EDU TERIA Logo
Unit4

“खुशकिस्मती के गुलाब बाग की सिंचाई”

12096CH08
12096CH08

विषय आठ

किसान, ज्ञर्मींदार और राज्य

कृषि समाज और मुगल साम्राज्य (लगभग सोलहवीं और सत्रहवीं सदी)

चित्र 8.1
चित्र 8.1

एक ग्रामीण दृश्य

सत्रहवीं शताब्दी के एक मुगल चित्र का ब्योरा

सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के दौरान हिंदुस्तान में करीब-करीब 85 फ्रीसदी लोग गाँवों में रहते थे। छोटे खेतिहर और भूमिहर संभ्रांत दोनों ही कृषि उत्पादन से जुड़े थे और दोनों ही फ्रसल के हिस्सों के दावेदार थे। इससे उनके बीच सहयोग, प्रतियोगिता और संघर्ष के रिश्ते बने। खेती से जुड़े इन तमाम रिश्तों के ताने-बाने से गाँव का समाज बनता था।

इसी समय कई बाहरी ताकतें भी ग्रामीण दुनिया में दाखिल हुई। इनमें सबसे महत्वपूर्ण मुगाल राज्य था जो अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा कृषि उत्पादन से उगाहता था। राज्य के नुमाइंदे – राजस्व निर्धारित करने वाले, राजस्व वसूली करने वाले, हिसाब रखने वाले – ग्रामीण समाज पर काबू रखने की कोशिश करते थे। वे तसल्ली करना चाहते थे कि खेतों की जुताई हो और राज्य को उपज से अपने हिस्से का कर समय पर मिल जाए। चौँकि कई फ्रसलें बिक्री के लिए उगाई जाती थीं, इसलिए व्यापार, मुद्रा और बाज्ञार भी गाँवों में घुस आए और इससे खेती वाले इलाके शहर से जुड़ गए।

1. किसान और कृषि उत्पादन

खेतिहर समाज की बुनियादी इकाई गाँव थी जिसमें किसान रहते थे। किसान साल भर अलग-अलग मौसम में वो तमाम काम करते थे जिससे फ्रसल की पैदावार होती थी – जैसे कि जमीन की जुताई, बीज बोना और फ्रसल पकने पर उसकी कटाई। इसके अलावा वे उन वस्तुओं के उत्पादन में भी शरीक्र होते थे जो कृषि-आधारित थीं जैसे कि शक्कर, तेल इत्यादि।

लेकिन सिफ्र मैदानी इलाकों में बसे किसानों की खेती ही ग्रामीण भारत की खृासियत नहीं थी। कई ऐसे क्षेत्र भी थे – जैसे कि सूखी ज़मीन के विशाल हिस्सों से पहाड़ियों वाले इलाके – जहाँ उस तरह की खेती नहीं हो सकती थी जैसी कि ज्यादा उपजाऊ़ ज़मीनों पर। इसके अलावा, भूखंड का एक बहुत बड़ा हिस्सा जंगलों से घिरा था। जब हम कृषि समाज की बात करते हैं तब हमें इन भौगोलिक विविधताओं का ख्याल रखना चाहिए।

1.1 स्त्रोतों की तलाश

चूँकि किसान अपने बारे में खुद नहीं लिखा करते थे इसलिए ग्रामीण समाज के क्रियाकलापों की जानकारी हमें उन लोगों से नहीं मिलती जो खेतों में काम करते थे। नतीजतन, सोलहवी और सत्रहवीं सदियों के कृषि इतिहास को समझने के लिए हमारे मुख्य स्त्रोत वे ऐतिहासिक ग्रंथ व दस्तावेज्त हैं जो मुगल दरबार की निगरानी में लिखे गए थे (देखिए अध्याय 9)।

सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथों में एक था आइन-ए-अकबरी (संक्षेप में आइन, देखिए अनुभाग 8) जिसे अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फ्रज्ल्न ने लिखा था। खेतों की नियमित जुताई की तसल्ली करने के लिए, राज्य के नुमाइंदों द्वारा करों की उगाही के लिए और राज्य व ग्रामीण सत्तापोशों यानी कि जमींदारों के बीच के रिश्तों के नियमन के लिए जो इंतज्ञाम राज्य ने किए थे, उसका लेखा-जोखा इस ग्रंथ में बड़ी सावधानी से पेश किया गया है।

आइन का मुख्य उद्देश्य अकबर के सम्राज्य का एक ऐसा खाका पेश करना था जहाँ एक मज्जबूत सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल-जोल बना कर रखता था। आइन के लेखक के मुताबिक, मुगृल राज्य के खिलाफ़ कोई बगावत या किसी भी किस्म की स्वायत्त सत्ता की दावेदारी का असफल होना पहले ही तय था। दूसरे शब्दों में, किसानों के बारे में जो कुछ हमें आइन से पता चलता है वह सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज्जरिया है।

खुशकिस्मती से आइन की जानकारी के साथ-साथ हम उन स्तोतों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं जो मुगलों की राजधानी से दूर के इलाकों में लिखे गए थे। इनमें सत्रहवीं व अठारहवीं सदियों के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान से मिलने वाले वे दस्तावेज्ञ शामिल हैं जो सरकार की आमदनी की विस्तृत जानकारी देते हैं। इसके अलावा, ईस्ट इंडिया कंपनी के बहुत सारे दस्तावेज्ञ भी हैं जो पूर्वी भारत में कृषि-संबंधों का उपयोगी खाका पेश करते हैं। ये सभी स्तोत किसानों, जर्मीदारों और राज्य के बीच तने झगड़ों को दर्ज करते हैं। लगे हाथ, ये स्तोत यह समझने में हमारी मदद करते हैं कि किसान राज्य को किस नज्जरिये से देखते थे और राज्य से उन्हें कैसे न्याय की उम्मीद थी।

1.2 किसान और उनकी ज्ञमीन

मुगल काल के भारतीय-फ्रारसी स्त्रोत किसान के लिए आमतौर पर रैयत (बहुवचन, रिआया) या मुज्नरियान शब्द का इस्तेमाल करते थे। साथ ही, हमें किसान या आसामी जैसे शब्द भी मिलते हैं। सत्रहवीं सदी के स्त्रोत

स्त्रोत 1

किसान बस्तियों का बसना-उजड़ना

यह हिंदुस्तानी कृषि समाज की एक खासियत थी और इस खासियत ने मुगल शासक बाबर की तेज्ञ निगाहों को इतना चौंकाया कि उसने इसे अपने संस्मरण बाबरनामा में नोट कियाः

हिंदुस्तान में बस्तियाँ और गाँव, दरअसल शहर के शहर, एक लमहे में ही वीरान भी हो जाते हैं और बस भी जाते हैं। वर्षों से आबाद किसी बड़े शहर के बाशिदे उसे छोड़कर चले जाते हैं, तो वे ये काम कुछ इस तरह करते हैं कि डेळ्ठ दिनों के अंदर उनका हर नामोनिशान (वहाँ से) मिट जाता है। दूसरी ओर, अगर वे किसी जगह पर बसना चाहते हैं तो उन्हें पानी के रास्ते खोदने की जरूरत नहीं होती क्योंकि उनकी सारी फ्रसलें बारिश के पानी में उगती हैं, और चृँकि हिंदुस्तान की आबादी बेशुमार है, लोग उमड़ते चले आते हैं। वे एक सरोवर या कुओँ बना लेते हैं; उन्हें घर बनाने या दीवार खड़ी करने की भी जरूरत नहीं होती... खस की घास बहुतायात में पाई जाती हैं, जंगल अपार हैं, झ्रोपड़ियाँ बनाई जाती हैं, और यकायक एक गाँव या शहर खड़ा हो जाता है!

कृषि जीवन के उन पहलुओं का विवरण दीजिए जो बाबर को उत्तर भारत के इलाके की खासियत लगी।

दो किस्म के किसानों की चर्चा करते हैं - खुद-काश्त व पाहि-काश्त। पहले किस्म के किसान वे थे जो उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी ज़मीन थी। दूसरे (पाहि-काश्त) वे खेतिहर थे जो दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे। लोग अपनी मर्जीं से भी पाहि-काश्त बनते थे (मसलन, अगर करों की शर्तं किसी दूसरे गाँव में बेहतर मिलें) और मजबूरन भी (मसलन, अकाल या भुखमरी के बाद आर्थिक परेशानी से)।

उत्तर भारत के एक औसत किसान के पास शायद ही कभी एक जोड़ी बैल और दो हल से ज्यादा कुछ होता था; ज्यादातर के पास इससे भी कम। गुजरात में जिन किसानों के पास 6 एकड़ के करीब जमीन थी वे समृब्द्र माने जाते थे; दूसरी तरफ्र, बंगाल में एक औसत किसान की जमीन की ऊपरी सीमा 5 एकड़ थी; 10 एकड़ जमीन वाले आसामी को अमीर समझा जाता था। खेती व्यक्तिगत मिल्कियत के सिद्धांत पर आधारित थी। किसानों की जमीन उसी तरह खरीदी और बेची जाती थी जैसे दूसरे संपत्ति मालिकों की।

उन्नीसवीं सदी के दिल्ली-आगरा इलाके में किसानों की मिल्कियत का यह विवरण सत्रहवीं सदी पर भी उतना ही लागू होता हैः:

हल जोतने वाले खेतिहर किसान हर जमीन की हदों पर मिट्टी, ईंट और काँटों से पहचान के लिए निशान लगाते हैं, और जमीन के ऐसे हज्ञारों टुकड़े किसी भी गाँव में देखे जा सकते हैं।

1.3 सिंचाई और तकनीक

ज्ञमीन की बहुतायत, मजदूरों की मौजूदगी, और किसानों की गतिशीलता की वजह से कृषि का लगातार विस्तार हुआ। चृँकि खेती का प्राथमिक उद्देश्य लोगों का पेट भरना था, इसलिए रोज्जमर्गी के खाने की जरुरतें जैसे चावल, गेहूँ, ज्वार इत्यादि फ्रसलें सबसे ज्यादा उगाई जाती थीं। जिन इलाकों में प्रति वर्ष 40 इंच या उससे ज्यादा बारिश होती थी, वहाँ कमोबेश चावल की खेती होती थी। कम और कमतर बारिश वाले इलाकों में क्रमशः गेहूँ व ज्वार-बाजरे की खेती ज्यादा प्रचलित थी।

मानसून भारतीय कृषि की रीढ़ था, जैसा कि आज भी है। लेकिन कुछ ऐसी फ्रसलें भी थीं जिनके लिए अतिरिक्त पानी की जरूरत थी। इनके लिए सिंचाई के कृत्रिम उपाय बनाने पड़े।

स्त्रोत 2

पेड़ों और खेतों की सिंचाई

यह बाबरनामा से लिया गया एक अंश है जो सिंचाई के उन उपकरणों के बारे में बताता है जो इस बादशाह ने उत्तर भारत में देखेः:

हिंदुस्तान के मुल्क का ज्यादातर हिस्सा मैदानी जमीन पर बसा हुआ है। हालांकि यहाँं शहर और खेती लायक जमीन की बहुतायत है, लेकिन कहीं भी बहते पानी (का इंतजाम) नहीं... वे इसलिए... कि फ्रसल उगाने या बागानों के लिए पानी की बिलकुल जरूरत नहीं है। शरद ऋष्टु की फ्रसलें बारिश के पानी से ही पैदा हो जाती हैं; और ये हैरानगी की बात है कि बसंत ऋष्टु की फ्रसलें तो तब भी पैदा हो जाती हैं जब बारिश बिलकुल ही नहीं होती। (फिर भी) छोटे पेड़ों तक बालटियों या रहट के जरिये पानी पहुँचाया जाता है...

