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Unit8

Panel to study anti-dumping duty on shrimp

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अंतराष्ट्रीय व्यापार

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आप एक ‘तृतीयक क्रियाकलाप’ के रूप में ‘व्यापार’ शब्द से पहले ही परिचित हैं जो आप इस पुस्तक के अध्याय 7 में पढ़ चुके हैं। आप जानते हैं कि व्यापार का तात्पर्य वस्तुओं और सेवाओं के स्वैच्छिक आदान-प्रदान से होता है। व्यापार करने के लिए दो पक्षों का होना आवश्यक है। एक व्यक्ति/पक्ष बेचता है और दूसरा खरीदता है। कुछ स्थानों पर लोग वस्तुओं का विनिमय करते हैं। व्यापार दोनों ही पक्षों के लिए समान रूप से लाभदायक होता है।

व्यापार दो स्तरों पर किया जा सकता है-अंतराष्ट्रीय और राष्ट्रीय। अंतराष्ट्रीय व्यापार विभिन्न राष्ट्रों के बीच राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान को कहते हैं। राष्ट्रों को व्यापार करने की आवश्यकता उन वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए होती है, जिन्हें या तो वे (देश) स्वयं उत्पादित नहीं कर सकते या जिन्हें वे अन्य स्थान से कम दामों में खरीद सकते हैं।

आदिम समाज में व्यापार का आरंभिक स्वरूप ‘विनिमय व्यवस्था’ था, जिसमें वस्तुओं का प्रत्यक्ष आदान-प्रदान होता था अर्थात् वस्तु के बदले में रुपये के स्थान पर वस्तु दी जाती थी। इस व्यवस्था में यदि आप एक कुम्हार होते और आपको एक नलसाज की आवश्यकता होती, तो आपको एक ऐसा नलसाज्ट ढूँढ़ना पड़ता, जिसे आप द्वारा बनाए हुए बर्तनों की आवश्यकता होती और आप उसकी नलसाज्ट की सेवाओं के बदले अपने बर्तन देकर आदान-प्रदान कर सकते थे।

चित्र संख्या 8.1 : जॉन बीलमेला में वस्तुओं का आदान-प्रदान
करती दो महिलाएँ
चित्र संख्या 8.1 : जॉन बीलमेला में वस्तुओं का आदान-प्रदान करती दो महिलाएँ

हर जनवरी में फसल कटाई की ऋष्टु के बाद गुवाहाटी से 35 कि.मी. दूर जागीरॉड में जॉन बील मेला लगता है और संभवतः यह भारत का एकमात्र मेला है, जहाँ विनिमय व्यवस्था आज भी जीवित है। इस मेले के दौरान एक बड़े बाज्ञार की व्यवस्था की जाती है और विभिन्न जनजातियों तथा समुदायों के लोग अपनी वस्तुओं का आदान-प्रदान करते हैं।

रुपये अथवा मुद्रा के आगमन के साथ ही विनिमय व्यवस्था की कठिनाइयों को दूर कर लिया गया। पुराने समय में कागजी व धात्विक मुद्रा के आगमन से पहले उच्च नैजमान मूल्य वाली दुर्लभ वस्तुओं को मुद्रा के रूप में प्रयुक्त किया जाता था जैसे-चकमक पत्थर, आब्सीडियन, (आग्नेय काँँच), काउरी शेल, चीते के पंजे, ह्वेल के दाँँत, कुत्ते के दाँँत, खालें, बाल (फर), मवेशी, चावल, पैपरकार्न, नमक, छोटे यंत्र, ताँबा, चौढी और स्वर्ण।

क्या आप जानते हैं

क्या आप जानते हैं कि ‘सैलेरी’ (Salary) शब्द लैटिन शब्द ‘सैलेरिअम’ (Salarium) से बना है, जिसका अर्थ है नमक के द्वारा भुगतान। क्योंकि उस समय समुद्र के जल से नमक बनाना झात नहीं था और इसे केवल खनिज नमक से बनाया जा सकता था, जो उस समय प्राय : दुर्लभ और खर्चीला था, यही वजह है कि यह भुगतान का एक माध्यम बना।

