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Unit4

Chapter 4

12095CH04
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विषय चार

विचारक, विश्वास और इमारतें

सांस्कृतिक विकास (ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक)

चित्र 4.1
साँँची की एक मूर्ति
चित्र 4.1 साँँची की एक मूर्ति

इस अध्याय में हम एक हज्ञार साल लंबी यात्रा पर जाएँगे। इसमें हम दार्शनिकों के बारे में पढ़ेगे और यह जानने की कोशिश करेंगे कि उन्होंने समाज में अपनी स्थिति को समझने के क्या प्रयास किए। हम यह भी देखेंगे कि उनके विचार किस तरह से मौखिक और लिखित परंपराओं में संग्रहित हुए तथा उन्हें स्थापत्य और मृर्तिकला के माध्यम से कैसी अभिव्यक्ति मिली। ये सब जनता पर इन विचारकों के स्थायी प्रभाव को दर्शाते हैं। हालाँकि हम बौढ़ धर्म का विशेष अध्ययन करेंगे, यह ध्यान देने की बात है कि यह परंपरा अकेली विकसित नहीं हुई। दूसरी कई परंपराएँ थीं जो एक-दूसरे के साथ लगातार वाद-विवाद और संवाद चला रही थीं।

इन रोमांचक विचारों और विश्वासों की दुनिया के पुनर्निर्माण के लिए इतिहासकार जिन स्रोतों का इस्तेमाल करते हैं उनमें बौढ़, जैन और बाह्पण ग्रंथों के अलावा इमारतों और अभिलेखों जैसे प्रभृत मात्रा में उपलब्ध भौतिक साक्ष्य भी शामिल हैं। उस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित है साँँची का स्तूप। यह स्तूप इस अध्याय के अध्ययन का एक प्रमुख केंद्र-बिंदु है।

चित्र 4.2

शाहजहाँ बेगम

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1. साँची की एक झलक

साँची उन्नीसवीं सदी में

भोपाल राज्य के प्राचीन अवशेषों में सबसे अद्भुत साँँची कनखेड़ा की इमारतें हैं। भोपाल से बीस मील उत्तर-पूर्व की तरफ़ एक पहाड़ी की तलहटी में बसे इस गाँव को हम कल देखने गए थे। हमने पत्थर की वस्तुओं, बुढ़ की मूर्तियों और एक प्राचीन तोरणढ्वार का निरीक्षण किया... ये अवशेष यूरोप के सज्जनों को विशेष रुचिकर लगते हैं जिनमें मेजर अलेक्जौंडर कनिंधम एक हैं। मेजर अलेक्जौंडर कनिंधम ने... इस इलाके में कई हफ्तों तक रुक कर इन अवशेषों का निरीक्षण किया। उन्होंने इस जगह के चित्र बनाए, वहाँ के अभिलेखों को पढ़ा और गुंबदनुमा ढाँँचे के बीचोंबीच खुदाई की। उन्होंने इस खोज के निष्कर्षों को एक अंग्रेज्ञी पुस्तक में लिखा है...

भोपाल की नवाब (शासनकाल 1868-1901), शाहजहाँ बेगम की आत्मकथा ताज-उल-इकबाल तारीख भोपाल (भोपाल का इतिहास) से। 1876 में एच.डी. बारस्टो ने इसका अनुवाद किया।

उन्नीसवीं सदी के यूरोपियों में साँँची के स्तूप को लेकर काफ़ी दिलचस्पी थी। फ्रांसीसियों ने सबसे अच्छी हालत में बचे साँँची के पूर्वी तोरणद्वार को फ्रांस के संग्रहालय में प्रदर्शित करने के लिए शाहजहाँ बेगम से फ्रांस ले जाने की इजाज्जत माँँगी। कुछ समय के लिए अंग्रेज्ञों ने भी ऐसी ही कोशिश की। सौभाग्यवश फ्रांसिसी और अंग्रेज्ञ दोनों ही बड़ी सावधानी से बनाई प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए। इस प्रकार मूल कृति भोपाल राज्य में अपनी जगह पर ही रही।

भोपाल के शासकों, शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम, ने इस प्राचीन स्थल के रख-रखाव के लिए धन का अनुदान दिया। आश्चर्य नहीं कि जॉन मार्शल ने साँँची पर लिखे अपने महत्वपूर्ण ग्रंथों को सुल्तानजहाँ को समर्पित किया। सुल्तानजहाँ बेगम ने वहाँ पर एक संग्रहालय और अतिथिशाला बनाने के लिए अनुदान दिया। वहाँ रहते हुए ही जॉन मार्शल ने उपर्युक्त पुस्तकें लिखीं। इस पुस्तक के विभिन्न खंडों के प्रकाशन में भी सुल्तानजहाँ बेगम ने अनुदान दिया। इसलिए यदि यह स्तूप समूह बना रहा है तो इसके पीछे कुछ विवेकपूर्ण निर्णयों की बड़ी भूमिका है। शायद हम इस मामले में भी भाग्यशाली रहे हैं कि इस स्तूप पर किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज्ञर नहीं पड़ी। यह उन लोगों से भी बचा रहा जो ऐसी चीजों को यूरोप के संग्रहालयों में ले जाना चाहते थे। बौढ़ धर्म के इस महत्वपूर्ण केंद्र की खोज से आरंभिक बौढ़ धर्म के बारे में हमारी समझ में महत्वपूर्ण बदलाव आए। आज यह जगह भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के सफल मरम्मत और संरक्षण का जीता जागता उदाहरण है।

चित्र 4.3

साँँची का महान स्तूप

यदि आप दिल्ली से भोपाल की रेलयात्रा करेंगे तो आप एक पहाड़ी के ऊपर एक मुकुट जैसे इस खृबसूरत स्तूप को देखेंगे। यदि आप गार्ड को सूचित करेंगे तो वह साँची के छोटे से स्टेशन पर दो मिनट के लिए गाड़ी को रोक देंगे – बस इतना समय कि आप गाड़ी से उतर जाएँ। पहाड़ी पर चढ़ते हुए आप पूरे स्तूप समूह को देख सकते हैं – एक विशाल गोलार्थ ढाँचा और कई दूसरी इमारतें जिनमें पाँचवीं सदी में बना एक मंदिर भी शामिल है।

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→ चर्चा कीजिए...

शाहजहाँ बेगम द्वारा किए गए वर्णन की तुलना चित्र 3 से कीजिए। इनमें आप क्या समानताएँ और असमानताएँ पाते हैं?

स्रोत 1

अग्नि की प्रार्थना

यहाँ पर ऋष्टगवेद से लिए गए दो छंद हैं जिनमें अग्निदेव का आह्वान किया गया है :

हे शक्तिशाली देव, आप हमारी आहुति देवताओं तक ले जाएँ। हे बुद्धिमंत, आप तो सबके दाता हैं। हे पुरोहित, हमे खूब सारे खाद्य पदार्थ दें।

हे अग्नि यज्ञ के द्वारा हमारे लिए प्रचुर धन ला दें। हे अग्नि, जो आपकी प्रार्थना करता है उसके लिए आप सदा के लिए पुष्टिवर्थक अद्भुत गाय ला दें। हमें एक पुत्र मिले जो हमारे वंश को आगे बढ़ाए...

इस तरह के छंद एक खास तरह की संस्कृत में रचे गए थे जिसे वैदिक संस्कृत कहा जाता था। ये स्रोत पुरोहित परिवारों के लोगों को मौखिक रूप में सिखाए जाते थे।

यज्ञ के उद्देश्यों की सूची बनाइए।

आखिर इस इमारत का क्या महत्व है? यह टीला क्यों बनाया गया और इसके अंदर क्या था? इसके चारों ओर पत्थर की रेलिंग क्यों बनाई गई? इस स्तूप-समूह को किसने बनवाया या इसके लिए धन किसने दिया? इसकी “खोज” कब की गई? ग्रंथों, मूर्तियों, स्थापत्य कला और अभिलेखों के अध्ययन के द्वारा हम इस रोचक इतिहास की खोज कर सकते हैं। आइए, हम प्रारंभिक बौढ़ धर्म की पृष्ठभूमि के अन्वेषण से शुरुआत करते हैं।

2. पृष्ठभूमि

यज्ञ और विवाद

ईसा पूर्व प्रथम सहस्त्राब्दि का काल विश्व इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इस काल में ईरान में जरथुस्त्र जैसे चितक, चीन में खुंगत्सी, यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु और भारत में महावीर, बुढ़ और कई अन्य चितकों का उद्धभव हुआ। उन्होंने जीवन के रहस्यों को समझने का प्रयास किया। साथ-साथ वे इनसानों और विश्व व्यवस्था के बीच रिश्ते को समझने की कोशिश कर रहे थे। यही वह समय था जब गंगा घाटी में नए राज्य और शहर उभर रहे थे और सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में कई तरह के बदलाव आ रहे थे (अध्याय 2 तथा 3)। ये मनीषी इन बदलते हालात को भी समझने की कोशिश कर रहे थे।

2.1 चज्ञों की परंपरा

चिंतन, धार्मिक विश्वास और व्यवहार की कई धाराएँ प्राचीन युग से ही चली आ रही थों। पूर्व वैदिक परंपरा जिसकी जानकारी हमें 1500 से 1000 ईसा पूर्व में संकलित ऋष्टवेद से मिलती है, वैसी ही एक प्राचीन परंपरा थी। ऋष्टवेद अग्नि, इंद्र, सोम आदि कई देवताओं की स्तुति का संग्रह है। यज्ञों के समय इन स्रोतों का उच्चारण किया जाता था और लोग मवेशी, बेटे, स्वास्थ्य, लंबी आयु आदि के लिए प्राथना करते थे।

शुरू-शुरू में यज्ञ सामूहिक रूप से किए जाते थे। बाद में (लगभग 1000 ईसा पूर्व -500 ईसा पूर्व) कुछ यज्ञ घरों के मालिकों द्वारा किए जाते थे। राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा किया करते थे। इनके अनुष्ठान के लिए उन्हें ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भर रहना पड़ता था।

2.2 नए प्रश्न

उपनिषदों (छठी सदी ई.पू. से) में पाई गई विचारधाराओं से पता चलता है कि लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे। क्या पुनर्जन्म अतीत के कर्मां के कारण होता था? ऐसे मुद्दों पर पुरज्जोर बहस होती थी। मनीषी परम यथार्थ की प्रकृति को समझने और अभिव्यक्त करने में लगे थे। वैदिक परंपरा से बाहर के कुछ दार्शनिक यह सवाल उठा रहे थे कि सत्य एक होता है या अनेक। लोग यज्ञों के महत्व के बारे में भी चिंतन करने लगे।

