उपनिवेशवाद और देहात - सरकारी अभिलेखों
अध्याय नौ
उपनिवेशवाद और देहात
सरकारी अभिलेखों
का अध्ययन
इस अध्याय में आप यह देखेंगे कि औपनिवेशिक शासन का अर्थ उन लोगों के लिए क्या था जो देहात में रहते थे। इस अध्याय के माध्यम से आप बंगाल के ज्ञर्मीदारों से मिलेंगे, उन राजमहल की पहाड्डियों की यात्रा करेंगे जहाँ पहाड्डिया और संथाल लोग रहते थे और फिर वहाँ से दक्कन की ओर आगे बढ़ेंगे। आप यह देखेंगे कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने देहात में अपना राज कैसे स्थापित किया था, अपनी राजस्व नीतियों को कैसे कार्यान्वित किया था, भिन्न-भिन्न वर्गों के लोगों के लिए इन नीतियों का क्या मतलब था और उन्होंने रोजमर्गी की जिंदंगी को कैसे बदल दिया था।
राज्य यानी सरकार द्वारा लागू किए गए क्रानूनों के जनसाधारण के लिए अनेक परिणाम होते हैं : वे कुछ हद तक यह निर्धारित करते हैं कि उन क्रानूनों के परिणामस्वरूप कौन पहले से अधिक धनवान बनते हैं और कौन गरीब हो जाते हैं; किसे नयी जमीन मिल जाती है और कौन अपनी उस जमीन को खो बैठता है जिस पर वह रहता और गुज्ञर-बसर करता था; किसानों को जब पैसे की जरूरत पड़ती है तब वे कहाँ, किसके पास जाते हैं; आप यह भी देखेंगे कि लोग क्रानूनों का पालन करने के लिए मजबूर होते हुए भी ऐसे क्रानून का विरोध करने से भी नहीं हिचकते थे जिसे वे अन्यायपूर्ण समझते थे। ऐसा करते समय लोग यह भी स्पष्ट करने का प्रयत्न करते थे कि क्रानून किस प्रकार लागू किए जाने चाहिए, और इस प्रकार वे उनके परिणामों में कुछफेर-बदल कर देते थे।
आप उन स्तोतों के बारे में भी जान पाएँगे जो हमें इन इतिहासों के बारे में बताते हैं साथ ही इन समस्याओं के बारे में भी जो इतिहासकारों के सामने इस संबंध में उपस्थित होती हैं। आप राजस्व अभिलेखों और सर्वेक्षणों, पत्र-पत्रिकाओं तथा सर्वेक्षकों एवं यात्रियों द्वारा छोड़े गए विवरणों और जाँच आयोगों द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोटों के बारे में भी पढ़ेंगे।

‘राजा’ शब्द का प्रयोग अकसर शक्तिशाली ज़मींदारों के लिए किया जाता था।
चित्र 9.2 बर्दवान के राजा का डायमंड हार्बर रोड, कलकत्ता स्थित राजमहल 19वीं शताब्दी के अंतिम दशकों तक बंगाल के बहुत से धनी जर्मींदारों ने अपने लिए सुंदर विशाल स्तंभों वाले राजमहल बनवा लिए थे जिनमें नृत्यकक्ष, बड़े-बड़े मैदान, शानदार प्रवेश द्वार थे।

1. बंगाल और वहाँ के ज़मींदार
जैसा कि आप जानते हैं, औपनिवेशिक शासन सर्वप्रथम बंगाल में स्थापित किया गया था। यही वह प्रांत था जहाँ पर सबसे पहले ग्रामीण समाज को पुनर्व्यवस्थित करने और भूमि संबंधी अधिकारों की नयी व्यवस्था तथा एक नयी राजस्व प्रणाली स्थापित करने के प्रयत्न किए गए थे। आइए, यह देखें कि कंपनी शासन के प्रारॉभिक वर्षों में बंगाल में क्या हुआ।
1.1 बर्दवान में की गई नीलामी की एक घटना
सन् 1797 में बर्दवान (आज के बढ़मान) में एक नीलामी की गई। यह एक बड़ी सार्वजनिक घटना थी। बर्दवान के राजा द्वारा धारित अनेक महाल (भूसंपदाएँ) बेचे जा रहे थे। सन् 1793 में इस्तमरारी बंदोबस्त लागू हो गया था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने राजस्व की राशि निश्चित कर दी थी जो प्रत्येक ज्ञमींदार को अदा करनी होती थी। जो ज्ञमींदार अपनी निश्चित राशि नहीं चुका पाते थे उनसे राजस्व वसूल करने के लिए उनकी संपदाएँ नीलाम कर दी जाती थीं। चृँकि बर्दवान के राजा पर राजस्व की बड़ी भारी रकम बकाया थी, इसलिए उसकी संपदाएँ नीलाम की जाने वाली थीं।
नीलामी में बोली लगाने के लिए अनेक खृरीद्दार आए थे और संपदाएँ (महाल) सबसे ऊँची बोली लगाने वाले को बेच दी गई। लेकिन कलेक्टर को तुरंत ही इस सारी कहानी में एक अजीब पंच दिखाई दे गया। उसे जानने में आया कि उनमें से अनेक खृरीद्दार, राजा के अपने ही नौकर या एजेंट थे और उन्होंने राजा की ओर से ही जमीनों को खृरीदा था। नीलामी में 95 प्रतिशत से अधिक बिक्री फ़र्जी थी। वैसे तो राजा की जमीनें खुलेतौर पर बेच दी गई थीं पर उनकी जमींदारी का नियंत्रण उसी के हाथों में रहा था।
राजा कंपनी को राजस्व क्यों नहीं अदा कर पाया था? नीलामी में खृरीद्दार कौन थे? यह कहानी उस समय पूर्वी भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में क्या हो रहा था, इसके बारे में हमें क्या बताती है?
1.2 अदा न किए गए राजस्व की समस्या
अकेले बर्दवान राज की ज़मीनें ही ऐसी संपदाएँ नहीं थों जो अठारहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में बेची गई थों। इस्तमरारी बंदोबस्त लागू किए जाने के बाद 75 प्रतिशत से अधिक ज़मींदारियाँ हस्तांतरित कर दी गई थों।
ब्रिटिश अधिकारी यह आशा करते थे कि इस्तमरारी बंदोबस्त लागू किए जाने से वे सभी समस्याएँ हल हो जाएँगी जो बंगाल की विजय के समय से ही उनके समक्ष उपस्थित हो रही थीं। 1770 के दशक तक आते-आते, बंगाल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुजरने लगी थी क्योंकि बार-बार अकाल पड़ रहे थे और खेती की पैदावार घटती जा रही थी। अधिकारी लोग ऐसा सोचते थे कि खेती, व्यापार और राज्य के राजस्व संसाधन सब तभी विकसित किए जा सकेंगे जब कृषि में निवेश को प्रोत्साहन दिया जाएगा और ऐसा तभी किया जा सकेगा जब संपत्ति के अधिकार प्राप्त कर लिए जाएँगे और राजस्व माँंग की दरों को स्थायी रूप से तय कर दिया जाएगा। यदि राज्य (सरकार) की राजस्व माँंग स्थायी रूप से निर्धरित कर दी गई तो कंपनी राजस्व की नियमित प्राप्ति की आशा कर सकेगी और उद्यमकर्ता भी अपने पूँजी-निवेश से एक निश्चित लाभ कमाने की उम्मीद रख सकेंगे, क्योंकि राज्य अपने दावे में वृद्धि करके लाभ की राशि नहीं छीन सकेगा। अधिकारियों को यह आशा थी कि इस प्रक्रिया से छोटे किसानों (योमॉन) और धनी भूस्वामियों का एक ऐसा वर्ग उत्पन्न हो जाएगा जिसके पास कृषि में सुधार करने के लिए पूँजी और उद्यम दोनों होंगे। उन्हें यह भी उम्मीद थी कि ब्रिटिश शासन से पालन-पोषण और प्रोत्साहन पाकर, यह वर्ग कंपनी के प्रति वफादार बना रहेगा।
लेकिन समस्या यह पता लगाने की थी कि वे कौन से व्यक्ति हैं जो कृषि में सुधार करने के साथ-साथ राज्य को निर्धारित राजस्व अदा करने का ठेका ले सकेंगे। कंपनी के अधिकारियों के बीच परस्पर लंबे वाद-विवाद के बाद, बंगाल के राजाओं और ताल्लुकदारों के साथ इस्तमरारी बंदोबस्त लागू किया गया। अब उन्हें ज़मींदारों के रूप में वर्गीकृत किया गया और उन्हें सदा के लिए एक निर्धारित राजस्व माँंग को अदा करना था। इस परिभाषा के अनुसार, ज़मींदार गाँव में भू-स्वामी नहीं था, बल्कि वह राज्य का राजस्व समाहर्ता (यानी संग्राहक) मात्र था।
ज़मींदारों के नीचे अनेक (कभी-कभी तो 400 तक) गाँव होते थे। कंपनी के हिसाब से, एक ज़मींदारी के भीतर आने वाले गाँव मिलाकर एक राजस्व संपदा का रूप ले लेते थे। कंपनी समस्त संपदा पर कुल माँग निर्धारित करती थी। तदोपरांत, ज़मींदार यह निर्धारित करता था कि भिन्न-भिन्न गाँवों से राजस्व की कितनी-कितनी माँग पूरी करनी होगी, और फिर ज़मींदार उन गाँवों से निर्धारित राजस्व राशि इकटुरी करता था। ज़मींदार से यह अपेक्षा की जाती थी कि बह कंपनी को नियमित रूप से राजस्व राशि अदा करेगा और यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो उसकी संपदा नीलाम की जा सकेगी।
1.3 राजस्व राशि के भुगतान में ज्ञमींदार क्यों चूक करते थे?
कंपनी के अधिकारियों का यह सोचना था कि राजस्व माँग निर्धीरित किए जाने से जमींदारों में सुरक्षा का भाव उत्पन्न होगा, और वे अपने निवेश पर प्रतिफल प्राप्ति की आशा से प्रेरित होकर अपनी संपदाओं में सुधार करने के लिए प्रोत्साहित होंगे। किंतु इस्तमरारी बंदोबस्त के बाद, कुछ प्रारंभिक दशकों में जमींदार अपनी राजस्व माँग को अदा करने में बराबर कोताही करते रहे, जिसके परिणामस्वरूप राजस्व की बकाया रकमें बढ़ती गई। चाल्स कार्नवालिस (1738-1805) का 1785 में थॉमस गेन्सबोरो द्वारा चित्रित चित्र। अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कार्नवालिस ब्रिटिश सेना का कमांडर था। जब 1793 में बंगाल में इस्तमरारी बंदेबस्त लागू किया गया, उस समय कार्नवालिस बंगाल का गवर्नर जनरल था।

