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Unit2

Chapter 2

अध्याय दस

विद्रोही और राज

1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

10 मई 1857 की दोपहर बाद मेरठ छावनी में सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया। हलचल की शुरुआत भारतीय सैनिकों से बनी पैदल सेना से हुई थी जो जल्द ही घुड़सवार फौज और फिर शहर तक फैल गई। शहर और आसपास के देहात के लोग सिपाहियों के साथ जुड़ गए। सिपाहियों ने शस्त्रागार पर क्रब्जा कर लिया जहाँ हथियार और गोला-बारूद रखे हुए थे। इसके बाद उन्होने गोरों पर निशाना साधा और उनके बंगलों, साजो-सामान को तहस-नहस करना और जलाना-फृँकना शुरू कर दिया। रिकॉर्ड दक्तर, जेल, अदालत, डाकखाने, सरकारी खजाने, जैसी सरकारी इमारतों को लूटकर तबाह किया जाने लगा। शहर को दिल्ली से जोड़ने बाली टेलीग्राफ़ लाइन काट दी गई। अँधेरा पसरते ही सिपाहियों का एक जत्था घोड़ों पर सवार होकर दिल्ली की तरफ़ चल पड़ा।

चित्र 10.1बहादुर शाह का चित्र
चित्र 10.1बहादुर शाह का चित्र

यह जत्था 11 मई को तड़के लाल क्रिले के फाटक पर पहुंचा। रमज्ञान का महीना था। मुगल सम्बाट बहादुर शाह नमाज्ञ पढ़कर और सहरी (रोज्ञे के दिनों में सूरज उगने से पहले का भोजन) खाकर उठे थे। उन्हें फाटक पर हो-हल्ला सुनाई दिया। बाहर खड़े सिपाहियों ने जानकारी दी कि “हम मेरठ के सभी अंग्रेज्ञ पुरुषों को मारकर आए हैं क्योंकि वे हमें गाय और सुअर की चर्बी में लिपटे कारतूस दाँँतों से खींचने के लिए मजबूर कर रहे थे। इससे हिंदू और मुसलमान, सबका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा।" तब तक सिपाहियों का एक और जत्था दिल्ली में दाखिल हो चुका था और शहर के आम लोग उनके साथ जुड़ने लगे थे। बहुत सारे यूरोपियन लोग मारे गए, दिल्ली के अमीर लोगों पर हमले हुए और लूटपाट हुई। दिल्ली अंग्रेज्ञों के नियंत्रण से बाहर जा चुकी थी। कुछ सिपाही लाल क्रिले में दाखिल होने के लिए दरबार के शिष्टाचार का पालन किए बिना बेधड़क क्रिले में घुस गए थे। उनकी माँग थी कि बादशाह उन्हें अपना आशीर्वाद दें। सिपाहियों से घिरे बहादुर शाह के पास उनकी बात मानने के अलावा और कोई चारा न था। इस तरह इस विद्रोह ने एक वैधता हासिल कर ली क्योंकि अब उसे मुगल बादशाह के नाम पर चलाया जा सकता था।

12 और 13 मई को उत्तर भारत में शाँति रही। लेकिन जैसे ही यह खृबर फैली कि दिल्ली पर विद्रोहियों का क्रब्जा हो चुका है और बहादुर शाह ने विद्रोह को अपना समर्थन दे दिया है, हालात तेज्ञी से बदलने लगे। गंगा घाटी की छावनियों और दिल्ली के पश्चिम की कुछ छावनियों में विद्रोह के स्वर तेज्ञ होने लगे।

1. विद्रोह का ढरा

यदि इन विद्रोहां को तारीख़ के हिसाब से सिलसिलेवार रखा जाए तो ऐसा लगता है कि जैसे-जैसे विद्रोह की खृबर एक शहर से दूसरे शहर में पहुँचती गई वैसे-वैसे सिपाही हथियार उठाते गए। हर छवनी में विद्रोह का घटनाक्रम कमोबेश एक जैसा था।

1.1 सैन्य विद्रोह कैसे शुरू हुए

सिपाहियों ने किसी न किसी विशेष संकेत के साथ अपनी कार्वाई शुरूकी। कई जगह शाम के समय तोप का गोला दागा गया तो कहीं बिगुल बजाकर विद्रोह का संकेत दिया गया। सबसे पहले उन्होंने शस्त्रागार पर क़ब्जा किया और सरकारी खृज्ञाने को लूटा। इसके बाद उन्होंने जेल, सरकारी खृज्ञाने, टेलीग्राफ्र दप्तर, रिकॉर्ड रूम, बंगलों, तमाम सरकारी इमारतों पर हमला किया और सारे रिकॉर्ड जलाते चले गए। गोरों से संबंधित हर चीज्ञ और हर शख्प हमले का निशाना था। हिंदुओं और मुसलमानों, तमाम लोगों को एकजुट होने और फ्रिरंगियों का सफाया करने के लिए हिंदी, उर्दू और फ्रासी में अपीलें जारी होने लगों।

विद्रोह में आम लोगों के भी शामिल हो जाने के साथ-साथ हमलों का दायरा फैल गया। लखनऊ, कानपुर और बरेली जैसे बड़े शहरों में साहूकार और अमीर भी विद्रोहियों के गुस्से का शिकार बनने लगे। किसान इन लोगों को न केवल अपना उत्पीड़क बल्कि अंग्रेजों का पिट्टू मानते थे। ज्यादातर जगह अमीरों के घर-बार लूटकर तबाह कर दिए गए। सिपाहियों की क्रतारों में हुए इन छिटपुट विद्रोहां ने जल्दी ही एक चौतरफ़ा विद्रोह का रूप ले लिया। शासन की सत्ता और सोपानों की सरेआम अवहेलना होने लगी।

फिरंगी, फ्रासी भाषा का शब्द है जो संभवतः फ्रैंक (जिससे फ्रांस का नाम पड़ा है) से निकला है। इसे उदू और हिंदी में पश्चिमी लोगों का मज्ञाक उड़ाने के लिए कभी-कभी इसका प्रयोग अपमानजनक दृष्टि से भी किया जाता है।

चित्र 10.2

लखनऊ में ब्रिटिश लोगों के खिलाफ्र हमलें में आम लोग भी सिपाहियों के साथ आ जुटते हैं।

Textbook illustration

मई-जून के महीनों में अंग्रेज्ञों के पास विद्रोहियों की कार्वाइयों का कोई जवाब नहीं था। अंग्रेज्ञ अपनी जिंद्गी और घर-बार बचाने में फँसे हुए थे। जैसा कि एक ब्रिटिश अफसर ने लिखा, ब्रिटिश शासन “ताश के क्रिले की तरह बिखर गया।”

स्त्रोत 1

असामान्य समय में सामान्य जीवन

विद्रोह के महीनों में शहरों में क्या हुआ? उथल-पुथल के उन दिनों में लोग अपनी जिंदगी कैसे जी रहे थे? सामान्य जीवन किस तरह प्रभावित हुआ? विभिन्न शहरों की रिपोटों से पता चलता है कि सामान्य गतिविधियाँ अस्त-व्यस्त हो गई थी। दिल्ली उदूर अखबार, 14 जून 1857 की इन रिपोटों को पढ़िए :

यही हालात सञ्जियों और साग (पालक) के भी हैं। लोग इस बात पर शिकायत कर रहे हैं कि बाज्ञारों में कहू और बैंगन तक नहीं मिलते। आलू और अरबी अगर मिलती भी हैं तो बासी, सड़ी जिसे कुँजड़ों (सञ्जी बेचने वाले) ने रोक कर (जमाकर) रखा हुआ था। शहर में स्थित बागा-बगीचों से कुछ माल चंद इलाकों तक पहुँच जाता है लेकिन गरीब और मध्यवर्ग वाले उन्हें देखकर बस होठों पर जीभ फिरा कर रह जाते हैं (क्योंकि वे चीजँं खास लोगों के लिए ही हैं)।

इन दोनों रिपोटाँ तथा उस दौरान दिल्ली के हालात के बारे में इस अध्याय में दिए गए विवरणों को पढ़े। याद रखें कि अखृबारों में छपी खृबरें अकसर पत्रकार के पूर्वाग्रह या सोच से प्रभावित होती हैं। इस आधार पर बताएँ कि दिल्ली उर्दू अखृबार लोगों की गतिविधियों को किस नज्तर से देखता था?

... यहाँ एक और चीज्ञ पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए जिससे लोगों को बड़ा नुकसान हो रहा है। मामला यह है कि पानी भरने वालों ने पानी भरना बंद कर दिया है। गारीब शुरफ्रा (शरीफ लोग) खुद घड़ों में पानी भरकर लाते हैं और तब जाकर घर में खाना बनता है। हलालखौर हरामखौर हो गए हैं। कई दिनों से बहुत सारे मोहल्लों में कोई आमदनी नहीं हुई है और यही हालात बने रहे तो गंदगी, मौत और बीमारियाँ शहर की आबो-हवा खराब कर देंगी और शहर महामारी की गिरफ्त में आ जाएगा, यहाँ तक कि आस-पास के इलाके भी उसकी चपेट में आ जाएँगे।

1.2 संचार के माध्यम

अलग-अलग स्थानों पर विद्रोह के ढरें में समानता की वजह आंशिक रूप से उसकी योजना और समन्वय में निहित थी। इसमें कोई शक नहीं कि विभिन्न छावनियों के सिपाहियों के बीच अच्छा संचार बना हुआ था। जब सातवीं अवध इरेंग्युलर कैवेलरी ने मई की शुरुआत में नए कारतूसों का इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया तो उन्होंने 48 नेटिव इन्फेंट्री को लिखा कि “हमने अपने धर्म की रक्षा के लिए यह फ्रैसला लिया है और 48 नेटिव इन्फेंट्री के हुक्म का इंतज्ञार कर रहे हैं।” सिपाही या उनके संदेशवाहक एक जगह से दूसरी जगह जा रहे थे। लब्बोलुआब ये कि लोग बस बग्गावत के मंसूबे गढ़ रहे थे और उसी के बारे में बात करते थे।

सिस्टन और तहसीलदार

विद्रोह और सैनिक अवज्ञा के संदर्भ में सीतापुर के देसी ईसाई पुलिस इस्पेक्टर फ्रांस्वाँँ सिस्टन का अनुभव हमें बहुत कुछ बताता है। वह मजिस्ट्रेट के पास शिष्टाचारवश मिलने सहारनपुर गया हुआ था। सिस्टन हिंदुस्तानी कपड़े पहने था और आलथी-पालथी मारकर बैठा था। इसी बीच बिजनौर का एक मुस्लिम तहसीलदार कमरे में दाखिल हुआ। जब उसे पता चला कि सिस्टन अवध में तैनात है तो उसने पूछा, “क्या खृबर है अवध की? काम कैसा चल रहा है?” सिस्टन ने कहा, “अगर हमें अवध में काम मिलता है तो जनाब-ए-आली को भी पता चल जाएगा।” इस पर तहसीलदार ने कहा, “भरोसा रखो, इस बार हम कामयाब होंगे। मामला काबिल हाथों में है।” बाद में पता चला कि यह तहसीलदार बिजनौर के विद्रोहियों का सबसे बड़ा नेता था।

विद्नोही अपनी योजनाओं को किस तरह एक-दूसरे तक पहुँचाते थे, इस बारे में इस बातचीत से क्या पता चलता है? तहसीलदार ने सिस्टन को संभावित विद्नोही क्यों मान लिया था?