अंतराष्ट्रीय व्यापार का इतिहास

प्राचीन समय में, लंबी दूरियों तक वस्तुओं का परिवहन जोखिमपूर्ण होता था, इसलिए व्यापार स्थानीय बाज्ञारों तक ही सीमित था। लोग तब अपने संसाधनों का अधिकांश भाग मूलभूत आवश्यकताओं- भोजन और वस्त्र पर खर्च करते थे। केवल धनी लोग ही आभूषण व महँगे परिधान खरीदते थे, और परिणामस्वरूप विलास की वस्तुओं का व्यापार आरंभ हुआ।

रेशम मार्ग लंबी दूरी के व्यापार का एक आरंभिक उदाहरण है, जो 6000 कि.मी. लंबे मार्ग के सहारे रोम को चीन से जोड़ता था। व्यापारी भारत, परशिया (ईरान) और मध्य एशिया के मध्यवर्ती स्थानों से चीन में बने रेशम, रोम की ऊन व बहुमूल्य धातुओं तथा अन्य अनेक महॉंगी वस्तुओं का परिवहन करते थे।

रोमन साम्राज्य के विखंडन के पश्चात् 12वीं और 13वीं शताब्दी के दौरान यूरोपीय वाणिज्य में वृद्धि हुई। समुद्रगामी युढ़पोतों के विकास के साथ ही यूरोप तथा एशिया के बीच व्यापार बढ़ा तथा अमेरिका की खोज हुई।

15वीं शताब्दी से ही यूरोपीय उपनिवेशवाद शुरू हुआ और विदेशी वस्तुओं के साथ व्यापार के साथ ही व्यापार के एक नए स्वरूप का उदय हुआ, जिसे ‘दास व्यापार’ कहा गया। इस अमेरिकन ‘दास नीलामी’ ने दासों की बिक्री अथवा अस्थायी रूप से स्वामियों द्वारा किराये पर लेने हेतु विज्ञापन दिया। खरीदने वाले (क्रेता) प्राय : कुशल व स्वस्थ दास के लिए \$2000 चुकाते थे। ऐसी नीलामियों ने प्राय : परिवार के सदस्यों को एक दूसरे से अलग कर दिया, उनमें से बहुतों ने अपने प्रियजनों को दोबारा नहीं देखा।

चित्र संख्या 8.2 : दासों की नीलामी हेतु विज्ञापन, 1829
चित्र संख्या 8.2 : दासों की नीलामी हेतु विज्ञापन, 1829

पुर्तगालियों, डचों, स्पेनिश लोगों व अंग्रेजों ने अफ्रीकी मूल निवासियों को पकड़ा और उन्हें बलपूर्वक, बागानों में श्रम हेतु नए खोजे गए अमेरीका में परिवहित किया। दास व्यापार दो सौ वर्षों से भी अधिक समय तक एक लाभदायक व्यापार रहा जब तक कि यह 1792 में डेनमार्क में, 1807 में ग्रेट ब्रिटेन में और 1808 में संयुक्त राज्य में पूर्णरूपेण समाप्त नहीं कर दिया गया।

औद्योगिक क्रांति के पश्चात्, कच्चे माल जैसे-अनाज, मांस, ऊन की माँँग भी बढ़ी, लेकिन विनिर्माण की वस्तुओं की तुलना में उनका मौद्रिक मूल्य घट गया।

औद्योगीकृत राष्ट्रों ने कच्चे माल के रूप में प्राथमिक उत्पादों का आयात किया और मूल्यपरक तैयार माल को वापस अनौद्योगीकृत राष्ट्रों को निर्यात कर दिया।

19वीं शताब्दी के उत्तराद्ध में, प्राथमिक वस्तुओं का उत्पादन करने वाले प्रदेश अधिक महत्वपूर्ण नहीं रहे और औद्योगिक राष्ट्र एक दूसरे के मुख्य ग्राहक बन गए।

अंतराष्ट्रीय व्यापार

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प्रथम व द्वितीय विश्व युङ्क के दौरान पहली बार राष्ट्रों ने व्यापार कर और संख्यात्मक प्रतिबंध लगाए। विश्व युङ्क के बाद के समय के दौरान ‘व्यापार व शुल्क हेतु सामान्य समझौता’ (GATT) जैसे संस्थाओं ने (जो कि बाद में विश्व व्यापार संगठन WTO बना) शुल्क को घटाने में सहायता की।

अंतराष्ट्रीय व्यापार अस्तित्व में क्यों है?