'ताल्लुक्रदार' का शब्दिक अर्थ है वह व्यक्ति जिसके साथ ताल्लुक्र यानी संबंध हो। आगे चलकर ताल्लुक्र का अर्थ क्षेत्रीय इकाई हो गया।
'रैयत' शब्द का प्रयोग अंग्रेजों के विवरणों में किसानों के लिए किया जाता था (अध्याय-8)। बंगाल में रैयत जमीन को खुद काश्त नहीं करते थे, बल्कि 'शिकमी-रैयत' को आगे पट्टे पर दे दिया करते थे।
जर्मीदारों की इस असफलता के कई कारण थे। पहला : प्रारंभिक माँगें बहुत ऊँची थीं, क्योंकि ऐसा महसूस किया गया था कि यदि माँग को आने वाले संपूर्ण समय के लिए निर्धारित किया जा रहा है तो आगे चलकर कीमतों में बढ़ोतरी होने और खेती का विस्तार होने से आय में वृद्धि हो जाने पर भी कंपनी उस वृद्धि में अपने हिस्से का दावा कभी नहीं कर सकेगी। इस प्रत्याशित हानि को कम-से-कम स्तर पर रखने के लिए, कंपनी ने राजस्व माँग को ऊँचे स्तर पर रखा, और इसके लिए दलील दी कि ज्यों-ज्यों कृषि के उत्पादन में वृद्धि होती जाएगी और कीमतें बढ़ती जाएँगी, जर्मीदारों का बोझ शनै: शनै: कम होता जाएगा।
दूसरा : यह ऊँची माँग 1790 के दशक में लागू की गई थी जब कृषि की उपज की कीमतें नीची थों, जिससे रैयत (किसानों) के लिए, जर्मींदार को उनकी देय राशियाँ चुकाना मुशिकल था। जब जर्मींदार स्वयं किसानों से राजस्व इकट्टा नहीं कर सकता था तो वह आगे कंपनी को अपनी निर्धारित राजस्व राशि कैसे अदा कर सकता था? तीसरा : राजस्व असमान था, फ्रसल अच्छी हो या खराब राजस्व का ठीक समय पर भुगतान जरुरी था। वस्तुतः सूर्यास्त बिधि (कानून) के अनुसार, यदि निश्चित तारीख़ को सूर्य अस्त होने तक भुगतान नहीं आता था तो जर्मींदारी को नीलाम किया जा सकता था। चौथा : इस्तमरारी बंदोबस्त ने प्रारंभ में जर्मींदार की शक्ति को रैयत से राजस्व इकट्टा करने और अपनी जर्मींदारी का प्रबंध करने तक ही सीमित कर दिया था।
कंपनी ज़मींदारों को पूरा महत्व तो देती थी पर बह उन्हें नियंत्रित तथा विनियमित करना, उनकी सत्ता को अपने वश में रखना और उनकी स्वायत्तता को सीमित करना भी चाहती थी। फलस्वरूप ज़मींदारों की सैन्य-टुकड़ियों को भंग कर दिया गया, सीमा शुल्क समाप्त कर दिया गया और उनकी कचहरियों को कंपनी द्वारा नियुक्त कलेक्टर की देखरेख में रख दिया गया। ज़मींदारों से स्थानीय न्याय और स्थानीय पुलिस की व्यवस्था करने की शक्ति छीन ली गई। समय के साथ-साथ, कलेक्टर का कार्यालय सत्ता के एक विकल्पी केंद्र के रूप में उभर आया और ज़मींदार के अधिकार को पूरी तरह सीमित एवं प्रतिबंधित कर दिया गया। एक मामले में तो यहाँँ तक हुआ कि जब राजा राजस्व का भुगतान नहीं कर सका तो एक कंपनी अधिकारी को तुरंत इस स्पष्ट अनुदेश के साथ उसकी ज़मींदारी में भेज दिया गया कि “ज्ञिले का पूरा कार्यभार अपने हाथ में ले लो और राजा तथा उसके अधिकारियों के संपूर्ण प्रभाव और प्राधिकार को खृत्म कर देने के लिए सर्वाधिक प्रभावशाली क्रदम उठाओ।”
राजस्व इकटुा करने के समय, जमींदार का एक अधिकारी जिसे आमतौर पर अमला कहते थे, गाँव में आता था। लेकिन राजस्व संग्रहण एक परिवार्षिक समस्या थी। कभी-कभी तो खराब फ्रसल और नीची कीमतों के कारण किसानों के लिए अपनी देय राशियों का भुगतान करना बहुत कठिन हो जाता था और कभी-कभी ऐसा भी होता था कि रैयत जान बूझकर भुगतान में देरी कर देते थे। धनवान रैयत और गाँव के मुखिया – जोतदार और मंडल – जमींदार को परेशानी में देखकर बहुत खुश होते थे। क्योंकि जमींदार आसानी से उन पर अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं कर सकता था। जमींदार बाक्रीदारों पर मुक्रदमा तो चला सकता था, मगर न्यायिक प्रक्रिया लंबी होती थी। 1798 में अकेले बर्दवान जिले में ही राजस्व भुगतान के बक्राया से संबंधित 30,000 से अधिक वाद लंबित थे।
1.4 जोतदारों का उद्य
अठारहवीं शताब्दी के अंत में जहाँ एक ओर अनेक ज़मींदार संकट की स्थिति से गुजर रहे थे, बहीं दूसरी ओर धनी किसानों के कुछ समूह गाँवों में अपनी स्थिति मजबृत करते जा रहे थे। फ्रांसिस बुकानन के उत्तरी बंगाल के दिनाजपुर जिले के सर्वेक्षण में हमें धनी किसानों के इस वर्ग का, जिन्हें ‘जोतदार’ कहा जाता था, विशद विवरण देखने को मिलता है। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों तक आते-आते, जोतदारों ने ज़मीन के बड़े-बड़े रकबे, जो कभी-कभी तो कई हज्ञार एकड़ में फैले थे, अर्जित कर लिए थे। स्थानीय व्यापार और साहूकार के कारोबार पर भी उनका नियंत्रण था और इस प्रकार वे उस क्षेत्र के गरीब काश्तकारों पर व्यापक शक्ति का प्रयोग करते थे। उनकी ज़मीन का काफ़ी बड़ा भाग बटाईदारों (अधियारों या बरगादारों) के माध्यम से जोता जाता था, जो खुद अपने हल लाते थे, खेत में मेहनत करते थे और फ्रसल के बाद उपज का आधा हिस्सा जोतदारों को दे देते थे।
गाँवों में, जोतोदारों की शक्ति, जमींदारों की ताकृत की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होती थी। जमींदार के विपरीत जो शहरी इलाक्रों में रहते थे, जोतदार गाँवों में ही रहते थे और गरीब ग्रामवासियों के काफ़ी बड़े वर्ग पर सीधे अपने नियंत्रण का प्रयोग करते थे। जमींदारों द्वारा गाँव की जमा (लगान) को बढ़ाने के लिए किए जाने वाले प्रयत्नों का वे घोर प्रतिरोध करते थे; जमींदारी अधिकारियों को अपने कर्तव्यों का पालन करने से रोकते थे; जो रैयत उन पर निर्भर रहते थे उन्हें वे अपने पक्ष में एकजुट रखते थे और जमींदार को राजस्व के भुगतान में जान-बूझकर देरी करा देते थे। सच तो यह है कि जब राजस्व का भुगतान न किए जाने पर जमींदार की
चित्र 9.4
बंगाल के गाँव का दृश्य; जॉर्ज चिनरी द्वारा 1820 में चित्रित।
चिनरी भारत में 23 वर्ष (1802–25) तक रहा था। उस दौरान उसने अनेक चित्र बनाए थे जिनमें आम लोगों के जनजीवन से संबंधित चित्र, भूदूश्यों के चित्र, विशिष्ट व्यक्तियों तथा विशाल भवनों के चित्र शामिल थे। नीचे दी गई आकृति में ग्रामीण बंगाल के एक घर का चित्र दिया गया है; उन दिनों जोतदार और साहूकार लोग ऐसे ही घरों में रहा करते थे।

दिनाजपुर के जोतदार
बुकानन ने बताया है कि उत्तरी बंगाल के दिनाजपुर ज्ञिले के जोतदार किस प्रकार जर्मांदार के अनुशासन का प्रतिरोध और उसकी शक्ति की अवहेलना किया करते थे :
भूस्वामी इस वर्ग के लोगों को पसंद नहीं करते थे, लेकिन यह स्पष्ट है कि इन लोगों का होना बहुत जरूरी था क्योंकि इनके बिना, जरूरतमंद काशतकारों को पैसा उधार कौन देता...
जोतदार, जो बड़ी-बड़ी जमीनें जोतते हैं, बहुत ही हठीले और जिद्वी हैं और यह जानते हैं कि जमींदारों का उन पर कोई वश नहीं चलता। वे तो अपने राजस्व के रूप में कुछ थोड़े से रूपये ही दे देते हैं और लगभग हर किस्त में कुछ-न-कुछ बक्राया रक्रम रह जाती है। उनके पास उनके पट्टे की हकदारी से ज्यादा जमीनें हैं। जमींदार की रक्रम के कारण, अगर अधिकारी उन्हें कचहरी में बुलाते थे और उन्हें डराने-धमकाने के लिए घंटे-दो-घंटे कचहरी में रोक लेते हैं तो वे तुरंत उनकी शिकायत करने के लिए फ्रौजदारी थाना (पुलिस थाना) या मुन्सिफ्र की कचहरी में पहुँच जाते हैं और कहते हैं कि जमींदार के कारिंदों ने उनका अपमान किया है। इस प्रकार राजस्व की बक्राया रक्रमों के मामलें बढ़ते जाते हैं और जोतदार छोटे-छोटे रैयत को राजस्व न देने के लिए भड्रकाते रहते हैं...
यह बताइए कि जोतदार जर्मींदारों की सत्ता का किस प्रकार प्रतिरोध किया करते थे।
ज़मींदारी को नीलाम किया जाता था तो अकसर जोतदार ही उन ज़मीनों को खुरीद लेते थे।
उत्तरी बंगाल में जोतदार सबसे अधिक शक्तिशाली थे, हालांकि धनी किसान और गाँव के मुखिया लोग भी बंगाल के अन्य भागों के देहाती इलाक्रों में प्रभावशाली बनकर उभर रहे थे। कुछ जगहों पर उन्हें ‘हवलदार’ कहा जाता था और कुछ अन्य स्थानों पर वे गाँटीदार (Gantidars) या ‘मंडल’ कहलाते थे। उनके उद्य से जमींदारों के अधिकार का कमजोर पड़ना अवश्यंभावी था।

- चित्र 9.5 के साथ दिए गए पाठ को सावधानीपूर्वक पढ़िए और तीर के निशानों के साथ-साथ उपयुक्त स्थलों पर ये शब्द भरिए : लगान, राजस्व, ब्याज, उधार (ऋण), उपज।
1.5 ज्ञमींदारों की ओर से प्रतिरोध
किंतु, ग्रामीण क्षेत्रों में जमींदारों की सत्ता समाप्त नहीं हुई। राजस्व की अत्यधिक माँग और अपनी भू-संपदा की संभावित नीलामी की समस्या से निपटने के लिए जमींदारों ने इन दबावों से उबरने के रास्ते निकाल लिए। नए संदर्भों में नयी रणनीतियाँ बना ली गई।
फ़र्जी बिक्री एक ऐसी ही तरक्रीब थी। इसमें कई तरह के हथकंडे अपनाए जाते थे। बर्दवान के राजा ने पहले तो अपनी जर्मींदारी का कुछ हिस्सा अपनी माता को दे दिया क्योंकि कंपनी ने यह निर्णय ले रखा था कि स्त्रियों की संपति को नहीं छीना जाएगा। फिर दूसरे क्रदम के तौर पर उसके एजेंटों ने नीलामी की प्रक्रिया में जोड़-तोड़ किया। कंपनी की राजस्व माँग को जान-बूझकर रोक लिया गया और भुगतान न की गई बक्राया राशि बढ़ती गई। जब भू-संपदा का कुछ हिस्सा नीलाम किया गया तो जर्मींदार के आदमियों ने ही अन्य ख़रीददारों के मुक्राबले ऊँची-ऊँची बोलियाँ लगाकर संपति को ख़रीद लिया। आगे चलकर उन्होंने ख़रीद की राशि को अदा करने से इनकार कर दिया, इसलिए उस भूसंपदा को फिर से बेचना पड़ा। एक बार फिर ज्ञर्मीदार के एजेंटांने ही उसे खृरीद लिया और फिर एक बार खृरीद की रक्रम नहीं अदा की गई और इसलिए एक बार फिर नीलामी करनी पड़ी। यह प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती रही और अंततोगत्वा राज और नीलामी के समय बोली लगाने वाले थक गए। जब किसी ने भी बोली नहीं लगाई तो उस संपदा को नीची क्रीमत पर फिर ज्ञर्मीदार को ही बेचना पड़ा। ज्ञर्मीदार कभी भी राजस्व की पूरी माँग नहीं अदा करता था; इस प्रकार कंपनी कभी-कभार ही किसी मामले में इकटुरी हुई बकाया राजस्व की राशियों को वसूल कर पाती थी।
ऐसे सौदे बड़े पैमाने पर हुए। सन् 1793 से 1801 के बीच, बंगाल की चार बड़ी जर्मींदारियों ने, जिनमें बर्दवान की जर्मींदारी भी एक थी, अनेक बेनामी खृरीददारियाँ कीं जिनसे कुल मिलाकर 30 लाख रुपये की प्राप्ति हुई। नीलामियों में की गई कुल बिक्रियों में से 15 प्रतिशत सौदे नकृली थी।
जमींदार लोग और भी कई तरीकों से अपनी जमींदारी को छिनने से बचा लेते थे। जब कोई बाहरी व्यक्ति नीलामी में कोई जमीन खृरीद लेते थे तभी उन्हें हर मामले में उसका कृष्जा नहीं मिलता था। कभी-कभी तो पुराने जमींदार के ‘लठियाल’ नए खृरीददार के लोगों को मारपीटकर भगा देते थे और कभी-कभी तो ऐसा भी होता था कि पुराने रैयत बाहरी लोगों को यानी नए खृरीददार के लोगों को जमीन में घुसने ही नहीं देते थे। वे अपने आपको पुराने जमींदार से जुड़ा हुआ महसूस करते थे और उसी के प्रति वफ्रादार बने रहते थे और यह मानते थे कि पुराना जमींदार ही उनका अन्नदाता है और वे उसकी प्रजा हैं। जमींदारी की बिक्री से उनके तादात्म्य और गौरव को धक्का पहुँचता था। इसलिए जमींदार आसानी से विस्थापित नहीं किए जा सकते थे।
उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में कीमतों में मंदी की स्थिति समाप्त हो गई। इसलिए, जो जर्मींदार 1790 के दशक की तकलीफ़ों को झेलने में सफल हो गए, उन्होंने अपनी सत्ता को सुदृढ़ बना लिया। राजस्व के भुगतान संबंधी नियमों को भी कुछ लचीला बना दिया गया। फलस्वरूप गाँवों पर जर्मींदार की सत्ता और अधिक मजबूत हो गई लेकिन आगे चलकर 1930 के दशक की घोर मंदी की हालत में अंततः जर्मींदारों का भट्टा बैठ गया और जोतदारों ने देहात में अपने पाँव मजबूत कर लिए।
1.6 पाँचवीं रिपोर्ट
हम जिन परिवर्तनों पर चर्चा कर रहे हैं उनमें से बहुत से परिवर्तनों का विस्तृत विवरण एक रिपोर्ट में दिया गया है जो सन् 1813 में ब्रिटिश संसद में पेश की गई थी। यह उन रिपोर्टों में से पाँङचवीं रिपोर्ट थी जो भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन तथा क्रियाकलापों के विषय में तैयार की गई थी। अक्सर ‘पाँङचवीं रिपोर्ट’ के नाम से उल्लिखित यह रिपोर्ट 1,002 पृष्ठों में थी। इसके 800 से अधिक पृष्ठ परिशिष्टों के थे जिनमें जमींदारों और रैयतों की अर्जियाँँ, भिन्न-भिन्न जिलों के जब इस्तमरारी बंदोबस्त लागू किया गया था, तब तेजचंद, बर्दवान का राजा था। उसके बाद, मेहताबचंद के शासन में बर्दवान की जर्मांदारी काफ्री फली-फूली। मेहताबचंद ने संथालों के विद्रोह और 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेजी हुकूमत का साथ दिया था। बेनामी का शाब्दिक अर्थ ‘गुमनाम’ है, हिंदी तथा कुछ अन्य भारतीय भाषाओं में इस शब्द का प्रयोग ऐसे सौदों के लिए किया जाता है जो किसी फ़र्जी या अपेक्षाकृत महत्वहीन व्यक्ति के नाम से किए जाते हैं और उनमें असली फ़र्यदा पाने वाले व्यक्ति का नाम नहीं दिया जाता।

