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मानव भूगोल

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प्रकृति एवं विषय क्षेत्र आप ‘भूगोल एक विषय के रूप में’ ‘भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत’ (रा.शै.अ.प्र.प. 2006) के अध्याय 1 में पहले ही पढ़ चुके हैं। क्या आप इसकी अंतर्वस्तु को याद कर सकते हैं? इस अध्याय ने बृहद रूप से आपका परिचिय भूगोल की प्रकृति से कराया था। आप भूगोल की महत्वपूर्ण शाखाओं से भी परिचित हैं। यदि आप अध्याय को पुनः पढ़ें तो आपको मानव भूगोल का मुख्य विषय ‘भूगोल’ से संबंध भी ज्ञात हो जाएगा। जैसा कि आप जानते हैं कि एक अध्ययन क्षेत्र के रूप में भूगोल समाकलनात्मक, आनुभविक एवं व्यावहारिक है। अतः भूगोल की पहुँच्च विस्तृत है और किसी भी घटना अथवा परिघटना का, जो दिक् एवं काल के संदर्भ में परिवर्तित होता है, उसका भौगोलिक ढंगं से अध्ययन किया जा सकता है। आप धरातल को किस प्रकार देखते हैं? क्या आप को लगता है कि पृथ्वी के दो प्रमुख घटक हैं: प्रकृति (भौतिक पर्यावरण) और जीवन के रूप जिसमें मनुष्य भी सम्मिलित हैं। अपने परिवेश के भौतिक और मानवीय घटकों की सूची बनाइए। भौतिक भूगोल भौतिक पर्यावरण का अध्ययन करता है और मानव भूगोल ‘भौतिक/प्राकृतिक एवं मानवीय जगत के बीच संबंध, मानवीय परिघटनाओं का स्थानिक वितरण तथा उनके घटित होने के कारण एवं विश्व के विभिन्न भागों में सामाजिक और आर्थिक विभिन्नताओं का अध्ययन करता है’।

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आपको इस तथ्य का पहले से ही बोध होगा कि एक विषय के रूप में भूगोल का मुख्य सरोकार पृथ्वी को मानव के घर के रूप में समझना और उन सभी तत्वों का अध्ययन करना है, जिन्होंने मानव को पोषित किया है। अतः प्रकृति और मानव के अध्ययन पर बल दिया गया है। आप अनुभव करेंगे कि भूगोल में द्वैतवाद आया और इस आशय के व्यापक तर्क-वितर्क आरंभ हो गए कि क्या एक विषय के रूप में भूगोल को नियम बनाने/सिद्धांतीकर (नोमोथेटिक) अथवा विवरणात्मक (भावचित्रात्मक/इडियोग्राफिक) होना चाहिए। क्या इसके विषय-वस्तु को व्यवस्थित किया जाना चाहिए और इसके अध्ययन का उपागम प्रादेशिक अथवा क्रमबढ़ होना चाहिए? क्या भौगोलिक परिघटनाओं की व्याख्या सैढ्धांतिक आधार पर होनी चाहिए अथवा ऐतिहासिक-संस्थागत उपागम के आधार पर? ये बौढ्चिक अभ्यास के मुढ़े रहे हैं और अंततः आप मूल्यांकन करेंगे कि प्रकृति और मानव के बीच बैध द्रैधता नहीं है, क्योंकि प्रकृति और मानव अविभाज्य तत्व हैं और इन्हें समग्रता में देखा जाना चाहिए। यह जानना रुचिकर है कि भौतिक और मानवीय दोनों परिघटनाओं का वर्णन मानव शरीर रचना विज्ञान से प्रतीकों का प्रयोग करते हुए रूपकों के रूप में किया जाता है।