अंतर्गष्ट्रीय व्यापार उत्पादन में विशिष्टीकरण का परिणाम है। यह विश्व की अर्थव्यवस्था को लाभान्वित करता है, यदि विभिन्न राष्ट्र वस्तुओं के उत्पादन या सेवाओं की उपलब्धता में श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण को प्रयोग में लाएँ। हर प्रकार का विशिष्टीकरण व्यापार को जन्म दे सकता है। इस प्रकार अंतर्गष्ट्रीय व्यापार वस्तुओं और सेवाओं के तुलनात्मक लाभ, परिपूरकता व हस्तांतरणीयता के सिद्धांतों पर आधारित होता है और सिद्धांततः यह व्यापारिक भागीदारों को समान रूप से लाभदायक होना चाहिए।

आधुनिक समय में व्यापार, विश्व के आर्थिक संगठन का आधार है और यह राष्ट्रों की विदेश नीति से संबंधित है। सुविकसित परिवहन तथा संचार प्रणाली से युक्त कोई भी देश अंतर्गष्ट्रीय व्यापार में भागीदारी से मिलने वाले लाभों को छोड़ने का इच्छुक नहीं है।

अंतराष्ट्रीय व्यापार के आधार

(i) राष्ट्रीय संसाधनों में भिन्नता : भौतिक संरचना जैसे कि भूविज्ञान, उच्चावच, मृदा व जलवायु में भिन्नता के कारण विश्व के राष्ट्रीय संसाधन असमान रूप से विपरीत हैं।

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(क) भौगोलिक संरचना खनिज संसाधन आधार को निर्धारित करती है और धरातलीय विभिन्नताएँ फसलों व पशुओं की विविधता सुनिश्चित करती हैं। निम्न भूमियों में कृषि-संभाव्यता अधिक होती है। पर्वत पर्यटकों को आकर्षित करते हैं और पर्यटन को बढावा देते हैं।
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(ख) खनिज संसाधन संपूर्ण विश्व में असमान रूप से वितरित हैं। खनिज संसाधनों की उपलब्धता औद्योगिक विकास का आधार प्रदान करती है।
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(ग) जलवायु किसी दिए हुए क्षेत्र में जीवित रह जाने वाले पादप व वन्य जात के प्रकार को प्रभावित करती है। यह विभिन्न उत्पादों की विविधता को

भी सुनिश्चित करती है, उदाहरणतः ऊन-उत्पादन ठंडे क्षेत्रों में ही हो सकता है; केला, रबड़ तथा कहवा उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में ही उग सकते हैं।

(ii) जनसंख्या कारक : विभिन्न देशों में जनसंख्या के आकार, वितरण तथा उसकी विविधता व्यापार की गई वस्तुओं के प्रकार और मात्रा को प्रभावित करते हैं।

(क) सांस्कृतिक कारक : विशिष्ट संस्कृतियों में कला तथा हस्तशिल्प के विभिन्न रूप विकसित हुए हैं जिन्हें विश्व-भर में सराहा जाता है। उदाहरणस्वरूप चीन द्वारा उत्पादित उत्तम कोटि का पॉर्सीलिन (चीनी मिट्री का बर्तन) तथा ब्रोकेड (किमखाब-जरीदार या बूटेदार कपड़ा)। ईरान के कालीन प्रसिद्ध हैं, जबकि उत्तरी अफ्रीका का चमड़े का काम और इंडोनेशियाई बटिक (छींट वाला) वस्त्र बहुमूल्य हस्तशिल्प हैं।