लठियाल, का शाब्दिक अर्थ है वह व्यक्ति जिसके पास लाठी या डंडा हो। ये जमींदार के लठैत यानी डंडेबाज पक्षधर होते थे।
चित्र 9.7
अंडुल राजमहल
ऐसे राजमहल एक युगांत को दर्शने वाले अवशेष हैं। जर्मींदारों के रहन-सहन की पत्नोन्मुख वैभवशाली जीवन शैली पर बनी सत्यजीत राय की प्रसिद्ध फिल्म ‘ जलशाघर’ की शूर्टिंग इसी अंडुल राजमहल में की गई थी।
कलेक्टरों की रिपोर्ट, राजस्व विवरणियों से संबंधित सांख्यिकीय तालिकाएँ और अधिकारियों द्वारा बंगाल और मद्रास के राजस्व तथा न्यायिक प्रशासन पर लिखित टिप्पणियाँ शामिल की गई थीं।
कंपनी ने 1760 के दशक के मध्य में जब से बंगाल में अपने आपको स्थापित किया था तभी से इंग्लैण्ड में उसके क्रियाकलापों पर बारीकी से नज्ञर रखी जाने लगी थी और उन पर चर्चा की जाती थी। ब्रिटेन में बहुत से ऐस्मे समूह भी थे जो भारत तथा चीन के साथ व्यापार पर ईस्ट ईंडिया कंपनी के एकाधिकार का विरोध करते थे। वे चाहते थे कि उस शाही फरमान को रद्ध कर दिया जाए जिसके तहत इस कंपनी को यह एकाधिकार दिया गया था। ऐस्मे निजी व्यापारियों की संख्या बढ़ती जा रही थी जो भारत के साथ होने वाले व्यापार में हिस्सा लेना चाहते थे और ब्रिटेन के उद्योगपति ब्रिटिश विनिर्माताओं के लिए भारत का बाज्ञार खुलवाने के लिए उत्सुक थे। कई राजनीतिक समूहों का तो यह कहना था कि बंगाल पर मिली विजय का लाभ केवल ईस्ट ईंडिया कंपनी को ही मिल रहा है, संपूर्ण ब्रिटिश राष्ट्र को नहीं। कंपनी के कुशासन और अव्यवस्थित प्रशासन के विषय में प्राप्त सूचना पर ब्रिटेन में गरमागरम बहस छिड़ गई और कंपनी के अधिकारियों के लोभ-लालच और भ्रष्टाचार की घटनाओं को ब्रिटेन के समाचारपत्रों में व्यापक रूप से उछाला गया। ब्रिटिश संसद ने भारत में कंपनी के शासन को विनियमित और नियंत्रित करने के लिए अठारहवीं शताब्दी के आंतिम दशकों में अनेक अधिनियम पारित किए। कंपनी को बाध्य किया गया कि वह भारत के प्रशासन के विषय में नियमित रूप से अपनी रिपोर्ट भेजा करे और कंपनी के कामकाज की जॉँच करने के लिए कई समितियाँं नियुक्त की गई। ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ एक ऐसी ही रिपोर्ट है जो एक प्रवर समिति द्वारा तैयार की गई थी। यह रिपोर्ट भारत में इस्ट इंडिया कंपनी के शासन के स्वरूप पर ब्रिटिश संसद में गंभीर वाद-विवाद का आधार बनी।

अठारहवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में ग्रामीण बंगाल में क्या हुआ इसके बारे में हमारी अवधारणा लगभग डेढ़ शताब्दी तक इस पाँचवीं रिपोर्ट के आधार पर ही बनती-सुधरती रही। पाँचवीं रिपोर्ट में उपलब्ध साक्ष्य बहुमूल्य हैं। लेकिन ऐसी की सरकारी रिपोर्टों को सावधानीपूर्वक पढ़ना और समझना चाहिए। हमें यह जानने की ज्ञरूरत है कि ये रिपोर्ट किसने और किस उद्देश्य से लिखी। वास्तव में आधुनिक शोधों से पता चलता है कि पाँचवीं रिपोर्ट में दिए गए तकों और साक्ष्यों को बिना किसी आलोचना के स्वीकार नहीं किया जा सकता।
शोधकर्ताओं ने ग्रामीण बंगाल में औपनिवेशिक शासन के बारे में लिखने के लिए बंगाल के अनेक ज़मींदारों के अभिलेखागारों तथा जिलों के स्थानीय अभिलेखों की सावधानीपूर्वक जाँच की है। उनसे पता चलता है कि पाँचवीं रिपोर्ट लिखने वाले कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना करने पर तुले हुए थे इसलिए पाँचवीं रिपोर्ट में परंपरागत ज़मींदारी सत्ता के पतन का वर्णन अतिरंजित है और जिस पैमाने पर ज़मींदार लोग अपनी ज़मीनें खोते जा रहे थे उसके बारे में भी बढ़ा-चढ़ा कर कहा गया है। जैसा कि हमने देखा है, जब जमींदारियाँ नीलाम की जाती थीं, तब भी ज़मींदार नए-नए हथकंडे अपनाकर अपनी ज़मींदारी को बचा लेते थे और बहुत कम मामलों में विस्थापित होते थे।
स्त्रोत 2
पाँचवीं रिपोर्ट से उद्धृत
ज्ञर्मींदारों की हालत और ज्ञर्मीनों की नीलामी के बारे में पाँँचवीं रिपोर्ट में कहा गया है :
राजस्व समय पर नहीं वसूल किया जाता था और काफ्री हद तक जमीनें समय-समय पर नीलामी पर बेचने के लिए रखी जाती थी। स्थानीय वर्ष 1203, तद्नुसार सन् 1796-97 में बिक्री के लिए विज्ञापित जमीन की निर्धारित राशि (जुम्मा) 28,70,061 सिक्का रू. थी और वह वास्तव में 17,90,416 रू. में बेची गई और 14,18,756 रू. की राशि जुम्मा के रूप में प्राप्त हुई। स्थानीय संवत 1204, तद्नुसार सन् 1797-98 में 26,66,191 सिक्का रू. के लिए जमीन विज्ञापित की गई, 22,74,076 सिक्का रू की जमीन बेची गई और क्रय राशि 21,47,580 सिक्का रू. थी। बाकीदारों में कुछ लोग देश के बहुत पुराने परिवारों में से थे। ये थे : नदिया, राजशाही, विशनपुर (सभी बंगाल के जिले) आदि के राजा...। साल दर साल उनकी जागीरों के टूटते जाने से उनकी हालत बिगड़ गई। उन्हें गरीबी और बरबादी का सामना करना पड़ा और कुछ मामलों में तो सार्वजनिक निर्धारण की राशि को यथावत बनाए रखने के लिए राजस्व अधिकारियों को भी काफ्री कठिनाइयाँउठानी पड़ी।
जिस लहजे में साक्ष्य अभिलिखित किया गया है, उससे आप रिपोर्ट में वर्णित तथ्यों के प्रति रिपोर्ट लिखने वाले के रुख के बारे में क्या सोचते हैं? आंकड़ों के जरिये रिपोर्ट में क्या दर्शने की कोशिश की गई है? क्या इन दो वर्षों के आंकड़ों से आपके विचार से, किसी भी समस्या के बारे में दीर्घकालीन निष्कर्ष निकालना संभव होगा?
→ चर्चा कीजिए...
आपने जर्मींदारों के हाल के बारे में अभी जो कुछ पढ़ा है उसकी तुलना अध्याय-8 में दिए गए विवरण से कीजिए।
2. कुदाल और हल
आइए अब हम अपना ध्यान बंगाल की गीली जमीनों से हटाकर सूखे अंचलों पर और स्थायी कृषि के क्षेत्र से हटाकर झूम कृषि के क्षेत्र पर केंद्रित करें। आप उन परिवर्तनों को देखेंगे जो कृषक अर्थव्यवस्था की सीमाओं के बाहर की ओर विस्तार होने से आए, जिससे राजमहल की पहाड़ियों के इलाक्रे में स्थित जंगल और चरागाह उस अर्थव्यवस्था में समा गए। आप यह भी देखेंगे कि इन परिवर्तनों के कारण इस क्षेत्र के भीतर तरह-तरह के झगड़े-झंझट कैसे उत्पन्न हुए।
2.1 राजमहल की पहाड़ियों में
उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में, बुकानन ने राजमहल की पहाड्डियों का दौरा किया था। उसके वर्णन के अनुसार ये पहाड्डियाँ अभेद्य लगती थीं। यह एक ऐसा खृतरनाक इलाका था जहाँ बहुत कम यात्री जाने की हिम्मत करते थे। बुकानन जहाँ कहीं भी गया, वहाँ उसने निवासियों के व्यवहार को शत्रुतापूर्ण पाया। वे लोग कंपनी के अधिकारियों के प्रति आशंकित थे और उनसे बातचीत करने को तैयार नहीं थे। कई उदाहरणों में तो वे अपने घर-बार और गाँव छोड़कर भाग गए थे।
ये पहाड़ी लोग कौन थे? वे बुकानन के दौरे के प्रति इतने आशंकित क्यों थे? बुकानन की पत्रिका में हमें उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में इन लोगों की जो तरस खाने वाली हालत थी उसकी झ्लक मिलती है। उन स्थानों के बारे में उसने डायरी लिखी थी, जहाँ-जहाँ उसने भ्रमण किया था, लोगों से मुलाक्रात की थी और उनके रीति-रिवाजों को देखा था। यह पत्रिका हमारे मस्तिष्क में अनेक प्रश्न खड़े करती है। किंतु यह हमेशा हमें उत्तर देने में सहायक नहीं होती है। उसकी यह डायरी समय के केवल एक क्षण-विशेष के बारे में ही बतलाती है, लोगों तथा स्थानों के लंबे इतिहास के बारे में नहीं बतलाती। ऐसे लंबे इतिहास के लिए इतिहासकारों को अन्य रिकाड़ों की ओर मुड़ना होगा।
यदि हम अठारहवीं शताब्दी के परवर्ती दशकों के राजस्व अभिलेखों पर दृष्टिपात करें तो हम जान लेंगे कि इन पहाड़ी लोगों को पहाड़िया क्यों कहा जाता था। वे राजमहल की पहाड़ियों के ईर्द-गिर्द रहा करते थे। वे जंगल की उपज से अपनी गुजर-बसर करते थे और झूम खेती किया करते थे। वे जंगल के छोटे-से हिस्से में झाडियों को काटकर और घास-फृँस को जलाकर जमीन साफ्र कर लेते थे और राख की पोटाश से उपजाऊ बनी जमीन पर ये पहाड़िया लोग अपने खाने के लिए तरह-तरह की दालें और ज्वार-बाजरा उगा लेते थे। वे अपने कुदाल से जमीन को थोड़ा खुरच लेते थे, कुछ वर्षों तक उस साफ्र की गई जमीन में खेती करते थे और फिर उसे कुछ वर्षों के लिए परती छोड़ कर नए इलाक्रे में चले जाते थे जिससे कि उस जमीन में खोई हुई उर्वरता फिर से उत्पन्न हो जाती थी।
बुकानन कौन था?
फ्रासिस बुकानन एक चिकित्सक था जो भारत आया और बंगाल चिकित्सा सेवा में (1794 से 1815 तक) कार्य किया। कुछ वर्षों तक, वह भारत के गर्वनर जनरल लार्ड बेलेज्ली का शल्य-चिकित्सक रहा। कलकत्ता (वर्तमान में कोलकत्ता) के अपने प्रवास के दौरान उसने कलकत्ता में एक चिड्दियाघर की स्थापना की, जो कलकत्ता अलीपुर चिड्दियाघर कहलाया। वे थोड़े समय के लिए वानस्पतिक उद्यान के प्रभारी रहे। बंगाल सरकार के अनुरोध पर उन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार क्षेत्र में आने वाली भूमि का विस्तृत सर्वेक्षण किया। 1815 में वह बीमार हो गए और इंग्लैण्ड चले गए। अपनी माता की मृत्यु के पश्चात् वे उनकी जायदाद के वारिस बने और उन्होंने उनके वंश के नाम ‘हैमितटन’ को अपना लिया। इसलिए उन्हें अकसर बुकानन-हैमितटन भी कहा जाता है।
उन जंगलों से पहाड़िया लोग खाने के लिए महुआ के फूल इकट्टे करते थे, बेचने के लिए रेशम के कोया और राल और काठकोयला बनाने के लिए लकड़ियाँँ इकट्टी करते थे। पेड़ों के नीचे जो छोटे-छोटे पौधे उग आते थे या परती ज़मीन पर जो घास-फृँस की हरी चादर-सी बिछ जाती थी वह पशुओं के लिए चरागाह बन जाती थी।