विद्रोहां की बनावट और जिन साक्ष्यों के आधार पर ऐसा लगता है कि इन विद्रोहां में एक योजना और समन्वय था, उनको देखकर कुछ अहम सवाल खड़े होते हैं। ये योजनाएँ कैसे बनाई गई? योजनाकार कौन थे? मौजूदा दस्तावेजों के आधार पर इन सवालों के सीधे-सीधे जवाब देना कठिन है। फिर भी, एक घटना इस बारे में कुछ सुरागा जरूर देती है कि ये विद्रोह इतने सुनियोजित कैसे थे। विद्रोह के दौरान अवध मिलिट्री पुलिस के कैप्टेन हियसे की सुरक्षा का जिम्मा भारतीय सिपाहियों पर था। जहाँ कैप्टेन हियसे तैनात था वहीं 41वीं नेटिव इन्फेंट्री भी तैनात थी। इन्फेंट्री की दलील थी कि क्योंकि वे अपने तमाम गोरे अफ्रसरों को खृत्म कर चुके हैं इसलिए अवध मिलिट्री का फर्ज बनता है कि या तो वे हियसे को मौत की नींद सुला दें या उसे गिरफ्तार करके 41वीं नेटिव इन्फेंट्री के हवाले कर दें। मिलिट्री पुलिस ने दोनों दलीलें खारिज कर दीं। अब यह तय किया गया कि इस मामले को हल करने के लिए हर रेजीमेंट के देशी अफ्रसरों की एक पंचायत बुलाई जाए। इस विद्रोह के शुरुआती इतिहासकारों में से एक, चाल्स बॉल ने लिखा है कि ये पंचायतें रात को कानपुर सिपाही लाइनों में जुटती थीं। इसका मतलब है कि सामूहिक रूप से कुछ प्रैसले जरूर लिए जा रहे थे। क्योंकि सिपाही लाइनों में रहते थे और सभी की जीवनशैली एक जैसी थी और क्योंकि उनमें बहुत सारे प्रायः: एक ही जाति के होते थे इसलिए इस बात का अंदाज्ञा लगाना मुश्कल नहीं है कि वे इकट्रा बैठकर अपने भविष्य के बारे में प्रैसले ले रहे होंगे। ये सिपाही अपने विद्रोह के कर्ताधर्ता खुद ही थे।

चित्र 10.3
चित्र 10.3
रानी लक्ष्मीबाई, एक प्रचलित चित्रचित्र 10.4नाना साहिब
रानी लक्ष्मीबाई, एक प्रचलित चित्रचित्र 10.4नाना साहिब

1858 के अंत में जब विद्रोह विफल हो गया तो नाना साहिब भाग कर नेपाल चले गए। उनके भागने की घटना को नाना साहिब के साहस और बहादुरी की कहानी का हिस्सा बताया जाता है।

1.3 नेता और अनुयायी

अंग्रेज्ञों से लोहा लेने के लिए नेतृत्व और संगठन जरूरी थे। इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए विद्रोहियों ने कई बार ऐसे लोगों की शरण ली जो अंग्रेज्ञों से पहले नेताओं की भूमिका निभाते थे। जैसा कि हम पीछे देख चुके हैं, मेरठ के सिपाहियों ने सबसे पहले जो काम किए उनमें एक यह था कि वे फौरन दिल्ली गए और उन्होंने बृढ़े हो चुके मुगाल बादशाह से विद्रोह का नेतृत्व स्वीकार करने की दरख्वास्त की। लेकिन इस निवेदन पर सहमति हासिल करने में भी वक्त लगा। बहादुर शाह इस खबर पर भयभीत और बैचेन दिखाई दिए। बहादुर शाह ने नाममात्र का नेता बनने की ज्ञिम्मेदारी भी तब स्वीकार की जब कुछ सिपाही शाही शिष्टाचार की अवहेलना करते हुए जबरन लाल क्रिले के मुगाल दरबार में जा घुसे और बहादुर शाह के पास बाकई कोई चारा नहीं बचा था।

अन्य स्थानों पर भी, छोटे पैमाने पर ही सही, इसी तरह के दृश्य घट चुके थे। कानपुर में सिपाहियों और शहर के लोगों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय के उत्तराधिकारी नाना साहिब के सामने बग्रावत की बागडोर संभालने के सिवा और कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा था। झाँसी में रानी को आम जनता के दवाब में बग्रावत का नेतृत्व संभालना पड़ा। कुछ ऐसी ही स्थिति बिहार में आरा के स्थानीय जमींदार कुँवर सिंह की थी। अवध में नवाब वाजिद अली शाह जैसे लोकप्रिय शासक को गही से हटा दिए जाने और उनके राज्य पर क्रब्जा कर लेने की यादें लोगों के जहन में अभी भी ताज्ञा थी। लखनऊ में ब्रिटिश राज के छहने की खबर पर लोगों ने नवाब के युवा बेटे बिरजिस क्रद्र को अपना नेता घोषित कर दिया था।

सभी जगहां पर नेता दरबारों से जुड़े व्यक्ति रानियाँ, राजा, नवाब, ताल्लुक्रदार नहीं थे। अकसर विद्रोह का संदेश आम पुरुषों एवं महिलाओं के ज्ञरिए और कुछ स्थानों पर धार्मिक लोगों के ज्ञरिए भी फैल रहा था। मेरठ से इस आशय की खृबरें आ रही थीं कि वहाँ हाथी पर सवार एक फ्रक्रीर को देखा गया था जिससे सिपाही बार-बार मिलने जाते थे। लखनऊ में अवध पर क्रब्ज्जे के बाद बहुत सारे धार्मिक नेता और स्वयंभू पैगम्बर-प्रचारक ब्रिटिश राज को नेस्तनाबूद करने का अलख जगा रहे थे।

अन्य स्थानों पर किसानों, जमींदारों और आदिवासियों को विद्रोह के लिए उकसाते हुए कई स्थानीय नेता सामने आ चुके थे। शाह मल ने उत्तर प्रदेश में बड़ौत परगना के गाँव वालों को संगठित किया। छोटा नागपुर स्थित सिंहभूम के एक आदिवासी काशतकार गोनू ने इलाके के कोल आदिवासियों का नेतृत्व संभाला हुआ था।

स्त्रोत 3

1857 के दो विद्रोही

शाह मल

शाह मल उत्तर प्रदेश के बड़ौत परगना के एक बड़े गाँव के रहने वाले थे। वह एक जाट कुटुम्ब से संबंध रखते थे जो चौरासी देस (चौरासी गाँव) में फैला हुआ था। इस इलाके की जमीन सिंचाई की सुविधाओं से लैस और उपजाऊ थी। यहाँ कि मिट्टी काली नम थी। बहुत सारे ग्रामीण संपन्न थे और लोग ब्रिटिश भूराजस्व व्यवस्था को दमनकारी मानते थे : लगान की दर ज्यादा और वसूली सर्क्त थी। नतीजा यह था कि किसानों की जमीन बाहरी लोगों के हाथ में जा रही थी। इलाक्रे में आने वाले व्यापारी और महाजन जमीन पर क्रब्जा करते जा रहे थे।

शाह मल ने चौरासी देस के मुखियाओं और काश्तकारों को संगठित किया। इसके लिए उन्होंने रात के साए में गाँव-गाँव जाकर बात की और लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ़ विद्रोह के लिए तैयार किया। बहुत सारे दूसरे स्थानों की तरह यहाँँ भी अंग्रेजों के खिलाफ़ आंदोलन एक व्यापक विद्रोह में तब्दील हो गया। अब विरोध उत्पीड़न और अन्याय के तमाम चिहां के खिलाफ़ होने लगा। किसान अपने खेत छोड़कर निकल पड़े और महाजनों व व्यापारियों के घर-बार लूटने लगे। बेदखृल भूस्वामियों ने छिन चुकी ज्ञमीनों पर दोबारा क्रब्जा कर लिया। शाह मल के आदमियों ने सरकारी इमारतों पर हमला किया, नदी का पुल ध्वस्त कर दिया और पक्की सड़कों को खोद डाला। इसकी एक वजह यह थी कि वे सरकारी फौजों का रास्ता रोकना चाहते थे। दूसरी वजह यह थी कि पुलों और सड़कों को ब्रिटिश शासन का प्रतीक माना जाता था। उन्होंने दिल्ली में विद्रोह करने वाले सिपाहियों को रसद पहुँचाई और ब्रिटिश हेडक्वार्टर व मेरठ के बीच तमाम सरकारी संचार बंद कर दिया। स्थानीय स्तर पर राजा कहलाने वाले शाह मल ने एक अंग्रेज़ अफ्रसर के बंगले में डेरा डाला, उसे “न्याय भवन” का नाम दिया और वहीं से झगड़ों और विवादों का फैसला करने लगे। उन्होंने गुप्तचरी का भी हैरतअंगेज्ञ नेटवर्क स्थापित कर लिया था। कुछ समय के लिए लोगों को लगा कि फ्रिंगी राज खत्म हो चुका है और उनका राज आ गया है। जुलाई 1857 में शाह मल को युढ़ में मार दिया गया।

मौलवी अहमदुल्ला शाह

मौलवी अहमदुल्ला शाह 1857 के विद्रोह में अहम भूमिका निभाने वाले बहुत सारे मौलवियों मे से एक थे। हैदराबाद में शिक्षित शाह काफ़ी कम उम्र में ही उपदेशक बन गए थे। 1856 में उन्हें अंग्रेज्ञों के खिलाफ़ जिहाद का प्रचार करते और लोगों को विद्रोह के लिए तैयार करते हुए गाँव-गाँव जाते देखा गया था। वे एक पालकी में बैठकर चलते थे। पालकी के आगे-आगे ढोल और पीछे उनके समर्थक होते थे। इसीलिए उन्हें लोग-बाग डंका शाह कहने लगे थे। ब्रिटिश अफ़सर इस बात से परेशान थे कि मौलवी के साथ हजारों लोग जुट रहे थे और बहुत सारे मुसलमान उन्हें पैगम्बर मानने लगे थे और समझते थे कि वह इस्लाम के आदर्शों से ओतप्रोत हैं। जब 1856 में वे लखनऊ पहुँचे तो पुलिस ने उन्हें शहर में उपदेश देने से रोक दिया। 1857 में उन्हें फैज्ञाबाद जेल में बंद कर दिया गया। रिहा होने पर उन्हें 22वीं नेटिव इन्फेंट्री के विद्रोहियों ने अपना नेता चुन लिया। उन्होंने चिनहाट के विख्यात संघर्ष में हिस्सा लिया जिसमें हेनरी लारौंस की अगुवाई बाली टुकड़ियों को मुँह की खानी पड़ी। मौलवी साहब को उनकी बहादुरी और ताकत के लिए जाना जाता था। बहुत सारे लोग मानते थे कि उनको कोई नहीं हरा सकता; उनके पास जादुई शक्तियाँ हैं और अंग्रेज्ञु उनका बाल भी बाँका नहीं कर सकते। काफ़ी हद तक इसी विशवास के कारण उन्हें लोगों में इतना अधिकार प्राप्त था।

चित्र 10.5
चित्र 10.5

हेनरी हार्डिंग, फ्रांसेस ग्रांट द्वारा बनाया चित्र, 1849

गवर्नर जनरल के तौर पर हार्डिंग ने सैनिक साजो-सामान के आधुनिकीकरण का प्रयास किया। उसने जिन एन्फ्रील्ड राइफ्रलों का इस्तेमाल शुरू किया उनमें चिकने कारतूसों का इस्तेमाल होता था जिनके खिलाफ्र सिपाहियों ने विद्रोह किया था।

1.4 अफ़वाहें और भविष्यवाणियाँ

तरह-तरह की अफ़वाहों और भविष्यवाणियों के जरिए लोगों को उठ खड़ा होने के लिए उकसाया जा रहा था। जैसा कि हमने पीछे देखा, मेरठ से दिल्ली आने वाले सिपाहियों ने बहादुर शाह को उन कारतूसों के बारे में बताया था जिन पर गाय और सुअर की चर्बी का लेप लगा था। उनका कहना था कि अगर वे इन कारतूसों को मुँह से लगाएँगे तो उनकी जाति और मजहब, दोनों भ्रष्ट हो जाएँगे। सिपाहियों का इशारा एन्फौल्ड राइफ़ल के उन कारतूसों की तरफ़ था जो हाल ही में उन्हें दिए गए थे। अंग्रेजों ने सिपाहियों को लाख समझाया कि ऐसा नहीं है लेकिन यह अफ़वाह उत्तर भारत की छावनियों में जंगल की आग की तरह फैलती चली गई।

