पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति
कक्षा 12 के लिए इतिहास की पाठ्यपुस्तक



राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्
NATIONAL COUNCIL OF EDUCATIONAL RESEARCH AND TRAINING
12095 - भारतीय इतिहास के कुछ विषय
कक्षा 12 के लिए इतिहास की पाठ्यपुस्तक
ISBN 81-7450-700-0
प्रथम संस्करण
मार्च 2007 फाल्गुन 1928
पुनर्मुद्रण
नवंबर 2007, अप्रैल 2009,
दिसंबर 2009, जनवरी 2011,
जनवरी 2012, मार्च 2013,
फरवरी 2014, फरवरी 2015,
फरवरी 2016, फरवरी 2017,
दिसंबर 2017, जनवरी 2019,
नवंबर 2019 और दिसंबर 2021
संशोधित संस्करण
अक्तूबर 2022 कार्तिक 1944
पुनर्मुद्रण
मार्च 2024 चैत्र 1946
जून 2024 ज्येष्ठ 1946
दिसंबर 2024 अग्रहायण 1946
दिसंबर 2025 अग्रहायण 1947
PD 25T BS
© राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, 2007, 2022
₹ 105.00
एन.सी.ई.आर.टी. बॉटरमार्क 80 जी.एस.एम. पेपर पर मुद्रित।
प्रकाशन प्रभाग में सचिव, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, श्री अरविंद मार्ग, नयी दिल्ली 110 016 द्वारा प्रकाशित तथा चंदू प्रेस, 469, पटपड़गंज इंडस्ट्रियल एस्टेट, दिल्ली-110092 द्वारा मुद्रित।
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गुवाहाटी 781021 फोन : 0361-2674869
प्रकाशन सहयोग
अध्यक्ष, प्रकाशन प्रभाग : एम.वी. श्रीनिवासन
मुख्य संपादक : बिज्ञान सुतार
मुख्य व्यापार प्रबंधक : अमिताभ कुमार
मुख्य उत्पादन अधिकारी : दीपक जैसवाल (प्रभारी)
संपादक : नरेश यादव
उत्पादन सहायक : मनोज कुमार
आवरण एवं सज्जा
आर्ट क्रियेशंस, नयी दिल्ली
काटोंग्राफी
के. वर्गीज़
आमुख
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (2005) सुझाती है कि बच्चों के स्कूली जीवन को बाहर के जीवन से जोड़ा जाना चाहिए। यह सिब्ड्रांत किताबी ज्ञान की उस विरासत के विपरीत है जिसके प्रभाववश हमारी व्यवस्था आज तक स्कूल और घर के बीच अंतराल बनाए हुए है। नयी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या पर आधारित पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकें इस बुनियादी विचार पर अमल करने का प्रयास हैं। इस प्रयास में हर विषय को एक मजबूत दीवार से घेर देने और जानकारी को रटा देने की प्रवृत्ति का विरोध शामिल है। आशा है कि ये कदम हमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) में वर्णित बाल-केंद्रित व्यवस्था की दिशा में काफ्री दूर तक ले जाएँगे।
इस प्रयत्न की सफलता अब इस बात पर निर्भर है कि स्कूलों के प्राचार्य और अध्यापक बच्चों को कल्पनाशील गतिविधियों और सवालों की मद्द से सीखने और अपने अनुभव पर विचार करने का अवसर देते हैं। हमें यह मानना होगा कि यदि जगह, समय और आज्ञादी दी जाए तो बच्चे बड़ों द्वारा सौपी गई सूचना-सामग्री से जुड़कर और जूझकर नए ज्ञान का सृजन करते हैं। शिक्षा के विविध साधनों व स्थोतों की अनदेखी किए जाने का प्रमुख कारण पाठ्यपुस्तक को परीक्षा का एकमात्र आधार बनाने की प्रवृत्ति है। सर्जना और पहल को विकसित करने के लिए जरूरी है कि हम बच्चों को सीखने की प्रक्रिया में पूरा भागीदार मानें और बनाएँ, उन्हें ज्ञान की निर्धारित खुराक का ग्राहक मानना छोड़ दें।
