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बायोस्फीयर रिजर्व: प्रकृति और मानव के बीच सेतु

भारत के 18 जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों, UNESCO नेटवर्क, तीन क्षेत्रीय संरचना, सरकारी पहलों, सामुदायिक भागीदारी और जैव विविधता संरक्षण के बारे में जानें।

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Written by Akhilesh Anand
Published: 4 November 2026•7 min read
बायोस्फीयर रिजर्व: प्रकृति और मानव के बीच सेतु
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बायोस्फीयर रिजर्व : प्रकृति और मानव के बीच एक सेतु

UPSC IAS/BPSC | सामान्य अध्ययन पेपर 3 | पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी

चर्चा में क्यों ?

जैव विविधता के संरक्षण और सतत विकास को बढ़ावा देने के महत्त्व को रेखांकित करने के लिए प्रति वर्ष 3 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र दिवस (International Day for Biosphere Reserves) मनाया जाता है।

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के अनुसार, भारत में 18 अधिसूचित जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र हैं, जिनमें से 13 यूनेस्को के विश्व जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र नेटवर्क (World Network of Biosphere Reserves – WNBR) में शामिल हैं। ये आरक्षित क्षेत्र उष्णकटिबंधीय वनों और मैंग्रोव से लेकर प्रवाल भित्तियों तथा उच्च पर्वतीय मरुस्थलों तक विविध पारिस्थितिक तंत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र क्या हैं?

जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserves) विशेष रूप से नामित ऐसे क्षेत्र हैं, जिनका उद्देश्य जैव विविधता का संरक्षण करना और साथ ही स्थानीय समुदायों को सतत आजीविका अपनाने का अवसर प्रदान करना है।

ये प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा करते हैं, आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण करते हैं तथा जैविक संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग को बढ़ावा देते हैं। पारंपरिक संरक्षित क्षेत्रों के विपरीत, ये पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ लोगों की सामाजिक एवं आर्थिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

इस अवधारणा को यूनेस्को के मानव एवं जैवमंडल (Man and the Biosphere – MAB) कार्यक्रम का समर्थन प्राप्त है, जिसे 1971 में शुरू किया गया था। यह कार्यक्रम मानव और प्रकृति के बीच संबंधों को बेहतर बनाकर वैज्ञानिक अनुसंधान तथा सतत विकास को बढ़ावा देता है।

जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों के तीन प्रमुख कार्य

जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र तीन परस्पर संबंधित कार्य करते हैं:

1. संरक्षण (Conservation): जैव विविधता, आनुवंशिक संसाधनों, पारिस्थितिक तंत्रों और प्राकृतिक परिदृश्यों के साथ-साथ सांस्कृतिक विविधता का संरक्षण करना।

2. सतत विकास (Sustainable Development): ऐसी आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना, जो पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार हों और स्थानीय परंपराओं का सम्मान करती हों।

3. वैज्ञानिक सहयोग (Scientific Support): अनुसंधान, पर्यावरणीय निगरानी, शिक्षा, प्रशिक्षण और ज्ञान के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करना।

जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र के तीन क्षेत्र (Zones)

संरक्षण और मानवीय गतिविधियों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र को तीन क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है।

क्षेत्रप्रमुख विशेषताएँ
कोर क्षेत्र (Core Zone)यह पारिस्थितिक तंत्रों, वन्यजीवों और आनुवंशिक विविधता के संरक्षण के लिए पूर्णतः संरक्षित क्षेत्र होता है। यहाँ मानवीय गतिविधियाँ अत्यधिक प्रतिबंधित होती हैं।
बफर क्षेत्र (Buffer Zone)यह कोर क्षेत्र को चारों ओर से घेरता है या उससे सटा होता है। यहाँ अनुसंधान, पर्यावरण शिक्षा और नियंत्रित इको-टूरिज्म जैसी गतिविधियों की अनुमति होती है।
संक्रमण क्षेत्र (Transition Zone)यह सबसे बाहरी क्षेत्र होता है, जहाँ स्थानीय समुदाय रहते हैं और कृषि, वानिकी तथा पर्यटन जैसी सतत गतिविधियाँ करते हैं।