(ख) जनसंख्या का आकार : सघन बसाव वाले देशों में आंतरिक व्यापार अधिक है जबकि बाह्य व्यापार कम परिमाण वाला होता है, क्योंकि कृषीय और औद्योगिक उत्पादों का अधिकांश भाग स्थानीय बाज्ञारों में ही खप जाता है। जनसंख्या का जीवन स्तर बेहतर गुणवत्ता वाले आयातित उत्पादों की माँग को निर्धारित करता है क्योंकि निम्न जीवन स्तर के साथ केवल कुछ लोग ही महँगी आयातित वस्तुएँ खरीद पाने में समर्थ होते है।

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(iii) आर्थिक विकास की प्रावस्था : देशों के आर्थिक विकास की विभिन्न अवस्थाओं में व्यापार की गई वस्तुओं का स्वभाव (प्रकार) परिवर्तित हो जाता है। कृषि की दृष्टि से महत्वपूर्ण देशों में, विनिर्माण की वस्तुओं के लिए कृषि उत्पादों का विनिमय किया जाता है, जबकि औद्योगिक राष्ट्र मशीनरी और निर्मित उत्पादों का निर्यात करते हैं तथा खाद्यान्न तथा अन्य कच्चे पदार्थों का आयात करते हैं।
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(iv) विदेशी निवेश की सीमा : विदेशी निवेश विकासशील देशों में व्यापार को बढ़ावा दे सकता है जिनके पास खनन, प्रवेधन ढ्वारा तेल-खनन, भारी अभियाँंत्रिकी, काठ कबाड़ तथा बागवानी कृषि के विकास के लिए आवश्यक पूँँजी का अभाव है। विकासशील देशों में ऐसे पूँँजी प्रधान उद्योगों के विकास ढ्वारा औद्योगिक राष्ट्र खाद्य पदार्थों, खनिजों का आयात सुनिश्चित करते हैं तथा अपने निर्मित उत्पादों के लिए बाज्ञार निर्मित
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करते हैं। यह संपूर्ण चक्र देशों के बीच में व्यापार के परिमाण को आगे बढाता है।

(v) परिवहन : पुराने समय में परिवहन के पर्याप्त और समुचित साधनों का अभाव स्थानीय क्षेत्रों में व्यापार को प्रतिबंधित करता था। केवल उच्च मूल्य वाली वस्तुओं, जैसे-रत्न, रेशम तथा मसाले का लंबी दूरियों तक व्यापार किया जाता था। रेल, समुद्री तथा वायु परिवहन के विस्तार और प्रशीतन तथा परिरक्षण के बेहतर साध नों के साथ, व्यापार ने स्थानिक विस्तार का अनुभव किया है।

व्यापार संतुलन

व्यापार संतुलन, एक देश के द्वारा अन्य देशों को आयात एवं इसी प्रकार निर्यात की गई वस्तुओं एवं सेवाओं की मात्रा (परिमाण) का प्रलेखन करता है। यदि आयात का मूल्य, देश के निर्यात मूल्य की अपेक्षा अधिक है तो देश का व्यापार संतुलन ऋष्णात्मक अथवा प्रतिकूल है। यदि निर्यात का मूल्य, आयात के मूल्य की तुलना में अधिक है तो देश का व्यापार संतुलन धनात्मक अथवा अनुकूल है।

एक देश की आर्थिकी के लिए व्यापार संतुलन एवं भुगतान संतुलन के गंभीर निहितार्थ होते हैं। एक ऋष्णात्मक संतुलन का अर्थ होगा कि देश वस्तुओं के क्रय पर उससे अधिक व्यय करता है जितना कि अपने सामानों के विक्रय से अर्जित करता है। यह अंतिम रूप में वित्तीय संचय की समाप्ति को अभिप्रेरित करता है।

अंतरिष्ट्रीय व्यापार के प्रकार

अंतर्ष्ट्रीय व्यापार को दो प्रकारों में वर्गिकृत किया जा सकता है :