राजमहल की पहाड़ियों में स्थित एक पहाड़ी गाँव का चित्र जो 1782 में विलियय होजेज द्वारा चित्रित किया गया था। विलियम होजेज एक ब्रिटिश कलाकार था जो कैप्टेन कुक के साथ उसकी प्रशांत महासागर की दूसरी समुद्र यात्रा (1772-75) के दौरान प्रशांत क्षेत्र में गया था और वहाँं से भारत आया था। 1781 में वह भागलपुर के कलेक्टर ऑंगस्टस क्लीवलैंड का मित्र बन गया था। क्लीवलैंड के निर्मंत्रण पर होजेज 1782 में उसके साथ जंगल महालों के भ्रमण पर गया था। वहाँं होजेज ने कई एक्वाटिंट तैयार किए थे। उस समय के अनेक चित्रकारों की तरह होजेज ने भी बड़े सुंदर-सुंदर रमणीय दृश्यों की खोज की थी। उस समय के चित्रोपम दृश्यों के खोजी कलाकार स्वच्छंद्तावाद की विचारधारा से प्रेरित थे; इस विचारधारा के अंतर्गत प्रकृति की पूजा की जाती थी और उसके सौंदर्य एवं शक्ति की प्रशंसा की जाती थी। रुमानी कलाकार यह महसूस करते थे कि प्रकृति से संलाप संबंध बनाने के लिए यह आवश्यक है कि कलाकार प्रकृति के निकट संपर्क में आए, अपने ग्राम गीतों में प्रकृति का चित्रण करे, आधुनिक कृत्रिम सभ्यता से दूषित न हो, अज्ञात भूदूश्यों को खोजे और छाया एवं प्रकाश के अलौकिक आनन्द का लाभ उठाए। प्रकृति के इन्हीं रहस्यों की खोज में ही होजेज ने राजमहल की पहाड़ियों का भ्रमण किया था। उसे समतल-सपाट भूखंड नीरस लगे, जबकि विविधतापूर्ण, ऊँची-नीची, उबड़-खाबड़ जमीन में सुंदरता के दर्शन हुए। औपनिवेशिक अधिकारी जिन भूदूश्यों को भयंकर तथा उजाड़, उपद्वी जंगली लोगों का निवास स्थल मानते थे, वे दृश्य होजेज की चित्रकारी में मनमोहक और रमणीय दिखाई देते हैं।
ऊपर दिए गए चित्र को देखिए और यह पता लगाइए कि होजेज ने राजमहल की पहाड़ियों को किसलिए रमणीय माना था। एक्वाट्टि (ताम्रपट्टेक्लीर्णन) एक ऐसी तसवीर होती है जो ताम्रपट्टी में अम्ल की सहायता से चित्र के रूप में कटाई करके छापी जाती है।
चित्र 9.9
विलियम होजेज द्वारा चित्रित जंगल प्रदेश का एक दृश्य।
यहाँ आप जंगल से ढकी हुई नीची पहाड़ियाँ, और ऊँची चोटियाँ भी देख सकते हैं जो कहीं भी वास्तव में 2000 फुट से ऊँची नहीं हैं। बीच में खड़ी दुरुह पहाड़ियाँ दिखलाकर होजेज उनकी दुर्गमता पर बल देना चाहता है।
शिकारियों, झूम खेती करने वालों, खाद्य बटोरने वालों, काठकोयला बनाने वालों, रेशम के कीड़े पालने वालों के रूप में पहाड़िया लोगों की जिंदगी इस प्रकार जंगल से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई थी। वे इमली के पेड़ों के बीच बनी अपनी झोपड़ियों में रहते थे और आम के पेड़ों की छाँह में आराम करते थे। वे पूरे प्रदेश को अपनी निजी भूमि मानते थे और यह भूमि उनकी पहचान और जीवन का आधार थी। वे बाहरी लोगों के प्रवेश का प्रतिरोध करते थे। उनके मुखिया लोग अपने समूह में एकता बनाए रखते थे, आपसी लड़ाई-झगड़े निपटा देते थे और अन्य जनजातियों तथा मैदानी लोगों के साथ लड़ाई छिड़ने पर अपनी जनजाति का नेतृत्व करते थे।

इन पहाड़ियों को अपना मूलाधार बनाकर, पहाड़िया लोग बराबर उन मैदानों पर आक्रमण करते रहते थे जहाँ किसान एक स्थान पर बस कर अपनी खेती-बाड़ि किया करते थे। पहाड़ियों द्वारा ये आक्रमण ज्यादातर अपने आपको विशेष रूप से अभाव या अकाल के वर्षों में जीवित रखने के लिए किए जाते थे। साथ ही, ये हमले मैदानों में बसे हुए समुदायों पर अपनी ताक्रत दिखलाने का भी एक तरीका था। इसके अलावा, ऐसे आक्रमण बाहरी लोगों के साथ अपने राजनीतिक संबंध बनाने के लिए भी किए जाते थे। मैदानों में रहने बाले जर्मींदारों को अकसर
चित्र 9.8 और 9.9 को देखिए। इन चित्रों द्वारा जनजातीय मनुष्य और प्रकृति के बीच के संबंधों को किस प्रकार दर्शाया गया है; वर्णन कीजिए।
इन पहाड़ी मुखियाओं को नियमित रूप से ख़िराज देकर उनसे शांति ख़रीदनी पड़ती थी। इसी प्रकार, व्यापारी लोग भी इन पहाड़ियों द्वारा नियंत्रित रास्तों का इस्तेमाल करने की अनुमति प्राप्त करने हेतु उन्हें कुछ पथकर दिया करते थे। जब ऐसा पथकर पहाड़िया मुखियाओं को मिल जाता था तो वे व्यापारियों की रक्षा करते थे और यह भी आश्वासन देते थे कि कोई भी उनके माल को नहीं लूटेगा।
इस प्रकार कुछ ले-देकर की गई शांति संधि अधिक लंबे समय तक नहीं चली। यह अठारहवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में उस समय भंग हो गई जब स्थिर खेती के क्षेत्र की सीमाएँ आक्रामक रीति से पूर्वी भारत में बढ़ाई जाने लगीं। अंग्रेजों ने जंगलों की कटाई-सफाई के काम को प्रोत्साहित किया और जमींदारों तथा जोतदारों ने परती भूमि को धान के खेतों में बदल दिया। अंग्रेजों के लिए स्थायी कृषि का विस्तार आवश्यक था क्योंकि उससे राजस्व के स्त्रोतों में वृद्धि हो सकती थी, निर्यात के लिए फ़सल पैदा हो सकती थी और एक स्थायी, सुव्यवस्थित समाज की स्थापना हो सकती थी। वे जंगलों को उजाड़ मानते थे और वनवासियों को असभ्य, बर्बर, उपद्रवी और कूर समझते थे जिन पर शासन करना उनके लिए कठिन था। इसलिए उन्होंने यही महसूस किया कि जंगलों का सफ़ाया करके, वहाँ स्थायी कृषि स्थापित करनी होगी और जंगली लोगों को पालतू व सभ्य बनाना होगा; उनसे शिकार का काम छुड़वाना होगा और खेती का धंधा अपनाने के लिए उन्हें राजी करना होगा।
ज्यों-ज्यों स्थायी कृषि का विस्तार होता गया, जंगलों तथा चरागाहों का क्षेत्र संकुच्चित होता गया। इससे पहाड़ी लोगों तथा स्थायी खेतीहरों के बीच झगड़ा तेज्ञ हो गया। पहाड़ी लोग पहले से अधिक नियमित रूप से बसे हुए गाँवों पर हमले बोलने लगे और ग्रामवासियों से अनाज और पशु छीन-झपट कर ले जाने लगे। औपनिवेशिक अधिकारियों ने उत्तेजित होकर इन पहाड़ियों पर काबू की भरसक कोशिशों कीं परंतु उनके लिए ऐसा करना आसान नहीं था।
1770 के दशक में ब्रिटिश अधिकारियों ने इन पहाड़ियों को निर्मूल कर देने की ऋूर नीति अपना ली और उनका शिकार और संहार करने लगे। तदोपरांत, 1780 के दशक में भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड ने शाँति स्थापना की नीति प्रस्तावित की जिसके अनुसार पहाड़िया मुखियाओं को एक वार्षिक भत्ता दिया जाना था और बदले में उन्हें अपने आदमियों का चाल-चलन ठीक रखने की जिम्मेदारी लेनी थी। उनसे यह भी आशा की गई थी कि वे अपनी बस्तियों में व्यवस्था बनाए रखेंगे और अपने लोगों को अनुशासन में रखेंगे। लेकिन बहुत से पहाड़िया मुखियाओं ने भत्ता लेने से मना कर दिया। जिन्होंने इसे स्वीकार क्रिया उनमें से अधिकांश अपने समुदाय में अपनी सत्ता खो बैठे। औपनिवेशिक सरकार के वेतनभोगी बन जाने से उन्हें अधीनस्थ कर्मचारी या वैतनिक मुखिया माना जाने लगा।
जब शांति स्थापना के लिए अभियान चल रहे थे तभी पहाड़िया लोग अपने आपको शत्रुतापूर्ण सैन्यबलों से बचाने के लिए और बाहरी लोगों से लड़ाई चालू रखने के लिए पहाड़ों के भीतरी भागों में चले गए। इसलिए जब 1810-11 की सर्दियों में बुकानन ने इस क्षेत्र की यात्रा की थी तो यह स्वाभाविक ही था कि पहाड़िया लोग बुकानन को संदेह और अविश्वास की दृष्टि से देखते। शांति स्थापना के अभियानों के अनुभव और कूरतापूर्ण दमन की यादों के कारण उनके मन में यह धारणा बन गई थी कि उनके इलाक्रे में ब्रिटिश लोगों की घुसपैठ का क्या असर होने वाला है। उन्हें ऐसा प्रतीत होता था कि प्रत्येक गोरा आदमी एक ऐसी शक्ति का प्रतिनिधित्व कर रहा है जो उनसे उनके जंगल और जमीन छीन कर उनकी जीवन शैली और जीवित रहने के साधनों को नष्ट करने पर उतारू हैं।
वस्तुतः इन्हीं दिनों उन्हें एक नए खतरे की सूचनाएँ मिलने लगी थीं और बह था संथाल लोगों का आगमन। संथाल लोग बहाँ के जंगलों का सफ्राया करते हुए, इमारती लकड़ी को काटते हुए, ज्ञमीन जोतते हुए और चावल तथा कपास उगाते हुए उस इलाक्रे में बड़ी संख्या में घुसे चले आ रहे थे। चृँकि संथाल बाशिंदों ने निचली पहाड्डियों पर अपना क्रब्जा जमा लिया था, इसलिए पहाड़ियों को राजमहल की पहाड़ियों में और भीतर की ओर पीछे हटना पड़ा। पहाड़िया लोग अपनी झूम खेती के लिए कुदाल का प्रयोग करते थे; इसलिए यदि कुदाल को पहाड़िया जीवन का प्रतीक माना जाए तो हल को नए बाशिंदों (संथालों) की शक्ति का प्रतिनिधि मानना होगा। हल और कुदाल के बीच की यह लड़ाई बहुत लंबी चली।
2.2 संथाल : अगुआ बाशिंदे
सन् 1810 के अंत में, बुकानन ने गंजुरिया पहाड़, जो कि राजमहल श्रृंखलाओं का एक भाग था, को पार किया और आगे के चट्टानी प्रदेश के बीच से निकलकर वह एक गाँव में पहुँच गया। वैसे तो यह एक पुराना गाँव था पर उसके आस-पास की जमीन खेती करने के लिए अभी-अभी साफ्र की गई थी। वहाँ के भूदृश्य को देखकर उसे पता चला कि ‘मानव श्रम के समुचित प्रयोग से’ उस क्षेत्र की तो काया ही पलट गई है। उसने लिखा, “गंजुरिया में अभी-अभी काफ्री जुलाई की गई है जिससे यह पता चलता है कि इसे कितने शानदर इलाके में बदला जा सकता है। मैं सोचता हूँ, इसकी सुंदरता और समृद्धि विश्व के किसी भी क्षेत्र जैसी विकसित की जा सकती है। यहाँ की जमीन अलबत्ता चट्टानी है लेकिन बहुत ही ज्यादा बढ़िया है और बुकानन ने उतनी बढ़िया तंबाकू और सरसों और कहीं नहीं देखीं। पूछने पर उसे पता चला कि वहाँ संथालों ने कृषि क्षेत्र की सीमाएँ काफ्री बढ़ा ली थीं। वे इस इलाके में 1800 के आस-पास आए थे, उन्होने वहाँ रहने वाले पहाड़ी लोगों को नीचे के ढालों पर भगा दिया, जंगलों का सफ्राया किया और फिर वहाँ बस गए।
संथाल लोग राजमहल की पहाड्डियों में कैसे पहुँचे? संथाल 1780 के दशक के आस-पास बंगाल में आने लगे थे। जर्मींदार लोग खेती के लिए नयी भूमि तैयार करने और खेती का विस्तार करने के लिए उन्हें भाड़े पर रखते थे और ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें जंगल महालों में बसने का
चित्र 9.10
संथाल प्रदेश में स्थित एक पहाड़ी ग्राम, 23 फ़रवरी 1856 के ‘लंदन न्यूज’ में प्रकाशित चित्रा।
राजमहल की निचली पहाड़ियों में स्थित गाँव का यह चित्र 1850 के दशक के प्रारंभ में वाल्टरशेरबिल द्वारा चित्रित किया गया था। यह गाँव शांतिपूर्ण, नीरव और रमणीय प्रतीत होता है। बाहरी दुनिया का इस पर कोई असर हुआ प्रतीत नहीं होता।
चित्र 9.12 से इस संथाल गाँव के चित्र की तुलना कीजिए।