इस अफ़वाह का स्त्रोत ढूँढा जा सकता है। राइफल इस्ट्रक्शन डिपो के कमांडेंट कैप्टेन राइट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि दम दम स्थित शस्त्रागार में काम करने वाले “नीची जाति” के एक खलासी ने जनवरी 1857 के तीसरे हप्फते में एक ब्राह्मण सिपाही से पानी पिलाने के लिए कहा था। ब्राह्मण सिपाही ने यह कहकर अपने लोटे से पानी पिलाने से इनकार कर दिया कि “नीची जाति” के छूने से लोटा अपवित्र हो जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक, इस पर खलासी ने जवाब दिया कि “(वैसे भी) जल्दी ही तुम्हारी जाति भ्रष्ट होने वाली है क्योंकि अब तुम्हंं गाय और सुअर की चर्बी लगे कारतूसों को मुँह से खींचना पड़ेगा।" इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता के बारे में कहना मुशिकल है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि जब एक बार यह अफ़वाह फैलना शुरू हुई तो अंग्रेज्ञ्र अफ़सरों के तमाम आश्वासनों के बावजूद इसे खृत्म नहीं किया जा सका और इसने सिपाहियों में एक गहरा गुस्सा पैदा कर दिया।

1857 की शुरुआत तक उत्तर भारत में यही एक अफ्रवाह नहीं थी। यह अफ्रवाह भी जोरों पर थी कि अंग्रेज्ञ सरकार ने हिंदुओं और मुसलमानों की जाति और धर्म को नष्ट करने के लिए एक भयानक साजिश रच ली है। अफ्रवाह फैलाने वालों का कहना था कि इसी मकसद को हासिल करने के लिए अंग्रेज्ञों ने बाज्ञार में मिलने वाले आटे में गाय और सुअर की हड्डिडयों का चूरा मिलवा दिया है। शहरों और छावनियों में सिपाहियों और आम लोगों ने आटे को छूने से भी इनकार कर दिया। चारों तरफ्र इस आशय का भय और शक बना हुआ था कि अंग्रेज्ञ हिंदुस्तानियों को ईसाई बनाना चाहते हैं। यह बेचैनी बहुत तेजी से फैली। ब्रिटिश अफ्रसरों ने लोगों को अपनी बात का यकीन दिलाने का भरसक प्रयास किया लेकिन नाकामयाब रहे। इन्हीं बेचैनियों ने लोगों को अगला कदम उठाने के लिए झिंझोड़ा। किसी बड़ी कार्वाई के आह्वान को इस भविष्यवाणी से और बल मिला कि प्लासी की जंग के 100 साल पूरा होते ही 23 जून 1857 को अंग्रेज्ञी राज खृत्म हो जाएगा।

बात सिफ्र अफ़वाहों तक ही सीमित नहीं थी। उत्तर भारत के विभिन्न भागों से गाँव-गाँव में चपातियाँ बॉटने की भी रिपोर्ट आ रही थीं। बताते हैं कि रात में एक आदमी आकर गाँव के चौकीदार को एक चपाती तथा पाँच और चपातियाँ बनाकर अगले गाँवों में पहुँचाने का निर्देश दे जाता था। और यह सिलसिला यूँ ही चलता जाता था। चपातियाँ बाँटने का मतलब और मक्रसद न उस समय स्पष्ट था और न आज स्पष्ट है। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि लोग इसे किसी आने वाली उथल-पुथल का संकेत मान रहे थे।

1.5 लोग अफ्रवाहों में विश्वास क्यों कर रहे थे?

इतिहास में अफ्रवाहों और भविष्यवाणियों की ताकत को सिफ्र इस आधार पर नहीं समझा जा सकता कि वे वाकई में सच थीं या नहीं। हमें देखना यह चाहिए कि जो उन पर यकीन कर रहे थे उनकी मानसिकता के बारे में इनसे क्या पता चलता है; ये अफ्रवाहें और भविष्यवाणियाँं उनके भय, उनकी आशंकाओं, उनके विश्वासों और प्रतिबढ़ताओं के बारे में क्या बताती हैं। अफ्रवाह तभी फैलती है जब उसमें लोगों के जहन में गहरे दबे डर और संदेह की अनुगूँज सुनाई देती है।

अगर 1857 की इन अफ्रवाहों को 1820 के दशक से अंग्रेजों द्वारा अपनाई जा रही नीतियों के संदर्भ में देखा जाए तो उनका मतलब ज्यादा आसानी से समझा जा सकता है। जैसा कि आपको मालूम होगा, गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक के नेतृत्व में उसी समय से ब्रिटिश सरकार पश्चिमी शिक्षा, पश्चिमी विचारों और पश्चिमी संस्थानों के जरिए भारतीय समाज को “सुधारने” के लिए खास तरह की नीतियाँ लागू कर रही थी। भारतीय समाज के कुछ तबकों की सहायता से उन्होंने अंग्रेजी माध्यम के स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्थापित किए थे जिनमें पश्चिमी विज्ञान और उदार कलाओं (Liberal Arts) के बारे में पढ़ाया जाता था। अंग्रेजों ने सती प्रथा को खृत्म करने (1829) और हिंदू विधवा विवाह को वैधता देने के लिए क्रानून बनाए थे।

शासकीय दुर्बलता और दत्तकता को अवैध घोषित कर देने जैसे बहानों के जरिए अंग्रेजों ने न केवल अवध बल्कि झाँसी और सतारा जैसी बहुत सारी दूसरी रियासतों को भी क्रब्जे में ले लिया था। जैसे ही ऐसी कोई रियासत या इलाका उनके क्रब्जे में आता था, वहाँ अंग्रेज़ अपने छंग की शासन व्यवस्था, अपने क्रानून, भूमि विवादों के निपटारे की अपनी पढ़ति और भूराजस्व वसूली की अपनी व्यवस्था लागू कर देते थे। उत्तर भारत के लोगों पर इन सब कार्वाइयों का गहरा असर हुआ।

लोगों को लगता था कि वे अब तक जिन चीजों की क्रद्र करते थे, जिनको पवित्र मानते थे चाहे राजे-रजवाड़े हों, सामाजिक-धार्मिक रीति-रिवाज हों या भूस्वामित्व, लगान अदायगी की प्रणाली हो उन सबको खृत्म करके एक ऐसी व्यवस्था लागू की जा रही थी जो ज्यादा हद्यहीन, परायी और दमनकारी थी।

र चर्चा कीजिए...

इस भाग को एक बार और पढ़िए तथा विद्रोह के दौरान नेता कैसे उभरते थे, इस बारे में समानताओं और भिन्नताओं की व्याख्या कीजिए। किन्हीं दो नेताओं के बारे में बताइए कि आम लोग उनकी तरफ्र क्यों आकर्षित हो जाते थे।

इस सोच को ईसाई प्रचारकों की गतिविधियों से भी बल मिल रहा था। ऐसे अनिश्चित हालात में अफ्रवाहें रातोंरात फैलने लगती थी।

सन 1857 के विद्रोह के आधार का विस्तार से पता लगाने के लिए आइए अवध का जरा नज्दीकी से अध्ययन कीजिए। अवध 1857 के इस भव्य नाटक का बड़ा केंद्र था।

2. अवध में विद्रोह

2.1 “ये गिलास फल (Cherry) एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।”

1851 में गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौज्ञी ने अवध की रियासत के बारे में कहा था कि “ये गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।” पाँँच साल बाद, 1856 में इस रियासत को औपचारिक रूप से ब्रिटिश साम्राज्य का अंग घोषित कर दिया गया।

रियासत पर क्रब्ज़े का यह सिलसिला जरा लंबा चला। 1801 से अवध में सहायक संधि थोप दी गई थी। इस संधि में शर्त थी कि नवाब अपनी सेना खृत्म कर दे, रियासत में अंग्रेज्ञ टुकड़ियों की तैनाती की इजाज्ञत दे और दरबार में मौजूद ब्रिटिश रेजीडेंट की सलाह पर काम करे। अपनी सैनिक ताक्रत से वंचित हो जाने के बाद नवाब अपनी रियासत में क्रानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए दिनोदिन अंग्रेज्ञों पर निर्भर होता जा रहा था। अब विद्रोही मुखियाओं और ताल्लुक्रदारों पर उसका कोई नियंत्रण नहीं था।

अवध पर क़बज्ने में अंग्रेजों की दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी। उन्हें लगता था कि वहाँ की जमीन नील और कपास की खेती के लिए मुफ्रीद है और इस इलाक्रे को उत्तरी भारत के एक बड़े बाज्ञार के रूप में विकसित किया जा सकता है। 1850 के दशक की शुरुआत तक वे देश के ज्यादातर बड़े हिस्सों पर जीत हासिल कर चुके थे। मराठा भूमि, दोआब, कर्नाटक, पंजाब और बंगाल, सब अंग्रेजों की झोली में थे। तक्ररीबन एक सदी पहले बंगाल पर जीत के साथ शुरू हुई क्षेत्रीय विस्तार की यह प्रक्रिया 1856 में अवध के अधिग्रहण के साथ मुकम्मल हो जाने वाली थी।

2.2 “देह से जान जा चुकी थी।”

लॉर्ड डलहौजी द्वारा किए गए इस अधिग्रहण से तमाम इलाक्रों और रियासतों में गहरा असंतोष था। लेकिन इतना गुरस्सा कहीं नहीं था जैसा उत्तर भारत की शान कहे जाने वाले अवध की रियासत में था। यहाँ के नवाब वाजिद अली शाह को यह कहते हुए गढ़ी से हटा कर कलकता निष्कासित कर दिया गया था कि वह अच्छी तरह शासन नहीं चला रहे थे। ब्रिटिश सरकार ने यह निराधार निष्कर्ष भी निकाल लिया कि वाजिद रेजीडेंट गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि को कहा जाता था। उसे ऐसे राज्य में तैनात किया जाता था जो अंग्रेजों के प्रत्यक्ष शासन के अंतर्गत नहीं था।

सहायक संधि

सहायक संधि लॉर्ड वेलेज्ली द्वारा 1798 में तैयार की गई एक व्यवस्था थी। अंग्रेजों के साथ यह संधि करने वालों को कुछ शर्तें माननी पड़ती थीं। मसलन :

•
(क) अंग्रेज्ञ अपने सहयोगी की बाहरी और आंतरिक चुनौतियां से रक्षा करेंगे;
•
(ख) सहयोगी पक्ष के भूक्षेत्र में एक ब्रिटिश सैनिक टुकड़ी तैनात रहेगी;
•
(ग) सहयोगी पक्ष को इस टुकड़ी के रख-रखाव की व्यवस्था करनी होगी; तथा
•
(घ) सह्योगी पक्ष न तो किसी और शासक के साथ संधि कर सकेगा और न ही अंग्रेजों की अनुमति के बिना किसी युद्ध में हिस्सा लेगा।
Textbook illustration

मानचित्र 1

1857 में भारतीय उपमहाद्धीप।

अली शाह लोकप्रिय नहीं थे। मगर सच यह है कि लोग उन्हें दिल से चाहते थे। जब वे अपने प्यारे लखनऊ से विद्धा ले रहे थे तो बहुत सारे लोग विलाप करते हुए कानपुर तक उनके पीछे गए थे।

नवाब के निष्कासन से पैदा हुए दुख और अपमान के इस व्यापक अहसास को उस समय के बहुत सारे प्रेक्षकों ने दर्ज किया है। एक ने लिखा था : “देह से जान जा चुकी थी। शहर की काया बेजान थी...। कोई सड़क, कोई बाजार और घर ऐसा न था जहाँं से जान-ए-आलम से बिछड़ने पर विलाप का शोर न गूँज रहा हो।” एक लोक गीत में इस बात पर शोक व्यक्त किया गया कि “अंगरेज बहादुर आइन, मुल्क लई लीन्हों।”

इस भावनात्मक उथल-पुथल को भौतिक क्षति के अहसास से और बल मिला। नवाब को हटाए जाने से दरबार और उसकी संस्कृति भी खृत्म हो गई। संगीतकारों, नर्तकों, कवियों, कारीगरों, बावर्चियों, नौकरों, सरकारी कर्मचारियों और बहुत सारे लोगों की रोज्री-रोटी जाती रही।

स्त्रोत 3

नवाब साहब जा चुके हैं

एक और गीत में ऐसे शासक की दुर्दशा पर विलाप किया जा रहा है जिसे मजबूरन अपनी मातृभूमि छोड़नी पड़ी :