(क) द्विपार्शिक व्यापार : द्विपार्शिक व्यापार दो देशों के द्वारा एक दूसरे के साथ किया जाता है। आपस में निर्दिष्ट वस्तुओं का व्यापार करने के लिए वे सहमति करते हैं। उदाहरणार्थ देश ‘क’ कुछ कच्चे पदार्थ के व्यापार के लिए इस समझौते के साथ सहमत हो सकता है कि देश ‘ख’ कुछ अन्य निर्दिष्ट सामग्री खरीदेगा अथवा स्थिति इसके विपरीत भी हो सकती है।

(ख) बहु पार्शिवक व्यापार : जैसा कि शब्द से स्पष्ट होता है कि बहु पार्शिवक व्यापार बहुत से व्यापारिक देशों के साथ किया जाता है। वही देश अन्य अनेक देशों के साथ व्यापार कर सकता है। देश कुछ व्यापारिक साझ्जेदारों को ‘सर्वाधिक अनुकूल राष्ट्र’ (MFN) की स्थिति प्रदान कर सकता है।

मुक्त व्यापार की स्थिति

व्यापार हेतु अर्थव्यवस्थाओं को खोलने का कार्य मुक्त व्यापार अथवा व्यापार उदारीकरण के रूप में जाना जाता है। यह कार्य व्यापारिक अवरोधों जैसे सीमा शुल्क को घटाकर किया जाता है। घरेलू उत्पादों एवं सेवाओं से प्रतिस्पर्धि करने के लिए व्यापार उदारीकरण सभी स्थानों से वस्तुओं और सेवाओं के लिए अनुमति प्रदान करता है।

भूमंडलीकरण और मुक्त व्यापार विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं को उन पर प्रतिकूल थोपते हुए तथा उन्हें विकास के समान अवसर न देकर बुरी तरह से प्रभावित कर सकते हैं। परिवहन एवं संचार तंत्र के विकास के साथ ही वस्तुएँ एवं सेवाएँ पहले की अपेक्षा तीत्रगति से एवं दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँच सकती है। किंतु व्यापार मुक्त व्यापार को केवल संपन्न देशों के द्वारा ही बाज्ञारों की और नहीं ले जाना चाहिए, बल्लि विकसित देशों को चाहिए कि वे अपने स्वयं के बाज्ञारों को विदेशी उत्पादों से संरक्षित रखें।

देशों को भी डंप की गई वस्तुओं से सतर्क रहने की आवश्यकता है, क्योंकि मुक्त व्यापार के साथ इस प्रकार की सस्ते मूल्य की डंप की गई वस्तुएँ घरेलू उत्पादकों को नुकसान पहुँचा सकती है।

डंप करना

लागत की दृष्टि से नहीं वरन् भिन्न-भिन्न कारणों से अलग-अलग कीमत की किसी वस्तु को दो देशों में विक्रय करने की प्रथा डंप करना कहलाती है।

विश्व व्यापार संगठन

1948 में विश्व को उच्च सीमा शुल्क और विभिन्न प्रकार की अन्य बाधाओं से मुक्त कराने हेतु कुछ देशों के द्वारा जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ (GATT) का गठन किया गया। 1994 में सदस्य देशों के द्वारा राष्ट्रों के बीच मुक्त एवं निष्पक्ष व्यापार को बढ़ा प्रोन्त करने के लिए एक स्थायी संस्था के निर्माण का निश्चय किया गया था तथा जनवरी 1995 से (GATT) को विश्व व्यापार संगठन (WTO) में रूपांतरित कर दिया गया।

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विश्व व्यापार संगठन एकमात्र ऐसा अंतरीष्ट्रीय संगठन है जो राष्ट्रों के मध्य वैश्विक नियमों का व्यवहार करता है। यह विश्वव्यापी व्यापार तंत्र के लिए नियमों को नियत करता है और इसके सदस्य देशों के मध्य विवादों का निपटारा करता है। विश्व व्यापार संगठन दूरसंचार और बैंकिंग जैसी सेवाओं तथा अन्य विषयों जैसे बौढ़िक संपदा अधिकार के व्यापार को भी अपने कार्यों में सम्मिलित करता है। उन लोगों के द्वारा विश्व व्यापार संगठन की आलोचना एवं विरोध किया गया है जो मुक्त व्यापार और अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण के प्रभावों से परेशान है। इस पर तर्क किया गया है कि मुक्त व्यापार आम लोगों के जीवन को अधिक संपन्न नहीं बनाता। धनी देशों को और अधिक धनी बनाकर यह वास्तव में गरीब और अमीर के बीच की खाई को बढ़ा रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि विश्व व्यापार संगठन में