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हम सामान्यतः पृथ्वी के ‘रूप’, तूफान की ‘औँख’, नदी के ‘मुख’, हिमनदी के ‘प्रोथ’ (नासिका), जलडमरूमध्य की ‘ग्रीवा’ और मृदा की ‘परिच्छेदिका’ का वर्णन करते हैं। इसी प्रकार प्रदेशों, गाँँवों, नगरों का वर्णन ‘जीवों’ के रूप में किया गया है। जर्मन भूगोलवेत्ता राज्य/देश का वर्णन ‘जीवित जीव’ के रूप में करते हैं। सड़कों, रेलमागों और जलमागों के जाल को प्रायः ‘परिसंचरण की धमनियों’ के रूप में वर्णन किया जाता है। क्या आप अपनी भाषा से ऐसे शब्दों और अभिव्यक्तियों को एकत्रित कर सकते हैं? अब मूल प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या हम प्रकृति और मनुष्य को पृथक् कर सकते हैं जबकि वे इतनी जटिलता से आपस में जुड़े हुए हैं?

मानव भूगोल की परिभाषाएँ

- “मानव भूगोल मानव समाजों और धरातल के बीच संबंधों का संश्लेषित अध्ययन है।”

रैटज्जेल

ऊपर दी गई परिभाषा में संश्लेषण पर जोर दिया गया है।

- “मानव भूगोल अस्थिर पृथ्वी और क्रियाशील मानव के बीच परिवर्तनशील संबधों का अध्ययन है।”

एलन सी. सेंपल

सेंपल की परिभाषा में संबंधों की गत्यात्मकता मुख्य शब्द है।

- “हमारी पृथ्वी को निर्यत्रित करने वाले भौतिक नियमां तथा इस पर रहने वाले जीवों के मध्य संबंधों के अधिक संश्लेषित ज्ञान से उत्पन्न संकल्पना।”

पॉल विडाल-डी-ला ब्लाश

मानव भूगोल पृथ्वी और मनुष्य के अंतर्सबंधों की एक नयी संकल्पना प्रस्तुत करता है।

मानव भूगोल की प्रकृति

मानव भूगोल भौतिक पर्यावरण तथा मानव-जनित सामाजिक सास्कृतिक पर्यावरण के अंतर्सबंधों का अध्ययन उनकी परस्पर अन्योन्यक्रिया के द्वारा करता है। आप अपनी कक्षा XI बीं की पुस्तक ‘भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत’(रा.शै.अ.प्र.प.-2006) में भौतिक पर्यावरण के तत्वों का अध्ययन कर चुके हैं। आप जानते हैं कि ये तत्व भू-आकृति, मृदाएँ, जलवायु, जल, प्राकृतिक वनस्पति और विविध प्राणिजात तथा वनस्पति-जात हैं। क्या आप उन तत्वों की सूची बना सकते हैं, जिनकी रचना मानव ने भौतिक पर्यावरण द्वारा प्रदत्त मंच पर अपने कार्य-कलापों के द्वारा की है? गृह, गाँव, नगर, सड़कों व रेलों का जाल, उद्योग, खेत, पत्तन, दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुएँ तथा भौतिक संस्कृति के अन्य सभी तत्व भौतिक पर्यावरण द्वारा प्रदत् संसाधनों का उपयोग करते हुए मानव द्वारा निर्मित किए गए हैं, जबकि भौतिक पर्यावरण मानव द्वारा वृहत् स्तर पर परिवर्तित किया गया है, साथ ही मानव जीवन को भी इसने प्रभावित किया है।

मानव का प्राकृतीकरण और प्रकृति का मानवीकरण

मनुष्य अपने प्रौद्योगिकी की सहायता से अपने भौतिक पर्यावरण से अन्योन्यक्रिया करता है। यह महत्वपूर्ण नहीं है, कि मानव क्या उत्पन्न और निर्माण करता है बल्लि कि यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि वह 'किन उपकरणों और तकनीकों की सहायता से उत्पादन और निर्माण करता है'?