ये उद्देश्य स्कूल की दैनिक जिंदगी और कार्यशैली में काफ्री फेरबदल की माँंग करते हैं। दैनिक समय-सारणी में लचीलापन उतना ही जरूरी है जितना वार्षिक कैलेण्डर के अमल में चुस्ती, जिससे शिक्षण के लिए नियत दिनों की संख्या हकीकत बन सके। शिक्षण और मूल्यांकन की विधियाँ भी इस बात को तय करेंगी कि यह पाठ्यपुस्तक स्कूल में बच्चों के जीवन को मानसिक दबाव तथा बोरियत की जगह खुशी का अनुभव बनाने में कितनी प्रभावी सिछ्ट होती है। बोझ़ की समस्या से निपटने के लिए पाठ्यक्रम निर्माताओं ने विभिन्न चरणों में ज्ञान का पुनर्निर्थारण करते समय बच्चों के मनोविज्ञान एवं अध्यापन के लिए उपलब्ध समय का ध्यान रखने की पहले से अधिक सचेत कोशिश की है। इस कोशिश को और गहराने के यत्न में यह पाठ्यपुस्तक सोच-विचार और विस्मय, छोटे समूहों में बातचीत एवं बहस और हाथ से की जाने वाली गतिविधियों को प्राथमिकता दैती है।
एन.सी.ई.आर.टी. इस पुस्तक की रचना के लिए बनाई गई पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति के परिश्रम के लिए कृतज्जता व्यक्त करती है। परिषद् सामाजिक विज्ञान सलाहकार समूह के अध्यक्ष, प्रोफेसर हरि वासुदेवन, इतिहास विभाग, कलकच्चा विश्वविद्यालय, कोलकाता एवं इतिहास पाठ्यपुस्तक समिति के मुख्य सलाहकार, प्रोफेसर नीलाद्रि भट्टाचार्य, इतिहास अध्ययन केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली की विशेष आभारी है। इस पाठ्यपुस्तक के निर्माण में कई शिक्षकों ने योगदान दिया; इस योगदान को संभव बनाने के लिए हम उनके प्राचार्यों के आभारी हैं। हम उन सभी संस्थाओं और संगठनों के प्रति कृतज्ज हैं जिन्होंने अपने संसाधनों, सामग्री और सहयोगियों
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की मदद लेने में हमें उदारतापूर्वक सहयोग दिया। हम माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा प्रोफ्रेसर मृणाल मीरी एवं प्रोफ्रेसर जी.पी. देशपांडे की अध्यक्षता में गठित निगरानी समिति (मॉनिटरिंग कमेटी) के सदस्यों को अपना मूल्यवान समय और सहयोग देने के लिए धन्यवाद देते हैं। व्यवस्थागत सुधारों और अपने प्रकाशनों में निरंतर निखार लाने के प्रति समर्पित एन.सी.ई.आर.टी. टिप्पणियों एवं सुझावों का स्वागत करेगी जिनसे भावी संशोधनों में मदद ली जा सके।
निदेशक
नयी दिल्ली
20 नवंबर 2006
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान
और प्रशिक्षण परिषद्
पाठ्यपुस्तकों में पाठ्य सामग्री का पुनर्स्योजन
कोविड-19 महामारी को देखते हुए, विद्यार्थियों के ऊपर से पाठ्य सामग्री का बोझ कम करना अनिवार्य है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में भी विद्यार्थियों के लिए पाठ्य सामग्री का बोझ कम करने और रचनात्मक नज़रिए से अनुभवात्मक अधिगम के अवसर प्रदान करने पर जौर दिया गया है। इस पृष्ठभूमि में, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् ने सभी कक्षाओं में पाठ्यपुस्तकों को पुनर्स्योजित करने की शुरुआत की है। इस प्रक्रिया में रा.शै.अ.प्र.प. ढ्वारा पहले से ही विकसित कक्षावार सीखने के प्रतिफलों को ध्यान में रखा गया है।
