भारत का निर्यात रिकॉर्ड 863.1 बिलियन डॉलर तक पहुंचा
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का निर्यात अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया, जो रिकॉर्ड 863.1 बिलियन डॉलर तक रहा। इसमें वस्तु निर्यात 441.8 बिलियन डॉलर और सेवा निर्यात 421.3 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो निर्यात वृद्धि को गति देने में भारत के वस्तु और सेवा सेक्टरों की संयुक्त शक्ति को दर्शाता है। वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने लोकसभा में लिखित उत्तर में यह जानकारी दी है। ऐसा माना जा रहा है कि इसमें मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) की अहम भूमिका रही है, जिनकी वजह से भारतीय कंपनियों को दुनिया के कई बड़े बाजारों तक पहुंच आसान हुई है।
भारत ने वर्तमान में 27 देशों के साथ 15 मुक्त व्यापार समझौते (FTA) लागू किए है। इनमें प्रमुख व्यापार समझौते हाल ही में लागू हुए हैं। भारत-ओमान व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA), भारत-यूएई CEPA, और भारत-ऑस्ट्रेलिया EFTA (ECTA) शामिल हैं। इसके अलावा, भारत ने यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों के साथ एक ऐतिहासिक और अब तक का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार समझौता भी संपन्न किया है।
भारत-यूएई व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) :
भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच हुए व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) का असर साफ दिखाई दे रहा है। यह समझौता 1 मई 2022 से लागू हुआ था और अब तक इसके तहत 4.45 लाख से ज्यादा सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन जारी किए जा चुके हैं। इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में भारतीय निर्यातकों ने यूएई बाजार में मिलने वाली शुल्क रियायतों का फायदा उठाया है। यूएई को भारत से भेजे जाने वाले उत्पादों की विविधता भी बढ़ी है।
भारत-ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौता (ईसीटीए):
भारत-ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौते (ईसीटीए) ने भी निर्यातकों को फायदा पहुंचाया है। इस समझौते के तहत अब तक 2.73 लाख सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन जारी किए गए हैं। समझौता लागू होने से पहले वित्त वर्ष 2020-21 में यह संख्या केवल 1,482 थी. बाद के वर्षों में हर साल औसतन 45,527 सर्टिफिकेट जारी किए गए। ऑस्ट्रेलिया के बाजार में भारतीय उत्पादों की पहुंच भी बढ़ी है।
भारत-मॉरीशस व्यापक आर्थिक सहयोग एवं साझेदारी समझौता (सीईसीपीए):
सीईसीपीए 1 अप्रैल 2021 से लागू हुआ। यह समझौता मॉरीशस में 310 भारतीय उत्पाद श्रेणियों के लिए प्राथमिकतापूर्ण बाजार पहुंच प्रदान करता है और इसमें वस्तुएं, सेवाएं, मूल नियम, सीमा शुल्क प्रक्रियाएं और आर्थिक सहयोग शामिल हैं।
भारत-ओमान व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) :
सीईपीए मूल्य के हिसाब से भारत के ओमान को होने वाले 99.38 प्रतिशत निर्यात को शुल्क-मुक्त पहुँच प्रदान करता है, जिसमें ओमान की 98.08 प्रतिशत टैरिफ लाइनें शामिल हैं। यह खाड़ी क्षेत्र में भारत के सबसे व्यापक बाजार पहुंच समझौतों में से एक है। 1 जून 2026 को इसके लागू होने के बाद से अब तक 783 मूल प्रमाण पत्र जारी किए जा चुके हैं।
भारत और ईएफटीए-टीईपीए:
टीईपीए के तहत, ईएफटीए ने भारत के 99.6 प्रतिशत निर्यात को कवर करने वाली 92.2 प्रतिशत टैरिफ लाइनें प्रदान की हैं। इसमें गैर-कृषि उत्पादों का 100 प्रतिशत और प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों (पीएपी) पर टैरिफ रियायतें शामिल हैं। अक्टूबर 2025 में इसके लागू होने के बाद से, 7885 मूल प्रमाण पत्र जारी किए गए हैं, जो भारतीय निर्यातकों द्वारा टैरिफ रियायतों के प्रभावशाली उपयोग को दर्शाता है।
