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क्या मणिपुर का भारत में विलय दबाव में हुआ था?

This blog pays attention on history of Manipur merger in India and violent dispute between Meitei-Kuki groups.

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Written by Dilip Kumar
Published: 12 October 2026•10 min read
क्या मणिपुर का भारत में विलय दबाव में हुआ था?
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क्या मणिपुर का भारत में विलय दबाव में हुआ था?

उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर लगातार नृजातीय हिंसा से जूझ रहा है. इस हिंसा के मूल में क्या है यह समझना जरूरी हो जाता है. लेकिन जब हम मूल की तलाश में आगे बढ़ते हैं तो मणिपुर के इतिहास और वैधानिक उतार-चढ़ाव को विस्तार से परखने की स्थिति सामने आती है. आज की चर्चा में इस संदर्भ में विस्तार से बात करेंगे. दोस्तों यह चर्चा इसलिए महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि बीते कुछ समय से कुछ मणिपुरी विद्रोही समूह 1949 में मणिपुर के भारत में हुए विलय को लेकर सक्रिय हो गये हैं. सबसे पहले समझते हैं कि वर्तमान में इन समूहों ने क्या पक्ष रखा है.

वर्तमान स्थिति

मणिपुर के सात प्रतिबंधित सशस्त्र संगठनों ने 15 अक्टूबर को 1949 में मणिपुर के भारत में विलय के विरोध में 12 घंटे के बंद का आह्वान किया है। इन संगठनों ने इस दिन को National Black Day  के रूप में मनाने की बात कही है। उनका आरोप है कि 1949 में मणिपुर का भारत में विलय दबाव में कराया गया था और इससे मणिपुर की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान प्रभावित हुई। इन संगठनों में से कुछ मणिपुर को उसके पुराने नाम कांगलेइपाक (Kangleipak) से संबोधित करते हैं। 

ये संगठन दावा करते हैं कि विलय निम्नलिखित दस्तावेजों के सिद्धांतों के विरुद्ध था।

  • संयुक्त राष्ट्र चार्टर (UN Charter): अंतरराष्ट्रीय शांति, देशों की संप्रभु समानता और लोगों के आत्मनिर्णय जैसे सिद्धांतों से संबंधित।
  • वियना कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ ट्रीटीज: अंतरराष्ट्रीय संधियों से संबंधित नियमों का प्रमुख दस्तावेज।
  • मणिपुर राज्य संविधान अधिनियम , 1947: मणिपुर के तत्कालीन संवैधानिक ढांचे से संबंधित कानून।
  • भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम , 1947: ब्रिटिश भारत में सत्ता हस्तांतरण और भारत-पाकिस्तान के गठन से संबंधित ब्रिटिश कानून।

लेकिन केवल इन दस्तावेजों का उल्लेख कर देने से उनका दावा कानूनी रूप से सिद्ध नहीं हो जाता। इसके लिए विलय समझौते, उस समय के कानूनों और संबंधित ऐतिहासिक परिस्थितियों का स्वतंत्र अध्ययन जरुरी है।

दोस्तों, मणिपुर का भारत में विलय की कहानी समझने के लिए इसके इतिहास की बारीकी को जान लेते हैं.

क्या है मणिपुर का इतिहास?

समाजशास्त्री ए. बिमल अकोइजम के मुताबिक  "मणिपुरियों की 'राष्ट्र' के रूप में पहचान ईसा की पहली शताब्दी से ही मैतेई साम्राज्य और उसके राज्य की पृष्ठभूमि में विकसित हुई।" मणिपुर के शाही इतिहास ग्रंथ चेइथारोल कुम्बाबा में मैतेई साम्राज्य कांगलेइपाक की उत्पत्ति 33 ईस्वी में मानी जाती है। मैतेई साम्राज्य पर 1955 तक मांगंग समूह ( Mangang clan) के निंगथौजा राजवंश के राजाओं का शासन रहा। 

1891 में, मणिपुर ब्रिटिश राज के अधीन एक रियासत बन गया, जिस पर मैतेई राजघराने का शासन केवल प्रतीकात्मक था, जबकि प्रशासनिक शक्ति अंग्रेजों के हाथों में थी। इस ऐतिहासिक संदर्भ में मणिपुरी पहचान विकसित हुई, जिसे 20वीं शताब्दी के आरंभ में अंग्रेजों और तत्कालीन महाराजा चुराचंद के निरंकुश शासन के विरुद्ध संघर्ष के माध्यम से और अधिक मजबूत किया गया, जो राज्य के लिए संघर्ष के रूप में प्रकट हुआ। 