लाहौर, दीपालपुर (दोनों ही आज के पाकिस्तान में) और ऐसी दूसरी जगहां पर लोग रहट के जरिये सिंचाई करते हैं। वे रस्सी के दो गोलाकार फंदे बनाते हैं जो कुएँ की गहराई के मुताबिक लंबे होते हैं। इन फंदों में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर वे लकड़ी के गुटके लगाते हैं और इन गुटकों पर घड़े बाँध देते हैं। लकड़ी के गुटकों और घड़ों से बॉधी इन रस्सियों को कुएँ के ऊपर पहियों से लटकाया जाता है। पहिये की धुरी पर एक और पहिया। इस अंतिम पहिये को बैल के जरिये घुमाया जाता है; इस पहिये के दॉत पास के दूसरे पहिये के दॉतों को जकड़ लेते हैं और इस तरह घड़ों वाला पहिया घूमने लगता है। घड़ों से जहाँ पानी गिरता है, वहाँ एक संकरा नाला खोद दिया जाता है और इस तरीके से हर जगह पानी पहुँचाया जाता है।

आगरा, चाँदवर और बयाना (आज के उत्तर प्रदेश में) में और एसे अन्य इलाकों में भी, लोगबाग बालटियों से सिंचाई करते हैं। कुएँ के किनारे पर वे लकड़ी के कन्ने गाड़ देते हैं, इन कन्नों के बीच बेलन टिकाते हैं, एक बड़ी बालटी में रस्सी बाँधते हैं, रस्सी को बेलन पर लपेटते हैं और इसके दूसरे छोर को बैल से बाँध देते हैं। एक शख्स को बैल हाँकना पड़ता है, दूसरा बालटी से पानी निकालता है।

सिंचाई के जिन साधनों का जिक्र बाबर ने किया है उनकी तुलना विजयनगर की सिंचाई (अध्याय 7) व्यवस्था से कीजिए। सिंचाई की इन दोनों अलग-अलग प्रणालियों में किस-किस तरह के संसाधनों की जरूरत पड़ती होगी? इनमें से किन-किन प्रणालियों में कृषि तकनीक में सुधार के लिए किसानों की भागेदारी जरूरी होती होगी?

चित्र 8.2

रहट की संरचना

Textbook illustration

तम्बाकू का प्रसार

यह पौधा सबसे पहले दक्कन पहुँचा और बहाँ से सत्रहवीं सदी के शुरुआती वर्षों में इसे उत्तर भारत लाया गया। आइन उत्तर भारत की फ्रसलों की सूची में तम्बाकू का जिक्र नहीं करती है। अकबर और उसके अभिजातों ने 1604 ई. में पहली बार तम्बाकू देखा। ऐसा लगता है कि इसी समय तम्बाकू का धूम्रपान (हुक्के या चिलम में) करने की लत ने जोर पकड़ा। जहाँगीर इस बुरी आदत के फैलने से इतना चिंतित हुआ कि उसने इस पर पाबंदी लगा दी। यह पाबंदी पूरी तरह से बेअसर साबित हुई क्योंकि हम जानते हैं कि सत्रहवीं सदी के अंत तक, तम्बाकू पूरे भारत में खेती, व्यापार और उपयोग की मुख्य वस्तुओं में से एक था।

सिंचाई कायों को राज्य की मदद भी मिलती थी। मसलन, उत्तर भारत में राज्य ने कई नयी नहरें व नाले खुदवाए और कई पुरानी नहरों की मरम्मत करवाई, जैसे कि शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान पंजाब में शाह नहर ।

वैसे तो खेती मेहनतकशी का काम था लेकिन किसान ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल भी करते थे जो अकसर पशुबल पर आधारित होती थीं। ऐसा एक उदाहरण लकड़ी के उस हलके हल का दिया जा सकता है जिसको एक छोर पर लोहे की नुकीली धार या फाल लगाकर आसानी से बनाया जा सकता था। ऐसे हल मिट्री को बहुत गहरे नहीं खोदते थे जिसके कारण तेज्ञ गर्मी के महीनों में नमी बची रहती थी। बैलों के जोड़े के सहारे खींचे जाने वाले बरमे का इस्तेमाल बीज बोने के लिए किया जाता था। लेकिन बीजों को हाथ से छिड़क कर बोने का रिवाज ज्यादा प्रचलित था। मिट्री की गुड़ाई और साथ-साथ निराई के लिए लकड़ी के मूठ वाले लोहे के पतले धार काम में लाए जाते थे।

1.4 फ्रसलों की भरमार

मौसम के दो मुख्य चक्रों के दौरान खेती की जाती थीः एक खरीफ़ (पतझड़ में) और दूसरी रबी (वसंत में)। यानी सूखे इलाकों और बंजर जमीन को छोड़ दें तो ज्यादातर जगहां पर साल में कम से कम दो फ़सलें होती थी। जहाँ बारिश या सिंचाई के अन्य साधन हर वक्त मौजूद थे वहाँं तो साल में तीन फ़सलें भी उगाई जाती थी। इस वजह से पैदावार में भारी विविधता पाई जाती थी। उदाहरण के तौर पर, आइन हमें बताती है कि दोनों मौसम मिलाकर, मुगृल प्रांत आगरा में 39 किस्म की फ़सलें उगाई जाती थीं जबकि दिल्ली प्रांत में 43 फ़सलों की पैदावार होती थी। बंगाल में सिर्फ चावल की 50 किस्में पैदा होती थी।

कृषि की समृद्धि और आबादी की बढ़ोतरी

कृषि उत्पादन के ऐसे विविध और लचीले तरीक्फों का एक बड़ा नतीजा यह निकला कि आबादी धीर-धीरे बढ़ने लगी। आर्थिक इतिहासकारों की गणना के मुताबिक, समय-समय पर होने वाली भूखमरी और महामारी के बावजूद, 1600 से 1700 के बीच भारत की आबादी लगभग 5 करोड़ बढ़ गई। 200 वर्षों में यह करीब-करीब 33 फीसदी बढ़ोतरी थी।

हालॉँकि दैनिक आहार की खेती पर ज्यादा जोर दिया जाता था मगर इसका मतलब यह नहीं था कि मध्यकालीन भारत में खेती सिफ् गुज्ञारा करने के लिए की जाती थी। स्त्रोतों में हमें अकसर जिन्स-ए-कामिल (सर्वोत्तम फ्रसलें) जैसे लफ़ज्ञ मिलते हैं। मुगृल राज्य भी किसानों को ऐसी फ्रसलों की खेती करने के लिए बढ़ावा देता था क्योंकि इनसे राज्य को ज्यादा कर मिलता था। कपास और गन्ने जैसी फ्रसलें बेहतरीन जिन्स-ए-कामिल थी। मध्य भारत और द्वक्कनी पठार में फैले हुए ज़मीन के बड़े-बड़े टुकड़ों पर कपास उगाई जाती थी, जबकि बंगाल अपनी चीनी के लिए मशहूर था। तिलहन (जैसे सरसों) और दलहन भी नकदी फ्रसलों में आती थी। इससे पता चलता है कि एक औसत किसान की ज़मीन पर किस तरह पेट भरने के लिए होने वाले उत्पादन और व्यापार के लिए किए जाने वाले उत्पादन एक दूसरे से जुड़े हुए थे।

सत्रहवीं सदी में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से कई नयी फ्रसलें भारतीय उपमहाद्वीप पहुँचौं। मसलन, मक्का भारत में अफ्रीका और स्पेन के रास्ते आया और सत्रहवीं सदी तक इसकी गिनती पश्चिम भारत की मुख्य फ्रसलों में होने लगी। टमाटर, आलू और मिर्च जैसी सब्जियाँ नयी दुनिया से लाई गई। इसी तरह अनानास और पपीता जैसे फल वहीं से आए।

2. ग्रामीण समुदाय

ऊपर लिखी बातों से ज़हिर है कि कृषि उत्पादन में किसानों की पुरजोर भागीदारी और पहल होती थी। इससे मुगल समाज के कृषि संबंधों पर क्या असर पड़ता था? यह पता करने के लिए आइए, हम समाज के उन समूहों पर एक नजर डालों जो खेती के विस्तार में शरीक होते थे। साथ ही हम उनके बीच के रिश्तों और झगड़ों पर भी गौर करेंगे।

हम पहले देख चुके हैं कि किसान की अपनी ज़मीन पर व्यक्तिगत मिल्कियत होती थी। साथ ही जहाँ तक उनके सामाजिक अस्तित्व का सवाल है, कई मायनों में वे एक सामूहिक ग्रामीण समुदाय का हिस्सा थे। इस समुदाय के तीन घटक थे – खेतिहर किसान, पंचायत और गाँव का मुखिया (मुक्रद्म या मंडल)।

2.1 जाति और ग्रामीण माहौल

जाति और अन्य जाति जैसे भेदभावों की वजह से खेतिहर किसान कई तरह के समूहों में बॉटे थे। खेतों की जुताई करने वालों में एक बड़ी तादाद ऐसे लोगों की थी जो नीच समझे जाने वाले कामों में लगे थे, या फिर खेतों में मजदूरी करते थे।

हालॉँकि खेती लायक जमीन की कमी नहीं थी, फिर भी कुछ जाति के लोगों को सिर्फ नीच समझे जाने वाले काम ही दिए जाते थे। इस तरह वे गृरीब रहने के लिए मजबूर थे। जनगणना तो उस वक्त नहीं होती थी, पर जो थोड़े बहुत ऑँकड़े और तथ्य हमारे पास हैं उनसे पता चलता है कि गाँव की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे ही समूहों का था। इनके पास संसाधन सबसे कम थे और ये जाति व्यवस्था की पार्बादियों से बॉधे थे। इनकी हालत कमोबेश

→ चर्चा कीजिए...

इस अनुभाग में खेती संबंधी जिन क्रियाकलापों और तकनीकों की चर्चा हुई है उनमें से कौन-कौन सी अध्याय 2 में वर्णित तकनीकों और क्रियाकलापों से मिलती-जुलती हैं और कौन कौन सी भिन्न हैं?

चित्र 8.3

आरांभिक उन्नीसवीं शताब्दी का एक चित्र जिसमें पंजाब के एक गाँँव को दिखाया गया है।

चित्र में महिलाएँ और पुरुष क्या-क्या करते दिखाए गए हैं? गाँव की वास्तुकला का भी वर्णन कीजिए।

Textbook illustration

वैसी ही थी जैसी कि आधुनिक भारत में दलितों की। ढूसरे संप्रदायों में भी ऐसे भेदभाव फैलने लगे थे। मुसलमान समुदायों में हलालखोरान जैसे ‘नीच’ कामों से जुड़े समूह गाँव की हदों के बाहर ही रह सकते थे; इसी तरह बिहार में मल्लाहज्ञादाओं (शाब्दिक अर्थ, नाविकों के पुत्र), की तुलना दासों से की जा सकती थी।

समाज के निचले तबकों में जाति, गरीबी और सामाजिक हैसियत के बीच सीधा रिश्ता था। ऐसा बीच के समूहों में नहीं था। सत्रहवीं सदी में मारवाड़ में लिखी गई एक किताब राजपूतों की चर्चा किसानों के रूप में करती है। इस किताब के मुताबिक जाट भी किसान थे लेकिन जाति व्यवस्था में उनकी जगह राजपूतों के मुक़ाबले नीची थी। सत्रहवीं सदी में राजपूत होने का दावा वृंदावन (उत्तर प्रदेश) के इलाके में गौरव समुदाय ने भी किया, बावजूद इसके कि वे ज़मीन की जुताई के काम में लगे थे। पशुपालन और बागबानी में बढ़ते मुनाफे की वजह से अहीर, गुज्जर और माली जैसी जातियाँं सामाजिक सीढ़ी में ऊपर उठी। पूर्वी इलाकों में, पशुपालक और मछुआरी जातियाँ, जैसे सदगोप व कैवर्त भी किसानों की सी सामाजिक स्थिति पाने लगी।

2.2 पंचायतें और मुखिया

गाँव की पंचायत में बुजुर्गों का जमावड़ा होता था। आमतौर पर वे गाँव के महत्वपूर्ण लोग हुआ करते थे जिनके पास अपनी संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार होते थे। जिन गाँवों में कई जातियों के लोग रहते थे, वहाँ अकसर पंचायत में भी विविधता पाई जाती थी। यह एक ऐसा अल्पतंत्र था जिसमें गाँव के अलग-अलग संप्रदायों और जातियों की नुमाइंदगी होती थी। फिर भी इसकी संभावना कम ही है कि छोटे-मोटे और “नीच” काम करने वाले खेतिहर मज्रदूरों के लिए इसमें कोई जगह होती होगी। पंचायत का फैसला गाँव में सबको मानना पड़ता था।

