नोट: प्रिय विद्यार्थियों, यह लेख आपको यह समझने में सहायक होगा कि विरोध का अधिकार का भारतीय संविधान में क्या स्थान है, सर्वोच्च न्यायालय का इस विषय में क्या अभिमत है और मुख्य निर्वाचन आयुक्त की पदच्युति को लेकर क्या संवैधानिक/वैधानिक प्रावधान हैं.
जंतर- मंतर विरोध प्रदर्शन और विरोध का अधिकार
विरोध मानव की प्रकृति का हिस्सा रहा है| कभी सकारात्मक तो कभी नकारात्मक वजहों से विरोध होते रहे हैं और उसके परिणाम भी निकलते रहे हैं| राजनीतिक और व्यवस्थागत सुधार के लिए भी विरोध की लम्बी फेहरिस्त रही है| दोस्तों, आज हम ऐसे ही एक विरोध की बात कर रहे हैं जो ख़ासा चर्चा में बना हुआ है| कॉक्रोच जनता पार्टी के नेतृत्व में भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विरोध तेज हो रहा है| 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर सामूहिक विरोध का आह्वान भी किया गया| हालांकि दिल्ली पुलिस ने इस विरोध प्रदर्शन की अनुमति यह कहते हुए नहीं दी कि इस संदर्भ में निर्धारित तारीख से कम से कम 10 दिन पहले पूर्व सूचना देनी चाहिए थी जबकि 7 अक्टूबर को इस बारे में अवगत कराया गया|
दोस्तों, इन सब खींच-तान के बीच यह समझना जरुरी है कि क्या विरोध का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है? संविधान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे को लेकर क्या प्रावधान हैं? माननीय सर्वोच्च न्यायालय में इस संदर्भ में कभी कोई सुनवाई हुई है या नहीं ? और सबसे बड़ी बात यह कि क्या मुख्य निर्वाचान आयुक्त खुद से भी इस्तीफा दे सकते हैं? इसे भी हमलोग चर्चा के दौरान समझेंगे|
पृष्ठभूमि
भारतीय निर्वाचन आयोग ने बीते कुछ समय से देश के अलग-अलग राज्यों में निर्वाचन नामावली में सुधार के मद्देनजर एक अभियान चलाया जिसे SIR यानी Special Investigative Revision नाम दिया गया| आयोग के अनुसार इस अभियान का मुख्य मकसद मतदाता सूचि की जाँच और उसमें अपेक्षित सुधार करना था| इसके तहत निम्नलिखित गतिविधियों को शामिल किया गया:
- योग्य मतदाताओं के नाम जोड़ना: जिन लोगों की उम्र 18 वर्ष या उससे अधिक हो गई है और जो पात्रता पूरी करते हैं, उन्हें मतदाता सूची में शामिल करना।
- अपात्र नाम हटाना: जिनकी मृत्यु हो चुकी है या जो नियमानुसार उस क्षेत्र की मतदाता सूची में शामिल होने के पात्र नहीं हैं, उनके नाम हटाने की प्रक्रिया करना।
- डुप्लीकेट नाम हटाना: एक ही व्यक्ति का नाम एक से अधिक जगह दर्ज होने की समस्या की पहचान करना।
- मतदाता सूची को सही करना: नाम, पता और अन्य विवरणों में गलतियों को ठीक करना।
- स्वच्छ और विश्वसनीय मतदाता सूची तैयार करना: ताकि चुनाव में मतदान का अधिकार सही पात्र लोगों को मिले और मतदाता सूची अधिक सटीक हो।
लेकिन इसे लेकर शुरू से ही विरोध दर्ज किये जाने लगे और चिंता जाहिर कि गयी कि दस्तावेज़ों की जाँच या नाम हटाने की प्रक्रिया में वास्तविक और पात्र मतदाताओं के नाम भी छूट सकते हैं। Indian Express अखबार ने इस मामले में जब एक रिपोर्ट पेश की तब विरोध तेज हो गये| रिपोर्ट के मुताबिक़
1. चुनाव आयुक्तों ने कम-से-कम 14 बार आपत्तियाँ दर्ज कीं।
चुनाव आयोग के तीन सदस्यों में से दो सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों के दौरान कम-से-कम 14 बार विभिन्न फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्तियाँ दर्ज की थीं।
2. SIR में मतदाताओं के नाम हटाने और जोड़ने पर सवाल उठे।
आपत्तियों में मतदाता सूची से नाम हटाने और दोबारा जोड़ने की प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे भी शामिल थे। इससे यह सवाल उठा कि मतदाताओं के नाम हटाने के फैसले किस प्रक्रिया के तहत लिए जा रहे थे।
3. नए मतदाताओं के Form 6 में बदलाव पर आपत्ति हुई।
नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में बदलाव को लेकर भी आपत्तियाँ दर्ज की गई थीं। इससे पहली बार वोट देने वाले युवाओं के लिए संभावित कठिनाइयों पर चिंता सामने आई।
4. मतदाता डेटा के केंद्रीकरण पर सवाल उठे।
मतदाता सूची के डेटा को एक जगह केंद्रीकृत करने, उस तक पहुँच और उसकी देखरेख की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल सामने आए।
इसके बाद CJP ने विरोध क्यों शुरू किया?