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Upholding India and Thailand request, World Trade Organization (WTO) has constituted a panel to examine the anti-dumping duty and customs bond imposed by the US government against the import shrimp from these countries. The dispute settlement body of WTO has resolved to appoint the panel so that several rounds of discussion with these countries were fu

Alliance [SSA], an organization of local shrimp manufacturers. The US act had seriously hit India's export to that country as US is the second largest importer of marine products from India. The duty was also imposed against a host of other countries like Thailand, China, Brazil, Ecuador and Vietnam in July 2004. US customs had also imposed continuous bond requirement on importers of certain frozen warm water shrimp from these countries.

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क्रियाकलाप

सोचिए! वे कौन से कारण हैं जिनसे व्यापारी देशों के लिए डंपिंग गहरी चिता का विषय बनती जा रही है?

प्रभावशाली राष्ट्र केवल अपने वाणिज्यिक हितों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इसके अतिरिक्त अनेक विकसित देशों ने अपने बाजारों को विकसित देशों के उत्पादों के लिए पूरी तरह से नहीं खोला है। यह भी तर्क दिया जाता है कि स्वास्थ्य, श्रमिकों के अधिकार, बाल श्रम और पर्यावरण जैसे मुढ़ों की उपेक्षा की गई है।

क्या आप जानते हैं

विश्व व्यापार संगठन का मुख्यालय जिनेवा (स्विटजरलैंड) में स्थित है।

2024 में 166 देश विश्व व्यापार संगठन के सदस्य थे।

भारत विश्व व्यापार संगठन के संस्थापक सदस्य में से एक रहा है।

अंतरिष्ट्रीय व्यापार से संबंधित मामले

अंतर्ष्ट्रीय व्यापार का होना राष्ट्रों के लिए पारस्परिक लाभदायक होता है, यदि यह प्रादेशिक विशिष्टीकरण, उत्पादन के उच्च स्तर, उच्च रहन-सहन के स्तर, वस्तुओं एवं सेवाओं की विश्वव्यापी उपलब्धता, कीमतों और वेतन का समानीकरण, जान एवं संस्कृति के प्रस्फुरण को प्रेरित करता है।

अंतर्ष्ट्रीय व्यापार देशों के लिए हानिकारक हो सकता है यदि यह अन्य देशों पर निर्भरता, विकास के असमान स्तर, शोषण और युढ़ का कारण बनने वाली प्रतिद्धिद्धिता की ओर उन्मुख है। विश्वव्यापी व्यापार जीवन के अनेक पक्षों को प्रभावित करते हैं। यह सारे विश्व में पर्यावरण से लेकर लोगों के स्वास्थ्य एवं कल्याण इत्यादि सभी को प्रभावित कर सकता है। जैसे-जैसे देश अधिक व्यापार के लिए प्रतिस्पर्थीं बनते जा रहे हैं, उत्पादन और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग बढ़ता जा रहा है, और संसाधनों के नष्ट होने की दर उनके पुनर्भरण की दर से तीत्र होती है। परिणामस्वरूप समुद्री जीवन भी तीत्रता से नष्ट हो रहा है, वन काटे जा रहे हैं और नदी बेसिन निजी पेय जल कंपनियों को बेचे जा रहे हैं। तेल गैस खनन, औषधि विज्ञान और कृषि व्यवसाय में संलग्न बहुराष्ट्रीय निगम और अधिक प्रदूषण उत्पन्न करते हुए हर कीमत पर अपने कायों को बढ़ाए रखती है-उनके कार्य करने की पढ़ति सतत पोषणीय विकास के मानकों का अनुसरण नहीं करती। यदि संगठन केवल लाभ बनाने की ओर उन्मुख रहते हैं और पर्यावरणीय तथा स्वास्थ्य संबंधी विषयों पर ध्यान नहीं देते तो यह भविष्य के लिए इसके गहरे निहितार्थ हो सकते हैं।