अभिजात और किसान, सब रो रहे थे। और सारा आलम रोता-चिल्लाता था।

हाय! जान-ए-आलम देस से विदा लेकर परदेस चले गए हैं।

इस पूरे भाग को पढ़े और चर्चा करें कि लोग वाजिद अली शाह की विदाई पर इतने दुखी क्यों थे।

चित्र 10.6
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2.3 फ़िरंगी राज का आना और एक दुनिया का ख्रात्मा

अवध में विभिन्न प्रकार की पीड़ाओं ने राजकुमारों, ताल्लुक्रदारों, किसानों और सिपाहियों को एक-दूसरे से जोड़ दिया था। वे सभी फिरंगी राज के आगमन को विभिन्न अर्थों में एक दुनिया की समाप्ति के रूप में देखने लगे थे। वे चीजें बिखर रही थीं जो लोगों के लिए बहुमूल्य थीं, जिनको वे प्यार करते थे। 1857 के विद्रोह में तमाम भावनाएँ और मुढे, परंपराएँ और निष्ठाएँ अभिव्यक्त हो रही थीं। बाकी जगहों के मुकाबले अवध में यह विद्रोह एक विदेशी शासन के खिलाफ़ लोक-प्रतिरोध की अभिव्यक्ति बन गया था।

अवध के अधिग्रहण से सिफ़ नवाब की ही गही नहीं छिनी थी। इसने इलाके के ताल्लुक्रदारों को भी लाचार कर दिया था। अवध के समूचे देहात में ताल्लुक्रदारों की जागीरें और क्रिले बिखरे हुए थे। ये लोग पीढ़ियों से अपने इलाक्रे में जमीन और सत्ता पर नियंत्रण रखते आए थे। अंग्रेजों के आने से पहले ताल्लुक्रदारों के पास हथियारबंद सिपाही होते थे। उनके अपने क्रिले थे। अगर वे नवाब की संप्रभुता को स्वीकार कर लें और अपने ताल्लुक्रदार का राजस्व चुकाते रहें तो उनके पास काफ़ी स्वायत्तता भी होती थी। कुछ बड़े ताल्लुक्रदारों के पास तो 12,000 तक पैद्दल सिपाही होते थे। छोटे-मोटे ताल्लुक्रदारों के पास भी 200 सिपाहियों की टुकड़ी तो होती ही थी। अंग्रेज्ञ इन ताल्लुक्रदारों की सत्ता को बरदाश्त करने के लिए कतई तैयार नहीं थे। अधिग्रहण के फौरन बाद ताल्लुक्रदारों की सेनाएँ भंग कर दी गई। उनके दुर्ग ध्वस्त कर दिए गए।

ब्रिटिश भूराजस्व नीति ने ताल्लुक्रदारों की हैसियत व सत्ता को और चोट पहुँचाई। अधिग्रहण के बाद 1856 में एकमुश्त बंदोबस्त के नाम से ब्रिटिश भूराजस्व व्यवस्था लागू कर दी गई। यह बंदोबस्त इस मान्यता पर आधारित था कि ताल्लुक्रदार बिचौलिए थे जिनके पास जमीन का मालिकाना नहीं था। उन्होंने बल और धोखाधड़ी के जरिए अपना प्रभुत्व स्थापित किया हुआ था। एकमुश्त बंदोबस्त में ताल्लुक्रदारों को उनकी जमीनों से बेदखल किया जाने लगा। आंकड़ों से पता चलता है कि अंग्रेज्ञों के आने से पहले ताल्लुक्रदारों के पास अवध के 67 प्रतिशत गाँव थे। एकमुश्त बंदोबस्त के लागू होने के बाद यह संख्या घटकर 38 प्रतिशत रह गई। दक्षिण अवध के ताल्लुक्रदारों को सबसे बुरी मार पड़ी। कुछ के तो आधे से ज्यादा गाँव हाथ से जाते रहे।

ब्रिटिश भूराजस्व अधिकारियों का मानना था कि ताल्लुक्रदारों को हटाकर वे जमीन असली मालिकों के हाथ में सौप देंगे जिससे किसानों के शोषण में कमी आएगी और राजस्व वसूली में इजाफ्रा होगा। वास्तव में ऐसा नहीं हुआ। भूराजस्व वसूली में तो इजाफ्रा हुआ लेकिन किसानों के बोझ में कमी नहीं आई। अधिकारियों को जल्दी ही समझ में आने लगा कि अवध के बहुत सारे इलाक्रे का मूल्य निर्धारण बहुत बढ़ा-चढ़ा कर किया गया था। कुछ स्थानों पर तो राजस्व माँंग में 30 से 70 प्रतिशत तक इज्ञाफ़ा हो गया था। यानी न तो ताल्लुक्रदारों के पास और न ही काशतकारों के पास इस अधिग्रहण पर खुशी जताने का कोई कारण था।

ताल्लुक्रदारों की सत्ता छिनने का नतीजा यह हुआ कि एक पूरी सामाजिक व्यवस्था भंगं हो गई। निष्ठा और संरक्षण के जिन बंधनों से किसान ताल्लुक्रदारों के साथ बँधे हुए थे वे अस्त-व्यस्त हो गए। अंग्रेज्ञों से पहले ताल्लुक्रदार ही जनता का उत्पीड़न करते थे लेकिन जनता की नजर में बहुत सारे ताल्लुक्रदार द्यालु अभिभावक की छवि भी रखते थे। वे किसानों से तरह-तरह के मद में पैसा तो वसूलते थे लेकिन बुरे वक्त में किसानों की मदद भी करते थे। अब अंग्रेज्ञों के राज में किसान मनमाने राजस्व आकलन और गैर-लचीली राजस्व व्यवस्था के तहत बुरी तरह पिसने लगे थे। अब इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि कठिन वक्त में या फ्रसल खराब हो जाने पर सरकार राजस्व माँग में कोई कमी करेगी या वसूली को कुछ समय के लिए टाल दिया जाएगा। ना ही किसानों को इस बात की उम्मीद थी कि तीज-त्यौहारों पर कोई क्रज्ञा और मदद मिल पाएगी जो पहले ताल्लुक्रदारों से मिल जाती थी।

अवध जैसे जिन इलाकों में 1857 के दौरान प्रतिरोध बेहद सघन और लंबा चला था वहाँ लड़ाई की बागडोर असल में ताल्लुक्रदारों और उनके किसानों के ही हाथों में थी। बहुत सारे ताल्लुक्रदार अवध के नवाब के प्रति निष्ठा रखते थे इसलिए वे अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए लखनऊ जाकर बेगम हजरत महल (नवाब की पत्नी) के खेमे में शामिल हो गए। उनमें से कुछ तो बेगम की पराजय के बाद भी उनके साथ डटे रहो।

किसानों का असंतोष अब फौजी बैरकों में भी पहुँचने लगा था क्योंकि बहुत सारे किसान अवध के गाँवों से ही भर्ती किए गए थे। दशकों से सिपाही कम वेतन और वक्त पर छुट्री न मिलने के कारण असंतुष्ट थे। 1850 के दशक तक आते-आते उनके असंतोष के कई नए कारण पैदा हो चुके थे।

1857 के जनविद्रोह से पहले के सालों में सिपाहियों के अपने गोरे अफ्रसरों के साथ रिश्ते काफ़ी बदल चुके थे। 1820 के दशक में अंग्रेज अफ्रसर सिपाहियों के साथ दोस्ताना ताल्लुकात रखने पर खासा जोर देते थे। वे उनकी मौजमस्ती में शामिल होते थे, उनके साथ मल्ल-युढ़ करते थे, उनके साथ तलवारबाजी करते थे और उनके साथ शिकार पर जाते थे। उनमें से बहुत सारे तो बखूबी हिंदुस्तानी बोलना जानते थे और यहाँ के रीति-रिवाजों व संस्कृति से वाकिफ़ थे। उनमें

स्त्रोत 4

ताल्लुक्रदारों की सोच

ताल्लुक्रदारों के रवैये को रायबरेली के पास स्थित कालाकंकर के राजा हनवन्त सिंह ने सबसे अच्छी तरह व्यक्त किया था। विद्रोह के दौरान हनवन्त सिंह ने एक अंग्रेज अफ्रसर को पनाह दी और उसे सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया था। उस अफ्रसर से आखिरी मुलाकात में हनवन्त सिंह ने कहा कि साहिब, आपके मुल्क के लोग हमारे देश में आए और उन्होंने हमारे राजाओं को खदेड़ दिया। आप अफ्रसरों को भेज कर जिले-जिले में जागीरों के मालिकाने की जाँच करवाते हैं। एक ही झटके में आपने मेरे पुरखों की जमीन मुझसे छीन ली। मैं चुप रहा। फिर अचानक आपका बुरा वक्त शुरु हो गया। यहाँ के लोग आपके खिलाफ्र उठ खड़े हुए। तब आप मेरे पास आए, जिसे आपने बर्बाद किया था। मैंने आप की जान बचाई है। लेकिन अब, अब मैं अपने सिपाहियों को लेकर लखनऊ जा रहा हूँ ताकि आपको देश से खदेड़ सकृँ।

इस अंश से आपको ताल्लुक्रदारों के रवैये के बारे में क्या पता चल रहा है? 'यहाँ के लोगों' से हनवन्त सिंह का क्या आशय था? उन्होने लोगों के गुस्से की क्या वजह बताई?

चित्र 10.7
चित्र 10.7

यूरोपीय क्रिस्म की वर्दी पहने बंगाल के सिपाही। यहाँ कलाकार सिपाहियों की वर्दी का मज्ञाक उड़ा रहा है। इन तस्वीरों के ज्ञरिए शायद यह जताने का प्रयास किया जा रहा है कि पश्चिमी पोशाक पहन कर भी हिंदुस्तानी सुंदर नहीं दिख सकते।

रचर्चा कीजिए...

पता लगाएँ कि क्या आपके राज्य के लोगों ने 1857 के विद्रोह में हिस्सा लिया था? अगर हाँ, तो उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा? अगर नहीं, तो उसकी व्याख्या कीजिए। अफ़सर की कड़क और अभिवावक का स्नेह, दोनों निहित थे।

1840 के दशक में स्थिति बदलने लगी। अफ्रसरों में श्रेष्ठता का भाव पैदा होने लगा और वे सिपाहियों को कमतर नस्ल का मानने लगे। वे उनकी भावनाओं की जरा-सी भी फ़िक्र नहीं करते थे। गाली-गलौज और शारीरिक हिंसा सामान्य बात बन गई। सिपाहियों व अफ्रसरों के बीच फ़ासला बढ़ता गया। भरोसे की जगह संदेह ने ले ली। चिकनाई युक्त कारतूसों की घटना इसका एक बढ़िया उदाहरण थी।

यह भी याद रखना महत्वपूर्ण है कि उत्तर भारत में सिपाहियों और ग्रामीण जगत के बीच गहरे संबंध थे। बंगाल आर्मी के सिपाहियों में से बहुत सारे अवध और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँवों से भर्ती होकर आए थे। उनमें से बहुत सारे ब्राह्मण या “ऊँची जाति” के थे। बल्कि अवध को तो “बंगाल आर्मी की पौधशाला” कहा जाता था। सिपाहियों के परिवार अपने इर्द-गिंद जिन बदलावों को देख रहे थे और उन्हें जो खृतरे दिखाई दे रहे थे वे जल्दी ही सिपाही लाइनों में भी दिखाई देने लगे। दूसरी ओर, कारतूसों के बारे में सिपाहियों का भय, छुटिट्टयों के बारे में उनकी शिकायतें, बढ़ते दुर्व्यवहार और नस्ली गाली-गलौज के प्रति बढ़ता असंतोष गाँवों में भी प्रतिबिंबित होने लगा था।

सिपाहियों और ग्रामीण जगत के बीच मौजूद इन संबंधों से जनविद्रोह के रूप-रंग पर गहरा असर पढ़ा। जब सिपाही अपने अफ़सरों की अवज्ञा करते थे और हथियार उठाते थे तो फौरन ही गाँवों में उनके भाई-बिरादर भी उनके साथ आ जुटते थे। हर कहीं किसान शहरों में पहुँचकर सिपाहियों और शहर के आम लोगों के साथ जुड़ कर विद्रोह के सामूहिक कृत्य में शामिल हो रहे थे।

3. विद्रोही क्या चाहते थे?