2.3 वाद-विवाद और चर्चाएँ

समकालीन बौढ़ ग्रंथों में हमें 64 संप्रदायों या चिंतन परंपराओं का उल्लेख मिलता है। इससे हमें जीवंत चर्चाओं और विवादों की एक झाँकी मिलती है। शिक्षक एक जगह से दूसरी जगह घूम-घूम कर अपने दर्शन या विश्व के विषय में अपनी समझ को लेकर एक-दूसरे से तथा सामान्य लोगों से तर्क-वितर्क करते थे। ये चर्चाएँ कुटागारशालाओं (शब्दार्थ- नुकीली छत वाली झोपड़ी) या ऐसे उपवनों में होती थीं जहाँ घुमक्कड़ मनीषी ठहरा करते थे। यदि एक शिक्षक अपने प्रतिद्धंद्री को अपने तर्कों से समझा लेता था तो बह अपने अनुयायियों के साथ उसका शिष्य बन जाता था इसलिए किसी भी संप्रदाय के लिए समर्थन समय के साथ बढ़ता-घटता रहता था।

इनमें से कई शिक्षक जिनमें महावीर और बुढ़ शामिल हैं, वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाते थे। उन्होने यह भी माना कि जीवन के दुःखों से मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता था। यह समझ ब्राह्णवाद से बिलकुल भिन्न थी। जैसा कि हमने देखा ब्राह्णवाद यह मानता था कि किसी व्यक्ति का अस्तित्व उसकी जाति और लिंग से निर्धारित होता था।

स्रोत 2

उपनिषद की कुछ पंक्तियाँ

यहाँ पर संस्कृत भाषा में रचित लगभग छठी सदी ईसा पूर्व के छंदोग्य उपनिषद से दो श्लोक दिए गए हैँ :

आत्मा की प्रकृति

मेरी यह आत्मा धान या यव या सरसों या बाजरे के बीज की गिरी से भी छोटी है। मन के अंदर छुपी मेरी यह आत्मा पृथ्वी से भी विशाल, क्षितिज से भी विस्तृत, स्वर्ग से भी बड़ी है और इन सभी लोकों से भी बड़ी है।

सच्चा यज्ञ

यह (पवन) जो बह रहा है, निश्चय ही एक यज्ञ है... बहते-बहते यह सबको पवित्र करता है; इसलिए यह वास्तव में यज्ञ है।

बौढ़ ग्रंथ किस प्रकार तैयार और संरक्षित किए जाते थे

बुढ़ (अन्य शिक्षकों की तरह) चर्चा और बातचीत करते हुए मौखिक शिक्षा देते थे। महिलाएँ और पुरुष (शायद बच्चे भी) इन प्रवचनों को सुनते थे और इन पर चर्चा करते थे। बुढ़ के किसी भी संभाषण को उनके जीवन काल में लिखा नहीं गया। उनकी मृत्यु के बाद (पाँङवीं-चौथी सदी ई.पू.) उनके शिष्यों ने ‘ज्येष्ठों’ या ज्यादा वरिष्ठ श्रमणों की एक सभा वेसली (बिहार स्थित वैशाली का पालि भाषा में रूप) में बुलाई। वहाँ पर ही उनकी शिक्षाओं का संकलन किया गया। इन संग्रहों को ‘त्रिपिटक’ (शब्दार्थ भिन्न प्रकार के ग्रंथों को रखने के लिए ‘तीन टोकरियाँ’) कहा जाता था। पहले उन्हें मौखिक रूप से ही संप्रेषित किया जाता था। बाद में लिखकर विषय और लंबाई के अनुसार वर्गीकरण किया गया।

विनय पिटक में संघ या बौढ़ मठों में रहने वाले लोगों के लिए नियमों का संग्रह था। बुढ़ की शिक्षाएँ सुत्त पिटक में रखी गई और दर्शन से जुड़े विषय अभिधम्म पिटक में आए। हर पिटक के अंदर कई ग्रंथ होते थे। बाद के युगों में बौढ़ विद्वानों ने इन ग्रंथों पर टीकाएँ लिखीं।

जब बौढ़ धर्म श्रीलंका जैसे नए इ्लाकों में फैला दीपवंश (ढ्रीप का इतिहास) और महावंश (महान इतिहास) जैसे क्षेत्र-विशेष के बौढ़ इतिहास को लिखा गया। इनमें से कई रचनाओं में बुढ़ की जीवनी लिखी गई है। ज्यादातर पुराने ग्रंथ पालि में हैं। बाद के युगों में संस्कृत में ग्रंथ लिखे गए।

जब बौढ़ धर्म पूर्व एशिया में फैला तब फा-शिएन और श्वैन त्सांग जैसे तीर्थयात्री बौढ़ ग्रंथों की खोज में चीन से भारत आए। ये पुस्तकें वे अपने देश ले गए जहाँ विद्धानों ने इनका अनुवाद किया। हिन्दुस्तान के बौढ़ शिक्षक भी दूर-दराज के देशों में गए। बुढ़ की शिक्षाओं का प्रसार करने के लिए वे कई पुस्तकें भी अपने साथ ले गए। कई सदियों तक ये पांडुलिपियाँ एशिया के भिन्न-भिन्न इलाकों में स्थित बौढ़ विहारों में संरक्षित थीं। पालि, संस्कृत, चीनी और तिब्बती भाषाओं में लिखे इन ग्रंथों से आधुनिक अनुवाद तैयार किए गए हैं।

चित्र 4.4संस्कृत में लिखी एक बौछ पांडुलिपि, लगभग 12वीं शताब्दी
चित्र 4.4संस्कृत में लिखी एक बौछ पांडुलिपि, लगभग 12वीं शताब्दी

नियत्तिवादी और भौतिकवादी

यहाँ हम सुत्त पिटक से लिया गया दृष्टांत दे रहे हैं। इसमें मगध के राजा अजातसतु और बुद्ध के बीच बातचीत का वर्णन किया गया है।

एक बार राजा अजातसत्तु बुढ़ के पास गए और उन्होंने मकखलि गोसाल नामक एक अन्य शिक्षक की बातें बताई :

“हालाँकि बुद्धिमान लोग यह विश्वास करते हैं कि इस सद्गुण से... इस तपस्या से मैं कर्म प्राप्ति करूँगा... मूर्ख उन्हीं कार्यों को करके धीरे-धीरे कर्म मुक्ति की उम्पीद करेगा। दोनों में से कोई कुछ नहीं कर सकता। सुख और दुख मानो पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं। इसे संसार में बदला नहीं जा सकता। इसे बढ़ाया या घटाया नहीं जा सकता। जैसे धागे का गोला फेंक देने पर लुढ़कते-लुढ़कते अफनी पूरी लंबाई तक खुलता जाता है उसी तरह मूर्ख और विद्धान दोनों ही पूर्व निर्धारित रास्ते से होते हुए दुःखों का निदान करेंगे।”

और अजीत केसकंबलिन् नामक दार्शनिक ने यह उपदेश दिया :

“हे राजनु! दान, यज्ञ या चढ़ावा जैसी कोई चीज्ञ नहीं होती... इस दुनिया या दूसरी दुनिया जैसी कोई चीज्ञ नहीं होती...

मनुष्य चार तत्वों से बना होता है। जब वह मरता है तब मिट्री वाला अंश पृथ्वी में, जल वाला हिस्सा जल में, गर्मी वाला अंश आग में, साँस का अंश वायु में वापिस मिल जाता है और उसकी इंद्रियाँ अंतरिक्षा का हिस्सा बन जाती है...

दान देने की बात मूर्खों का सिद्धांत है, खोखला झूठ है... मूर्ख हो या विद्धान दोनों ही कट कर नष्ट हो जाते हैं। मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता।"

प्रथम गद्यांश के उपदेशक आजीविक परंपरा के थे। उन्हें अक्सर नियतिवादी कहा जाता है-एसे लोग जो विश्वास करते थे कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है। द्वितीय गद्यांश के उपदेशक लोकायत परंपरा के थे जिन्हें सामान्यतः भौतिकवादी कहा जाता है। इन दार्शनिक परंपराओं के ग्रंथ नष्ट हो गए हैं। इसलिए हमें अन्य परंपराओं से ही उनके बारे में जानकारी मिलती है।

क्या इन लोगों को नियतिवादी या भौतिकवादी कहना आपको उचित लगता है?

→ चर्चा कीजिए...

जब लिखित सामग्री उपलब्ध न हो अथवा किन्हीं वजहों से बच न पाई हो तो ऐसी स्थिति में विचारों और मान्यताओं के इतिहास का पुनर्निर्माण करने में क्या समस्याएँ सामने आती हैं?

चित्र 4.5
चित्र 4.5

मथुरा से प्राप्त तीर्थिकर की एक मूर्ति, लगभग तीसरी शताब्दी ई.

स्रोत 4

3. लौकिक सुखों से आगे

महावीर का संदेश

जैनों के मूल सिद्धांत छठी सदी ईसा पूर्व में वर्धमान महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे। जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 शिक्षक हो चुके थे, उन्हें तीर्थिकर कहा जाता हैः : यानी कि वे महापुरुष जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं।

जैन दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा यह है कि संपूर्ण विश्व प्राणवान है। यह माना जाता है कि पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन होता है। जीवों के प्रति अहिंसा – खासकर इनसानों, जानवरों, पेड्ड-पौथों और कीड़े-मकोड़ों को न मारना जैन दर्शन का केंद्र बिंदु है। वस्तुतः जैन अहिंसा के सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया है। जैन मान्यता के अनुसार जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म के द्वारा निर्धारित होता है। कर्म के चक्र से मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या की जरूरत होती है। यह संसार के त्याग से ही संभव हो पाता है। इसीलिए मुक्ति के लिए विहारों में निवास करना एक अनिवार्य नियम बन गया। जैन साधु और साध्वी पाँच ब्रत करते थे : हत्या न करना, चोरी नहीं करना, झूठ न बोलना, ब्रहचर्य (अमृष्पा) और धन संग्रह न करना।

महल के बाहर की दुनिया

जैसे बुढ़ के उपदेशों को उनके शिष्यों ने संकलित किया वैसे ही महावीर के शिष्यों ने किया। अक्सर ये उपदेश कहानियों के रूप में प्रस्तुत किए जाते थे जो आम लोगों को आकर्षित करते थे। यह उदाहरण उत्तराध्ययन सूत्र नामक एक ग्रंथ से लिया गया है। इसमें कमलावती नामक एक महारानी अपने पति को संन्यास लेने के लिए समझा रही है :

अगर संपूर्ण विश्व और वहाँ के सभी खज्ञाने तुम्हारे हो जाएँ तब भी तुम्हें संतोष नहीं होगा, न ही यह सारा कुछ तुम्हें बचा पाएगा। हे राजन्! जब तुम्हारी मृत्यु होगी और जब सारा धन पीछे छूट जाएगा तब सिर्फ धर्म ही, और कुछ भी नहीं, तुम्हारी रक्षा करेगा। जैसे एक चिड़िया पिंजरे से नफरत करती है वैसे ही मैं इस संसार से नफरत करती हूँ। मैं बाल-बच्चे को जन्म न देकर निष्काम भाव से, बिना लाभ की कामना से और बिना द्रेष के एक साध्वी की तरह जीवन बिताऊँगी...

