ब्रिक्स : संस्कृति कार्य समूह की बैठक
केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने राज्यसभा में लिखित उत्तर में ब्रिक्स, संस्कृति कार्य समूह की बैठक के बारे में जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि वाराणसी में आयोजित ब्रिक्स संस्कृति कार्य समूह की दूसरी बैठक से निकले सुझाव और विचार-विमर्श ब्रिक्स सदस्य देशों के साथ साझा किए गए हैं।
उल्लेखनीय है कि भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता में 29 से 30 अप्रैल, 2026 और 5 से 6 जून, 2026 को आयोजित ब्रिक्स संस्कृति कार्य समूह (सीडब्ल्यूजी) की पहली और दूसरी बैठकों में बदलते डिजिटल परिवेश में रचनाकारों, कलाकारों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं के अधिकारों और हितों की रक्षा करना था, जिसमें ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच कॉपीराइट संरक्षण, उचित पारिश्रमिक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का नैतिक और जिम्मेदार उपयोग, बौद्धिक संपदा ढांचे को मजबूत करना आदि से संबंधित मुद्दे शामिल थे।
यह आयोजन BRICS फ्रेमवर्क के भीतर सांस्कृतिक कूटनीति के बढ़ते महत्त्व को दर्शाता है और मज़बूत अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को बढ़ावा देने के लिये संस्कृति को एक माध्यम के रूप में रेखांकित करता है।
ब्रिक्स (BRICS) के बारे में
‘BRIC’ शब्द का गठन वर्ष 2001 में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने किया था। उल्लेखनीय है कि औपचारिक समूह के रूप में BRIC की शुरुआत 2006 में G8 आउटरीच शिखर सम्मेलन के दौरान सेंट पीटर्सबर्ग में रूस, भारत और चीन के नेताओं की बैठक से हुई थी।
इस समूह को 2006 में न्यूयॉर्क में UNGA के दौरान BRIC विदेश मंत्रियों की प्रथम बैठक में औपचारिक रूप दिया गया। आधिकारिक रूप से पहला BRIC शिखर सम्मेलन वर्ष 2009 में रूस में आयोजित हुआ।
प्रारंभ में इसे BRIC कहा जाता था, लेकिन 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद इसे BRICS कहा जाने लगा।
वहीं वर्ष 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को BRICS में शामिल किया गया। 2025 में इंडोनेशिया BRICS का नवीनतम सदस्य बना है। वर्तमान में ब्रिक्स (BRICS) में कुल 11 देश शामिल हैं, जिनमें प्रमुख रूप से भारत, चीन और ब्राजील शामिल हैं।
भारत के लिए BRICS का महत्व
रणनीतिक स्वायत्तता का मंच :-BRICS भारत को एक गैर-पश्चिमी बहुपक्षीय मंच देता है। इसके जरिए भारत किसी एक गुट से बंधे बिना अमेरिका, रूस और चीन जैसी सभी बड़ी शक्तियों के साथ जुड़ सकता है।
वैश्विक प्रभाव में वृद्धि :- विस्तार के बाद BRICS अब विश्व की लगभग आधी जनसंख्या और प्रमुख तेल उत्पादकों का प्रतिनिधित्व करता है। इससे भारत को एक अधिक प्रभावशाली आर्थिक और राजनीतिक समूह का हिस्सा बनने का लाभ मिलता है।
वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व :- BRICS के मंच पर भारत स्वयं को वैश्विक दक्षिण की अग्रणी आवाज के रूप में प्रस्तुत करता है।
विकासशील देशों का प्रतिनिधि होने का BRICS का दावा, भारत के "अधिक न्यायसंगत विश्व व्यवस्था" के लक्ष्य के साथ मेल खाता है।
मध्य पूर्व के साथ रणनीतिक जुड़ाव :-सऊदी अरब, ईरान, UAE और मिस्र के जुड़ने से भारत को मिलते हैं: ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी कल्याण, समुद्री सुरक्षा और निवेश सहयोग के नए राजनयिक व आर्थिक अवसर।
बहुपक्षीय सुधारों को बल :- एक बड़ा और मजबूत BRICS, UNSC सुधार की भारत की मांग को वैश्विक समर्थन देता है, जहां भारत स्थायी सदस्यता चाहता है।
चीन के प्रभुत्व का संतुलन :- विस्तारित सदस्यता BRICS में चीन के एकतरफा प्रभुत्व को कम कर सकती है। भारत नए सदस्यों के साथ गठबंधन बनाकर संतुलित एजेंडा चला सकता है और किसी एक देश के वर्चस्व को रोक सकता है।
BRICS के समक्ष मौजूद चुनौतियाँ
आंतरिक भू-राजनीतिक तनाव - भारत-चीन सीमा विवाद जैसे मुद्दे समूह के भीतर द्विपक्षीय विश्वास को कमजोर करते हैं।
शक्ति और प्रभाव में असमानता-चीन की आर्थिक श्रेष्ठता के कारण निर्णय लेने की प्रक्रिया में असंतुलन पैदा होता है।
एकजुट दृष्टिकोण की कमी-BRICS के पास कोई एकीकृत विचारधारा नहीं है। सदस्य केवल "बहुपक्षवाद और विकास" जैसे व्यापक मुद्दों पर सहमत हैं। प्रत्येक देश अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है, जिससे सामूहिक कार्रवाई सीमित हो जाती है।
संस्थागत सीमाएँ - BRICS का कोई स्थायी सचिवालय नहीं है। समन्वय घूर्णन अध्यक्षता पर निर्भर है। शिखर सम्मेलन की घोषणाओं को लागू करने के लिए कोई प्रवर्तन तंत्र नहीं है।
आर्थिक असमानताएँ- सदस्य देश विकास के अलग-अलग चरणों में हैं। इससे समान व्यापार नीतियाँ और आर्थिक लक्ष्य तय करना कठिन होता है।
विस्तार से जुड़ी चुनौतियाँ- नए सदस्यों के जुड़ने से विविधता बढ़ी है, लेकिन इससे समन्वय जटिल हो गया है और समूह के मूल फोकस के कमजोर होने का जोखिम है।
आगे की राह
आर्थिक एकीकरण को गहरा करना- सदस्य देशों के बीच व्यापार और लॉजिस्टिक्स को सरल बनाना, ताकि बाहरी संरक्षणवाद के झटकों को कम किया जा सके।
वैकल्पिक भुगतान तंत्र- SWIFT के विकल्प के रूप में एक क्षेत्रीय भुगतान प्रणाली विकसित करना, जैसा कि पिछले शिखर सम्मेलनों में प्रस्तावित था।
व्यापार साझेदारों का विविधीकरण- अमेरिका पर निर्भरता घटाने के लिए विशेष रूप से वैश्विक दक्षिण में नए बाजार और आपूर्ति श्रृंखलाएँ विकसित करना
दक्षिण-दक्षिण सहयोग- ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और कृषि जैसे क्षेत्रों में सहयोग को प्राथमिकता देना।
निष्कर्ष
BRICS की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह आंतरिक मतभेदों को सुलझाकर एक व्यावहारिक, परिणाम-उन्मुख मंच बनकर उभरे और बहुध्रुवीय विश्व के समक्ष मौजूद चुनौतियों को दूर करने में एक मजबूत साझीदार बने।
ब्रिक्स संस्कृति कार्य समूह की बैठकें मुख्य रूप से बीपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा (PT) के करेंट अफेयर्स और मुख्य परीक्षा (Mains) के सामान्य अध्ययन प्रपत्र-1 से सीधी तौर पर जुड़ा हुआ है।
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