यह क्षेत्रीकरण मॉडल प्रकृति को संरक्षित रखते हुए समुदायों को प्राकृतिक संसाधनों से जिम्मेदारीपूर्वक लाभ प्राप्त करने का अवसर देता है।

भारत के जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र: सभी 18 आरक्षित क्षेत्रों की सूची

भारत विश्व के 17 महा-जैव विविधता वाले देशों (Mega-biodiverse Countries) में से एक है। पृथ्वी के कुल भू-क्षेत्र का केवल 2.4% हिस्सा होने के बावजूद, भारत में विश्व की दर्ज प्रजातियों का लगभग 7–8% पाया जाता है।

इस समृद्ध प्राकृतिक विरासत के संरक्षण के लिए भारत ने 18 जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र स्थापित किए हैं। इनमें से 13 यूनेस्को के विश्व जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र नेटवर्क का हिस्सा हैं।

जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों का वैश्विक नेटवर्क

यूनेस्को के विश्व जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र नेटवर्क में 145 देशों के 797 जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र शामिल हैं।

ये आरक्षित क्षेत्र न केवल जैव विविधता के संरक्षण के लिए महत्त्वपूर्ण हैं, बल्कि स्थानीय समुदायों को सहायता प्रदान करने और जलवायु परिवर्तन के प्रति उनकी अनुकूलन क्षमता मजबूत करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र बनाम राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्यजीव अभयारण्य

हालाँकि तीनों का उद्देश्य जैव विविधता का संरक्षण करना है, लेकिन इनके दृष्टिकोण में अंतर है।

  • राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्यजीव अभयारण्य: मुख्य रूप से वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
  • जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र: जैव विविधता संरक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान और स्थानीय समुदायों के सतत विकास को एक साथ जोड़ने वाला व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हैं।

    इस प्रकार, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र ऐसी जीवंत प्रयोगशालाओं के रूप में कार्य करते हैं, जहाँ संरक्षण और मानव कल्याण एक साथ आगे बढ़ सकते हैं।

जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों के संरक्षण हेतु सरकारी पहल

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय व्यापक योजना प्राकृतिक संसाधनों एवं पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण (Conservation of Natural Resources and Ecosystems) के अंतर्गत जैव विविधता संरक्षण योजना लागू करता है।

प्रमुख विशेषताएँ:

वित्तीय सहायता:स्वीकृत प्रबंधन योजनाओं के तहत संरक्षण एवं विकास गतिविधियों के लिए राज्यों को अनुदान प्रदान किया जाता है।
लागत साझाकरण:अन्य राज्यों के लिए केंद्र और राज्य के बीच वित्तपोषण का अनुपात 60:40 तथा पूर्वोत्तर एवं हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 है।
एकीकृत प्रबंधन योजनाएँ: वर्ष 2022–23 से नंदा देवी, पचमढ़ी, देहांग-दीबांग और अगस्त्यमलाई के लिए पाँच वर्षीय योजनाओं का प्रायोगिक कार्यान्वयन किया गया है।
सामुदायिक भागीदारी: इन योजनाओं के तहत आरक्षित क्षेत्र प्राधिकरणों, अनुसंधान संस्थानों और स्थानीय समुदायों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित किया जाता है, ताकि आवास पुनर्स्थापन, जैव विविधता निगरानी और सतत आजीविका को बढ़ावा मिल सके।

सामुदायिक भागीदारी: एक आक्रामक पौधे को अवसर में बदलना

जब स्थानीय समुदाय केवल लाभार्थी न रहकर संरक्षण प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनते हैं, तो संरक्षण के प्रयास अधिक प्रभावी हो जाते हैं।