पंचायत का सरदार एक मुखिया होता था जिसे मुक्रहम या मंडल कहते थे। कुछ स्तोतों से ऐसा लगता है कि मुखिया का चुनाव गाँव के बुजुर्गों की आम सहमति से होता था और इस चुनाव के बाद उन्हें इसकी मंजूरी जर्मींदार से लेनी पड़ती थी। मुखिया अपने ओहदे पर तभी तक बना रहता था जब तक गाँव के बुजुर्गों को उस पर भरोसा था। ऐसा नहीं होने पर बुजुर्ग उसे बर्खास्त कर सकते थे। गाँव के आमद्नी व खर्चे का हिसाब-किताब अपनी निगरानी में बनवाना मुखिया का मुख्य काम था और इसमें पंचायत का पटवारी उसकी मदद करता था।

पंचायत का खर्चा गाँव के उस आम खृजाने से चलता था जिसमें हर व्यक्ति अपना योगदान देता था। इस खृजाने से उन कर अधिकारियों की खृतिरदारी का खृर्चा भी किया जाता था जो समय-समय पर गाँव

श्रष्ट मंडल

मंडल अकसर अपने ओहदे का गृलत इस्तेमाल करते थे। मुख्यतः उन पर ये आरोष था कि वे पटवारी के साथ मिलंकर हिसाब-किताब में हेरा-फेरी करते थे, और यह भी कि वे अपनी ज़मीन पर कर का आकलन कम करके, अतिरिक्त बोझ छोटे किसानों पर डाल देते थे।

का दौरा किया करते थे। दूमरी ओर, इस कोष का इस्तेमाल बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं से निपटने के लिए भी होता था और ऐसे सामुदायिक कार्यों के लिए भी जो किसान खुद नहीं कर सकते थे, जैसे कि मिट्री के छोटे-मोटे बाँध बनाना या नहर खोदना।

पंचायत का एक बड़ा काम यह तसल्ली करना था कि गाँव में रहने वाले अलग-अलग समुदायों के लोग अपनी जाति की हदों के अंदर रहें। पूर्वी भारत में सभी शादियाँ मंडल की मौजूदगी में

होती थीं। यूँ कहा जा सकता है कि “जाति की अवहेलना रोकने के लिए” लोगों के आचरण पर नज्ञर रखना गाँव के मुखिया की जिम्मेदारियों में से एक था।

पंचायतों को जुर्माना लगाने और समुदाय से निष्कासित करने जैसे ज्यादा गंभीर दंड देने के अधिकार थे। समुदाय से बाहर निकालना एक कड़ा कदम था जो एक सीमित समय के लिए लागू किया जाता था। इसके तहत दंडित व्यक्ति को (दिए हुए समय के लिए) गाँव छोड़ना पड़ता था। इस दौरान वह अपनी जाति और पेशे से हाथ धो बैठता था। ऐसी नीतियों का मकसद जातिगत रिवाजों की अवहेलना रोकना था।

ग्राम पंचायत के अलावा गाँव में हर जाति की अपनी पंचायत होती थी। समाज में ये पंचायतें काफ्री ताकतवर होती थी। राजस्थान में जाति पंचायतें अलग-अलग जातियों के लोगों के बीच दीवानी के झगड़ों का निपटारा करती थी। वे जमीन से जुड़े दावेदारियों के झगड़े सुलझाती थीं; यह तय करती थीं कि शादियाँ जातिगत मानदंडों के मुताबिक हो रही हैं या नहीं, और यह भी कि गाँव के आयोजन में किसको किसके ऊपर तरजीह दी जाएगी। कर्मकांडीय वर्चस्व किस क्रम में होगा। फौजदारी न्याय को छोड़ दें तो ज्यादातर मामलों में राज्य जाति पंचायत के फैसलों को मानता था।

पश्चिम भारत – खासकर राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे प्रांतों- के संकलित दस्तावेज्जों में ऐसी कई अर्जियाँ हैं जिनमें पंचायत से “ऊँची” जातियों या राज्य के अधिकारियों के खिलाफ्र जबरन कर उगाही या बेगार वसूली की शिकायत की गई है। आमतौर पर यह अर्जियाँ ग्रामीण समुदाय के सबसे निचले तबके के लोग लगाते थे। अकसर प्रारंभिक उन्नीसवीं शताब्दी का चित्र जिसमें गाँँव के बुजुर्ग कर अधिकारियों से मिल रहे हैं।

चित्र 8.4
चित्र 8.4

चित्रकार ने गाँव के बुजुर्गों और कर अधिकारियों में फ़र्क कैसे डाला है?

चित्र 8.5

कपड़ा उत्पादन को दर्शाती सत्रहवीं शताब्दी की एक चित्रकारी

चित्र में दर्शायी गई गतिविधियों का वर्णन कीजिए।

सामूहिक तौर पर भी ऐसी अर्जियाँ दी जाती थीं। इनमें किसी जाति या संप्रदाय विशेष के लोग संभ्रांत समूहों की उन माँगों के खिलाफ अपना विरोध जताते थे जिन्हें वे नैतिक दृष्टि से अवैध मानते थे। उनमें एक थी बहुत ज्यादा कर की माँग क्योंकि इससे किसानों का दैनिक गुज्ञारा ही जोखिम में पड़ जाता था, खासकर सूखे या ऐसी दूसरी विपदाओं के दौरान। उनकी नज्ञरों में जिंदा रहने के लिए न्यूनतम बुनियादी साधन उनका परंपरागत रिवाजी हक् था। वे समझते थे कि ग्राम पंचायत को इसकी सुनवाई करनी चाहिए और यह

Textbook illustration

सुनिश्चित करना चाहिए कि राज्य अपना नैतिक फर्ज अदा करे और न्याय करे। “निचली जाति” के किसानों और राज्य के अधिकारियों या स्थानीय ज्ञर्मींदारों के बीच झगड़ों में पंचायत के फैसले अलग-अलग मामलों में अलग-अलग हो सकते थो। अत्यधिक कर की माँगों के मामले में पंचायत अकसर समझौते का सुझाव देती थी। जहाँ समझौते नहीं हो पाते थे, वहाँ किसान विरोध के ज्यादा उग्र रास्ते अपनाते थे, जैसे कि गाँव छोड़कर भाग जाना। जोतने लायक खाली जमीन अपेक्षाकृत आसानी से उपलब्ध थी जबकि श्रम को लेकर प्रतियोगिता थी। इस वजह से, गाँव छोड़कर भाग जाना खेतिहरों के हाथ में एक बड़ा प्रभावी हथियार था।

2.3 ग्रामीण दस्तकार

अलग-अलग तरह के उत्पादन कार्य में जुटे लोगों के बीच फैले लेन-देन के रिश्ते गाँव का एक और रोचक पहलू था। अंग्रेज्ञी शासन के शुरुआती वर्षों में किए गए गाँवों के सर्वेक्षण और मराठाओं के दस्तावेज्ञ बताते हैं कि गाँवों में दस्तकार काफ्री अच्छी तादाद में रहते थे। कहीं-कहीं तो कुल घरों के 25 फ्रीसदी घर दस्तकारों के थे।

कभी-कभी किसानों और दस्ताकारों के बीच फर्क करना मुशिकल होता था क्योंकि कई ऐसे समूह थे जो दोनों किस्म के काम करते थे। खेतिहर और उसके परिवार के सदस्य कई तरह की वस्तुओं के उत्पादन में शिरकत करते थे। मसलन-रॉगरेजी, कपड़े पर छपाई, मिट्री के बरतनों को पकाना, खेती के औज्ञारों को बनाना या उनकी मरम्मत करना। उन महीनों में जब उनके पास खेती के काम से फुरसत होती-जैसे कि बुआई और सुहाई के बीच या सुहाई और कटाई के बीच-उस समय ये खेतिहर दस्तकारी का काम करते थे।

कुम्हार, लोहार, बढई, नाई, यहाँ तक कि सुनार जैसे ग्रामीण दस्तकार भी अपनी सेवाएँ गाँव के लोगों को देते थे जिसके बद्ले गाँव वाले उन्हें अलग-अलग तरीकों से उन सेवाओं की अदायगी करते थे। आमतौर पर या तो उन्हें फ्रसल का एक हिस्सा दे दिया जाता था या फिर गाँव की जमीन का एक टुकड़ा, शायद कोई ऐसी जमीन जो खेती लायक होने के बावजूद बेकार पड़ी थी। अदायगी की सूरत क्या होगी ये शायद पंचायत ही तय करती थी। महाराष्ट्र में ऐसी जमीन दस्तकारों की मीरास या वतन बन गई जिस पर दस्तकारों का पुश्तैनी अधिकार होता था।

यही व्यवस्था कभी-कभी थोड़े बदले हुए रूप में भी पायी जाती थी जहाँ दस्तकार और हरेक खेतिहर परिवार परस्पर बातचीत करके अदायगी की किसी एक व्यवस्था पर राज़ी होते थे। ऐसे में आमतौर पर वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय होता था। उदाहरण के तौर पर, अठारहवीं सदी के स्त्रोत बताते हैं कि बंगाल में जर्मींदार उनकी सेवाओं के बदले लोहारों, बढ़ई और सुनारों तक को “रेज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी देते थे।” इस व्यवस्था को जजमानी कहते थे, हालांकि यह शब्द सोलहवीं व सत्रहवीं सदी में बहुत इस्तेमाल नहीं होता था। ये सबूत मज्जेदार हैं क्योंकि इनसे पता चलता है कि गाँव के छोटे स्तर पर फेर-बदल के रिशते कितने पेचीदा थे। ऐसा नहीं है कि नकद अदायगी का चलन बिलकुल ही नदारद था।

2.4 एक “छोटा गणराज्य”?

ग्रामीण समुदाय की अहमियत को हम कैसे समझें? उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज्ञ अफ्रसरों ने भारतीय गाँवों को एक ऐसे “छोटे गणराज्य” के रूप में देखा जहाँ लोग सामूहिक स्तर पर भाईचारे के साथ संसाधनों और श्रम का बॉटवारा करते थे। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि गाँव में सामाजिक बराबरी थी। संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत होती थी, साथ ही जाति और जेंडर (सामाजिक लिंग) के नाम पर समाज में गहरी विषमताएँ थीं। कुछ ताकतवर लोग गाँव के मसलों पर प्रैसले लेते थे और कमज्ञोर वर्गों का शोषण करते थे। न्याय करने का अधिकार भी उन्हीं को मिला हुआ था।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि गाँवों और शहरों के बीच होने वाले व्यापार की वजह से गाँवों में भी नकद के रिश्ते फैल चुके थे।

गाँव में मुद्रा

सत्रहवीं सदी में फ्रांसीसी यात्री ज्यां बैष्टिस्ट तैवर्नियर को यह बात उल्लेखनीय लगी कि “भारत में वे गाँव बहुत ही छोटे कहे जाएँगे जिनमें मुद्रा की फेर बदल करने वाले, जिन्हें सराफ्र कहते हैं, न हों। एक बैंकर की तरह सराफ्र हवाला भुगतान करते हैं (और) अपनी मर्जी के मुताबिक पैसे के मुकाबले रुपये की कीमत बढ़ा देते हैं और कौड़ियों के मुकाबले पैसे की।

चित्र 8.6
चित्र 8.6

सराफ्र अपने काम में लगा हुआ है।

चित्र 8.7
चित्र 8.7

सूत कातती महिला

मुगलों के केंद्रीय इलाकों में कर की गणना और वसूली भी नकद में की जाती थी। जो दस्तकार निर्यात के लिए उत्पादन करते थे, उन्हें उनकी मज्ञदूरी या पूर्व भुगतान भी नकद में ही मिलता था। इसी तरह कपास, रेशम या नील जैसी व्यापारिक फ्रसलें पैदा करने वालों का भुगतान भी नकदी ही होता था।

रचर्चा कीजिए...

इस अनुभाग में जिन पंचायतों का जिक्र किया गया है, वे आपके मुताबिक किस तरह से आज की ग्राम पंचायतों से मिलती-जुलती थीं अथवा भिन्न थीं?