जिन लोगों ने सुख का उपभोग करके उसे त्याग दिया है, वायु की तरह ध्रमण करते हैं, जहाँ मन करे स्वतंत्र उड़ते हुए पश्चियों की तरह जाते हैं...

इस विशाल राज्य का परित्याग करो... इंद्रिय सुखों से नाता तोड़ो, निष्काम अपरिग्रही बनो, तत्पश्चात तेजमय हो घोर तपस्या करो...

महारानी के द्वारा दिया गया कौन सा तर्क आपको सबसे ज्यादा युक्तियुक्त लगता है?

3.1 जैन धर्म का विस्तार

धीरे-धीरे जैन धर्म भारत के कई हिस्सों में फैल गया। बौढ़ों की तरह ही जैन विद्वानों ने प्राकृत, संस्कृत, तमिल जैसी अनेक भाषाओं में काफ़ी साहित्य का सृजन किया। सैकड़ों वर्षों से इन ग्रंथों की पांडुलिपियाँ मांदिशों से जुड़े पुस्तकालयों में संरक्षित हैं।

धार्मिक परंपराओं से जुड़ी हुई सबसे प्राचीन मूर्तियों में जैन तीर्थिकरों के उपासकों द्वारा बनवाई गई मूर्तियाँ भारतीय उपमहाद्धीप के कई हिस्सों में पाई गई हैं।

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क्या बीसवीं सदी में अहिंसा की कोई प्रासंगिकता है?

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4. बुद्ध और ज्ञान की खोज

बुढ़ उस युग के सबसे प्रभावशाली शिक्षकों में से एक थे। सैकड़ों वर्षों के दौरान उनके संदेश पूरे उपमहाद्रीप में और उसके बाद मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया और जापान, श्रीलंका से समुद्र पार कर म्यौमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक फैले।

हम बुढ़ की शिक्षाओं के बारे में कैसे जानते हैं? इनकी पुनरचना का आधार था बौढ़ ग्रंथों का बहुत परिश्रम से संपादन, अनुवाद और विश्लेषण किया जाना। इतिहासकारों ने उनके जीवन के बारे में चरित लेखन से जानकारी इकटुरी की। इनमें से कई ग्रंथ बुढ़ के जीवन काल से लगभग सौ वर्षों के बाद लिखे गए। इनमें इस महान धर्मोपदेशक की याद को बनाए रखने की कोशिश की गई थी।

इन परंपराओं के अनुसार सिद्धार्थ (बुढ़ के बचपन का नाम) शाक्य कबीले के सरदार के बेटे थे। जीवन के कटु यथार्थों से दूर उन्हें महल की चारदीवारी के अंदर सब सुखों के बीच बड़ा किया गया। एक दिन

चित्र 4.6

चौदहवीं सदी के जैन ग्रंथ की पांडुलिपि का एक पन्ना

क्या आप इसकी लिपि को पहचान सकते हैं?

संतचरित्र किसी संत या धार्मिक नेता की जीवनी है। संतचरित्र संत की उपलब्धियों का गुणगान करते हैं, जो तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह सही नहीं होते। ये इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि ये हमें उस परंपरा के अनुयायियों के विश्वासों के बारे में बताते हैं।

उन्होंने अपने रथकार को उन्हें शहर घुमाने के लिए मना लिया। बाहरी दुनिया की उनकी पहली यात्रा काफ़ी पीड़ादायक रही। एक वृढ़ व्यक्ति को, एक बीमार को और एक लाश को देखकर उन्हें गहरा सदमा पहुँचा। उसी क्षण उन्हें यह अनुभृति हुई कि मनुष्य के शरीर का क्षय और अंत निश्चित है। उन्होंने एक गृहत्याग किए संन्यासी को भी देखा उसे मानो बुढ़ापे, बीमारी और मृत्यु से कोई परेशानी नहीं थी और उसने शांति प्राप्त कर ली थी। सिड्लार्थ ने निश्चय किया कि वे भी संन्यास का रास्ता अपनाएँगे। कुछ समय के बाद महल त्याग कर वे अपने सत्य की खोज में निकल गए।

सिद्धार्थ ने साधना के कई मार्गों का अन्वेषण किया। इनमें एक था शरीर को अधिक से अधिक कष्ट देना जिसके चलते वे मरते-मरते बचे। इन अतिवादी तरीकों को त्यागकर, उन्होंने कई दिन तक ध्यान करते हुए अंततः ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद से उन्हेंं बुढ्ध अथवा ज्ञानी व्यक्ति के नाम से जाना गया है। बाकी जीवन उन्होंने धर्म

या सम्यक जीवनयापन की शिक्षा दी।

चित्र 4.7

अमरावती (गुंटूर जिला, आंध्र प्रदेश) में लगभग 200 ईसवी की एक मूर्ति जिसमें बुब्ध को महल से जाते हुए दिखाया गया है।

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यदि आप बुद्ध के जीवन के बारे में नहीं जानते तो क्या आप मूर्ति को देखकर समझ पाते कि उसमें क्या दिखाया गया है?

5. बुद्ध की शिक्षाएँ

बुढ़ की शिक्षाओं को सुत्त पिटक में दी गई कहानियों के आधार पर पुनर्निर्मित किया गया है। हालौंकि कुछ कहानियों में उनकी अलौकिक शक्तियों का वर्णन है, दूसरी कथाएँ दिखाती हैं कि अलौकिक शक्तियों की बजाय बुढ़ ने लोगों को विवेक और तर्क के आधार पर समझाने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए, जब एक मरे हुए बच्चे की शोकमग्न माँ बुढ़ के पास आई तो उन्होंने बच्चे को जीवित करने के बजाय उस महिला को मृत्यु के अवश्यंभावी होने की बात समझायी। ये कथाएँ आम जनता की भाषा में रची गई थीं जिससे इन्हें आसानी से समझा जा सकता था।

बौढ़ दर्शन के अनुसार विश्व अनित्य है और लगातार बदल रहा है, यह आत्माविहीन (आत्मा) है क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं है। इस क्षणभंगुर दुनिया में दुरख मनुष्य के जीवन का अंतर्निहित तत्व है। घोर तपस्या और विषयासक्ति के बीच मध्यम मार्ग अपनाकर मनुष्य दुनिया के दुरखों से मुक्ति पा सकता है। बौढ़ धर्म की प्रारंभिक परंपराओं में भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था।

स्रोत 5

व्यवहार में बौढ़ धर्म

सुत्त पिटक से लिए गए इस उब्दरण में बुब्द्र सिंगल नाम के एक अमीर गृहपति को सलाह दे रहे हैं :

मालिक को अपने नौकरों और कर्मचारियों की पाँँच तरह से देखभाल करनी चाहिए... उनकी क्षमता के अनुसार उन्हें काम देकर, उन्हें भोजन और मज्रदूरी देकर, बीमार पड़ने पर उनकी परिचिर्या करके, उनके साथ सुस्वादु भोजन बॉटकर औरं समय-समय पर उन्हें छुट्टी देकर...

कुल के लोगों को पाँँच तरह से श्रमणों (जिन्होंने सांसारिक जीवन को त्याग दिया है) और ब्राह्मणों की देखभाल करनी चाहिए... कर्म, वचन और मन से अनुराग द्वारा, उनके स्वागत में हमेशा घर खुले रखकर और उनकी दिन-प्रतिदिन की ज़रूरतों की पूर्ति करके।

सिंगल को माता-पिता, शिक्षक और पत्नी के साथ व्यवहार के लिए भी ऐसे ही उपदेश दिए गए हैं।

आप सुझाव दीजिए कि माता-पिता, शिक्षकों और पत्नी के लिए किस तरह के निर्देश दिए गए होंगे।

→ चर्चा कीजिए...

बुढ़ द्वारा सिंगल को दी गई सलाह की तुलना असोक द्वारा उसकी प्रजा (अध्याय 2) को दी गई सलाह से कीजिए। क्या आपको कुछ समानताएँ और असमानताएँ नज्ञर आती हैं?