इसका एक प्रेरणादायक उदाहरण नीलगिरि जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र से मिलता है, जहाँ आदिवासी समुदाय उखाड़ी गई लैंटाना की लताओं का उपयोग हाथियों की मूर्तियाँ, फर्नीचर और हस्तशिल्प बनाने में करते हैं।

इस पहल के दो प्रमुख उद्देश्य हैं: स्थानीय कारीगरों के लिए आजीविका के अवसर पैदा करना और आक्रामक पौधों की प्रजातियों के प्रति जागरूकता बढ़ाना।

वर्ष 2021 में लैंटाना से बनाई गई 125 आदमकद हाथियों की मूर्तियाँ लंदन में प्रदर्शित की गई थीं, जिससे इस रचनात्मक संरक्षण प्रयास को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।

लैंटाना कैमारा (Lantana camara) क्या है?

लैंटाना कैमारा एक आक्रामक झाड़ी(invasive shrub) है, जो तेजी से फैलती है और घनी झाड़ियों का निर्माण करती है। यह देशज पौधों के साथ प्रतिस्पर्धा करती है, जैव विविधता को कम करती है तथा प्राकृतिक आग के स्वरूप को बदल सकती है। इसे हटाना कठिन होता है, क्योंकि यह तेजी से दोबारा उग आती है।

यह पहल दर्शाती है कि किस प्रकार पर्यावरणीय चुनौती को सामुदायिक भागीदारी और सतत आजीविका के अवसर में बदला जा सकता है।

जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन में चुनौतियाँ

अपने महत्त्व के बावजूद, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है:

  • आवास का क्षरण (Habitat Degradation): वनों की कटाई, बुनियादी ढाँचे का विकास और भूमि उपयोग में बदलाव प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों के लिए खतरा पैदा करते हैं।
  • जलवायु परिवर्तन (Climate Change): बढ़ता तापमान, चरम मौसमी घटनाएँ और वर्षा के बदलते स्वरूप संवेदनशील आवासों को प्रभावित करते हैं।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict): प्राकृतिक आवासों पर बढ़ता दबाव मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष को बढ़ा सकता है।
  • आक्रामक प्रजातियाँ (Invasive Species): लैंटाना कैमारा जैसी प्रजातियाँ देशज वनस्पतियों और पारिस्थितिक संतुलन के लिए खतरा पैदा करती हैं।
  • सीमित सामुदायिक भागीदारी: जब स्थानीय समुदायों को पर्याप्त आजीविका सहायता या निर्णय लेने के अवसर नहीं मिलते, तो संरक्षण के प्रयासों में कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

आगे की राह: संरक्षण को जन-केंद्रित बनाना

वैज्ञानिक अनुसंधान, सामुदायिक भागीदारी और प्रभावी शासन के समन्वय से भारत के जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र सतत विकास के अधिक सशक्त मॉडल बन सकते हैं।

  • आवास पुनर्स्थापन और जैव विविधता की निगरानी को मजबूत करना।
  • स्थानीय समुदायों के लिए सतत पर्यटन और आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देना।
  • पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ जोड़ना।
  • सरकारी एजेंसियों, अनुसंधान संस्थानों और स्थानीय हितधारकों के बीच समन्वय में सुधार करना।
  • जलवायु-अनुकूल संरक्षण रणनीतियों को मजबूत करना और आक्रामक प्रजातियों पर नियंत्रण करना।

निष्कर्ष

जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र यह प्रदर्शित करते हैं कि प्रकृति का संरक्षण मानव विकास की कीमत पर होना आवश्यक नहीं है। ये एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत करते हैं, जिसमें जैव विविधता संरक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान और स्थानीय आजीविका एक-दूसरे को सहयोग प्रदान करते हैं।भारत के 18 जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र केवल संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र नहीं हैं, बल्कि इस बात के जीवंत उदाहरण हैं कि किस प्रकार मानव और प्रकृति एक साथ समृद्ध हो सकते हैं।

Reference:

PIB

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