3. कृषि समाज में महिलाएँ

जैसा कि शायद कई समाजों में आपने गौर किया होगा, उत्पादन की प्रक्रिया में मर्द और महिलाएँ खास किस्म की भूमिकाएँ अदा करते हैं। जिस संदर्भ में हम बात कर रहे हैं, बहाँ महिलाएँ और मर्द कंधे से कंधा मिलाकर खेतों में काम करते थे। मर्द खेत जोतते थे व हल चलाते थे और महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई के साथ-साथ पकी हुई फ्रसल का दाना निकालने का काम करती थीं। जब छोटी-छोटी ग्रामीण इकाइयों का और किसान की व्यक्तिगत खेती का विकास हुआ-जो कि मध्यकालीन भारतीय कृषि की खासियत थी-तब घर-परिवार के संसाधन और श्रम, उत्पादन की बुनियाद बने। स्वाभाविक तौर पर, ऐस्मे में लिंग बोध के आधार पर आमतौर पर किया जाने वाला फ्रक (घर के लिए महिलाएँ और बाहर के लिए मर्द) मुमकिन नहीं था। फिर भी महिलाओं की जैव वैज्ञानिक क्रियाओं को लेकर लोगों के मन में पूर्वाग्रह बने रहे। मसलन पश्चिमी भारत में, राजस्वला महिलाओं को हल या कुम्हार का चाक छूने की इज्ञाज्त नहीं थी; इसी तरह बंगाल में अपने मासिक-धर्म के समय महिलाएँ पान के बगान में नहीं घुस सकती थीं।

सूत कातने, बरतन बनाने के लिए मिट्री को साफ्र करने और गृधने, और कपड़ों पर कढ़ाई जैसे दस्तकारी के काम उत्पादन के ऐसे पहलू थे जो महिलाओं के श्रम पर निर्भर थे। किसी वस्तु का जितना वाणिज्यीकरण होता था, उसके उत्पादन के लिए महिलाओं के श्रम की उतनी ही माँग होती थी। दरअसल, किसान और दस्तकार महिलाएँ जरूरत पड़ने पर न सिफ्र खेतों में काम करती थीं बल्कि नियोक्ताओं के घरों पर भी जाती थीं और बाज्ञारों में भी।

चूँकि समाज श्रम पर निर्भर था, इसलिए बच्चे पैदा करने की अपनी क्लाबिलियत की वजह से महिलाओं को महत्वपूर्ण संसाधन के रूप में देखा जाता था। फिर भी शादी-शुदा महिलाओं की कमी थी क्योंकि कुपोषण, बार-बार माँ बनने और प्रसव के वक्षत मौत की वजह से महिलाओं में मृत्युदर बहुत ज्यादा था। इससे किसान और दस्तकार समाज में ऐसे सामाजिक रिवाज पैदा हुए जो संभ्रांत समूहों से बहुत अलग थे। कई ग्रामीण संप्रदायों में शादी के लिए “दुलहन की कीमत” अदा करने की जरूरत होती थी, न कि दहेज की। तलाकशुदा महिलाएँ और विधवाएँ दोनों ही कानूनन शादी कर सकती थीं।

महिलाओं की प्रजनन शक्ति को इतनी अहमियत दी जाती थी कि उस पर काबू खोने का बड़ा डर था। स्थापित रिवाजों के मुताबिक घर का मुखिया मर्द होता था। इस तरह महिला पर परिवार और समुदाय के मर्दों द्वारा पुरजोर काबू रखा जाता था। बेवफाई के शक पर ही महिलाओं को भयानक दंड दिए जा सकते थे।

राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र आदि पश्चिमी भारत के इलाकों से मिले दस्तावेजों में ऐसी दरख्वास्त मिली हैं जो महिलाओं ने न्याय और मुआवजे की उम्मीद से ग्राम पंचायत को भेजी थीं। पत्नियाँ अपने पतियों की बेवफ्ाई का विरोध करती दिखाई देती हैं या फिर गृहस्थी के मर्द पर ये आरोप लगातीं कि वे पत्नी और बच्चों की अनदेखी करता है। मर्दों की बेवफ्ाई हमेशा दंडित नहीं होती थी; लेकिन राज्य और “ऊँची” जाति के लोग अकसर ये सुनश्चित करने की कोशिश करते कि परिवार के भरण-पोषण का इंतज्ञाम हो जाए। ज्यादातर, जब महिलाएँ पंचायत को दरख्वास्त देतीं, उनके नाम दस्तावेजों में दर्ज नहीं किए जातेः दरख्वास्त करने वाली का हवाला गृहस्थी के मर्द/मुखिया की माँ, बहन या पत्नी के रूप में दिया जाता था।

भूमिहर भद्रजनां में महिलाओं को पुश्तैनी संपत्ति का हक्र मिला हुआ था। पंजाब से ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ महिलाएँ (विधवा महिलाएँ भी) पुश्तैनी संपत्ति के विक्रेता के रूप में ग्रामीण ज्ञमीन के बाज्ञार में सक्रिय हिस्पेदारी रखती थीं। हिंदू और मुसलमान महिलाओं को ज्ञमींदारी उत्तराधिकार में मिलती थी जिसे बेचने अथवा गिरवी रखने के लिए वे स्वतंत्र थीं। बंगाल में भी महिला ज्ञमींदार पाई जाती थीं। अठारहवीं सदी की सबसे बड़ी और मशहूर ज्ञमींदारियों में से एक थी राजशाही की ज्ञमींदारी जिसकी कर्ता-धर्ता एक स्त्री थी।

चित्र 8.8 (क)
चित्र 8.8 (क)
चित्र 8.8 (ख)
चित्र 8.8 (ख)

→ चर्चा कीजिए...

क्या आपके प्रांत में कृषि भूमि पर महिलाओं और मर्दों की पहुँच में कोई फर्क है?

चित्र 8.9 नीलगाय का शिकार करते हुए शाहजहाँ का चित्र (बादशाहनामा से)

आप इस चित्र में जो देखते हैं उसका वर्णन कीजिए। इसमें ऐसा कौन सा सांकेतिक तत्व है जो शिकार और एक आदर्श न्याय व्यवस्था को जोडता है?

Textbook illustration

4 जंगल और कबीले

4.1 बसे हुए गाँवों के परे

ग्रामीण भारत में, बसे हुए लोगों की खेती के अलावा भी बहुत कुछ था। उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भारत की गहरी खेती वाले प्रदेशों को छोड़ दें तो जमीन के विशाल हिस्से जंगल या झाड्डियों (खरबंदी) से घिरे थे। ऐसे इलाके झारखंड सहित पूरे पूर्वी भारत, मध्य भारत, उत्तरी क्षेत्र (जिसमें भारत-नेपाल के सीमावर्ती इलाके की तराई शामिल हैं), दक्षिणी भारत का पश्चिमी घाट और दक्कन के पठारों में फैले हुए थे। हालौंकि इस काल में अखिल भारतीय स्तर पर जंगलों के फैलाव का औसत निकालना लगभग असंभव है, फिर भी समसामयिक स्रोतों से मिली जानकारी के आधार पर ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह औसत करीब-करीब 40 फ्रीसदी था।

समसामयिक रचनाएँ जंगल में रहने वालों के लिए जंगली शब्द का

इस्तेमाल करती है। लेकिन जंगली होने का मतलब सभ्यता का न होना बिलकुल नहीं था, वैसे आजकल इस शब्द का प्रचलित अर्थ यही है। उन दिनों इस शब्द का इस्तेमाल ऐसे लोगों के लिए होता था जिनका गुज्ञारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था। ये काम मौसम के मुताबिक होते थे। उदाहरण के तौर पर भीलों में, बसंत के मौसम में जंगल के उत्पाद इकढुा किए जाते, गर्मियों में मछली पकड़ी जाती, मानसून के महीनों मे खेती की जाती, और शरद व जाड़े के महीनों में शिकार किया जाता था। यह सिलसिला लगातार गतिशीलता की बुनियाद पर खड़ा था और इस बुनियाद को मजबूत भी करता था। लगातार एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहना इन जंगलों में रहने वाले कबीलों की एक खासियत थी।

जहाँ तक राज्य का सवाल है, उसके लिए जंगल उलट फेर वाला इलाका था : बद्माशों को शरण देने वाला अढु़ा (मवास)। एक बार फिर हम बाबर की ओर देखते हैं जो कहता है कि जंगल एक ऐसा रक्षाकवच था “जिसके पीछे परगना के लोग कड़े विद्रोही हो जाते थे और कर अदा करने से मुकर जाते थे।”

4.2 जंगलों में घुसपैठ

जंगल में बाहरी ताकतें कई तरह से घुसती थीं, मसलन, राज्य को सेना के लिए हाथियों की जरूरत होती थी। इसलिए, जंगलवासियों से ली जाने वाली पेशकश में अकसर हाथी भी शामिल होते थे।

मुगल राजनीतिक विचारधारा में, गरीबों और अमीरों सहित सबके साथ जुड़ते हुए राज्य के गहरे सरोकार का एक लक्षण था-शिकार अभियान। दरबारी इतिहासकारों की मानें, तो शिकार अभियान के नाम पर बादशाह अपने विशाल साम्राज्य के कोने-कोने का दौरा करता था और इस तरह अलग-अलग इलाकों के लोगों की समस्याओं और शिकायतों पर व्यक्तिगत रूप से गौर करता था। दरबारी कलाकारों के चित्रों में शिकार का विषय बार-बार आता था। इन चित्रों में चित्रकार अकसर छोटा-सा एक ऐसा दृश्य डाल देते थे जो सद्भावनापूर्ण शासन का संकेत देता था। परगना मुगृल प्रांतों में एक प्रशासनिक प्रमंडल था।

पेशकश मुग्नाल राज्य के द्वारा ली जाने वाली एक तरह की भेंट थी।

स्रोत 3

कृषि बस्तियों के लिए जंगलों का सफ्राया

यह सोलहवीं सदी में मुकुंदराम चक्रवर्ती की लिखी एक बंगाली कविता चंडीमंगल का एक अंश है। कविता के नायक, कालकेतु ने जंगल खाली करवा के, एक साम्राज्य की स्थापना की :

खबर मिलते ही, परदेसी आने लगे तमाम जगहों से।

फिर कालकेतु ने खरीद कर बाँटे उनमें

भारी भरकम चाकू, कुल्हाड़ी, और भाले-बरछे।

उत्तर से आए दास

सैकड़ों उमड़ते हुए।

हुए चकित देखकर कालकेतु को

जिसने दी सुपारी एक-एक को।

दक्खिन से आए फ्रसल कटाई वाले

एक उद्यमी के साथ पाँच सौ।

पश्चिम से आया ज़फर मियाँ

साथ में बाईस हज्ञार लोग।

हाथों में सुलेमानी मोती की माला

जपते हुए पीर ओ पैगम्बर का नाम।

जंगलों को हटाने के बाद

उन्होंने बसाए बाज़ार।

सैकड़ों सैकड़ों की तादाद में बिदेसी

जंगलों को (जैसे) खा लिए, और घुस आए वहाँं।

कुल्हाड़ियों की आवाज्ञ सुनकर

शेर डर गए और दहाड़ते हुए भाग निकले। यह पद्यांश जंगल में घुसपैठ के कौन से रूपों को उजागर करता है? इसके संदेश की तुलना चित्र 8.9 में दिये गए लघु चित्र से कीजिए। जंगल में रहने वाले लोगों के अनुसार पंद्याश में किन्हें “बिदेसी” बताया गया है?