पाठ्य सामग्रियों के पुनर्स्योजन में निम्नलिखित बिंदुओं को ध्यान में रखा गया है -
वर्तमान संस्करण, ऊपर दिए गए परिवर्तनों को शामिल करते हुए तैयार किया गया पुनर्स्योजित संस्करण है।
भारत का संविधान
उद्देशिका
हम, भारत के लोग, भारत को एक ¹[संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य] बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को :
सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म
और उपासना की स्वतंत्रता ,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता
प्राप्त कराने के लिए,
तथा उन सब में
व्यक्ति की गरिमा और ²[राष्ट्र की एकता
और अखंडता] सुनिश्चित करने वाली बंधुता
बढ़ाने के लिए
दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख
26 नवंबर, 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत् दो
हजार छह विक्रमी) को एतद्धारा इस संविधान को
अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
अध्ययन का केंद्रबिंदु निश्चित करना
कौन सी बात इस किताब के केंद्रबिंदु को निर्धारित करती है? आखिर इस किताब का क्या लक्ष्य है? पिछली कक्षाओं की पढाई से यह कैसे जुड़ी हुई है?
कक्षा 6 से 8 तक हमने भारतीय इतिहास के बारे में प्रारंभिक काल से आधुनिक युग तक की जानकारी प्राप्त की। हर वर्ष एक विशेष ऐतिहासिक काल के बारे में पढ़ई की गई। कक्षा 9 और 10 की किताबों में परीक्षण का दायरा बदल गया। उच्च प्राथमिक कक्षाओं के विपरीत यहाँ हमने एक छोटा सा काल चुनकर समकालीन विश्व का सूक्ष्म अध्ययन किया। क्षेत्रीय सीमाओं को लाँघते हुए, राष्ट्रीय-राज्यों के विस्तार से कहीं आगे बढ़कर, हमने यह जानने की कोशिश की कि दुनिया के अलग-अलग हलकों और मुल्कों के लोगों ने आज की दुनिया बनाने में क्या भूमिका अदा की है। भारतीय इतिहास एक बृहत्तर विश्व के अंतर्सबंधित इतिहास का हिस्सा बन गया। इसके बाद कक्षा 11 में हमने विश्व इतिहास के कुछ विषयों का अध्ययन किया। इस दौरान हमने पृथ्वी पर इनसानों के जीवन की शुरुआत से आज तक के लबे अंतराल के बीच अपनी कालानुक्रमिक दृष्टि को विस्तार दिया। लेकिन हमने विशेष खोज के लिए सिफ्र कुछ विषयों को चुना। इस साल हम भारतीय इतिहास के कुछ विषयों का अध्ययन करेंगे।
यह किताब हड़प्पा से शुरू होती है और भारतीय संविधान के बनने पर खत्म होती है। इसमें पाँच हज्ञार वर्षों का सामान्य सर्वेक्षण नहीं बल्लि कुछ विशेष विषयों का गहन अध्ययन किया गया है। पिछले वर्षों की किताबों ने आपको पहले ही भारतीय इतिहास से परिचित करा दिया है। अब समय आ गया है कि हम कुछ विषयों की गहराई से छानबीन करें।
जहाँ हमने आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक विषयों को चुनकर बदलाव के अलग-अलग आयामों को समझने की कोशिश की है वहीं इनके बीच की दीवारों को भी तोड़ने का प्रयास किया है। जहाँ इस किताब के कुछ विषय आपको उस युग की राजनीति तथा सत्ता और शक्ति की प्रकृति से परिचित करवाएँगे, वहीं कुछ में यह समझने का प्रयास है कि समाज कैसे संगठित होता है, कैसे काम करता है और कैसे बदलता है। कुछ और अध्याय बताते हैं धार्मिक जीवन और रीति-रिवाजों के बारे में, अर्थव्यवस्थाओं के विषय में और ग्रामीण एवं शहरी समाजों में बदलाव के बारे में।