CJP ने इन खुलासों को आधार बनाकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जवाबदेही की माँग की। CJP ने उन्हें 48 घंटे में इस्तीफा देने का अल्टीमेटम दिया और देशव्यापी विरोध की चेतावनी दी।
CJP की प्रमुख माँगें थीं:
- मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और स्वतंत्र जाँच की माँग।
- SIR के दौरान नाम हटाने की प्रक्रिया पर रोक लगाने तथा पुराने रिकॉर्ड की जाँच की माँग।
- चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार।
नोट: चुनाव आयोग ने कहा था कि आयुक्तों की टिप्पणियाँ सामान्य निर्णय-प्रक्रिया और आंतरिक जाँच का हिस्सा थीं। इसलिए आपत्तियाँ दर्ज होना अपने आप में चुनाव में गड़बड़ी या अवैधता साबित नहीं करता।
क्या विरोध का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है| साथ ही अनुच्छेद 19(1)(ख) बिना हथियार के शांतिपूर्वक इकट्ठा होने के अधिकार की भी गारंटी देता है| लेकिन ये अधिकार आत्यंतिक नहीं हैं| अनुच्छेद 19(2) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुछ आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है, जबकि अनुच्छेद 19(3) शांतिपूर्ण सभा के अधिकार पर लोक व्यवस्था और भारत की संप्रभुता एवं अखंडता के हित में उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है।
विरोध-प्रदर्शन के लिए पुलिस की अनुमति
पुलिस की अनुमति लेना क्यों जरूरी है?
दिल्ली पुलिस के दिशानिर्देशों के अनुसार, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन आयोजित करने के लिए अनुमति का आवेदन देना होता है।
- सामान्यतः आवेदन प्रदर्शन की तारीख से कम-से-कम 10 दिन पहले DCP (Deputy Commissioner of Police) को देना चाहिए।
- देर से दिए गए आवेदन पर भी परिस्थितियों के अनुसार विचार किया जा सकता है।
- आवेदन पहले आने के आधार पर देखे जाते हैं, लेकिन पुलिस अन्य जरूरी बातों की भी जाँच करती है।
पुलिस किन आधारों पर अनुमति देने से मना कर सकती है?
पुलिस यह देखती है कि प्रदर्शन से:
- यातायात में गंभीर बाधा तो नहीं आएगी।
- लोगों की सुरक्षा को खतरा तो नहीं होगा।
- सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका तो नहीं है।
- आयोजन स्थल पर पर्याप्त जगह उपलब्ध है या नहीं।
लेकिन सिर्फ अनुमति की आवश्यकता होने का मतलब यह नहीं है कि पुलिस हर प्रदर्शन को मनमाने ढंग से रोक सकती है। नियमों को संविधान में दिए गए शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार के अनुरूप लागू करना चाहिए।
जंतर-मंतर पर कितने लोग प्रदर्शन कर सकते हैं?
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में अधिकतम 1,000 लोगों की सीमा बताई गई है।
यदि इससे अधिक लोगों के शामिल होने की संभावना है, तो प्रदर्शन का आयोजन रामलीला मैदान में किया जा सकता है, जहाँ लगभग 50,000 लोगों के समायोजन की क्षमता है।
यदि पुलिस अनुमति देने से मना कर दे तो क्या करें?
आयोजकों के पास कुछ विकल्प होते हैं:
- पुलिस से दोबारा अनुरोध करना।
- अनुमति न देने के कारणों पर पुनर्विचार की माँग करना।
- कम लोगों के साथ प्रदर्शन का प्रस्ताव देना।
- प्रदर्शन की अवधि कम करना या कोई दूसरा स्थान प्रस्तावित करना।
संबंधित स्थायी आदेश के तहत DCP का निर्णय आयोजकों के लिए अंतिम और बाध्यकारी माना गया है। हालाँकि, यदि निर्णय मनमाना हो या दिशानिर्देशों के विपरीत हो, तो आयोजक संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दिल्ली हाई कोर्ट जा सकते हैं।
अनुमति मिल जाने के बाद पुलिस उसे रद्द कर दे तो?