स्त्रोत 4

पहाड़ी कबीलों और मैदानों के बीच व्यापार, लगभग 1595

अवध सूबे (आज के उत्तर प्रदेश का हिस्सा) के मैदानी इलाकों और पहाड़ी कबीलों के बीच होने वाले लेन-देन के बारे में अबुल फ्रज्ज्ञ ने कुछ इस तरह लिखा है:

उत्तर के पहाड़ों से इंसानों, मोटे-मोटे घोड़ों और बकरों की पीठ पर लादकर बेशुमार सामान ले जाए जाते हैं, जैसे कि सोना, ताँबा, शीशा, कस्तूरी, सुरागाय (याक) की पृँछ, शहद, चुक (संतरे के रस और नींबू के रस को साथ उबालकर बनाया जाने वाला एक अम्ल), अनार दाना, अदरख, लंबी मिर्च, मजीठ (जिससे लाल रंग बनाया जाता है) की जड़ें, सुहागा, ज्रदवार (हल्दी जैसी एक जड़), मोम, ऊनी कपड़े, लकड़ी के सामान, चील, बाज, काले बाज, मर्लिन (बाज्ञ पक्षी की ही एक किस्म), और अन्य वस्तुएँ। इसके बदले, वे सफ्रेद और रंगीन कपड़े, कहरुबा (एक पीला-भूरा धातु जिससे गहने बनाए जाते थे), नमक, हींग, गहने और शीशे व मिट्री के बरतन वापिस ले जाते हैं।

इस अनुच्छेद में परिवहन के कौन से तरीक्रों का जिक्र किया गया है? आपके मुताबिक, इनका इस्तेमाल क्यों किया जाता था? मैदानों से जो सामान पहाड़ ले जाए जाते थे, उनमें से हर एक वस्तु किस काम में लाई जाती होगी, इसका खुलासा कीजिए।

चित्र 8.10

सूफी गायक को सुनते हुए एक किसान और एक शिकारी।

Textbook illustration

वाणिज्यिक खेती का असर, बाहरी कारक के रूप में, जंगलवासियों की जिंदगी पर भी पड़ता था। जंगल के उत्पाद-जैसे शहद, मधुमोम और लाक की बहुत माँग थी। लाक जैसी कुछ वस्तुएँ तो सत्रहवीं सदी में भारत से समुद्र पार होने वाले निर्यात की मुख्य वस्तुएँ थी। हाथी भी पकड़े और बेचे जाते थे। व्यापार के तहत वस्तुओं की अदला-बदली भी होती थी। कुछ कबीले भारत और अफ्रग्नानिस्तान के बीच होने वाले जमीनी व्यापार में लगे थे, जैसे पंजाब का लोहानी कबीला। वे पंजाब के गाँवों और शहरों के बीच होने वाले व्यापार में भी शिरकत करते थे।

सामाजिक कारणों से भी जंगलवासियों के जीवन में बद्लाव आए। कबीलों के भी सरदार होते थे, बहुत कुछ ग्रामीण समुदाय के “बड़े आदमियों” की तरह। कई कबीलों के सरदार जर्मींदार बन गए, कुछ तो राजा भी हो गये। ऐसे में उन्हें सेना खड़ी करने की जरूरत हुई। उन्होंने अपने ही खानदान के लोगों को सेना में भर्ती किया; या फिर अपने ही भाई-बंधुओं से सैन्य सेवा की माँग की। सिंध इलाके की कबीलाई सेनाओं में 6000 घुड़सवार और 7000 पैद्ल सिपाही होते थे। असम में, अहोम राजाओं के अपने पायक होते थे। ये वे लोग थे जिन्हें जर्मीन के बद्ले सैनिक सेवा देनी पड़ती थी। अहोम राजाओं ने जंगली हाथी पकड़ने पर अपने एकाधिकार का ऐलान भी कर रखा था।

हालॉँकि कबीलाई व्यवस्था से राजतॉत्रिक प्रणाली की तरफ्र संक्रमण बहुत पहले ही शुरू हो चुका था, लेकिन ऐसा लगता है कि सोलहवीं सदी में आकर ही यह प्रक्रिया पूरी तरह विकसित हुई। इसकी जानकारी हमें उत्तर-पूर्वी इलाकों में कबीलाई राज्यों के बारे में आइन की बातों से मिलती है। उदाहरण के तौर पर, सोलहवी-सत्रहवीं सदी में कोच राजाओं ने पड़ोसी कबीलों के साथ एक के बाद एक युढ्ध किया और उन पर अपना कब्जा जमा लिया।

जंगल के इलाकों में नए सांस्कृतिक प्रभावों के विस्तार की भी शुरुआत हुई। कुछ इतिहासकारों ने तो दरअसल यह भी सुझाया है कि नए बसे इलाकों के खेतिहर समुदायों ने जिस तरह धीरे-धीरे इस्लाम को अपनाया उसमें सूफी संतों (पीर) ने एक बड़ी भूमिका अदा की थी (अध्याय 6 भी देखिए)।

5. जमींदार

मुगाल भारत में कृषि संबंधों की हमारी दास्तान तब तक अधूरी रहेगी जब तक गाँवों में रहने वाले एक ऐसे तबके की बात न कर लें जिनकी कमाई तो खेती से आती थी लेकिन जो कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सेदारी नहीं करते थे। ये जमींदार थे जो अपनी जमीन के मालिक होते थे और जिन्हें ग्रामीण समाज में ऊँची हैसियत की बजह से कुछ खास सामाजिक और आर्थिक सुविधाएँ मिली हुई थी। जमींदारों की बढ़ी हुई हैसियत के पीछे एक कारण जाति था; दूसरा कारण यह था कि वे लोग राज्य को कुछ खास किस्म की सेवाएँ (खिदमत) देते थे।

जर्मींदारों की समृद्धि की वजह थी उनकी बिस्तृत व्यक्तिगत जर्मीन। इन्हें मिल्कियत कहते थे, यानी संपत्ति। मिल्कियत जर्मीन पर जर्मींदार के निजी इस्तेमाल के लिए खेती होती थी। अकसर इन जर्मीनों पर दिहाड़ी के मज्ञदूर या पराधीन मज्ञदूर काम करते थे। जर्मींदार अपनी मर्जीं के मुताबिक इन जर्मीनों को बेच सकते थे, किसी और के नाम कर सकते थे या उन्हें गिरवी रख सकते थे।

जर्मींदारों की ताकत इस बात से भी आती थी कि वे अकसर राज्य की ओर से कर वसूल कर सकते थे। इसके बदले उन्हें वित्तीय मुआवजा मिलता था। सैनिक संसाधन उनकी ताकत का एक और जरिया था। ज्यादातर जर्मींदारों के पास अपने किले भी थे और अपनी सैनिक टुकड़ियाँ भी जिसमें घुड़सवारों, तोपखाने और पैदल सिपाहियों के जत्थे होते थे।

इस तरह, अगर हम मुगालकालीन गाँवों में सामाजिक संबंधों की कल्पना एक पिरामिड के रूप में करें, तो ज्ञमींदार इसके संकरे शीर्ष का

रचर्चा कीजिए...

पता कीजिए कि आपके प्रांत में किन क्षेत्रों को आजकल जंगल वाले इ्लाके के रूप में पहचाना जाता है? क्या इन इ्लाकों में आज जिंदगियाँ बदल रही हैं? इन बद्लावों की वजहें वही हैं जिनका जिक्र हमने इस अनुभाग में किया है या उनसे अलग?

हिस्सा थे। अबुल फ्रज्ल इस ओर इशारा करता है कि “ऊँची जाति” के ब्राह्मण-राजपूत गठबंधन ने ग्रामीण समाज पर पहले ही अपना ठोस नियंत्रण बना रखा था। इसमें तथाक्थित मध्यम जातियों की भी खासी नुमाइंदगी थी जैसा कि हमने पहले देखा है, और इसी तरह कई मुसलमान जमींदारों की भी।

समसामयिक दस्तावेजों से ऐसा लगता है कि जंग में जीत जमींदारों की उत्पत्ति का संभावित स्रोत रहा होगा। अकसर, जमींदारी फैलाने का एक तरीक्रा था ताकतवर सैनिक सरदारों द्वारा कमजोर लोगों को बेदखल करना। मगर इसकी संभावना कम ही है कि किसी जमींदार को इतने आक्रामक रुख की इजाज्ञत राज्य देता हो जब तक कि एक राज्यादेश (सनद) के जरिये इसकी पुष्टि पहले ही नहीं कर दी गई हो।

इससे भी महत्वपूर्ण थी ज़मींदारी को पुख्ता करने की धीमी प्रक्रिया। स्रोतों में इसके दस्तावेज भी शामिल हैं। ये कई तरीके से क्रिया जा सकता थाः नयी ज़मीनों को बसाकर (जंगल-बारी), अधिकारों के हस्तांतरण के ज़रिये, राज्य के आदेश से, या फिर खरीद कर। यही वे प्रक्रियाएँ थीं जिनके ज़रिये अपेक्षाकृत “निचली” जातियों के लोग भी जमींदारों के दर्जे में दाखिल हो सकते थे, क्योंकि इस काल में ज़मींदारी धडल्ले से खरीदी और बेची जाती थी।

कई कारणों ने मिलकर परिवार या वंश पर आधारित जमींदारियों को पुख्ला होने का मौका दिया। मसलन, राजपूतों और जाटों ने ऐसी रणनीति अपनाकर उत्तर भारत में जमीन की बड़ी-बड़ी पट्टियों पर अपना नियंत्रण पुख्ला किया। इसी तरह मध्य और दक्षिण-पश्चिम बंगाल में किसान-पशुचारियों (जैसे, सदगोप) ने ताकतवर जमींदारियाँ खड़ी कीं।

ज्ञर्मींदारों ने खेती लायक ज्ञर्मींनों को बसाने में अगुआई की और खेतिहरों को खेती के साजो-सामान व उधार देकर उन्हें वहाँ बसने में भी मदद की। ज्ञर्मींदारी की खरीद-फ्ररोख्त से गाँवों के मौद्रीकरण की प्रक्रिया में तेजी आई। इसके अलावा, ज्ञर्मींदार अपनी मिल्कियत की ज्ञर्मीनों की फ्रसल भी बेचते थे। ऐसे सबूत हैं जो दिखाते हैं कि ज्ञर्मींदार अकसर बाज्ञार (हाट) स्थापित करते थे जहाँ किसान भी अपनी फ्रसलें बेचने आते थे।

हालॉँकि इसमें कोई शक नहीं कि ज़मींदार शोषण करने वाला तबका था, लेकिन किसानों से उनके रिश्तों में पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट था। दो पहलू इस बात की पुष्टि करते हैं। एक तो ये कि भक्ति संतों ने जहाँँ बड़ी बेबाकी से जातिगत और दूसरी किस्मों के

एक समांतर सैनिक बल!

आइन के मुताबिक, मुग्नल भारत में जर्मींदारों की मिली-जुली सैनिक शक्ति इस प्रकार थी : 384,558 घुड़सवार; 4,277,057 पैदल; 1863 हाथी; 4260 तोप; और 4,500 नाव।

अत्याचारों की निंदा की (अध्याय 6 भी देखिए), वहीं उन्होंने जर्मींदारों को (या फिर, दिलचस्प बात है, साहूकारों को) किसानों के शोषक या उन पर अत्याचार करने वाले के रूप में नहीं दिखाया। आमतौर पर राज्य का राजस्व अधिकारी ही उनके गुस्से का निशाना बना। दूसरे, सत्रहवीं सदी में भारी संख्या में कृषि विद्रोह हुए और उनमें राज्य के खिलाफ़ जर्मींदारों को अकसर किसानों का समर्थन मिला।

6. भू-राजस्व प्रणाली

ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुगोल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद थी। इस कारण से, कृषि उत्पादन पर नियंत्रण रखने के लिए और तेजी से फैलते साम्राज्य के तमाम इलाकों में राजस्व आकलन व वसूली के लिए यह ज़रूरी था कि राज्य एक प्रशासनिक तंत्र खड़ा करे। दीवान, जिसके द्फ्पतर पर पूरे राज्य की वित्तीय व्यवस्था के देख-रेख की जिम्मेदारी थी, इस तंत्र में शामिल था। इस तरह हिसाब रखने वाले और राजस्व अधिकारी खेती की दुनिया में दाखिल हुए और कृषि संबंधों को शक्ल देने में एक निर्णायिक ताकत के रूप में उभरे।

लोगों पर कर का बोझ निर्धारित करने से पहले मुगाल राज्य ने जमीन और उस पर होने वाले उत्पादन के बारे में खास किस्म की सूचनाएँ इक्क्छा करने की कोशिश की। भू-राजस्व के इंतज्ञामात में दो चरण थे : पहला, कर निर्धारण और दूसरा, वास्तविक वसूली। जमा निर्धारित रक्रम थी और हासिल सचमुच वसूली गई रक्रम। अमील-गुज्ञार या राजस्व वसूली करने वाले के कामों की सूची में अकबर ने यह हुक्म दिया कि जहाँउ उसे (अमील-गुज्ञार को) कोशिश करनी चाहिए कि खेतिहर नक्रद भुगतान करे, वहीं फ्रसलों में भुगतान का विकल्प भी खुला रहे। राजस्व निर्धारित करते समय राज्य अपना हिस्सा ज्यादा से ज्यादा रखने की कोशिश करता था। मगर स्थानीय हालात की वजह से कभी-कभी सचमुच में इतनी वसूली कर पाना संभव नहीं हो पाता था।

हर प्रांत में जुती हुई ज़मीन और जोतने लायक ज़मीन दोनों की नपाई की गई। अकबर के शासन काल में अबुल फ्रज्ल्ल ने आइन में ऐसी ज़मीनों के सभी आंकड़ों को संकलित किया। उसके बाद के बादशाहों के शासनकाल में भी ज़मीन की नपाई के प्रयास जारी रहे। मसलन, 1665 ई. में, औरंगजेब ने अपने राजस्व कर्मचारियों को स्पष्ट निर्देश दिया कि हर गाँव में खेतिहरों की संख्या का सालाना हिसाब रखा जाए (स्रोत 7)। इसके बावजूद सभी इलाकों की नपाई सफलतापूर्वक नहीं हुई। जैसाकि हमने देखा है, उपमहाद्वीप के कई बड़े हिस्से जंगलों से घिरे हुए थे और इनकी नपाई नहीं हुई।

→ चर्चा कीजिए...