निमंत्रण दिया। जब ब्रिटिश लोग पहाड़ियों को अपने बस में करके स्थायी कृषि के लिए एक स्थान पर बसाने में असफल रहे तो उनका ध्यान संथालों की ओर गया। पहाड़िया लोग जंगल काटने के लिए हल को हाथ लगाने को तैयार नहीं थे और अब भी उपद्रवी व्यवहार करते थे। जबकि, इसके विपरीत, संथाल आदर्श बाशिंदे प्रतीत हुए, क्योंकि उन्हें जंगलों का सफ्राया करने में कोई हिचक नहीं थी और वे भूमि को पूरी ताक्रत लगाकर जोतते थे।
संथालों को ज्ञमीनें देकर राजमहल की तलहटी में बसने के लिए तैयार कर लिया गया। 1832 तक, ज्ञमीन के एक काफ़ी बड़े इलाक़े को दामिन-इ-कोह के रूप में सीमांकित कर दिया गया। इसे संथालों की भूमि घोषित कर दिया गया। उन्हें इस इलाके के भीतर रहना था, हल चलाकर खेती करनी थी और स्थायी किसान बनना था। संथालों को दी जाने वाली भूमि के अनुदान-पत्र में यह शर्त थी कि उनको दी गई भूमि के कम-से-कम दसवें भाग को साफ़ करके पहले दस वर्षों के भीतर जोतना था। इस पूरे क्षेत्र का सर्वेक्षण करके उसका नक्शा तैयार किया गया। इसके चारों ओर खबे गाड़कर इसकी परिसीमा निर्धारित कर दी गई और इसे मैदानी इलाके के स्थायी कृषकों की दुनिया से और पहाड़िया लोगों की पहाड़ियों से अलग कर दिया गया।
दामिन-इ-कोह के सीमांकन के बाद, संथालों की बस्तियाँ बड़ी तेजी से बढ़ी, संथालों के गाँवों की संख्या जो 1838 में 40 थी, तेजी से बढ़कर 1851 तक 1,473 तक पहुँच गई। इसी अवधि में, संथालों की जनसंख्या जो केवल 3,000 थी, बढ़कर 82,000 से भी अधिक हो गई। जैसे-जैसे खेती का विस्तार होता गया, वैसे-वैसे कंपनी की तिजोरियों में राजस्व राशि में वृद्धि होती गई।
उन्नीसवीं शताब्दी के संथाल गीतों और मिथकों में उनकी यात्रा के लंबे इतिहास का बार-बार उल्लेख किया गया हैः उनमें कहा गया है कि संथाल लोग अपने लिए बसने योग्य स्थान की खोज में बराबर बिना थके चलते ही रहते थे। अब यहाँँ दामिन-इ-कोह में आकर मानो उनकी इस यात्रा को पूर्ण विराम लग गया।
जब संथाल राजमहल की पहाडियों पर बसे तो पहले पहाडिया लोगों ने इसका प्रतिरोध किया पर अंततोगत्वा वे इन पहाडियों में भीतर की ओर चले जाने के लिए मजबूर कर दिए गए। उन्हें निचली पहाडियों तथा घाटियों में नीचे की ओर आने से रोक दिया गया और ऊपरी पहाडियों के चट्टानी और अधिक बंजर इलाकों तथा भीतरी शुष्क भागों तक सीमित कर दिया गया। इससे उनके रहन-सहन तथा जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ा और आगे चलकर वे गरीब हो गए। झूम खेती नयी-से-नयी ज्ञमीनें खोजने और भूमि की प्राकृतिक उर्वरता का उपयोग करने की क्षमता पर निर्भर रहती है। अब सर्वाधिक उर्वर ज्ञमीनें उनके लिए दुर्लभ हो गई क्योंकि वे अब दामिन का हिस्सा बन चुकी थीं। इसलिए पहाडिया लोग खेती के अपने तरीके (झूम खेती) को आगे सफलतापूर्वक नहीं चला सके। जब इस क्षेत्र के जंगल खेती के लिए साफ़ कर दिए गए तो पहाडिया शिकारियों को भी समस्याओं का सामना करना पड़ा। इसके विपरीत संथाल लोगों ने अपनी पहले वाली खानबदोश जिंदगी को छोड़ दिया था। अब वे एक जगह बस गए थे और बाज्ञार के लिए कई तरह के वाणिज्यिक फ़सलों की खेती करने लगे थे और व्यापारियों तथा साहूकारों के साथ लेन-देन करने लगे थे।

किंतु, संथालों ने भी जल्दी ही यह समझ लिया कि उन्होंने जिस भूमि पर खेती करनी शुरू की थी वह उनके हाथों से निकलती जा रही है। संथालों ने जिस ज़मीन को साफ्र करके खेती शुरू की थी उस पर सरकार (राज्य) भारी कर लगा रही थी, साहूकार (दिकू) लोग बहुत ऊँची दर पर ब्याज लगा रहे थे और कर्ज अदा न किए जाने की सूरत में ज़मीन पर ही कब्जा कर रहे थे, और ज़मींदार लोग दामिन इलाके पर अपने नियंत्रण का दावा कर रहे थे।
1850 के दशक तक, संशाल लोग यह महसूस करने लगे थे कि अपने लिए एक आदर्श संसार का निर्माण करने के लिए, जहाँ उनका अपना शासन हो, जमींदारों, साहूकारों और औपनिवेशिक राज के


कल्पना कीजिए कि आप ‘इलस्ट्रेटेड लंडन न्यूज़’ के पाठक हैं। चित्र 9.12, 9.13 और 9.14 में चित्रित दूश्यों के प्रति आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? इन चित्रों से आपके मन में संथालों की क्या-क्या छवि बनती है?
चित्र 9.13
संथालों के गाँव जल रहे है। 23 फ़रवरी 1856 के इलस्ट्रेटेड लंडन न्यूज्ञ में प्रकाशित चित्रा। विद्रोह कुचल दिए जाने के बाद, इलाके की छानबीन की गई, संदिधि व्यक्तियों को पकड़ लिया गया और गाँवों को आग लगा दी गई। जलते हुए गाँवों के चित्र ब्रिटेन में आम जनता को दिखाए गए, गर्वपूर्वक यह दर्शाने के लिए कि ब्रिटिश कितने शक्तिशाली हैं और उनमें विद्रोह को कुचल डालने और औपनिवेशिक व्यवस्था को थोपने की कितनी अधिक योग्यता है।