इनमें से हर विषय आपको इतिहासकारों के शिल्प से अवगत कराएणा। इतिहास को ढूँढ़ निकालने के लिए इतिहासकारों को स्रोतों की जरूरत पड़ती है जिनके माध्यम से अतीत के बारे में जाना जा सकता है। लेकिन स्रोत खुद-ब-खुद अतीत को प्रकट नहीं करते। इतिहासकारों को इन स्रोतों के साथ जूझना पड़ता है, इनकी व्याख्या करनी पड़ती है और उनसे अतीत के तथ्य बुलवाने पड़ते हैं। इसीलिए तो इतिहास एक दिलचस्प विषय बन जाता है। पुराने स्रोतों से भी हमें कई नयी जानकारियाँ मिल सकती हैं, यदि हम उनसे नए सवाल पूछें और उन पर अलग तरीके से नजर दौढ़ाएँ। इसलिए हमें यह जानने की जरूरत है कि इतिहासकार किस तरह स्रोतों को पढ़ते हैं और कैसे वे पुराने स्रोतों में नयी बातें खोज निकालते हैं।
लेकिन इतिहासकार सिफ्र कुपाने स्रोतों का ही पुनर्परीक्षण नहीं करते। वे नए स्रोत भी खोज निकालते हैं। कई बार ये स्रोत आकस्मिक रूप से मिल जाते हैं। पुराविदों को कभी-कभी अनजाने में ही कोई मुहर या टीला दिख जाता है जिससे किसी प्राचीन सभ्यता के स्थल का सुराग मिल जाता है।
किसी कलेक्टरेट के धूल-धूसरित दस्तावेजों और लेखों के पुलिंदे की छानबीन करते हुए इतिहासकार अनजाने में किसी स्थानीय झगड़े के मुकदमे के कागज्ञात पा लेता है और इनसे सदियों पहले के ग्रामीण जीवन का एक नया विश्व सामने खड़ा हो जाता है। क्या ये खोजें एक संयोग मात्र हैं? हो सकता है किसी अभिलेखागार में आपको अचानक पुराने दस्तावेजों का एक पुलिंदा मिल जाए। आप उसे खोल कर देखते हैं लेकिन आपको उसमें कोई महत्वपूर्ण बात नज्ञर नहीं आती। यदि आपके मन में संबढ़ सवाल नहीं हों तो उस स्रोत का कोई मतलब नज्ञर नहीं आएगा। आपको स्रोत को खोजना होता है, मूल पाठ को पढ़ना होता है, सुरागों के पीछे लगना पड़ता है और इन सबका अंतर्सबंध दृँढ़ना होता है तब जाकर आप अतीत का पुनर्निर्माण कर पाते हैं। किसी स्रोत की खोज मात्र से ही अतीत के रहस्य नहीं खुल जाते। जब अलेक्जैंडर कनिंधम ने पहली बार हड़प्पा सभ्यता की एक मुहर देखी तो वे इसका कोई मतलब नहीं निकाल पाए। काफ़ी समय बाद ही उस मुहर का महत्च समझ में आया।
वस्तुतः जब इतिहासकार नए सवाल पूछना शुरू करते हैं या नए विषयों की खोज करते हैं तब उन्हें अक्सर नए प्रकार के स्रोतों की खोज करनी पड़ती है। यदि हम क्रांतिकारियों और विद्वोहियों के बारे में जानना चाहते हैं तो सरकारी कागज्ञात सिफ्र एक अधूरी छवि ही प्रस्तुत कर पाएँगे। एक ऐसी छवि जो सरकारी पक्ष के ट्रेष और पूर्वाग्रहांं से रॉगी हुई होगी। हमें विद्वोहियों की डायरी, उनके व्यक्तिगत पत्र, उनके लेख और उद्धोषणाओं जैसे दस्तावेजों को ढूँढ़ने की जरुरत पड़ेगी। ये सब आसानी से नहीं मिलते। यदि हम लोगों के अनुभवों को समझना चाहते हैं तो लिखित स्रोतों की अपेक्षा मौखिक स्रोत ज्यादा बातें उद्धाटित कर पाएँगे।