आज्ञादी के बाद भारत में जमींदारी व्यवस्था खृत्म कर दी गई। इस अनुभाग को पढ़िए और उन कारणों की पहचान कीजिए जिनकी वजह से ऐसा किया गया।

स्रोत 5

अमीन एक मुलाज्ञिम था जिसकी ज्ञिम्बेवारी यह सुनिश्चित करना था कि प्रांतों में राजकीय नियम कानूनों का पालन हो रहा है।

अकबर के शासन में भूमि का वर्गींकरण

आइन में वर्गीकरण के मापदंड की निम्नलिखित सूची दी गई हैः:

अकबर बादशाह ने अपनी गहरी दूरदर्शिता के साथ ज़मीनों का वर्गीकरण किया और हरेक (वर्ग की ज़मीन) के लिए अलग-अलग राजस्व निर्धारित किया। पोलज वह ज़मीन है जिसमें एक के बाद एक हर फ़सल की सालाना खेती होती है और जिसे कभी खाली नहीं छोड़ा जाता है। परौती वह ज़मीन है जिस पर कुछ दिनों के लिए खेती रोक दी जाती है ताकि वह अपनी खोयी ताकत वापस पा सके। चचर वह ज़मीन है जो तीन या चार वर्षों तक खाली रहती है। बंजर वह ज़मीन है जिस पर पाँच या उससे ज्यादा वर्षों से खेती नहीं की गई हो। पहले दो प्रकार की ज़मीन की तीन किस्में हैं, अच्छी, मध्यम और खराब। वे हर किस्म की ज़मीन के उत्पाद को जोड़ देते हैं, और इसका तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद माना जाता है, जिसका एक-तिहाई हिस्सा शाही शुल्क माना जाता है।

अपने अधीन इलाकों में ज़मीन का वर्गिकरण करते बकृत मुगल राज्य ने किन सिद्धांतों का पालन किया? राजस्व निर्धारण किस प्रकार किया जाता था?

मानचित्र 1

मुगल साम्राज्य का विस्तार

भू-राजस्व की वसूली पर साम्राज्य के विस्तार का क्या प्रभाव पड़ा?

मनसबदारी व्यवस्था

मुगाल प्रशासनिक व्यवस्था के शीर्ष पर एक सैनिक-नौकरशाही तंत्र (मनसबदारी) था जिस पर राज्य के सैनिक व नागरिक मामलों की जिम्मेदारी थी। कुछ मनसबदारों को नकृदी भुगतान किया जाता था, जब कि उनमें से ज्यादातर को साम्भाज्य के अलग-अलग हिस्सों में राजस्व के आबंटन के जरिये भुगतान किया जाता था। समय-समय पर उनका तबादला किया जाता था। अध्याय 9 देखिए।

Textbook illustration

स्त्रोत 6

नक्रद या जीन्स ?

आइन से यह एक और अनुच्छेद हैः:

अमील-गुज्ञार सिफ़ नकृद लेने की आदत न डाले बल्कि फ़सल भी लेने के लिए तैयार रहे। यह बाद वाला तरीका कई तरह से काम में लाया जा सकता है। पहला, कणकृतः हिंदी जुबान में कण का मतलब है, अनाज, और कुत, अंदाजा ...... अगर कोई शक हो, तो फ़सल को तीन अलग-अलग पुलिंदों में काटना चाहिए- अच्छा, मध्यम और बदतर, और इस तरह शक दूर करना चाहिए। अकसर अंदाज्त से किया गया जमीन का आकलन भी पर्याप्त रूप से सही नतीजा दैता है। दूसरा, बटाई जिसे भाओली भी कहते हैं (में), फ़सल काट कर जमा कर लेते हैं, और फ़िर सभी पक्षों की मौजूदगी में व रज्ञामंदी में बॉटवारा करते हैं। लेकिन इसमें कई समझदार निरीक्षकों की ज़रूरत पड़ती है; वर्ना दुष्ट-बुढ्धि और मक्कार धोखेबाजी की नीयत रखते हैं। तीसरे, खेत बटाई जब वे बीज बोने के बाद खेत बाँट लेते हैं। चौथे, लाँग बटाई; फ़सल काटने के बाद, वे उसका ढैर बना लेते हैं और फिर उसे अपने में बाँट लेते हैं, और हरेक (पक्ष) अपना हिस्सा घर ले जाता है और उससे मुनाफ़ा कमाता है।

राजस्व निर्धारण व वसूली की हरेक प्रणाली में खेतिहरों पर क्या फ़र्क पड़ता होगा?

→ चर्चा कीजिए...

क्या आप मुगालों की भू-राजस्व प्रणाली को एक लचीली व्यवस्था मानेंगे?

7 चाँदी का बहाव

मुगल साम्राज्य एशिया के उन बड़े साम्राज्यों में एक था जो सोलहवीं व सत्रहवीं सदी में सत्ता और संसाधनों पर अपनी पकड़ मजबृत बनाने में कामयाब रहे। ये साम्राज्य थे-मिंग (चीन में), सफावी (ईरान में), और ऑटोमन (तुर्की में)। इन साम्राज्यों की राजनीतिक स्थिरता ने चीन से लेकर भूमध्य सागर तक जमीनी व्यापार का जीवंत जाल बिछाने में मदद की। खोजी यात्राओं से, और ‘नयी दुनिया’ के खुलने से यूरोप के साथ एशिया के, खास कर भारत के, व्यापार में भारी विस्तार हुआ। इस वजह से भारत के समुद्र-पार व्यापार में एक ओर भौगोलिक विविधता आई तो दूसरी ओर कई नयी वस्तुओं का व्यापार भी शुरू हो गया। लगातार बढ़ते व्यापार के

स्रोत 7

जमा

1665 ई. में अपने राजस्व अधिकारी को औरंगज्जेब के द्वारा दिये गए हुक्म का एक अंश :

वे परगनाओं के अमीनों को निर्देश दें कि वे हर गाँव, हर किसान (आसामीवार) के बावत खेती के मौजूदा हालात (मौजूदात) पता करें, और बारीकी से उनकी जाँच करने के बाद सरकार के वित्तीय हितों (किफ्रायत) व किसानों के कल्याण को ध्यान में रखते हुए जमा निर्धारित करें।

आपकी राय में बादशाह ने विस्तृत सर्वेक्षण पर क्यों जोर दिया?

Textbook illustration
चित्र 8.11
चित्र 8.11

अकबर द्वारा जारी किए गए चाँदी के रुपये की दोनों तरफें

Textbook illustration
चित्र 8.12
औरंगज्जेब द्वारा जारी किया गया चॉँदी का
रुपया
चित्र 8.12 औरंगज्जेब द्वारा जारी किया गया चॉँदी का रुपया

साथ, भारत से निर्यात होने बाली वस्तुओं का भुगतान करने के लिए एशिया में भारी मात्रा में चॉँदी आई। इस चॉँदी का एक बड़ा हिस्सा भारत की तरफ़ खिच गया। यह भारत के लिए अच्छा था क्योंकि यहाँँ चॉँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे। नतीजतन, सोलहवीं से अठारहवीं सदी के बीच भारत में धातु मुद्रा-खास कर चॉँदी के रूपयों-की उपलब्धि में अच्छी स्थिरता बनी रही। इसके साथ ही एक तरफ़ तो अर्थव्यवस्था में मुद्रा संचार और सिक्कों की ढलाई में अभूतपूर्व विस्तार हुआ, दूसरी तरफ़ मुगल राज्य को नकदी कर उगाहने में आसानी हुई।

इटली के एक मुसाफ़िर जोवान्नी कारेरी, जो लगभगर 1690 ई. में भारत से होकर गुज़रा था, ने इस बात का बड़ा सजीव चित्र पेश किया है कि किस तरह चाँदी तमाम दुनिया से होकर भारत पहुँचती थी। उसी से हमें यह भी पता चलता है कि सत्रहवीं सदी के भारत में बड़ी अद्भुत मात्रा में नकद और वस्तुओं का आदान-प्रदान हो रहा था।

चित्र 8.13 यूरोपीय बाज्ञारों की माँगों को पूरा करने के लिए भारतीय उपमहाद्वीप के वस्त्र उत्पादन का एक उदाहरण

→ चर्चा कीजिए...

पता लगाइए कि वर्तमान में आपके राज्य में कृषि उत्पादन पर कर लगाए जाते हैं या नहीं। आज की राज्य सरकारों की राजकोषीय नीतियों और मुगल राजकोषीय नीतियों में समानताओं और भिन्नताओं को समझाइए।

Textbook illustration

स्त्रोत 8

भारत में चाँदी कैसे आई?

जोवान्नी कारेरी के लेख (बर्नियर के लेख पर आधारित) के निम्नलिखित अंश से हमें पता चलता है कि मुगृल साग्राज्य में कितनी भारी मात्रा में बाहर से धन आ रहा था:

(मुग्ल) साम्राज्य की धन-संपत्ति का अंदाजा लगाने के लिए पाठक इस बात पर गौर करें कि दुनिया भर में बिचरने वाला सारा सोना-चाँँदी आखिरकार यहीं पहुँच जाता है। ये सब जानते हैं कि इसका बहुत बड़ा हिस्सा अमेरिका से आता है, और यूरोप के कई राज्यों से होते हुए, (इसका) थोड़ा-सा हिस्सा कई तरह की वस्तुओं के लिए तुर्की में जाता है; और थोड़ा-सा हिस्सा रेशम के लिए स्मिरना होते हुए फ्रारस पहुँचता है। अब चृँकि तुर्की लोग कॉफ्री से अलग नहीं रह सकते, जो कि ओमान और अरबिया से आती है...... (और) न ही फ्रारस, अरबिया और तुर्की (के लोग) भारत की वस्तुओं के बिना रह सकते हैं। (वे) मुद्रा की विशाल मात्रा लाल सागर पर बेबल मंडेल के पास स्थित मोचा भेजते हैं; (इसी तरह वे ये मुद्राएँ) फ्रारस की खाड़ी पर स्थित बसरा भेजते हैं;.... बाद में ये (सारी संपत्ति) जहाजों से इन्दोस्तान (हिंदुस्तान) भेज दी जाती है। भारतीय जहाजों के अलावा जो डच, अंग्रेजी और पुर्तगाली जहाज्त हर साल इंदोस्तान की वस्तुएँ लेकर पेगू, तानस्सेरी (म्यांमार के हिस्से), स्याम (थाइलैंड), सीलोन (श्रीलंका)... मालदीव के टापू, मोज्ञाम्बीक्र और अन्य जगहें ले जाते हैं, (इन्हीं जहाजों को) निश्चित तौर पर बहुत सारा सोना-चाँँदी इन देशों से लेकर वहाँ (हिंदुस्तान) पहुँचाना पड़ता है। वो सब कुछ, जो डच लोग जापान की खानों से हासिल करते हैं, देर-सवेर इंदोस्तान (को) चला जाता है; और यहाँं से यूरोप को जाने वाली सारी वस्तुएँ, चाहे वो ф्रांस जाएँ या इंग्लैंड या पुर्तगाल, सभी नकद में खरीदी जाती हैं, जो (नकद) वहीं (हिंदुस्तान में) रह जाता है।