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पत्तन अंतराष्ट्रीय व्यापार के प्रवेश द्वार पत्तन

अंतराष्ट्रीय व्यापार की दुनिया के मुख्य प्रवेश द्वार पोताश्रय तथा पत्तन होते हैं। इन्हीं पत्तनों के द्वारा जहाजी माल तथा यात्री विश्व के एक भाग से दूसरे भाग को जाते हैं।

पत्न जहाज़ के लिए गोदी, लादने, उतारने तथा भंडारण हेतु सुविधाएँ प्रदान करते हैं। इन सुविधाओं को प्रदान करने के उद्देश्य से पत्न के प्राधिकारी नौगम्प द्वारों का रख-रखाव, रस्सों व बजरों (छोटी अतिरिक्त नौकाएँ) की व्यवस्था करने और श्रम एवं प्रबंधकीय सेवाओं को उपलब्ध कराने की व्यवस्था करते हैं। एक पत्न के महत्व को नौभार के आकार और निपटान किए गए जहाजों की संख्या द्वारा निश्चित किया जाता है। एक पत्न द्वारा निपटाया नौभार, उसके पृष्ठ प्रदेश के विकास के स्तर का सूचक है।

चित्र 8.4 : सैन फ्रांसिस्को, विश्व का सबसे बड़ा स्थलरुढ़ पत्तन
चित्र 8.4 : सैन फ्रांसिस्को, विश्व का सबसे बड़ा स्थलरुढ़ पत्तन

पत्तन के प्रकार

सामान्यत : पत्तनों का वर्गीकरण उनके द्वारा संभाले गए यातायात के प्रकार के अनुसार किया जाता है।

निपटाए गये नौभार के अनुसार पत्नों के प्रकार :

(i) औद्योगिक पत्तन : ये पत्तन थोक नौभार के लिए विशेषीकृत होते हैं जैसे-अनाज, चीनी, अयस्क, तेल, रसायन और इसी प्रकार के पदार्थ।

(ii) वाणिज्यिक पत्तन : ये पत्तन सामान्य नौभार संबेष्टित उत्पादों तथा विनिर्मित वस्तुओं का निपटान करते हैं। ये पत्तन यात्री-यातायात का भी प्रबंध करते हैं।

चित्र 8.5 : लेनिनग्राद का वाणिज्यिक पत्तन
चित्र 8.5 : लेनिनग्राद का वाणिज्यिक पत्तन

(iii) विस्तृत पत्तन : ये पत्तन बड़े परिमाण में सामान्य नौभार का थोक में प्रबंध करते हैं। संसार के अधिकांश महान पत्तन विस्तृत पत्तनों के रूप में वर्गीकृत किए गए हैं।

अवस्थिति के आधार पर पत्नों के प्रकार

(i) अंतर्देशीय पत्तन : ये पत्तन समुद्री तट से दूर अवस्थित होते हैं। ये समुद्र से एक नदी अथवा नहर द्वारा जुड़े होते हैं। ऐसे पत्तन चौरस तल वाले जहाज्ञ या बजरे द्वारा ही गम्प्य होते हैं। उदाहरणस्वरूप-मानचेस्टर एक नहर से जुड़ा है; मेफिस मिसीसिपी नदी पर अब स्थित है; राइन के अनेक पत्तन हैं जैसे-मैनहीम तथा ड्यूसबर्ग; और कोलकाता हुगली नदी, जो गंगा नदी की एक शाखा है, पर स्थित है।

(ii) बाह्म पत्तन : ये गहरे जल के पत्तन हैं जो वास्तविक पत्तन से दूर बने होते हैं। ये उन जहाजों, जो अपने बड़े आकार के कारण उन तक पहुँचने में अक्षम हैं, को ग्रहण करके पैतृक पत्नों को सेवाएँ प्रदान करते हैं। उदाहरणस्वरूप एथेंस तथा यूनान में इसके बाह्म पत्तन पिरेडअस एक उच्चकोटि का संयोजन है।