जैसे-जैसे इतिहास की दृष्टि फैलती है वैसे-वैसे अतीत को समझने की कोशिश में लगे इतिहासकार नए सुरागों की तलाश में नए स्रोतों की खोज शुरू कर देते हैं। जब ऐसा होता है तब किन-किन चीजों को स्रोत माना जाए – इसकी समझ ही बदल जाती है। एक समय था जब सिफ़ लिखित दस्तावेजों को ही प्रामाणिक स्रोत माना जाता था। लिखित दस्तावेजों को सत्यापित किया जा सकता था, उनका हवाला दिया जा सकता था और उन्हें जॉचा जा सकता था। मौखिक साथ्य को एक वैध स्रोत ही नहीं माना जाता था। आखिर उसके सत्यापन या जॉच की गारंटी कौन लेता? मौखिक परंपरा में अविश्वास की यह स्थिति अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। लेकिन मौखिक परंपरा का अभिनव प्रयोग करके ऐसे अनुभवों को सामने लाया गया है जो दूसरे किसी दस्तावेज्ज से प्रकट नहीं होते।
इस साल की किताब से आप इतिहासकारों की दुनिया में प्रवेश करेंगे, उनके साथ नए सूत्रों की तलाश करेंगे और देखेंगे कि वे किस तरह से अतीत के साथ संवाद करते हैं। आप देखेंगे कि वे किस तरह से स्रोतों से सार्थक जानकारी ढूँढ़ निकालते हैं, अभिलेखों को पढ़ते हैं, पुरास्थलों की खुदाई करते हैं, मनकों और हड़ियों के अर्थ निकालते हैं, महाकाव्यों की व्याख्या करते हैं, स्तूपों और इमारतों का निरीक्षण करते हैं, चित्रों और तसवीरों का परीक्षण करते हैं, पुलिस की रपट और राजस्व के दस्तावेजों की व्याख्या करते हैं और अतीत की आवाजों को सुनते हैं। हर विषयवस्तु एक विशेष किस्म के स्रोत की खासियत और संभावनाओं पर विचार करेगी। यह चर्चा करेगी कि कोई स्रोत क्या बता सकता है और क्या नहीं।
भारतीय इतिहास के कुछ विषय पुस्तक का यह भाग 1 है। भाग 2 और भाग 3 इसी क्रम में होंगे।
नीलाद्रि भट्टाचार्य
मुख्य सलाहकार
इतिहास
अध्यक्ष, सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक सलाहकार समिति
हरि वासुदेवन, प्रोफेसर, इतिहास विभाग, कलकता विश्वविद्यालय, कोलकाता
मुख्य सलाहकार
नीलाद्रि भट्टाचार्य, प्रोफेसर, इतिहास अध्ययन केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली (विषय 9)
सलाहकार
कुमकुम रॉय, एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास अध्ययन केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली (विषय 2)
मोनिका जुनेजा, गेस्ट प्रोफेसर, इस्टीट्यूट फूरगेशीख्ट (इतिहास संबंधी अध्ययन के लिए संस्था), विएना, ऑस्ट्रिया
सदस्य
उमा चक्रवर्ती, रीडर (अवकाशप्राप्त), इतिहास, मिरांडा हाऊस, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली (विषय 4)
कुणाल चक्रवर्ती, प्रोफेसर, इतिहास अध्ययन केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली (विषय 3)
जया मेनन, रीडर, इतिहास विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ (विषय 1)
नजफ्र हैदर, एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास अध्ययन केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली
पाथों दत्ता, रीडर, इतिहास विभाग, जाकिर हुसैन कॉलेज (सांध्य कक्षाएँ), दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
प्रभा सिंह, पी.जी.टी., केंद्रीय विद्यालय, ओल्ड कैंट, तेलियरगंज, इलाहाबाद
फरहत हसन, रीडर, इतिहास विभाग, अलीगढ़ (विषय 5)
बीबा सोब्ली, पी. जी.टी., मॉडर्न स्कूल, बाराखंबा रोड, नयी दिल्ली
मुज्ञाप्फ़कर आलम, प्रोफेसर, दक्षिण-एशियाई इतिहास, शिकागो विश्वविद्यालय, शिकागो, यू.एस.ए.
