Greenhouse gases rising alarmingly - Air pollution biggest killer Southeast Asia, says WH - Gangotri
विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन
विश्व की जलवायु का अध्ययन जलवायु संबंधी आंकड़ों एवं जानकारियों को संगठित करके किया जा सकता है। इन आंकड़ों को आसानी से समझने व उनका वर्णन और विश्लेषण करने के लिए उन्हें अपेक्षाकृत छोटी इकाइयों में बाँटकर संश्लेषित किया जा सकता है। जलवायु का वर्गीकरण तीन वृहत् उपगमनों द्वारा किया गया है। वे हैं – आनुभविक, जननिक और अनुप्रयुक्त। आनुभविक वर्गीकरण प्रेक्षित किए गए विशेष रूप से तापमान एवं वर्णन से संबंधित आंकड़ों पर आधारित होता है। जननिक वर्गीकरण जलवायु को उनके कारणों के आधार पर संगठित करने का प्रयास है। जलवायु का अनुप्रयुक्त वर्गीकरण किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए किया जाता है।
कोपेन की जलवायु वर्गीकरण की पढ़ति
वी. कोपेन द्वारा विकसित की गई जलवायु के वर्गीकरण की आनुभविक पढ़ति का सबसे व्यापक उपयोग किया जाता है। कोपेन ने वनस्पति के वितरण और जलवायु के बीच एक घनिष्ठ संबंध की पहचान की। उन्होंने तापमान तथा वर्षण के कुछ निश्चित मानों का चयन करते हुए उनका वनस्पति के वितरण से संबंध स्थापित किया और इन मानों का उपयोग जलवायु के वर्गीकरण के लिए किया। वर्षा एवं तापमान के मध्यमान वार्षिक एवं मध्यमान मासिक ऑँकड़ों पर आधारित यह एक आनुभविक पढ़ति है। उन्होंने जलवायु के समूहों एवं प्रकारों की पहचान करने के लिए बड़े तथा छोटे अक्षरों के प्रयोग का आरंभ किया। सन् 1918 मे विकसित तथा समय के साथ संशोधित हुई कोपेन की यह पढ़ति आज भी लोकप्रिय और प्रचलित है।
कोपेन ने पाँँच प्रमुख जलवायु समूह निर्धारित किए जिनमें से चार तापमान पर और एक वर्षण पर आधारित है। कोपेन के जलवायु समूह एवं उनकी विशेषताओं को सारणी 11.1 में दिया गया है।
| समूह | लक्षण |
| A. उष्णकटिबंधीयB. शुष्क जलवायुC. कोष्ण शीतोष्णD. शीतल हिम-वन जलवायुE. शीत | सभी महीनों का औसत तापमान सेल्सियस से अधिक।वर्षण की तुलना में विभव वाष्पीकरण की अधिकता।सर्वाधिक ठंडे महीने का औसत तापमान सेल्सियस से अधिक किन्तु सेल्सियस से कम मध्य अक्षांशीय जलवायु।वर्ष के सर्वाधिक ठंडे महीने का औसत तापमान शून्य अंश तापमान से नीचे।सभी महीनों का औसत तापमान सेल्सियस से कम। |
बड़े अक्षर A, C, D तथा E आर्द जलवायु को तथा B अक्षर शुष्क जलवायु को निरूपित करता है। जलवायु समूहों को तापक्रम एवं वर्षा की मौसमी विशेषताओं के आधार पर कई उप-प्रकारों में विभाजित किया गया है जिसको छोटे अक्षरों द्वारा अभिहित किया गया है। शुष्कता वाले मौसमों को छोटे अक्षरों f,m,w और s द्वारा इंगित किया गया है। इसमें f शुष्क मौसम के न होने को m कारण यहाँ की जलवायु ऊष्ण एवं आद्रे रहती है। यहाँ वार्षिक तापांतर बहुत कम तथा वर्षा अधिक होती है। जलवायु के इस उष्णकटिबंधीय समूह को तीन प्रकारों में बाँटा जाता है, जिनके नाम हैं (i) Af उष्णकटिबंधीय आद्र जलवायु; (ii) Am उष्णकटिबंधीय मानसून जलवायु और (iii) Aw उष्णकटिबंधीय आद्र जलवायु जिसमें शीत क्रहतु शुष्क होती है।
| समूह | प्रकार | कूट अक्षर | लक्षण |
| A उष्णकटिबंधीयआर्द जलवायु | उष्णकटिबंधीय आर्दउष्णकटिबंधीय मानसूनउष्णकटिबंधीय आर्द एवं शुष्क | AfAmAw | कोई शुष्क ऋहतु नहीं।मानसून, लघु शुष्क ऋहतुजाड़े की शुष्क ऋहतु |
| B शुष्क जलवायु | उपोष्ण कटिबंधीय स्टैपीउपोष्ण कटिबंधीय मरुस्थलमध्य अक्षांशीय स्टैपीमध्य अक्षांशीय मरुस्थल | BShBWhBSkBWk | निम्न अक्षांशीय अर्ध शुष्क एवं शुष्कनिम्न अक्षांशीय शुष्कमध्य अक्षांशीय अर्ध शुष्क अथवा शुष्कमध्य अक्षांशीय शुष्क |
| C कोष्ण शीतोष्ण (मध्यअक्षांशीय जलवायु) | आर्द उपोष्ण कटिबंधीयभूमध्य सागरीयसमुद्री पश्चिम तटीय | CfaCsaCfb | मध्य अक्षांशीय अर्धशुष्क अथवा शुष्कशुष्क गर्म ग्रीष्मकोई शुष्क ऋहतु नहीं, कोष्ण तथा शीतल ग्रीष्म |
| D शीतलहिम-वन जलवायु | आर्द महाद्वीपीयउप-उत्तर भुवीय | DfDw | कोई शुष्क ऋहतु नहीं, भीषण जाड़ाजाड़ा शुष्क तथा अत्यंत भीषण |
| E शीत जलवायु | टुंड्राभुवीय हिमटोपी | ETEF | सही अथों में कोई ग्रीष्म नहींसदैव हिमाच्छादित हिम |