बुढ़ मानते थे कि समाज का निर्माण इनसानों ने किया था न कि ईश्वर ने। इसीलिए उन्होंने राजाओं और गृहपतियों (देखें अध्याय 2) को द्यावान और आचारवान होने की सलाह दी। ऐसा माना जाता था कि व्यक्तिगत प्रयास से सामाजिक परिवेश को बदला जा सकता था।

बुढ़ ने जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति, आत्म-ज्ञान और निर्वाण के लिए व्यक्ति-केंद्रित हस्तक्षेप और सम्यक कर्म की कल्पना की। निर्वाण का मतलब था अहं और इच्छा का खत्म हो जाना जिससे गृहत्याग करने वालों के दुख के चक्र का अंत हो सकता था। बौढ़ परंपरा के अनुसार अपने शिष्यों के लिए उनका अंतिम निर्देश था, “तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें खुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता छूँढ़ना है।”

6. बुद्ध के अनुयायी

धीरे-धीरे बुढ़ के शिष्यों का दल तैयार हो गया, इसलिए उन्होंने संघ की स्थापना की, ऐसे भिक्षुओं की एक संस्था जो धम्म के शिक्षक बन गए। ये श्रमण एक सादा जीवन बिताते थे। उनके पास जीवनयापन के लिए अत्यावश्यक चीज़ों के अलावा कुछ नहीं होता था। जैसे कि दिन में एक बार उपासकों से भोजन दान पाने के लिए वे एक कटोरा रखते थे। चौंकि वे दान पर निर्भर थे इसलिए उन्हें भिक्खु कहा जाता था।

शुरू-शुरू में सिफ्र पुरुष ही संघ में सम्मिलित हो सकते थे। बाद में महिलाओं को भी अनुमति मिली। बौढ़ ग्रंथों के अनुसार बुढ़ के प्रिय शिष्य आनंद ने बुढ़ को समझाकर महिलाओं के संघ में आने की अनुमति प्राप्त की। बुढ़ की उपमाता महाप्रजापति गोतमी संघ में आने वाली पहली भिकखुनी बनीं। कई स्त्रियाँ जो संघ में आई, वे धम्म की उपदेशिकाएँ बन गई। आगे चलकर वे थेरी बनी जिसका मतलब है ऐसी महिलाएँ जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया हो।

बुढ़ के अनुयायी कई सामाजिक वर्गों से आए। इनमें राजा, धनवान, गृहपति और सामान्य जन कर्मकार, दास, शिल्पी, सभी शामिल थे। एक बार संघ में आ जाने पर सभी को बराबर माना जाता था क्योंकि भिक्खु और भिक्खुनी बनने पर उन्हें अपनी पुरानी पहचान को त्याग देना पड़ता था। संघ की संचालन पढ़ति गणों और संघों की परंपरा पर आधारित थी। इसके तहत लोग बातचीत के माध्यम से एकमत होने की कोशिश करते थे। अगर यह संभव नहीं होता था तो मतदान ढ्वारा निर्णय लिया जाता था।

स्रोत 6

शेरीगाथा

यह अनूठा बौढ़ ग्रंथ सुत्त पिटक का हिस्सा है। इसमें भिक्खुनियों द्वारा रचित छंदों का संकलन किया गया है। इससे महिलाओं के सामाजिक और आध्यात्मिक अनुभवों के बारे में अंतर्दृष्टि मिलती है। पुन्ना नाम की एक दासी अपने मालिक के घर के लिए प्रतिदिन सुबह नदी का पानी लाने जाती थी। वहाँँ वह हर दिन एक ब्राह्मण को स्नान कर्म करते हुए देखती थी। एक दिन उसने ब्राह्मण से बात की। निम्नलिखित पद्य की रचना पुन्ना ने की थी जिसमें ब्राह्मण से उसकी बातचीत का वर्णन है :

मैं जल ले जाने वाली हूँ :

कितनी भी ठंड हो

मुझे पानी में उतरना ही है

सज़ा के डर से

या ऊँचे घरानों की स्त्रियों के कटु वाक्यों के डर से।

हे ब्राह्मण तुम्हें किसका डर है,

जिससे तुम जल में उतरते हो

(जबकि) तुम्हारे अंग ठंड से काँप रहे हैं?

ब्राह्मण बोले :

मैं बुराई को रोकने के लिए अच्छाई कर रहा हूँ;

बूढ़ा या बच्चा

जिसने भी कुछ बुरा किया हो

जल में स्नान करके मुक्त हो जाता है।

पुन्ना ने कहा :

यह किसने कहा है

कि पानी में नहाने से बुराई से मुक्ति मिलती है?...

वैसा हो तो सारे मंढ़क और कछुए स्वर्ग जाएँगे

साथ में पानी के साँप और मगरमच्छ भी!

इसके बदले में वे कर्म न करें

जिनका डर

आपको पानी की ओर खींचता है।

हे ब्राह्मण, अब तो रुक जाओ।

अपने शरीर को ठंड से बचाओ...

बुढ़ की कौन-सी शिक्षाएँ इस रचना में नज़र आती हैं?

चित्र 4.8

जल ले जाने वाली एक स्त्री, मथुरा, लगभग तीसरी शताब्दी ई.

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स्रोत 7

भिक्षुओं और भिक्खुनियों के लिए नियम

ये नियम विनय पिटक में मिलते हैं :

जब कोई भिक्खु एक नया कंबल या गलीचा बनाएगा तो उसे इसका प्रयोग कम से कम छः वर्षों तक करना पड़ेगा। यदि छः वर्ष से कम अवधि में वह बिना भिक्खुओं की अनुमति के एक नया कंबल या गलीचा बनवाता है तो चाहे उसने अपने पुराने कंबल/गलीचे को छोड़ दिया हो या नहीं – नया कंबल या गलीचा उससे ले लिया जाएगा और इसके लिए उसे अपराध स्वीकरण करना होगा।

यदि कोई भिक्खु किसी गृहस्थ के घर जाता है और उसे टिकिया या पके अनाज का भोजन दिया जाता हैं तो यदि उसे इच्छा हो तो वह दो से तीन कटोरा भर ही स्वीकार कर सकता है। यदि वह इससे ज्यादा स्वीकार करता है तो उसे अपना ‘अपराध’ स्वीकार करना होगा। दो या तीन कटोरे पकवान स्वीकार करने के बाद उसे इन्हें अन्य भिक्खुओं के साथ बाँटना होगा। यही सम्यक आचरण है।

यदि कोई भिक्खु जो संघ के किसी विहार में ठहरा हुआ है, प्रस्थान के पहले अपने द्वारा बिछाए गए या बिछवाए गए बिस्तरे को न ही समेटता है, न ही समेटवाता है, या यदि वह बिना विदाई लिए चला जाता है तो उसे अपराध स्वीकरण करना होगा।

क्या आप बता सकते हैं कि ये नियम क्यों बने?

बुढ़ के जीवनकाल में और उनकी मृत्यु के बाद भी बौढ़ धर्म तेजी से फैला। इसका कारण यह था कि लोग समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असंतुष्ट थे और उस युग में तेजी से हो रहे सामाजिक बदलावों ने उन्हें उलझनों में बाँध रखा था। बौढ़ शिक्षाओं में जन्म के आधार पर श्रेष्ठता की बजाय जिस तरह अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्व दिया गया उससे महिलाएँ और पुरुष इस धर्म की तरफ़ आकर्षित हुए। खुद से छोटे और कमजोर लोगों की तरफ़ मित्रता और करणा के भाव को महत्व देने के आदर्श काफ़ी लोगों को भाए।

→ चर्चा कीजिए...

पुन्ना जैसी दासी संघ में क्यों जाना चाहती थी?

7. स्तूप

हमने देखा कि बौढ़ आदर्श और व्यवहार ब्राह्मण, जैन तथा कई अन्य परंपराओं के साथ संवाद और तर्क-वितर्क की प्रक्रिया से उभरे। इनमें से कई परंपराओं के विचार और आचार ग्रंथों में नहीं लिखे गए। इस तरह के मेलजोल को हम पवित्र स्थलों के उभरने की प्रक्रिया को देखकर भी समझ सकते हैं।

बहुत प्राचीन काल से ही लोग कुछ जगहां को पवित्र मानते थे। अक्सर जहाँ खास वनस्पति होती थी, अनूठी चढ़ानें थीं या विस्मयकारी प्राकृतिक सौंदर्य था, वहाँ पवित्र स्थल बन जाते थे। ऐसे कुछ स्थलों पर एक छोटी-सी वेदी भी बनी रहती थीं जिन्हें कभी-कभी चैत्य कहा जाता था।

बौढ़ साहित्य में कई चैत्यों की चर्चा है। इसमें बुढ़ के जीवन से जुजुड़ी जगहों का भी वर्णन है-जहाँँ वे जन्मे थे (लुम्बिनी), जहाँँ उन्होंने शवदाह के बाद शरीर के कुछ अवशेष टीलों पर सुरक्षित रख दिए जाते थे। अंतिम संस्कार से जुड़े ये टीले चैत्य के रूप में जाने गए।

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स्रोत 8

स्तूप क्यों बनाए जाते थे?

यह उद्धरण महापरिनिब्बान सुक्त से लिया गया है जो सुक्त पिटक का हिस्सा है :

परिनिर्वाण से पूर्व आनंद ने पूछाः

भगवान हम तथागत (बुढ़ का दूसरा नाम) के अवशेषों का क्या करेंगे?

बुब्द्र ने कहा, “तथागत के अवशेषों को विशेष आदर देकर खुद को मत रोको। धर्मोत्साही बनो, अपनी भलाई के लिए प्रयास करो।”

लेकिन विशेष आग्रह करने पर बुढ़ बोले :

“उन्हें तथागत के लिए चार महापथों के चौक पर थूप (स्तूप का पालि रूप) बनाना चाहिए। जो भी वहाँ धूप या माला चढ़ाएगा... या वहाँ सिर नवाएगा, या वहाँ पर हद्य में शांति लाएगा, उन सबके लिए वह चिर काल तक सुख और आनंद का कारण बनेगा।”

चित्र 4.15 को देखकर क्या आप इनमें से कुछ रीति-रिवाज्नों को पहचान सकते हैं?

ज्ञान प्राप्त किया (बोधगया), जहाँ उन्होंने प्रथम उपदेश दिया (सारनाथ) और जहाँ उन्होंने निब्बान प्राप्त किया (कुशीनगर)। धीरे-धीरे ये सारी जगहें पवित्र स्थल बन गई। हमें यह मालूम है कि बुढ़ के समय से लगभग दो सौ वर्षों बाद असोक ने लुम्बिनी की अपनी यात्रा की याद में एक स्तंभ बनवाया।

7.1 स्तूपों का निर्माण क्यों किया जाता था?

ऐसी कई अन्य जगहें थीं जिन्हें पवित्र माना जाता था। इन जगहों पर बुढ़ से जुड़े कुछ अवशेष जैसे उनकी अस्थियाँं या उनके द्वारा प्रयुक्त सामान गाड़ दिए गए थे। इन टीलों को स्तूप कहते थे।

स्तूप बनाने की परंपरा बुढ़ से पहले की रही होगी, लेकिन वह बौढ़ धर्म से जुड़ गई। चृँकि उनमें ऐसे अवशेष रहते थे जिन्हें पवित्र समझा जाता था, इसलिए समूचे स्तूप को ही बुढ़ और बौढ़ धर्म के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठा मिली। अशोकावदान नामक एक बौढ़ ग्रंथ के अनुसार असोक ने बुढ़ के अवशेषों के हिस्से हर महत्वपूर्ण शहर में बाँट कर उनके ऊपर स्तूप बनाने का आदेश दिया। ईसा पूर्व दूसरी सदी तक भरहुत, साँँची और सारनाथ जैसी जगहों पर (मानचित्र 1) स्तूप बनाए जा चुके थे।

7.2 स्तूपों का निर्माण कैसे हुआ?