बतौर विजेता कठिनाइयों, चुनौतियों और बहादुरी के बारे में अंग्रेजों की अपनी राय थी। वे विद्नोहियों को अहसानफ़रामोश और बर्बर लोगों का झुंड मानते थे। विद्नोहियों को कुचलने का एक मतलब यह भी था कि उनकी आवाज़ को दबा दिया जाए। कुछ विद्नोहियों को ही इस घटनाक्रम के बारे में अपनी बात दर्ज करने का मौका मिला। यृँ भी विद्नोहियों में ज्यादातर सिपाही और आम लोग थे जो पढ़े-लिखे नहीं थे। इस प्रकार, अपने विचारों का प्रसार करने और लोगों को विद्नोह में शामिल करने के लिए जारी की गई कुछ घोषणाओं व इश्तहारों के सिवाय हमारे पास ऐसी ज्यादा चीजें नहीं हैं जिनकी बिना पर हम विद्नोहियों के नज्ञरिए को समझ सकें। इसीलिए,

1857 में जो कुछ हुआ, उसे रचने के लिए इतिहासकारों की कोशिशों को बहुत हद तक, और मजबूरन, अंग्रेजों के दस्तावेजों पर निर्भर रहना पड़ता है। विडंबना यह है कि इन स्वोतों से अंग्रेज्ञ अफ्रसरों की सोच का तो पता चलता है लेकिन इस बारे में ज्यादा सुरागा नहीं मिल पाता कि विद्रोही क्या चाहते थे।

3.1 एकता की कल्पना

1857 में विद्नोहियों द्वारा जारी की गई घोषणाओं में, जाति और धर्म का भेद किए बिना, समाज के सभी तबकों का आह्वान किया जाता था। बहुत सारी घोषणाएँ मुस्लिम राजकुमारों या नवाबों की तरफ़ से या उनके नाम पर जारी की गई थीं। परंतु उनमें भी हिंदुओं की भावनाओं का खृयाल रखा जाता था। इस विद्रोह को एक ऐसे युढ्ध के रूप में पेश किया जा रहा था जिसमें हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों का नफ़ा-नुकसान बराबर था। इशतहारों में अंग्रेजों से पहले के हिंदू-मुस्लिम अतीत की ओर संकेत किया जाता था और मुगाल साम्राज्य के तहत विभिन्न समुदायों के सहअस्तित्व का गौरवगान किया जाता था। बहादुर शाह के नाम से जारी की गई घोषणा में मुहम्मद और महावीर, दोनों की दुहाई देते हुए जनता से इस लड़ई में शामिल होने का आह्वान किया गया। दिलचस्प बात यह है कि आंदोलन

स्त्रोत 5

आज़मगढ़ घोषणा, 25 अगस्त 1857

विद्द्रोही क्या चाहते थे, इसके बारे में हमारी जानकारी का यह एक मुख्य स्त्रोत है :

यह सर्वविदित है कि इस युग में हिंदुस्तान के लोग, हिंदू और मुस्लिम, दोनों ही अधर्मा और पष्ठ्यंत्रकारी अंग्रेजों की निरकुंशता व उत्पीड़न से त्रस्त हैं। इसलिए देश के सभी धनवान लोगों को, खासतौर से जिनका मुस्लिम शाही परिवारों से ताल्लुक्र रहा है, और जिन्हें लोगों का धर्मरक्षक और स्वामी माना जाता है, अपने जीवन और संपत्ति को जनता की कुशलक्षेम के लिए होम कर देना चाहिए...।

अपने धर्म की रक्षा के लिए अरसा पहले अपने घर-बार छोड़ चुके और भारत से अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने के लिए पूरा जोर लगा रहे बहुत सारे हिंदू और मुसलमान मुखिया मेरे पास आए और उन्होंने इस भारतीय धर्म युढ़ में हिस्सा लिया। मुझे पूरी उम्मीद है कि जल्दी ही मुझे पश्चिम से भी मदद मिलेगी। इसलिए जनता की जानकारी के लिए कई भागों का यह इश्तहार जारी किया जा रहा है। यह सबका दायित्व है कि इसको गौर से पढ़े और इसका पालन करें। इस साझा उद्देश्य में जो लोग अपना योगदान देना चाहते हैं, लेकिन जिनके पास अपनी सेवाएँ देने के साधन नहीं हैं, उन्हें मेरी तरफ से दैनिक भोजन दिया जाएगा; और सबको मालूम हो कि हिंदू और मुस्लिम, दोनों तरह के प्राचीन ग्रंथों में, चमत्कार करने वालों के लेखन और भविष्यवक्ताओं में, पंडितों की गणनाओं में... सबमें यह सहमति दिखायी देती कि अब भारत में या कहीं भी अंग्रेजों के पैर टिक नहीं पाएँगे। इसलिए यह सबका फ्रज्ञ है कि वे अंग्रेजों का वर्चस्व बने रहने की सारी उम्मीद छोड़ दें, मेरा साथ दें और साझे हित में काम करते हुए अपने व्यक्तिगत परिश्रम से बादशाही सम्मान के हकदार बनें और अपने-अपने लक्ष्य प्राप्त करें। अन्यथा, अगर यह स्वर्णिम अवसर हमारे हाथ से चला गया तो हमें अपनी इस मूर्खता पर पश्चाताप करना पड़ेगा....।

भाग-1 जमींदारों के बारे मेंः जाहिर है कि जमींदारी बंदोबस्त तय करने में अंग्रेज्ञी सरकार ने बेहिसाब जमा (भूराजस्व) थोप दिया है और कई जमींदारों को बेइज्ज्जत व बरबाद किया है। बकाया लगान की वजह से उनकी जागीरें नीलाम कर दी गई हैं। हद तो ये है कि एक आम रैयत, किसी जनाना नौकर या किसी गुलाम की और से दाखिल किए गए मुकदमे पर भी बाइज्ज्जत जमींदारों को अदालत में घसीटा जा रहा है, गिरफ्तार किया जा रहा है, कैदखाने में डाला जा रहा है और बेइज्ज्जत किया जा रहा है। जमींदारियों के बारे में दायर किए गए मुक्रदमों में भारी खृचे की स्टाम्प और दीवानी अदालतों के गैर-जरूरी खृचों का मकसद प्रतिवादियों को दरिद्र करना रहा है। जमींदारों के खृज्ञाने को स्कूलों, अस्पतालों, सड़कों आदि के लिए चन्दे के नाम पर हर साल खाली किया जा रहा है। इस तरह की वसूलियों के लिए बादशाही सरकार में कोई जगह नहीं होगी : जमा हलका रहेगा, जमींदारों के हितों की रक्षा की जाएगी और हर जमींदार को अपनी जमींदारी में अपने ढंग से शासन करने का अधिकार होगा...

भाग 2 – व्यापारियों के बारें मेंः इस अधर्मी और पड्यंत्रकारी ब्रिटिश सरकार ने नील, कपड़े, जहाज व्यवसाय जैसी तमाम बेहतरीन और बहुमूल्य चीजों के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित कर लिया है। अब छोटी-मोटी चीजों का व्यापार ही लोगों के लिए रह गया है...। डाक खर्चे, नाका वसूली और स्कूलों के लिए चन्दे के नाम पर व्यापारियों के मुनाफ्रे में से संध मारी जा रही है। इन तमाम रियायतों के बावजूद व्यापारियों को दो कौड़ी के आदमी की शिकायत पर गिरफ्रतार किया जा सकता है, बेइज्जत किया जा सकता है। जब बादशाही सरकार बनेगी तो इन सारे फरेबी तौर-तरीकों को खृत्म कर दिया जाएगा और ज्ञमीन व पानी, दोनों रास्तों से होने बाला हर चीज्ञ का व्यापार भारत के देसी व्यापारियों के लिए खोल दिया जाएगा...। इसलिए यह हर व्यापारी की जिम्मेदारी है कि कि वह इस जंग में हिस्सा ले और बादशाही सरकार की हर इनसानी और माली मदद करे...।

भाग 3-सरकारी कर्मचारियों के बारे मेंः अब यह राज़ की बात नहीं है कि अंग्रेज सरकार के तहत प्रशासनिक और सैनिक सेवाओं में भर्ती होने वाले भारतीय लोगों को इज्जत नहीं मिलती, उनकी तनख्वाह कम होती है और उनके पास कोई ताकत नहीं होती। दोनों महकमों में प्रतिष्ठा और पैसे वाले सारे पद सिफ्र अंग्रेजों को मिलते हैं...। इसलिए ब्रिटिश सेवा में काम करने वाले तमाम भारतीयों को अपने मजहब और हित पर ध्यान देना चाहिए और अंग्रेजों के प्रति अपनी वफादारी छोड़कर बादशाही सरकार का साथ देना चाहिए। उन्हें फ्रिलहाल 200 और 300 रुपये प्रतिमाह की तनख्वाह मिलेगी और भविष्य में ऊँचे ओहदों की उम्मीद रखें...।

भाग 4- कारीगरों के बारे में: इसमें कोई शक नहीं कि इंग्लैंड में बनी चीज्ञों को ला-लाकर यूरोपियों ने हमारे बुनकरों, सूती वस्त्र बनाने वालों, बढ़इयों, लोहारों और मोचियों आदि को बेरोजगार कर दिया है, उनके काम-धंधों पर इस तरह क्रब्जा जमा लिया है कि देसी कारीगरों की हर श्रेणी भिखमंगों की हालत में पहुँच गई है। बादशाही सरकार में देसी कारीगरों को राजाओं और अमीरों की सेवा में तैनात किया जाएगा। इससे निःसंदेह उनकी उन्नति होगी। इसलिए इन करीगरों को अंग्रेजों की सेवा छोड़ देनी चाहिए।

भाग 5 पंडितों, फ्रकीरों और अन्य ज्ञानी व्यक्तियों के बारे मेंः पंडित और फ्रकीर क्रमशः हिंदू और मुस्लिम धर्मों के अभिभावक हैं। यूरोपीय दोनो धर्मों के शत्रु हैं और क्योंकि फिलहाल धर्म के कारण ही अंग्रेजों के खिलाफ एक युद्ध छिड़ा हुआ है इसलिए पंडितों और फ्रकीरों का फ्रर्ज है कि वे खुद को मेरे सामने पेश करें और इस पवित्र युद्ध में अपना हिस्सा निभाएँ...।

इस घोषणा में ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ कौन से मुद्दे उठाए गए हैं। प्रत्येक तबके के बारे में दिए गए भाग को ध्यान से पढ़िए। घोषणा की भाषा पर ध्यान दीजिए और देखिए कि उसमें कौन-सी भावनाओं पर जोर दिया जा रहा है।

सिपाही क्या सोचते थे

विद्रोही सिपाहियों की एक अर्जी जो बच गई :

एक सदी पहले अंग्रेज हिंदुस्तान आए और धीरे-धीरे यहाँ फौजी टुकड़ियाँ बनाने लगे। इसके बाद वे हर राज्य के मालिक बन बैठे। हमारे पुरखों ने सदा उनकी सेवा की है और हम भी उनकी नौकरी में आए...। ईश्वर की कृपा से और हमारी सहायता से अंग्रेजों ने जो चाहा वो इ्लाका जीत लिया। उनके लिए हमारे जैसे हज्ञारों हिंदुस्तानी जवानों को अपनी कुर्बानी देनी पड़ी लेकिन न हमने कभी पैर पीछे खौंचे और न कोई बहाना बनाया और न ही कभी बग्नावत के रास्ते पर चले...।

लेकिन सन् 1857 में अंग्रेजों ने ये हुक्म जारी कर दिया कि अब सिपाहियों को इंग्लैंड से नए कारतूस और बंदूकें दी जाएँगी। नए कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी मिली हुई है और गेहूँ के आटे में हडिड्डयों का चूरा मिलाकर खिलाया जा रहा है। ये चीजें पैदल-सेना, घुड़सवारों और गोलअंदाज्न फौज की हर रेजीमेंट में पहुँचा दी गई है...।

उन्होने ये कारतूस थर्ड लाइट केवेलरी के सवारों (घुड़सवार सैनिक) को दिए और उन्हें दाँँतो से खींचने के लिए कहा। सिपाहियों ने इस हुक्म का विरोध किया और कहा कि वे ऐसा कभी नहीं करंगे क्योंकि अगर उन्होने ऐसा किया तो उनका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा....। इस पर अंग्रेज अफ्रसरों ने तीन रेजीमेंटों के जवानों की परेड करवा दी। 1400 अंग्रेज सिपाही, यूरोपीय सैनिकों की दूसरी बटालियनें, और घुड़सवार गोलअंदाज्न फौज को तैयार कर भारतीय सैनिकों को घेर लिया गया। हर पैदल रेजीमेंट के सामने छरों से भरी छह-छह तोपें तैनात कर दी गई और 84 नए सिपाहियों को गिरफ्तार करके, बेड्डियाँ डालकर, जेल में बंद कर दिया गया। छावनी के सवारों को इसलिए जेल में डाला गया ताकि हम डर कर नए कारतूसों को दाँँतों से खींचने लगें। इसी कारण हम और हमारे सारे सहोदर इकटुा होकर अपनी आस्था की रक्षा के लिए अंग्रेजों से लड़...। हमें दो साल तक युद्ध्र जारी रखने पर मजबूर किया गया। धर्म व आस्था के सवाल पर हमारे साथ खड़े राजा और मुखिया अभी भी हमारे साथ हैं और उन्होने भी सारी मुसीबतें झेली हैं। हम दो साल तक इसलिए लड़े ताकि हमारा अक्रायद (आस्था) और मजहब्दूषित न हों। अगर एक हिंदू या मुसलमान का धर्म ही नष्ट हो गया तो दुनिया में बचेगा क्या?