मानसून जलवायु को w शुष्क शीत ऋहतु को और s शुष्क ग्रीष्म ऋहतु को इंगित करता है छोटे अक्षर a,b,c तथा d तापमान की उग्रता वाले भाग को दर्शति है। B समूह की जलवायु को उपविभाजित करते हुए स्टेपी अथवा अर्थ-शुष्क के लिए S तथा मरुस्थल के लिए W जैसे बड़े अक्षरों का प्रयोग किया गया है। जलवायु प्रकारों को सारणी 11.2 में दिखाया गया है। जलवायु समूहों एवं प्रकारों का वितरण सारणी 11.1 में दर्शाया गया है।
समूह A उष्णकटिबंधीय जलवायु
उष्णकटिबंधीय आद्र जलवायु कर्क रेखा और मकर रेखा के बीच पाई जाती है। संपूर्ण वर्ष सूर्थ के ऊर्धर्वस्थ तथा अंतर उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र की उपस्थिति के उष्णकटिबंधीय आद्रे जलवायु (Af)
उष्णकटिबंधीय आद्र जलवायु विषुवत् वृत्त के निकट पाई जाती है। इस जलवायु के प्रमुख क्षेत्र दक्षिण अमेरिका का अमेजन बेसिन, पश्चिमी विषुवतीय अफ्रीका तथा दक्षिणी पूर्वी एशिया के ढ्वीप हैं। वर्ष के प्रत्येक माह में दोपहर के बाद गरज और बौछारों के साथ प्रचुर मात्रा में वर्षा होती है। तापमान समान रूप से ऊँचा और वार्षिक तापांतर नगण्य होता है। किसी भी दिन अधिकतम तापमान लगभग 30° सेल्सियस और न्यूनतम तापमान लगभग 20° सेल्सियस होता है। इस जलवायु में सघन वितान तथा व्यापक जैव-विविधता वाले उष्णकटिबंधीय सदाहरित वन पाए जाते हैं।
उष्णकटिबंधीय मानसून जलवायु (Am)
उष्णकटिबंधीय मानूसन जलवायु भारतीय उपमहाद्वीप, दक्षिण अमेरिका के उत्तर-पूर्वी भाग तथा उत्तरी आस्टेलिया में पाई जाती है। भारी वर्षा अधिकतर गर्मियों में होती है। शीत ऋहतु शुष्क होती है। जलवायु के इस प्रकार का विस्तृत जलवायवी विवरण ‘भारत : भौतिक पर्यावरण’, एन.सी.आर.टी., 2006 में दिया गया है।
उष्णकटिबंधीय आर्द एवं शुष्क जलवायु (Aw)
उष्णकटिबंधीय आर्द्र एवं शुष्क जलवायु Af प्रकार के जलवायु प्रदेशों के उत्तर एवं दक्षिण में पाई जाती है। इसकी सीमा महाद्वीपों के पश्चिमी भाग में शुष्क जलवायु के साथ और पूर्वी भाग में Cf तथा Cw प्रकार की जलवायु के साथ पाई जाती है। विस्तृत Aw जलवायु दक्षिण अमेरिका में स्थित ब्राजील के वनों के उत्तर और दक्षिण में बोलिविया और पैरागुए के निकटवर्ती भागों तथा सूडान और मध्य अफ्रीका के दक्षिण में पाई जाती है। इस जलवायु में वार्षिक वर्षा Af तथा Am जलवायु प्रकारों की अपेक्षा काफी कम तथा विचरणशील है। आर्द्र क्रहतु छोटी और शुष्क क्रहतु भीषण व लंबी होती है। तापमान वर्ष भर ऊँचा रहता है और शुष्क क्रहतु में दैनिक तापांतर सर्वाधिक होते हैं। इस जलवायु में पर्णपाती वन और पेड़ों से ढकी घासभूमियाँ पाई जाती है।
शुष्क जलवायु-B
शुष्क जलवायु की विशेषता अत्यंत न्यून वर्षा है जो पादपों की वृद्धि के लिए पर्याप्त नहीं होती। यह जलवायु पृथ्वी के बहुत बड़े भाग पर पाई जाती है जो विषुवत् वृत्त से 15° से 60° उत्तर व दक्षिणी अक्षांशों के बीच विस्तृत है। 15° से 30° के निम्न अंक्षाशों में यह उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब क्षेत्र में पाई जाती है। जहाँँ तापमान का अवतलन और उत्क्रमण, वर्षा नहीं होने देते। महाद्वीपों के पश्चिमी सीमांतों पर, ठंडी धाराओं के आसन्न क्षेत्र, विशेषतः दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर, यह जलवायु विषुवत् वृत्त की ओर अधिक विस्तृत है और तटीय भाग में पाई जाती है। मध्य अक्षांशों में विषुवत् वृत्त से 35° से 60° उत्तर व दक्षिण के बीच यह जलवायु महाद्वीपों के उन आंतरिक भागों तक परिरूब्द्र होती है जहाँँ पर्वतों से घिरे होने के कारण प्रायः समुद्री आर्द पवनें नहीं पहुँच पातीं।
शुष्क जलवायु को स्टेपी अथवा अर्थ-शुष्क जलवायु (BS) और मरूस्थल जलवायु (BW) में विभाजित किया जाता है। इसे आगे 15° से 35° अक्षांशों के बीच उपोष्ण कटिबंधीय स्टेपी (BSh) और उपोष्ण कटिबंधीय मरूस्थल (BWh) में बाँटा जाता है। 35° और 60° अंक्षाशों के बीच इसे मध्य अक्षांशीय स्टेपी (BSk) तथा मध्य अक्षांशीय मरूस्थल (BWk) मे विभाजित किया जाता है।
उपोष्ण कटिबंधीय स्टेपी (BSh) एवं उपोष्ण कटिबंधीय मरूस्थल (BWh) जलवायु