स्तूपों की वेदिकाओं और स्तंभों पर मिले अभिलेखों से इन्हें बनाने और सजाने के लिए दिए गए दान का पता चलता है। कुछ दान राजाओं के द्वारा दिए गए थे (जैसे सातवाहन वंश के राजा), तो कुछ दान शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियों द्वारा दिए गए। उदाहरण के लिए, साँँची के एक तोरणद्वार का हिस्सा हाथी दाँत का काम करने वाले शिल्पकारों के दान से बनाया गया था। सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों ने दान के अभिलेखों में अपना नाम बताया है। कभी-कभी वे अपने गाँव या शहर का नाम बताते हैं और कभी-कभी अपना पेशा और रिश्तेदारों के नाम भी बताते है। इन इमारतों को बनाने में भिक्खुओं और भिक्खुनियों ने भी दान दिया।

7.3 स्तूप की संरचना

स्तूप (संस्कृत अर्थ टीला) का जन्म एक गोलार्थ लिए हुए मिट्री के टीले से हुआ जिसे बाद में अंड कहा गया। धीरे-धीरे इसकी संरचना ज्यादा जटिल हो गई जिसमें कई चौकोर और गोल आकारों का संतुलन बनाया गया। अंड के ऊपर एक हर्मिका होती थी। यह छज्जे जैसा ढाँँचा देवताओं के घर का प्रतीक था। हर्मिका से एक मस्तूल निकलता था जिसे यष्टि कहते थे जिस पर अक्सर एक छत्री लगी होती थी। टीले के चारों ओर एक वेदिका होती थी जो पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करती थी।

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साँची और भरहुत के प्रारंभिक स्तूप बिना अलंकरण के हैं सिवाए इसके कि उनमें पत्थर की वेदिकाएँ और तोरणद्वार हैं। ये पत्थर की वेदिकाएँ किसी बाँस के या काठ के घेरे के समान थीं और चारों दिश्जाओं में खड़े तोरणद्वार पर खूब नक्काशी की गई थी। उपासक पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश करके टीले को दाई तरफ्र रखते हुए दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे, मानो वे आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण कर रहे हों। बाद में स्तूप के टीले पर भी अलंकरण और नक्काशी की जाने लगी। अमरावती और पेशावर (पाकिस्तान) में शाह जी की ढेरी में स्तूपों में ताख और मूर्तियाँ उत्कीर्ण करने की कला के काफ़ी उदाहरण मिलते हैं।

चित्र 4.9

साँंची का एक दानात्मक अभिलेख

ऐसे सैकड़ों अभिलेख भरहुत और अमरावती में

भी मिले हैं।

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साँची के महास्तूप के मापचित्र

(चित्र 4.10 क) और छायाचित्र

(चित्र 4.3) में क्या समानताएँ और फ़र्क हैं?

इस इमारत की कौन-सी

विशेषताएँ नक्शे में सबसे ज्यादा

स्पष्ट हैं? कौन-सी विशेषताएँ

ऊर्धवस्थ परिप्रेक्ष्य से देखने पर ज्यादा स्पष्ट होती हैं?

चित्र 4.10 (क)
चित्र 4.10 (क)

साँंची के महास्तूप की योजना

यह उस इमारत का समतलीय परिप्रेक्ष्य दिखाता है।

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चित्र 4.10 (ख)
चित्र 4.10 (ख)

महास्तूप की ऊँचाई

ऊर्धर्वस्थ परिप्रेक्ष्य में

8. स्तूपों की 'खोज'

अमरावती और साँची की नियति

जैसा कि हमने देखा हर स्तूप का अपना इतिहास है। कुछ इतिहास हमें बताते हैं कि वे कैसे बने। साथ-साथ इनकी खोज का भी इतिहास है। अब हम इनकी खोज के इतिहास पर एक नज्ञर डालें। 1796 में एक स्थानीय राजा को जो मांदिर बनाना चाहते थे, अचानक अमरावती के स्तूप के अवशेष मिल गए। उन्होंने उसके पत्थरों के इस्तेमाल करने का निश्चय किया। उन्हें ऐसा लगा कि इस छोटी सी पहाड़ी में संभवतः कोई खज्ञाना छुपा हो। कुछ वर्षों के बाद कॉलिन मेकेज़ी नामक एक अंग्रेज़ अधिकारी इस इलाके से गुज्ञरे (अध्याय 7 भी देखिए)। हालौँकि उन्होंने कई मूर्तियाँ पाई और उनका विस्तृत चित्रांकन भी किया, लेकिन उनकी रिपोर्ट कभी छपी नहीं।

चित्र 4.11

साँची का पूर्वी तोरणद्धार

सजीव मूर्तियों को देखिए।

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1854 में गुंटूर (आंध्र प्रदेश) के कमिश्नर ने अमरावती की यात्रा की। उन्होंने कई मूर्तियाँ और उत्कीर्ण पत्थर जमा किए और वे उन्हें मद्रास ले गए। (इन्हें उनके नाम पर एलियट संगमरमर के नाम से जाना जाता है)। उन्होंने पश्चिमी तोरणद्वार को भी खोज निकाला और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि अमरावती का स्तूप बौढ्छों का सबसे विशाल और शानदार स्तूप था। 1850 के दशक में अमरावती के उत्कीर्ण पत्थर अलग-अलग जगहों पर ले जाए जा रहे थे। कुछ पत्थर कलकत्ता में एशियाटिक सोसायटी ऑफ्र बंगाल पहुँचे, तो कुछ मद्रास में इंडिया ऑफिस। कुछ पत्थर लंदन तक पहुँच गए। कई अंग्रेज्ञ अधिकारियों के बागों में अमरावती की मूर्तियाँ पाना कोई असामान्य बात नहीं थी। वस्तुतः इस इलाके का हर नया अधिकारी यह कहकर कुछ मूर्तियाँ उठा ले जाता था कि उसके पहले के अधिकारियों ने भी ऐसा किया।

पुरातत्ववेत्ता एच.एच. कोल उन मुटुरी भर लोगों में एक थे जो अलग सोचते थे। उन्होंने लिखा “इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट होने देना मुझे आत्मघाती और असमर्थनीय नीति लगती है।” वे मानते थे कि संग्रहालयों में मूर्तियों की प्लास्टर प्रतिकृतियाँ रखी जानी चाहिए जबकि असली कृतियाँ खोज की जगह पर ही रखी जानी चाहिए। दुर्भाग्य से कोल अधिकारियों को अमरावती पर इस बात के लिए राजी नहीं कर पाए। लेकिन खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात को साँँची के लिए मान लिया गया।

साँची क्यों बच गया जबकि अमरावती नष्ट हो गया? शायद अमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गई थी। तब तक विद्वान इस बात के महत्व को नहीं समझ पाए थे कि किसी पुरातात्विक अवशेष को उठाकर ले जाने की बजाय खोज की जगह पर ही संरक्षित करना कितना महत्वपूर्ण था। 1818 में जब साँची की खोज हुई, इसके तीन तोरणद्वार तब भी खड़े थे। चौथा वहीं पर गिरा हुआ था और टीला भी अच्छी हालत में था। तब भी यह सुझाव आया कि तोरणद्वारों को पेरिस या लंदन भेज दिया जाए। अंततः कई कारणों से साँची का स्तूप वहीं बना रहा और आज भी बना हुआ है जबकि अमरावती का महाचैत्य अब सिर्फ एक छोटा सा टीला है जिसका सारा गौरव नष्ट हो चुका है।

9. मूर्तिकला

हमने अभी-अभी पढ़ा है कि किस तरह से स्तूपों से मूर्तियों को यूरोप ले जाया गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जिन लोगों ने मूर्तियों को देखा उन्हें ये खूबसूरत और मूल्यवान लगीं। इसलिए वे उन्हें अपने लिए रखना चाहते थे। आइए, हम इन मूर्तियों को ध्यान से देखें।

9.1 पत्थर में गढ़ी कथाएँ

आपने ऐसे घुमक्कड़ कथावाचकों को देखा होगा जो अपने साथ कपड़ों या कागज्ञ पर बने चित्रों (चारणचित्र) को लेकर घूमते हैं। जब वे कहानी कहते हैं तब वे इन चित्रों को दिखाते हैं।

चित्र 4.13 देखिए। पहली बार देखने पर तो इस मूर्तिकला अंश में फूस की झाँपड़ी और पेड़ों वाले ग्रामीण दृश्य का चित्रण दिखता है। परंतु वे कला इतिहासकार जिन्होंने साँची की इस मूर्तिकला का गहराई से अध्ययन किया है, इसे वेसान्तर जातक से लिया गया एक दृश्य बताते हैं। यह कहानी एक ऐसे दानी राजकुमार के बारे में है जिसने अपना सब कुछ एक ब्राह्मण को सौप दिया और स्वयं अपनी पत्नी और बच्चों के

→ चर्चा कीजिए...

खंड एक को दुबारा पढ़िए। कारण बताइए कि साँची क्यों बच गया।

चित्र 4.12

तोरण का एक हिस्सा

क्या आपको ऐसा लगता है कि साँँची के तक्षक पटचित्र को खुलते हुए दर्शना चाह रहे थे?