इस काल में कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और समाजवादी क्रांतिकारी हिजाम इरावत ने 1946 में लोंगजाम बिमोल के साथ मिलकर प्रजा संघ राजनीतिक दल का गठन किया. इसका उद्देश्य संसद, संविधान और मंत्रिमंडल सहित एक स्वतंत्र मणिपुर की मांग करना था। परिणामस्वरूप, मणिपुर राज्य संविधान अधिनियम 27 जून, 1947 को अधिनियमित किया गया। यह ब्रिटिश शासन की समाप्ति के तुरंत बाद लागू हुआ। अधिनियम के प्रावधानों के तहत, 1948 में विधानसभा चुनाव हुए। "यह भारत में वयस्क मताधिकार पर आधारित पहला चुनाव था।"

अब जानते हैं कि मणिपुर का भारत में विलय कैसे हुआ था? 

इसे तिथिवार समझा सकता है:

15 अगस्त , 1947: भारत स्वतंत्र हुआ; मणिपुर एक रियासत था। महाराजा बोधचंद्र सिंह इसके शासक थे।

1948: निर्वाचित विधानसभा बनी. मणिपुर में संविधान के अंतर्गत चुनाव हुए और एक निर्वाचित विधानसभा बनी। इससे वहाँ लोकतांत्रिक शासन की शुरुआत हुई। 

उस समय की विपक्षी पार्टी मणिपुर कांग्रेस मणिपुर के संविधान की विरोधी थी और उसने भारत में इसके विलय के लिए आंदोलन शुरू किया। वहीं, इरावत और महाराजा दोनों ही इस विलय के घोर विरोधी थे।

23 मार्च, 1949: विलय के प्रश्न पर विवाद चरम पर पहुंच गया.  प्रजा शांति पार्टी ने मणिपुर की जनता की ओर से तत्कालीन असम के राज्यपाल श्री प्रकाश को एक ज्ञापन भेजा, जिसकी प्रतियाँ तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भी भेजी गईं, जिसमें भारत के साथ प्रस्तावित विलय के प्रति असहमति व्यक्त की गई थी।

नोट: उस समय असम के राज्यपाल का पूर्वोत्तर क्षेत्र के प्रशासनिक और राजनीतिक मामलों में महत्वपूर्ण संपर्क था। इसलिए मणिपुर के मामले में अपनी बात रखने के लिए उन्हें ज्ञापन भेजा गया था। 

महाराजा ने अपने मंत्रिपरिषद से परामर्श किए बिना समझौते पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उन्हें तुरंत नजरबंद कर दिया गया। इम्फाल निवासी लेखक वांगम सोमरजीत कहते हैं, "उसी समय इम्फाल में भारतीय सेना ने राज महल को घेर लिया, टेलीफोन और तार लाइनों पर नियंत्रण कर लिया और महाराजा को उनकी प्रजा से पूरी तरह अलग कर दिया।"

21 सितंबर 1949: विलय समझौते पर हस्ताक्षर. 

महाराजा बोधचंद्र सिंह ने शिलांग में भारत सरकार के साथ Manipur Merger Agreement पर हस्ताक्षर किए।

15 अक्टूबर 1949: विलय प्रभावी हुआ. मणिपुर का प्रशासन भारत सरकार के अधीन आ गया। बाद में मणिपुर केंद्रशासित क्षेत्र बना और 1972 में पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971 द्वारा यह दर्जा दिया गया. भारत सरकार द्वारा उठाया गया पहला कदम मणिपुर को "भाग ग " राज्य, या केंद्र शासित प्रदेश के रूप में पुनर्वर्गीकृत करना और इसे चीफ कमिश्नर के शासन के अधीन लाना था, साथ ही इसकी विधानसभा को भंग करना था।

आगे हमलोग उस सन्दर्भ की चर्चा करते हैं जिसने मणिपुर में हिंसा कि स्थिति को बढ़ावा दिया है.