उपोष्ण कटिबंधीय स्टेपी (BSh) एवं उपोष्ण कटिबंधीय मरूस्थल (BWh) जलवायु में वर्षण और तापमान के लक्षण एक समान होते हैं। आद्र एंव शुष्क जलवायु के संक्रमण क्षेत्र में अवस्थित होने के कारण उपोष्ण कटिबंधीय स्टेपी जलवायु में मरूस्थल जलवायु की अपेक्षा वर्षा थोड़ी ज्यादा होती है जो विरल घासभूमियों के लिए पर्याप्त होती है। वर्षा दोनों ही जलवायु में परिवर्तनशीलता होती है। वर्षा की परिवर्तनशीलता मरूस्थल की अपेक्षा स्टेपी में जीवन को अधिक प्रभावित करती है। इससे कई बार अकाल की स्थिति पैदा हो जाती है। मरूस्थलों में वर्षा थोड़ी किंतु गरज के साथ तीत्र बौछारों के रूप में होती है, जो मृदा में नमी पैदा करने में अप्रभावी सिद्ध होती है। ठंडी धाराओं तापमान लगते तटीय मरूस्थलों में कोहरा एक आम बात है। ग्रीष्मत्रहतु में अधिकतम तापमान बहुत ऊँचा होता है। लीबिया के अल-अजीजिया में 13 सितंबर 1922 को उच्चतम तापमान 58° सेल्सियस दर्ज किया गया था। इस जलवायु में वार्षिक और दैनिक तापांतर भी अधिक पाए जाते हैं।
कोष्ण शीतोष्ण (मध्य अक्षांशीय) जलवायु - C
कोष्ण शीतोष्ण (मध्य अक्षांशीय) जलवायु 30° से 50° अक्षांशों के मध्य मुख्यतः महाद्वीपों के पूर्वी और पश्चिमी सीमांतों पर विस्तृत है। इस जलवायु में सामान्यतः ग्रीष्म ऋहतु कोष्ण और शीत ऋहतु मृदुल होती है। इस जलवायु को चार प्रकारों में वर्गिकृत किया गया हैः (i) आर्द उपोष्ण कटिबंधीय, अर्थात सर्दियों में शुष्क और गर्मियों में उष्ण (Cwa) (ii) भूमध्यसागरीय (Cs) (iii) आर्द उपोष्ण कटिबंधीय अर्थात् शुष्क ऋहतु की अनुपस्थिति तथा मृदु शीत ऋहतु (Cfa) (iv) समुद्री पश्चिम तटीय जलवायु (Cfb)।
आद्र उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु (Cwa)
आर्द उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु कर्क एवं मकर रेखा से धुवों की ओर मुख्यतः भारत के उत्तरी मैदान और दक्षिणी चीन के आंतरिक मैदानों में पाई जाती है। यह जलवायु Aw जलवायु जैसी ही है, केवल इतना अपवाद है कि इसमे सर्दियों का तापमान कोष्ण होता है।
भूमध्यसागरीय जलवायु (Cs)
जैसा कि नाम से स्पष्ट है भूमध्य सागरीय जलवायु भूमध्य सागर के चारों ओर तथा उपोष्ण कटिबंध से 30° से 40° अक्षांशों के बीच महाद्वीपों के पश्चिमी तट के साथ-साथ पाई जाती है। मध्य केलिफोर्निया, मध्य चिली तथा आस्ट्रेलिया के दक्षिण-पूर्वी और दक्षिण-पश्चिमी तट इसके उदाहरण हैं। ये क्षेत्र ग्रीष्म ऋष्टु में उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब तथा शीत ऋष्टु में पछुआ पवनों के प्रभाव में आ जाते हैं। इस प्रकार उष्ण व शुष्क गर्मियाँँ तथा मृदु एवं वर्षयुक्त सर्दियाँँ इस जलवायु की विशेषताएँ हैं। ग्रीष्म ऋष्टु में औसत मासिक तापमान 25° सेल्सियस के आस-पास तथा शीत ऋष्टु में 10° सेल्सियस से कम रहता है। वार्षिक वर्षा 35 से 90 से.मी. के बीच होता है।
आद्र उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु (Cfa)
आद्र उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु उपोष्ण कटिबंधीय अक्षांशों में महाद्वीपों के पूर्वी भागों में पाई जाती है। इस प्रदेश में वायुराशियाँ प्रायः अस्थिर रहती हैं और पूरे वर्ष वर्षा करती हैं। यह जलवायु पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, दक्षिणी तथा पूर्वी चीन, दक्षिणी जापान, उत्तर-पूर्वी अर्जेटीना, तटीय दक्षिण अफ्रीका और आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर पाई जाती है। औसत वार्षिक वर्षा 75 से 150 से.मी. के बीच रहती है। ग्रीष्म क्रहतु में तड़ितझंझा और शीतक्रहतु में वाताग्री वर्षण सामान्य विशेषताएँ हैं। ग्रीष्म क्रहतु में औसत मासिक तापमान लगभग 27° सेल्सियस होता है जबकि जाड़ों में यह 5° से 12° सेल्सियस के बीच रहता है। दैनिक तापातर बहुत कम होता है।
समुद्री पश्चिम तटीय जलवायु (Cfb)