यदि पुलिस पहले अनुमति दे चुकी है और बाद में उसे रद्द करती है, तो रद्द करने के कारणों को लिखित रूप में दर्ज करके आयोजकों को बताना आवश्यक है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पुलिस का निर्णय उचित कारणों पर आधारित हो और आयोजकों को पता हो कि अनुमति क्यों वापस ली गई।
क्या अनुमति के बिना प्रदर्शन करने पर कार्रवाई हो सकती है?
यदि प्रदर्शन निषेधाज्ञा का उल्लंघन करता है या लागू कानूनों का उल्लंघन होता है, तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
प्रदर्शन पर निषेधाज्ञा क्या होती है?
निषेधाज्ञा (Prohibitory Order) एक लिखित कानूनी आदेश है, जिसके जरिए किसी क्षेत्र में कुछ गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के अनुसार यदि प्रशासन को किसी क्षेत्र में हिंसा या गंभीर अव्यवस्था की आशंका हो, तो वह कानूनी शर्तों के अनुसार लोगों के जमावड़े या कुछ धारा 163 के तहत हर आदेश में पाँच या उससे अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर स्वतः प्रतिबंध नहीं लगता; यह आदेश की वास्तविक शर्तों पर निर्भर करता है।
यदि निषेधाज्ञा गलत लगे तो नागरिक क्या कर सकते हैं?
BNSS की धारा 163(5) के तहत प्रभावित व्यक्ति उस मजिस्ट्रेट से आदेश को वापस लेने या उसमें बदलाव करने का अनुरोध कर सकता है, जिसने आदेश जारी किया है।
- धारा 163(5): आदेश को रद्द करने या बदलने के लिए आवेदन किया जा सकता है।
- धारा 163(7): मजिस्ट्रेट को आवेदक को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना होता है।
यदि आवेदन पूरी तरह या आंशिक रूप से अस्वीकार किया जाता है, तो मजिस्ट्रेट को इसके कारण लिखित रूप में दर्ज करने होते हैं।
इस तरह नागरिक प्रशासनिक आदेश को चुनौती देने के लिए कानूनी रास्ता अपना सकते हैं।
आगे समझते हैं कि माननीय सुप्रीम कोर्ट इस मामले को किस तरह देखता है-
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय
1961 के बाबूलाल पराटे बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि प्रभावित व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने का पूरा अधिकार है, चाहे वह आदेश बिना किसी की बात सुने ही क्यों न पास किया गया हो। वहीं 2012 से जुड़े रामलीला मैदान मामले में कोर्ट ने कहा कि निषेधाज्ञा सिर्फ तब लगाई जानी चाहिए जब लोक व्यवस्था और शांति के लिए वास्तविक और स्पष्ट खतरा हो। इस शक्ति का इस्तेमाल बहुत सावधानी से और बिना किसी मनमानी के करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में क्या कहा था?
सुप्रीम कोर्ट ने मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में शांतिपूर्ण विरोध और आम जनता के अधिकारों के बीच संतुलन पर विचार किया।
मामला दिल्ली में सार्वजनिक सभाओं, जुलूसों और प्रदर्शनों पर पुलिस द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों से संबंधित था। ये प्रतिबन्ध तत्कालीन आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 144 (वर्तमान में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163) के तहत लगाए गये थे| इसमें जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन और आसपास के निवासियों को होने वाली परेशानी का मुद्दा भी शामिल था।
कोर्ट ने कहा कि:
- नागरिकों को अपनी शिकायतें सरकार तक पहुँचाने के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार है।
- उनकी शिकायतों को संबंधित अधिकारियों तक पहुँचने का अवसर मिलना चाहिए।
- लेकिन प्रदर्शन के कारण आम लोगों को अत्यधिक परेशानी नहीं होनी चाहिए और सार्वजनिक स्थानों का इस्तेमाल संतुलित तरीके से होना चाहिए।
अब अहम सवाल यह कि इस पूरे मामले में जो मूल मुद्दा मुख्य निर्वाचन आयुक्त के त्यागपत्र से जुड़ा है वो क्या कहता है?
दोस्तों , भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान तरीके से और समान आधारों पर ही उनके पद से हटाया जाएगा | यानी इसके लिए संसदीय प्रक्रिया को अपनाया जाता है|
क्या है तरीका ?