मैतेई-कुकी विवाद 

मणिपुर में यह विवाद पूर्वोत्तर भारत का एक गंभीर जातीय, सामाजिक, राजनीतिक और सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। मई 2023 में यह विवाद बड़े पैमाने पर हिंसा में बदल गया . मैतेई (Meitei) समुदाय मुख्य रूप से इम्फाल घाटी में रहता है। इस समुदाय में अधिकांश हिन्दू धर्म को मानते हैं.  राज्य की राजनीति और अर्थव्यवस्था में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। वहीं कुकी-जो (Kuki-Zo) समुदाय मुख्य रूप से मणिपुर के पहाड़ी जिलों में रहता है। इस समुदाय के अधिकांश लोग ईसाई हैं। इनकी अपनी भाषाएँ, सांस्कृतिक परंपराएं और सामुदायिक संस्थाएँ हैं। अनुसूचित जनजाति (ST) के रूप में मान्यता प्राप्त समुदायों में कुकी-जो समूहों की विभिन्न जनजातियाँ शामिल हैं। मणिपुर की भौगोलिक स्थिति इस विवाद में महत्त्वपूर्ण हो जाती है. 

दरअसल, मणिपुर को मोटे तौर पर दो भौगोलिक हिस्सों में समझ सकते हैं : पहली , इम्फाल घाटी- राज्य का राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र। मैतेई समुदाय की बड़ी आबादी यहाँ रहती है। विधानसभा की अधिकांश सीटें भी घाटी के क्षेत्रों में हैं। और दूसरा राज्य के बड़े भूभाग में फैले पहाड़ी इलाके, जहाँ कुकी-जो और नागा सहित विभिन्न जनजातीय समुदाय रहते हैं। जनजातीय भूमि और प्रशासन से जुड़े विशेष प्रावधान यहाँ महत्वपूर्ण हैं।

मणिपुर के लगभग 10% क्षेत्र में घाटी और लगभग 90% क्षेत्र में पहाड़ हैं। यह भौगोलिक अंतर भूमि के अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संसाधनों को लेकर विवादों को समझने में मदद करता है।

विवाद की सबसे बड़ी वजहें क्या हैं?

 1. मैतेई समुदाय को ST दर्जा देने की मांग

यह मई 2023 की हिंसा का तत्काल कारण बना। भारतीय संविधान के तहत ST समुदायों को शिक्षा, सरकारी नौकरियों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे क्षेत्रों में विशेष संवैधानिक सुरक्षा तथा आरक्षण से जुड़े लाभ मिल सकते  हैं। मैतेई समुदाय के कुछ संगठनों ने मांग की कि उन्हें भी ST सूची में शामिल किया जाए। उनका तर्क था कि इससे उनकी सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और पैतृक भूमि की सुरक्षा मजबूत होगी।

कुकी-जो समुदाय ने इसका विरोध क्यों किया?

कुकी-जो और अन्य जनजातीय संगठनों को आशंका थी कि मैतेई समुदाय को ST दर्जा मिलने पर:

  • सीमित आरक्षित नौकरियों और शैक्षणिक अवसरों पर प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
  • पहाड़ी क्षेत्रों की जनजातीय भूमि और संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है।
  • पहले से राजनीतिक रूप से प्रभावशाली समुदाय को अतिरिक्त लाभ मिल सकता है।

अप्रैल 2023 में मणिपुर हाईकोर्ट के एक आदेश ने राज्य सरकार से मैतेई समुदाय की ST दर्जे की मांग पर विचार कर सिफारिश भेजने को कहा। इससे जनजातीय संगठनों का विरोध तेज हुआ। 

 2. जमीन और भूमि अधिकार

मणिपुर में पहाड़ी और घाटी क्षेत्रों के भूमि कानूनों और अधिकारों में अंतर है। कई पहाड़ी क्षेत्रों में जनजातीय भूमि की सुरक्षा के लिए विशेष नियम लागू होते हैं। कुकी-जो समुदाय को डर था कि मैतेई समुदाय को ST दर्जा मिलने से इन व्यवस्थाओं पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, ST दर्जे की मांग करने वाले मैतेई संगठनों ने अपनी पैतृक भूमि और सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा को भी प्रमुख तर्क बनाया। इस प्रकार भूमि का सवाल दोनों पक्षों की  चिंताओं से जुड़ा था, हालांकि दोनों की मांगें और उनका कानूनी आधार अलग-अलग थे।

3. राजनीतिक प्रतिनिधित्व

मणिपुर विधानसभा में कुल 60 सीटें हैं, जिनमें से 40 घाटी और 20 पहाड़ी क्षेत्रों में हैं। इससे राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर असमानता की भावना पैदा हो सकती है। मैतेई समुदाय की राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका है,  जबकि पहाड़ी जनजातीय समुदाय अपनी भूमि, प्रशासन और सुरक्षा से जुड़े फैसलों में पर्याप्त भागीदारी चाहते हैं।