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चित्र 4.13
चित्र 4.13

साथ जंगल में रहने चला गया। जैसा कि इस उदाहरण से स्पष्ट है अक्सर इतिहासकार किसी मूर्तिकला की व्याख्या लिखित साक्ष्यों के साथ तुलना के द्वारा करते हैं।

9.2 उपासना के प्रतीक

बौढ़ मूर्तिकला को समझने के लिए कला इतिहासकारों को बुढ़ के चरित लेखन के बारे में समझ बनानी पड़ी। बौढ़चरित लेखन के अनुसार एक बृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए बुढ़ को ज्ञान प्राप्ति हुई। कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुढ़ को मानव रूप में न दिखाकर उनकी उपस्थिति प्रतीकों के माध्यम से दर्शाने का प्रयास किया। उदाहरणतः, रिक्त स्थान (चित्र 4.14) बुढ़ के ध्यान की दशा तथा स्तूप (चित्र 4.15) महापरिनिब्बान के प्रतीक बन गए। चक्र का भी प्रतीक के रूप में प्रायः इस्तेमाल किया गया (चित्र 4.16)। यह बुढ़ द्वारा सारनाथ में दिए गए पहले उपदेश का प्रतीक था। जैसा कि स्पष्ट है ऐसी मूर्तिकला को अक्षरशः नहीं समझा जा सकता है। उदाहरणतः, पेड़ का तात्पर्य केवल एक पेड़ नहीं था वरन्

चित्र 4.14 (नीचे दाई ओर)

बोधि वृक्ष की पूजा

चित्र में वृक्ष, आसन और उसके चारों ओर जन-समुदाय के चित्रण पर ध्यान दीजिए।

चित्र 4.15 (नीचे मध्य में)

स्तूप की पूजा

चित्र 4.16 (नीचे बाई ओर)

धर्मचक्र प्रवर्तन

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वह बुढ़ के जीवन की एक घटना का प्रतीक था। ऐसे प्रतीकों को समझने के लिए यह जरूरी है कि इतिहासकार कलाकृतियों के निर्माताओं की परंपराओं को जानें।

9.3 लोक परंपराएँ

चित्र 4.17

तोरणद्वार पर एक स्त्री

साँँची में उत्कीर्णित बहुत सी अन्य

मूर्तियाँ शायद बौढ़ मत से सीधी जुड़ी नहीं

थीं। इनमें कुछ सुंदर स्त्रियाँ भी मूर्तियों में

उत्कीर्णित हैं जो तोरणद्वार के किनारे एक पेड़

पकड़ कर झूलती हुई (चित्र 4.17) दिखती हैं।

शुरू-शुरू में विद्धान इस मूर्ति के महत्व के बारे में

थोड़े असमंजस में थे। इस मूर्ति का त्याग और तपस्या

से कोई रिश्ता नज़र नहीं आता था लेकिन साहित्यिक

परंपराओं के अध्ययन से वे समझ पाए कि यह संस्कृत भाषा में वर्णित शालभॉजिका की मूर्ति है। लोक परंपरा में यह माना जाता था कि इस स्त्री ढ्वारा छुए जाने से वृक्षों में फूल खिल उठते थे और फल होने लगते थे। ऐसा लगता है कि यह एक शुभ प्रतीक माना जाता था और इस कारण स्तूप के अलंकरण में प्रयुक्त हुआ। शालभॉजिका की मूर्ति से पता चलता है कि जो लोग बौढ़ धर्म में आए उन्होंने बुढ़-पूर्व और बौढ़ धर्म से इतर दूसरे विश्वासों, प्रथाओं और धारणाओं से बौढ़ धर्म को समृढ़

किया। साँँची की मूर्तियों में पाए गए कई प्रतीक या चिह्न निश्चय

ही इन्हीं परंपराओं से उभरे थे। उदाहरण के लिए, जानवरों

के कुछ बहुत खूबसूरत उत्कीर्णन यहाँ पर पाए गए हैं।

इन जानवरों में हाथी, घोड़े, बंदर और गाय-बैल शामिल

हैं। हालाँकि साँची में जातकों से ली गई जानवरों की

कई कहानियाँ हैं, ऐसा लगता है कि यहाँ पर लोगों को

आकर्षित करने के लिए जानवरों का उत्कीर्णन किया

गया था। साथ ही जानवरों को मनुष्यों के गुणों के

प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। उदाहरण के

लिए, हाथी शक्ति और ज्ञान के प्रतीक माने जाते थे।

इन प्रतीकों में कमल दल और हाथियों के बीच एक

चित्र 4.18

साँची में एक हाथी

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चित्र 4.19गजलक्ष्मी
चित्र 4.19गजलक्ष्मी

चित्र 4.20

अजंता से एक चित्र

बैठे हुए व्यक्ति और उनके सेवकों

पर गौर कीजिए।

चित्र 4.21

साँची में सर्प

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अतीत से प्राप्त चित्र

पत्थर की कलाकृतियाँ लंबे समय तक सुरक्षित बच जाती हैं। इसलिए इतिहासकारों को यह आसानी से उपलब्ध हो जाता है। लेकिन अतीत में चित्रकारी जैसे संप्रेषण के दूसरे माध्यम भी इस्तेमाल किए जाते थे। उनमें जो सबसे अच्छी हालत में बचे हुए हैं वे गुफाओं की दीवारों पर बने चित्र हैं। इनमें अजंता (महाराष्ट्र) की चित्रकारी काफ़ी प्रसिद्धे है।

अजंता के चित्र जातकों की कथाएँ दिखाते हैं। इनमें राज दरबार का जीवन, शोभा यात्राएँ, काम करते हुए स्त्री-पुरुष और त्यौहार मनाने के चित्र दिखाए गए हैं। कलाकारों ने त्रिविम रूप देने के लिए आभाभेद तकनीक का प्रयोग किया। कुछ चित्र बिल्कुल स्वाभाविक और सजीव लगते हैं।

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महिला की मूर्ति प्रमुख है (चित्र 4.19)। ये हाथी उनके ऊपर जल छिड़क रहे हैं जैसे वे उनका अभिषेक कर रहे हों। जहाँ कुछ इतिहासकार उन्हें बुढ़ की माँँ माया से जोड़ते हैं तो दूसरे इतिहासकार उन्हें एक लोकप्रिय देवी गजलक्ष्मी मानते हैं। गजलक्ष्मी सौभाग्य लाने वाली देवी थीं जिन्हें प्रायः हाथियों के साथ जोड़ा जाता है। यह भी संभव है कि इन उत्कीर्णित मूर्तियों को देखने वाले उपासक इसे माया और गजलक्ष्मी दोनों से जोड़ते थे।

कई स्तंभों पर दिखाए गए सपों को भी देखिए (चित्र 4.21)। यह प्रतीक भी ऐसी लोक परंपराओं से लिया गया प्रतीत होता है जिनका ग्रंथों में हमेशा ज्ञिक्र नहीं होता था। दिलचस्प बात यह है कि कला पर लिखने वाले आधुनिक इतिहासकारों में एक शुरुआती इतिहासकार जेम्स फर्गुसन ने साँँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र माना था। वे बौढ्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे। तब तक ज्यादातर बौढ्ध ग्रंथों का अनुवाद नहीं हुआ था। इसलिए उन्होंने सिफ्रे उत्कीर्णित मूर्तियों का अध्ययन करके अपने निष्कर्ष निकाले थे।

10. नयी धार्मिक परंपराएँ

10.1 महायान बौढ़ मत का विकास

ईसा की प्रथम सदी के बाद बौढ़ अवधारणाओं और व्यवहार में बदलाव नज्तर आते हैं। प्रारंभिक बौढ़ मत में निब्बान के लिए व्यक्तिगत प्रयास को विशेष महत्व दिया गया था। बुढ़ को भी एक मनुष्य समझा जाता था जिन्हांने व्यक्तिगत प्रयास से प्रबोधन और निब्बान प्राप्त किया। परंतु धीरे-धीरे एक मुक्तिदाता की कल्पना उभरने लगी। यह विश्वास किया जाने लगा कि वे मुक्ति दिलवा सकते थे। साथ-साथ बोधिसत्त की अवधारणा भी उभरने लगी। बोधिसत्तों को परम करुणामय जीव माना गया जो अपने सत्कायों से पुण्य कमाते थे। लेकिन वे इस पुण्य का प्रयोग दुनिया को दुखों में छोड़ देने के लिए और निब्बान प्राप्ति के लिए नहीं करते थे। बल्कि वे इससे दूसरों की सहायता करते थे। बुढ़ और बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग बन गई।

चिंतन की इस नयी परंपरा को महायान के नाम से जाना गया। जिन लोगों ने इन विश्वासों को अपनाया उन्होने पुरानी परंपरा को हीनयान नाम से संबोधित किया।

हीनयान या थेरवाद?

महायान के अनुयायी दूसरी बौढ़ परंपराओं के समर्थकों को हीनयान के अनुयायी कहते थे। लेकिन, पुरातन परंपरा के अनुयायी खुद को थेरवादी कहते थे। इसका मतलब है वे लोग जिन्होंने पुराने, प्रतिष्ठित शिक्षकों (जिन्हें थेर कहते थे) के बताए रास्ते पर चलने वाले।

→ चर्चा कीजिए...

मूर्तिकला के लिए हड्डियों, मिट्री और धातुओं का भी इस्तेमाल होता है। इनके विषय में पता कीजिए।

चित्र 4.22

पहली सदी की बुँछ मूर्ति, मथुरा

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चित्र 4.23

विष्णु का वराह अवतार जिसमें उन्हें पृथ्वी देवी को बचाते हुए दिखाया गया है। (लगभग छठी सदी, एहोल, कर्नाटक)

मूर्ति में दी गई आकृतियों के आपसी अनुपात में फ़र्क से क्या बात समझ में आती है?