न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन न्यायाधीश जाँच अधिनियम, 1968 में किया गया है। अधिनियम में पद से हटाने के लिए निम्नलिखित चरण निर्धारित हैं:
- इस अधिनियम के तहत, हटाने से संबंधित प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। कार्यवाही शुरू करने के लिए: (i) लोकसभा के कम से कम 100 सदस्य अध्यक्ष को हस्ताक्षरित सूचना दे सकते हैं, या (ii) राज्यसभा के कम से कम 50 सदस्य सभापति को हस्ताक्षरित सूचना दे सकते हैं। अध्यक्ष या सभापति संबंधित व्यक्तियों से परामर्श कर सकते हैं और सूचना से संबंधित प्रासंगिक सामग्री की जाँच कर सकते हैं। इसके आधार पर, वे प्रस्ताव को स्वीकार करने या अस्वीकार करने का निर्णय ले सकते हैं।
- यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो अध्यक्ष या सभापति(जिन्हें यह प्रस्ताव प्राप्त होता है) शिकायत की जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन करेंगे। इसमें निम्नलिखित सदस्य होंगे: (i) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश; (ii) उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश; और (iii) एक प्रतिष्ठित न्यायविद। समिति आरोपों का निर्धारण करेगी, जिसके आधार पर जाँच की जाएगी। आरोपों की एक प्रति न्यायाधीश को भेजी जाएगी, जो लिखित बचाव प्रस्तुत कर सकते हैं।
- अपनी जाँच पूरी करने के बाद, समिति अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष या संसद अध्यक्ष को सौंपेगी, जो फिर उस रिपोर्ट को संसद के संबंधित सदन के समक्ष रखेंगे। यदि रिपोर्ट में दुर्व्यवहार या अक्षमता का कोई निष्कर्ष निकलता है, तो बर्खास्तगी प्रस्ताव पर विचार-विमर्श किया जाएगा।
- संसद के प्रत्येक सदन द्वारा सदन से सदन को हटाने के प्रस्ताव को पारित करने के लिए निम्नलिखित आवश्यक हैं: (i) सदन के कुल सदस्यों का बहुमत; और (ii) सदन के उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का बहुमत। यदि प्रस्ताव इस बहुमत से पारित हो जाता है, तो इसे दूसरे सदन में पारित होने के लिए भेजा जाएगा।
- एक बार जब प्रस्ताव दोनों सदनों में पारित हो जाता है, तो इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है, जो न्यायाधीश को हटाने का आदेश जारी करेंगे।
अर्थात इसी तरीके से मुख्य निर्वाचन आयुक्त को भी हटाया जाता है| न्यायाधीश को हटाने का आधार साबित कदाचार या अक्षमता को माना गया है | ऐसे में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के मामले में भी यही आधार लागू होते हैं|
क्या मुख्य निर्वाचन आयुक्त इस्तीफा दे सकता है?
मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 11 इस्तीफे और पद से हटाने से संबंधित है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त या कोई निर्वाचन आयुक्त कभी भी राष्ट्रपति को अपने हस्ताक्षर से लिखित पत्र भेजकर अपने पद से इस्तीफा दे सकता है।
क्या मुख्य निर्वाचन आयुक्त को गिरफ्तार किया जा सकता है?
दरअसल, संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 पारित किया, जो 2024 में लागू हुआ। इसकी धारा 16 किसी ऐसे व्यक्ति को, जो केंद्रीय निर्वाचन आयुक्त या निर्वाचन आयुक्त है या रह चुका है, आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन के दौरान या उसके संबंध में किए गए किसी कार्य, वस्तु या शब्द के लिए अदालत में दीवानी या आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा प्रदान करती है।
यह प्रावधान महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस व्यक्ति को भी संरक्षण प्रदान करता है जो मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त "है या थी"।
हालांकि, धारा 16 में स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा गया है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। इसमें कहा गया है कि कोई भी न्यायालय इस प्रावधान के अंतर्गत आने वाले आचरण से संबंधित दीवानी या आपराधिक कार्यवाही पर विचार नहीं करेगा या उसे जारी नहीं रखेगा। इस धारा में "गिरफ्तारी", "जाँच" या "पुलिस हिरासत" जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है। इसलिए इसे गिरफ्तारी से पूर्ण छूट के रूप में वर्णित नहीं किया जा सकता है।
निष्कर्ष
लोकतंत्र में सरकार को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन इस शक्ति का प्रयोग उचित और आवश्यक सीमा में होना चाहिए। वहीं, नागरिकों को भी लागू कानूनी आदेशों का पालन करना चाहिए और गलत आदेश के खिलाफ कानूनी उपाय अपनाने चाहिए।