निर्यात प्रदर्शन की निगरानी के लिए ढ़ांचागत विकास
सरकार ने श्रम प्रधान सेक्टरों सहित सभी सेक्टरों में निर्यात प्रदर्शन की निगरानी के लिए एक व्यापक ढांचा स्थापित किया है, जिसमें वाणिज्य विभाग, विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी), निर्यात संवर्धन परिषदें (ईपीसी), कमोडिटी बोर्ड, संबंधित मंत्रालय, राज्य सरकारें, जिनमें जिले और विदेशों में भारतीय दूतावास शामिल हैं, को शामिल करते हुए एक समग्र सरकारी दृष्टिकोण अपनाया गया है।
वाणिज्य विभाग ने ट्रेड ई-कनेक्ट और ट्रेड इंटेलिजेंस एंड एनालिटिक्स (टीआईए) पोर्टल जैसे व्यापार सुविधा और व्यापार खुफिया प्लेटफार्मों को भी अत्यधिक सुदृढ़ किया है। ट्रेड ई-कनेक्ट एक व्यापक निर्यातक सुविधा मंच के रूप में कार्य करता है, जो बाजार खुफिया जानकारी, शुल्क संबंधी जानकारी, गैर-शुल्क बाधाएं, उत्पत्ति नियमों से संबंधित मार्गदर्शन, क्रेता-विक्रेता जानकारी, व्यापार कार्यक्रम, देश और उत्पाद मार्गदर्शिकाएँ, और एफटीए से संबंधित सलाहकार सेवाएं प्रदान करता है।
इससे निर्यातकों को अवसरों की पहचान करने और भारत के एफटीए के तहत प्राथमिकतापूर्ण बाजार पहुंच का प्रभावी ढंग से उपयोग करने में मदद मिलती है। यह मंच निर्यातकों, विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों और संबंधित सरकारी एजेंसियों के बीच संवाद को भी सुगम बनाता है, जिससे सूचना विषमता कम होती है और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच में सुधार होता है।
टीआईए पोर्टल व्यापक व्यापार विश्लेषण, वस्तु-स्तरीय डेटा, साझेदार देशों की जानकारी और इंटरैक्टिव डैशबोर्ड प्रदान करके इन प्रयासों को पूरा करता है, जिससे डेटा-आधारित नीति निर्माण और निर्यात प्रदर्शन की वास्तविक समय की निगरानी में सहायता मिलती है।
मुक्त व्यापार समझौता (FTA) क्या है?
मुक्त व्यापार समझौता (FTA) दो या दो से अधिक देशों के बीच की गई एक औपचारिक संधि है। इसका उद्देश्य सीमा शुल्क घटाकर और गैर-शुल्क बाधाओं को कम करके वस्तुओं, सेवाओं, निवेश, बौद्धिक संपदा तथा व्यापार से जुड़े विवादों के निपटारे के लिए समान नियम बनाना है। इससे देशों के बीच व्यापार और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा मिलता है।
व्यापार समझौतों के प्रमुख प्रकार
- मुक्त व्यापार समझौता (FTA): सदस्य देश आपस में वस्तुओं (और कभी-कभी सेवाओं) पर शुल्क एवं व्यापार बाधाओं को समाप्त या कम करते हैं, जबकि गैर-सदस्यों के साथ स्वतंत्र व्यापार नीतियाँ बनाए रखते हैं जैसे भारत-ASEAN FTA
- व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA): मुक्त व्यापार समझौते का एक गहन रूप जो न केवल वस्तुओं बल्कि सेवाओं, निवेश, बौद्धिक संपदा, गतिशीलता और नियामक सहयोग को भी शामिल करता है जैसे भारत-UAE CEPA
- व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता (CECA): CEPA के समान है लेकिन अपेक्षाकृत कम व्यापक है तथा प्रतिबद्धताओं वाला है, जिसे प्रायः गहन एकीकरण की दिशा में एक कदम के रूप में देखा जाता है जैसे, भारत-सिंगापुर CECA
- वरीयतापूर्ण व्यापार समझौता (PTA): इसमें देश पूर्ण शुल्क उन्मूलन के बजाय चुनिंदा वस्तुओं पर कम शुल्क की पेशकश करते हैं, जिससे यह एक सीमित और आंशिक व्यापार व्यवस्था बन जाती है जैसे, भारत-दक्षिण एशिया SAFTA
- सीमा शुल्क संघ: सदस्य देश आंतरिक शुल्क समाप्त कर देते हैं और गैर-सदस्य देशों के लिये एक समान बाह्य शुल्क अपनाते हैं, जिसके लिये गहन समन्वय की आवश्यकता होती है जैसे, MERCOUSER
- आर्थिक संघ: यह सबसे एकीकृत रूप है, जिसमें वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी और श्रम की मुक्त आवाजाही के साथ-साथ समन्वित आर्थिक नीतियाँ शामिल होती हैं जैसे, यूरेशियन आर्थिक संघ
भारत में FTAs के समक्ष मुख्य चुनौतियां