प्रौद्योगिकी किसी समाज के सांस्कृतिक विकास के स्तर की सूचक होती है। मानव प्रकृति के नियमों को बेहतर ढंग से समझने के बाद ही प्रौद्योगिकी का विकास कर पाया। उदाहरणार्थ, घर्षण और ऊष्मा की संकल्पनाओं ने अग्नि की खोज में हमारी सहायता की। इसी प्रकार डी.एन.ए. और आनुवाँशिकी के रहस्यों की समझ ने हमें अनेक बीमारियों पर विजय पाने के योग्य बनाया। अधिक तीत्र गति से चलने वाले यान विकसित करने के लिए हम वायु गति के नियमों का प्रयोग करते हैं। आप देख सकते हैं कि प्रकृति का ज्ञान प्रौद्योगिकी को विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण है और प्रौद्योगिकी मनुष्य पर पर्यावरण की बंदिशों को कम करती है। प्राकृतिक पर्यावरण से अन्योन्यक्रिया की आरंभिक अवस्थाओं में मानव इससे अत्यधिक प्रभावित हुआ था। उन्होने प्रकृति के आदेशों के अनुसार अपने आप को ढाल लिया। इसका कारण यह है कि प्रौद्योगिकी का स्तर अत्यंत निम्न था और मानव के सामाजिक विकास की अवस्था भी आदिम थी। आदिम मानव समाज और प्रकृति की प्रबल शक्तियों के बीच इस प्रकार की अन्योन्यक्रिया को पर्यावरणीय निश्चयवाद कहा गया। प्रौद्योगिक विकास की उस अवस्था में हम प्राकृतिक मानव की कल्पना कर सकते हैं जो प्रकृति को सुनता था, उसकी प्रचंडता से भयभीत होता था और उसकी पूजा करता था।

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मानव का प्राकृतीकरण

बेंदा मध्य भारत के अबृझमाड़ क्षेत्र के जंगलों में रहता है। उसके गाँव में तीन झापडियाँ हैं जो जंगल के बीच है। यहाँ तक कि पक्षी और आवारा कुत्ते जिनकी भीड़ प्रायः गाँवों में मिलती है, भी यहाँ दिखाई नहीं देते। छोटी लंगोटी पहने और हाथ में कुल्हाड़ी लिए वह पेंडा (वन) का सर्वेक्षण करता है, जहाँ उसका कबीला कृषि का आदिम रूप-स्थानांतरी कृषि करता है। बेंदा और उसके मित्र वन के छोटे टुकड़ों को जुताई के लिए जलाकर साफ्र करते है। राख का उपयोग मुदा को उर्वर बनाने के लिए किया जाता है। अपने चारों और खिले हुए महुआ वृक्षों को देखकर बेंदा प्रसन्न है। जैसे ही वह महुआ, पलाश और साल के वृक्षों को देखता है, जिन्होंने बचपन से ही उसे आश्रय दिया है, वह सोचता है कि इस सुंदर ब्रहांड का अंग बनकर वह कितना सौभाग्यशाली है। विसपीं गति से पेंडा को पार करके बेंदा नदी तक पहुँचता है। जैसे ही वह चुल्लू भर जल लेने के लिए झुकता है, उसे वन की आत्मा लोई-लुगी की प्यास बुझाने की स्वीकृति देने के लिए धन्यवाद करना याद आता है। अपने मित्रों के साथ आगे बढ़ते हुए बेंदा गुदेदार पत्तों और कंदमूल को चबाता है। लड़के वन से गज्ज्हरा और कुचला का संग्रहण करने का प्रयास कर रहे है। ये विशिष्ट पादप हैं जिनका प्रयोग बेंदा और उसके लोग करते है। वह आशा करता है कि वन की आत्माएँँ द्या करंगी और उसे उन जड़ी बूटियों तक ले जाएँगी। ये आगामी पूर्णिमा को मधाई अथवा जनजातीय मेले में वस्तु विनिमय के लिए आवश्यक है। वह अपने नेत्र बंद करके स्मरण करने का कठिन प्रयत्न करता है, जो उसके बुजुगों Nे उन जड़ी बूटियों और उनके पाए जाने वाले स्थानों के बारे में समझाया था। वह चाहता है कि काश उसने अधिक ध्यानपूर्वक सुना होता। अचानक पत्तों में खड़खड़ाहट होती है। बेंदा और उसके मित्र जानते हैं कि कि ये बाहरी लोग हैं जो इन जंगलों में उन्हेंढूँढ़ते हुए आए है।. एक ही प्रवाही गति से बेंदा और उसके मित्र सघन νृक्षों के वितान के पीछे अदृश्य हो जाते हैं और वन की आत्मा के साथ 玕काकार हो जाते है।