चित्र 9.14
संथाल कैदियों को ले जाया जा रहा है। इलस्ट्रेटेड लंडन न्यूज्ज, 1856
ध्यान दीजिए कि ऐसे चित्र किस प्रकार के राजनीतिक संदेश देते हैं। आप देख सकते हैं कि चित्र के बीचों-बीच ब्रिटिश अधिकारी विजयगर्वित होकर किस शान से हाथी पर सवार हैं। घोड़े पर बैठा हुआ एक अधिकारी हुक्का गुड़गुड़ा रहा है; यह तसवीर यह दिखलाती है कि परेशानी का समय खृत्म हो गया है, विद्रोह कुचल दिया गया है। विद्रोही अब जंजीरों से बॉधे जेल ले जाए जा रहे हैं कंपनी के सिपाही उन्हें चारों ओर से घरे हुए है। इस तरह की तसवीरें, जिनमें ब्रिटिश हुक्कूमत को अजेय दर्शाया गया है, ब्रिटिश जनता को अपनी ताक्रत के बारे में आश्वस्त करने के लिए पर्याप्त थी।
स्त्रोत 3
संथालों के बारे में बुकानन के विचार
नयी जमीनें साफ्र करने में वे बहुत होशियार होते हैं लेकिन नीचता से रहते हैं। उनकी झ्रोपड़ियों में कोई बाड़ नहीं होती और दीवारें सीधी खड़ी की गई छोटी-छोटी सटी हुई लकड़ियों की बनी होती हैं जिन पर भीतर की ओर लेप (पलस्तर) लगा होता है। झ्रोपड़ियाँ छोटी और मैली-कुचैली होती हैं; उनकी छत सपाट होती हैं, उनमें उभार बहुत कम होता है।
स्त्रोत 4
कडुया के पास की चट्टानें
बुकानन की पत्रिका निम्नलिखित ऐसे प्रेक्षणों से भरी पड़ी हैः:
आगे लगभग एक मील चलने के बाद में (मैं) चट्टानों के एक शिलाफलक पर आ गया; जिसका कोई यह एक छोटा दानेदार ग्रेनाइट है जिसमें लाल- लाल फेल्डस्पार, क्वार्ट्रज और काला अबरक लगा है... बहाँ से आधा मील से अधिक की दूरी पर में एक अन्य चट्टान पर आया वह भी स्तरहीन थी और उसमें बारीक दानों वाला ग्रेनाइट था जिसमें पीला-सा फेल्डस्पार, सफ्रेद-सा क्वार्ट्रज और काल, अबरक था।
विरुळ विद्रोह करने का समय अब आ गया है। 1855-56 के संथाल विद्रोह के बाद संथाल परगने का निर्माण कर दिया गया, जिसके लिए 5,500 वर्गमील का क्षेत्र भागलपुर और बीरभूम जिलों में से लिया गया। औपनिवेशिक राज को आशा थी कि संथालों के लिए नया परगना बनाने और उसमें कुछ विशेष क्रानून लागू करने से संथाल लोग संतुष्ट हो जाएँगे।
2.3 बुकानन का विवरण
हम बुकानन के विवरण को अपनी जानकारी का आधार मान रहे हैं। लेकिन उसकी रिपोर्टों को पढ़ते समय हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का एक कर्मचारी था। उसकी यात्राएँ केवल भूदृश्यों के प्यार और अज्ञात की खोज से ही प्रेरित नहीं थीं। वह नक्षा नवीसों, सर्वेक्षकों, पालकी उठाने वालों कुलियों आदि के बड़े दल के साथ सर्वत्र यात्रा करता था। उसकी यात्राओं का खर्च ईस्ट ईंडिया कंपनी उठाती थी क्योंकि उसे उन सूचनाओं की आवश्यकता थी जो बुकानन प्रत्याशित रूप से इकट्ठी करता था। बुकानन को यह साफ्र-साफ्र हिदायत दी जाती थी कि उसे क्या देखना, खोजना और लिखना है। वह जब भी अपने लोगों की फ्रौज के साथ किसी गाँव में आता तो उसे तत्काल सरकार के एक एजेंट के रूप में ही देखा जाता था।
जब कंपनी ने अपनी शक्ति को सुदृढ़ बना लिया और अपने व्यवसाय का विकास कर लिया तो वह उन प्राकृतिक साधनों की खोज में जुट गई जिन पर कब्जा करके उनका मनचाहा उपयोग कर सकती थी। उसने परिदृश्यों तथा राजस्व स्तोतों का सर्वेक्षण किया, खोज यात्राएँ आयोजित कीं, और जानकारी इकट्टी करने के लिए अपने भूविज्ञानियों, भूगोलवेत्ताओं, वनस्पति विज्ञानियों और चिकित्सकों को भेजा। निस्संदेह असाधारण प्रेक्षण शक्ति का धनी बुकानन ऐसा ही एक व्यक्ति था। बुकानन जहाँ कहीं भी गया, बहाँ उसने पत्थरों तथा चट्टानों और वहाँ की भूमि के भिन्न-भिन्न स्तरों तथा परतों को ध्यानपूर्वक देखा। उसने वाणिज्यिक दृष्टि से मूल्यवान पत्थरों तथा खनिजों को खोजने की कोशिश की; उसने लौह खनिज और अबरक, ग्रेनाइट तथा साल्टपीटर से संबंधित सभी स्थानों का पता लगाया। उसने सावधानीपूर्वक नमक बनाने और कच्चा लोहा निकालने की स्थानीय पढ़तियों का निरीक्षण किया।
जब बुकानन किसी भूदृश्य के बारे में लिखता था तो वह अकसर इतना ही नहीं लिखता था कि उसने क्या देखा है और भूदृश्य कैसा था, बल्कि वह यह भी लिखता था कि उसमें फेरबदल करके उसे अधिक उत्पादक कैसे बनाया जा सकता है वहाँँ कौन-सी फ्रसलें बोई जा सकती हैं, कौन-से पेड़ काटे जा सकते हैं और कौन-से उगाए जा सकते हैं और हमें यह भी याद रखना होगा कि उसकी सूक्ष्म दृष्टि और प्राथमिकताएँ स्थानीय निवासियों से भिन्न होती थीं: क्या आवश्यक है इस बारे में उसका आकलन कंपनी के वाणिज्यिक सरोकारों से और प्रगति के संबंध में आधुनिक पाश्चात्य विचारधारा से निर्धारित होता था। वह अनिवार्य रूप से वनवासियों की जीवन-शैली का आलोचक था और यह महसूस करता था कि वनों को कृषि भूमि में बदलना ही होगा।
स्त्रोत 5
वनों की बटाई और स्थायी कृषि के बारे में
निचली राजमहल की पहाड़ियों में एक गाँव से गुजरते हुए, बुकानन ने लिखाः इस प्रदेश का दृश्य बहुत ही बढ़िया है; यहाँ की खेती विशेष रूप से, घुमावदार संकरी घाटियों में धान की फ्रसल, बिखरे हुए पेड़ों के साथ साफ़ की गई जमीन, और चट्टानी पहाड़ियाँँ सभी अपने आप में पूर्ण हैं, कमी है तो बस इस क्षेत्र में कुछ प्रगति की और विस्तृत तथा उन्नत खेती की, जिनके लिए यह प्रदेश अत्यंत संवेदनशील है। यहाँ लकड़ी की जगह टसर और लाख के लिए आवश्यकतानुसार बड़े-बड़े बागान लगाए जा सकते हैं; बाक़ी जंगल को भी साफ़ किया जा सकता है, और जो भाग इस प्रयोजन के लिए उपयुक्त न हो वहाँँ पनई ताड़ और महुआ के पेड़ लगाए जा सकते हैं।
3. देहात में विद्रोह
बम्बई दक्कन
आप पढ़ चुके हैं कि औपनिवेशिक बंगाल के किसानों और जमीदार्शों और राजमहल की पहाड़ियों के पहाड़िया और संथाल लोगों के जीवन में किस प्रकार परिवर्तन आ रहा था। आडए अब पश्चिम भारत और परवर्ती अवधि पर दृष्टिपात करें और पता लगाएँ कि बम्बई दक्कन के देहाती क्षेत्र में क्या हो रहा था।
एसे परिवर्तनों का पता लगाने का एक तरीका है वहाँ के किसान विद्रोह पर ध्यान केंद्रित करना। ऐसे नाजुक दौर में विद्रोही अपना गुस्सा और प्रकोपोन्माद दिखलाते हैं; वे जिसे अन्याय और अपने दुःख-दर्द का कारण समझते हैं उनके खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करते हैं। यदि हम उनकी नाराजगी के आधारभूत कारणों को जानने का प्रयत्न करते हैं और उनके गुस्पे की परतें उधेड़ने लगते हैं तो हम उनके जीवन और अनुभव की झलक देख पाते हैं जो अन्यथा हमसे छिपी रहती है। विद्रोहों के बारे में ऐसे अभिलेख भी उपलब्ध होते हैं, जिनका इतिहासकार अवलोकन कर सकते हैं। विद्रोहियों की करतृतों से उत्तेजित होकर और पुनः व्यवस्था स्थापित करने की उत्कट इच्छा से, राज्य के प्राधिकारी केवल विद्रोह को ही दबाने का प्रयत्न नहीं करते, बल्कि वे उसे जानने-बूझने की कोशिश करते हैं और उसके कारणों की भी जाँचा करते हैं जिससे कि नीतियाँ निर्धारित की जा सकें और शांति की स्थापना हो सके। ऐसी जाँच-पड़ताल से साक्ष्य उत्पन्न होता हैं जिसके बारे में इतिहासकार शोध कर सकें।
चर्चा कीजिए...
बुकानन का वर्णन विकास के संबंध में उसके विचारों के बारे में क्या बतलाता है? उद्धरणों से उदाहरण देते हुए अपनी दलील पेश कीजिए। यदि आप एक पहाड़िया वनवासी होते तो उसके इन विचारों के प्रति आपकी प्रतिक्रिया क्या होती?
स्त्रोत 6
उस दिन सूपा में
16 मई 1875 को, पूना के जिला मजिस्ट्रेट ने पुलिस आयुक्त को लिखा:
शनिवार दिनांक 15 मई को सूपा में आने पर मुझे इस उपद्रव का पता चला। एक साहूकार का घर पूरी तरह जला दिया गया; लगभग एक दर्जन मकानों को तोड़ दिया गया और उनमें घुसकर बहाँ के सारे सामान को आग लगा दी गई। खाते पत्र, बांड, अनाज, देहाती कपड़ा, सड़कों पर लाकर जला दिया गया, जहाँ राख के ढेर अब भी देखे जा सकते हैं।
मुख्य कांस्टेबल ने 50 लोगों को गिरपत्तार किया। लगभग 2000 रु. का चोरी का माल छुड़ा लिया गया। अनुमानतः 25,000 रु. से अधिक की हानि हुई। साहूकारों का दावा है कि 1 लाख रु. से ज्यादा का नुक्रसान हुआ है
दक्कन दंगा आयोग
साहूकार ऐसा व्यक्ति होता था जो पैसा उधार देता था और साथ ही व्यापार भी करता था।
लेखक द्वारा प्रयुक्त भाषा या शब्दावली से अकसर उसके पूर्वाग्रहों का पता चल जाता है, स्त्रोत 7 को सावधानीपूर्वक पढ़िए और उन शब्दों को छाँटिए जिनसे लेखक के पूर्वाग्रहों का पता चलता है। चर्चा कीजिए कि उस इलाके का रैयत उसी स्थिति का किन शब्दों में वर्णन करता होगा।
उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान, भारत के विभिन्न प्रांतों के किसानों ने साहूकारों और अनाज के व्यापारियों के विरुढ़ अनेक विद्रोह किए। ऐसा ही एक दक्कन में 1875 में हुआ।
3.1 लेखा बहियाँ जला दी गई
यह आंदोलन पूना (आधुनिक पुणे) जिले के एक बड़े गाँव सूपा में शुरु हुआ। सूपा एक विपणन केंद्र (मंडी) था जहाँ अनेक व्यापारी और साहूकार रहते थे। 12 मई 1875 को, आसपास के ग्रामीण इ्लाकों के रैयत (किसान) इकट्टे हो गए, उन्होंने साहूकारों से उनके बही-खातों और ऋष्णबंधों की माँग करते हुए उन पर हमला बोल दिया। उन्होंने उनके बही-खाते जला दिए, अनाज की दुकानें लूट लीं और कुछ मामलों में तो साहूकारों के घरों को भी आग लगा दी।
पूना से यह विद्रोह अहमद्नगर में फैल गया। फिर अगले दो महीनों में यहाँ और भी आग फैल गई और 6,500 वर्ग किलोमीटर का इ्लाका इनकी चपेट में आ गया। तीस से अधिक गाँव इससे कुप्रभावित हुए। सब जगह विद्रोह का स्वरूप एकसमान ही थाः: साहूकारों पर हमला किया गया, बही-खाते जला दिए गए और ऋष्टणबंध नष्ट कर दिए गए। किसानों के हमलों से घबराकर साहूकार गाँव छोड़कर भाग गए, अधिकतर मामलों में वे अपनी संपत्ति और धन-दौलत भी वहीं पीछे छोड़ गए।
जब विद्रोह फैला तो ब्रिटिश अधिकारियों की ऑँखों के सामने 1857 का गदर दृश्य आ गया (अध्याय 10 भी देखिए)। विद्रोही किसानों के गाँवों में पुलिस थाने स्थापित किए गए। जल्दी से सेनाएँ बुला ली गई। 95 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया गया और उनमें से बहुतों को दंडित दिया गया। लेकिन देहात को काबू करने में कई महीने लग गए।
स्त्रोत 7
समाचारपत्र में छपी रिपोर्ट
‘रैयत और साहूकार’ शीर्षक नामक निम्नलिखित रिपोर्ट 6 जून 1876 के ‘नेटिव ओपीनियन’ नामक समाचार पत्र में छपी और उसे मुंबई के नेटिव न्यूज्ञेपपर्स की रिपोर्ट में यथावत उद्धृत किया गया (हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है):
“बे (रैयत) सर्वप्रथम अपने गाँवों की सीमाओं पर यह देखने के लिए जासूसी करते हैं कि क्या कोई सरकारी अधिकारी आ रहा है और अपराधियों को समय रहते उनके आने की सूचना दे देते हैं। फिर वे एक झुंड बनाकर अपने ऋणदाताओं के घर जाते हैं और उनसे उनके ऋणपत्र और अन्य दस्तावेज्त माँगते हैं और इनकार करने पर ऋणदाताओं पर हमला करके छीन लेते हैं। यदि ऐसी किसी घटना के समय कोई सरकारी अधिकारी उन गाँवों की ओर आता हुआ दिखाई दे जाता है तो गुप्तचर अपराधियों को इसकी खबर पहुँचा देते हैं और अपराधी समय रहते ही तितर-बितर हो जाते हैं”।
त्रहणपत्र और दस्तावेज़ क्यों जलाए गए थे? यह विद्रोह क्यों हुआ? इससे हमें दक्कन के देहात के बारे में और वहाँ औपनिवेशिक शासन में हुए कृषि या भूमि संबंधी परिवर्तनों के बारे में क्या पता चलता है? आइए उन्नीसवीं शताब्दी में हुए परिवर्तनों के लंबे इतिहास पर दृष्टिपात करें।
3.2 एक नयी राजस्व प्रणाली
जैसे-जैसे ब्रिटिश शासन बंगाल से भारत के अन्य भागों में फैलता गया वहाँ भी राजस्व की नयी प्रणालियाँ लागू कर दी गई। इस्तमरारी बंदोबस्त को बंगाल से बाहर बिरले ही लागू किया गया।
ऐसा क्यों किया गया? इसका एक कारण तो यह था कि 1810 के बाद खेती की ऋ़ीमतें बढ़ गई, जिससे उपज के मूल्य में वृद्धि हुई और बंगाल के जर्मींदारों की आमदनी में इज्ञाफ़ा हो गया। चृँकि राजस्व की माँगे इस्तमरारी बंदोबस्त के तहत तय की गई थी, इसलिए औपनिवेशिक सरकार इस बढ़ी हुई आय में अपने हिस्से का कोई दावा नहीं कर सकती थी। अपने वित्तीय संसाधनों को बढ़ाने की उत्कट इच्छा से, औपनिवेशिक सरकार को अपने भू-राजस्व को अधिक से अधिक बढ़ाने के तरीक्रों पर विचार करना पड़ा। इसलिए उन्नीसवीं शताब्दी में औपनिवेशिक शासन में शामिल किए गए प्रदेशों में राजस्व बंदोबस्त किए गए।
अन्य भी कई कारण थे। जब अधिकारी नीतियाँ निर्धारित करते हैं तो उनकी विचारधारा उन आर्थिक सिद्धांतों से अत्यधिक प्रभावित रहती है जिनसे वे अधिकारी पहले से परिचित होते हैं। 1820 के दशक तक इंग्लैंड में डेविड रिकार्डों एक जाने-माने अर्थशास्त्री के रूप में विख्यात थे। औपनिवेशिक अधिकारियों ने अपने महाविद्यालयी जीवन में रिकार्डों के विचारों का अध्ययन किया था। महाराष्ट्र में जब ब्रिटिश अधिकारियों ने 1820 के दशक में प्रारंभिक बंदोबस्त की शर्तं करने का काम हाथ में लिया तो वे इन्हीं में से कुछ विचारों के अनुसार कार्वाई करने लगे।
रिकार्डों के विचारों के अनुसार भूस्वामी को उस समय लागू् ‘औसत लगानों’ को प्राप्त करने का ही हक़ होना चाहिए। जब भूमि से ‘औसत लगान’ से अधिक प्राप्ति होने लगे तो भूस्वामी को अधिशेष आय होगी जिस पर सरकार को कर लगाने की आवश्यकता होगी। यदि कर नहीं लगाया गया तो किसान किरायाजीवी में बदल जाएँगे और उनकी अधिशेष आय का भूमि के सुधार में उत्पाद्क रीति से निवेश नहीं होगा। भारत में अनेक ब्रिटिश अधिकारियों ने सोचा कि बंगाल के इतिहास ने रिकार्डों के सिद्धांत की पुष्टि कर दी है। वहाँँ जमींदार लोग किरायाजीवियों के रूप में बदल गए प्रतीत हुए क्योंकि उन्हॉने अपनी जमीनें पष्ट्रे पर दे दीं और किराये की आमदनी पर निर्भर रहने लगे। इसलिए ब्रिटिश अधिकारियों के विचार से अब यह आवश्यक था कि एक भिन्न राजस्व प्रणाली अपनाई जाए।
जो राजस्व प्रणाली बम्बई दक्कन में लागू की गई उसे रैयतवाड़ी कहा जाता है। बंगाल में लागू की गई प्रणाली के विपरीत, इस प्रणाली के किरायाजीवी शब्द ऐसे लोगों का द्वोतक है जो अपनी संपत्ति के किराए की आय पर जीवनयापन करते हैं।
अंतर्गत राजस्व की राशि सीधे रैयत के साथ तय की जाती थी। भिन्न-भिन्न प्रकार की भूमि से होने वाली औसत आय का अनुमान लगा लिया जाता था। रैयत की राजस्व अदा करने की क्षमता का आकलन कर लिया जाता था और सरकार के हिस्से के रूप में उसका एक अनुपात निर्धारित कर दिया जाता था। हर 30 साल के बाद ज्ञमीनों का फिर से सर्वेक्षण किया जाता था और राजस्व की दर तदनुसार बढ़ा दी जाती थी। इसलिए राजस्व की माँग अब चिरस्थायी नहीं रही थी।
3.3 राजस्व की माँग और किसान का कर्ज
बम्बई दक्कन में पहला राजस्व बंदोबस्त 1820 के दशक में किया गया। माँगा गया राजस्व इतना अधिक था कि बहुत से स्थानों पर किसान अपने गाँव छोड़कर नए क्षेत्रों में चले गए। जिन इलाकों की जमीन घटिया किस्म की थी और वर्षा भी कम ज्यादा होती थी, खास तौर पर समस्या और भी विकट थी। जब वर्षा नहीं होती थी और फ्रसल खराब होती थी तो किसानों के लिए राजस्व अदा करना असंभव हो जाता था। फिर भी, राजस्व इकट्टा करने वाले प्रभारी कलेक्टर अपनी कार्यकुशलता को प्रदर्शित करने और अपने बड़े अधिकारियों को प्रसन्न करने के लिए अत्यंत उत्कट रहते थे। इसलिए वे अत्यंत कठोरतापूर्वक राजस्व वसूल करने का प्रयत्न करते थे। जब कोई किसान अपना राजस्व नहीं दे पाता था तो उसकी फ्रसलें जब्त कर ली जाती थीं और समूचे गाँव पर जुर्माना ठोक दिया जाता था।
1830 के दशक तक आते-आते यह समस्या और भी गंभीर हो गई। सन् 1832 के बाद कृषि उत्पादों की क्रीमतों में तेज्ञी से गिरावट आई और लगभग डेळ्ट दशक तक इस स्थिति में कोई सुधार नहीं आया। इसके परिणामस्वरूप किसानों की आय में और भी गिरावट आई। इसी दौरान, 1832-34 के वर्षों में देहाती इलाके अकाल की चपेट में आकर बरबाद हो गए। दक्कन का एक-तिहाई पशुधन मौत के मुँह में चला गया और आधी मानव जनसंख्या भी काल का ग्रास बन गई। और जो बचे, उनके पास भी उस संकट का सामना करने के लिए खाद्यान्न नहीं था। राजस्व की बकाया राशियाँ आसमान को छूने लगीं।
एसे समय में किसान लोग कैसे जीवित रहे? उन्होंने राजस्व कैसे अदा किया, अपनी जरुरत की चीजां को कैसे जुटाया, अपने हल-बैल कैसे खरीदे अथवा बच्चों की शादियाँ कैसे की?
यह सब करने के लिए पैसा उधार लेने के अलावा उनके पास और कोई चारा नहीं था। ऋष्णदाता से पैसा उधार लेकर ही राजस्व चुकाया जा सकता था लेकिन यदि रैयत ने एक बार ऋष्ण ले लिया तो उसे वापस करना उसके लिए कठिन हो गया। कर्ज़ बढ़ता गया, उधार की राशियाँँ बकाया रहती गई और ऋष्णदाताओं पर किसानों की निर्भरता बढ़ती गई। अब स्थिति यहाँँ तक बिगड़ गई थी कि किसानों को अपनी रोजमर्ग की जरुरतों को खरीदने और अपने उत्पादन के खर्च को पूरा करने के लिए भी कर्ज़ लेने पड़ते थे। 1840 के दशक तक, अधिकारियों को भी इस बात का साक्ष्य मिलने लगा था कि सभी जगह के किसान कर्ज के बोझ़ के तले भयंकर रूप से दबे जा रहे थे।
1840 के दशक के मध्य में एक विशेष प्रकार के आर्थिक पुनरृत्थान के लक्षण दिखाई दने लगे। तब अनेक ब्रिटिश अधिकारियों ने यह महसूस करना शुरू कर दिया कि 1820 के दशक में किए गए राजस्व संबंधी बंदोबस्त कठोरतापूर्ण थे। माँंगा गया राजस्व बहुत ज्यादा था, व्यवस्था कठोर एवं लचकहीन थी, और किसानों की अर्थव्यवस्था का भट्टा बैठने वाला था। इसलिए खेती का विस्तार करने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से राजस्व संबंधी माँंग को कुछ हलका किया गया। 1845 के बाद कृषि उत्पादों की कृीमतें शनैः शनैः बढ़ती गई। किसान अपने कृषि क्षेत्र को बढ़ाने लगे थे, इसके लिए वे नए-नए इलाकों में जा रहे थे और गोचर भूमियों को कृषि भूमि में बदल रहे थे। लेकिन किसानों को अपनी खेती का विस्तार करने के लिए अधिक हल-बैल चाहिए थे। उन्हें बीज और जमीन खरीदने के लिए पैसे की जरूरत थी। इन सब कामों के लिए उन्हें एक बार फिर पैसा उधार लेने के लिए क्रणदाताओं के पास जाना पड़ा।
3.4 फिर कपास में तेजी आई
1860 के दशक से पहले, ब्रिटेन में कच्चे माल के तौर पर आयात की जाने वाली समस्त कपास का तीन-चौथाई भाग अमेरिका से आता था ब्रिटेन के सूती वस्त्रों के विनिर्माता काफ़ी लंबे अरसे से अमेरिकी कपास पर अपनी निर्भरता के कारण बहुत परेशान थे। अगर यह स्त्रोत बंद हो गया तो हमारा क्या होगा? इस प्रश्न से विचलित होकर, वे बड़े उत्तुकता से कपास की आपूर्ति के वैकल्पिक स्त्रोत खोज रहे थे।
1857 में, ब्रिटेन में कपास आपूर्ति संघ की स्थापना हुई और 1859 में मैनचेस्टर कॉटन कंपनी बनाई गई। उनका उद्देश्य “दुनिया के हर भाग में कपास के उत्पादन को प्रोत्साहित करना था जिससे कि उनकी कंपनी का विकास हो सके।" भारत को एक ऐसा देश समझा गया जो अमेरिका से कपास की आपूर्ति बंद हो जाने की सूरत में, लंकाशायर को कपास भेज सकेगा। भारत की भूमि और जलवायु दोनों ही कपास की खेती के लिए उपयुक्त थे और यहाँ सस्ता श्रम उपलब्ध था।