4. पहाड़ी क्षेत्रों में बेदखली और आरक्षित वन का विवाद

2022–23 के दौरान मणिपुर सरकार ने कुछ गाँवों को आरक्षित या संरक्षित वन क्षेत्रों में कथित अवैध बसावट बताते हुए कार्रवाई की। सरकार का तर्क था कि वन भूमि की सुरक्षा जरूरी है और कुछ क्षेत्रों में अवैध गतिविधियों की समस्या थी। दूसरी ओर, कुकी समूहों ने आरोप लगाया कि इस कार्रवाई से लंबे समय से रह रहे जनजातीय लोगों के  अधिकार और उनकी आजीविका प्रभावित हुई। इस मुद्दे ने सरकार और कुकी समुदाय के बीच अविश्वास को  बढ़ाया। 

5. नशीले पदार्थों और अवैध खेती का मुद्दा

मणिपुर म्यांमार की सीमा से लगा हुआ है। इस कारण सीमा पार तस्करी और नशीले पदार्थों की समस्या राज्य की सुरक्षा के लिए चुनौती रही है। राज्य सरकार ने कुछ क्षेत्रों में अफीम की अवैध खेती और वन भूमि पर अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई की।

कुछ कुकी संगठनों ने ऐसी कार्रवाइयों को अपने समुदाय के खिलाफ बताया, जबकि सरकार ने इन्हें कानून और पर्यावरण की सुरक्षा से जुड़ा कदम कहा।

इस मुद्दे पर पूरे कुकी समुदाय को नशीले पदार्थों के कारोबार से जोड़ना गलत होगा। किसी समुदाय की पहचान और व्यक्तिगत या संगठित अवैध गतिविधियों में स्पष्ट अंतर करना जरूरी है।

 6. लंबे समय से चला आ रहा अविश्वास

किसी भी जातीय संघर्ष में केवल एक घटना जिम्मेदार नहीं होती। पुराने विवाद, अफवाहें, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, सुरक्षा को लेकर भय और हिंसा के बाद बदले की भावना मिलकर हालात को गंभीर बना सकती हैं।

मणिपुर में भी मई 2023 की घटना से पहले कई मुद्दों पर तनाव था। हिंसा शुरू होने के बाद लोगों का विस्थापन, घरों का जलना, परिवारों का बिछड़ना और अलग-अलग समुदायों के बीच संपर्क कम होना इस अविश्वास को और गहरा करता गया।

इस विवाद को सुलझाने के लिए क्या किया जा सकता है?

  1. संवाद और विश्वास बहाली: मैतेई, कुकी-जो, नागा और अन्य समुदायों के प्रतिनिधियों के बीच नियमित बातचीत होनी चाहिए।
  2. सुरक्षा और न्याय: हिंसा के मामलों की निष्पक्ष जांच, दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और सभी समुदायों के नागरिकों की सुरक्षा जरूरी है।
  3. विस्थापित लोगों का पुनर्वास: प्रभावित परिवारों की सुरक्षित वापसी, घरों का पुनर्निर्माण, आजीविका और बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करनी होगी।
  4. भूमि और संवैधानिक अधिकारों पर स्पष्टता: ST दर्जा, जनजातीय भूमि, आरक्षण और पहाड़ी क्षेत्रों के प्रशासन से जुड़े मुद्दों का समाधान संवैधानिक प्रक्रियाओं के अनुसार होना चाहिए।
  5. अफवाहों पर नियंत्रण: गलत सूचनाओं और भड़काऊ संदेशों को रोकना तथा विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध कराना जरूरी है।
  6. स्थानीय भागीदारी: शांति प्रक्रिया में महिलाओं, युवाओं, नागरिक संगठनों और प्रभावित परिवारों को भी शामिल किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष:

कुल मिलाकर , यह स्पष्ट होता है कि दोनों समुदायों के बीच हिंसक गतिविधियों ने तनाव को बढ़ाया है. इस बीच  मणिपुर में 15 अक्टूबर को प्रस्तावित बंद के पीछे मुख्य मुद्दा 1949 के भारत में विलय की ऐतिहासिक वैधता, महाराजा पर कथित दबाव और मणिपुर की अलग राजनीतिक पहचान से जुड़ाव रखता है। 

Reference:

  1. The Indian Express
  2. The Hindu

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