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केरल का पहला Red List Assessment

Kerala has launched India’s first state-level Ecosystem Red List Assessment. Learn about the IUCN framework, Western Ghats biodiversity, threatened ecosystems

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Written by Dilip Kumar
Published: 15 October 2026•5 min read
केरल का पहला Red List Assessment
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केरल में भारत का पहला Ecosystem Red List Assessment

यह लेख UPSC एवं BPSC परीक्षाओं के दृष्टिकोण से पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी विषय से जुड़ा है. इससे भारत में पारिस्थितिकीय गतिविधियों को समझने में आसानी होगी.

चर्चा में क्यों?

केरल ने अपने प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों की स्थिति का वैज्ञानिक आकलन करने के लिए भारत के किसी राज्य स्तर पर पहली Red List Assessment of Ecosystems (RLE) पहल शुरू की है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि कौन-से जंगल, आर्द्रभूमि, घास के मैदान और तटीय क्षेत्र नष्ट होने या अपना प्राकृतिक स्वरूप खोने के खतरे में हैं। केरल राज्य जैव विविधता बोर्ड (Kerala State Biodiversity Board — KSBB) ने पारिस्थितिकी तंत्रों के जोखिम का आकलन करने के लिए इस परियोजना को महत्त्व दिया है| इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं: भारत में पहली राज्य-स्तरीय पहल: किसी भारतीय राज्य द्वारा Ecosystem Red List Assessment शुरू करने की अग्रणी पहल। अवधि: एक वर्ष की परियोजना। क्षेत्र: केरल के सभी 14 जिलों के पारिस्थितिकी तंत्रों का आकलन। वैज्ञानिक आधार: IUCN की Red List of Ecosystems पद्धति। मुख्य उद्देश्य: पारिस्थितिकी तंत्रों के क्षरण, आवास के विखंडन और उनके पूरी तरह ढहने के जोखिम की पहचान करना। उपयोग: संरक्षण, पारिस्थितिक पुनर्बहाली (Ecological Restoration) और भविष्य की सरकारी योजनाओं के लिए वैज्ञानिक जानकारी जुटाना।

नोट: Red List Assessment वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर यह आकलन करता है कि कोई प्रजाति या पारिस्थितिकी तंत्र कितना खतरे में है।

Ecosystem Red List Assessment यह समझने में मदद करता है कि: जंगल का कितना हिस्सा नष्ट हो चुका है? मिट्टी और पानी की स्थिति कितनी बिगड़ी है? जीवों और उनके आवास के बीच संबंध कितने प्रभावित हुए हैं? भविष्य में पूरा पारिस्थितिकी तंत्र ढहने का कितना जोखिम है? उसे बचाने के लिए कहाँ और किस तरह के उपाय करने चाहिए?

IUCN यानी International Union for Conservation of Nature ने इसके लिए एक वैज्ञानिक ढाँचा विकसित किया है, जिसे Red List of Ecosystems (RLE) कहा जाता है। यह स्थलीय, मीठे पानी और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों का अलग-अलग स्तरों पर आकलन कर सकता है।

उलेखनीय है कि केरल में पश्चिमी घाट, सदाबहार वन, नदियों के किनारे के जंगल, दलदली क्षेत्र, ऊँचाई वाले घास के मैदान और मैंग्रोव जैसे महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र हैं। लेकिन बाँध निर्माण, शहरीकरण, भूमि उपयोग में बदलाव, बाहरी आक्रामक प्रजातियाँ और जलवायु परिवर्तन इनके लिए खतरा बन रहे हैं। केरल में उपस्थित कुछ महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों की चर्चा निम्नलिखित आधारों पर की जा सकती है जो हाल के समय में संकट से जूझ रहे हैं. उष्णकटिबंधीय नदी-तटीय सदाबहार वन (Tropical Riparian Evergreen Forests): पिछले लगभग 100 वर्षों में इनके क्षेत्रफल में करीब 83% की कमी बताई गई है। मौजूदा दबाव जारी रहने पर इनके अगले 20–40 वर्षों में गंभीर रूप से ढहने का खतरा है।

मिरिस्टिका दलदल (Myristica Swamps): दुर्लभ और विशेष प्रकार के दलदली वन, जो जैव विविधता और जल संरक्षण के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