बॉक्स की कथा (मानव का प्राकृतीकरण) आर्थिक दृष्टि से आदिम समाज से संबंधित एक घर के प्रत्यक्ष संबंधों का प्रतिनिधित्व करती है। ऐसे अन्य आदिम समाजों के संबंध में पढ़े जो प्राकृतिक पर्यावरण के साथ पूर्णतः सामंजस्य बनाए हुए हैं। आप अनुभव करेंगे कि ऐसे सभी प्रकरणों में प्रकृति एक शक्तिशाली बल, पूज्य, सत्कार योग्य तथा संरक्षित है। सतत पोषण हेतु मनुष्य प्राकृतिक संसाधनों पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर है। ऐसे समाजों के लिए भौतिक पर्यवरण ‘माता-प्रकृति’ का रूप धारण करता है।

समय के साथ लोग अपने पर्यावरण और प्राकृतिक बलों को समझने लगते हैं। अपने सामाजिक और सांस्कृतिक विकास के साथ मानव बेहतर और अधिक सक्षम प्रौद्योगिकी का विकास करते हैं। वे अभाव की अवस्था से स्वतंत्रता की अवस्था की और अग्रसर होते हैं। पर्यावरण से प्राप्त संसाधनों के द्वारा वे संभावनाओं को जन्म देते हैं। मानवीय क्रियाएँ सांस्कृतिक भू-दूश्य की रचना करती हैं। मानवीय क्रियाओं की छाप सर्वत्र है; उच्च भूमियों पर स्वास्थ्य विश्रामस्थल, विशाल नगरीय प्रसार, खेत, फलोद्यान मैदानों व तरंगित पहाड़ियों में चरागाहें, तटों पर पत्तन और महासागरीय तल पर समुद्री मार्ग तथा अंतरिक्ष में उपग्रह इत्यादि। पहले के विद्धानों ने इसे संभववाद का नाम दिया। प्रकृति अवसर प्रदान करती है और मानव उनका उपयोग करता है तथा धीरे-धीरे प्रकृति का मानवीकरण हो जाता है तथा प्रकृति पर मानव प्रयासों की छाप पड़ने लगती है।

प्रकृति का मानवीकरण

ट्रॉन्डहाईम के शहर में सर्दियों का अर्थ है- प्रचंड पवनें और भारी हिम। महीनों तक आकाश अदीप्त रहता है। कैरी प्रातः 8 बजे ऑंधेरे में कार से काम पर जाती है। सर्दियों के लिए उसके पास विशेष टायर हैं और वह अपनी शक्तिशाली कार की लाइटें जलाए रखती है। उसका कार्यालय सुखदायक 23 डिग्री सेल्सियस पर कृत्रिम ढंग से गर्म रहता है। विश्वविद्यालय का परिसर जिसमें वह काम करती है, काँच के एक विशाल गुंबद के नीचे बना हुआ है। यह गुंबद सर्दियों में हिम को बाहर रखता है और गर्मियों में धूप को अंदर आने देता है। तापमान को सावधानीपूर्वक नियंत्रित किया जाता है और वहाँ पर्याप्त प्रकाश होता है। यद्यपि ऐसे रूक्ष मौसम में नयी सब्जियाँ और पौधे नहीं उगते। कैरी अपने डेस्क पर आर्किड रखती है और उष्णकटिबंधीय फलों जैसे-केला व किवी का आनन्द लेती है। ये नियमित रूप से वायुयान द्वारा उष्ण क्षेत्रों से मॉगाए जाते हैं। माउस की एक क्लिक के साथ कैरी नयी दिल्ली में अपने सहकर्मियों से कंप्यूटर नेटवर्क से जुड़ जाती है। वह प्रायः लंदन के लिए सुबह की उड़ान लेती है और शाम को अपना मनपसंद टेलिविजन सीरियल देखने के लिए सही समय पर वापस पहुँच जाती है। यद्यपि कैरी 58 वर्षीय है फिर भी वह विश्व के अन्य भागों के अनेक 30 वर्षीय लोगों से अधिक स्वस्थ और युवा दिखती है।