10.2 पौराणिक हिंदू धर्म का उद्य

मुक्तिदाता की कल्पना सिर्फ बौढ़ धर्म तक सीमित नहीं थी। हम पाते हैं कि इसी तरह के विश्वास एक अलग ढंग से उन परंपराओं में भी विकसित हो रहे थे जिन्हें आज हिंदू धर्म के नाम से जाना जाता है। इसमें वैष्णव (वह हिंदू परंपरा जिसमें विष्णु को सबसे महत्वपूर्ण देवता माना जाता है) और शैव (वह संकल्पना जिसमें शिव परमेश्वर है) परंपराएँ शामिल हैं। इनके अंतर्गत एक विशेष देवता की पूजा को खास महत्व दिया जाता था। इस प्रकार की आराधना में उपासना और ईश्वर के बीच का रिश्ता प्रेम और समर्पण का रिश्ता माना जाता था। इसे भक्ति कहते हैं।

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वैष्णाववाद में कई अवतारों के इर्द-गिर्द पूजा पढ़तियाँ विकसित हुई। इस परंपरा के अंदर दस अवतारों की कल्पना है। यह माना जाता था कि पापियों के बढ़ते प्रभाव के चलते जब दुनिया में अव्यवस्था और नाश की स्थिति आ जाती थी तब विश्व की रक्षा के लिए भगवान अलग-अलग रूपों में अवतार लेते थे। संभवतः अलग-अलग अवतार देश के भिन्न-भिन्न हिस्सों में लोकप्रिय थे। इन सब स्थानीय देवताओं को विष्णु का रूप मान लेना एकीकृत धार्मिक परंपरा के निर्माण का एक महत्वपूर्ण तरीका था।

कई अवतारों को मूर्तियों के रूप में दिखाया गया है। दूसरे देवताओं की भी मूर्तियाँ बनीं। शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में बनाया जाता था। लेकिन उन्हें कई बार मनुष्य के रूप में भी दिखाया गया है। ये सारे चित्रण देवताओं से जुड़ी हुई मिश्रित अवधारणाओं पर आधारित थे। उनकी खूबियों और प्रतीकों को उनके शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुधों (हथियार और हाथ में धारण किए गए अन्य शुभ अस्त्र) और बैठने की शैली से इंगित किया जाता था।

इन मूर्तियों के अंकन का मतलब समझने के लिए इतिहासकारों को इनसे जुड़ी हुई कहानियों से परिचित होना पड़ता है। कई कहानियाँ प्रथम सहस्पाब्दि के मध्य से ब्राहाणों ढ़ारा रचित पुराणों में पाई जाती हैं। इनमें बहुत से किस्से ऐसे हैं जो सैकड़ों वर्ष पहले रचने के बाद सुने-सुनाए जाते रहे थे। इनमें देवी-देवताओं की भी कहानियाँ हैं। सामान्यतः इन्हें संस्कृत श्लोकों में लिखा गया था। इन्हें ऊँची आवाज्ञ में पढ़ा जाता था जिसे कोई भी सुन सकता था। महिलाएँ और शूद्र जिन्हें वैदिक साहित्य पढ़ने-सुनने की अनुमति नहीं थी, पुराणों को सुन सकते थे।

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पुराणों की ज्यादातर कहानियाँ लोगों के आपसी मेल-मिलाप से विकसित हुई। पुजारी, व्यापारी और सामान्य स्त्री-पुरुष एक से दूसरी जगह आते-जाते हुए अपने विश्वासों और अवधारणाओं का आदान-प्रदान करते थे। उदाहरण के लिए, हम यह जानते हैं कि वासुदेव-कृष्ण मथुरा इलाके के महत्वपूर्ण देवता थे। कई शताब्दियों के दौरान उनकी पूजा देश के दूसरे इलाकों में भी फैल गई।

10.3 मंदिरों का बनाया जाना

जिस समय साँची जैसी जगहां में स्तूप अपने विकसित रूप में आ गए थे उसी समय देवी-देवताओं की मूर्तियों को रखने के लिए सबसे पहले मंदिर भी बनाए गए। शुरू के मंदिर एक चौकोर कमरे के रूप में थे जिन्हें गर्भगृह कहा जाता था। इनमें एक दरवाजा होता था जिससे उपासक मूर्ति की पूजा करने के लिए भीतर प्रविष्ट हो सकता था। धीरे-धीरे गर्भगृह के ऊपर एक ऊँचा ढाँचा बनाया जाने लगा जिसे शिखर कहा चित्र 4.24 महाबलीपुरम् (तमिलनाडु) में दुर्गा की एक मूर्ति (छठी सदी)

कलाकारों ने किस प्रकार गति को दिखाने की कोशिश की है? इस मूर्ति में बताई कहानी के बारे में जानकारी इकटुरी कीजिए।

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चित्र 4.25

एक मंदिर, देवगढ़ (उत्तर प्रदेश), पाँँचवीं सदी

ं गर्भगृह के प्रवेशद्वार और शिखर के अवशेषों को पहचानें।

जाता था। मंदिर की दीवारों पर अक्सर भिति चित्र उत्कीर्ण किए जाते थे। बाद के युगों में मंदिरों के स्थापत्य का काफ़ी विकास हुआ। अब मंदिरों के साथ विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें और तोरण भी जुड़ गए। जल आपूर्ति (देखिए अध्याय 7) का इंतज्ञाम भी किया जाने लगा।

शुरु-शुरु के मंदिरों की एक खास बात यह थी कि इनमें से कुछ पहाड़ियों को काट कर खोखला करके कृत्रिम गुफाओं के रूप में बनाए गए थे। कृत्रिम गुफाएँ बनाने की परंपरा काफ़ी पुरानी थी (चित्र 4.27)।

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चित्र 4.26

शेषनाग पर आराम करते विष्णु की मूर्ति, देवगढ़ (उत्तर प्रदेश), पाँँचवीं सदी

सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए बनाई गई थीं।

यह परंपरा अलग-अलग चरणों में विकसित होती रही। इसका सबसे विकसित रूप हमें आठवीं सदी के कैलाशनाथ (शिव का एक नाम) के मंदिर में नज्ञर आता है जिसमें पूरी पहाड़ी काटकर उसे मंदिर का रूप दे दिया गया था।

एक ताम्रपत्र अभिलेख एलोरा के प्रमुख तक्षक द्वारा इसका निर्माण समाप्त करने के बाद उसके आश्चर्य को व्यक्त करता है “हे भगवान यह मैने कैसे बनाया!”

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चित्र 4.27
बराबर (बिहार) की गुफाएँ, लगभग तीसरी सदी
ईसा पूर्व
चित्र 4.27 बराबर (बिहार) की गुफाएँ, लगभग तीसरी सदी ईसा पूर्व

चित्र 4.28 कैलाशनाथ मंदिर, एलोरा (महाराष्ट्र) यह सारा ढाँंचा एक चट्ट्रान को काटकर तैयार क्रिया गया है।

11. क्या हम सब कुछ देख-समझ सकते हैं?

अब तक आपको हमारे अतीत की समृद्ध दृश्य परंपराओं की एक झलक मिल चुकी है। ये परंपराएँ ईट और पत्थर से निर्मित स्थापत्य कला, मूर्ति कला और चित्रकला के रूप में हमारे सामने आई है। हमने पाया कि समय के बहाव में बहुत कुछ नष्ट हो गया है। लेकिन जो बचा है और संरक्षित है वह हमें इन भव्य कलाकृतियों के निर्माताओं-कलाकारों, मूर्तिकारों, राजगीरों और वास्तुकारों की दृष्टि से परिचित कराता है। लेकिन क्या हम उनके संदेश को बिना दुविधा के अपने-आप समझ सकते है? क्या हम कभी यह पूरी तरह से समझ पाएँगे कि जो लोग इन प्रतिकृतियों को देखते और पूजते थे उनके लिए इनका क्या महत्व था?

11.1 अनजाने को समझने की कोशिश

यह स्मरणीय है कि यूरोप के विद्वानों ने उन्नीसवीं सदी में जब देवी-देवताओं की मूर्तियाँ देखां तो वे उनकी पृष्ठभूमि और महत्व को नहीं समझ पाए। कई सिरों, हाथों वाली या मनुष्य और जानवर के रूपों को मिलाकर बनाई गई मूर्तियाँ उन्हें विकृत लगती थीं और कई बार वे घृणा से भर जाते थे।

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इन शुरू-शुरू के विद्धानों ने ऐसी अजीबोगरीब मूर्तियों की समझ बनाने के लिए उनकी तुलना एक ऐसी परंपरा से की जिससे वे परिचित थे। यह थी प्राचीन यूनान की कला परंपरा। हालॉँकि वे प्रारंभिक भारतीय मूर्तिकला को यूनान की कला से निम्न स्तर का मानते थे, बुढ़ और बोधिसत्त की मूर्तियों की खोज से वे काफ़ी उत्साहित हुए। ऐसा इसलिए हुआ कि ये मूर्तियाँ यूनानी प्रतिमानों से प्रभावित थीं। ये मूर्तियाँ ज्यादातर तक्षशिला और पेशावर जैसे उत्तर-पश्चिम के नगरों में मिली थीं। इन इलाकों में ईसा से दो सौ साल पहले भारतीय-यूनानी शासकों ने राज्य बनाए थे। ये मूर्तियाँ यूनानी मूर्तियों से काफ़ी मिलती-जुलती थीं। चृँकि ये विद्धान यूनानी परंपरा से परिचित थे, इसलिए उन्होंने इन्हें भारतीय मूर्ति कला का सर्वश्रेष्ठ नमूना माना। परिणामतः इन विद्धानों ने इस कला को समझने के लिए एक तरीका अपनाया जो हम सब अक्सर अपनाते हैं - परिचित चीजों के आधार पर अपरिचित चीजों को समझने का पैमाना तैयार करना।

11.2 यदि लिखित और दृश्य का मेल न हो...

एक और समस्या पर नजर डालिए। हमने पाया कि किसी मूर्ति का महत्व और संदर्भ समझने के लिए कला के इतिहासकार अक्सर लिखित ग्रंथों से जानकारी इकटुी करते हैं। भारतीय मूर्तियों की यूनानी मूर्तियों से तुलना कर निष्कर्ष निकालने की अपेक्षा यह निश्चय ही ज्यादा बेहतर तरीका है। लेकिन यह बहुत आसान नहीं। इसका सबसे दिलचस्प उदाहरण है महाबलीपुरम (तमिलनाडु) में एक विशाल चट्टान पर उत्कीर्ण मूर्तियाँ।

निश्चय ही चित्र 4.30 में किसी कथा का सजीव चित्रण किया गया है। लेकिन यह कौन-सी कथा है? कला इतिहासकारों ने पुराणों के साहित्य में इस कथा को पहचानने के लिए काफ़ी खोजबीन की है। लेकिन उनमें काफ़ी

चित्र 4.29

गांधार का एक बोधिसत्त

उनके कपड़ों और केश विन्यास पर ध्यान दीजिए। मतभेद हैं। कुछ का मानना है कि इसमें गंगा नदी के स्वर्ग से अवतरण का चित्रण है। चट्टान की सतह के मध्य प्राकृतिक दरार शायद नदी को दिखा रही है। यह कथा महाकाव्यों और पुराणों में वर्णित है। दूसरे विद्धान मानते हैं कि यहाँ पर दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए महाभारत में दी गई अर्जुन की तपस्या को दिखाया गया है। वे मूर्तियों के बीच एक साधु को केंद्र में रखे जाने की बात को महत्व देते हैं।

अंततः हमें यह याद रखना चाहिए कि बहुत से रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास और व्यवहार इमारतों, मूर्तियों या चित्रकला के द्वारा स्थायी दृश्य माध्यमों के रूप में दर्ज नहीं किए गए। इनमें दिन-प्रतिदिन और विशिष्ट अवसरों के रीति-रिवाज शामिल हैं। कई लोगों और समुदायों को चिरस्थायी विवरण रखने की जरूरत महसूस नहीं हुई हो। संभव है कि धार्मिक गतिविधियों और दार्शनिक मान्यताओं की उनकी सक्रिय परंपरा रही हो। वस्तुतः हमने इस अध्याय में जिन शानदार उदाहरणों को चुना है वे एक विशाल ज्ञान राशि की मात्र ऊपरी परत हैं।

→ चर्चा कीजिए...

