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बच्चों का इंटरनेट इस्तेमाल करना एक मौलिक अधिकार : सुप्रीम कोर्ट

Supreme Court ruling on children’s right to internet access explained. Understand fundamental rights, Article 21, online safety, digital privacy.

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Written by Dilip Kumar
Published: 18 October 2026•6 min read
बच्चों का इंटरनेट इस्तेमाल करना एक मौलिक अधिकार : सुप्रीम कोर्ट
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बच्चों का इंटरनेट इस्तेमाल करना एक मौलिक अधिकार : सुप्रीम कोर्ट

बच्चों के लिए इंटरनेट तक पहुँच और उसका उपयोग करना उनके मौलिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है। यह मुद्दा केवल मोबाइल या सोशल मीडिया के इस्तेमाल का नहीं, बल्कि शिक्षा, अभिव्यक्ति, सूचना तक पहुँच, समान अवसर और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा का भी है।

चर्चा में क्यों?

सुप्रीम कोर्ट ने हालिया एक निर्णय में कहा है कि बच्चों को भी इंटरनेट तक पहुँचने और उसका उपयोग करने का मौलिक अधिकार है। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(a) के साथ पढ़ा जाएगा। कोर्ट के अनुसार, बच्चों की सुरक्षा के नाम पर उन्हें पूरी तरह इंटरनेट से दूर करना उचित समाधान नहीं है। इंटरनेट पर बच्चों के शोषण और दुर्व्यवहार को रोकने के लिए उन लोगों तथा प्लेटफॉर्मों पर कार्रवाई होनी चाहिए जो ऐसी सामग्री बनाते, फैलाते या हटाने में विफल रहते हैं न कि बच्चों को ही समस्या मानकर उनके अधिकार छीन लिए जाएँ।

अनुच्छेद 21- जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान कहता है कि किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है। डिजिटल दुनिया आज शिक्षा, सूचना, सामाजिक संपर्क और व्यक्तिगत विकास का माध्यम है। डिजिटल पहुँच को गरिमापूर्ण जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़ा जा सकता है।

अनुच्छेद 19(1)(a) - वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता यह भारतीय नागरिकों को बोलने और अपनी बात रखने की स्वतंत्रता देता है। बच्चे इंटरनेट के माध्यम से अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं, जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, शैक्षिक चर्चाओं में भाग ले सकते हैं और अपनी रचनात्मकता प्रदर्शित कर सकते हैं। हालंकि ध्यान देने वाली बात यह है कि संविधान में इंटरनेट तक पहुँच को स्पष्ट रूप से एक अलग मौलिक अधिकार के रूप में स्थान नहीं किया गया है।

क्या बच्चों के इंटरनेट उपयोग पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जा सकता है? कोर्ट ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के नाम पर सभी बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के विचार पर अपनी सहमती नहीं जताई. कोर्ट ने इस बारे में निम्नलिखित पक्ष रखे: प्रतिबंध के बावजूद बच्चे छिपकर इंटरनेट इस्तेमाल कर सकते हैं। वे कम सुरक्षित या कम नियंत्रित प्लेटफॉर्मों पर जा सकते हैं। यदि बच्चों को डर हो कि इंटरनेट इस्तेमाल करने के कारण उन्हें सजा मिलेगी, तो वे ऑनलाइन धमकी या शोषण की शिकायत करने से कतरा सकते हैं। पूर्ण प्रतिबंध से बच्चों की शिक्षा, सूचना और अभिव्यक्ति प्रभावित हो सकती है। इससे ऑनलाइन अपराध करने वालों तथा गैर-जिम्मेदार प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही तय करने का मूल मुद्दा हल नहीं होता।

इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए उचित सुरक्षा उपाय और उम्र के अनुरूप प्रतिबंध आवश्यक हो सकते हैं। हानिकारक सामग्री या कुछ विशेष सेवाओं तक पहुँच सीमित करने पर विचार किया जा सकता है।

इस मामले में Child Sexual Exploitation and Abuse Material (CSEAM) क्या है?

CSEAM का पूरा नाम है Child Sexual Exploitation and Abuse Material, अर्थात बच्चों के यौन शोषण या दुर्व्यवहार से संबंधित सामग्री। इसमें ऐसी सामग्री शामिल हो सकती है जो बच्चों के यौन शोषण को दर्शाती है या उससे संबंधित होती है। ऐसी सामग्री का निर्माण, प्रसार और प्रसार में सहायता बच्चों के अधिकारों तथा सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। कोर्ट ने इस बात पर विचार किया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसी सामग्री की पहचान, रिपोर्टिंग और उसे हटाने के अपने दायित्वों को कितनी प्रभावी तरह पूरा कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित कदम उठाने का निर्देश दिया:

1. राष्ट्रीय Hash और URL डेटाबेस: केंद्र सरकार को पुष्ट की गई अवैध शोषणकारी सामग्री से जुड़े डिजिटल पहचान संकेतकों और URL की राष्ट्रीय सूची बनाने का निर्देश दिया गया, ताकि प्लेटफॉर्म समान सामग्री को पहचानकर हटा सकें।