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि ऐसी जीवनशैली कैसे संभव हुई है? यह प्रौद्योगिकी है जिसके कारण ट्रॉन्डहाईम के लोग व उन जैसे अन्य लोग प्रकृति द्वारा आरोपित अवरोधों पर विजय पाने के लिए सक्षम हुए है। क्या आप ऐसे अन्य कुछ दृष्टांतों को जानते हैं? ऐसे उदाहरणों को ढूँढ़ना कठिन नहीं है।

भूगोलवेता ग्रिफ्लिथ टेलर ने एक नयी संकल्पना प्रस्तुत की है जो दो विचारों पर्यावरणीय निश्चयवाद और संभववाद के बीच मध्य मार्ग को परिलक्षित करता है। उन्होंने इसे नवनिश्यचवाद अथवा रुको और जाओ निश्चयवाद का नाम दिया। आप में से जो नगरों में रहते हैं और जो नगर देख चुके हैं, जस्त्र जानते होंगे कि चौराहों पर यातायात का नियंत्रण बत्तियों द्वारा होता है। लाल बत्ती का अर्थ है 'रुको', ऐंबर (पीली) बत्ती लाल और हरी बत्तियों के बीच रुककर तैयार रहने का अंतराल प्रदान करती है और हरी बत्ती का अर्थ है 'जाओ'। संकल्पना दर्शाती है कि न तो यहाँ' नितांत आवश्यकता की स्थिति (पर्यावरणीय निश्चयवाद) है और न ही नितांत स्वतंत्रता (संभववाद) की दशा है। इसका अर्थ है कि प्राकृतिक नियमों का अनुपालन करके हम प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सकते है। उन्हें लाल संकेतों पर प्रत्युत्तर देना होगा और जब प्रकृति रुपांतरण की स्वीकृति दे तो वे अपने विकास के प्रयल्नों में आगे बढ़ सकते है। इसका तात्पर्य है कि उन सीमाओं में, जो पर्यावरण की हानि न करती हों, संभावनाओं को उत्पन्न किया जा सकता है। तथा अंधाधुंध रफ्तार दुर्घटनाओं से मुक्त नहीं होती है। विकसित अर्थव्यवस्थाआ के द्वारा चली गई मुक्त चाल के परिणामस्वरूप हरित-गृह प्रभाव, ओजोन परत अवक्षय, भूमंडलीय तापन, पीछे हटती हिमनदियाँ, निम्नीकृत भूमियाँ है। नवनिश्चयवाद संकल्पनात्मक ढंग से एक संतुलन बनाने का प्रयास करता है जो संभावनाओं के बीच अपरिहार्य चयन दैतवाद को निष्फल करता है।