विशिष्टीकृत कार्यकलापों के आधार पर पत्नों के प्रकार

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(i) तैल पत्न : ये पत्न तेल के प्रक्रमण और नौ-परिवहन का कार्य करते हैं। इनमें से कुछ टैंकर पत्न हैं तथा कुछ तेल शोधन पत्न हैं। वेनेजुएला में माराकाइबो, ट्यूनिशिया में एस्सखीरा, लेबनान में त्रिपोली टैंकर पत्न हैं। पर्शिया की खाड़ी पर अबादान एक तेलशोधन पत्न है।
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(ii) मार्ग पत्तन (विश्राम पत्तन) : ये ऐसे पत्तन हैं, जो मूल रूप से मुख्य समुद्री मार्गों पर विश्राम केंद्र के रूप में विकसित हुए, जहाँ पर जहाज्त पुन : ईंधन भरने, जल भरने तथा खाद्य सामग्री लेने के लिए लंगर डाला करते थे। बाद में, वे वाणिज्यिक पत्तनों में विकसित हो गए। अदन, होनोलूलू तथा सिंगापुर इसके अच्छे उदाहरण हैं।
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(iii) पैकेट स्टेशन : इन्हें फ़ेरी-पत्तन के नाम से भी जाना जाता है। ये पैकेट स्टेशन विशेष रूप से छोटी दूरियों को

तय करते हुए जलीय क्षेत्रों के आर-पार डाक तथा यात्रियों के परिवहन (आवागमन) से जुड़े होते हैं। ये स्टेशन जोड़ों में इस प्रकार अवस्थित होते हैं कि वे जलीय क्षेत्र के आरपार एक दूसरे के सामने होते हैं। उदाहरणस्वरूप-इंग्लिश चैनल के आरपार इंग्लैंड में डोवर तथा फ्रांस में कैलाइस।

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(iv) आंत्रपो पत्तन : ये वे एकत्रण केंद्र हैं, जहाँ विभिन्न देशों से निर्यात हेतु वस्तुएँ लाई जाती हैं। सिंगापुर एशिया के लिए एक आंत्रपो पत्तन है, रोटरडम यूरोप के लिए और कोपेनहेगेन बाल्टिक क्षेत्र के लिए आंत्रपो पत्तन हैं।
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(v) नौ सेना पत्तन : ये केवल सामाजिक महत्व के पत्तन हैं। ये पत्तन युढ़क जहाजों को सेवाएँ देते हैं तथा उनके लिए मरम्मत कार्यशालाएँ चलाते हैं। कोच्चि तथा कारवाड़ भारत में ऐसे पत्तनों के उदाहरण हैं।
अभ्यास
अभ्यास

1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर चुनें :

(i) संसार के अधिकांश महान पत्तन इस प्रकार वर्गीकृत किए गए हैं-

(क) नौसेना पत्तन

(ख) विस्तृत पत्न

(ग) तैल पत्तन

(घ) औद्योगिक पत्तन

(ii) निम्नलिखित महाद्वीपों में से किस एक से विश्व व्यापार का सर्वाधिक प्रवाह होता है?

(क) एशिया

(ख) यूरोप

(ग) उत्तरी अमेरिका

(घ) अफ्रीका

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30 शब्दों में दीजिए :

•
(i) विश्व व्यापार संगठन के आधारभूत कार्य कौन-से हैं?
•
(ii) ऋष्णात्मक भुगतान संतुलन का होना किसी देश के लिए क्यों हानिकारक होता है?
•
(iii) व्यापारिक समूहों के निर्माण द्वारा राष्ट्रों को क्या लाभ प्राप्त होते हैं?
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3. नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर 150 शब्दों से अधिक में न दें :

•
(i) पत्तन किस प्रकार व्यापार के लिए सहायक होते हैं? पत्तनों का वर्गिकरण उनकी अवस्थिति के आधार पर कीजिए।
•
(ii) अंतराष्ट्रीय व्यापार से देश कैसे लाभ प्राप्त करते हैं?