इस अर्जी में सैनिक विद्रोह के जो कारण बताए गए हैं उनकी तुलना ताल्लुक्रदार द्वारा बताए गए कारणों (स्वोत 3) के साथ कीजिए।

में हिंदू और मुसलमानों के बीच खाई पैदा करने की अंग्रेजों द्वारा की गई कोशिशों के बावजूद ऐसा कोई फ़क् नहीं दिखाई दिया। अंग्रेज शासन ने दिसंबर 1857 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश स्थित बरेली के हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ़ भड़काने के लिए 50,000 रुपये खर्च किए। उनकी यह कोशिश नाकामयाब रही।

3.2 उत्पीड़न के प्रतीकों के खिलाफ़

इन घोषणाओं में ब्रिटिश राज (जिसे विद्रोही फिरंगी राज कहते थे) से संबंधित हर चीज्ञ को पूरी तरह खारिज किया जा रहा था। देशी रियासतों पर क्रब्जे और समझौतों का उल्लंघन करने के लिए अंग्रेज्ञों की निंदा की जाती थी। विद्रोही नेताओं का कहना था कि अंग्रेज्ञों पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

लोगों को इस बात पर गुस्सा था कि ब्रिटिश भूराजस्व व्यवस्था ने बड़े-छोटे भूस्वामियों को जमीन से बेदखृल कर दिया था और विदेशी व्यापार ने दस्तकारों और बुनकरों को तबाह कर डाला था। ब्रिटिश शासन के हर पहलू पर निशाना साधा जाता था। फिरंगियों पर स्थापित और सुंदर जीवन-शैली को नष्ट करने का आरोप लगाया जाता था। विद्रोही अपनी उस दुनिया को दोबारा बहाल करना चाहते थे।

विद्रोही उद्धोषणाएँ इस व्यापक डर को व्यक्त करती थीं कि अंग्रेज्ञ, हिंदुओं और मुसलमानों की जाति और धर्म को नष्ट करने पर तुले हैं और वे लोगों को ईसाई बनाना चाहते हैं। इसी डर की वजह से लोग चल रही अफ़वाहों पर भरोसा करने लगे। लोगों को प्रेरित किया गया की वे इकट्टे मिलकर अपने रोज्ञगार, धर्म, इज्जत और अस्मिता के लिए लड़े। यह ‘व्यापक सार्वजनिक भलाई’ की लड़ाई होगी।

जैसा कि हम देख चुके हैं, बहुत सारे स्थानों पर अंग्रेजों के खिलाफ़ विद्रोह उन तमाम ताकतों के विरुढ़ हमले की शक्ल ले लेता था जिनको अंग्रेजों के हिमायती या जनता का उत्पीड़क समझा जाता था। कई दफा विद्रोही शहर के संभ्रांत को जान-बूझकर बेइज्जत करते थे। गाँवों में उन्होंने सूदखोरों के बहीखाते जला दिए और उनके घर तोड़-फोड़ डाले। इससे पता चलता है कि विद्रोही तमाम उत्पीड़कों के खिलाफ़ थे और परंपरागत सोपानों (ऊँच-नीच) को खृत्म करना चाहते थे। इसमें हमें एक वैकल्पिक दृष्टि, संभवतः एक ज्यादा समतापरक समाज की कल्पना दिखाई देती है। पर, यह सोच उनकी घोषणाओं में नहीं दिखाई देती। उनमें तो फ्रिंगी राज के खिलाफ़ तमाम सामाजिक समूहों को एकजुट करने का ही आह्वान किया जाता था।

3.3 वैकल्पिक सत्ता की तलाश

ब्रिटिश शासन ध्वस्त हो जाने के बाद दिल्ली, लखनऊ और कानपुर जैसे स्थानों पर विद्रोहियों ने एक प्रकार की सत्ता और शासन संरचना स्थापित करने का प्रयास किया। बेशक यह प्रयोग ज्यादा समय तक नहीं चला लेकिन इन कोशिशों से पता चलता है कि विद्रोही नेता अठारहवीं सदी की पूर्व-ब्रिटिश दुनिया को पुनस्थर्थापित करना चाहते थे। इन नेताओं ने पुरानी दरबारी संस्कृति का सहारा लिया। विभिन्न पदों पर नियुक्तियाँ की गई। भूराजस्व बसूली और सैनिकों के वेतन के भुगतान का इंतज्ञाम किया गया। लूटपाट बंद करने के लिए हुक्मनामे जारी किए गए। इसके साथ-साथ अंग्रेजों के खिलाफ़ युढ़ जारी रखने की योजनाएँ भी बनाई गई। सेना की कमान शृंखला तय की गई। इन सारे प्रयासों में विद्रोही अठारहवीं सदी के मुगल जगत से ही प्रेरणा ले रहे थे यह जगत उन तमाम चीजों का प्रतीक बन गया जो उनसे छिन चुकी थीं।

विद्रोहियों द्वारा स्थापित शासन संरचना का प्राथमिक उद्हेश्य युढ़ की ज़रूरतों को पूरा करना था। लेकिन ज्यादातर मामलों में ये संरचनाएँ

→ चर्चा कीजिए...

आपकी राय में विद्रोहियों के नज्ञरिए को पुनःनिर्मित करने में इतिहासकारों के सामने कौन-सी मुख्य समस्याएँ आती हैं?

अंग्रेजों की मार बरदाश्त नहीं कर पाई। अवध में अंग्रेजों के खिलाफ़ प्रतिरोध सबसे लंबा चला। वहाँ लखनऊ दरबार द्वारा जवाबी हमले की योजनाएँ बनाई जा रही थीं और 1857 के आखिर तथा 1858 के शुरुआती महीनों तक हुकुम की श्रेणियाँ वजूद में थीं।

4. दमन

1857 के बारे में हमारे पास जो भी विवरण मौजूद हैं उनसे यह साफ्र हो जाता है कि इस विद्रोह को कुचलना अंग्रेज्ञों के लिए बहुत आसान साबित नहीं हुआ।

उत्तर भारत को दोबारा जीतने के लिए टुकड़ियों को रवाना करने से पहले अंग्रेजों ने उपद्रव शांत करने के लिए फ्रौजियों की आसानी के लिए कई क्रानून पारित कर दिए थे। मई और जून 1857 में पारित किए गए कई क्रानूनों के जरिए न केवल समूचे उत्तर भारत में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया बल्कि फ्रौजी अफ्रसरों और यहाँँ तक कि आम अंग्रेजों को भी ऐसे हिंदुस्तानियों पर मुक्रदमा चलाने और उनको सज्जा देने का अधिकार दे दिया गया जिन पर विद्रोह में शामिल होने का शक था। कहने का मतलब यह है कि क्रानून और मुकदमें की सामान्य प्रक्रिया रह कर दी गई थी और यह स्पष्ट कर दिया गया था कि विद्रोह की केवल एक ही सज्जा हो सकती है सज्जा-ए-मौत।

स्त्रोत 7

विद्रोही ग्रामीण

ग्रामीण अवध क्षेत्र से रिपोर्ट भेजने वाले एक अफ्रसर ने लिखा :

अवध के लोग उत्तर से जोड़ने वाली संचार लाइन पर जोर बना रहे हैं...। अवध के लोग गाँव वाले हैं...। ये गाँव वाले यूरोपियों की पकड़ से बिलकुल बाहर हैं। पल में बिखर जाते हैं, पल में फिर जुट जाते हैं। शासकीय अधिकारियों का कहना है कि इन गाँव वालों की संख्या बहुत बड़ी है और उनके पास बाकायदा बंदूकें हैं।

इस विवरण के अनुसार गाँव वालों से निपटने में अंग्रेजों को किन मुश्चिलों का सामना करना पड़ा?

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मानचित्र 2 यहाँ विद्रोह के महत्वपूर्ण केंद्र दिखाए गए हैं। विद्रोहियों पर ब्रिटिश हमलों के मार्गों को भी दर्शाया गया है। दिल्ली रिज पर स्थित एक मस्जिद, फेलिस बिएतो द्वारा लिया गया चित्र, 1857–58.

चित्र 10.8
चित्र 10.8

1857 के बाद ब्रिटिश फ्रोटोग्राफरों ने तबाही और ध्वंस की असंख्य तसवीरें उतारी थीं।

इन नए विशेष क्रानूनों और ब्रिटेन से मँगाई गई नयी टुकड़ियों से लैस अंग्रेज्ञ सरकार ने विद्रोह को कुचलने का काम शुरू कर दिया। विद्रोहियों की तरह वे भी दिल्ली के सांकेतिक महत्व को बखूबी समझते थे। लिहाज्ञा, उन्होने दोतरफा हमला बोल दिया। एक तरफ कलकते से, दूसरी तरफ पंजाब से दिल्ली की तरफ कृच हुआ हालांकि पंजाब कमोबेश शांत था। दिल्ली को क्रब्जे में लेने की अंग्रेज्ञों की कोशिश जून 1857 में बड़े पैमाने पर शुरू हुई लेकिन यह मुहिम सितंबर के आखिर में जाकर पूरी हो पाई। दोनों तरफ से जमकर हमले किए गए और दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इसकी एक वजह ये थी कि पूरे उत्तर भारत के विद्रोही राजधानी को बचाने के लिए दिल्ली में आ जमे थे।

गंगा के मैदान में भी अंग्रेजों की बढ़त का सिलसिला धीमा रहा। अंग्रेज टुकड़ियों को हर इलाका गाँव-दर-गाँव जीतना था। आम देहाती जनता और आस-पास के लोग उनके खिलाफ् थे। जैसे ही उन्होंने अपनी उपद्रव-विरोधी कार्वाई शुरू की, अंग्रेजों को अहसास हो गया कि उनका सामना सिफ् सैनिक विद्रोह से नहीं है, वे ऐसे आंदोलन से जूझ रहे हैं जिसके पीछे बेहिसाब जन-समर्थन मौजूद है। उदाहरण के लिए, अवध में फॉरसिथ नाम के एक अंग्रेज अफसर का अनुमान था कि कम से कम तीन-चौथाई वयस्क पुरुष आबादी विद्रोह में शामिल थी। इस इलाक्रे को लंबी लड़ाई के बाद मार्च 1858 में जाकर ही अंग्रेज दोबारा अपने नियंत्रण में ले पाए।

अंग्रेजों ने सैनिक ताकत का भयानक पैमाने पर इस्तेमाल किया। लेकिन यह उनका एकमात्र हथियार नहीं था। वर्तमान उत्तर प्रदेश के एक विशाल भू-भाग में बड़े भूस्वामियों और काश्तकारों ने मिलकर अंग्रेजों का विरोध किया था। अंग्रेजों ने इस एकता को तोड़ने के लिए

चित्र 10.9
चित्र 10.9

सिंकदरा बाग, चित्रकार फेलिस बिएतो, 1858

यहाँ हमें एक ज़माने में नवाब वाजिद अली शाह द्वारा बनवाए गए रंग बाग (प्लेज्ञर गार्डन) के खंडहरों में चार आदमी दिखायी दे रहे हैं। 1857 में इसकी रक्षा करने वाले 2000 से ज्यादा विद्रोही सिपाहियों को कैम्पबेल के नेतृत्व में ब्रिटिश सैनिकों ने मार डाला था। अहाते में पड़े नरकंकाल विद्रोह की निर्थर्कता की एक ठंडी चेतावनी देते हैं। बड़े ज्ञमींदारों को आश्वासन दिया कि उन्हें उनकी जागीरें लौंटा दी जाएँगीं। विद्रोह का रास्ता अपनाने वाले ज्ञमींदारों को ज्ञमीन से बेदखृल कर दिया गया और जो वफ्रादार थे उन्हें ईनाम दिए गए। बहुत सारे ज्ञमींदार या तो अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते मारे गए या भागकर नेपाल चले गए जहाँ उन्होने बीमारी व भूख से दम तोड़ दिया।

5. विद्रोह की छवियाँ

हम इस विद्रोह, विद्रोहियों की गतिविधियों और उन पर किए गए दमन के तरीकों के बारे में किस तरह जान सकते हैं?