बढ़ता व्यापार घाटा- वित्त वर्ष 2025 में संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस और EFTA देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा 50 बिलियन डॉलर से अधिक रहा। आसियान, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ औसत वार्षिक व्यापार घाटा लगभग 62 बिलियन डॉलर है।
दक्षिण एशिया एकमात्र अपवाद है, जिसके साथ भारत का व्यापार अधिशेष 6.7 बिलियन डॉलर से बढ़कर 20 बिलियन डॉलर हो गया है।
टैरिफ में विषमता- FTAs के तहत भारत अपने आयात शुल्क में कटौती करता है, जिससे विदेशी वस्तुएं भारत में सस्ती हो जाती हैं। इसके विपरीत, जिन देशों में पहले से ही शुल्क कम हैं, वहां भारतीय निर्यातकों को बहुत कम लाभ मिलता है।
भारतीय निर्यातकों द्वारा कम उपयोग- भारतीय निर्यातक FTAs का पूरा लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। केवल 20-30% पात्र निर्यात ही इन समझौतों के अधिमान्य प्रावधानों का उपयोग करते हैं। इसका मुख्य कारण 'उत्पत्ति के नियमों' के अनुपालन की उच्च लागत है, जो मिलने वाले शुल्क लाभ से अधिक हो जाती है।
इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर- कच्चे माल पर अधिक शुल्क और उससे बने तैयार माल पर कम शुल्क होने के कारण भारतीय घरेलू विनिर्माताओं की उत्पादन लागत बढ़ जाती है, जिससे वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते हैं।
विनिर्माण का विदेशों में स्थानांतरण- सस्ती उत्पादन लागत और भारतीय बाजार में शुल्क-मुक्त पहुंच के कारण कंपनियां 'मेक इन आसियान, सेल इन इंडिया' की रणनीति अपना रही हैं। इससे भारत का अपना विनिर्माण क्षेत्र प्रभावित हो रहा है।
आगे की राह
प्रशुल्क संरचना की समीक्षा- औद्योगिक कच्चे माल/इनपुट्स पर शुल्क को FTA प्रतिबद्धताओं के साथ संतुलित किया जाना चाहिए, ताकि घरेलू आपूर्ति श्रृंखला मजबूत हो और इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर समाप्त किया जा सके।
अनुपालन को सरल बनाना-भारतीय निर्यातकों के लिए 'उत्पत्ति के नियम' जैसे जटिल FTA प्रावधानों को आसान बनाना चाहिए, ताकि वे इन समझौतों का अधिकतम लाभ उठा सकें।
घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा- 'मेक इन इंडिया' पहल के तहत औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता को और सुदृढ़ करना चाहिए, ताकि भारतीय उत्पाद वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन सकें।
निष्कर्ष
भारत के हाल के मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) वार्ताओं में श्रम-प्रधान सेक्टर प्रमुख प्राथमिकता रहे हैं। संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, ओमान, न्यूजीलैंड और ईएफटीए के साथ संपन्न समझौतों ने संवेदनशील घरेलू सेक्टरों की सुरक्षा के लिए संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए बेहतर बाजार पहुंच सुनिश्चित की है। ये समझौते वस्त्र और परिधान, चमड़ा और जूते, रत्न और आभूषण, समुद्री उत्पाद, कालीन, हस्तशिल्प और कृषि उत्पाद जैसे श्रम-प्रधान सेक्टरों के लिए महत्वपूर्ण निर्यात अवसर प्रदान करते हैं, जबकि संतुलित टैरिफ उदारीकरण और परिवर्तनशील व्यवस्थाओं के माध्यम से संवेदनशील घरेलू क्षेत्रों के लिए पर्याप्त नीतिगत संभावना बनाए रखते हैं। इस संतुलित दृष्टिकोण का उद्देश्य रोजगारोन्मुखी निर्यात को बढ़ावा देना, घरेलू विनिर्माण प्रतिस्पर्धा को मजबूत करना और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में भारत के एकीकरण को गहरा करना है।
BPSC प्रारंभिक परीक्षा (PT) में शामिल राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्व की वर्तमान घटनाएँ और बीपीएससी मुख्य परीक्षा सामान्य अध्ययन- 2 (खंड II - भारतीय और बिहार अर्थव्यवस्था) के अलावा वैश्विक अर्थव्यवस्था के संदर्भ में निबंध लेखन के लिए भी यह टॉपिक प्रासंगिक है।
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