8. अबुल फ़ज़ल की आइन-ए-अकबरी

आइन-ए-अकबरी ऑँकड़ों के वर्गीकरण के एक बहुत बड़े ऐतिहासिक और प्रशासनिक परियोजना का नतीजा थी जिसका जिम्मा बादशाह अकबर के हुक्म पर अबुल फ़ज्ल ने उठाया था। अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष, 1598 ई. में, पाँच संशोधनों के बाद, इसे पूरा किया गया। आइन इतिहास लिखने के एक ऐसे बृहत्तर परियोजना का हिस्सा थी जिसकी पहल अकबर ने की थी। इस परियोजना का परिणाम था अकबरनामा जिसे तीन जिल्दों में रचा गया। पहली दो जिल्दों ने ऐतिहासिक दास्तान पेश की। इन हिस्सों पर हम अध्याय 9 में ज्यादा करीबी नज्तर डालेंगे। तीसरी जिल्द, आइन-ए-अकबरी, को शाही नियम कानून के सारांश और साम्राज्य के एक राजपत्र की सूरत में संकलित किया गया था।

आइन कई मसलों पर विस्तार से चर्चा करती है : दरबार, प्रशासन और सेना का संगठन; राजस्व के ख्रोत और अकबरी साम्भाज्य के प्रांतों का भूगोल; और लोगों के साहित्यिक, सांस्कृतिक व धार्मिक रिवाज। अकबर की सरकार के तमाम विभागों और प्रांतों (सूबों) के बारे में विस्तार से जानकारी देने के अलावा, आइन इन सूबों के बारे में पंचीदे और ऑँकडेबढ़ सूचनाएँ बड़ी बारीकी के साथ देती है।

चित्र 8.14
अबुल फ्रज्ल अपने आश्रयदाता को
अकबरनामा की पांडुलिपि पेश कर रहे हैं
चित्र 8.14 अबुल फ्रज्ल अपने आश्रयदाता को अकबरनामा की पांडुलिपि पेश कर रहे हैं

इन सूचनाओं को इकढुा करके, उन्हें सिलसिलेवार तरीक्रे से संकलित करना एक महत्वपूर्ण शाही कवायद थी। इसने बादशाह को साम्राज्य के तमाम इलाकों में प्रचलित रिवाजों और पेशों की जानकारी दी। इस तरह हमारे लिए आइन अकबर के शासन के दौरान मुगृल साम्राज्य के बारे में सूचनाओं की खान है। फिर भी यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि आइन का नज्ञरिया क्षेत्रों के बारे में केंद्र का नज्ञरिया है, या यूँ कहें कि समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर।

आइन पाँच भागों (दप्फतर) का संकलन है जिसके पहले तीन भाग प्रशासन का विवरण देते है। मंजिल-आबादी के नाम से पहली किताब शाही घर-परिवार और उसके रख-रखाव से ताल्लुक रखती है। दूसरा भाग, सिपह-आबादी सैनिक व नागरिक प्रशासन और नौकरों की व्यवस्था के बारे में है। इस भाग में शाही अफ्रसरों (मनसबदार), विद्वानों, कवियों और कलाकारों की संक्षिप्त जीवनियाँ शामिल हैं।

तीसरा, मुल्क-आबादी, वह भाग है जो साम्राज्य व प्रांतों के वित्तीय पहलुओं तथा राजस्व की दरों के ऑँकड़ों की विस्तृत जानकारी देने के बाद “बारह प्रांतों का बयान” देता है। इस खंड में सांख्यिकी सूचनाएँ तफ़सील से दी गई हैं, जिसमें सूबों और उनकी तमाम प्रशासनिक व वित्तीय इकाइयों (सरकार, परगना और महल) के भौगोलिक, स्थलाकृतिक और आर्थिक रेखाचित्र भी शामिल हैं। इसी खंड में हर प्रांत और उसकी अलग-अलग इकाइयों की कुल मापी गई जमीन और निर्धारित राजस्व (जमा) भी दी गई हैं।

सूबा स्तर की विस्तृत जानकारी देने के बाद, आइन हमें सूबों के नीचे की इकाई सरकारों के बारे में विस्तार से बताती है। ये सूचनाएँ तालिकाबढ़ तरीके से दी गई हैं, जहाँ हर तालिका में आठ खाने हैं जो हमें निम्नलिख्ति सूचनाएँ देते हैं : (1) परगनात/महल; (2) क्रिला; (3) अराजी और जमीन-ए-पाईमूद (मापे गए इलाके); (4) नकदी (नक्रद निर्धारित राजस्व); (5) सुयूरग्ाल (दान में दिया गया राजस्व अनुदान); (6) जमींदार; खाने 7 और 8 में जमींदारों की जातियाँ और उनके घुड़सवार, पैदल सिपाही (प्यादा) व हाथी (फ्रील) सहित उनके फ्रौज की जानकारी दी गई है। मुल्क-आबादी उत्तर भारत के कृषि समाज का विस्तृत, आकर्षक व पेचीदा चित्र पेश करती है। चौथी और पाँचवीं किताबें (दफ्तर) भारत के लोगों के मज्रहबी, साहित्यिक और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों से ताल्लुक रखती हैं; इनके आखिर में अकबर के “शुभ वचनों” का एक संग्रह भी है।

स्त्रोत 9

नीचे दिये गए अंश में अबुल फ्रज्ल ने बड़े साफ़ तौर पर ये खुलासा किया है कि उसने कैसे और किनसे अपनी सूचनाएँ हासिल कीं:

...अबुल फ्रज्ल, वल्द मुबारक... को यह शानदार हुक्म दिया गया, “शानदार घटनाओं और राज्य-क्षेत्र अधीन करने बाली हमारी फ्रतहों की दास्तान ईमानदारी के कलम से लिखो...”। तसल्ली से, मैने काफ़ी खोजबीन और मिहनत करके महामहिम की गतिविधियों के सबूत और दस्तावेज्ञ इक्ट्टे किए और बहुत समय तक राज्य के मुलाज्ञिमों व शाही परिवार के सदस्यों के साथ जवाब तलब किया। मैने सच बोलने बाले समझदार बुजुगौं और फुर्तीले दिमाग बाले, सत्यकर्मी जवानों दोनों (की बातों) को परखा, और उनके बयानों को लिखित रूप से दर्ज किया। सूबों को शाही हुक्म जारी किया गया कि पुराने मुलाज्ञिमों में जिस किसी को बीते वक्त की घटनाएँ याद हों, पूरे विश्वास के साथ या मामूली शक के साथ (भी), वे अपने संस्मरण को लिखें और उसे दरबार भेज दें, (फिर) उस पाक-मौजूदगी के कक्ष से एक और हुक्म रौशन हुआ; बो ये, कि जो सामग्री जमा की जाए... उसे शाही मौजूदगी में पढ़कर सुनाया जाए, और बाद में जो कुछ भी लिखा जाना हो, उसे उस महान किताब में परिशिष्ट की शक्ल में जोड़ दिया जाए, और ये कि ऐसे ब्योरे जो जॉच-पड़ताल की बारीकियों की वजह से, या मामले की बारीकियों की वजह से, उसी समय अंजाम तक नहीं लाए जा सके, उन्हें मैं बाद में दर्ज करूँ।

ईश्वरी अध्यादेश का खुलासा करने बाले इस शाही हुक्म (की वजह) से अपनी गुप्त फिक्र से राहत पाकर, मैंने ऐसे कच्चे प्रारूप लिखने की शुरुआत की, जिसमें शैली या विन्यास की खूबसूरती नहीं थी। मैंने इलाही संवत के उन्नीसवें साल से – जब महामहिम की दानिशमंद अक्ल से दस्तावेज्ञ दप्तर स्थापित किया गया था – घटनाओं का इतिहासवृत्त हासिल किया, और उसके भरे-पूरे पन्नों से मैंने कई मामलों का ब्योरा पाया। काफ्री तकलीफ़े उठाकर उन सभी हुक्मों की मूल प्रति या नकल हासिल की गई जो राज्याभिषेक से लेकर आज तक सूबों को जारी किए गए थे। काफ्री दिक्कतों का सामना करते हुए, मैंने उनमें से कई रिपोटों को भी शामिल किया जो साम्राज्य के विभिन्न मामलों या दूसरे देशों में घटी घटनाओं के बारे में थीं और जिन्हें ऊँचे अफ्रसरों और मंत्रियों ने भेजा था। और जवाबतलब व खोजबीन के तंत्र से मेरी मिहनतपसंद रुह संतृप्त हो गई। बड़ी कर्मठता के साथ मैंने वे कच्चे मसौदे व ज्ञापनपत्र भी हासिल किए जो जानकार और दूरदर्शी लोगों ने लिखे थे। इन तरीकों से खुशकिस्मती के इस गुलाब बाग (अकबरनामा) को सींचने और नमी देने के लिए मैंने हौज्ज बनाया।

उन सभी स्वोतों की सूची बनाएँ जिनका इस्तेमाल अबुल फ्रज्ल ने अपनी किताब पूरी करने के लिए किया। कृषि संबंधों को समझने के लिए इनमें से कौन से स्वोत सबसे उपयोगी होते? आपके मुताबिक किस हद तक अबुल फ्रज्ल की किताब अकबर से उसके रिश्ते से प्रभावित हुई होगी?

आइन का अनुवाद

आइन की अहमियत की वजह से, कई विद्वानों ने इसका अनुवाद किया। हेनरी ब्लॉकमेन ने इसे संपादित किया और कलकत्ता (आज का कोलकाता) के एशियाटिक सोसाइटी ने अपनी बिब्लियोथिका श्रृंखला में इसे छापा। इस किताब का तीन खंडों में अंग्रेजी अनुवाद भी किया गया। पहले खंड का मानक अंग्रेजी अनुवाद ब्लॉकमेन का है (कलकत्ता, 1873), बाकी के दो खंडों के अनुवाद एच. एस. जैरेट ने किए (कलकत्ता, 1891 और 1894)।

हालॉँकि बादशाह अकबर के शासन की सहूलियत के लिए आइन को आधिकारिक तौर पर विस्तृत सूचनाएँ जमा करने के लिए प्रायोजित किया गया था, फिर भी यह किताब आधिकारिक दस्तावेजों की महज नकल से कहीं बढ़ कर थी। हम जानते हैं कि इसकी पांडुलिपि को लेखक द्वारा पाँँच बार संशोधित किया गया। इससे ऐसा लगता है कि प्रामाणिकता की खोज में अबुल फ्रज्ल काफ़ी सावधानी बरत रहे थे। उदाहरण के तौर पर, मौखिक बयानों को तथ्य के रूप में किताब में शामिल करने से पहले, अन्य स्वोतों से उसकी असलियत और सच्चाई की पुष्टि करने की कोशिश की जाती थी। सांखिकी वाले खंडों में सभी आँकड़ों को अंकों के साथ शब्दों में भी लिखा गया ताकि बाद की प्रतियों में नकल की गलतियाँँ कम से कम हों।

फिर भी जिन इतिहासकारों ने ध्यान से आइन का अध्ययन किया, वे बताते हैं कि यह ग्रंथ पूरी तरह समस्याओं से परे नहीं है। जोड़ करने में कई गृलतियाँ पाई गई हैं। ऐसा माना जाता है कि या तो ये अंकगणित की छोटी-मोटी चूक है या फिर नकल उतारने के दौरान अबुल फ़ज्लन के सहयोगियों की भूल। आमतौर पर ये गृलतियाँ मामूली हैं और एक व्यापक स्तर पर किताबों के आंकड़ों की सच्चाई को कम नहीं करतीं।

आइन की एक और सीमा यह है कि इसके संख्यात्मक ऑँकड़ों में विषमताएँ हैं। सभी सूबों से ऑँकड़े एक ही शक्ल में नहीं एकत्रित किए गए। मसलन, जहाँ कई सूबों के लिए ज्ञमींदारों की जाति के मुतलिक विस्तृत सूचनाएँ संकलित की गई, वहीं बंगाल और उड़ीसा के लिए ऐसी सूचनाएँ मौजूद नहीं हैं। इसी तरह, जहाँ सूबों से लिए गए राजकोषीय ऑँकड़े बड़ी तफसील से दिए गए हैं, वहीं उन्हीं इलाकों से कीमतों और मज्जदूरी जैसे इतने ही महत्वपूर्ण मापदंड इतने अच्छे से दर्ज नहीं किए गए हैं। कीमतों और मज्जदूरी की दरों की जो विस्तृत सूची आइन में दी भी गई है वह साम्राज्य की राजधानी आगरा या उसके इर्द-गिर्द के इलाकों से ली गई है। ज्ञाहिर है कि देश के बाकी हिस्सों के लिए इन ऑँकड़ों की प्रासंगिकता सीमित है।