समुद्री पश्चिम तटीय जलवायु महाद्रीपों के पश्चिमी तटों पर भूमध्य सागरीय जलवायु से धुवों की ओर पाई जाती है। इस जलवायु के प्रमुख क्षेत्र हैं - उत्तर-पश्चिमी यूरोप, उत्तरी अमेरिका का पश्चिमी तट, उत्तरी केलिफोर्निया, दक्षिण चिली, दक्षिण-पूर्वी आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड। यहाँ समुद्री प्रभाव के कारण तापमान मध्यम होते हैं और शीत ऋष्टु में अपने अक्षांशों की तुलना में कोष्ण होते हैं। गर्मा के महीनों में औसत तापमान 15° से 20° सेल्सियस और सर्दियों में 4° से 10° सेल्सियस के बीच रहता है। वार्षिक और दैनिक तापांतर कम पाया जाता है। वर्षण साल भर होती है लेकिन यह सर्दियों में अधिक होती है। वर्षण 50 से.मी. से 250 से.मी. के बीच घटती बढ़ती रहती है।
शीत हिम-वन जलवायु (D)
शीत हिम-वन जलवायु उत्तरी गोलाद्ध में 40° से 70° अक्षांशों के बीच यूरोप, एशिया और उत्तर अमेरिका के विस्तृत महाद्रीपीय क्षेंत्रों में पाई जाती है। शीत हिम वन जलवायु को दो प्रकारों में विभक्त किया जाता हैः (i) Df आर्द जाड़ों से युक्त ठंडी जलवायु और (ii) Dw शुष्क जाड़ों से युक्त ठंडी जलवायु उच्च अक्षांशों में सर्दी की उग्रता अधिक मुखर होती है।
आद्र जाड़ों से युक्त ठंडी जलवायु (Df)
आर्द जाड़ों से युक्त ठंडी जलवायु समुद्री पश्चिम तटीय जलवायु और मध्य अक्षांशीय स्टैपी जलवायु से धुवों की ओर पाई जाती है। जाड़े ठंडे और बफर्ले होते हैं। तुषार-मुक्त ऋहतु छोटी होती है। वार्षिक तापांतर अधिक होता है। मौसमी परिवर्तन आकस्मिक और अल्पकालिक होते हैं। धुवों की ओर सर्दियाँ अधिक उग्र होती हैं।
शुष्क जाड़ों से युक्त ठंडी जलवायु (DW)
शुष्क जाड़ों से युक्त ठंडी जलवायु मुख्यतः उत्तर-पूर्वी एशिया में पाई जाती है। जाड़ों में प्रतिचक्रवात का स्पष्ट विकास तथा ग्रीष्म ऋहतु में उसका कमजोर पड़ना इस क्षेत्र में पवनों के प्रत्यार्वन की मानसून जैसी दशाएँ उत्पन्न करते हैं। धुवों की और गर्मियों में तापमान कम होते हैं और जाड़ों में तापमान अत्यंत न्यून होती है। कुछ स्थान तो ऐसे भी हैं, जहाँ वर्षा के सात महीने तक तापमान हिमांक बिंदु से कम रहता है। वार्षिक वर्षा कम होती है जो 12 से 15 से.मी. के बीच होती है।
धुवीय जलवायु (E)
धुवीय जलवायु 70° अक्षांश से परे धुवों की ओर पाई जाती है। धुवीय जलवायु दो प्रकार की होती हैः (i) टुण्ड्रा (ET) (ii) हिम टोपी (EF)।
टुण्ड्रा जलवायु (ET)
टुण्ड्रा जलवायु का नाम काई, लाइकान तथा पुष्पी पाद्प जैसे छोटे वनस्पति प्रकारों के आधार पर रखा गया है। यह स्थायी तुषार का प्रदेश है जिसमें अधोभूमि स्थायी रूप से जमी रहती है। लघुवर्धन काल और जलाक्रांति छोटी वनस्पति का ही पोषण कर पाते हैं। ग्रीष्म क्रहतु में टुण्ड्रा प्रदेशों में दिन के प्रकाश की अवधि लंबी होती है।
हिमटोप जलवायु (EF)
हिमटोप जलवायु ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के आंतरिक भागों में पाई जाती है। गर्मियों में भी तापमान हिमांक से नीचे रहता है। इस क्षेत्र में वर्षा थोड़ी मात्रा में होती है। तुषार एवं हिम एकत्रित होती जाती है जिनका बढ़ता हुआ दबाव हिम परतों को विकृत कर देता है। हिम परतों के ये टुकड़े आर्कटिक एवं अंटार्कटिक जल में खिसक कर प्लावी हिम शैलों के रूप में तैरने लगते हैं। अंटार्कटिक में 79° दक्षिण अक्षांश पर “प्लेट्यू स्टेशन” पर भी यही जलवायु पाई जाती है।
जलवायु परिवर्तन
जिस प्रकार की जलवायु का अनुभव हम अब कर रहे हैं वह थोड़े बहुत उतार चढ़ाव के साथ विगत 10 हज्ञार वर्षों से अनुभव की जा रही है। अपने प्रादुर्भांव से ही पृथ्वी ने जलवायु में अनेक परिवर्तन देखे हैं। भूगर्भिक अभिलेखों से हिमयुगों और अंतर-हिमयुगों में क्रमशः परिवर्तन की प्रक्रिया परिलक्षित होती है। भू-आकृतिक लक्षण, विशेषतः ऊँचाईयों तथा उच्च अक्षांशों में हिमानियों के आगे बढ़ने व पीछे हटने के शेष चिह्न प्रदर्शित करते हैं। हिमानी निर्मित झीलों में अवसादों का निक्षेपण उष्ण एवं शीत युगों के होने को उजागर करता है। वृक्षों के तनों में पाए जाने वाले वलय भी आद्र एवं शुष्क युगों की उपस्थिति का संकेत देते हैं। ऐतिहासिक अभिलेख भी जलवायु की अनिश्चितता का वर्णन करते हैं। ये सभी साक्ष्य इंगित करते हैं कि जलवायु परिवर्तन एक प्राकृतिक एवं सतत प्रक्रिया है।
भारत में भी आद्रे एवं शुष्क युग आते जाते रहे हैं। पुरातत्व खोजें दर्शाती हैं कि ईसा से लगभग 8,000 वर्ष पूर्व राजस्थान मरुस्थल की जलवायु आद्रे एवं शीतल थी। ईसा से 3,000 से 1,700 वर्ष पूर्व यहाँ वर्षा अधिक होती थी। लगभग 2,000 से 1,700 वर्ष ईसा पूर्व यह क्षेत्र हड़प्पा संस्कृति का केंद्र था। शुष्क दशाएँ तभी से गहन हुई हैं।