जब सन् 1861 में अमेरिकी गृहयुढ़ छिंड़ गया तो ब्रिटेन के कपास क्षेत्र (मंडी तथा कारखानों) में तहलका मच गया। अमेरिका से आने वाली कच्ची कपास के आयात में भारी गिरावट आ गई। बह सामान्य मात्रा का 3 प्रतिशत से भी कम हो गया: 1861 में जहाँ 20 लाख गाँठें (हर गाँठ 400 पाउंड की) आई थीं वहीं 1862 में केवल 55 हज्ञार गाँठों का आयात हुआ। भारत तथा अन्य देशों को बड़ी व्यग्रता के साथ यह संदेश भेजा गया कि ब्रिटेन को कपास का अधिक मात्रा में निर्यात करें। बम्बई में, कपास के सौदागरों ने कपास की आपूर्ति का आकलन करने और कपास की खेती को अधिकाधिक प्रोत्साहन देने के लिए कपास पैदा करने वाले जिलों का दौरा किया। जब कपास की कीमतों में उछाल आया (चित्र 9.15 देखिए) तो बम्बई के कपास निर्यातकों ने ब्रिटेन की माँग को पूरा करने के लिए अधिक से अधिक कपास खरीदने का प्रयत्न किया। इसके लिए उन्होंने शहरी साहूकारों को अधिक से अधिक अग्रिम, राशियाँँ दी ताकि वे भी आगे उन ग्रामीण ऋष्णदाताओं को जिन्होंने उपज को उपलब्ध कराने का वचन दिया था, अधिकाधिक मात्रा चित्र 9.17 के तीन भाग हैं जिनमें कपास ढोने के भिन्न-भिन्न साधन दर्शाए गए हैं। चित्र में कपास के बोझ से दबे जा रहे बैलों, सड़क पर पड़े शिलाखंडों और नौका पर लदी गाँळों के विशाल ढेर को देखिए। कलाकार इन तसवीरों के जरिए क्या दर्शाना चाहता है?

रेलों का युग शुरू होने से पहले कपास का परिवहन, इलस्ट्रेटेड लंडन न्यूज्ञ, 20 अप्रैल 1861। जब अमेरिकी गृहयुद्ध के दौरान अमेरिका से कपास की आपूर्ति बहुत कम हो गई तब ब्रिटेन को यह आशा हुई कि भारत ब्रिटिश उद्योगों की कपास संबंधी सारी जरूरतों को पूरा कर देगा। इसके लिए आपूर्ति का आकलन किया जाने लगा, कपास की गुणवत्ता की जाँच होने लगी और उत्पादन तथा विपणन के तरीकों का अध्ययन किया जाने लगा। उनकी यह दिलचस्पी ‘इलस्ट्रेटेड लंडन न्यूज्ञ’ के पृष्ठों में परिलक्षित होती है।
में राशि उधार दे सर्कें। जब बाज्ञार में तेज्ञी आती है तो ऋष्टण आसानी से दिया जाता है क्योंकि ऋष्टणदाता अपनी उधार दी गई राशियों की वसूली के बारे में अधिक आश्वस्त महसूस करते हैं।
इन बातों का दक्कन के देहाती इलाक्रों में काफ़ी असर हुआ। दक्कन के गाँवों के रैयतों को अचानक असीमित ऋष्ण उपलब्ध होने लगा। उन्हें कपास उगाई जाने वाले प्रत्येक एकड़ के लिए 100 रु. अग्रिम राशि दी जाने लगी। साहूकार भी दीर्घावधिक ऋष्ण देने के लिए एकदम तैयार थे।
जब अमेरिका में संकट की स्थिति बनी रही तो बम्बई दक्कन में कपास का उत्पादन बढ़ता गया।
1860 से 1864 के दौरान कपास उगाने वाले एकड़ों की संख्या दोगुनी हो गई। 1862 तक स्थिति यह आई कि ब्रिटेन में जितना भी कपास का आयात होता था उसका 90 प्रतिशत भाग अकेले भारत से जाता था।
लेकिन इन तेजी के वर्षों में सभी कपास उत्पादकों को समृद्धि प्राप्त नहीं हो सकी। कुछ धनी किसानों को तो लाभ अवश्य हुआ। लेकिन अधिकांश किसान कर्ज़ के बोझ से और अधिक दब गए।

चित्र 9.18
नौकाओं का एक बेड़ा मिज्ञपुर से गंगानदी के रास्ते कपास की गाठ्टें ले जा रहा है। इलस्ट्रेटेड लंडन न्यूज, 13 दिसंबर 1862
रेलों का युग प्रारंभ होने से पहले, मिज्ञापुर
का कस्बा दक्कन से आने वाली कपास के लिए संग्रह केंद्र था।