मीनाक्षी खना, रीडर (इतिहास), इद्रप्रस्थ कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली (विषय 6)
रजत दता, प्रोफेसर, इतिहास अध्ययन केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली (विषय 8)
रामचंद्र गुहा, स्वतंत्र लेखक, मानवविज्ञानी एवं इतिहासकार, बंगलौर (विषय 11)
रश्म पालीवाल, एकलव्य, कोठी बाजार, होशंगाबाद
रुद्वरांगशू मुखर्जीं, कार्यकारी संपादक, ‘दि टेलीग्राफ़’, कोलकाता (विषय 10)
विजया रामास्वामी, प्रोफेसर, इतिहास अध्ययन केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली (विषय 7)
सी.एन. सुब्रमण्यम, एकलव्य, कोठी बाजार, होशंगाबाद (विषय 7)
स्मिता सहाय भट्राचार्य, पी. जी. टी., ब्लू बेल्स स्कूल, कैलाश कॉलोनी, नयी दिल्ली
सुमित सरकार, प्रोफेसर-इतिहास (अवकाशप्राप्त), दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली (विषय 12)
अनुवादक
अनिल सेठी
पी.के. बसंत, रीडर, इतिहास एवं संस्कृति विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नयी दिल्ली
शालिनी शाह, रीडर, इंद्रप्रस्थ कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
संजय शर्मा, लेकचरर, आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
सीमा एस. ओझा
हीरामन तिवारी, असिस्टेंट प्रोफेसर, इतिहास अध्ययन केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली
सदस्य-समन्वयक
अनिल सेठी, प्रोफेसर, सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, नयी दिल्ली
सीमा एस. ओझा, लेक्चर, सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, नयी दिल्ली
आभार
यह पुस्तक, भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1, बहुत सारी चर्चाओं के बाद प्रकाश में आई है। ये चर्चाएँ विषय-विशेषजों, विश्वविद्यालयों के लेखकों, स्कूल के अध्यापकों तथा एन.सी.ई.आर.टी. के व्यावसायिक विशेषजों के बीच लगातार होती रहीं। हम उन सभी के आभारी हैं जिन्होंने उत्साहपूर्वक इन चर्चाओं में हिस्सा लिया। पुस्तक सामूहिक बौढ़िक संसाधनों और अनुभवों का ही परिणाम है।
अध्यायों के प्रारूपों पर कई लोगों ने अपनी टिप्पणियाँ दीं, इससे अनेक मुद्दे स्पष्ट हुए और पांडुलिपि के सुधार में मदद मिली। खासतौर पर हम अपने युवा पाठकों, मीरा एवं संध्या विश्वनाथन के शुक्रगुज्ञार हैं जिनके सुझावों व टिप्पणियों की वजह से प्रस्तुति ज्यादा प्रभावी बन पाई। बैशाख चक्रवर्ती ने हमें प्रोत्साहित किया। निगरानी समिति के सदस्यों प्रोफेसर जे.एस. ग्रेवाल और शोभा वाजपेयी जी के सुझाव अत्यंत महत्वपूर्ण रहे।
प्रोफेसर बी.डी. चट्टोपाध्याय ने अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के बावजूद इस पुस्तक के लिए समय निकाला और आलोचनात्मक सलाह दी। प्रोफेसर रणबीर चक्रवर्ती, प्रोफेसर उपिन्दर सिंह एवं डॉ. सुप्रिया वर्मा ने भी मूल्यवान सुझाव दिए। डॉ. नसीम अख्तर, श्री वीरेंद्र बांगरू और डॉ. सुरेश मिश्रा ने चित्रों और लिखित सामग्री के कुछ विशेष पहलुओं पर सलाह दी। सुश्री समीरा वर्मा ने दृश्य और लेखन संबंधी शोध में लगातार त्वरित सहायता दी।