लगभग 50 करोड़ से 30 करोड़ वर्ष पहले भू-वैज्ञानिक काल के कैंब्रियन, आर्डोंविसियन तथा सिल्युरियन युगों में पृथ्वी गर्म थी। प्लीस्टोसीन युगांतर के दौरान हिमयुग और अंतर हिमयुग अवधियाँ रही हैं। अंतिम प्रमुख हिमयुग आज से 18,000 वर्ष पूर्व था। वर्तमान अंतर हिमयुग 10,000 वर्ष पूर्व आरंभ हुआ था।
अभिनव पूर्व काल में जलवायु
सभी कालों में जलवायु परिवर्तन होते रहे हैं। पिछली शताब्दी के 90 के दशक में चरम मौसमी घटनाएँ घटित हुई हैं। 1990 के दशक में शताब्दी का सबसे गर्म तापमान और विश्व में सबसे भयंकर बाढाँं को दर्ज किया है। सहारा मरुस्थल के दक्षिण में स्थित साहेल प्रदेश में 1967 से 1977 के दौरान आया विनाशकारी सूखा ऐसा ही एक परिवर्तन था। 1930 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका के बृहत मैदान के दक्षिण-पश्चिमी भाग में, जिसे ‘धूल का कटोरा’ कहा जाता है, भीषण सूखा पड़ा। फसलों की उपज अथवा फसलों के विनाश, बाढाँं तथा लोगों के प्रवास संबंधी ऐतिहासिक अभिलेख परिवर्तनशील जलवायु के प्रभावों के बारे में बताते हैं। यूरोप अनेकों बार उष्ण, आद्र, शीत एवं शुष्क युगों से गुजरा है। इनमें से महत्वपूर्ण प्रसंग 10 बीं और 11 बीं शताब्दी की उष्ण एवं शुष्क दशाओं का है, जिनमें वाइकिंग कबीले ग्रीनलैंड में जा बसे थे। यूरोप ने सन् 1550 से सन् 1850 के दौरान लघु हिम युग का अनुभव किया है। 1885 से 1940 तक विश्व के तापमान में वृद्धि की प्रवृत्ति पाई गई है। 1940 के बाद तापमान में वृद्धि की दर घटी है।
जलवायु परिवर्तन के कारण
जलवायु परिवर्तन के अनेक कारण हैं। इन्हें खगोलीय और पार्थिव कारणों में वर्गीकृत किया जा सकता है। खगोलीय कारणों का सबंध सौर कलंकों की गतिविधियों से उत्पन्न सौर्थिक निर्गत ऊर्जा में परिवर्तन से है। सौर कलंक सूर्थ पर काले धब्बे होते हैं, जो एक चक्रीय, ढंग से घटते-बढ़ते रहते हैं। कुछ मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार सौर कलंकों की संख्या बढ़ने पर मौसम ठंडा और आद्र हो जाता है और तूफानों की संख्या बढ़ जाती है। सौर कलंकों की संख्या घटने से उष्ण एवं शुष्क दशाएँ उत्पन्न होती हैं यद्यपि ये खोजें ऑँकड़ों की दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं हैं।
एक अन्य खगोलीय सिद्धांत ‘मिलैंकोविच दोलन’ है, जो सूर्य के चारों ओर पृथ्वी के कक्षीय लक्षणों में बदलाव के चक्रों, पृथ्वी की डगमगाहट तथा पृथ्वी के अक्षीय झुकाव में परिवर्तनों के बारे में अनुमान लगाता है। ये सभी कारक सूर्य से प्राप्त होने वाले सूर्यातप में परिवर्तन ला देते हैं। जिसका प्रभाव जलवायु पर पड़ता है।
ज्वालामुखी क्रिया जलवायु परिवर्तन का एक अन्य कारण है। ज्वालामुखी उद्भेदन वायुमंडल में बड़ी मात्रा में ऐैरोसोल फेंक देता है। ये ऐैरोसोल लंबे समय तक वायुमंडल में विद्यमान रहते हैं और पृथ्वी की सतह पर पहुँचने वाले सौर्थिक विकिरण को कम कर देते हैं। हाल ही में हुए पिनाटोबा तथा एल सियोल ज्वालामुखी उद्भेदनों के बाद पृथ्वी का औसत तापमान कुछ हद तक गिर गया था।
जलवायु पर पड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण मानवोद्भवी कारण वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों का बढ़ता सांद्रण है। इससे भूमंडलीय ऊष्पन हो सकता है।
भूमंडलीय ऊष्मन
ग्रीन हाउस गैसों की उपस्थिति के कारण वायुमंडल एक ग्रीनहाउस की भांति व्यवहार करता है। वायुमंडल प्रवेशी सौर विकिरण का पारेषण भी करता है किंतु पृथ्वी की सतह से ऊपर की और उत्सर्जित होने वाली अधिकतम् दीर्घ तंरगों को अवशोषित कर लेता है। वे गैसें जो विकिरण की दीर्घ तरंगों का अवशोषण करती हैं, ग्रीनहाउस गैसें कहलाती हैं। वायुमंडल का तापन करने वाली प्रक्रियाओं को सामूहिक रूप से ‘ग्रीनहाउस प्रभाव’ (Green house effect) कहा जाता है।