ग्रेट इंडियन पेनिन्सुलर रेलवे के बम्बई टर्मिनस पर कपास की गाठ्टें पड़ी हुई हैं; इन्हें आगे समुद्री जहाज्ञ से इंग्लैंड भेजा जाएगा। इलस्ट्रेटेड लंडन न्यूज्ञ, 23 अगस्त 1862। जब रेलें चलने लगीं तो कपास की गाठ्टें गाड़ियों और नौकाओं द्वारा ही नहीं, रेलों से भी भेजी जाने लगीं। नदी मार्ग से यातायात धीरे-धीरे कम होता गया परंतु परिवहन के पुराने साधनों का प्रयोग पूरी तरह बंद नहीं हुआ। चित्र में पीछे दाहिनी ओर लदी हुई बैलगाड़ियाँँ रेलवे स्टेशन से पत्तन तक कपास की गाठ्टें ले जाने के लिए तैयार खड़ी हैं।
स्त्रोत 8
रैयत अर्जी
नीचे एक याचिका का उदाहरण दिया गया है जो करजत तालुको के मीरगाँव के एक रैयत द्वारा कलेक्टर अहमदनगर, दक्कन दंगा आयोग को दी गई थी :
साहूकार लोग काफी दिनों से हम पर अत्याचार कर रहे हैं? चृँकि हम अपना घर खर्च चलाने के लिए काफी मात्रा में पैसा नहीं कमा सकते, इसलिए हम उनसे पैसा, कपड़ा और अनाज माँगने के लिए मजबूर हो गए हैं। उनसे हमें ये चीर्जें मिलती जाती हैं पर बड़ी कठिनाई से और उसके लिए हमें उनके साथ कड़ी शर्तों पर बंधपत्र लिखने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इसके अलावा कपड़ा और अनाज भी नकद दरों पर नहीं बेचा जाता। हमसे जो कीमतें माँगी जाती हैं वह नकदी कीमत चुकाने वाले ग्राहकों की अपेक्षा आमतौर पर 25 से 50 प्रतिशत होती हैं।... हमारे खेतों की उपज भी साहूकार ले जाते हैं; उपज ले जाते समय तो वे हमें यह आश्वासन देते हैं कि इसकी कीमत हमारे खाते में जमा कर दी जाएगी लेकिन वे हमारे खातों में ऐसा कोई उल्लेख नही करते। वे जब हमारी उपज ले जाते हैं तो बदले में कोई रसीद भी नहीं देते।
3.5 ऋण का सोत सूख गया
जिन दिनों कपास के व्यापार में तेजी रही, भारत के कपास व्यापारी, अमेरिका को स्थायी रूप से विस्थापित करके, कच्ची कपास के विश्व बाज्ञार को अपने कृब्जे में करने के सपने देखने लगे। 1861 में बाँबे गजट के संपादक ने पूछा, “दास राज्यों (संयुक्त राज्य अमेरिका) को विस्थापित करके, लंकाशायर को कपास का एकमात्र आपूर्तिकर्ता बनने से भारत को कौन रोक सकता है?” लेकिन 1865 तक ऐसे सपने आने बंद हो गए। जब अमेरिका में गृह्युढ़ समाप्त हो गया तो वहाँ कपास का उत्पादन फिर से चालू हो गया और ब्रिटेन के भारतीय कपास के निर्यात में गिरावट आती चली गई।
महाराष्ट्र में निर्यात व्यापारी और साहूकार अब दीर्घावधिक ऋष्ण देने के लिए उत्सुक नहीं रहे। उन्होंने यह देख लिया था कि भारतीय कपास की माँग घटती जा रही है और कपास की कीमतों में भी गिरावट आ रही है। इसलिए उन्होंने अपना कार्य-व्यवहार बंद करने, किसानों को अग्रिम राशियाँ प्रतिबंधित करने और बकाया ऋष्णों को वापिस माँगने का निर्णय लिया।
एक ओर तो ऋष्ण का स्थोत सूख गया बहीं दूसरी ओर राजस्व की माँग बढ़ा दी गई। जैसा कि हमने ऊपर पढ़ा है, पहला राजस्व बंदोबस्त 1820 और 1830 के दशकों में किया गया था। अब अगला बंदोबस्त करने का समय आ गया था। और इस नए बंदोबस्त में माँग को, नाटकीय ढंग से, 50 से 100 प्रतिशत तक बढ़ा दिया गया। भला, बेचारे रैयत उस हालत में, जबकि कीमतें गिर रही थीं और कपास के खेत गायब हो रहे थे, इस प्रकार बढ़ी हुई माँग को कैसे पूरा कर सकते थे? इसलिए उन्हें एक बार फिर ऋष्णदाता की शरण में जाना पढ़ा। लेकिन ऋष्णदाता ने अबकी बार ऋष्ण देने से इनकार कर दिया। उसे अब रैयत द्वारा ऋष्ण वापस अदा किए जाने की उसकी क्षमता में विश्वास नहीं रहा था।
3.6 अन्याय का अनुभव
त्रष्णदाता द्वारा त्रष्ण देने से इनकार किए जाने पर, रैयत समुदाय को बहुत गुस्सा आया। वे इस बात के लिए ही कुछ़ नहीं थे कि वे त्रष्ण के गर्त में गहरे से गहरे डूबे जा रहे हैं अथवा कि वे अपने जीवन को बचाने के लिए त्रष्णदाता पर पूर्ण रूप से निर्भर हैं, बल्कि वे इस बात से ज्यादा नाराज थे कि त्रष्णदाता वर्ग इतना संवेदनहीन हो गया है कि वह उनकी हालत पर कोई तरस नहीं खा रहा है। त्रष्णदाता लोग देहात के प्रथागत मानकों यानी रूढ़ि रिवाजों का भी उल्लंघन कर रहे थे।
पैसा उधार देने का कारोबार निश्चित रूप से औपनिवेशिक शासन से पहले भी काफ्री फैला हुआ था और ऋष्टणदाता अकसर ताकतवर हस्तियाँं होते थे। कई प्रकार के प्रथागत मानक ऋष्टणदाता और रैयत के पारस्परिक संबधों पर लागू होते थे और उन्हें विनियमित करते थे। एक सामान्य मानक यह था कि ब्याज मूलधन से अधिक नहीं लिया जा सकता था। इसका प्रयोजन ऋष्टणदाता द्वारा की जाने वाली जबरन वसूली को सीमित करना और यह पारिभाषित करना था कि ‘उचित ब्याज’ क्या होना चाहिए। औपनिवेशिक शासन में इस नियम की धज्जियाँं उड़ा दी गई। दक्कन दंगा आयोग द्वारा छानबीन किए गए मामलों में से एक मामले में ऋष्टणदाता ने 100 रू. के मूलधन पर 2,000 रू. से भी अधिक ब्याज लगा रखा था। अनेकानेक याचिकाओं में रैयत लोगों ने इस प्रकार की जबरन वसूलियांं और प्रथाओं के उल्लंघन से संबंधित अन्याय के विरूढ़ शिकायत की थी।
स्त्रोत 8
भाड़ा-पत्र
जब किसान पर ऋष्ण का भार बहुत बढ़ गया तो वह ऋष्णदाता का ऋष्ण चुकाने में असमर्थ हो गया। अब ऋष्णदाता के पास अपना सर्वस्व-जमीन, गाड़ियाँ, पशुधन देने के अलावा कोई चारा नहीं था। लेकिन पशुओं के बिना वह आगे खेती कैसे कर सकता था। इसलिए उसने जमीन और पशु भाड़े पर ले लिए। अब उसे उन पशुओं के लिए, जो मूल रूप से उसके अपने ही थे, भाड़ा चुकाना पड़ता था। उसे एक भाड़ा-पत्र (किरायानामा) लिखना पड़ता था जिसमें यह साफतौर पर कहा जाता था कि ये पशु और गाड़ियाँ उसकी अपनी नहीं हैं। विबाद छिड़ने पर, ये दस्तावेज्ज न्यायालयों में मान्य होते थे।
नीचे एक ऐसे ही दस्तावेज्ञ का नमूना दिया गया है जो नवंबर 1873 में एक किसान ने हस्ताक्षरित किया था (यह दक्कन दंगा आयोग के अभिलेखों से उद्धृत है।) :
मैने आपको देय क्षण के खाते में, आपको अपनी लोहे के धुरों बाली दो गाडियाँ, साज-समान और चार बैलों के साथ बेची है... मैने इस दस्तावेज के तहत उन्हीं दो गाडियां और चार बैलों को आपसे भाड़े पर लिया है। मैं हर माह आपको चार रूपए प्रतिमाह की दर से उनका किराया (भाड़ा) दूँगा और आपसे आपकी अपनी लिखावट में रसीद प्राप्त करुँगा। रसीद न मिलने पर में यह द्लील नहीं दूँगा कि किराया नहीं चुकाया गया है।
उन सभी वचनबढ़ताओं की सूची बनाइए जो किसान इस दस्तावेज़ में दे रहा है। ऐसा कोई दस्तावेज़ हमें किसान और ऋषणदाता के बीच के संबंधों के बारे में क्या बताता है। इससे किसान और बैलों (जो पहले उसी के थे) के बीच के संबंधों में क्या अंतर आएगा?
रैयत ऋष्णदाता को कुटिल और धोखेबाज समझने लगे थे। वे ऋष्णदाताओं के द्वारा खातों में धोखाधड़ी करने और कानून को धत्ता बताने की शिकायतें करते थे। 1859 में अंग्रेजों ने एक परिसीमन क्रानून पारित किया जिसमें यह कहा गया कि ऋष्णदाता और रैयत के बीच हस्ताक्षरित ऋष्णपत्र केवल तीन वर्षों के लिए ही मान्य होंगे। इस कानून का उद्देश्य बहुत समय तक ब्याज को संचित होने से रोकना था। कितु ऋष्णदाता ने इस कानून को घुमाकर अपने पक्ष में कर लिया और रैयत से हर तीसरे साल एक नया बंधपत्र भरवाने लगा। जब कोई नया बांड हस्ताक्षरित होता तो न चुकाई गई शेष राशि अर्थात् मूलधन और उस पर उत्पन्न तथा इकटा हुए संपूर्ण ब्याज को मूलधन के रूप में दर्ज किया जाता और उस पर नए सिरे से ब्याज लगने लगता। दक्कन दंगा आयोग को प्राप्त हुई याचिकाओं में रैयत लोगों ने यह बतलाया कि यह प्रक्रिया कैसे काम कर रही थी (स्वोत 10 देखिए) और किस प्रकार ऋष्णदता लोग रैयत को ठगने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते थे : जब ऋष्ण चुकाए जाते तो वे रैयत को उसकी रसीद देने से इनकार कर देते थे, बंधपत्रों में जाली आंकड़े भर लेते थे, किसानों की फसल नीची कीमतों पर ले लेते थे और आखिरकार किसानों की धन-संपति पर ही कब्जा कर लेते थे।
तरह-तरह के दस्तावेज्ञ्र और बंधपत्र इस नयी अत्याचारपूर्ण प्रणाली के प्रतीक बन गए। पहले ऐसे दस्तावेज्ञ्र बहुत ही कम हुआ करते थे। किंतु ब्रिटिशा अधिकारी अनौपचारिक समझौते के आधार पर पुराने ढंग से किए गए लेन-देन को संदेह की दृष्टि से देखते थे। उनके विचार से लेन-देन की शर्तें, संविदाओं, दस्तावेज्ञ्रों और बंधपत्रों में साफ्र-साफ्र, सुस्पष्ट और सुनिश्चित शब्दों में कही जानी चाहिए और वे विधिसम्मत होनी चाहिए। जब तक कि कोई दस्तावेज्ञ्र या संविदा कानून की दृष्टि से प्रवर्तनीय नहीं होगा तब तक उसका कोई मूल्य नहीं होगा।
समय के साथ, किसान यह समझने लगे कि उनके जीवन में जो भी दुःख तकलीफ है वह सब बंधपत्रों और दस्तावेजों की इस नयी
स्त्रोत 10
कर्ज कैसे बढ़ते गए
दक्कन दंगा आयोग को दी गई अपनी याचिका में एक रैयत ने यह स्पष्ट किया कि ऋष्णों की प्रणाली कैसे काम करती थी :
एक साहूकार अपने कर्जदार को एक बंधपत्र के आधार पर 100 रु. की रकम 3-2 आने प्रतिशत की मासिक दर पर उधार देता है। कर्ज लेने वाला इस रकम को बांड पास होने की तारीख से आठ दिन के भीतर वापस अदा करने का करार करता है। रकम वापस अदा करने के लिए निर्धारित समय के तीन साल बाद साहूकार अपने कर्जदार से मूलधन तथा ब्याज दोनों को मिला कर बनी राशि (मिश्रधन) के लिए एक अन्य बांड उसी ब्याज दर से लिखवा लेता है और उसे संपूर्ण कर्जा चुकाने के लिए 125 दिन की मोहलत दे देता है। तीन साल ओर 15 दिन बीत जाने पर कर्जदार द्वारा एक तीसरा बांड पास किया जाता... (यह प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है)... 12 वर्ष के अंत में... 1000 रु. की राशि पर उसका कुल ब्याज 2,028 रु. 10 आना 3 पैसे हो जाता है।
▶ ब्याज की उस मद का हिसाब लगाइए जो रैयत इन वर्षों में दे रहा था।
व्यवस्था के कारण ही है। उनसे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवा लिए जाते और ऑँगूठे के निशान लगवा लिए जाते थे पर उन्हें यह पता नहीं चलता कि वास्तव में वे किस पर हस्ताक्षर कर रहे हैं या ऑँगूठे के निशान लगा रहे हैं। उन्हें उन खंडों के बारे में कुछ भी पता नहीं होता जो ऋष्णदाता बंधपत्रों में लिख देते थे। वे तो हर लिखे हुए शब्द से डरने लगे थे। मगर वे लाचार थे क्योंकि जीवित रहने के लिए उन्हें ऋष्ण चाहिए थे और ऋष्णदाता कानूनी दस्तावेजों के बिना ऋष्ण देने को तैयार नहीं थे।
4. दक्कन दंगा आयोग
जब विद्रोह दक्कन में फैला तो प्रारंभ में बम्बई की सरकार उसे गंभीरतापूर्वक लेने को तैयार नहीं थी। लेकिन भारत सरकार ने, जो कि 1857 की याद से चिंतित थी बम्बई की सरकार पर द्बाव डाला कि वह दंगों के कारणों की छानबीन करने के लिए एक जाँच आयोग बैठाए। आयोग ने एक रिपोर्ट तैयार की जो 1878 में ब्रिटिश पार्लियामेंट में पेश की गई।
यह रिपोर्ट जिसे दक्कन दंगा रिपोर्ट कहा जाता है, इतिहासकारों को उन दंगों का अध्ययन करने के लिए आधार सामग्री उपलब्ध कराती है। आयोग ने दंगा पीड़ित जिलों में जाँच पड़ताल कराई, रैयत बर्गों, साहूकारों और चशमदीद गवाहों के बयान लिए, भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में राजस्व की दरों, कीमतों और ब्याज के बारे में आंकडे इकटुरे किए और जिला कलेक्टरों द्वारा भेजी गई रिपोर्टों का संकलन किया।
ऐसे स्कोतों पर दृष्टिपात करते समय, हमें यह फिर याद रखना होगा कि वे सरकारी स्कोत हैं और वे घटनाओं के बारे में सरकारी सरोकार और अर्थ प्रतिबिंबित करते हैं। उदाहरण के लिए, दक्कन दंगा आयोग से विशिष्ट रूप से यह जाँच करने के लिए कहा गया था कि क्या सरकारी राजस्व की माँग का स्तर विद्रोह का कारण था। और संपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत करने के बाद आयोग ने यह सूचित किया था कि सरकारी माँग किसानों के गुस्से की वजह नहीं थी। इसमें सारा दोष ऋष्णदाताओं या साहूकारों का ही था। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि औपनिवेशिक सरकार यह मानने को कदापि तैयार नहीं थी कि जनता में असंतोष या रोष कभी सरकारी कार्वाही के कारण उत्पन्न हुआ था।
इस प्रकार, सरकारी रिपोर्ट इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए बहुमूल्य स्त्रोत सिद्ध होती हैं। लेकिन उन्हें हमेशा सावधानीपूर्वक पढ़ा जाना चाहिए और समाचारपत्रों, गैर-सरकारी वृतांतों, वैधिक अभिलेखां और यथासंभव मौखिक स्त्रोतों से संकलित साक्ष्य के साथ उनका मिलान करके उनकी विश्वसनीयता की जाँच की जानी चाहिए।
चर्चा कीजिए...
आजकल आप जिस क्षेत्र में रहते हैं वहाँ पर ली जाने वाली ब्याज दरों का पता लगाइए। यह भी पता लगाइए कि क्या ये दरें पिछले 50 वर्षों में बदली हैं। क्या भिन्न-भिन्न वर्गों के लोगों द्वारा अदा की जाने वाली दरों में कोई अंतर है? यदि है तो इन अंतरों के क्या कारण हैं?
| 1765 | इंग्लिश इस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल की दीवानी प्राप्त की |
| 1773 | ईस्ट इंडिया कंपनी के क्रियाकलापों को विनियमित करने के लिए ब्रिटिश पार्लियामेंट द्वारा रेग्यूलैटिंग एक्ट पारित किया गया |
| 1793 | बंगाल में इस्तमरारी बंदोबस्त |
| 1800 का दशक | संथाल लोग राजमहल की पहाड़ियों में आने लगे और वहाँ बसने लगे |
| 1818 | बम्बई दक्कन में पहला राजस्व बंदोबस्त |
| 1820 का दशक | कृषि कीमतें गिरने लगीं |
| 1840 व 1850 का दशक | बम्बई दक्कन में कृषि विस्तार की धीमी प्रक्रिया |
| 1855-56 | संथालों की बगावत |
| 1861 | कपास में तेजी का समारंभ |
| 1875 | दक्कन के गाँवों में रैयतों ने बग्गावत की |


उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

मानचित्र कार्य
10. उपमहाद्वीप के बाहरेखा मानचित्र (खाके) में इस अध्याय में वर्णित क्षेत्रों को अंकित कीजिए। यह भी पता लगाइए कि क्या ऐसे भी कोई इलाके थे जहाँ इस्तमरारी बंदोबस्त और रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू थी। एसे इलाकों को मानचित्र में भी अंकित कीजिए।

परियोजना कार्य (कोई एक)

यदि आप और जानकारी चाहते हैं तो इन्हें पढ़िए :
सुगाता बोस, 1986
अग्रेरियन बंगाल, कैम्ब्रज यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली
फ्रांसिस बुकानन, 1930
जरनल ऑफ फ्रासिस बुकानन केप्ट ड्यूरिंग दि सर्वे ऑफ दि डिस्ट्रिक्ट ऑफ भागलपुर, सुपरिटेंडेंट, गवर्नमेंट प्रिंटिंग, बिहार और उड़ीसा, पटना
रामचन्द्र गुहा, 1989
दि अनक्वाइट बुड्स : इकोलॉजिकल चेंज एंड पीजेंट रेजीस्टेंट इन दि हिमालयाज, ऑक्सफ्रोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नयी दिल्ली
सुमित गुहा, 1985
दि अग्रेरियन इकोनाँमी ऑफ दि बाँम्बे डेक्कन, 1818–1941, पॉंगिन, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नयी दिल्ली
रविन्द्र कुमार, 1968
वेस्ट्रन इंडिया इन दि नाइनटिंथ सेंचुरी : ए स्टडी इन दि सोशल हिस्ट्री ऑफ महाराष्ट्रा, लंदन : रूटलेज और केगन पॉल
रत्नलेखा राय, 1979
चेंज इन बेंगाल अग्रेरियन सोसाइटी, ई. 1760-1850, मनोहर, नयी दिल्ली
कुमार सुरेश सिंह, 1966
डस्ट-स्ट्रॉम एंड दि हैंगिंग मिस्ट : ए स्टडी ऑफ बिरसा मुंडा एंड हिज्ञ मूवमेंट इन छोटानागपुर (1874-1901), फर्मा के. एल. मुखोपाध्याय, कलकत्ता