हम उन सभी संस्थानों और व्यक्तियों को धन्यवाद देना चाहंगे जिनसे हमें चित्र-मानचित्र आदि प्राप्त हुए : अमेरिकन इस्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज, गुडङगाँव, भारतीय पुराताल्विक सर्वेक्षण, सास्कृतिक स्त्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन और राष्ट्रीय संग्रहालय। प्रोफेसर प्रेगरी एल. पोशेल से प्राप्त चित्र संबंधी सामग्री विषय एक में प्रयोग की गई है। राष्ट्रीय संग्रहालय के श्री आर.आर. एस. चौहान और श्री जे.सी. ग्रोवर एवं सी.आई.ई.टी., एन.सी.ई.आर.टी. के श्री वाई.के. गुप्ता की मदद से राष्ट्रीय संग्रहालय की पुरावस्तुओं की तस्वीरें ली जा सकी है। हम इन सभी के विशेष आभारी है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के श्री के. वर्गिज्ञ ने इस पुस्तक के लिए मानचित्र बनाए।
श्रीमती श्यामा वार्नर ने इस पुस्तक के अंग्रेजी संस्करण की कॉपी एडिंटिंग व प्रूफ रीडिंग की। आर्ट क्रियेशंस, नयी दिल्ली की रितु टोपा व अनिमेश राँय जी ने पुस्तक को डिज्ञाइन किया। इस काम से जुड़े धीरज, ध्यान और लगन के लिए हम इनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं।
हम श्री एल्बनस टिकर्ता और श्री मनोज हल्दर को भी उनके तकनीकी सहयोग और मदद के लिए धन्यवाद देना चाहेंगे। वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, नयी दिल्ली के अवकाशप्राप्त अनुसंधान अधिकारी (इतिहास एवं पुरातत्व) राजेन्द्र प्रसाद तिवारी ने पुस्तक के हिंदी अनुवाद में तकनीकी शब्दों को शुढ़ बनाने में योगदान दिया। हिंदी टाइपिंग का कार्य विजय कंघ्पूटर, दिल्ली द्वारा किया गया। गिरीश गोयल और सरिता किमोठी डी.टी.पी. ऑपरेटर; मनोज मोहन कॉपी एडीटर ने इसमें सहयोग दिया। हम इन सभी के प्रति अपना आभार व्यक्त करते हैं।
परिषद्, इस संस्करण के पुनर्स्योजन के लिए पाठ्यक्रमों, पाठ्यपुस्तकों एवं विषय सामग्री के विश्लेषण हेतु दिए गए महत्वपूर्ण सहयोग के लिए उमेश अशोक कदम, प्रोफेसर, सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज़, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, नयी दिल्ली; सुनील कुमार सिंह, पी.जी.टी., इतिहास, केंद्रीय विद्यालय, ए.एफ.एस., तुगलकाबाद, महरौली बदरपुर रोड़, नयी दिल्ली; कृष्णा रंजन, पी.जी.टी. इतिहास, केंद्रीय विद्यालय, विकासपुरी, विलेज हस्तसाल, उत्तम नगर, दिल्ली; डॉ. अर्चना वर्मा, इतिहास विभाग, हिंदू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली; श्रुति मिश्रा, पी.जी.टी. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास, दिल्ली पब्लिक स्कूल, आर.के. पुरम, सेक्टर 12, नयी दिल्ली; गौरी श्रीवास्तव, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, डी.ई.एस.एस., एन.सी.ई.आर.टी., नयी दिल्ली; प्रत्युश के. मंडल, प्रोफेसर, डी.ई.एस.एस., एन.सी.ई.आर.टी., नयी दिल्ली; सीमा एस. ओझा, प्रोफेसर, डी.ई.एस.एस., एन.सी.ई.आर.टी., नयी दिल्ली; डॉ. शरद कुमार पांडेय, डी.सी.एस. एंड डी., एन.सी.ई.आर.टी., नयी दिल्ली के प्रति आभार व्यक्त करती है।