जैसा कि हम पीछे देख चुके हैं, विद्रोहियों की सोच के बारे में हमारे पास बहुत कम दस्तावेज्न मौजूद हैं। हमारे पास विद्रोहियों की कुछ घोषणाएँ, अधिसूचनाएँ तथा नेताओं के पत्र हैं। लेकिन अब तक ज्यादातर इतिहासकार अंग्रेजों द्वारा लिखे गए दस्तावेजों की रोशनी में ही विद्रोहियों की कार्ववाइयों पर चर्चा करते आ रहे हैं।

यह तो है ही कि इस बारे में सरकारी ब्योरों की कमी नहीं है : औपनिवेशिक प्रशासक और फ्रौजी अपनी चिट्टि यों, डायरियों, आत्मकथाओं और सरकारी इतिहासों में अपने-अपने ब्योरे दर्ज कर गए हैं। असंख्य मेमों और नोट्स, परिस्थितियों के आकलन एवं विभिन्न रिपोटों के जरिए भी हम सरकारी सोच और अंग्रेज्जों के बदलते रवैये को समझ सकते हैं। आज इनमें से बहुत सारे दस्तावेज्जों को सैनिक विद्रोह रिकॉड्स्पं पर केंद्रित खंडों में संकलित किया जा चुका है। ये दस्तावेज्ज हमें अफ्रसरों के भीतर मौजूद भय और बैचेनी तथा विद्रोहियों के बारे में उनकी सोच का पता देते हैं। ब्रिटिश अख्बारों और पत्रिकाओं में इस विद्रोह की जो कहानियाँळछपीं उनमें सैनिक विद्रोहियों द्वारा की गई हिंसा को बड़े लोमहर्षक शब्दों में छापा जाता था। ये कहानियाँळ जनता की भावनाओं को भड़काती थीं तथा प्रतिशोध और सबक सिखाने की माँगों को हवा देती थीं।

अंग्रेजों और भारतीयों द्वारा तैयार की गई तसवीरें सैनिक विद्रोह का एक महत्वपूर्ण रिकॉर्ड रही हैं। इस विद्रोह के बारे में कई चित्र, पेंसिल से बने रेखांकन, उत्कीर्ण चित्र, पोस्टर, कार्टून, और बाजार-प्रिंट उपलब्ध हैं। आइए, उनमें से कुछ को देखें और जाने कि वे हमें क्या बताते हैं।

5.1 रक्षकों का अभिनंदन

अंग्रेज्ञों द्वारा बनाई तसवीरों को देखने पर तरह-तरह की भावनाएँ और प्रतिक्रियाएँ पैदा होती हैं। उनमें से कुछ में अंग्रेज्ञों को बचाने और विद्रोहियों को कुचलने वाले अंग्रेज्ञ नायकों का गुणगान किया गया है। 1859 में टॉमस जोन्स बार्कर द्वारा बनाया गया चित्र ‘रिलीफ़ ऑफ़ लखनऊ’ (लखनऊ की राहत) इसी श्रेणी का एक उदाहरण है। जब

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चित्र 10.10

“द रिलीफ ऑफ लखनऊ” चित्रकार टॉमस जोन्स बार्कर, 1859

विद्रोही टुकड़ियों ने लखनऊ पर घेरा डाल दिया तो लखनऊ के कमिश्नर हेनरी लारॉस ने ईसाइयों को इकट्टा किया और बेहद सुरक्षित रेजीर्डेंसी में पनाह ले ली। बाद में लारॉस तो मारा गया किंतु कर्नल इंगलिस के नेतृत्व में रेजीर्डेंसी सुरक्षित रहा। 25 सितंबर को जेम्स ऑट्रम और हेनरी हेवलॉक वहाँ पहुँचे, उन्हाँने विद्रोहियों को तितर-बितर कर दिया और ब्रिटिश टुकड़ियों को नयी मजबूती दी। 20 दिन बाद भारत में ब्रिटिश टुकड़ियों का नया कमांडर कॉलिन कैम्पबेल भारी तादाद में सेना लेकर वहाँ पहुँचा और उसने ब्रिटिश रक्षकसेना को घेरे से छुड़ाया। अंग्रेजों के बयानों में लखनऊ की घेरेबंदी उत्तरजीविता, बहादुराना प्रतिरोध और ब्रिटिश सत्ता की निर्विवाद विजय की कहानी बन गई।

बार्कर की पंटिंग कैम्पबेल के आगमन के क्षण का जश्न मनाती है। कैन्वस के मध्य में कैम्पबेल, ऑट्रम और हेवलॉक, इन तीन ब्रिटिश नायकों की छवियाँ हैं। उनके इर्द-गिर्द खड़े लोगों के हाथों को देखने पर दर्शक की निगाह चित्र के मध्य भाग की तरफ़ चली जाती है। ये नायक एक ऐसे स्थान पर खड़े हैं जहाँँ काफ़ी उजाला है, जिनके अगले हिस्से में परछाई है और पिछली तरफ़ टूटा-फूटा रेजीडेंसी दिखाई देता है। चित्र के अगले भाग में पड़े शव और घायल इस घरेबंदी के दौरान हुई मारकाट की गवाही देते हैं जबकि मध्य भाग में घोड़ों की विजयी तसवीरें इस तथ्य पर जोर देती हैं कि अब ब्रिटिश सत्ता और नियंत्रण बहाल हो चुका है। इस तरह के चित्रों से अंग्रेज़ जनता में अपनी सरकार के प्रति भरोसा पैदा होता था। इन चित्रों से उन्हें यह लगता था कि संकट की घड़ी जा चुकी है और विद्रोह खृत्म हो चुका है : अंग्रेज जीत चुके हैं।

5.2 अंग्रेज्ञ औरतें तथा ब्रिटेन की प्रतिष्ठा

अखुबारों में छपी खृबरों का जनता की कल्पना और मनोदशा पर भारी असर होता है। वे घटनाओं के बारे में लोगों की भावनाओं और सोच को तय करती हैं। भारत में औरतों और बच्चों के साथ हुई हिंसा की कहानियों को पढ़कर ब्रिटेन की जनता प्रतिशोध और सबक सिखाने की माँग करने लगी। अंग्रेज्ञ अपनी सरकार से मासूम औरतों की इज्जत बचाने और निस्सहाय बच्चों को सुरक्षा प्रदान करने की माँग करने लगे। कलाकारों ने सदमे और पीड़ा की अपनी चित्रात्मक अभिव्यक्तियों के जरिये इन भावनाओं को आकार प्रदान किया।

जोजेफ्र नोएल पेटन ने सैनिक विद्रोह के दो साल बाद “इन मेमोरियम” (‘स्मृति में’, चित्र 10.11) बनाई। इस चित्र में अंग्रेज्ञ औरतें और बच्चे एक घेरे में एक-दूसरे से लिपटे दिखाई देते हैं। वे लाचार और मासूम दिख रहे हैं, मानो एक भयानक घड़ी की आंशका में हैं।

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चित्र 10.11

“इन मेमोरियम”, चित्रकार जोज़ेफ

नोएल पेटन, 1859

चित्र 10.12

कानपुर में सिपाहियों से अपनी रक्षा करती मिस क्छीलर।

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चित्र 10.13

जस्टिस (न्याय), पन्च, 12 सितंबर 1857 चित्र के नीचे पट्टी पर लिखा है“कानपुर में हुए भीषण जनसंहार के समाचार ने समूचे इंस्लैंड में प्रतिशोध की गहरी चाह और भयानक अपमान का भाव पैदा कर दिया है।”

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वे अपनी बेइज्जती, हिंसा और मृत्यु का इंतजार कर रहे हैं। “इन मेमोरियम” में भीषण हिंसा नहीं दिखती : उसकी तरफ सिफ्र एक इशारा है। यह दर्शक की कल्पना को झिंझोड़ती है और उसमें गुस्से और बेचेनी का भाव पैदा करती है। इसमें विद्रोहियों को हिंसक और बर्बर बताया गया है हलांकि वे चित्र में अदृश्य हैं। पृष्ठभूमि में आप ब्रिटिश टुकड़ियों को रक्षक के तौर पर आगे बढ़ते देख सकते हैं।

कुछ अन्य रेखाचित्रों व पॉर्टिंग्स में हमें औरतें अलग तेवर में दिखाई देती हैं। इनमें वे विद्रोहियों के हमले से अपना बचाव करती हुई नज्ञर आती हैं। उन्हें वीरता की मूर्ति के रूप में दर्शाया गया है। चित्र 10.12 में मिस व्हीलर मध्य में दृढ़तापूर्वक खड़ी है। वह अकेले ही विद्रोहियों को मौत की नींद सुलाते हुए अपनी इज्जत की रक्षा करती है। तमाम ब्रिटिश चित्रों की तरह यहाँ भी विद्रोहियों को दानवों के रूप में दर्शाया गया है। यहाँ चार कढ़वर आदमी हाथों में तलवारें और बंदूक लिये एक अकेली औरत के ऊपर हमला कर रहे हैं। यहाँ इज्जत और जिंदगी की रक्षा के लिए औरत के संघर्ष की आड़ में दरअसल एक गहरे धार्मिक विचार को प्रस्तुत किया गया है – यह ईसाइयत की रक्षा का संघर्ष है। चित्र में धरती पर पड़ी किताब बाइबल है।

5.3 प्रतिशोध और सबक्र

जैसे-जैसे ब्रिटेन में गुस्से और सकते का माहौल बनता गया, बदले की माँँग बुलंद होती गई। विद्रोह के बारे में प्रकाशित चित्रों एवं खृबरों ने ऐसा माहौल रच दिया जिसमें हिंसक दमन और प्रतिशोध को लाजिमी और वाजिब माना जाने लगा। माहौल ऐसा था मानो न्याय के मूल्यों की रक्षा के लिए ब्रिटिश प्रतिष्ठा और सत्ता को दी जा रही चुनौती को निर्ममता से कुचलना जरूरी था। विद्रोह से आतंकित अंग्रेजों को लगता था कि उन्हें अपनी अपराजयता का प्रदर्शन करना ही चाहिए। ऐसी ही एक तसवीर (चित्र 10.13) में हमें न्याय की एक रूपकात्मक स्त्री छवि दिखाई देती

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चित्र 10.14

चित्र के नीचे पट्टी पर लिखा है- “बंगाल टाइगर से ब्रिटिश शेर का प्रतिशोध”, पन्च, 1857

तसवीर से क्या सोच निकलती है? शेर और चीते की तसवीरों के माध्यम से क्या कहने का प्रयास किया गया है? औरत और बच्चे की तसवीर क्या दर्शाती है?