2. तकनीकी पहचान और सामग्री हटाना: सरकार को perceptual hash-matching, URL listing और अन्य तकनीकी उपायों के लिए विस्तृत दिशानिर्देश तथा मानक संचालन प्रक्रियाएँ (SOPs) बनाने को कहा गया।

3. मानवीय सत्यापन: डेटाबेस में शामिल किए जाने वाले प्रत्येक रिकॉर्ड की कई स्तरों पर जाँच और कम-से-कम तीन प्रशिक्षित मानव विश्लेषकों द्वारा अंतिम स्वतंत्र मूल्यांकन की व्यवस्था पर निर्देश दिए गए।

4. गोपनीयता और गलत पहचान से सुरक्षा: डेटाबेस में वास्तविक दुर्व्यवहार सामग्री रखने के बजाय संबंधित डिजिटल पहचान और URL रखने की व्यवस्था बताई गई। गलत पहचान या गलत तरीके से सामग्री हटाए जाने पर शिकायत और सुधार की प्रक्रिया भी आवश्यक है। इन निर्देशों का उद्देश्य ऐसी सामग्री को तेजी से पहचानना और हटाना है, साथ ही गलत पहचान, अनुचित निगरानी तथा निजता के उल्लंघन का जोखिम कम करना है। कोर्ट ने सरकार से मौजूदा व्यवस्था की प्रगति पर जानकारी भी माँगी।

कुछ महत्त्वपूर्ण शब्दावलियाँ: URL: इंटरनेट पर किसी पेज या सामग्री का पता। Hash: किसी डिजिटल फाइल की पहचान करने में मदद करने वाला डिजिटल संकेतक। Perceptual hash: ऐसी तकनीक जो दृश्य या मीडिया सामग्री के समान रूपों को पहचानने में मदद कर सकती है, भले ही फाइल में कुछ बदलाव किए गए हों।

डिजिटल इंडिया और बच्चों के इंटरनेट अधिकार

इंटरनेट का उपयोग आज केवल मनोरंजन के लिए नहीं होता। यह शिक्षा, सरकारी सेवाओं, जानकारी और सामाजिक भागीदारी का माध्यम बन चुका है। बच्चों के लिए इंटरनेट का महत्व: ऑनलाइन पढ़ाई और डिजिटल पुस्तकालय। ग्रामीण क्षेत्रों में शैक्षिक संसाधनों तक पहुँच। दिव्यांग बच्चों के लिए सहायक तकनीक और समुदायों से जुड़ने के अवसर। वैज्ञानिक जानकारी, रचनात्मक गतिविधियों और कौशल विकास तक पहुँच। अपनी समस्याओं के बारे में जानकारी प्राप्त करना और सहायता माँगना। सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से यह बात रेखांकित की कि दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों के लिए इंटरनेट शिक्षा और सूचना का प्रमुख माध्यम हो सकता है। विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए भी यह सामाजिक संपर्क का महत्वपूर्ण साधन हो सकता है।

आगे की राह उपरोक्त चर्चा के आधार पर निम्नलिखित पक्षों पर ध्यान देने की जरुरत है:

1. अधिकार और सुरक्षा में संतुलन: बच्चों की आयु, जरूरत और जोखिम के अनुसार प्रतिबंध बनाए जाएँ। सभी बच्चों पर एक जैसा पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय अनुपातिक और लक्षित उपाय अपनाए जाएँ।

2. प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही: सोशल मीडिया कंपनियों को शोषणकारी सामग्री की पहचान, रिपोर्टिंग, हटाने और पीड़ितों की सहायता के लिए प्रभावी व्यवस्था लागू करनी चाहिए।

3. डिजिटल साक्षरता: स्कूलों में बच्चों को ऑनलाइन धोखाधड़ी, साइबर बुलिंग, निजता, सहमति और सुरक्षित व्यवहार के बारे में उम्र के अनुरूप शिक्षा दी जानी चाहिए।

4. अभिभावक और शिक्षक की भूमिका: बच्चों के साथ खुला संवाद, उचित निगरानी और भरोसे का वातावरण बनाया जाए, ताकि वे ऑनलाइन परेशानी होने पर बिना डर मदद माँग सकें।

5. निजता-सुरक्षित तकनीक: आयु सत्यापन और बाल-सुरक्षा प्रणालियों को इस तरह तैयार किया जाए कि अनावश्यक व्यक्तिगत डेटा एकत्र न हो और निगरानी का दुरुपयोग न किया जा सके।

6. पीड़ित-केंद्रित सहायता: ऑनलाइन शोषण का सामना करने वाले बच्चों को शिकायत दर्ज करने, कानूनी सहायता, परामर्श और मनोवैज्ञानिक सहयोग तक आसान पहुँच मिलनी चाहिए।

निष्कर्ष:

इस फैसले का व्यापक संदेश यह है कि बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने का अर्थ उन्हें डिजिटल दुनिया से बाहर करना नहीं, बल्कि डिजिटल दुनिया को उनके लिए अधिक सुरक्षित, समावेशी और जवाबदेह बनाना है।

Reference : The Hindu

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