शोला-घासभूमि क्षेत्र (Shola-Grassland Mosaics): पश्चिमी घाट के ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले छोटे सदाबहार वन और घासभूमि का मिश्रित तंत्र।

तटीय मैंग्रोव (Coastal Mangroves): समुद्री तटों को कटाव से बचाने और अनेक जीवों को आवास देने वाले वन।

मिरिस्टिका दलदल (Myristica Swamps): Myristica Swamps पश्चिमी घाट में पाए जाने वाले मीठे पानी से भरे, दलदली जंगल हैं। ये बहुत प्राचीन और जैव-विविधता से भरपूर पारिस्थितिकी तंत्र हैं। भारत में ये मुख्य रूप से केरल और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में पाए जाते हैं। उल्लेखनीय है कि Myristica पौधों के एक वंश (genus) का वैज्ञानिक नाम है।

पारिस्थितिकी तंत्र का आकलन कैसे किया जाएगा?

इस परियोजना में वैज्ञानिकों को यह समझना होगा कि प्राकृतिक आवास कहाँ हैं, उनमें कितना बदलाव आया है और उनके नष्ट होने का जोखिम कितना है। इसके लिए IUCN Red List of Ecosystems के वैज्ञानिक मानदंडों का उपयोग किया जाएगा। इस आकलन में पाँच प्रमुख प्रकार के जोखिम देखे जाते हैं:

1. भौगोलिक क्षेत्र में कमी: क्या जंगल, आर्द्रभूमि या घासभूमि का क्षेत्रफल लगातार घट रहा है?

2. सीमित भौगोलिक वितरण: क्या पारिस्थितिकी तंत्र बहुत छोटे या सीमित क्षेत्र में ही बचा है, जिससे वह किसी बड़े खतरे के प्रति अधिक संवेदनशील हो गया है?

3. पर्यावरणीय क्षरण: क्या मिट्टी, पानी, वनस्पति या अन्य प्राकृतिक घटकों की गुणवत्ता बिगड़ रही है?

4. प्राकृतिक प्रक्रियाओं में बाधा: क्या भोजन शृंखला, पोषक तत्त्वों का चक्र, जल व्यवस्था या जीवों के बीच संबंध प्रभावित हो रहे हैं?

5. भविष्य में ध्वस्त होने का जोखिम: उपलब्ध वैज्ञानिक आँकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि पूरा पारिस्थितिकी तंत्र भविष्य में कितनी गंभीर स्थिति में पहुँच सकता है। इन मानदंडों से मिले निष्कर्षों के आधार पर संरक्षण की प्राथमिकताएँ तय की जा सकती हैं।

परियोजना से निम्नलिखित परिणाम प्राप्त करने की योजना है: Ecosystem Risk Register: उन पारिस्थितिकी तंत्रों का व्यवस्थित रिकॉर्ड जो संकट में हैं। Ecosystem Typology Atlas: राज्य के विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्रों का वर्गीकरण और मानचित्रण। Restoration Priority Maps: ऐसे क्षेत्रों के नक्शे जहाँ प्राकृतिक आवास की बहाली को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। स्थानीय स्तर पर संरक्षण: पंचायतों और Biodiversity Management Committees (BMCs) को अपने क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण की योजना बनाने में सहायता।

केरलम की पहल यह दिखाती है कि जैव विविधता संरक्षण में केवल अलग-अलग जीवों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। उन प्राकृतिक तंत्रों की रक्षा करना भी आवश्यक है जिन पर वे निर्भर हैं। इसके तीन बड़े लाभ हैं: 1. वैज्ञानिक आधार पर नीति निर्माण: किस क्षेत्र को पहले बचाना चाहिए, इसका निर्णय बेहतर आँकड़ों के आधार पर हो सकता है।

2. प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर प्रबंधन: जंगलों, नदियों, आर्द्रभूमियों और तटीय क्षेत्रों के उपयोग की योजना अधिक प्रभावी बन सकती है।

3. दीर्घकालीन संरक्षण: संरक्षण का लक्ष्य केवल तत्काल नुकसान रोकना नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र की प्राकृतिक कार्यप्रणाली को बनाए रखना भी होगा।

Reference: The Hindu

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