अंततः इस पुस्तक का प्रयोग करने बालों के सुझाव आर्मत्रित हैं जिससे हमें इस पुस्तक के आगे आने बाले संस्करणों को सुधारने में मदद मिलेगी।
भाग 1
विषय एक 1
ईटें, मनके तथा अस्थियाँ
हड़पा सभ्यता
विषय दो 28
राजा, किसान और नगर
आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ
(लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी)
विषय तीन 53
बंधुत्व, जाति तथा वर्ग
आरंभिक समाज
(लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी)
विषय चार 82
विचारक, विश्वास और इमारतें
सांस्कृतिक विकास
(लगभग 600 ईसा पूर्व से ईसा संवत् 600 तक)

भाग 2*
विषय पाँँच
यात्रियों के नज़रिए
समाज के बारे में उनकी समझ
(लगभग दसवीं से सत्रहवीं सदी तक)
विषय छः:
भक्ति-सूफी परंपराएँ
धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रब्दा ग्रंथ
(लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी तक)

विषय सात
एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर
(लगभग चौदहवीं से सोलहवीं सदी तक)
विषय आठ
किसान, ज़मींदार और राज्य
कृषि समाज और मुगल साम्राज्य
(लगभग सोलहवीं और सत्रहवीं सदी)
भाग 3*
विषय नौ
उपनिवेशवाद और देहात
सरकारी अभिलेखों का अध्ययन
विषय दस
विद्रोही और राज
1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान
विषय ग्यारह
महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन
सविनय अवज्ञा और उससे आगे
विषय बारह
संविधान का निर्माण
एक नए युग की शुरुआत

इस पुस्तक का कैसे प्रयोग किया जाए?
यह पुस्तक भारतीय इतिहास के कुछ विषय का भाग 1 है। भाग 2 और भाग 3 इसी क्रम में होंगे।
संक्षेप में अर्थ
अतिरिक्त जानकारी विस्तृत परिभाषाएँ
यह सामग्री परीक्षा में मूल्यांकन हेतु नहीं है। यह केवल समझने की प्रक्रिया पुख्ता बनाने और उसकी मदद करने के लिए है।
स्रोत
(ग) स्त्रोत अलग तरह के बॉक्स में दिए गए हैं। तरह-तरह की लिखित सामग्री एवं अभिलेखों से अंश इनके अंतर्गत दिए गए हैं। लिखित साक्ष्यों के साथ ही चित्रों के साक्ष्य उन सुरागों से परिचित कराएँगे जिनका इतिहासकार इस्तेमाल करते हैं। आप यह भी देखेंगे कि इतिहासकार इनका विश्लेषण कैसे करते हैं। अंतिम परीक्षा में समान/मिलती-जुलती सामग्री के अंश या फिर चित्र दिए जा सकते हैं। इस तरह आपको ऐसी सामग्री के प्रयोग का अवसर मिलेगा।
☑ पाठ के अंतर्गत दो तरह के प्रश्न दिए गए हैं।
(क) पीले रंग के बॉक्स में वे प्रश्न दिए गए हैं जिनका मूल्यांकन हेतु अभ्यास किया जा सकता है।
(ख) चर्चा कीजिए... के अंतर्गत वे प्रश्न दिए गए हैं जो मूल्यांकन के लिए नहीं हैं।
☑ प्रत्येक अध्याय के अंत में चार तरह के अभ्यास कार्य दिए गए हैं :

लघु प्रश्न

लघु निबंध

मानचित्र कार्य

परियोजना कार्य
ये अंतिम परीक्षा व मूल्यांकन हेतु अभ्यास के लिए दिए गए हैं।
आशा है आपको इस पुस्तक का प्रयोग दिलचस्प लगेगा।