ग्रीनहाउस शब्द का साम्यानुमान उस ग्रीनहाउस से लिया गया है। जिसका उपयोग ठंडे इ्लाकों में ऊष्मा का परिक्षण करने के लिए किया जाता है। ग्रीनहाउस काँच का बना होता है। काँच प्रवेशी सौर विकिरण की लघु तरंगों के लिए पारदर्शीं होता है मगर बहिर्गामी विकिरण की दीर्घ तरंगों के लिए अपारदर्शी। इस प्रकार काँच अधिकाधिक विकिरण को आने देता है और दीर्घ तंरगों वाले विकिरण को काँच घर से बाहर जाने से रोकता है। इससे ग्रीनहाउस इमारत के भीतर बाहर की अपेक्षा तापमान अधिक हो जाता है। जब आप गर्मियों में किसी बंद खिड्कियों वाली कार अथवा बस में प्रवेश करते हैं तो आप बाहर की अपेक्षा अधिक गर्मी अनुभव करते हैं। इसी प्रकार जाड़ों में बंद दरवाजों व खिड्कियों वाला वाहन बाहर की अपेक्षा गर्म रहता है। यह ग्रीनहाउस प्रभाव का एक अन्य उदाहरण है।
ग्रीनहाउस गैसें (GHGs)
वर्तमान में चिंता का कारण बनी मुख्य ग्रीनहाउस गैसें कार्बन डाईऑक्साइड (CO₂) क्लोरो-फ्लोरोकार्बन्स (CFCs), मीथेन (CH₄) नाइट्रस ऑक्साईड (N₂O) और ओज्जोन (O₃) हैं। कुछ अन्य गैसें जैसे नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) और कार्बन मोनोक्साइड (CO) आसानी से ग्रीनहाउस गैसों से प्रतिक्रिया करती हैं और वायुमंडल में उनके सांद्रण को प्रभावित करती हैं। किसी भी ग्रीनहाउस गैस का प्रभाव इसके सांद्रण में वृद्धि के परिमाण, वायुमंडल में इसके जीवन काल तथा इसके द्वारा अवशोषित विकिरण की तरंग लंबाई पर निर्भर करता है। क्लोरो-फ्लोरोकार्बन अत्यधिक प्रभावी होते हैं। समताप मंडल में पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करने वाली ओज्जोन जब निम्न समताप मंडल में उपस्थित होती है, तो वह पार्थिव विकिरण को अत्यंत प्रभावी छंग से अवशोषित करती है। एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ग्रीनहाउस गैसों के अणु जितने लंबे समय तक बने रहते हैं इनके द्वारा लाए गए परिवर्तनों से पृथ्वी के वायुमंडलीय तंत्र को उबरने में उतना अधिक समय लगता है। वायुमंडल में उपस्थित ग्रीनहाउस गैसों में सबसे अधिक सांद्रण कार्बन डाईऑक्साइड का है। CO₂ का उत्सर्जन मुख्यतः जीवाश्मी ईंधनों (तेल, गैस एंव कोयला) के दहन से होता है। वन और महासागर कार्बन डाईऑक्साइड के कुंड होते हैं। वन अपनी वृद्धि के लिए CO₂ का उपयोग करते हैं। अतः भूमि उपयोग में परिवर्तनों के कारण की गई जंगलों की कटाई भी CO₂ की मात्रा बढ़ाती है। अपने स्रोतों में हुए परिवर्तनों से समंजित करने के लिए CO₂ को 20 से 50 वर्ष लग जाते हैं। यह लगभग 0.5 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रही है। जलवायवी माँडलों में जलवायु में होने वाले परिवर्तनों का आंकलन CO₂ की मात्रा को पूर्व औद्योगिक स्तर से दुगुना करके किया जाता है।
क्लोरो-फ्लोरोकार्बन मानवीय गतिविधियों से पैदा होते है। ओज्ञोन समताप मंडल में उपस्थित होती है, जहाँ पराबैंगनी किरणों ऑक्सीजन को ओज्ञोन में बदल देती है। इससे पराबैंगनी किरणों पृथ्वी की सतह पर नहीं पहुँच पाती। समताप मंडल में वाहित होने वाली ग्रीनहाउस गैसें भी ओज्ञोन को नष्ट करती हैं। ओज्ञोन का सबसे अधिक हास अंटार्कटिका के ऊपर हुआ है। समताप मंडल में ओज्ञोन के सांद्रण का हास ओज्ञोन छिंद्र कहलाता है। यह छिंद्र पराबैंगनी किरणों को क्षोभमंडल से गुज्ञरने देता है।
वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए अंतरीष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किए गए है। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण 'क्योटो प्रोटोकॉल' है जिसकी उद्धोषणा सन् 1997 में की गई थी। सन् 2005 में प्रभावी हुई इस उद्धोषणा का 141 देशों ने अनुमोदन किया है क्योटो प्रोटोकॉल ने 35 औद्योगिक राष्ट्रीं को
Greenhouse gases rising alarmingly
Ancient Air Bubbles Buried In Antarctic Ice To Shed More Light On Global Warming
It has happened in the North Atlantic and may happen again. According to scientists, global warming could lead to prolonged chill

cometh
Air pollution biggest killer Southeast Asia, says WH
A smoky haze that Ashrouded parts of Southeast Asia this month, forcing schools and busi- nesses to close, is just one ele- ment of an air pollution problem that kills hundreds of thousands of people in the region annually, the World Health Organisation said.
