर्बलतामंडल के ऊपर धीरे-धीरे खिसकने की योग्यता होती है।

प्रकाश संश्लेषण : यह एक रसायनिक प्रक्रिया है जिसमें पौधे तथा कुछ बैक्टीरिया सूर्थ से ऊर्जा प्राप्त कर के उसे धारण कर लेते हैं।

बायोम : पृथ्वी पर प्राणियों और पौधों का सबसे बड़ा जमाव बायोम का वितरण मुख्यतः जलवायु से निर्यंत्रित होता है।

बिंग बैंग : ब्रहमांड की उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत इस सिद्धांत के अनुसार 1500 करोड़ वर्ष पूर्व ब्रहमांड के समस्त पदार्थ एवं ऊर्जा एक अणु से भी लघु क्षेत्र में सांद्रित थे। इस अवस्था में पदार्थ, ऊर्जा, स्थान और समय अस्तित्व में नहीं थे। तब अचानक एक धमाके के साथ ब्रहमांड अविश्वसनीय गति से विस्तृत होने लगा और पदार्थ, ऊर्जा, स्थान और समय अस्तित्व में आए, ज्यों ही ब्रहमांड का विस्तार हुआ पदार्थ गैसीय बादलों में व तत्पश्चात् तारों व ग्रहां में संलीन होने लगा। कुछ विद्वानों का विश्वास है कि यह विस्तार परिमित है और एक दिन रुढ्ध हो जाएगा। समय के इस मोड़ पर जब तक बिंग क्रंच घटित नहीं होता ब्रहमांड का विध्वंस होना आरंभ हो जाएगा।

बैथोलिथ/महास्कंध : अधोतल में स्थित आंतरिक आग्नेय शैलों की विशाल संहति, जिसकी उत्पत्ति मैटल मैग्मा से हुई है।

भाटा : उच्च ज्वार के पश्चात् समुद्र के पानी की सतह में गिरवट या प्रतिसरण।

भूकंप : भूकंप पृथ्वी के भीतर की यकायक गति या हिलने को कहते हैं। यह गति धीरे-धीरे संचित ऊर्जा के भूकंपी तंरगों के रूप में तीत्र मोचन के कारण उत्पन्न होती है।

भूकंप उद्गम केंद्र (अथवा अधिकेंद्र) : भूकंप में प्रतिबल मोचन बिंदु।

भू-चुंबकत्व : चट्टानों की रचना की अवधि के दौरान चुंबकीय रूप से ग्रहण शील खनिजों का पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से सरैखित होने का गुणधर्म।

भूमंडलीय ऊष्मन : ग्रीन हाउस गैसों के कारण पृथ्वी के औसत वैश्विक तापमान में वृद्धि।

भूविक्षेपी पवन : ऊपरी बायु मंडल में समदाब रेखाओं के समानांतर चलने वाली क्षैतिज पवनें जो दाब प्रवणता बल एवं कोरियालिस बल के बीच संतुलन से उत्पन्न होती है।

महाद्वीपीय पर्पटी : भू-पर्पटी का ग्रेनाइटी भाग जिस से महाद्वीप बने हैं। महाद्वीपीय पर्पटी की मोटाई 20 से 75 किलोमीटर के बीच पाई जाती है।

रुङ्कोष्म हास दर : ऊपर उठती अथवा नीचे आती वायु संहति के तापमान के परिवर्तन की दर। यदि कोई अन्य अरुङ्कोष्म प्रक्रियाएँ (जैसे तन्त्र में उष्मा का प्रवेश अथवा निकास) घटित नहीं होतीं (जैसे संघनन, वाष्पीकरण और विकिरण) तो विस्तार वायु के इस खंड का 0.98° सेल्सियस प्रति 100 मीटर की दर से शीतलन करती है, जब कोई वायु का खंड वायुमंडल में नीचे उतरता है तो इससे विपरीत घटित होता है, नीचे उतरती वायु का खंड संपीडित हो जाता है। संपीडन के कारण वायु के खंड का तापमान 0.98° सेल्सियस प्रति 100 मीटर बढ़ जाता है।

रेगिस्तानी कुट्टिटम : वायु द्वारा बारीक कणों के अपरदन के बाद भूमि पर छूटे हुए मोटे कणों की पतली चादर।

ला निना : यह एल निनो की विपरीत स्थिति होती है। इस के अंतर्गत उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागरीय व्यापारिक पवर्नें सबल हो जाती हैं जिस के कारण मध्वर्ती एवं पूर्वी प्रशांत महासागर में ठंडे जल का असामान्य संचयन हो जाता है।

लघु ज्वार भाटा : हर 14-15 दिन में आने वाला ज्वार जो चंद्रमा के पहले चौथाई या आखिरी चौथाई काल में होता है। इस समय चंद्रमा तथा सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल एक दूसरे की लंबवत स्थिति में होते है। अतः ज्वार की ऊँचाई या भाटे की नीचाई सामान्य से कम होती है।

वर्षण : भू-पृष्ठ पर मेघों से वर्षा की बूंदों, हिम एंव ओले के रूप में गिरना। वर्षा, हिमपात, करकापात तथा मेघों का फटना आदि वर्षण के विभिन्न रूप हैं।

वर्षास्तरी मेघ : वर्षा अथवा हिमपात के रूप में लगातार वर्षण करने वाले एवं कम ऊँचाई वाले काले या भूरे मेघ। ये प्रायः भूपृष्ठ से 3000 मीटर की ऊँचाई तक पाये जाते हैं।

वायु संहति : वायु का बह पिंड जिसमें उद्भव क्षेत्र से ग्रहण किए गए तापमान एवं आर्दता के लक्षण सैकड़ों से हज्ञारों किलोमीटर की क्षैतिज दूरियों में अपेक्षाकृत स्थिर रहते हैं। वायुसंहतियाँ उद्भव क्षेत्र में अनेक दिनों तक स्थिर रहने के बाद अपने जलवायविक लक्षणों का विकास करती हैं।

वायुमंडलीय दाब : धरातल पर वायुमंडल का भार 1 समुद्र तल पर औसत वायुमंडलीय 1,013.25 मिलीबार होता है। दाब को एक उपकरण द्वारा मापा जाता है जिसे वायुदाब मापी अथवा बैरोमीटर कहा जाता है।

शीताग्र : वायुमंडल में एक सक्रमण क्षेत्र जहाँ आगे बढ़ती हुई एक शीत वायु संहति गर्म वायु संहति को विस्थापित कर देती है।

सूर्यातप : सूर्य की लघु तरंगों के रूप में विकीर्ण ऊर्जा।

सौर पवन : सूर्य द्वारा अंतरिक्ष मे प्रेषित आयन युक्त गैस संहति यह धुवीय ज्योति (प्रकाश पुंज) के बनने में सहायक होती है।