•
मानव भूगोल की कल्याणपरक अथवा मानवतावादी विचारधारा का संबंध मुख्यतः लोगों के सामाजिक कल्याण के विभिन्न पक्षों से था। इनमें आवासन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे पक्ष सम्मिलित थे। भूगोलवेताओं ने पहले ही स्नातकोत्तर पाठ्यचर्या में 'सामाजिक कल्याण के रूप में भूगोल' का एक कोर्स आरंभ कर दिया है।
•
आमूलवादी (रेडिकल) विचारधारा ने निर्धनता के कारण, बंधन और सामाजिक असमानता की व्याख्या के लिए माकर्स के सिद्धांत का उपयोग किया। समकालीन सामाजिक समस्याओं का संबंध पूँजीवाद के विकास से था।
•
व्यवहारवादी विचारधारा ने प्रत्यक्ष अनुभव के साथ-साथ मानव जातीयता, प्रजाति, धर्म इत्यादि पर आधारित सामाजिक संवर्गों के दिक्काल बोध पर ज्यादा जौर दिया।

मानव भूगोल के क्षेत्र और उप-क्षेत्र

मानव भूगोल, जैसा कि आपने देखा, मानव जीवन के सभी तत्वों तथा अंतराल, जिसके अंतर्गत वे घटित होते हैं के मध्य संबंध की व्याख्या करने का प्रत्यत्न करती है। इस प्रकार मानव भूगोल की प्रकृति अत्यधिक अंतर-विषयक है। पृथ्वी तल पर पाए जाने वाले मानवीय तत्वों को समझने व उनकी व्याख्या करने के लिए मानव भूगोल सामाजिक विज्ञानों के सहयोगी विषयों के साथ चनिष्ठ अंतरापृष्ठ विकसित करती है। ज्ञान के विस्तार के साथ नए उपक्षेत्रों का विकास होता है और मानव भूगोल के साथ भी ऐसा ही हुआ। आइए, मानव भूगोल के क्षेत्रों और उप-क्षेत्रों का परीक्षण करें (तालिका 1.2)।

समय अवधिउपागमवृहत्त लक्षण
आरंभिक उपनिवेश युगअन्वेषण और विवरणसाम्राज्यी और व्यापारिक रुचियों ने नए क्षेत्रों में खोजों व अन्वेषणों को प्रोत्साहित किया। क्षेत्र का विश्वज्ञानकोषिय विवरण भूगोलवेताओं द्वारा वर्णन का महत्वपूर्ण पक्ष बना।
उत्तर उपनिवेश युगप्रादेशिक विश्लेषणप्रदेश के सभी पक्षों के विस्तृत वर्णन किए गए। मत यह था कि सभी प्रदेश पूर्ण अर्थात् पृथ्वी के भाग हैं, अतः इन भागों की पूरी समझ पृथ्वी पूर्ण रूप से समझने में सहायता करेगी।
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अंतर-युढ़ अवधि के बीच 1930 का दशकक्षेत्रीय विभेदनएक प्रदेश अन्य प्रदेशों से किस प्रकार और क्यों भिन्न है यह समझने के लिए तथा किसी प्रदेश की विलक्षणता की पहचान करने पर बल दिया जाता था।
1950 के दशक के अंत से 1960 के दशक के अंत तकस्थानिक संगठनकंष्पूटर और परिष्कृत सांख्यिकीय विधियों के प्रयोग के लिए विशिष्ट। मानचित्र और मानवीय परिघटनाओं के विश्लेषण में प्राय:, भौतिकी के नियमों का अनुप्रयोग किया जाता था। इस प्रावस्था को विभिन्न मानवीय क्रियाओं के मानचित्र योग्य प्रतिरूपों की पहचान करना इसका मुख्य उद्देश्य था।
1970 का दशकमानवतावादी, आमूलवादी और व्यवहारवादी विचारधाराओं का उद्य।मात्रात्मक क्रांति से उत्पन्न असंतुष्टि और अमानवीय रूप से भूगोल के अध्ययन के चलते मानव भूगोल में 1970 के दशक में तीन नए विचारधाराओं का जन्म हुआ। इन विचारधाराओं के अभ्युद्य से मानव भूगोल सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ के प्रति अधिक प्रासंगिक बना। इन विचारधाराओं की थोड़ी और जानकारी के लिए नीचे दिए गए बॉक्स का अवलोकन करें।
1990 का दशकभूगोल में उत्तर-आधुनिकवादवृहत् सामान्यीकरण तथा मानवीय दशाओं की व्याख्या करने वाले वैश्विक सिद्धांतों की प्रयोज्यता पर प्रश्न उठने लगे। अपने आप में प्रत्येक स्थानीय संदर्भ की समझ के महत्व पर जोर दिया गया।
मानव भूगोल के क्षेत्रउपक्षेत्रसामाजिक विज्ञानों के सहयोगी अनशासकों से अंतरा पृष्ठ
सामाजिक भूगोल-सामाजिक विज्ञान - समाजशास्त्र
व्यवहारवादी भूगोलमनोविज्ञान
सामाजिक कल्याण का भूगोलकल्याण अर्थशास्त्र
अवकाश का भूगोलसमाजशास्त्र
सांस्कृतिक भूगोलमानवविज्ञान
लिंग भूगोलसमाजशास्त्र, मानवविज्ञान, महिला अध्ययन
ऐतिहासिक भूगोलइतिहास
चिकित्सा भूगोलमहामारी विज्ञान
नगरीय भूगोलनगरीय अध्ययन और नियोजन
राजनीतिक भूगोलराजनीति विज्ञान
निर्वाचन भूगोल
सैन्य भूगोलसैन्य विज्ञान
जनसंख्या भूगोलजनांकिकी
आवास भूगोलनगर/ग्रामीण नियोजन
अर्थिक भूगोलअर्थशास्त्र
संसाधन भूगोलसंसाधन अर्थशास्त्र
कृषि भूगोलकृषि विज्ञान
उद्योग भूगोलऔद्योगिक अर्थशास्त्र
विपणन भूगोलव्यवसायिक अर्थशास्त्र, वाणिज्य
पर्यटन भूगोलपर्यटन और यात्रा प्रबंधन
अंतराष्ट्रीय व्यापार का भूगोलअंतराष्ट्रीय व्यापर
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अभ्यास