Air pollution in major Southeast Asian and Chinese cities ranks among the worst in the world and contributes to the deaths of about 500,000 people each year, said Michal Krzyzanowski, an air quality specialist at the WHO's European Center for Environment and Health in Bonn. Drifting smoke from purposely set forest fires in Indonesia caused Malaysia to declare a state of emergency last week in two areas outside Kuala Lumpur. Parts of Thailand were also blanketed in the haze.
Malaysia said hospitals reported a 150% increase in breathing problems and seven people who had a history of respiratory pro portedly died. Th ment could not co smoky air was to Worldwide, air contributes to so deaths each year. gency in Malaysia after two days. But ogists are predict cloud will hover of Malaysia and Singapore.
The haze, blame dry-season burn in land on Sumatra is annual problem.

the Euro ce Corin publishe nce. perts no research
did not get as far as humans have," said Richard B Alley, a geosciences professor at Pennsylvania State University who is an expert on ice cores. "We're changing the world really hugely - way past where it's been for a long time."
James White, a geology professor at the University of Colorado, Boulder, not involved with the study, said that although the ice-age evidence showed that levels of carbon dioxide and the other greenhouse gases rose and fell in response to warming and cooling, the gases could clearly take the lead as well.

Gangotri is shrinking 23m every year
Geneva: Himalayan glaciers, including the Gangotri, are receding at among the fastest rates in the world due to global warming, threatening water shortages for millions of people in India, China and Nepal, a leading conservation group said on Monday.
The Worldwide Fund for Nature (WWF) said in a new study that Himalayan glaciers were receding 10-15 metres per year on average and that the rate was accelerating as global warming increases.
In India, the Gangotri glacier is receding at an average rate of 23 metres per year, the study said.
"Himalayan glaciers are among the fastest retreating glaciers globally due to the effects of global warming," the WWF said in a statement. "This will eventually result in water shortages for hundreds of millions of people who rely on glacier-dependent rivers in India, China and Nepal," it said.

Himalayan glaciers feed seven of Asia's greatest rivers - Ganga, Indus, Brahmaputra, Salween, Mekong, Yangtze and Huang He
"The rapid glacial change in the last 13 years since winter temperatures in the WWF's programme, this situation is a water level- meaning of them." "The data Point To Break And Iceless Future ing Arctic could act global weather e • Webminutes: Changes in the past 13 years since winter temperatures in the WWF's programme, which are also expected to be increased by 2007. The data point was taken on T. A. (1984) and the data point was taken on T. A. (1985) and the data point was taken on T. A. (1986). The data point was taken on T. A. (1987) and the data point was taken on T. A. (1988) and the data point was taken on T. A. (1989) and the data point was taken on T. A. (1990) and the data point was taken on T. A. (1991) and the data point was taken on T. A. (1992) and the data point was taken on T. A. (1993) and the data point was taken on T. A. (1994) and the data point was taken on T. A. (1995) and the data point was taken on T. A. (1996) and the data point was taken on T. A. (1997) and the data point was taken on T. A. (1998) and the data point was taken on T. A. (1999) and the data point was taken on T. A. (2000) and the data point was taken on T. A. (2001) and the data point was taken on T. A. (2002) and the data point was taken on T. A. (2003) and the data point was taken on T. A. (2004) and the data point was taken on T. A. (2005) and the data point was taken on T. A. (2006) and the data point was taken on T. A. (2007) and the data point was taken on T. A. (2008) and the data point was taken on T. A. (2009) and the data point was taken on T. A. (2010) and the data point was taken on T. A. (2011) and the data point was taken on T. A. (2012) and the data point was taken on T. A. (2013) and the data point was taken on T. A. (2014) and the data point was taken on T. A. (2015) and the data point was taken on T. A. (2016) and the data point was taken on T. A. (2017) and the data point was taken on T. A. (2018) and the data point was taken on T. A. (2019) and the data point was taken on T. A. (2020) and the data point was taken on T. A. (2021) and the data point was taken on T. A. (2022) and the data point was taken on T. A. (2023) and the data point was taken on T. A. (2024) and the data point was taken on T. A. (2025) and the data point was taken on T. A. (2026) and the data point was taken on T. A. (2027) and the data point was taken on T. A. (2028) and the data point was taken on T. A. (2029) and the data point was taken on T. A. (2030) and the data point was