इन सीमाओं के बावजूद, आइन अपने समय के लिए एक असामान्य व अनोखा दस्तावेज है। मुगृल साम्राज्य के गठन और उसकी संरचना को मंत्र-मुग्ध करने वाली झ्लकियाँ दिखाकर और उसके बाशिंदों व उत्पादों के बारे में सांख्यकीय ऑँकड़े देकर, अबुल फ्रज्ल मध्यकालीन इतिहासकारों की अब तक प्रचलित परंपराओं से कहीं आगे निकल गए और यह निश्चित तौर पर एक बड़ी उपलब्धि थी। गौरतलब है कि मध्यकालीन भारत में अबुल फ्रज्ल से पहले के इतिहासकार ज्यादातर राजनीतिक वारदातों के बारे में ही लिखते थे-जंग, फ्रतह, सियासी साजिशें, या वंशीय उथल-पुथल। देश, उसके लोग या उत्पादों का जिक्र गाहे बगाहे प्रसंगवश ही आता था और वह भी एक ऐसे लेख “साज-सज्जा” के रूप में जिसकी दिशा मूलतः राजनीतिक होती थी।

भारत के लोगों और मुगृल साम्राज्य के बारे में विस्तृत सूचनाएँ दर्ज करके आइन ने स्थापित परंपराओं को पीछे छोड़ दिया और इस तरह सत्रहवीं सदी के मुहाने पर भारत के अध्ययन के लिए एक संदर्भ बिंदु बन गया। जहाँ तक कृषि संबंधों का सवाल है, आइन के सांख्यिकीय सबूतों की अहमियत चुनौतियों के परे है। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण, लोगों, उनके पेशों और व्यवसायों, साम्राज्य की व्यवस्था और उसके उच्चाधिकारियों के बारे में जो सूचनाएँ यह ग्रथ मुहैया कराता है, उनकी मद्द से इतिहासकार समकालीन भारत के सामाजिक ताने-बाने का इतिहास पुनः रचते हैं।

1526दिल्ली के सुलतान, इब्राहिम लोदी को पानीपत में हराकर बाबर पहला मुगृल बादशाह बनता है
1530-40हुमायूँ के शासन का पहला चरण
1540-55शेरशाह से हार कर हुमायूँ सफ्रावी दरबार में प्रवासी बन कर रहता है
1555-56हुमायूँ खोये हुए राज्य को फिर से हासिल करता है
1556-1605अकबर का शासन काल
1605-27जहाँगीर का शासन काल
1628-58शाहजहाँ का शासन काल
1658-1707औरंगज्जेब का शासन काल
1739नादिरशाह भारत पर आक्रमण करता है और दिल्ली को लूटता है
1761अहमद शाह अब्दाली पानीपत के तीसरे युढ्ध में मराठों को हराता है
1765बंगाल के दीवानी अधिकार इस्ट इंडिया कंपनी को सौप दिये जाते हैं
1857अंतिम मुगृल बादशाह बहादुर शाह जफ्रर को अंग्रेज गढी से हटा देते हैं और देश निकाला देकर रंगून (आज का यांगोन, म्प्यांमार में) भेज देते हैं।
Textbook illustration

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

•
कृषि इतिहास लिखने के लिए आइन को स्त्रोत के रूप में इस्तेमाल करने में कौन सी समस्याएँ हैं? इतिहासकार इन समस्याओं से कैसे निपटते हैं?
•
सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में कृषि उत्पादन को किस हद तक महज़ गुज्ञारे के लिए खेती कह सकते हैं? अपने उत्तर के कारण स्पष्ट कीजिए।
•
कृषि उत्पादन में महिलाओं की भूमिका का विवरण दीजिए।
•
विचाराथीन काल में मौद्रिक कारोबार की अहमियत की विवेचना उदाहरण देकर कीजिए।
•
उन सूबतों की जाँच कीजिए जो ये सुझाते हैं कि मुग्ल राजकोषीय व्यवस्था के लिए भू-राजस्व बहुत महत्वपूर्ण था।
Textbook illustration

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250-300 शब्दों में)

•
आपके मुताबिक कृषि समाज में सामाजिक व आर्थिक संबंधों को प्रभावित करने में जाति किस हद तक एक कारक थी?
•
सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में जंगल वासियों की जिंदंगी किस तरह बदल गई?
•
मुग़ल भारत में ज़मींदारों की भूमिका की जाँच कीजिए।
•
पंचायत और गाँव का मुखिया किस तरह से ग्रामीण समाज का नियमन करते थे? विवेचना कीजिए।

चित्र 8.15 सुनारों को दर्शाते हुए सत्रहवीं शताब्दी का चित्र

Textbook illustration
Textbook illustration

मानचित्र कार्य

10. विश्व के बहिरंखा वाले नक्शे पर उन इलाकों को दिखाएँ जिनका मुगृल साप्राज्य के साथ आर्थिक संपर्क था। इन इलाकों के साथ यातायात-मागों को भी दिखाएँ।

Textbook illustration

परियोजना कार्य (कोई एक)

•
पड़ोस के एक गाँव का दौरा कीजिए। पता कीजिए कि वहाँ कितने लोग रहते हैं, कौन सी फ़सलें उगाई जाती हैं, कौन से जानवर पाले जाते हैं, कौन से दस्तकार समूह रहते हैं, महिलाएँ जमीन की मालिक हैं या नहीं, और वहाँ की पंचायत किस तरह काम करती है। जो आपने सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के बारे में सीखा है उससे इस सूचना की तुलना करते हुए, समानताएँ नोट कीजिए। परिवर्तन और निरंतरता दोनां की व्याख्या कीजिए।
•
आड़न का एक छोटा सा अंश चुन लीजिए (10 से 12 पृष्ठ, दी गई वेबसाइट पर उपलब्ध)। इसे ध्यान से पढ़िए और इस बात का ब्योरा दीजिए कि इसका इस्तेमाल एक इतिहासकार किस तरह से कर सकता है?

चित्र 8.16

मिठाई बेचती हुई महिला

Textbook illustration
Textbook illustration

यदि आप और जानकारी चाहते हैं तो इन्हें पढ़िएः

सुमित गुहा, 1999

एनवायरनमेंट एंड एथिनीसिटी

इन इंडिया, कैम्ब्रज यूनिवर्सिटी प्रेस, कैम्ब्रज

इरफान हबीब, 1999

द अग्रेरियन सिस्टम ऑफ मुग़ल

इंडिया 1556-1707 (सेकंड

एडिशन), ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी

प्रेस, न्यू दिल्ली

डब्ल्यू.एच. मोरलेंड, 1983 (पुनर्मुद्रण)

इंडिया एट द डेथ ऑफ अकबरः

एन इकोनॉमिक स्टडी

ओरियंटल, न्यू दिल्ली

तपन रायचौधरी एंड इरफान हबीब

(संपा.), 2004, द कैम्ब्रिज

इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया,

वोल्यूम 1, ओरियंट लोंगमैन, न्यू दिल्ली

डीटमर रोथरमंड, 1993

एन इकोनाँमिक हिस्ट्री ऑफ

इंडिया-फ्राँम प्री-कोलोनियल

टाइम्स टू 1991, राउटलेज, लंदन

संजय सुब्रह्मण्यम (संपा.), 1994

मनी एंड दि मार्केंट इन इंडिया

1100-1700

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस

न्यू दिल्ली

अधिक जानकारी के लिए आप निम्नलिखित वेबसाइट देख सकते हैं http://persian.packhum.orgpersianindex.jsp?serv=pf&file=00702053&ct=0

Textbook illustration

चित्रों के लिए श्रेय

विषय 5

•
चित्र 5.1: Ritu Topa.
•
चित्र 5.2 : Henri Stierlin, The Cultural History of the Arabs, Aurum Press, London, 1981.
•
चित्र 5.4, 5.13: FICCI, Footprints of Enterprise: Indian Business Through the Ages, Oxford University Press, New Delhi, 1999.
•
चित्र 5.5: Calcutta Art Gallery, printed in E.B. Havell, The Art Heritage of India, D.B. Taraporevala Sons & Co., Bombay, 1964.
•
चित्र 5.6, 5.7, 5.12: Bamber Gascoigne, The Great Moghuls, Jonathan Cape Ltd., London, 1971.
•
चित्र 5.8, 5.9: Sunil Kumar.
•
चित्र 5.10: Rosemary Crill, Indian Ikat Textiles, Weatherhill, London, 1998.
•
चित्र 5.11, 5.14: C.A. Bayly (ed). An Illustrated History of Modern India, 1600-1947, Oxford University Press, Bombay, 1991.

विषय 6

•
चित्र 6.1: Susan L. Huntington, The Art of Ancient India, Weatherhill, New York, 1993.
•
चित्र 6.3, 6.17: Jim Masselos, Jackie Menzies and Pratapaditya Pal, Dancing to the Flute: Music and Dance in Indian Art, The Art Gallery of New South Wales, Sydney, Australia, 1997.
•
चित्र 6.4, 6.5: Benjamin Rowland, The Art and Architecture of India, Penguin, Harmondsworth, 1970.
•
चित्र 6.6: Henri Stierlin, The Cultural History of the Arabs, Aurum Press, London, 1981.
•
चित्र 6.8: http:èkèkwww.us.iis.ac.ukèkview_article.aspèkContentID=104228
•
चित्र 6.9: http:èkèkwww.thekkepuram.ourfamily.comèkmiskal.htm
•
चित्र 6.10: http:èkèka bangladesh.comèkbanglapedia èkImagesèkA_0350A.JPG
•
चित्र 6.11: [email protected]
•
चित्र 6.12: Stuart Cary Welch, Indian Art and Culture 1300-1900, The Metropolitan Museum of Art, New York, 1985.
•
चित्र 6.13: Bamber Gascoigne, The Great Moghuls, Jonathan Cape Ltd., London, 1971.
•
चित्र 6.15: CCRT.
•
चित्र 6.16: C.A. Bayly (ed). An Illustrated History of Modern India, 1600-1947, Oxford University Press, Bombay, 1991.
•
चित्र 6.18: Ahmad Nabi Khan, Islamic Architecture in Pakistan, National Hijra Council, Islamabad, 1990.

विषय 7

•
चित्र 7.1, 7.11, 7.12, 7.14, 7.15, 7.16, 7.18: Vasundhara Filliozat and George Michell (eds), The Splendours of Vijayanagara, Marg Publications, Bombay, 1981.
•
चित्र 7.2: C.A. Bayly (ed). An Illustrated History of Modern India, 1600-1947, Oxford University Press, Bombay, 1991.
•
चित्र 7.3: Susan L. Huntington, The Art of Ancient India, Weatherhill, New York, 1993.
•
चित्र 7.4, 7.6, 7.7, 7.20, 7.23, 7.26, 7.27, 7.32: George Michell, Architecture and Art of South India, Cambridge University Press, Cambridge, 1995.
•
चित्र 7.5, 7.8, 7.9, 7.21 http:èkèkwww.museum.upenn.eduèknewèkresearchèkExp_Rese_Discèk AsiaèkvrpèkHTMLèkVijay_Hist.shtml
•
चित्र 7.10: Catherine B. Asher and Cynthia Talbot. India Before Europe, Cambridge University Press, Cambridge, 2006.
•
चित्र 7.17, 7.22, 7.24, 7.28, 7.29, 7.30, 7.31, 7.33: George Michell and M.B.Wagoner, Vijayanagara: Architectural Inventory of the Sacred Centre, Munshiram Manoharlal, New Delhi.
•
चित्र 7.25: CCRT.

विषय 8

•
चित्र 8.1, 8.9: Milo Cleveland Beach and Ebba Koch, King of the World, Sackler Gallery, New York, 1997.
•
चित्र 8.3: India Office Library, printed in C.A. Bailey (ed). An Illustrated History of Modern India, 1600-1947, Oxford University Press, Bombay, 1991.
•
चित्र 8.4: Harvard University Art Museum, printed in Stuart Cary Welch, Indian Art and Culture 1300-1900, The Metropolitan Museum of Art, New York, 1985.
•
चित्र 8.6, 8.11, 8.12, 8.14: C.A. Bayly (ed). An Illustrated History of Modern India, 1600-1947, Oxford University Press, Bombay, 1991.
•
चित्र 8.13, 8.15: Bamber Gascoigne, The Great Moghuls, Jonathan Cape Ltd., London, 1971.