1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए :

(i) निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा एक भूगोल का वर्णन नहीं करता?

•
(क) समाकलनात्मक अनुशासन
•
(ख) मानव और पर्यावरण के बीच अंतर-संबंधों का अध्ययन।
•
(ग) दैधता पर आश्रित
•
(घ) प्रौद्योगिकी के विकास के फलस्वरूप आधुनिक समय में प्रासंगिक नहीं।

(ii) निम्नलिखित में से कौन-सा एक भौगोलिक सूचना का श्रोत नहीं है?

•
(क) यात्रियों के विवरण
•
(ख) प्राचीन मानचित्र
•
(ग) चंद्रमा से चट्टानी पदार्थों के नमूने
•
(घ) प्राचीन महाकाव्य

(iii) निम्नलिखित में कौन-सा एक लोगों और पर्यावरण के बीच अन्योन्यक्रिया का सर्वाधिक महत्चपूर्ण कारक है?

•
(क) मानव बुद्धिमता
•
(ख) प्रौद्योगिकी
•
(ग) लोगों के अनुभव
•
(घ) मानवीय भाईचारा

(iv) निम्नलिखित में से कौन-सा एक मानव भूगोल का उपगमन नहीं है?

•
(क) क्षेत्रीय विभिन्ता
•
(ख) मात्रात्मक क्रांति
•
(ग) स्थानिक संगठन
•
(घ) अन्वेषण और वर्णन

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए :

•
(i) मानव भूगोल को परिभाषित कीजिए।
•
(ii) मानव भूगोल के कुछ उप-क्षेत्रों के नाम बताइए।
•
(iii) मानव भूगोल किस प्रकार अन्य सामाजिक विज्ञानों से संबंधित है?

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए।

•
(i) मानव के प्राकृतीकरण की व्याख्या कीजिए।
•
(ii) मानव भूगोल के विषय क्षेत्र पर एक टिप्पणी लिखिए।