आपने कोई भी धार्मिक अनुष्ठान देखा हो तो उसका वर्णन कीजिए। क्या इसे किसी रूप में हमेशा के लिए दर्ज किया जाता है?

चित्र 4.30

महाबलीपुरम् में शैल शिल्प का समूह

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लगभग 1500-1000 ई. पू.प्रारंभिक वैदिक परंपराएँ
लगभग 1000-500 ई. पू.उत्तर वैदिक परंपराएँ
लगभग छठी सदी ई. पू.प्रारंभिक उपनिषद, जैन धर्म, बौढ़ धर्म
लगभग तीसरी सदी ई. पू.आरंभिक स्तूप
लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगेमहायान बौढ़ मत का विकास, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराएँ
लगभग तीसरी सदी ईसवीसबसे पुराने मंदिर
उन्नीसवीं सदी
1814डँडियन म्यूजियम, कलकत्ता की स्थापना
1834रामराजा लिखित एसेज्ञ ऑँन द आर्किटैक्चर ऑँफ्र द हिंदूज्ञ का प्रकाशन; कनिंघम ने सारनाथ के स्तूप की छानबीन की
1835-1842जेम्स फर्गुसन ने महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों का सर्वेक्षण किया
1851गवर्नमेंट म्यूजियम, मद्रास की स्थापना
1854अलेकर्जेंडर कनिंघम ने भिलसा टोप्स लिखी जो साँची पर लिखी गई सबसे प्रारंभिक पुस्तकों में से एक है
1878राजेंद्र लाल मित्र की पुस्तक, बुछ्ठ गया : द हेरिटेज्ञ ऑँफ्र शाक्य मुनि का प्रकाशन
1880एच.एच. कोल को प्राचीन इमारतों का संग्रहाध्यक्ष बनाया गया
1888टेजर-ट्रोव एक्ट का बनाया जाना। इसके अनुसार सरकार पुरातात्विक महत्व की किंसी भी चीज्ञ को हस्तगत कर सकती थी
बीसवीं सदी
1914जॉन मार्शल और अल्फ्रेड फूसे की द माँन्युमेंट्स ऑँफ्र साँची पुस्तक का प्रकाशन
1923जॉन मार्शल की पुस्तक कंजर्वेशन मैनुअल का प्रकाशन
1955प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय संग्रहालय, नयी दिल्ली की नीव रखी
1989साँची को एक विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया
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उत्तर दीजिए (लगभग 100-150 शब्दों में)

•
क्या उपनिषदों के दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भिन्न थे? अपने जवाब के पक्ष में तर्क दीजिए।
•
जैन धर्म की महत्वपूर्ण शिक्षाओं को संक्षेप में लिखिए।
•
साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका की चर्चा कीजिए।
•
निम्नलिखित संक्षिप्त अभिलेख को पढ़िए और जवाब दीजिए : महाराजा हुविष्क (एक कुषाण शासक) के तैंतीसवें साल में गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन त्रिपिटक जानने वाले भिक्खु बल की शिष्या, त्रिपिटक जानने वाली बुढ़मिता के बहन की बेटी भिक्खुनी धनवती ने अपने माता-पिता के साथ मधुवनक में बोधिसत्त की मूर्ति स्थापित की।
•
(क) धनवती ने अपने अभिलेख की तारीख कैसे निश्चित की?
•
(ख) आपके अनुसार उन्होंने बोधिसत की मूर्ति क्यों स्थापित की?
•
(ग) वे अपने किन रिश्तेदारों का नाम लेती हैं?
•
(घ) वे कौन-से बौढ़ ग्रंथों को जानती थीं?
•
(ड.) उन्होंने ये पाठ किससे सीखे थे?

5. आपके अनुसार स्त्री-पुरुष संघ में क्यों जाते थे?

चित्र 4.31

साँची की एक मूर्ति

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निम्नलिखित पर एक संक्षिप्त निबंध लिखिए ( लगभग 500 शब्दों में )

•
साँची की मूर्तिकला को समझने में बौढ़ साहित्य के ज्ञान से कहाँं तक सहायता मिलती है?
•
चित्र 4.32 और 4.33 में साँची से लिए गए दो परिदृश्य दिए गए हैं। आपको इनमें क्या नजर आता है? वास्तुकला, पेड़-पौधे, और जानवरों को ध्यान से देखकर तथा लोगों के काम-धंधों को पहचान कर यह बताइए कि इनमें से कौन से ग्रामीण और कौन से शहरी परिदृश्य हैं?
•
वैष्णववाद और शैववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला और मूर्तिकला के विकास की चर्चा कीजिए।
•
स्तूप क्यों और कैसे बनाए जाते थे? चर्चा कीजिए।
चित्र 4.33चित्र 4.32
चित्र 4.33चित्र 4.32
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मानचित्र कार्य

10. विश्व के रेखांकित मानचित्र पर उन इलाकों पर निशान लगाइए जहाँ बौढ़ धर्म का प्रसार हुआ। उपमहाद्वीप से इन इलाकों को जोड़ने वाले जल और स्थल मागों को दिखाइए।

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परियोजना कार्य (कोई एक)

•
इस अध्याय में चर्चित धार्मिक परंपराओं में से क्या कोई परंपरा आपके अड़ोस-पड़ोस में मानी जाती है? आज किन धार्मिक ग्रंथों का प्रयोग किया जाता है? उन्हें कैसे संरक्षित और संप्रेषित किया जाता है? क्या पूजा में मूर्तियों का प्रयोग होता है? यदि हाँँ तो क्या ये मूर्तियाँ इस अध्याय में लिखी गई मूर्तियों से मिलती-जुलती हैं या अलग हैं? धार्मिक कृत्यों के लिए प्रयुक्त इमारतों की तुलना प्रारंभिक स्तूपों और मंदिरों से कीजिए।
•
इस अध्याय में वर्णित धार्मिक परंपराओं से जुड़े अलग-अलग काल और इलाकों की कम से कम पाँच मूर्तियों और चित्रों की तसवीरें इकट्टी कीजिए। उनके शीर्षक हटाकर प्रत्येक तसवीर दो लोगों को दिखाइए और उन्हें इसके बारे में बताने को कहिए। उनके वर्णनों की तुलना करते हुए अपनी खोज की रिपोर्ट लिखिए।
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यदि आप और जानकारी चाहते हैं तो इन्हें पढ़िए :

ए.एल. बाशम, 1985

द वंडर दैट वाज्ञ इंडिया,

रूपा, कलकता।

एन.एन. भट्टाचार्य, 1996

इंडियन रिलिजियस हिस्टोरियोग्राफ़ी,

मुंशीराम मनोहरलाल,

नयी दिल्ली।

एम.के. धावलीकर, 2003

माँन्युमेंटल लीगेसी ऑफ़ साँँची,

ऑक्सफोर्ड यूनिवसिटी प्रेस,

नयी दिल्ली।

पॉल डुंडास, 1992

द जैनस्,

रूटलेज, लंदन।

गेविन फ्लड, 2004

इंट्रोडकशन टू हिन्दुझ्ज्म,

कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस,

कैंब्रिज।

रिचार्ड एफ. गोम्ब्रिच, 1988

थेरवाद बुद्धिज्म : ए सोशल हिस्ट्री फ्रॉम

एंशियेंट बनारस टू मॉडर्न कोलंबो,

रूटलेज एंड केगन पॉल, लंदन।

बेंजामिन रॉलैंड, 1967

द आर्ट एंड आर्किटेक्चर ऑफ इंडिया :

बुद्धिस्ट/हिंदू/जैन,

पेंगिवन बुक्स, हार्मन्द्सवर्थ।

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ज्यादा जानकारी के लिए आप

निम्नलिखित वेबसाइट देख सकते हैं

http://dsal.uchicago.edu/

images/aiis/

चित्रों हेतु श्रेय

विषय 1

चित्र 1.1, 1.2, 1.3, 1.4, 1.5, 1.6, 1.8, 1.11, 1.12, 1.13, 1.14,

1.15, 1.16, 1.20, 1.22, 1.23, 1.26, 1.28, 1.29, चित्र 1.30 अभ्यास कार्य

भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण तथा भारतीय संग्रहालय, नयी दिल्ली

चित्र 1.7, 1.9, 1.10, 1.17, 1.18, 1.19, 1.21, 1.24:

प्रोफेसर ग्रेगोरी एल. पोशेल

चित्र 1.27:

सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र, नयी दिल्ली

विषय 2

चित्र 2.1: अमेरिकन इस्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज्ञ, गुड़गाँव

चित्र 2.2, 2.6: भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण

चित्र 2.3, 2.5, 2.10:

सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र, नयी दिल्ली

चित्र 2.4, 2.7, 2.9, 2.12, 2.13: भारतीय संग्रहालय, नयी दिल्ली

चित्र 2.8: वाइकीपीडिया

विषय 3

चित्र 3.1, 3.10: भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण

चित्र 3.3, 3.4, 3.5, 3.6, 3.7, 3.8, 3.9: भारतीय संग्रहालय, नयी दिल्ली

विषय 4

चित्र 4.1, 4.5, 4.8, 4.9, 4.12, 4.13, 4.14, 4.15, 4.16, 4.17,

4.18, 4.19, 4.21, 4.22, 4.23, 4.24, 4.25, 4.26, 4.27, 4.29,

4.31, चित्र 4.32 और 33 अभ्यास कार्य में

अमेरिकन इस्टीट्यूट ऑफ़ इंडियन स्टडीज़, गुड़गाँव

चित्र 4.2: वाइकीपीडिया

चित्र 4.3, 4.11, 4.28, 4.30:

सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र, नयी दिल्ली

चित्र 4.4, 4.6, 4.7, 4.20: भारतीय संग्रहालय, नयी दिल्ली