taken on T. A. (2031) and the data point was taken on T. A. (2032) and the data point was taken on T. A. (2033) and the data point was taken on T. A. (2034) and the data point was taken on T. A. (2035) and the data point was taken on T. A. (2036) and the data point was taken on T. A. (2037) and the data point was taken on T. A. (2038) and the data point was taken on T. A. (2039) and the data point was taken on T. A. (2040) and the data point was taken on T. A. (2041) and the data point was taken on T. A. (2042) and the data point was taken on T. A. (2043) and the data point was taken on T. A. (2044) and the data point was taken on T. A. (2045) and the data point was taken on T. A. (2046) and the data point was taken on T. A. (2047) and the data point was taken on T. A. (2048) and the data point was taken on T. A. (2049) and the data point was taken on T. A. (2050) and the data point was taken on T. A. (2051) and the data point was taken on T. A. (2052) and the data point was taken on T. A. (2053) and the data point was taken on T. A. (2054) and the data point was taken on T. A. (2055) and the data point was taken on T. A. (2056) and the data point was taken on T. A. (2057) and the data point was taken on T. A. (2058) and the data point was taken on T. A. (2059) and the data point was taken on T. A. (2060) and the data point was taken on T. A. (2061) and the data point was taken on T. A. (2062) and the data point was taken on T. A. (2063) and the data point was taken on T. A. (2064) and the data point was taken on T. A. (2065) and the data point was taken on T. A. (2066) and the data point was taken on T. A. (2067) and the data point was taken on T. A. (2068) and the data point was taken on T. A. (2069) and the data point was taken on T. A. (2070) and the data point was taken on T. A. (2071) and the data point was taken on T. A. (2072) and the data point was taken on T. A. (2073) and the data point was taken on T. A. (2074) and the data point was taken on T. A. (2075) and the data point was taken on T. A. (2076) and the data point was taken on T. A. (2077) and the data point was taken on T. A.( )
भूमंडलीय ऊष्मन पर एक व्याख्यात्मक
टिप्पणी लिखें।
परिबढ़ किया कि वे सन् 1990 के उत्सर्जन स्तर में वर्ष 2012 तक 5 प्रतिशत की कमी लायें।
वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों के सांद्रण में वृद्धि की प्रवृत्ति आगे चलकर पृथ्वी को गर्म कर सकती है। एक बार भूमंडलीय ऊष्मन के आरंभ हो जाने पर इसे उलटना बहुत मुशिकल होगा। भूमंडलीय ऊष्मन का प्रभाव हर जगह एक समान नहीं हो सकता। तथापि भूमंडलीय ऊष्मन के दुष्प्रभाव जीवन पोषक तंत्र को कुप्रभावित कर सकते हैं। हिमटोपियों व हिमनदियों के पिघलने से ऊँचा उठा समुद्री जल का स्तर और समुद्र का ऊष्मीय विस्तार तटीय क्षेत्र के विस्तृत भागों और द्वीपों को आप्लावित कर सकता है। इससे सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न होंगी। विश्व समुदाय के लिए यह गहरी चिंता का एक और विषय है। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने और भूमंडलीय ऊष्मन की प्रवृत्ति को रोकने के लिए प्रयास आरंभ हो चुके है। हमें आशा है कि विश्व समुदाय इस चुनौती का प्रत्युत्तर देगा और एक ऐसी जीवन शैली को अपनाएगा जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संसार रहने के लायक रह सकेगा।
आज भूमंडलीय ऊष्मन विश्व की प्रमुख चिंताओं में से एक है, आइए देखें कि दर्ज तापमानों के आधार पर यह कितना गर्म हो चुका है।
पृथवी के धरातल के निकट वायु का औसत वार्षिक तापमान लगभग 14° सैल्सियस है।
तापमान के बढ़ने की प्रवृत्ति 20वीं शताब्दी में दिखाई दी। 20वीं शताब्दी में सबसे अधिक तापन दो अवधियों में हुआ है-1901-44 और 1977-99। इन दोनों में से प्रत्येक अवधि में भूमंडलीय ऊष्मन 0.4° सेल्सियस बढ़ा है। इन दोनों अवधियों के बीच थोड़ा शीतलन भी हुआ जो उत्तरी गोलार्थ में अधिक चिहित था।
20वीं शताब्दी के अंत में औसत वार्षिक तापमान का वैश्विक अध्ययन 19वीं शताब्दी में दर्ज किए गए तापमान में 0.6° सेल्सियस अधिक था। 1856-2000 के दौरान सबसे गर्म साल अंतिम दशक में दर्ज किया गया था। सन् 1998 संभवतः न केवल 20वीं शताब्दी का बल्क पूरी सहस्फाब्दि का सबसे गर्म वर्ष था।
अभ्यास
1. बहुवैकल्पिक प्रश्न :
(i) कोपेन के A प्रकार की जलवायु के लिए निम्न में से कौन सी दशा अहंक हैं?
(क) सभी महीनों में उच्च वर्षा
(ख) सबसे ठंडे महीने का औसत मासिक तापमान हिमांक बिंदु से अधिक
(ग) सभी महीनों का औसत मासिक तापमान 18° सेल्पियस से अधिक
(घ) सभी महीनों का औसत तापमान 10° सेल्सियस के नीचे
(ii) जलवायु के वर्गीकरण से संबंधित कोपेन की पञ्जति को व्यक्त किया जा सकता है-
(क) अनुप्रयुक्त (ख) व्यवस्थित (ग) जनिक (घ) आनुभविक
(iii) भारतीय प्रायद्वीप के अधिकतर भागों को कोपेन की पढ़ति के अनुसार वर्गीकृत किया जायेगा-
(क) "Af" (ख) "BSh" (ग) "Cfb" (घ) "Am"
(iv) निम्नलिखित में से कौन सा साल विश्व का सबसे गर्म साल माना गया है-
(क) 1990 (ख) 1998 (ग) 1885 (घ) 1950
(v) नीचे लिखे गए चार जलवायु के समूहों में से कौन आर्द दशाओं को प्रदर्शित करता हैं?
(क) A-B-C-E (ख) A-C-D-E (ग) B-C-D-E (घ) A-C-D-F
2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए :
3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए :
परियोजना कार्य
भूमंडलीय जलवायु परिवर्तनों से संबंधित ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ से संबंधित जानकारियाँँ एकत्रित कीजिए।