है जिसके एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में ढाल है। उसकी मुद्रा आक्रामक है : उसके चेहरे पर भयानक गुस्सा और बदला लेने की तड़प दिखाई देती है। वह सिपाहियों को अपने पैरों तले कुचल रही है जबकि भारतीय औरतों और बच्चों की भीड़ भय से काँप रही है।

इनके अलावा भी ब्रिटिश प्रेस में असंख्य दूसरी तसवीरें और कार्टून थे जो निर्मम दमन और हिंसक प्रतिशोध की ज्ञूरत पर जोर दे रहे थे। एगजीक्यूशन ऑफ्र म्पूटिनियर्स ऐट पेशावर (पेशावर में विद्रोहियों को मृत्युदंड), इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज्ञ, 3 अक्टूबर 1857. मृत्युदंड के इस दृश्य में 12 विद्रोही एक क्रतार में लटके हुए हैं और चारों तरफ़ तोपें तैनात हैं। यह सामान्य दंड का दृश्य नहीं है, यह दहशत का प्रदर्शन है। लोगों को ये अहसास कराने की कोशिश की जा रही है कि सज्ञा किसी बंद जगह पर नहीं बल्कि लोगों के बीच भी दी जा सकती है। उसे खुले में नाटकीय ढंग से प्रस्तुत करना जरूरी था।

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चित्र 10.16
चित्र 10.16

THE CLEMENCY OF CANNING.
THE CLEMENCY OF CANNING.

Sommation - WELL, FOR, THEY SHANT BLOW HIM FROM MASTY OOK! BUT BE MOST PROMISE TO BE A GOOD LITTLE REPORT?

5.4 दहशत का प्रदर्शन

प्रतिशोध और सबक्र सिखाने की चाह इस बात में भी प्रतिबिम्बित होती है कि विद्रोहियों को कितने निर्मम छंग से मौत के घाट उतारा गया। उन्हें तोपों के मुहाने पर बाँधकर उड़ा दिया गया या फ़ौसी पर लटका दिया। इन सज्ञाओं की तसवीरें आम पत्र-पत्रिकाओं के जरिये दूर-दूर तक पहुँच रही थीं।

5.5 दया के लिए कोई जगह नहीं

जब प्रतिशोध के लिए ही शोर मच रहा हो, ऐसे समय पर नर्म सुझाव मज्ञाक का पात्र बन कर ही रह जाते हैं। जब गवर्नर-जनरल कैनिंग ने ऐलान किया कि नर्मी और द्या भाव से सिपाहियों की वफ़ादारी हासिल करने में मदद मिलेगी तो ब्रिटिश प्रेस में उसका मज्ञाक उड़ाया गया।

हास्यपरक व्यंग्य की ब्रिटिश पत्रिका पन्च के पन्नों में प्रकाशित एक कार्टून में कैर्निंग को एक भव्य नेक बुजुर्ग के रूप में दर्शाया गया। उसका

चित्र 10.17

“द किलमेंसी ऑफ्र केनिंग” (केनिंग का दयाभाव), पन्च, 24 अक्टूबर 1857 नीचे की पट्टी : गवर्नर जनरल : “बिलकुल सही, फिर वे उसे घिनौनी बंदूकों से नहीं उड़ाएँगे बशर्ते वो एक अच्छा सिपाही बनने का वादा करे।”

हाथ एक सिपाही के सिर पर है जो अभी भी नंगी तलवार और कटार लिए हुए है और दोनों से खून टपक रहा है (चित्र 10.17)। यह एक ऐसी छवि थी जो उस समय की बहुत सारी ब्रिटिश तसवीरों में बार-बार सामने आती थी।

5.6 राष्ट्रवादी दृश्य कल्पना

बीसवीं सदी में राष्ट्रवादी आंदोलन को 1857 के घटनाक्रम से प्रेरणा मिल रही थी। इस विद्रोह के ईर्द-गिर्द राष्ट्रवादी कल्पना का एक विस्तृत दृश्य जगत बुन दिया गया था। इसको प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में याद किया जाता था जिसमें देश के हर तबके के लोगों ने साम्राज्यवादी शासन के खिलाफ़ मिलकर लड़ाई लड़ी थी।

इतिहास लेखन की तरह कला और साहित्य ने भी 1857 की स्मृति को जीवित रखने में योगदान दिया। विद्रोह के नेताओं को ऐसे नायकों के रूप में पेश किया जाता था जो देश को रणस्थल की तरफ़ ले जा रहे हैं। उन्हें लोगों को दमनकारी साम्राज्यवादी शासन के खिलाफ़ उत्तेजित करते चित्रित किया जाता था। एक हाथ में घोड़े की रास और दूसरे हाथ में तलवार थामे अपनी मातृभूमि की मुक्ति के लिए लड़ाई लड़ने वाली रानी के शौर्य का गौरवगान करते हुए कविताएँ लिखी गई। रानी झाँसी को एक ऐसी मर्दाना शख्पियत के रूप में चित्रित किया जाता था जो दुश्मनों का पीछा करते हुए और ब्रिटिश सिपाहियों को मौत की नींद सुलाते हुए आगे बढ़ रही है। देश के विभिन्न भागों में बच्चे सुभद्रा कुमारी चौहान की इन पंक्तियों को पढ़ते हुए बढ़े हो रहे थे : “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।” लोक छवियों में रानी लक्ष्मीबाई को प्रायः: फ्रौजी पोशाक में घोड़े पर सवार और एक हाथ में तलवार लिए दिखाया जाता है – अन्याय और विदेशी शासन के दृढ़ प्रतिरोध का प्रतीक।

इन तसवीरों से पता चलता है कि उन्हें बनाने वाले चित्रकार इन घटनाओं को कैसे देखते थे, उनके अहसास क्या थे और वे क्या कहना चाहते थे। इन चित्रों और कार्टूनों के माध्यम से हम उस जनता के बारे में जान सकते हैं जो उन चित्रों की तारीफ्र या आलोचना करती थी, उनकी नक्रलों को खृरीद कर घरों में सजाती थी।

ये तस्वीरें केवल अपने समय की भावनाओं और अहसासों को ही प्रतिबिंबित नहीं कर रही थीं। उन्होंने संवेद्नाओं को भी शक्ल दी। ब्रिटेन में छप रहे चित्रों से उत्तेजित वहाँ की जनता विद्रोहियों को भयानक बर्बरता के साथ कुचल डालने के लिए आवाज़ उठा रही थी। दूसरी तरफ़ भारतीय राष्ट्रवादी चित्र हमारी राष्ट्रवादी कल्पना को निर्धारित करने में मदद कर रहे थे।

चित्र 10.18
चित्र 10.18

चर्चा कीजिए...

इस भाग में दिए गए प्रत्येक चित्र के विभिन्न तत्वों की जॉच कीजिए और चर्चा कीजिए कि उनके जरिए आपको कलाकार की सोच को पहचानने में कैसे मद्द मिलती है।

काल-रेखा

1801अवध में वेलेजली द्वारा सहायक संधि लागू की गई
1856नवाब वाजिद अली शाह को गद्वी से हटाया गया, अवध का अधिग्रहण
1856-57अंग्रेजों द्वारा अवध में एकमुश्त लगान बंदोबस्त लागू
1857
10 मईमेरठ में “सैनिक विद्रोह”
11-12 मईदिल्ली रक्षकसेना में विद्रोह : बहादुर शाह सांकेतिक नेतृत्व स्वीकार करते हैं
20-27 मईअलीगढ़, इटावा, मैनपुरी, एटा में सिपाही विद्रोह
30 मईलखनऊ में विद्रोह
मई-जूनसैनिक विद्रोह एक व्यापक जन विद्रोह में बदल जाता है
30 जूनचिनहाट के युढ़ में अंग्रेजों की हार होती है
25 सितंबरहेवलॉक और ऑट्रम के नेतृत्व में अंग्रेजों की टुकड़ियाँ लखनऊ रेजीडेंसी में दाखिल होती हैं
1858
जूनयुढ़ में रानी झाँसी की मृत्यु
जुलाईयुढ़ में शाह मल की मृत्यु

चित्र 10.19

विद्रोहियों के चेहरे

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उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

•
बहुत सारे स्थानों पर विद्रोही सिपाहियों ने नेतृत्व संभालने के लिए पुराने शासकों से क्या आग्रह किया?
•
उन साक्ष्यों के बारे में चर्चा कीजिए जिनसे पता चलता है कि विद्रोही योजनाबढ़ और समन्वित ढंग से काम कर रहे थे?
•
1857 के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक विश्वासों की किस हद तक भूमिका थी?
•
विद्रोहियों के बीच एकता स्थापित करने के लिए क्या तरीके अपनाए गए?
•
अंग्रेज्ञों ने विद्रोह को कुचलने के लिए क्या कदम उठाए?
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निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

•
अवध में विद्रोह इतना व्यापक क्यों था? किसान, ताल्लुक्रदार और ज्ञमींदार उसमें क्यों शामिल हुए?
•
विद्रोही क्या चाहते थे? विभिन्न सामाजिक समूहों की दृष्टि में कितना फर्क था?
•
1857 के विद्रोह के बारे में चित्रों से क्या पता चलता है? इतिहासकार इन चित्रों का किस तरह विश्लेषण करते हैं?
•
एक चित्र और एक लिखित पाठ को चुनकर किन्हीं दो स्वोतों की पड़ताल कीजिए और इस बारे में चर्चा कीजिए कि उनसे विजेताओं और पराजितों के दृष्टिकोण के बारे में क्या पता चलता है?
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मानचित्र कार्य

10. भारत के मानचित्र पर कलकत्ता (कोलकाता), बम्बई (मुंबई), मद्रास (चेनई) को चिद्धित कीजिए जो 1857 में ब्रिटिश सत्ता के तीन मुख्य केंद्र थे। मानचित्र 1 और 2 को देखिए तथा उन इलाकों को चिद्धित कीजिए जहाँ विद्रोह सबसे व्यापक रहा। औपनिवेशिक शहरों से ये इलाक्रे कितनी दूर या कितनी पास थे?

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परियोजना कार्य (कोई एक)

•
1857 के विद्रोही नेताओं में से किसी एक की जीवनी पढ़े। देखिए कि उसे लिखने के लिए जीवनीकार ने किन स्त्रोतों का उपयोग किया है? क्या उनमें सरकारी रिपोटों, अख्बारी खबरों, क्षेत्रीय भाषाओं की कहानियों, चित्रों और किसी अन्य चीज्ञ का इस्तेमाल किया गया है? क्या सभी स्त्रोत एक ही बात कहते हैं या उनके बीच फ़र्क दिखाई दते हैं? अपने निष्कर्षों पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
•
1857 पर बनी कोई फ्रिल्म देखिए और लिखिए कि उसमें विद्धोह को किस तरह दर्शाया गया है। उसमें अंग्रेज्जों, विद्धोहियों और अंग्रेज्जों के भारतीय वफ़कादारों को किस तरह दिखाया गया है? फ्रिल्म किसानों, नगरवासियों, आदिवासियों, जर्मींदारों और ताल्लुक्रदारों के बारे में क्या कहती है? फ्रिल्म किस तरह की प्रतिक्रिया को जन्म देना चाहती है?
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यदि आप और जानकारी चाहते हैं तो इन्हें पढ़िए :

गौतम भद्रा, 1987 फौर रेबल्स ऑफ्र एटीन फिफ्टी सेवन, सबॉल्टर्न स्टडीज्ञ, खंड 4, ऑक्सफ्रोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली

विलियन डेलरिम्पल, 2006 दि लास्ट मुग्नल : दि फ्रॉल ऑफ्र ए डायनेस्टी, दिल्ली 1857, पेंगिवन, वाइकिंग, नयी दिल्ली

रूद्रांग्शू मुखर्जी, 1984 अवध इन रिवोल्ट 1857–58, ऑक्सफ्रोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली

तापती राँय, 2006 राज ऑफ्र दि रानी, पेंग्विन, नयी दिल्ली ऐरिक स्टॉक्स, 1980 पैज्नेन्ट्रस एंड दि राज, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी, प्रेस, दिल्ली

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अधिक जानकारी के लिए आप निम्नलिखित वेबसाइट देख सकते हैं

http://books.google.com (1857 पर अंग्रेज्ञ अधिकारियों के विवरणों के लिए)

www.copsey-family.org/allenc/lakshmibai/links.html (रानी लक्ष्मीबाई के पत्रों के लिए)